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हास्य-व्यंग्य : नहीं आयेंगे अच्छे दिन...

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प्रमोद यादव

‘आज तो फैसला हो ही जाए जी..’ पत्नी ने पति के घर प्रवेश करते ही गुस्से से कहा.

‘ किस बात का फैसला भई ? क्या हो गया ? शांतिपूर्वक बैठकर बताओ.. और पहले थोड़ी सांस तो लेने दो..’ पति ने कहा.

‘ दिन भर आफिस में बैठ यही तो लेते है..”कुछ और” भी लेते तो आज ये नौबत नहीं आती...’ पत्नी गुस्से से बोली.

‘ अरी भागवान..फालतू बात मत किया करो..मैं निहायत ही ईमानदार और आम आदमी हूँ..मुझे आम ही रहने दो..खास मत बनाओ..देखती नहीं आम से ख़ास बने लोग कैसे खासे फर्जीवाड़े में फंसते जा रहे..’

‘ बस यही तो खराबी है आपमें..हमेशा जिद पर अड़े रहते हैं..अपनी मुर्गी की एक टांग किये रहते हैं..आप जिंदगी भर आम बने रहें..हमें कोई गुरेज नहीं..पर हमें तो कुछ ख़ास बना दो.. देखिये..आस-पड़ोस की गृहिणियां कैसे हमेशा सिर से पैर तक सोने के गहनों से लदी ख़ास बनी रहती हैं..उनके पति कैसे सांस के साथ-साथ जो मिलता है..चुपचाप ले लेते हैं..आपकी तरह उपदेश नहीं देते हैं..’ पत्नी एक सांस में बोली.

‘ देखो जी..बेकार की बातें मत करो..मैं उलटे-सीधे काम नहीं कर सकता- मतलब नहीं कर सकता..जो कुछ मिलता है,मुझे उसी में संतोष है..और कायदे से अर्धांगिनी होने के नाते तुम्हें भी संतोष करना चाहिए..’ पति ने झिड़कते हुए कहा.

‘ अभी तक तो कर ही रही थी..पर अब नहीं..इस विकराल महंगाई में मुझसे घर नहीं चलाया जाता.. जितना देते हैं वो अब ऊंट के मुंह में जीरा हो गया है..बहुत सुन ली आपकी..साल भर से झांसा दे रहे कि महंगाई कम होगी.. महंगाई कम होगी.. जल्द ही अच्छे दिन आने वाले.. अच्छे दिन आने वाले.. क्या ख़ाक अच्छे दिन आये ? पहले तो केवल सब्जियों में आग लगी थी..आलू प्याज ही मंहगे थे..अब तो दाल-चांवल-तेल भी धूं-धूं जलने लगा है..’ पत्नी चिल्लाकर बोली.

‘ अरे तो मुझे क्या मालूम था कि तब “वे” अपने अच्छे दिन आने की बात कहते थे..मैं समझा कि हमारे बारे में कह रहे..’

‘ बस..यही फरक है मुझमें और आप में..आप बात को ठीक से समझते नहीं..और मैं समझाती हूँ तो आप सुनते नहीं..’ पत्नी बिफरी.

‘ कब नहीं सुना बताओ ? जो कहती हो,सब तो सुनता हूँ..और करता भी हूँ..’ पति ने सफाई दी.

‘अरे उन दिनों नहीं कहा था कि बडबोले फेंकू मियाँ को वोट मत दो..ये कहीं जीत गए तो इतना फेकेंगे कि कोई लपेट भी नहीं पाएगा ..पर आपने कहाँ सुनी मेरी ? काले धन की वापसी और पंद्रह लाख के चक्कर में आ गए..खुद तो डूबे सनम हमको भी ले डूबे..मुझे आज भी उस एक वोट का मलाल है जो ख़राब हो गया..’ पिछले दिनों को याद करते पत्नी बोली.

‘ कैसी बात करती हो यार..जिसे वोट दिया वही पार्टी तो जीती..भला कहाँ तुम्हारा वोट खराब हुआ ? ‘

‘ अब छोडो भी..जब किस्मत ही ख़राब हो तो वोट ख़राब की क्या बात करें..’

‘ अरे ऐसा क्या पहाड़ टूट गया..जलजला आ गया कि बस सुनाये ही जा रही हो ? साफ़-साफ़ कहो –क्या बात है ? क्यों लड़ने पर उतारू हो भई ? पति ने प्यार से पुचकारा.

‘ बात बिलकुल साफ़ है जी कि ये मुआ महंगाई हमें लड़वा रहा..आपको होश भी है कि इसका ग्राफ कितने ऊपर चला गया है..अब तो आपके पूरे वेतन से केवल दाल-चांवल ही आ पायेगा.. बाकी खर्चा आप जानो..सब्जी खाना तो छोड़ ही चुके..क्या अब दाल-चांवल भी छोड़ दें ? ‘ पत्नी ताना मारते बोली.

‘ शांत देवी..शांत..महंगाई का पता मुझे भी है..’ पति ने शांत स्वर में कहा.

‘ तो फिर कुछ करते क्यों नहीं ? ‘

‘ क्या करूँ ? महंगाई कोई गाडी है जो ब्रेक लगा रोक दूँ ?

‘ अरे आप नहीं रोक सकते तो उन्हें कहिये जिन्होंने बढ़ा रखा है.. जीना हराम कर रखा है.. ’

‘ बताओ..किसे कहूँ ?..सी.एम. को...पी.एम. को... ‘

‘ आपने वोट किसे दिया था ? ‘

‘ जिसकी सरकार है..’

‘ तो उसी से कहो ..उसके पी.एम. से कहो..’ पत्नी बडबड़ाई.

‘ पर वे साहब तो एक ही साल में इतने बहरे हो गए कि कुछ भी नहीं सुनते.. सुना है कि अपने सांसदों-मंत्रियों की भी नहीं सुनते.. हाँ..सुनाते धुंआधार हैं..21 जून के लिए तैयार रहो..योग पर थोक में सुनायेंगे..वैसे इस बार तो उनका हक़ बनता है.. टी.वी. में तो सुनाते ही हैं अब बाबा आदम के ज़माने का रेडिओ भी “ऑन” कर रखा है.. उसमें “मन की बात” सुनाते हैं पर दूसरों की कतई नहीं सुनते..’

‘ अरे ..क्यों नहीं सुनेंगे भला..आप लोग दिल्ली जाकर एक बार हल्ला तो बोलिए..’ पत्नी बोली.

‘ कोई फायदा नहीं यार..वो वहां होते कब हैं ? वो तो हमेशा हवा में सवार होते हैं..हवा-हवाई का उन्हें बड़ा शौक है..देखो आज ही नया टाईम-टेबल आ गया-जुलाई से नवम्बर तक का.. मलेशिया..अमेरिका..तुर्की..रूस दौरे का ..विदेश-दौरे तो ये कर रहे और विवादों में फंसती जा रही विदेशमंत्री.. पर कुछ भी कहो.. हैं बड़े खुश किस्मत..अकेले होने का पूरा लुत्फ़ उठा रहे..घर में घरवाली होती तो पता चलता....उड़ना तो दूर की बात ,चैन से बैठ भी नहीं पाते..’

‘ अच्छा जी..तो हम घरवाली राह के रोड़े हैं ?..अरे हम न हों तो आप लोग तो मिनटों में ही आउट आफ कंट्रोल हो जाएँ..’

‘ अरे वही तो कह रहा हूँ..महंगाई कंट्रोल करना है तो पहले साहब को कंट्रोल करो..उनका घर बसाओ.. पत्नी से ही तो पति को महंगाई का पता चलता है.. ’ पति ने आईडिया दिया.

‘ अरे..बिलकुल ठीक कहते हैं आप..महंगाई.. महंगाई..करते तो साल बीत गए..कंट्रोल नहीं हुआ..हड़ताल..रैली..घेराव..पुतला-दहन..सब बेकार..कोई फायदा नहीं हुआ.. केवल वक्त बर्बाद हुआ.इतना समय इस पुन्य काम में लगाते तो अब तक अच्छे दिन आ गए होते...अच्छा बताओ क्या करें ?..हमने तो सुना है कि “वो” तो पिया घर ( पी.एम.हाउस) जाने बेकरार है पर शायद दिल्ली से ही सिग्नल नहीं मिलता..’

‘ हाँ..दिल्ली से अब मिलना भी मुश्किल है..दिल्ली के घमासान में अभी दिल्ली वालों को कोई सिग्नल नहीं मिल रहा..तो बाहरवालों की क्या बात करें ?..बेचारे सब “डेड” हुए बैठे है.. ए.के.एल.जी.के जंग में सबका एस.एन. (सत्यानाश ) हो रहा है..’

‘तो फिर मिशन “महंगाई” कैसे संभव होगा ? और कैसे काबू होंगे वे ? ‘ पत्नी हडबडाई.

‘ अरे..वे तो बेकाबू ही रहेंगे..”एक से भले दो” में उन्हें भरोसा नहीं..इस विषय में कोई चर्चा भी छेड़े तो उसे कालापानी तय..सुना नहीं कि पिछले दिनों किसी सामाजिक कार्यक्रम में “वो” मुख्य-अतिथि थी पर उनके पहुँचते ही कार्यक्रम रद्द हो गया..( करा दिया गया ) विश्वस्त सूत्रों की माने तो रद्द का फरमान दिल्ली से जारी हुआ .. ऐसी घटनायें आम आदमी की सेहत के लिए ठीक नहीं.. अब अच्छे दिन नहीं आनेवाले..वे नियंत्रित नहीं होने वाले..महंगाई की मार हमें झेलना ही है..और यही हमारी नियति है...’

‘तो फिर क्या करें जी ? ‘ पत्नी उदास हो बोली.

‘ इंतजार...अगले आम चुनाव का.. अगले एम.बी.बी.एस.पी.एम. का..’

‘ एम.बी.बी.एस.पी.एम. का ? मतलब ? ‘ पत्नी चौंकते हुए बोली.

‘ मतलब कि बीबी और बाल-बच्चे सहित वाले पी.एम. का.. ‘

‘अच्छा..समझ गई..एम.बी.बी.एस. का अर्थ समझ गई..’ पत्नी हंसते हुए बोली.

‘ तो फिर जाओ यार..इतना और समझ लो..अब खोपडा खराब हो रहा.. दौड़कर गरमागरम चाय ले आओ..चाय पीने से शायद दिमाग चलने लगे..उनका तो यही पी-पी ही चल रहा है..’

इतना कह पति कमीज उतारने लगा और पत्नी चाय बनाने किचन चली गई.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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