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हास्य-व्यंग्य : फार्मूला गोल का

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- हनुमान मुक्त

 

वे अपने नगर के बहुत प्रतिष्ठित और काम के व्यक्ति है। किसी भी पार्टी की सरकार हो उनके काम कभी नहीं रुकते। चलने का नाम ही जिन्दगी है। उनकी जिन्दगी हमेशा रेल के गोल पहियों की तरह निर्बाध गति से दौड़ती रहती है।

हर सरकार में उनके काम होते रहना, प्रत्येक पार्टी के लोगों का उन्हें अपना मानना एक विचित्र लेकिन सार्वभौमिक सत्य है। जब भी कोई सामाजिक कार्य होता है वे पूरी तरह से आगे रहते हैं। बढ़-चढ़कर नेतृत्व करते हैं। सर्वधर्म सभाओं में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। प्रत्येक पार्टी के किचन कार्यकर्ताओं में उनकी गिनती की जाती है। सभी पार्टियों के लोग उन्हें अपना और सिर्फ अपना समझते हैं।

उनके जीवन का गोल क्या है? यह तो नहीं पता लेकिन गोल से उनका बहुत गहरा रिश्ता रहा है। स्कूल कॉलेज के जमाने से वे कक्षा से गोल रहने के आदी रहे हैं। हाजिरी-वाजिरी की उन्हें ज्यादा परवाह नहीं रही। लेकिन गुरुजनों के सभी गोलमटोल कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर हमेशा अपना गोल प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

गोलमाल एक, दो, तीन सभी फिल्मों को वे कई बार देख चुके हैं। उनका मानना है कि जो जैसा है वैसा ही दिखे यह आवश्यक नहीं। कुछ बेवकूफ किस्म के लोग होते हैं जो जैसा अंदर से होते हैं वैसा बाहर से दिखते हैं।

जैसे सूरज और चांद गोल है और गोल दिखते भी हैं। लेकिन पृथ्वी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह गोल है, कभी गोल दिखती है? आसमान नीला दिखता है, क्या वह नीला है? नहीं।

वे सही मायने में स्वयं को पृथ्वी पुत्र मानते हैं। पृथ्वी की तरह गोल होना, लेकिन गोल दिखाई नहीं देना। (खगोलविदों के आधार पर ही गोल मानना।) धरती माता से इस गुण को उन्होंने प्राप्त किया है।

उनके भाषण हमेशा गोल-मोल होते हैं। वे क्या कहना चाहते है? क्या कहना चाह रहें हैं? श्रोता कभी नहीं समझ पाते। सब अपने-अपने ढंग से उसका अर्थ निकाल लेते हैं। जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा ने देवता, असुर और मनुष्यों की प्रार्थना पर शिक्षा देते समय मात्र ‘द’ कहा।

तीनों ने उनके एक अक्षर ‘द’ का अर्थ अपने-अपने ढंग से क्रमशः दायत् अर्थात दमन करो, दयध्वम् अर्थात दया करो, दत्त अर्थात दान करो, लगा लिया।

गोल अर्थात शून्य, शून्य ब्रह्म है, शून्य पूर्ण है, शून्य से शून्य लेने पर भी और शून्य में शून्य देने पर भी शून्य बचता है। इसको वे पूरी तरह समझते भी हैं और इसकी पालना भी करते हैं।

गोल चीजों से उनका लगाव जग जाहिर है। बचपन से ही फुटबॉल खेलने के शौकीन रहे हैं। गोलकीपर के रूप में सैकड़ों गोलों को उन्होंने होने से रोका है। अब भी यदा-कदा वे दूसरों को गोल करने नहीं देते।

पार्टी विशेष की सामूहिक मीटिंग में जाने से वे अपने आपको गोल कर जाते हैं लेकिन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, महंगाई जैसे सार्वभौमिक मुद्दों पर गोलमोल भाषण देने से वे कभी पीछे नहीं हटते।

आने वाले का बोलबाला, जाने वाले का मुंह काला। लोकोक्ति में से पहली पंक्ति का इस्तेमाल ही करते हैं। दूसरी पंक्ति को वे नहीं छेड़ते। उनका मानना है कि कोई भी कभी भी आ जा सकता है। फिर मुंह काला करने से क्या मतलब। जाने कब किस गधे को बाप कहना पड़ जाए।

आने वाले का स्वागत सत्कार करने, मालाएं, साफा पहनाने जैसे पुनीत कार्यों को करने से वे कभी गोल नहीं होते। उनका मानना है कि इससे प्रगाढ़ता बढ़ती है। व्यक्ति गोलमटोल हो जाता है। सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है।

वे एक सरकारी विभाग के बड़े ओहदे पर कार्यरत हैं। अब तक उनके यहां से बड़ी-बड़ी चौकोर और मोटी फाईलें भी गोल हो गई। लोगों की समझ में कभी नहीं आया कि इस प्रकार फाइलें इतना गोल-मटोल रूप कैसे धारण कर लेती हैं।

जब भी किसी मंत्री को या किसी बड़े अधिकारी को किसी फाइल को या किसी काम या आदमी को गोल कराना हो तो उन्हें ही यह गौरवपूर्ण कार्य दिया जाता है।

गोल करने के अभ्यस्त वे आज तक कभी किसी पचड़े में नहीं फंसे, उनके सभी सवालों के जबाब गोलमोल होते हैं, टिप्पणी गोलमोल होती है। शरीर और कदकाठी से भी वे गोलमटोल हैं। गोल के विशेषज्ञ उनकी खोपड़ी भी गोल ही है। जिसमें चलते रहने वाले सभी आईडियाज, दूसरों को गोल करने के लिए परफेक्ट हैं। बेपेंदे का लोटा तो सिर्फ नीचे से ही गोल होता है लेकिन वे तो गेंद की तरह गोल हैं। कहीं भी किधर भी लुढ़कने का सार्वभौमिक गुण समाहित किए हुए।

उनका अपना फार्मूला है। फार्मूला टेढ़ा नहीं है वह भी गोल है। किसी सवाल का जवाब न देना हो तो गोल कर दो। किसी से कोई वायदा किया हो और वह पूरा न हो सके तो गोल हो जाओ।

ऑफिस, घर, मीटिंग कहीं भी गोल होना बचाव के लिए बेहतर फार्मूला है। कामचोर, दामचोर और आमचोर सब ठीक वक्त पर गोल होते हैं।

काम न करना हो तो गोल और दाम चुराते ही गोल हो जाना चाहिए। आमचोर वे होते है जो हर मामले को गोल कर देते हैं। अच्छा-बुरा, दोनों को एक जैसा मानते है ये लोग। अच्छा भी गोल, बुरा भी गोल।

समदृष्टि, समव्यवहार गोल का व्यवहारिक और लोकहितकारी मंत्र है। जितनी भी गोल चीजें हैं, उनसे उनका गहरा लगाव है। जब कोई उनसे गोल के बारे में पूछता है आखिर गोल होता क्या है तो उनका जवाब होता है-जैसे चलने वाली वस्तुओं का पहिया गोल होता है, फुटबॉल, लड्डू, गेंद गोल होते हैं, इसी तरह गोल, गोल होता है। रोटी, पहिया और गेंद, लड्डू की गोलाई में कितने साम्यता है ये तो वे ही जाने लेकिन उनके गोलमटोल जवाबों का हल किसी के पास नहीं होता। लोग समझ नहीं पाते और उनको गलत ठहरा भी नहीं पाते।

 

 

Hanuman Mukt

93, Kanti Nagar

Behind head post office

Gangapur City(Raj.)

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