शुक्रवार, 12 जून 2015

अनूठे कलाकार श्रीपत भाई दोसी

माही धरा के रत्न

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अनूठे कलाकार श्रीपत भाई दोसी

कलात्मक टोपियों और फैशनी साज-सज्जा का बेताज बादशाह

 

- डॉ दीपक आचार्य

 

       बांसवाड़ा हर विधा के कलाकारों का गढ़ रहा है। लोढ़ी काशी की इस सरजमीं ने समाज- जीवन व परिवेशीय सरोकारों से जुड़े हर क्षेत्र में एक से बढ़कर एक रत्न दिये हैं जिन्हाेंने विषमताओं, अभावों और गरीबी से संघर्ष कर अनथक परिश्रम से खास मुकाम पाया और बांसवाड़ा को बहुत कुछ दिया।

       यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि ठेठ सुदूरवर्ती क्षेत्र होने की वजह से बांसवाड़ा की कला प्रतिभाओं को प्रचार नहीं मिल पाया और काफी दोष हमारा भी रहा, जिन्हाेंने कृतघ्नता और ईष्र्या की चादरें ओढ़कर प्रतिभाओं को कभी जानने, पहचानने व स्वीकारने की पहल या कोई कोशिश तक कभी नहीं की।

       बांसवाड़ा में जाये जन्मे श्री श्रीपत भाई दोसी उन प्रयोगधर्मा कलाकारों में थे जिन्हाेंने कई विद्याओं में अपने कलात्मक व अन्यतम हुनर की छाप छोड़ी। मधुरभाषी, मिलनसार व हास्य से भरे-पूरे श्रीपत भाई दोसी का जन्म 25 अगस्त 1933 को हुआ। उनकी जीवन यात्रा ने 28 अक्टूम्बर को विराम पा लिया।

       बांसवाड़ा शहर के सदर बाजार में मनहर केप मार्ट एवं श्रीपत लेडिज टेलर के नाम से उनकी दुकान क्षेत्र की मशहूर दुकानों में शामिल रही है।

       तरह-तरह की टोपियों व सम-सामयिक फैशन के मुताबिक टोपियों का व्यवसाय करने वाले श्रीपत भाई कलात्मक साज-सज्जा, आंतरिक व बाहरी डेकोरेशन व मंच सज्जा के बेहतरीन कलाकार थे, जिनकी भागीदारी के बिना कोई सा भव्य कार्यक्रम पूर्ण नहीं होता था। सामाजिक, क्षेत्रीय व राजकीय आयोजनों में उनकी सेवाएं हमेशा सराहना पाती थी।

       बांसवाड़ा में आजादी के तीन दशक बाद तक सभी वर्गों में टोपियों का चलन बरकरार रहा। इस दौरान श्रीपत भाई ही ऎसे थे जिनकी दुकान टोपियों का केन्द्र हुआ करती थी। इनमें परम्परा से लेकर नई-नई फैशनेबल टोपियाँ  भी उपलब्ध रहती।  जब भी टोपियों की नई फैशन आती, श्रीपत भाई के वहाँ वह जरूर उपलब्ध होती। इनके साथ ही साफा बाँधने, दूल्हे-दुलहिनों को श्रृंगार प्रसाधनों से सजाने-सँवारने के हुनर में भी उनका कोई सानी नहीं था।

       बांसवाड़ा की सरजमीं से जुड़े श्रीपत भाई ने अपनी प्रतिभा का लोहा दूर-दूर तक मनवाया और शोहरत हासिल की। माही धरा के पुराने लोग आज भी श्रीपत भाई दोसी के हुनर व सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व का स्मरण कर उनकी याद को तरोताजा कर ही देते हैं। लेडिज टेलर के रूप में भी वे बांसवाड़ा जिले भर ही नहीं आस-पास के सभी क्षेत्रों में प्रसिद्ध थे। श्रीयुत श्रीपत भाई दोसी जैसे कलाकार उस जमाने में इतने मशहूर थे कि उनके बगैर कोई काम नहीं चलता, वहीं जब भी कोई आयोजन होता उसमें उनकी भागीदारी किसी कारण से नहीं होने की स्थिति में उनकी कमी अखरती भी थी। श्रीपत भाई दोसी ने खूब सारे लोगों को अपने हुनर से परिचित भी कराया और सिखाया भी।

       बांसवाड़ा के पुराने लोगों में आज भी श्रीपत भाई दोसी के बारे में अलग ही छवि है और यही कारण है कि श्रीपतभाई दोसी जैसा कलाकार भुलाये नहीं भूलता। माही धरा के इस सपूत बहुआयामी कला प्रतिभाओं भरा जिस प्रकार का कलात्मक व्यक्तित्व पाया वह आधुनिक युग की कला प्रतिभाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो यह सिखाता है कि विपरीत व विषम परिस्थितियों और विपन्नताओं की चट्टानों पर भी गुलाब खिल कर परिवेश को महकाने का सामथ्र्य रखते हैं।

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- डॉ दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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