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सामयिक हास्य-व्यंग्य : मोस्ट वांटेड मैन से मुलाक़ात

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-प्रमोद यादव

सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि देश का एम.डब्लू.एम. (मोस्ट वांटेड मैन ) मेरे अंगने में ?..चार -पांच दिनों से विभिन्न टी.वी.चैनलों में जिसे इंटरव्यू देते अपलक निहार रहा था- वो “डॉन” मेरे “डोर” में ?..समझ नहीं आया कि राजा-रानियों के संग उठने-बैठने वाला रंगीन तबीयत का महाराजा मेरे गरीबखाने में ? मैं हडबडा गया..सोच में पड गया कि कहाँ बिठाऊं उन्हें ? अपने फटीचर दीवान में कि दशकों पुरानी ससुराली कुरसी में ? पल भर में ही तय किया कि कुरसी ही ठीक रहेगा..उस पर जल्दी से कपड़ा फेरते उन्हें आमंत्रित किया तो “ ठीक है..ठीक है..चलेगा ..” कहते धम से वे कुर्सी पर विराज गए..पहली बार कुर्सी को भी अच्छा लगा होगा कि उसके अनुरूप तो कोई बैठा.. पहले जमाने की सालों पुरानी महाराजा टाईप ससुराली कुर्सी..इतनी बड़ी साईज की कि पूरी फैमिली उसमें बैठ “ग्रुप-फोटो” खींचवा ले ..पर हमेशा मैं उसमें अकेले ही बैठता रहा..शुरू-शुरू में कई बार पत्नी को कहा कि तुम भी साथ बैठो..पर वो ये कह छटक जाती कि बाबूजी ने बड़े ही मन से इसे खुद खड़े होकर बनवाये हैं..दोनों के बैठने से कहीं “भसक” न जाए..कुर्सी तो आज भी ठीक ही हालत में है अलबत्ता पत्नी जरुर कुछ भसक गई है..खैर परसनल बातें फिर कभी..

मैंने बड़े ही अदब से पूछा- “ महोदय, मुझ अकिंचन के घर कैसा आना हुआ ? ‘

‘ अरे भई..दोस्ती और परिवार के लिए तो हम जान भी लुटा देते हैं..देखा नहीं..आपके विदेशमंत्री जी (महारानी जी) कहीं ज्यादा विवाद में न फंस जाए इसलिए हमने सब कुछ क्लियर करने न्यूज चैनल को इंटरव्यू दिया.. उन्होंने ( महारानी ने ) जो कुछ भी किया , मानवता के नाते किया..’ उसने चश्मा ऊपर करते कहा.

‘ पर आपने तो विवाद से बचाते-बचाते उन्हें कई और विवादों में उलझा दिया..लगभग डूबा ही दिया..और तो और..एक के साथ एक फ्री की तरह आपने इस विवाद में दूसरी महारानी का जिक्र कर उन्हें भी दिन में तारे दिखा दिया..उनके बेटे का भी बखेड़ा खड़ा कर दिया..दोनों सत्ता के गलियारे में किसी को मुंह भी नहीं दिखा पा रहीं..जो अब तक नहीं था आम,उसे आपने कर दिया खुले-आम.. दशकों पुराने पारिवारिक मित्र बता आपने उन्हें देश का दुश्मन बना दिया.. हाय..ये आपने क्या कर दिया ? ’

‘ अरे यार..मैं तो पाक-साफ़ नियत से उनकी मुश्किलें कम कर रहा था पर मुझे क्या मालूम कि विरोधी दल इसे तिल का ताड़ बना देंगे.. बात का बतंगड़ कर उलझा देंगे..मुझे तो लगा था कि चवालीस सीट के साथ वे शवासन में चले गए..पर लगता है अभी भी बहुत जान है इन विरोधियों में..इस पुरानी पार्टी में...’ उसने सफाई के साथ संभावना प्रकट की.

‘ सो तो है जी.. शहजादा अज्ञातवास से लाइफ टाईम रिचार्ज होकर लौटे है..बड़े ही आक्रामक हो पलटे हैं..अब सरकार की खैर नहीं..खैर उनकी छोडो..इनकी देखो.. अभी जिस अंदाज में ये सरकार.. ये पार्टी चल रही..हमें तो लगता है ,इन्हें भी अगले चुनाव में दिल्ली वाला मुंह न देखना पड जाए.. कहीं तीन सीट के लिए भी तरसना न पड जाए..’ हमने संदेह जाहिर करते कहा.

‘अरे शुभ-शुभ बोलो यार..इस पार्टी में मेरे और भी ढेर सारे मित्र हैं..पिछली सरकार और पार्टी के नुमाइंदों ने तो मुझे कहीं का न छोडा.. दिल ऐसा तोडा कि अमानुष बनाके छोड़ा और इसीलिए हमने ब्रिटेन की तरफ मुंह मोड़ा..

‘ हां जी..और विज्ञापित हो गए भगोड़ा..’ काफिया मिलाते मैंने कहा.

‘ भगोड़ा मत कहो यार..थोडा टुच्चा टाईप लगता है.. एम.डब्लु.एम. (मोस्ट वांटेड मैन ) कहो..इसमें डॉन जैसा “फील गुड” होता है..वैसे भी मैं भागा कहाँ हूँ ?..मैं तो आराम से बैठे ऐश कर रहा हूँ..जो भागते हैं वे दिखते कहाँ हैं ?.. किसी में हिम्मत है तो आके पकड़ ले मुझे..’ उसने बाहें चढाते कहा.

‘ अरे आपको पकड़ना तो मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है..आप तो डॉन के भी बाप हो..’ मैंने उसे फुलाया.

‘ शुक्रिया..जर्रानवाजी के लिए शुक्रिया..’

‘ सो तो ठीक है जी..पर मैं समझा नहीं कि आप यहाँ आये किसलिए ? ‘ मैंने पुनः पूछा.

‘ दरसल तुम चार-पांच दिनों से हमें टी.वी. चैनल पर टकटकी लगाए निहार रहे थे.. हमें यूँ कोई देखता है तो हजारों किलोमीटर दूर से हमें टेलीपैथी हो जाता है..हम जान जाते हैं कि किसी को हमारी तलब है..हम जान गए कि तुम्हारे भीतर बहुत हलचल है.. गुबार है..कोई संगीन बात है.. हमें लगा कि कुछ पूछना चाह रहे..सो चले आये..ठीक कह रहा हूँ न ? ‘

‘ हाँ जी..बात तो सोलहों आने ठीक कर रहे..चैनलों में जिस दबंगता से आप इंटरव्यू दे रहे थे..लग रहा था जैसे “दबंग-३ “ देख रहा हूँ..आपकी दबंगई देख मैं दंग था....मैं ही क्या पूरा देश दंग था.. मोस्ट वांटेड मैन कहते ही आप खिल पड़े थे..खिलखिला उठे थे..मन करता था कुछ ऐसा ही धांसू इंटरव्यू मैं भी करूँ पर मन के चाहने से भला क्या होता है ? ‘

‘ अरे भई जी छोटा मत करो..लो आ गया हूँ..आप भी कर लो इंटरव्यू.. पूछो क्या पूछना है ? ’

मुझे तो जैसे काटो तो खून नहीं..मैं अकबका गया कि क्या पूछूँ ? एकाएक मुंह से निकल गया- ‘ आप जिस रमणीक और रोमांटिक जगह में बैठकर इंटरव्यू दे रहे थे , ऐसा लगता है.. वो किसी जन्नत से कम नहीं..’

‘ हाँ..ठीक कह रहे हो..मेरी तो पैदाइश ही जन्नत की है..मेरा मतलब कि बचपन से ही ऐसे रंगीन माहौल में रहने का आदी रहा हूँ...’ उसने जवाब दिया.

‘आपका बचपन तो नहीं मालूम हमें ..हाँ जवानी वाले एपिसोड से सहमत हूँ..जब तक यहाँ रहे...जन्नत में रहे..ऐसा लोग कहते हैं..चैनल वाले इंटरव्यू के पश्चात आपका एक विडियो क्लिप बार-बार दिखा रहे थे जिसमें आप विदेशी हसीनाओं के साथ बड़ी अदा से शाहरूख की तरह ठुमके लगा रहे थे..क्या झूम रहे थे ऋतिक की तरह..हमें तो लगता है कोई न कोई फिल्म निर्माता जल्द ही आपको साईन करने पहुंचता ही है..अगर आफर मिला तो क्या बालीवुड में काम करेंगे ?’ मैंने सवाल दागा.

‘ बालीवुड वाले मुझे क्या साइन करेंगे यार..कईयों को तो मैंने ही “शाइन” किया है..जितने भी चमकते सितारे हैं ( फिल्म हो या क्रिकेट ) सब मेरी बदौलत ही तो हैं..’ उसने कालर ऊंची करते कहा.

‘ तो फिर हालीवुड ही कर लीजिये..’ मैंने सलाह दी.

‘ वो तो कर ही लूँगा..पहले तुम बताओ-व्हाट कैन आई डू फॉर यू ? कोई दिक्कत या तमन्ना हो तो बताओ..दोस्तों के लिए जान हाजिर है..’

‘ दिक्कत क्या साहब जी..बस ले-दे के सब चल जाता है.. हाँ..एक ख्वाहिश है कि जीते जी मेरी कविता-संग्रह छप जाए तो ..’ मैंने सकुचाते हुए कहा.

‘ अरे ..तो समझो छप गई ..अभी तुरंत ही पी.डी.एफ. फ़ाइल मेल कर दो..दो दिन में पुस्तक ले लो.. शानदार विदेशी चिकने-चमकते पन्ने में छपवाऊँगा..’ उसने तत्परता से कहा.

‘ साहबजी.. तो विमोचन भी आप के कर-कमलों से हो जाए..’ मैंने विनती के स्वर में कहा.

‘ वो तो ठीक है बन्धु..पर इसके लिए तुम्हें ही उधर आना होगा..मैं तो आने से रहा..’ उसने विवशता जाहिर की.

‘ पर मैं कैसे आऊँगा भई ? न पासपोर्ट है ना वीजा..’ मैंने समस्या बताई.

‘ अरे फिकर नाट..हमारी पारिवारिक मित्र हैं न आपके विदेशमंत्री..उनसे कह के एक दिन में बनवा देंगे..’ उसने सीना फुलाते कहा..

‘ अरे साहब जी..आप तो घूमफिर कर फिर वहीँ आ गए..मुझे विवादों में नहीं फ़सना ..रानियाँ तो बच निकलेंगी..मैं नहीं बचूंगा..इसके पहले कि कोई चैनल वाला आ धमके प्लीज.. आप चलते बनिए..’ मैंने डरते हुए गुजारिश की.

‘ ठीक है दोस्त ..जैसी तुम्हारी मर्जी..’ कहते हुए वे गायब हो गए..

आँख खुली तो सामने दरवाजे पर कवि निर्लज्ज जी को पूरी निर्लज्जता के साथ मुस्कुराते हाथ जोड़े खड़े पाया..बगल में लटके झोले से एक पुस्तक निकाल देते हुए बोले- ‘ बन्धु..हमारी कविता-संग्रह छप गई..आपका क्या हाल है ? ‘

‘ बस बन्धु.. हमारी छपते-छपते रह गई..विदेश में छपवा रहे थे न..पर कुछ विवादों के चलते अभी ठन्डे बस्ते में है..’

‘ ठीक है जी..गरम बस्ते में कभी आये तो खबर करें ..कल विमोचन है जरुर पधारें..’ इतना कह कवि निर्लज्ज चले गए.

कविता-संग्रह के शीर्षक को पढ़ मैं भौंचक रह गया.. शीर्षक था- “ मेरे पिया गए रंगून”

उफ़..यहाँ भी विदेश..लगता है इस पर भी जमकर विवाद उठेगा...

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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