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विपरीत धारा से लड़ने वाला योद्धा है पिता

जून माह का तीसरा रविवार पिता दिवस पर विशेष...
विपरीत धारा से लड़ने वाला योद्धा है पिता
० जीवन की मजबूत बैसाखी भी

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डॉ. सूर्यकांत मिश्रा


मानवीय जीवन रिश्तेदारी की खान है। परिवार से शुरू रिश्तेदारी की शुरूआती पौध अनंत दूरी तय करती है। मां के द्वारा जन्म देने के बाद प्रारंभ की गई रिश्तेदारी की यात्रा अनेक मीठे और कड़वे अनुभव का अहसास करा जाती है। परिवार में यदि माता का स्थान भगवान से भी पहले है, तो पिता की भूमिका भी एक गुरू के स्थान से कम नहीं आंकी जा सकती है। परिवार की ताकत, परिवार का संबल, बच्चों का मार्गदर्शक, बरसात और धूप की ठंडी छतरी, कठिनाई की भंवर से पार लगाने वाली नैय्या और न जाने किस-किस उपमा से एक पिता की तुलना की जाती है। हमारे देश में पिता की उक्त जिम्मेदारियों को स्वीकार करते हुए जहां परिवार का मुखिया अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है, वहीं बच्चों ने भी अब पिता के मजबूत कंधों के सहारे पारिवारिक सुख सुविधा के आनंद का अनुभव करते हुए ‘पिता दिवस’ के आयोजन तक की अहमियत तक को आत्मसात किया है। भले ही यह भारतीय पर्वों में शामिल न हो किंतु विदेशी संस्कृति में मान सम्मान के पुट को ढूंढते हुए पिता के सम्मान से संबंधित उक्त दिवस में वास्तव में परिवारों में पिता के महत्व को अमलीजामा पहनाना शुरू कर नई पीढ़ी के लिए  एक नई संस्कृति का शुभारंभ किया है। इसीलिए किसी ने कहा है-


पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है।
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।


‘पिता दिवस’ के अवसर आज उन अनछुए पहलुओं पर रौशनी डालने का वक्त है, जो प्रायः अनदेखे और लापरवाही पूर्वक बिसरा दिये जाते है। परिवारों में अनेक ऐसे अवसर आते है, जब पिता का मार्गदर्शन ही सबसे प्रमुख होता है। बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा संपन्न होने के साथ ही भविष्य की चिंता सबसे पहले विषय चयन के रूप में बड़ी चुनौती के साथ सामने आती है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा पूरी कर जब रोजगार और नौकरी की दुविधा भरी राह सामने आती है, तब भी पिता का दिशा निर्देश और अनुभव ही सही मार्ग दिखा सकता है। आज कल की दूषित हवा के बीच अपने मन का जीवन साथी न ढूंढने की पुख्ता सोच रखने वालों को पुनः पिता की बैसाखी जीवन साथी के चयन के लिए याद आने लगती है।

परिवार में पिता ही वह मुख्य कड़ी है, जो अपने बच्चों को अनुशासन और सभ्यता की महत्वपूर्ण बारीकियों से परिचित कराते हुए एक अच्छा वातावरण निर्मित करता है। अनेक परिवारों में यह स्थिति देखने में आई कि पिता के बाहर रहने पर बच्चे अपनी मां के निर्देशों का पालन नहीं करते और समाज की धारा के विपरीत चल पड़ते है। प्रायः इस प्रकार की स्थिति उन परिवारों को परेशान किये होती है, जिन परिवारों में घर का मुखिया सेवाओं के कारण हफ्ते या पखवाड़े भर बाद महज एक या दो दिन के लिए ही घर आते पाते है।
एक पिता के जन्म की कहानी भी बड़ी रोचक और संघर्षों से भरी होती है। अपनी स्कूली शिक्षा का सफर तय कर महाविद्यालयीन विद्या की संपन्नता और भी रोजगार या किसी प्रकार की शासकीय अथवा निजी सेवा में संलग्न होकर उस युवक के पिता को नई जिम्मेदारी का अहसास करता है। वह महती जिम्मेदारी अपने पुत्र के विवाह की चिंता के रूप में सामने आती है। यह जिंदगी का एक ऐसा पड़ाव है, जहां का कर्तव्य ही प्रमुख रूप से सामने आता है। अपने बेटे का विवाह अच्छे संस्कारित परिवार में करा कर एक बड़ी जिम्मेदारी की पूर्णतः पिता के सामाजिक दायित्व का निर्वहन से जोड़कर देखी जाती है। यहीं से शुरू होता है, एक नये पिता के जन्म का कथानक। जब नई नवेली दुल्हन और उसके पति को यह पता चलता है कि उनके परिवार में नये मेहमान का आगमन होने वाला है, तो जीवन की बगिया में अनेकानेक फुल खिल उठते है। बच्चे के जन्म के साथ ही एक नये पिता का जन्म इस बात पर विचार करने विवश कर देता है कि बच्चे के देखभाल या उनके पालन पोषण के लिए किस प्रकार की सावधानी बरती जाए?

अपने बचपन की शरारतों और माता-पिता की परेशान करने वाली घटनाओं की स्मृति ताजा होते ही रूह कांप उठती है कि कहीं मेरे बच्चा भी वैसे ही हालात पैदा मुझे अपनी गलतियों की याद न दिला दे। बच्चे का जन्म माता के साथ ही पिता के भी परीक्षा की घड़ी होती है। जब रात-रात भर बच्चा सोता नहीं, तब मां के साथ ही पिता को भी सारी रात पलकों पर काटनी पड़ती है। यह एक ऐसी स्थिति होती है जब थकान होते हुए भी नये पिता को खुशियों एवं आनंद की अनुभूति के चलते एक अलग ही गुदगुदाने वाला एहसास होता है।


सामाजिक रूप से देखा जाए तो पिता को संवेदनशीलता की श्रेणी से दूर ही रखा जाता है। यह माना जाता है कि बच्चों के प्रति मां की संवेदनाएं अधिक गंभीर होती है, किंतु एक बेटी के पिता की भावनाओं को समाज बहुत जल्द नहीं पढ़ पाता है। प्रायः यह देखा गया है कि पिता का प्यार बेटों की तुलना में बेटियों के प्रति कहीं अधिक होता है। अपने कंधों एवं बांहों में झुला झुलाकर बड़ी की गई बेटी के विवाह के बाद दूसरे परिवार में चले जाने की कल्पना मात्र से जब पिता का दिल धड़क उठता है, तब एक पिता की संवेदनशीलता का आभाष होता है। स्वयं को परिवार के भीतर बहुत ही ज्यादा कठोर एवं रिश्तों के प्रति गंभीरता न दिखाने वाला पिता बंद कमरे में बेटी के बिदाई के पलों को याद कर जब आंसू बहाता है, तब उसे देखने और समझने वाला सिर्फ और सिर्फ ईश्वर ही होता है। अपनी प्यारी बेटी की शादी की रस्मों को पूरा करते करते कितनी बार एक पिता की आंखे नम होती है, इसका गवाह भी केवल भगवान ही होता है।

अपनी बेटी की घर बसाने की स्वर्णिम रस्में पूरी होने के बाद जब विदाई का वक्त आता है, तब एक पिता को अपने सीने पर पत्थर रखकर उसे भीगी आंखों से अपनी दुनिया आबाद करने का आशीर्वाद देते देखा जा सकता है। क्या एक पिता की उक्त भूमिका और उसकी संवेदनशीलता को कोई चुनौती दे सकता है, शायद नहीं? इसलिए कहा भी गया है-


पिता उंगली पकड़े बच्चे का सहारा है।
पिता कभी कुछ खट्टा तो कभी खारा है।।
पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।
पिता है तो बच्चों को इंतजार है।।


एक परिवार में मुखिया की मुख्य भूमिका में होते हुए एक व्यक्ति को जो कर्तव्य निभाने पड़ते है, उनके चलते कठोरता और स्नेहिल स्वभाव का परस्पर साथ साथ चलना कोई नई चीज नहीं है। परिवार की मान मर्यादा का ख्याल रखते हुए अपने व्यवहार में कठोरता को स्थान देना मुखिया का ऐसा चरित्र होता है, जो परिजनों को कुछ तकलीफ तो देता है पर फल बड़ा ही आनंद दायक होता है। इसे हम अखरोट या बादाम के स्वाद से जोड़कर देख सकते है, जिन्हें खाने से पहले तोड़ने की मशक्कत करनी पड़ती है। इसके ठीक विपरीत अपने व्यवहार में सहज स्नेह का प्रदर्शन कई बार काजू अथवा किसमिस की मिठास के साथ लंबे समय में कष्ट दायक परिणाम सामने लाता है, किंतु जहां हमने पारिवारिक वातावरण में अधिक स्नेह की मिठास घोली, वहां वही कहावत चरितार्थ होकर सामने आती है, जिसमें कहा गया है कि-अधिक मिठास में मक्खी जरूर बैठती है। कहने का तात्पर्य यह कि एक पिता का जीवन कठोरता को अपनाता है, किंतु सहज स्नेह उसके चरित्र में छिपी हुई प्रतिष्ठा के रूप में ही होना चाहिए, जिसका गलत फायदा कोई भी न उठा सके।



                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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