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कहानी - जिस्म

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मोनिका गजेंद्रगडकर

 

सरकारी वकील ने काला चोगा कांधे पर सरकाते हुए सायरा से पूछा, ‘‘आपके शौहर की दूसरी बीवी थी मुमताज?’’

‘‘जी।’’ बुरके के जाली को ढक रहे आवरण को उछालकर सिर पर धर देने के प्रयास में सायरा के हाथ की उंगलियां कांपती-सी लग रही थीं। मुख्य न्यायाधीश भी बीच-बीच में कुछ सवाल पूछते थे। लेकिन उनकी आंख से आंख भिड़ाकर जवाब देने की हिम्मत वह नहीं दिखा पा रही थी, न कटघरे में खड़े अपने फटीचर शौहर अहमद की ओर देखने में उसे कोई दिलचस्पी थी।

‘‘आपको तो अपने शौहर की दूसरी शादी मंज़ूर नहीं होगी? क्यों? क्या मुमताज आपके साथ नहीं रहती थी?’’

सायरा ने अपने पपड़ी होंठों को अपनी तरज़ुबान से तनिक राहत पहुंचाते हुए कहा, ‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं। अव्वल तो हमारे मज़हब में मर्द दूसरी शादी कर सकते हैं और... और मुमताज को मैं अपनी छोटी बहन मानती थी। वह भी मुझे दीदी पुकारती थी और वह शुरू से ही अलग रहना चाहती थी।’’

‘‘क्या अहमद उससे बदसलूकी करता था? यानी मार-पीट करता था? आपके साथ कैसे सलूक करता है वह? क्या उसकी मारपीट से तंग आकर ही उसने ख़ुद को आग के हवाले कर दिया?’’ वकील ने अहमद की ओर इशारा करते हुए पूछा।

इस सवाल से सायरा कुछ हड़बड़ा गयी और उसने पहली बार अहमद की ओर देखा। वह अपने छंटे हुए अंदाज़ में तमाखू की चुटकी मुंह में दबाए, कटघरे पर तनिक झुककर बेरहम-सा खड़ा था। दाढ़ी के छितरे-बिखरे बाल, आग में ज़्यादा तपे चांदी के पात्र-सा तामई, सूजा हुआ चेहरा और आंखों में बदमिजाज़ खुमारी... ये निशान उसके पियक्कड़ होने का सबूत दे रहे थे। फन फैलाये नागन-सी खूंख्वार नज़रों से वासना का ज़हर अभी भी रिसता दिखाई देता था...

मुमताज का मुकदमा पिछले चार महीनों से जारी था... मुमताज जल मरी, तभी अहमद को पुलिस ने हिरासत में लिया।

तीन हफ्ते वह जेल में ही था। सायरा ने दुनियाभर की जोड़-तोड़ की और कहीं से कर्ज लिया। फ़ारूख़ उन्हीं की बस्ती में रहता था। उसी ने जैसे-तैसे उसका यह काम किया। तब कहीं अहमद ज़मानत पर रिहा हो सका। लेकिन मुक़दमा शुरू हुआ।

एक के बाद एक तारीखें मिलती रहीं। सायरा की गवाही पर ही मामले की पूरी दारोमदार थी। इसीलिए उसकी अहमियत बहुत ज़्यादा थी।

‘‘मुमताज ने अहमद की बदसलूकी का ज़िक्र कभी किया था आपसे?’’ क्या जवाब दिया जाए? सायरा की ज़ुबान लड़खड़ाने लगी थी। मुमताज शादी के बाद कुछ दिनों तक तो जैसे-तैसे गुज़ारा कर सकी। अहमद वैसे तो दिल का बुरा नहीं है... किस्मत का मारा है... मुक़द्दर ही उसे ले डूबी...

‘‘वह कभी तो दिल के फफोले फ़ोडती रही होगी आपके पास? कुछ कहिए भी...’’ वकील ने फिर एक बार उससे कुछ उगलवाने का प्रयास किया।

वह मुमताज अल्हड़ थी... अहमद ने उसकी मासूमियत की धज्जियां उड़ायीं... नोच खाता रहा वह उसे...

‘‘आप डरिए नहीं... बोलिए।’’ वकील बार-बार उससे दरख्वास्त करते रहे। ऐसे में एक पल ज़ोरों से चिल्लाकर कहने को सायरा का दिल हुआ भी कि, हां, औरत को मार-पीट करना ही मज़हब है इस कम्बख्त़ का। शराब जितना ही भूखा होता है वह औरत के जिस्म का। मुमताज को चूस-चूसकर खोई बना डाला उसने।

खूब भोगता रहा। निहायत ख़ूबसूरत नाज़ुक फूल-सी थी वह। उसे पूरी तरह से नोच डाला कम्बख्त ने। उसके जज्बातों की कभी क़द्र ही नहीं की कम्बख्त ने... मैं तो मुर्दा बनकर झेलती रही उसे... लेकिन मुमताज ने...

‘‘क्या मुमताज को पागलपन के दौरे पड़ते थे? सच क्या है? आपका शौहर ही कहता है...’’ उसकी ज़ुबान पर पड़े ताले खुलने का काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद वकील ने फिर एक बार कोशिश की। ‘‘अब तो कुछ कहिए...’’

‘‘मुमताज मां बनना चाहती थी। पर अल्लाह ने उसकी मुराद पूरी नहीं होने दी। इसी वजह से वह ख़ब्ती-सी बन गयी थी। लेकिन...’’ होंठों पर आयी पसीने की बूंदें पोंछने के बहाने वह ठिठक गयी तो ठिठक ही गयी। क्या कहूं? बांझ... उसे बांझ करार देकर उसकी हस्ती मिटा देने पर ही आमादा हो गया अहमद... लेकिन सायरा की ज़ुबान को जैसे काठ मार गया था। उसके सामने तो वह मुमताज की बखिया उधेड़ता था - ‘‘तू चुप कर बांझ... वैसे तू औरत ही है कहां? बच्चा रहता ही कहां है तेरी कोख में! दूसरा कोई मर्द होता तो कभी का भगा दिया होता तुझे...’’

‘‘लेकिन हंसती, मुस्कुराती मुमताज धीरे-धीरे... गुमसुम-सी हो गयी...’’ सायरा बड़ी मुश्किल से बोलने लगी, ‘‘उसकी आंखों को देखकर मेरी बेटी कहा करती थी, छोटी- मां की आंखों से तो जैसे शहद झरता है!

कंचन-सी काया और चाशनी-चाशनी ज़ुबान। हमेशा होंठों पर हंसी... लेकिन बाद में वह सूखकर कांटा बन गयी... पहचानी भी नहीं जा सकती थी। खुद से ही नफ़रत करने लगी थी वह। उसकी एक ही ख्वाहिश थी... मां बनना। आख़िर तक यही ख़ब्त सवार रहा उसके दिमाग़ पर।’’

‘‘तो आपका शौहर मोम का पुतला बना रहा? कुछ नहीं किया उसने? डॉक्टर को नहीं दिखाया?’’ वकील ने पूछा।

‘‘जी नहीं।’’ इत्ता-सा दो टूक जवाब दिया उसने।

उसके जज्बातों से अहमद को तो कोई लेना-देना ही नहीं रहा कभी। उसके लिए ज़िंदगी एक नशा थी... जाम और जिस्म का नशा...

‘‘आपकी गवाही बहुत ज़्यादा मायने रखती है इस मामले में। अपनी ही जैसे एक औरत को न्याय दिला सकती हैं आप... अदालत आपके साथ है... डरने की कोई आवश्यकता नहीं...’’ वकील ने उसकी हौसला अफज़ाई करते हुए कहा।

वकील के आश्वासक बयान से सायरा को तनिक राहत-सी महसूस हुई। उसने अहमद की ओर देखा। बेहयाई का वही नूर उसके चेहरे पर बरकरार था। सायरा को लगा कि वह यदि अहमद के खिलाफ गवाही देती है तो उसे फांसी की सजा सुनायी जाएगी। लेकिन उससे हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा? मुक्ति मिलेगी हम सभी को। किधर जाता है, क्या काम करता है - कुछ बताता नहीं, हफ्ता-हफ्ता भर घर नहीं लौटता - दारू पीकर पड़ा रहता है किधर भी... हमाली करता हूं बोलता तो है...

लेकिन कौन रखेगा इसे काम पे? सुना है कि सबके साथ गुंडागर्दी कता है। घर में तो पैसा कुछ भी नहीं देता... सिलाई, कसीदाकारी करके मैं ही घर चलाती हूं जैसे-तैसे। ऊपर से ़जरीना को भी रखैल बना रखा है... उसे भी कुछ तो रुपये-पैसे देता ही होगा। तीन बच्चियां... और एक लड़का चाहिए हरामज़ादे को! बच्चियों के वास्ते कुछ करने का नाम ही नहीं लेता कम्बख़्त। दो-एक बार गुस्से में मैं अपने भाई के पास मालेगांव गयी थी, तो वहां आकर तमाशा खड़ा किया इसने... और मुझे वापस लिवा लाया... अल्ला ने ही यह मौका दिया है उससे निजात पाने का...

लेकिन सायरा सोचती ही रह गयी और सुनवाई की अगली तारीख का एलान हुआ।

अदालत के बाहर अहमद का भाई खड़ा था। सायरा का भाई भी मालेगांव से आया था... मुमताज की मां और बहन भी भिवंडी से आयी थीं। लेकिन अहमद ने न किसी की ओर देखा न पूछा। सरपट वहां से आगे निकल गया। उसका और अहमद का भाई... दोनों भी... इतना ही कर सकता है कोई भी... उससे आगे तो हम और हमारा मुक़द्दर... सायरा की आंखें भर आयीं। मुमताज की मां बगल में पोटली थामे कोने में मायूस-सी खड़ी थी। सायरा का ध्यान उसकी ओर गया और मन- ही-मन वह पसीज गयी। मैंने उसे आश्वस्त तो किया था, कि मैं आपकी बेटी की ओर से लड़ाई लड़ूंगी और आपको न्याय दिलवाऊंगी। लेकिन नहीं निभा सकी मैं अपनी बात। अहमद के खिलाफ एक लफ़्ज भी नहीं निकल पाया मेरे मुंह से। मैं सिर्फ अपनी ही ज़िंदगी के बारे में सोचती रही...

‘‘हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा...’’ सायरा मुमताज की मां के सामने हाथ जोड़कर खड़ी रही। मैं तो सिर्फ इतना ही कह सकी कि, ‘‘मुमताज मेरी छोटी बहन थी। इससे ज़्यादा कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई मेरी...’’

‘‘नहीं बेटी, नहीं। ग़लती तेरी नहीं है। मुमताज की मां होकर भी मैं कहां कुछ बोल सकी अहमद के खिलाफ?’’ फिर सायरा को एक ओर ले जाकर हौले से वह फुसफुसायी, ‘‘कसूर तो मुमताज का भी था। वो भी तो पागल जैसा ही बरताव करती थी।’’

वो तो ठीक है। लेकिन अहमद भी उसे हमेशा बांझ-बांझ कहकर उलाहना देता था - सायरा कहने को ही थी। लेकिन यह सब तो उन्हें मालूम था। अहमद ने ही मुमताज को उकसाया और वह आग के हवाले हो गयी - अदालत में ऐसा बयान देने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। इसके बावजूद मुमताज की मां खुद को ही कसूरवार बताती है? आख़िर क्यों? अब तो यह डर भी नहीं रहा कि अहमद मुमताज से तलाक़ लेगा... फिर भी?

‘‘अम्मी जान, आपको ग़ुस्सा नहीं आता अहमद पर?’’ सायरा ने पूछा। मुमताज की मां के मुंह में पान की पीक थी। तनिक दूर जाकर उसने वह थूक दी और मुंह पोंछते हुए कहा, ‘‘ग़ुस्सा करने से क्या फायदा? मुमताज तो चली गयी - मेरे ग़ुस्सा करने से वापस थोड़े ही आएगी? और सायरा बेगम, मेरी बेटी की भी गलती थी न? मां न बनने की बद्दुआ जो मिली थी उसे।’’ सायरा को फौरन याद आया, मुमताज ने एक बार बताया तो था उसे, ‘‘मेरी मां बताती तो है... तेरे में कमी है। तुझे बच्चा नहीं होगा। इसलिए तेरे को अहमद की मारपीट सहन करनी ही पड़ेगी...’’ मुमताज ने भी ग़ुस्से में जवाब दिया, ‘‘मैं बोली मां को, हां, ग़लती मेरी ही सही, पर तेरी भी ग़लती है। तू ख़ुद तो मां बन गयी, पर मेरी कोख हरी होने की ताकत तू ने मेरे को नहीं दी... हरामी तो तेरा भी जिसम है।’’

‘‘अहमद बोलता था मेरे को।’’

मुमताज की मां कहने लगी, ‘‘ऐसी लड़की को मेरे गले में बांध के आपने मेरी ज़िंदगी बरबाद कर दी... इसके वास्ते आपकी ये दूसरी लड़की मुझे दे डालो...’’

यह सुनकर सायरा दंग रह गयी। उसे अहमद से घिन-सी होने लगी। मुमताज की बहन सुलताना पास ही में खड़ी थी। सबीना से दो-तीन साल बड़ी लगती थी! उससे निकाह करने का बोलता है? ‘‘वो तो कुछ भी बोलेगा कमीना!’’ सायरा ने झुंझलाकर कहा।

मुमताज की मां फिर भी बिल्कुल ही शांत थी। कहने लगी, ‘‘कभी-कभी लगता है कि मर जाऊं तो अच्छा होगा... ये दोजख तो देखना नहीं पड़ेगा... मुमताज के अब्बू चल बसे, दो लड़कियां मेरे सिर पे डाल के। दो में से एक अल्ला को प्यारी हो भी गयी। हमारा ख़याल नहीं आया उसको। और ये सुलताना, कम्बख़्त! इसके दिमाग़ में दीमक लगी है - एक हिंदू लड़के के साथ घूमती है साली! उसके साथ रहके गुलछर्रे उड़ाती है। उसके साथ सो के पेट सेभी रह गयी थी मुंहजली!’’ कहते हुए सुलताना की ओर देखकर उसने आंखें पोंछ ली।

‘‘अहमद बुरा है तो बुरा ही सही, पर मज़हब के दायरे में तो है...’’ मज़हब के दायरे में रहना काफी है? दायरे में रहने से कुछ भी करने की छूट मिल जाती है? बेटी की ख़ुशहाली कोई मायने नहीं रखती? - सायरा मन-ही-मन सोचती रही। मज़हब के दायरे की दलील देती है बड़ी मां, पर क्या अहमद ऐसी ख़ुशफ़हमी के काबिल है भी? ये औरत ऐसा सोच कैसे सकती है।

बाद में वे कहने लगीं, ‘‘लेकिन मैं खुद ही अपने आप को कोसती हूं कि जिस आदमी ने मेरी एक बेटी की जान ली, उसी के साथ दूसरी बेटी का निकाह होने दूं? क्या हो गया है मेरे दिमाग को? एक मां भला ऐसा सोच सकती है?...’’ मुमताज की मां ने एक उसांस छोड़ी।

‘‘कुछ समझ में नहीं आता बेटी... दिमाग़ काम ही नहीं करता मेरा। लगता है मैं पागल हो जाऊंगी... तूने मुमताज के साथ बहन की तरह बरताव किया। अल्ला तुझे सलामत रखे। अहमद रिहा हो जाएगा... तो अच्छा है। तीन-तीन लड़कियों की ज़िम्मेवारी उसके सिर पर है... खैर।

चलती हूं बेटी।’’ कहकर उन्होंने सायरा का हाथ छोड़ा।

‘‘लेकिन घर तो चलिए। मुमताज चली गयी तो क्या, मैं जो हूं...’’ सायरा ने उनसे आग्रह किया।

‘‘नहीं बेटी, ख़ुश रहो।’’ कहकर डबडबायी आंखों से ही वे चल दीं। वो तो चली गयीं, पर सामने देखा तो ज़रीना खड़ी थी। उसके हाथ में नन्ही- मुन्नी अमीना थी, तौलिया ओढ़ायी... सायरा की गुड़िया अमीना।

‘‘मैंने दूध पिलाया... अभी-अभी सोयी है।’’ ज़रीना सायरा के करीब आयी। ‘‘मुझे डर था कि रो-रो के अदालत में बावेला मचाएगी ये लड़की...’’ अमीना को अपने हाथों में थामते हुए सायरा ने कहा।

‘‘आप कितना अच्छा बोलती थीं...’’ ज़रीना ने कहा। ‘‘आप स्कूल में थोड़ा तो पढ़ी हैं... मैं तो घबराहट से मर जाती... लेकिन अपने मरद की बदनामी बरदाश्त नहीं कर सकती। बराबर है न? इसमें हमारी बदनामी होती है।’’

अपने मर्द? सायरा जरीना को घूर रही थी। बुझी-बुझी-सी सुरमई आंखें - नाक में लौंग... पेड़ की छाल-सा कत्थई रंग... होंठ भी गुलाबी होने के बजाय उसी तरह से कत्थई। ज़नाना नज़ाकत का कोई नामो निशां नहीं... क्या देखा इसमें अहमद ने। कहने को वह सिर्फ औरत है, बस!

इतना ही काफी है अहमद के लिए। इसे रखैल बनाया है उसने... ज़रीना को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं। उसका मरद मर गया था इसलिए...? लेकिन अहमद उसे ख़ुश रख पाता होगा? रोज़ाना उसके लात- घूंसे खा के भी उसी के साथ रहती है यह- आख़िर क्यों?...

‘‘चलेंगे अब...’’ सायरा ने उससे कहा। बस्ती के पास ही पटरी पर खड़ी मालगाड़ी वहीं-की-वहीं खड़ी थी। बस्ती के लोग गाड़ी के डिब्बों के नीचे से ही ‘ए पार - ओ पार’ आ जा रहे थे। उसके अगल- बगल में फ़ारिग हो रहे लोगों की बेतरतीब सी पांत... मानो बड़ियां-बोटियां सुखाने के लिए धूप में धर दी गयी हों। लोगों की भीड़ से कटा-कटा-सा तनहा प्लेटफॉर्म। सिर्फ लंबी दूरी की गाड़ियां ही इस स्टेशन से आती-जाती थीं। पटरी के उस पार बने अवैध बसेरे... हिंदू-मुसलमान के मिले- जुले ठिय्ये।

सड़क के एक ओर पानी के हैंडपंप का घेरा और सवेरे-सवेरे पानी के लिए वहां उमड़ी भीड़। उससे भी आगे स्कूल की खंडहरनुमा इमारत, स्कूल के पिछवाड़े जाम होकर जंग खा रहे लोहे के गेट पर सूख रहे कपड़े... उसी के पास लबालब होने से बह रहा कूड़ादान। उसी के आस- पास ज़मीन से धंसा, बच्चों का चकरी खिलौना... उस पर भी लत्ते-चिंदियों की सुखावन - यहां से कुछ ही आगे, सीवर नाले के पास सायरा का मकान...

सायरा की बड़ी बेटी सबीना पानी के लिए कतार में खड़ी थी। दूसरी, पांच- छः साल की साजदा अभी तक सो रही थी। झूले में नन्ही-सी अमीना का हाथ- पांव मारना शुरू हो गया था। सवेरे की अजान के बाद सायरा-सबीना नमाज़ अदा कर चुके थे। चंदोवे से लटक रही, चिंदी की चिड़ियों को देख-देख खुश हो रही अमीना हुंकार भरते हुए खूब मचल रही थी। अहमद के बूढ़े वालिद यानी दिलावर चाचा सवेरे की नमाज़ अदा करने के बाद बिस्तरे में यूं ही करवटें बदलते लेटे थे। उनके आंख-कान कभी के निकम्मे हो चुके थे। उनके पास में ही पिशाबदानी के तौर पर रखा लोटा अब बदबू फैलाने लगा था।

सिलाई के लिए आये ब्लाउज में सायरा बटन टांक रही थी। ब्लाउज लेने रज़िया दोपहर में आने वाली थी। पिशाबदानी को वहां से उठाकर खाली करवाना ज़रूरी था।

किंतु ब्लाउज-बटन से निपटते ही अन्य ज़रूरी कामों में जुटने का उसका इरादा था। बटन टांकने के बाद सुई का धागा दांतों से कुतरते हुए सायरा का ध्यान उस कोने में गया, जहां से चूहे राजा की सवारी डोलते-डोलते निकली थी। उसकी कृपा से वह लोटा लुढ़कते-लुढ़कते बाल-बाल बच गया।

‘‘हाय अल्ला! तेरी तो...’’ सायरा चूहे की दिशा में झपट पड़ी। ‘‘अब तो चूहे की दवा लानी ही पड़ेगी बाजार से।’’ वह बुदबुदायी।

लोटा खाली कर के लौटते हुए वह पड़ोसी अज़हर के ठेले की ओर मुड़ ही गयी। चूहे-झिंगूर-क़ीडे मारने की दवा बेचने का काम वह करता था। चूहे की दवा उसने अज़हर से ले तो ली और ‘‘पैसा दोपहर में दूंगी’’ कहकर वह आगे खिसक गयी। लेकिन मकान मालिक वहीं खड़ा था। उसने सायरा का रास्ता रोककर घुड़की दी, ‘‘किधर है तेरा लुच्चा-लफंगा मरद? भाड़ा तो दिया नहीं, ऊपर से पैसा भी उधार लिया... जब देखो बहाने बनाता है कमीना...’’

‘‘मुझे नहीं मालूम साबजी। कसम से नहीं मालूम। आज पांच दिन हुए घर आया ही नहीं... मैं क्या बताऊं आपको?... मेहरबानी करके रहम खाओ मुझ पर। हाथ में पैसे आते ही मैं भाड़ा चुकाऊंगी।’’ सायरा ने बुरके में से ही गुज़ारिश की।

‘‘तुम्हारे जैसे मनहूस लोगों को तो पास में फटकने ही नहीं देना चाहिए... बदमाश लोगों की ही कौम है...’’

‘‘कौन बदमाश! किस की कौम? ज़ुबान संभाल के बात करना सेठ...’’ सायरा का पड़ोसी जावेद मशीरी करते खड़ा था, उलझ गया।

‘‘तू चुप बे मवाली! तुम जैसे मक्कारों ने ही कौम को बदनाम कर रखा है... कौम के नाम से दया की भीख मांगते हो तुम लोग और मौका देखकर कौमी हथियार से ही दहशत फैलाते हो... हैवानियत पर उतर आते हो! ’’

‘‘ए साला काफिर! ज़्यादा बकबक मत कर। वरना मार खायेगा तू मेरे से...’’ कहकर जावेद उस पर झपट पड़ा। बस्ती के और लोग भी वहां इकट्ठा होने लगे, तो मौका देखकर सायरा वहां से दफा हो गयी। उसके आने की आहट पाते ही दिलावर चाचा ने कराहते हुए कहा, ‘‘बहू, दो घूंट चाय तो पिला दे... गला सूख गया है।’’

‘‘घर में दूध नहीं है। चूहे की दवा लायी हूं, कहो तो दे दूं?’’ सायरा ने झुंझलाकर कहा। ‘‘अपने बेटे को बोलो न... हरामज़ादा जेल से रिहा होने के बाद तो और भी मुस्टंडा हो गया है कमीना... मालिक भाड़ा मांगता था मकान का... उससे बचते-बचाते आयी हूं... किस-किस से मुंह बचाऊं मैं?’’ सायरा का गुस्सा मायूसी में बदल जाने से वह रुआंसी हो गयी।

‘‘बदज़ात है मेरा बेटा,’’ दिलावर चाचा कहने लगे, ‘‘वो तो हर तरह से हमारे इस्लाम के साथ खिलवाड़ कर रहा है बहू... एक तो दारू पीता है और ऊपर से औरत पे हाथ उठाता है, तुझे पीटता है। कितनी बार बोला उसको... क़ुरआन शरीफ ऐसी बेजा हरकतों की हिमायत हरगिज़ नहीं करता। फिर भी वो मनमानी करता रहा तो अल्ला उसे माफ़ नहीं करेगा... जहन्नुम का भागीदार बनेगा कम्बख़्त।’’

आंखें पोंछते हुए सायरा ने बाहर की ओर देखा। सबीना बरामदे में धुले कपड़े रस्सी पर डाल रही थी। उसका चम्पई बदन... पानी में पड़ी धूप-सी गहरी, चमकदार पारदर्शी आंखें, शानों पर लहराती चुटिया, कानों में लटकते झुमके, सुनहरे वर्ख वाली खनकती चूड़ियां... सायरा यूं ही उसकी ख़ूबसूरती को देखती ही रह गयी। मेरी प्यारी बन्नो... सोलह साल पूरे कर लेगी जल्दी ही। बस्ती के छोटे-बड़े लोग टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं आते-जाते... सजना-संवरना तो खूब पसंद है उसे।

कसीदाकारी करती है और उससे हुई आमदनी कंगन, झुमके आदि में खर्च करती है। बस्ती के लौंडों का डर लगता है। उसके बाप का तो और भी ज़्यादा डर। अहमद की नज़र कब बदल जाए भरोसा नहीं... गायब रहता है घर से तो सुकून रहता है... उसके घर लौटते ही ख़ौफ़ के साये मंडराने लगते हैं।

पड़ोसी जावेद सबीना पर आंखें गड़ाए घूर रहा था। सायरा का ध्यान गया तो उसने सबीना को आवाज़ दी, ‘‘बेटी, अंदर आ जा जल्दी।’’

‘‘क्यों चिल्लाती है अम्मी? यहींच पड़ी हूं मैं घर में...’’ खाली बाल्टी को नाली के पास लगभग पटकते हुए वह झल्लायी। खिड़की के पास पड़े एक शीशे के टुकड़े में वह अपना मुखड़ा देखती खड़ी रही, तो सायरा का माथा ठनका।

‘‘बस्स, खाली आईने में देखती रह तू... ’’

‘‘बराबर देखूंगी। लेकिन जलती काय को तू? मैं आईने में देखती तो तुझे क्या परेशानी हुई? जावेद देख रहा था इसलिए...?’’

‘‘सबीना तू समझती क्यों नहीं? खाली सजना-धजना और ख़ूबसूरत दिखना... इत्ताच काम होता है क्या औरत का? पांचवी क्लास में स्कूल छोड़ के घर में बैठी तू। क्या फायदा हुआ तेरा? अरी, पढ़ने-लिखने से इज़्ज़त बढ़ती है, मुई। नौकरी-पैसा उसीसे तो मिलेगा। मैं तेरे को खूब पढ़ाना चाहती हूं। अभी मेरे हाथ-पांव में दम है। मैं चाहे जितनी मेहनत करूंगी... तू सिर्फ पढ़ने का काम कर... मैं कहती हूं अभी भी शुरू कर सकती है तू... मेरा एक सपना है बेटी... तुझे, साजदा-अमीना को पढ़ाने का, तुम लोगों को एक अच्छी ज़िंदगी बख़्शने की दिली ख्वाहिश है।’’

‘‘सजने-धजने से नहीं संवरती ज़िंदगी?’’ सबीना ने तैश में आकर प्रतिवाद किया। ‘‘मेरे से नहीं होगा पढ़ना-बिढ़ना।

मैं दिखने में अच्छी हूं, मेरे को शादी करने का... फैशन-वैशन कर के और ज्यादा अच्छा दिखने का है मुझे। मां बनने का, घर बसाने का इरादा है मेरा। तेरा सपना तेरा होगा... मेरे को उससे क्या लेना-देना?’’

सायरा के मुंह पर जैसे ताले पड़ गये। ये सबीना नहीं, उसकी जवानी बोल रही है। कैसे समझाया जाए उसे? घर- बार, बच्चे-कच्चे, फैशन-वैशन में सिमटने का सोच रखना ग़लत है... लेकिन उसके दिमाग में घुसती क्यों नहीं यह बात? क्या अपनी अम्मी की हालत देख नहीं रही वो? ‘‘अम्मी, तू यह सब मेरे को सिखाती है, तेरे को क्या मिला? दसवीं के ऊपर दो साल पढ़ी तू। लेकिन कपड़ों की सिलाई में ही सिमटकर रह गयी न आख़िर? इत्ता भोत पढ़-लिखकर क्या हासिल किया तूने?’’

सायरा सुनकर दंग रह गयी। और उसकी बात सच भी थी। अब्बू ने जल्दी की और अहमद के साथ मेरी शादी कर दी... क्योंकि अम्मी को टी.बी. ने घेर लिया था। वरना अब्बू तो मुझे पढ़ने के लिए बोलते थे और अम्मी भी कहती थी कि पढ़ने से सोच का दायरा बढ़ जाता है।

लेकिन हाय! अहमद से शादी के बाद मैं सिर्फ एक औरत बनकर सांस लेती रही, वो सायरा पता नहीं कहां खो गयी... अहमद ने मुझे अपनी मिल्कियत बनाकर मुझे भोगने का काम किया... मेरे जिस्म को नोच खाता रहा बस। उसकी सड़ीयल ज़िंदगी की विरासत के बीज मेरे जिस्म में पनपते रहे और दोजख बने इस कूड़ेदान में उसी विरासत की निशानियों के साथ सांस लेते हुए बिलबिला रही हूं मैं...

‘‘अम्मी, तेरे को सुनाई नहीं देता क्या? अमीना कब्बी से रो रही है।’’ रोती हुई अमीना को झूले में से उठाकर सायरा की गोदी में धर देते हुए सबीना चिल्लायी।

सायरा ने कुर्ती के बटन खोलकर दुपट्टे की ओट की ओर अमीना को थन से लगाया। रूई की तरह भुरभुरे, निचुड़े, खोई बने थनों में पर्याप्त दूध नहीं था फिर भी... पानी की प्यासी धरती में पड़ी झुलसन की दरारों की तरह बिवाइयां पड़ी चूची को नन्ही-सी अमीना के नाज़ुक से होंठों का स्पर्श भी नागवार गुज़र रहा था... उसे ऐसा लग रहा था जैसे थनों को कच्चा चबाया जा रहा हो। होंठों को दांतों से भींचकर उन ख़ुशगवार लम्हों को वह कड़ुवे घूंट की तरह बड़ी मुश्किल से जज़्ब कर रही थी।

दूध की प्यासी मुनिया बड़ी शिद्दत से थन चूस तो रही थी पर बीच-बीच में अपर्याप्त दूध की वजह से चूची मुंह से बाहर निकल आती थी। सूखे चूसन की व्यथा बरदाश्त से बाहर होने लगी, तो सायरा ने खीझकर अमीना के कूल्हे पर एक चपत भी जमायी।

‘‘कितना चूसती है साली! बाप की तरह!’’ अमीना तिलमिलाकर दूर हो गयी, तो सायरा ने फौरन उसको भींच लिया। ‘‘माफ करना... मेरी बच्ची...’’ कहते हुए यकायक उसकी आंखों में नादिर तैरने लगा। मुश्किल से एकाध महीने का रहा होगा नादिर... सबीना के बाद हुआ था।

मुद्दत से पहले ही पैदा हुआ। बहुत ही कमजोर तथा छुई-मुई सा। उस वक़्त सायरा के थनों में इतना ज़्यादा दूध था कि चूसते- चूसते बच्चा थक जाता था। ...और उस दिन थन चूसते हुए... पता नहीं कैसे, दूध की धारा अचानक नादिर की नाक में घुस गयी। फिर क्या था, उसकी सांश रुंध गयी। चेहरा लाली-लाल हुआ और मुंह-नाक से दूध पलटकर बाहर आ गया। सांस फूलने से हिचकियां बंधने लगीं और उसी दौर में उसका दम घुटता चला गया। सायरा उसके चंदिया को सहलाती रही और उसे पता भी नहीं चला कि नादिर की सांस कब थम गयी। सायरा को काटो तो खून नहीं। वह नादिर के ललाये चेहरे की मायूस सुर्खी को देखकर तार-तार हो रही थी। उसी के दूध ने उसी के कलेजे के टुकड़े की जान ले ली थी। नादिर के खुले होंठों तथा अधखुली आंखों को देखकर वह फूट पड़ी ‘नादिरऽ...’ उसकी चीख समूची बस्ती के सन्नाटे को चीरते हुए आर- पार चली गयी। और उसके बाद... उसके बाद उसके थन आप ही बहने लगे... अनवरत। टपक रहे दूध की कुछ बूंदें निःस्पंद नादिर के पलकों पर बड़ी ही बेरहमी से सवार हुई थीं। अहमद तो जैसे सायरा को एक निवाले में ही निगलने पर आमादा नज़र आ रहा था। उसे मार-मार के भुर्ता बनाया था उसने। उलाहना भरी उसकी गाली-ग़लौज नशीलेपन में या अन्यथा भी छुरे की तरह गहरे घाव करती है, लहू- लुहान कर देती हैः ‘रांड साली, ख़ूनी कुतिया!... तेरे थनों में दूध है या ज़हर... तू मां है या चुड़ैल? अपने जिगर के टुकड़े को अपने ही ज़हर से मार डाला... डायन कहीं की!’

उन मनहूस स्मृतियों ने सायरा की आंखों में नमी भर दी। दुपट्टे से आंखें पोंछकर उसने अमीना के मुंह में दूसरा थन धर दिया। इस बीच साजदा की नींद खुल गयी थी और वह बिलबिला रही थी। उसे भूख लगी थी। सायरा की भौंहें तन गयीं। अमीना के खिलौने वहीं बिखरे पड़े थे। उनमें से लट्टू उठाकर सायरा ने उसकी ओर उछाल दिया... ‘‘चुप कर साली! भूख... भूख...

आ, यहां आ... खा ले मुझे...’’

साजदा ने आवाज़ त़ेज कर दी। सबीना नहाकर गुसलखाने से अभी बाहर निकल ही रही थी। वह तमतमाकर आगे बढ़ी और प्लेट में रखा पाव उसने साजदा के हाथ में थमा दिया। फिर हिकारत से मां को घूरते हुए उसने फिकरा कसा, ‘‘कायको पैदा की ये पल्टन? खाना नहीं खिला सकती तो?’’

‘‘जा, अपने बाप से पूछ...!’’ सायरा ने भी उसी तेवर में जवाब दिया। ‘‘वो मरद है... लेकिन तू तो औरत है न... वो भी पढ़ी-लिखी औरत?’’

अपना ही खून ये तेवर दिखा रहा है... मर्द भले मनमानी करे... औरत को ही औरताई निभानी पड़ेगी! - अहमद की बेटी... खुद को मर्द के हवाले कर देने के लिए आतुर... सायरा बेबस निगारों से सबीना को ताकती रही, बस। इसी दोजख में तो मैं अपने साथ ही इसे भी पाल रही हूं... मेरे साथ ही अब इसका भी इसी दलदल में फंसना लगभग तय हो गया है - वो तो थोथा चना है... बजेगा ही... उसी के जैसी औरत की गवाही से!

अमीना दूध पीते-पीते सो भी गयी। उसका थन भी अब मुक्त हो चुका था। मुनिया के चूसने से लाल हुई, फटी-दरकी चूची फिर भी हहराती थी... सायरा को बराबर महसूस होने लगा था। आंखों के उमड़ने के लिए इतना दर्द तो काफी था। अमीना के ठोडी पर पड़ी दूध की बूंद उसने पोंछ डाली और अपने आंसू वह पी गयी... पूरे नौ दिन हो चुके हैं, किंतु अहमद का कोई अता-पता नहीं था। वह नदारद क्या हुआ, ग़ायब ही हो गया। कोई कहता वह दर्गाह के पास था, कोई कहता उसे मसज़िद के आस-पास देखा था... मुमताज के घर के पास... किसी गली-मुहल्ले में... सायरा ने पास-पड़ोस में तथा बस्ती के और भी लोगों से पूछताछ की... किंतु कोई सूराग नहीं मिला। उसे लगा कि वह ज़रीना के साथ हो सकता है... इसलिए वह चल पड़ी। अमीना तो अभी-अभी सोयी थी। जाते-जाते उसने हौले से झूले को झुलाया।

साजदा गली में खेल रही थी। दिलावर चाचा भी झपकी ले रहे थे। सबीना को चौका सौंपकर उसने हिज़ाब पहना और चल दी।

ज़रीना के घर के सामने ही चौकीदार की तरह खड़ा इत्ता बड़ा पेड़... उसके साये में बच्चे उछल-कूद कर रहे थे। पास वाली मसजिद में जुम्मे की नमाज़ के बाद किसी खास मौलवीजी की तकरीर जारी थी, जो लाउडस्पीकर की मेहरबानी से दूर-दूर तक साफ सुनाई दे रही थी। दूसरी तरफ कसाई की दूकान के सामने वाले हिस्से में ‘बड़े’ के गुलाबी गोश्त की नुमाइश टंगी थी। उसी के पिछवाड़े खाली ज़मीन का बड़ा-सा रकवा तपती धूप में झुलसने लगा था।

ज़रीना के घर का दरवाज़ा परदे से ढका था... सायरा ठिठक कर बाहर ही खड़ी रही। अहमद यदि भीतर होगा तो बिफर जाएगा... ज़रीना के सामने बेइज़्ज़ती करेगा... यही सोचकर उसने आवाज़ दी, ‘‘झरीनाऽ’’

आवाज़ सुनते ही वह फुर्ती से बाहर आयी। ‘‘अंदर आइए न दीदी। यहां तो बहुत ज़्यादा धूप है। पानी-वानी पी लीजिए। शरबत बनाती हूं आपके लिए। वो तो कभी से बाहर गये हैं... कल रात यहीं थे, घर नहीं आये?’’

सायरा भीतर गयी। इससे पहले भी एक बार वह अहमद को ढ़ूंढते-खोजते आयी थी यहां। ज़रीना का एक कमरे वाला मकान... पर साफ-सुथरा। ट्रांजिस्टर पर गाने बज रहे थे। दीवार पर मरहूम शौहर की तस्वीर... उसी के बगल में क़ाबे का नज़ारा और एक शीशा। सामने वाली दीवार में ठुके लंबे से तख़्ते पर करीने से रखे कनस्तर... ठीक उसी के नीचे, दीवाल से सटकर रखे छोटे-बड़े पानी के घड़े, अल्लूनियम की थालियों की खड़ी पांत, स्टोव पर पक रहा गोश्त... चारदीवारी में फैली उसकी महक...

ज़रीना झट से शरबत बनाकर ले आयी। उस समय सायरा का ध्यान उसके गले की ओर गया। वहां उसे खरौंच के निशान दिखाई दिये। इससे पहले कि सायरा उससे कुछ पूछे, ज़रीना ने खुद ही सफाई पेश की, ‘‘कल ज़्यादा पीकर आये थे... शायद मारपीट करने के बाद ही उनका प्यार उमड़ पड़ता है।’’

अहमद की मारपीट भी इसे प्यारी लगती है? अजीब औरत है। सायरा को उस पर तरस आता रहा। ‘‘मेरी मां कहती थी कि मरद जितना ज़्यादा पीटता है, उतना ही उसका प्यार सच्चा होता ही... मेरा आदमी भी कम नहीं पीटता था मेरे को। पर दिल खोल के मुहब्बत करता था।’’ ज़रीना ने अपने मरहूम शौहर की तस्वीर की ओर देखते हुए कहा। मर्द से पिटना यानी सम्मानित होने जैसा है! बीवी को पीटने का अधिकार जतलाना यानी प्यार करना होता है...?

‘‘मेरे अब्बू इमाम थे’’ सायरा खुश होकर कहने लगी, ‘‘वे मेरी अम्मी की बहुत इज़्ज़त करते थे। बोलते थे, अल्ला सभी को एक ही नज़र से देखता है... औरत हो या मर्द... सबीना के अब्बू को मेरे अब्बू नसीहत देते थे - मेरी बेटी पर हाथ न उठाना।’’

‘‘लेकिन हमें भी अब आदत पड़ गयी है मार खाने की... है न दीदी?’’ ज़रीना ने कहा। ‘‘सभी घरों में कमोबेश ऐसा ही होता है... क्यों दीदी?’’

‘‘ग़लती तो हमारी है। हम मर्द को अपना रखवाला मानते हैं। लेकिन रखवाला मानने से क्या बेहूदगी का हक़ मिल जाता है...?’’ सायरा ने प्रतिवाद किया।

‘‘लेकिन मरद से लड़ाई-झगड़ा करके हमें क्या मिलेगा?’’ ज़रीना ने शरबत का खाली गिलास उठाया, तो उस पर भिनभिना रही मक्खियां फौरन छितर गयीं।

मैं उसकी हाथापाई का विरोध करती हूं, तो उल्टा मुझे सुनाता है, ‘‘वो ज़रीना देख... साली रंडी होके भी चूं-चपड़ नहीं करती... और तू... हरामज़ादी मेरे को आंख दिखाती है...’’

‘‘एक बात पूछूं झरीना? बुरा तो नहीं मानोगी? इतने लात-घूंसे खाकर भी तुम उसके साथ क्यों रहती हो? क्या मजबूरी है तुम्हारी?’’ आख़िरकार सायरा ने उसे पूछ ही लिया।

‘‘क्यूं रहती हूं?’’ उसने मासूम अंदाज़ में सवाल को दोहराया। लेकिन तुरंत गंभीर होकर उसने जवाब में कहा, ‘‘अकेली नहीं रह सकती मैं, दीदी!

डर लगता है। मेरा आदमी तो चला गया, पर दस लोग घूरने लगते हैं। उनसे बचना मुश्किल होता है। इसके बजाय किसी एक की रांड बनकर रहना अच्छा है... किसी की जुर्रत नहीं होती आंख उठाकर देखने की।’’ तनिक आगे झुककर उसने सायरा का हाथ थामकर आगे कहा - ‘‘आपसे मेरी एक गुजारिश है, दीदी...

कहूं? आप अपनी बहन समझ के मुझे पनाह दीजिए। आपके शौहर से निका नहीं करना मेरे को। उसकी रखैल कहलाना मुझे मंजूर है। मुझे मरद के सहारे की सख़्त जरूरत है। हां! मेरे को मालूम है, आपको तकलीफ होती होगी। किंतु अल्ला कसम, मेरे को उससे अलग मत करना। मैं हाथ जोड़ती हूं... वादा करो दीदी...’’

ज़रीना इतना गिड़गिड़ा रही है... वह भी अहमद के लिए! सायरा को हज़म नहीं हो रहा था ज़रीना का यह बेगानापन। मर्द की कोई वक़त हो या न हो, वह औरत को कूड़ा-कचरा क्यों न मानता हो... उसका सिर्फ होना ही औरत के लिए इतना क्यों मायने रखता है? सायरा ने ज़रीना का हाथ अपने हाथ में रहने दिया और कहा, ‘‘मुझ में इतनी हिम्मत है कि मैं सबीना के अब्बू को मना कर सकूं? मान जाएंगे वे मेरी बात को? मुमताज को मेरे सामने ऐसे ही लाके खड़ा किया था उन्होंने, जब उसे ब्याह के लाये थे। फिक्र मत करो।’’ कहकर सायरा ने ज़रीना की आंखों में झांकने का प्रयास किया।

किंतु ज़रीना की निगाहें ज़मीन में गड़ी थीं।

‘‘हमारी शादी को सात महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि मेरे मरद का इंतिकाल हो गया। मेरे मायके वाले और ससुराल वाले - दोनों में से किसी को भी हमारी शादी मंज़ूर नहीं थी। इस तरह मैं अपने मायके वालों से कट गयी और ससुराल वालों ने तो मुझे अपनाया ही नहीं था। मैं कहीं की नहीं रही। मेरे तो पांव के नीचे की ज़मीन ही खिसक गयी...’’ इतने में ज़रीना का ध्यान स्टोव की तरफ गया। गोश्त पक रहा था। उसने कलछुल से सालन को नीचे- ऊपर किया और स्टोव के पास में ही बैठकर सायरा की ओर देखते हुए वह आगे कहने लगी, ‘‘मेरे तो पर कट गये थे। मैं उड़ नहीं सकती थी। पूरी तरह से बेसहारा बन गय मैं। सैयद से अहमद की दोस्ती थी। अकेला वही आता था मेरी पूछताछ करने को...’’

कहते-कहते उसका गला भर आया था और नाक का सिरा भी लाल हो रहा था। नाक की लौंग को वहीं-के-वहीं वह घुमाती रही थी। उसकी हाथ में लगी मेहंदी की महक बीच-बीच में लहराती थी। ‘‘ऐसा सूनापन अल्ला किसी को न दे...! आप अंदाज़ा नहीं लगा सकतीं दीदी, कि मैं भीतर-ही-भीतर कितनी टूट चुकी थी... लेकिन कम्बख़्त ये जिसम... ये तो ज़िंदा था न दीदी। इसी जिसम ने मुझे अहसास दिलाया तनहाई का, सूनेपन का।’’

सायरा उसकी बातों को ग़ौर से सुन रही थी। इसी क्रम में उसे बार-बार मुमताज की याद आती रही... काश! इस जिस्म के बिना औरत को बनाया होता अल्ला ने... मुमताज ने एक बार कहा था... सबीना भी तो ज़रीना के सांचे वाली ही है। दोनों का सोचने का तरीक़ा एक जैसा ही है... ज़रीना ने एक बार अपनी हथेलियों से बदन को यूं ही सहलाया और सायरा की ओर मुख़ातिब होते हुए कहा, ‘‘बदन की ताकत बहुत होती है न दीदी... बला की भूख होती है उसमें... वही ज़िंदगी को बरबाद करती है या उसे संवारती भी है... आपकी क्या राय है?’’

बाहर किसी लड़के ने इमली की फली को निशाना बनाकर एक पत्थर फेंका था, जो छत की टिन पर गिरने से टन्-सी आवाज़ हुई। ज़रीना को ग़ुस्सा आया - वह बाहर गयी और हुड़दंग मचा रहे बच्चों को डपटकर वापस आयी।

‘‘देखा दीदी, कभी-कभी तो ये लड़के जान-बूझकर शरारत करते हैं। अकेली बेवा औरत को देखकर तो उनको और भी जोश आता है। आपने कहा कि अहमद मेरे जिसम के लिए यहां आता है... मैं भी सोच में पड़ जाती हूं, कि मेरे पास ऐसा क्या खास है? मैं तो आपकी जैसी ख़ूबसूरत भी नहीं हूं।

सैयद ने थोड़ा पैसा जमा किया था। कसीदाकारी करके थोड़ा बहुत कमा लेती हूं... हो जाता है गुज़ारा...’’ ज़रीना अपना दिल हल्का कर रही थी, किंतु उसमें कहीं भी रंज-ओ-ग़म की छटा नहीं थी। ‘‘अपने औरत होने को मैं कमजोरी नहीं मानती दीदी। अपना जिसम ही सबसे बड़ी ताकत है मेरी, जो अल्ला ने दी है। इसी की वजह से मुझे सैयद मिला था... और अब अहमद... मैं तो ऐसा ही समझती हूं अभी।’’

सायरा को अब फिर एक बार ज़रीना की जगह पर सबीना दिखाई दे रही थी... दोनों के चेहरे ऐसे, जैसे उन पर किसी भी तरह के अहसास का इंदराज़ अभी तक न हुआ हो... सायरा का दिल बैठ गया।

सच है कि जिसम की भूख औरत को भी होती है। लेकिन सिर्फ जिसम की भूख ही ज़िंदगी तो नहीं हो सकती! ...किसी भी मर्द के बिना ही औरत अपने वजूद को साबित क्यों नहीं कर सकती? अहमद मेरे साथ है, फिर भी मैं बेसहारा हूं। दरअसल ज़रीना का अकेला होना और हमारा या मुमताज का भी - है कोई फ़र्क... सायरा उठ ही रही थी, जाने के लिए।

किंतु ज़रीना ने तनिक और रुकने का आग्रह किया और कहने लगी, ‘‘दीदी, और एक बात करनी है आप से। मुझे मां बनना है। बच्चा तो मेरे को भी चाहिए - बोली मैं उनसे।’’

‘‘फिर क्या कहा उसने? मंज़ूर है उसे?’’ अधीर होकर सायरा ने पूछा।

‘‘बोले, रंडी है तू। भूल गयी क्या? बच्चा मांगती है तू? शरम नहीं आती?’’ और आगे बोले, ‘‘ख़बरदार! तेरी जैसी औरत ही यदि तू ने पैदा की, तो दोनों को भगा दूंगा, समझी? मेरे को लड़का चाहिए... बोल, मंजूर है? फाल्तू में एक और हरामी लड़की का बाप नहीं बनना मुझे। दीदी, मैंने सोच लिया। लड़का या लड़की देना अल्ला के हाथ में होता है। मेरी किस्मत फूटी और लड़की पैदा हुई तो अहमद का सहारा भी छूट जाएगा। मुमताजबी की तरह मां बनने की उतनी ज़्यादा भूख नहीं है मेरे को। ...लेकिन अकेलापन काटने को दौड़ता है। भोत डर लगता है।’’ मेहंदी से रंगी उंगलियों पर निगाह फेरते हुए ज़रीना ने अपनी बात जारी रखी - ‘‘और दीदी, मुमताजबी का क्या हाल हुआ, पता है न आपको। वाट लग गयी उसकी... मां बनने की ज़िद ही ले डूबी उसको...’’

‘‘ऐसा नहीं है झरीना।’’ सायरा ने गर्दन हिलाते हुए कहा, ‘‘मुमताज जांबाज औरत थी। ख़ुद को आग के हवाले कर देना आसान नहीं होता। जिगर वालों का काम होता है यह। अपनी हैसियत का ज़बरदस्त अहसास दिलाया उसने। उसकी इस खुद्दारी ने अहमद की भूख की धज्जियां उड़ा दीं। समझी?’’

‘‘आप ऊंची-ऊंची बात करती हैं।

मेरी समझ में नहीं आती वो।’’ ‘‘खैर, जाने दो।’’ कहकर सायरा उठ खड़ी हुई।

बाहर धूप का कहर अभी कम नहीं हुआ था। पर हां, हुडदंगी लड़के इमली के रकबे से जा चुके थे, सो ख़ामोशी का माहौल था। सामने वाले खाली मैदान की सांय- सांय तो चरम पर थी ही। नक़ाब तो सायरा ने पहन लिया, किंतु चेहरे का हिस्सा खुला ही रहने दिया था। पीठ के हिस्से में पसीना कुछ ज़्यादा ही चू रहा था। रास्ते में दो मोड़ों से होते हुए मुमताज के घर के पास पहुंचते ही वह ठिठक गयी। धुंए की कलौंच धारण किया दरवाज़ा... खिड़की के अधजले पाट... मुमताज की मृत्यु से दो दिन पहले ही तो सायरा उससे मिली थी। अमीना को भूख लगी थी। तब मुमताज ने कहा था, ‘‘दीदी, अमीना को मुझे दे दो। दूध तो नहीं आएगा मेरे थनों से... पर महसूस करना है मुझे उसका चूसना...’’ उसकी आंखों के भावों को देखकर ऐसा लगा तो नहीं कि यह उसका पागलपन था। सायरा ने वाक़ई अमीना को उसे सौंप दिया... और मुमताज ने भी सचमुच अमीना को अपने सीने से चिपका लिया था। अमीना पर इस कदर जान छिड़कने वाली मुमताज वहशी लगती ही नहीं थी... हां इतना ज़रूर है कि अहमद शादी के बाद पहली बार जब मुमताज को ले आया तो वह कमसिन और मासूम थी...

उसने अपनी नादानी का परिचय देते हुए पूछा भी था, ‘‘दीदी, आप नफरत करती हैं मुझसे?’’ देखते-ही-देखते खो गया उसका अल्हड़पन और बचा रहा उसका झुलसा हुआ बदन... उसे पहचानना भी मुश्किल हो गया था... इस कदर जल गयी थी।

...उस दिन दोपहर के वक़्त नशे में धुत होकर ही अहमद मुमताज के घर गया था। उन दिनों मुमताज बेचैन-सी रहती थी और किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

या फिर बात-बात पर झुंझलाती थी।

घर में अहमद के प्रवेश करते ही उसके मुंह से आ रही शराब की बदबू से उसका माथा ठनका और उसकी कलाई थामकर जब अहमद उसे खींचने लगा, तो झिंझोड़कर अपनी कलाई छुड़ाते हुए उसने नाराजगी जतलायी, ‘‘हाथ मत लगाना मेरे को। दफा हो जाओ यहां से...’’ मुमताज का इंकार अहमद के लिए मानो चुनौती बन गया। सिरफिरा तो वह था ही, मुमताज के सनकीपन से उसके तन-बदन में जैसे आग लग गयी।

‘‘बांझ साली! कलमुंही! मेरे से पंगा लेती है...’’ कहकर अहमद ने आवेग से उसे अपनी ओर खींचा और एक हथेली से ठोडी समेत उसके चेहरे को थाम कर एक के बाद एक चांटे रसीद करता रहा। और जी भर गया तो उसके दोनों हाथ पीठ की ओर से उसने कसकर पकड़ लिये और उसके साथ ही खुद को भी ज़मीन पर लोट दिया। अॅसिड की तरह तेजी से असर करते हुए संपूर्ण बदन को गिरफ्त में ले रही शराब की खुमारी और खूंख्वार भेड़िये-सी हिंस्र वासना का कहर... अहमद ने बांहें मरोड़कर उसे चित लिटाया और उसे वह चारपाई से बांधने की जुगाड़ में ही था।

लेकिन मुमताज ने अपने बदन पर झुके अहमद के पेट में ज़ोरदार लात मारी और फुर्ती से उठ खड़ी हुई। उसके अनपेक्षित लात प्रहार से आहत अहमद औंधे मुंह ज़मीन पर धड़ाम् से गिर पड़ा। औंधे से सीधे होने में भी उसे बड़ी तकलीफ होने लगी थी। वहीं के वहीं वह सिर्फ रेंगता रहा, बस। मुमताज ने एक और लात उसके कमर में जमा दी। ‘‘हरामज़ादा साला... कमीना!’’

‘‘साली! बांझ! मेरे को मारती है?...’’

उसकी बकबक जारी थी। मुमताज की बड़ी- बड़ी मधुवाही आंखें अब अंगार उगलने लगी थीं। तिरस्कार और नफरत की बेहूदगी अब मुमताज की बरदाश्त से बाहर हो गयी थी। उसी पिनक में वह चौके में गयी और किरासीन का कनस्तर उसने अपने बदन पर खाली किया।

‘‘बांझ हूं न मैं... अब मज़ा चखाती हूं तेरे को... इसी के वास्ते आता है न तू मेरे पास? अब देख मेरे जिसम का कारनामा... तेरे को तबाह नहीं कर डाला तो मेरा नाम मुमताज नहीं... आना पड़ेगा तेरे को मेरे पास...’’

लुढ़कती-बिदकती गर्दन जैसे-तैसे उठाकर मदमाती आंखों से फुंफकारते हुए अहमद उसकी ओर देख रहा था। उसे दिख रही थी हिचकोली खाती, हिलती-डुलती मुमताज; लेकिन उठकर खड़ा होना उस वक़्त उसे संभव नहीं हो पा रहा था। इस बीच... मुमताज ने तीली जलायी और... पुआल के ढेर में लगी आग सी, बुर्के में से भरभराती लपटों ने उसे देखते- ही-देखते अपने आग़ोश में समेट लिया और नाज़ुक फली-सी तन्वंगी मुमताज क्या से क्या हो गयी। आग की लपटें, धुंए के ग़ुबार और मुमताज की चीखें... उस समूचे परिसर को घुनती रहीं।

‘‘एऽ... पागल... मुमताज... पगली साली ए... मत कर ऐसा’’ लपटों की लप- लप, फट-फट के बीच में अहमद के हकलाते स्वर अपनी आवाज़ खो बैठते थे... लपटों की गर्मी से उसका नशा उतरने लगा था। लपटों से घिरी, चीखती-चिल्लाती मुमताज कमरे में इधर से उधर बिलबिला रही थी... असहाय-सी। धुआं खिड़की के रास्ते बाहर निकल रहा था। पास-पड़ोस में हबड़-दबड़ मची, लोग इकट्ठा होने लगे... उन्होंने धक्के मार-मारकर दरवाज़ा तोड़ा और भीतर घुस गये। बाल्टियां भर-भर कर पानी उंड़ेलने के बाद आग तो बुझ गयी और बची रही स्याही... कोयला बनी काया... मुमताज की। अहमद बच तो गया, पर कहीं-कहीं झुलसने के निशान दिखाई दे रहे थे।

मुमताज के घर के सामने ही सायरा ठिठकी थी और वहीं, दरवाज़े के पास अहमद पड़ा था... कुछ-कुछ बुदबुदा रहा था। अचानक सायरा का ध्यान उसकी ओर गया। पास-पड़ोसियों के दरवाज़े बंद थे।

कुछ घरों के दरवाज़े पर्दानशीं से लग रहे थे तो कुछेक घरों में बुजुर्ग लोग चारपाई पर लेटे आराम फरमा रहे थे। सायरा सी़ढियां चढ़कर अहमद के पास जा पहुंची। थूक और उल्टी से सने उसके चेहरे से शराब की बदबू बराबर आ ही रही थी। लुंगी- तहमद का तो उसे होश ही कहां था! सायरा ने नीचे बैठकर उसे होश दिलाने का प्रयास किया, ‘‘उठिये, घर चलिए...’’

‘‘कौन है बे? मुमताज... पागल साली...’’

उसकी भारी-भरकम काया और शराब की निढाल खुमारी... उसे उठाना और घर ले जाना टेढ़ी खीर थी। इस बीच चारपाई पर आराम कर रहे लोग भी ताक- झांक करने लगे थे। सायरा शर्मसार हुई जा रही थी। इतने में सामने वाली कच्ची सड़क पर से धूल उड़ाते हुए, मछली का ट्रक आगे निकल गया। ट्रक में से पानी की पतली-सी धारा सड़क की मिट्टी पर अपनी छाप तो छोड़ ही रही थी, साथ ही मछलियों की विशिष्ट गंध भी परिवेश में व्याप्त तल्खी पर नमक छिड़क रही थी। शराब, उल्टी की खट्टी-सी सड़ांध, मछली की बास और धूप की मार... सायरा को मितली-सी होने लगी। अतः आगामी अनहोनी से बचने के लिए अहमद को वहीं छ़ोड, सी़ढियां उतरकर वह घर की ओर चल दी।

कल देर रात से अमीना का बुखार उतरना शुरू हुआ तो बीबीजी ने राहत की सांस ली। दो दिन से उसका बुखार उतरता ही नहीं था, सो सायरा उसे दर्गाह में ले गयी। पीर बाबा की फूंक उसके माथे पर डलवा आयी। अहमद भी कहीं से दवाई ले आया। अमीना बीच-बीच में पिनपिनाती तो थी ही और दूध भी नहीं पीती थी। उसके बदन से बुखार की चिपचिपी गंध आने लगी थी। और आंखों से भी कीच बहती थी।

सायरा की गोदी से वह मानो चिपक हो गयी थी। अहमद ने थोड़ी देर उसे उठा तो लिया था किंतु ज्यूं ही वह पिनपिनाने लगी, उसने झट उसे सायरा की गोदी में खिसकाते हुए अपना पिंड छुड़ा लिया। उसके बाद कुछ देर तक वह साजदा के साथ बातें करता रहा, खेलता रहा... यह भी एक अजूबा ही था। लेकिन सांझ घिरने लगी, तो जनाब बोतल के लिए छटपटाने लगे।

‘‘अमीना की दवाई के पैसे मैंने दिये थे, दे दो मेरे को...’’ उसने हल्ला मचाना शुरू किया।

‘‘आज के दिन तो सबर कर ले। अल्लाह मेहरबान होगा तेरे ऊपर...’’ दिलावर चाचा ने उसे घुट्टी पिलायी। इसके जवाब में उसने ‘‘तू चुप कर बुड्ढे!’’ का तोहफा उन्हें दिया।

सबीना बाजार से सब्जी लाने चली थी, तो अहमद उसकी ओर मुखातिब हुआ।

‘‘सायरा, तेरे लाड़-प्यार ने इसे बिगाड़ा है... बन-ठन के घूमती है साली, धंधे पे बिठा दे इसे...’’ ‘‘कितनी गंदी-गंदी बातें करते हैं आप? घर में बच्ची बीमार है। कुछ तो लिहाज़ कीजिए...’’ सायरा ने गुज़ारिश की, तो अहमद ने उसकी पीठ में एक ज़ोरदार घूंसा जमाया।

‘‘हत्यारी साली! अपने बेटे को खा गयी! ज़हरीली औरत...’’ बुदबुदाते हुए वह चला गया।

पर आज शायद चंदे का जुगाड़ नहीं हो पाया। वह बिन पीये ही लौट आया।

बिस्तरे पर अहमद के पास सायरा... उसके बाद साजदा, सबीना... और दीवाल के पास दिलावर चाचा। अमीना तो झूले में थी। पिछले दो दिनों से अमीना की बीमारी के कारण वह सो नहीं पायी थी। फिर भी उसे लगा कि आज अहमद की बांहों में समाया जाए। अहमद प्यार से उसे सहलाए... दो मीठे बोल बोले तो कितना ही अच्छा होगा।

कई दिनों के अंतराल के बाद आज उसकी भूख जगी थी और पूरी ताकत के साथ मचलने लगी थी। ज़रीना ने कहा भी था... खर्राटे भर रहे अहमद को देखकर उसे अहमद का वह रूप याद आया, जो नादिर के पैदा होने के बाद उसने देखा था... पुत्र प्राप्ति की वजह से उस दिन वह फूले नहीं समाता था। सायरा के लिए बेहतरीन साड़ी ले आया था। और ज़्यादा पीता भी नहीं था। अपनी औकात में था। मीठी-मीठी बातें करता था... कुछ कमाके भी लाता था... घर- बार चलाने में हाथ बंटाता था... फिर क्या हुआ? नादिर नहीं रहा इसलिए सब उल्टा- पुल्टा हो गया? अहमद के तेवर बदलते रहे... बेरहमी की ज़द में वह आ गया... खूंख्वार भेड़िया बन गया... पूरा शैतान... इन्हीं ख्यालों में वह सो भी गयी थी, लेकिन अहमद के अनचाहे और उजड्ड स्पर्श से उसकी आंख खुली... लेकिन आज अमीना ने उसकी रक्षा की। उसका रोना शुरू होते ही एक गाली बकते हुए अहमद ने करवट बदली। सायरा ने झूले में से उसे उठाकर अपनी गोदी में लिटाया और बैठे-बैठे उसे सुलाती रही। इस बीच वह खुद भी ऊंघने लगी थी। काफी देर तक एक ही स्थिति में बैठे रहने से आधी रात के बाद उसका एक पैर सोने लगा, तो सायरा की आंख खुली। बुखार उतर जाने से अब उसके बदन का तापमान सामान्य हो गया था। अतः अमीना को पुनः झूले में सुलाने के लिए वह उठ खड़ी हुई और उसने मुड़कर देखा। अहमद सबीना से सटकर सोया था। सायरा का खून जम गया। आंखें फाड़कर वह अंधेरे में ही उसे घूरती रही। वह देख रही थी कि करवट लेकर सो रहे अहमद का हाथ सबीना के अंगों को सहला रहा था, टटोल रहा था... गर्दन... छाती के उभार... लिजलिजा, वासनायुक्त, घिनौना स्पर्श...! वयस्कता की दहलीज पर पहुंची बेटी और उसका जन्मदाता बाप स्वयं... अपने रिश्ते और खून से गद्दारी कर रहे, धज्जियां उड़ा रहे जिस्म - स्त्री और पुरुष... नर- मादा... आदिम वासनाओं का निकृष्टतम, घिनौना, आलांघ्य प्रदर्शन... मात्र एक- दूसरे को भोगना... अहमद नामक बाप के भीतर के नक़ाबपोश शैतान के बेहया स्पर्श-सुख को बड़ी बेशर्मी के साथ भोग रही सबीना नामक उसी की बेटी - एक औरत का बदन... सायरा का बदन कांपने लगा और रात की स्याही अर्राते तूफान की तरह उसे झिंझोड़ने लगी।

‘‘जानवर! साला हरामज़ादा... कमीना!’’ वह चिल्लायी। उसके चिल्लाने से अहमद हड़बड़ाकर उठ बैठा। सबीना भी साजदा की ओर हौले से खिसकती रही। सायरा ने अहमद पर जैसे धावा ही बोल दिया। वह उस पर झपट पड़ी और उसने अहमद के बाल मुट्ठी में कसकर पकड़ लिये।

‘‘शैतान है रे तू खाली! महज़ एक जानवर! अपनी बेटी को भी तू... इससे बेहतर है कि तू मर क्यों नहीं जाता?’’ उसके सिर को ज़ोर से झिंझोड़ते हुए सायरा ने कहा। ‘‘कितना चूसेगा तू सबको? हाय अल्ला! कुछ तो शर्म कर... ख़ुद पर तो रहम खा रे कम्बख़्त...’’ सायरा की ख़ूनी आंखों से अब आंसू बहने लगे। उसके बदन पर वह थूक भी दी। अब वह सबीना के पास आयी। सबीना की ओढ़ी चादर उसने खींच ली।

‘‘और तू भी हरामी है... जानवर की औलाद साली!’’ लातों से उसे खुंदलते हुए सायरा चिल्लायी, ‘‘शरम नहीं आती तुझे? तेरा बाप है न वो...? बेहया है करमजली!’’ लात-घूंसे मार-मारकर थक जाने के बाद बुक्का फाड़कर विलाप करते हुए दोनों हथेलियों से सिर थाम कर वह बैठ गयी।

अब साजदा उठ बैठी और रोने लगी। अमीना भी झूले में किलचने लगी थी। ‘‘एऽ साली चूप! अहमद ने उसे हड़काते हुए लिटा दिया और उसी पिनक में झूले की रस्सी थामकर ज़ोरों से उसे झुलाने लगा। अब बारी थी सायरा की बाज़ की तरह उस पर वह झपट पड़ा। सायरा की कमर में एक ज़ोरदार लात मारकर उसे धराशायी करने के बाद वह उसकी ख़ूब मरम्मत करता रहा, कुचलता रहा।’’ ‘‘मेरे पे हाथ उठाती है हरामज़ादी...! चुड़ैल, तेरी ये हिम्मत...! बाप-बेटी के प्यार में ज़हर घोलती है कम्बख़्त... मेरे बेटे की हत्यारी डायन... अब मेरी बच्ची को भी...’’

पेट में घुटने लेकर रो रही सबीना अब उठ बैठी। सायरा को जमकर खुंदल रहे अहमद को उसने जैसे-तैसे रोका और अम्मी को थामने के लिए आगे बढ़ी। अब दिलावर चाचा की पलकें भी खुल गयी थीं।

‘‘अहमद... सबर करो... मत मारो बहू को... बेटा, औरत पे हाथ नहीं उठाते। रहम कर अल्लाह के वास्ते...’’ वे अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही अनुरोध करते रहे।

सायरा की बोटी-बोटी जैसे जवाब दे रही थी। वह निढाल-सी हो गयी थी। सबीना ने ही उसे सहारा दिया और जैसे- तैसे वह उठ बैठी। अब सबीना उससे लिपट गयी और ‘अम्मी’ कहकर फूट पड़ी। लेकिन सायरा निर्विकार भाव से और बूझी-बूझी निगाहों से अंधेरे को उलीचती रही थी। अहमद परेशान-सा, चारदीवारी में ही चक्कर लगाता रहा था और मुंह से गालियां बुदबुदाने का उसका सिलसिला भी बदस्तूर जारी था। इसी उधेड़बुन में बाहर जाने के लिए उसने दरवाज़ा खोला और दहलीज पार करने ही वाला था कि सायरा के तन-बदन में पता नहीं कहां से, यकायक स्फूर्ति आयी। गलबहियां डाले बिलख रही सबीना को उसने दूर धकेला और अपनी आहों-कराहों को दरकिनार कर बड़ी तेजी से उठ खड़ी हुई। अहमद को बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था। अहमद के ठीक पीछे खड़ी होकर सायरा ने उसे ज़ोरदार धक्का मारा।

‘‘जा, मर... हैवान कहीं का! मैं समझूंगी बेवा हुई... दफ़ा हो जा यहां से।

दुबारा शकल मत दिखाना...’’ पीछे से अचानक हुए हमले के परिणामस्वरूप लड़खड़ाकर गिरते-गिरते वह बच गया। अब वह पलट वार करने को ही था, उससे पहले सायरा ने धडाम् से दरवाज़ा बंद किया।

‘‘तेरी तो, खोल दरवाज़ा...’’ तैश में आकर वह दरवाज़े पर काफी देर तक लातें मारता रहा, बाद में रुक गया। और वहां से चला भी गया।

घर में अब तक मची हायतौबा अब ठंडी हो गयी थी। आगे-आगे खिसकते हुए, रात अब भोर के मुंहाने पर आ पहुंची थी... साजदा सुबकती हुई, घुटने मोड़कर बिस्तरे में पड़ी थी... सबीना का बेशक घुटनों में गर्दन डाले सिसकना अभी भी जारी था। रात की अफरातफरी में सबीना, सायरा के फूटे कंगनों की किरचें फर्श पर बिखरी पड़ी थीं। दिलावर चाचा अल्लाह से दुआ मांगने के अलावा और कर भी क्या सकते थे? अमीना रो-रोकर थक गयी थी। दूध पीने का वक़्त हो जाने के बावजूद अभी भी वह सोयी हुई थी। फिर भी सायरा ने उसे झूले में से उठाकर गोदी में लिया और कुर्ती के बदन खोलकर मुरझायी, कुम्हलायी चूची उसके मुंह में धर दी। चूची का स्पर्श पाते ही अमीना का चूसना शुरू हुआ।

‘‘अम्मी... मेरे को माफ करना।

अम्मीऽऽ’’ सिसकते, सिसकते सबीना ने कहा... कई बार कहा। पर सायरा ने उसकी ओर देखा तक नहीं। अमीना के बालों को सहलाते हुए वह दुपट्टे से बार-बार अपनी नाक पोंछती रही।

सवेरे की नमाज़ की अजान हुई। लेकिन सायरा की बोटी-बोटी जवाब दे रही थी। उससे उठा नहीं जा रहा था। रात भर का तमाशा, रतजगे की मनहूसियत... तथा मारपीट की टीस... पूरे बदन में ऐंठन थी। आज शब-ए-बारात का दिन होने से क़ब्रिस्तान भी जाना था... दुआ मांगने।

लेकिन अहमद का कोई अता-पता नहीं था। कल रात से ही वह गायब था... उसका इंतज़ार करने का कोई मतलब ही नहीं था... किस मुंह से शक्ल दिखाएगा? ...सायरा का भी दिमाग सुन्न हो गया था।

नमाज़ के बाद सबीना चुप्पी साधे बैठी थी। साजदा को भूख तो लगी थी किंतु अम्मी की हालत देखकर वह तनिक समझदार बन शांति से बैठी थी। दिलावर चाचा इबादत में थे। दरअसल क़ब्रिस्तान वे जाना तो चाहते थे, लेकिन स्वास्थ्य के कारण पिछले दो वर्षों से घर में ही आयतें पढ़ते थे।

सबीना ने कपड़े धोये भी और उन्हें रस्सी पर भी वह डाल आयी। काफी देर तक रोते रहने से उसकी आंखें लाल हुई थीं और उनमें सूजन भी आयी थी। सायरा ने चाय बनाकर उसे दी तो, किंतु प्याली वैसी ही रखी रही। उसने वह पी ही नहीं। इत्ती सी मलाई एक प्लेट में कहीं चिपकी थी, तो उस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। चूहे का पिल्ला मौका देखकर घर में घुसा था और बेरोकटोक वह इधर से उधर मज़े से तफरीह कर रहा था। चाय की प्याली में भी झांक के गया था।

‘‘एऽ सबीना... चाय पी ले... तेरे लिए ही रखी है... वरना चूहा गिरा देगा।

चूहे के लिए थोड़े ही बनायी है...’’ सायरा अभी शांत नहीं हुई थी।

‘‘नहीं चाहिये मुझे’’ माथे पर आयी ज़ुल्फों को पीछे करते हुए उसने जवाब दिया।

‘‘क्यों? आज तेरे को बन-ठन के सजना नहीं है? ख़ूबसूरत नहीं दिखना है? दिल मचल नहीं रहा तेरा? उसके वास्ते पी ले।’’

सायरा का उलाहना सबीना को सूई की तरह चुभ गया। हवा निकले गुबारे- सी, सिमटकर वह बैठी रही।

‘‘अम्मी... मेरे को माफ करना, बोली न मैं? फिर क्यों ऐसा बोलती है? अम्मी... भूल हुई बोल तो दिया। लेकिन एक बात बोलने की है...’’

‘‘क्या?’’ सायरा की त्यौरियां चढ़ी हुई थीं।

‘‘अम्मी, मेरे को डर लगता है... नहीं संभाल पाती मैं ख़ुद को... मेरे बदन में शैतान उतर आता है... मेरी शादी कर डालो जल्दी से...’’

‘‘शादी... शादी... शादी? शादी को खेल समझती क्या रे तू?’’ सायरा ने झुंझलाकर कहा। ‘‘अपने बाप के साथ सोती है? बन-ठन के डोरे डालती है? कहीं भी घूमती-फिरती है? तेरी अम्मी जैसी, बच्चे पैदा करने वाली मशीन बनना चाहती है...?’’

ठंडी हुई चाय को फिर से गरम कर प्याली उसके सामने पटकते हुए सायरा ने कहा।

‘‘ले, पी ले। पढ़ने-लिखने से दूर रहेगी तो ऐसा ही सोचेगी। दुनियादारी का तेरे को पता नहीं... मरद लोग प्यार के क़ाबिल नहीं होते। वे प्यार-व्यार कुछ नहीं करते... उनको सिर्फ जिसम चाहिए होता है... भोगने के लिए। अपनी हवस की आग में जला डालते हैं वो औरत को। इस तरह औरत मरद के हाथ का खिलौना बन जाती है। तेरे अब्बू ने कभी प्यार दिया मेरे को?... तू तो सब देख रही है... संभल जा।

समझी क्या?’’ सायरा आंखें तरेरकर उसे घूरती रही।

‘‘तुझे क्या लगता है सबीना, कल तेरा बाप तेरे से प्यार करता था...? समझती क्यों नहीं तू? क्या तू सिर्फ एक औरत है?

जानवर है? या इंसान भी है? कभी तो सोचा कर... औरत की ताकत एक अलग जिसम की होती है सबीना। औरत कमजोर नहीं होती...!’’

‘‘लेकिन सब मरद एक से थोड़े ना होते हैं?’’ इतना समझाने के बावजूद सबीना की यह दलील सायरा को नागवार गुज़री। फिर भी बात को स्पष्ट करते हुए उसने कहा, ‘‘मेरे अब्बू मसज़िद में इमाम थे सबीना। वो नेक इंसान थे, मर्द थे। क़ुरआन शरीफ पूरा पढ़ा था उन्होंने। कहते थे, जो मर्द अपनी औरत के साथ औरत की तरह से ही पेश आता है, वही मर्द कहलाने लायक होता है - अल्लाह उसी पर मेहरबान होते हैं... अब्बू बताते थे कि ऐसा क़ुरआन में लिखा तो है, किंतु हक़ीक़त में ऐसा मर्द मिलता कहां है औरत को?’’

फूटी हुई बंगडी का एक किरचा कलाई में घुस जाने से हुए घाव को सहलाते हुए सबीना ने सवाल किया, ‘‘अम्मी, फिर मुझे औरत क्यों बनाया अल्लाह ने? और ये ख़ूबसूरती किसलिए दी? इसी वजह से तो बाप की नीयत खराब हुई और उसने बुरा सलूक़ किया मेरे साथ...’’

डबडबायी आंखों ने सबीना की जुबान पर भी असर डाला था। उसकी आवाज़ कांपने लगी थी। आगे झुककर उसने सायरा का हाथ थाम लिया।

‘‘कितनी गंदी हूं न अम्मी मैं?’’ पलकें झुकाकर वह कहने लगी। ‘‘मेरे को माफ कर दो... मैं घमंडी हूं... मैं तो इसी ग़ुरूर में थी कि मेरे साथ शादी करने को तो कोई भी तैयार हो जाएगा... वो मुझे खुशियां देगा... राज करूंगी मैं उस पर... लेकिन कल मैं संभाल नहीं पायी खुद को। मेरा दिमाग तो जैसे मर गया था... सिर्फ जिसम बाकी रह गया था मेरा... कभी-कभी मेरे को लगता है कि मेरा बदन ही गंदा है... छोटी मां की तरह उसे -’’

‘‘सबीना...’’ सायरा के आंखें फौरन भर आयीं। आवेग से उसे बाहुओं में भरकर उसने कहा, ‘‘ऐसा क्यों बोलती है पगली? अल्लाह ने हमको औरत बनाकर ज़ुल्म नहीं किया है सबीना... ज़ुल्मी है मर्दों की कसैली नज़र... उनकी फरेबी चाल... उनका दोगलापन...’’

उसके माथे को चूमकर उसकी आंखें पोंछते हुए सायरा ने कहा, ‘‘सब भूल जा तू, बच्ची। समझ ले कि तूने ठोकर खायी है। अल्लाह से माफी मांग ले... दिल साफ रख, सब ठीक हो जाएगा... दरगाह में जाके दुआ मांगेगे परवरदिगार से। आज शब-ए-बारात भी है... अच्छा दिन है। मुंह मीठा करेंगे सब का... चूड़ियां खरीदेंगे तेरे को...’’

‘‘और मेरे को भी...’’ तालियां पीटते हुए पीछे से साजदा ने खुशी ज़ाहिर की। ‘‘हां हां, क्यों नहीं!’’ सायरा ने उसे अपने पास बुलाया, ‘‘आ जा मेरी प्यारी बिटिया रानी!’’

गली से बाहर निकलते ही सब्जी मार्केट था। उसके बाद छोटी-छोटी दूकानें। उससे थोड़ा-सा आगे था हनुमानजी का मंदिर... गुंबज पर फहराते गेरुए वाला छोटा-सा मंदिर। उसके आस-पास हिंदुओं की बस्ती... उनके चाल जैसे मकान... उसके बाद एक मरियल-सा पिक्चर हॉल... उससे भी आगे दर्गाह... और आगे एक बड़ी-सी मसज़िद... फुटपाथ पर सजा मीना बाजार... बटुवे, चप्पलें, रंग-बिरंगे हिज़ाब, दुपट्टे, सलवार-कमीज़, जालीदार टोपियां, इत्र-फुलैल आदि की लकदक दूकाने... और सामने मसज़िद... मसज़िद के घेरे में ऊपर की ओर चारों तरफ धुंधली रोशनी वाले हर लट्टुओं की हदबंदी... मसज़िद के चारों कोनों पर खड़ी मीनारें। मसज़िद की कमानों तथा खिड़कियों पर कबूतरों की निरंतर आवाजाही और गुटुर गूं... सनीचर होने से उस दिन हनुमान भक्तों की भी भीड़ मंदिर के बाहर देखी जा सकती थी। रुक- रुककर घंटानाद सुनाई पड़ता था। बाहर याचकों-भिखारियों की भी लंबी कतार... ‘‘संगीता आती है इस मंदिर में... एक बार मैं भी गयी थी वहां उसके साथ...’’ मंदिर के सामने से गुज़रने के दौरान सबीना ने कहा।

‘‘संगीता यानी तेरी सहेली... जो स्कूल में तेरे साथ थी? एक-दो बार अपने घर में आयी तो थी।’’

‘‘हां, लेकिन उसके बाद फिर कभी नहीं आयी। उसके मां-बाप को पसंद नहीं थी हमारी दोस्ती। मैं भी उसके घर नहीं जा सकती थी। उससे मिले हुए भी भोत दिन हुए। अच्छी लड़की थी। हम दोनों में अच्छी बनती थी... अकरीमा, नजमा से भी ज़्यादा। वो भी एक बार दर्गा में आने का बोलती थी... देखने के वास्ते।’’

मंदिर से आगे निकलते हुए सबीना ने तनिक रुककर कहा, ‘‘अम्मी, जाएंगे मंदिर में? हिंदू लोगों के मंदिर में भगवान की मूरत होती है।’’ ‘‘पागल हो गयी क्या? हम हिज़ाब पहने हैं। वो लोग जाने थोड़े ही देंगे हमें अंदर?’’

‘‘जा सकते अम्मी...’’ ‘‘अरी चुप कर... उल्टी-सीधी ज़ुबान मत चला...’’ सबीना का हाथ पकड़कर वे दोनों आगे बढ़ते रहे।

‘‘मेरी भी एक हिंदू सहेली थी - मालेगांव में - लता। मेरी बचपन की सहेली।’’ चलते-चलते सायरा बता रही थी। उसका मकान जला दिया गया था। एक दंगे में, पूरा-का-पूरा खानदान तबाह हुआ उनका... कोई भी ज़िंदा नहीं बचा... वो खुद भी नहीं।’’

‘‘अम्मी, हिंदू-मुसलमान हमेशा लड़ते क्यों हैं? उनका क्यों नहीं जमता? हिंदू लोगों को हम अच्छे नहीं लगते क्या?’’ सबीना ने पूछा।

‘‘दो अलग मज़हब हैं न। और दोनों को लगता है कि हमारा मज़हब ही बड़ा है। लोगों को लगता है कि अपने मज़हब को ऊंचा दिखाने से उनका ख़ुद का कद भी बड़ा हो जाएगा।’’

‘‘तुमको कैसे मालूम? इस्कूल में सिखाते थे क्या?’’

‘‘थोड़ा-थोड़ा सिखाते थे। मज़हब जीने का रास्ता दिखाता है... अब्बू भी बोलते थे।’’

‘‘लेकिन अम्मी, मज़हब यानी क्या?’’ सायरा मुस्कुरायी।

‘‘हाय अल्ला! तू मेरे को ऐसे पूछ रही है जैसे मुझे सब पता है! पगली, उतना ज़्यादा थोड़ा ही पढ़ी मैं, जो तेरे को बता सकूं? अब्बू एक बार बता रहे थे, इस्लाम के बारे में... तो मेरी अम्मी ने बोला था... धरम का रूप तो औरत के जैसा ही होता है। औरत की ताकत का पता लोगों को नहीं चलता, वैसे ही मज़हब के जादू का करिश्मा उनको मालूम नहीं पड़ता है। लोग अपने मतलब के लिए, फायदे के वास्ते दोनों का इस्तेमाल करते हैं...’’

फूलों की, चादरों की दूकानों को पार कर वे दोनों दर्गाह की कमान के भीतर अब पहुंच गयीं। चिलमन की एक ओर औरतों को इबादत के लिए अलग से एक जगह रखी गयी थी। भीतर मर्दों के लिए... ‘अल्लाहऽऽ’ की अनुगूंज दर्गाह के समूचे परिसर से व्याप्त थी। धूप, अगरबत्तियां की महक से पूरा महकमा सराबोर था... पांच-छः औरतें नमाज़ अदा कर रही थीं - सबीना, सायरा भी उनके साथ जुड़ गयीं।

इतने में पटाखें फूटने जैसी आवाज़ें आने लगीं। इतने भारी धमाके... कि कानों के पर्दे फट जाएं... ज़मीन कांपने लगे। फिर क्या था, अफरातफरी मच गयी। लोगों का चीखना-चिल्लाना... भागमभाग और रोना- कलपना। बम फूटा... धमाका हुआ... भागो, भागो। दर्गाह से बाहर निकलने की होड़- सी लग गयी। औरतें भी उसी हुज़ूम में शामिल हो गयीं... नमाज़-वमाज़ आधे में ही छोड़कर... सायरा भी आधे में ही उठ खड़ी हुई, पर लोगों की अफरातफरी की ओर वह सिर्फ देखती रही, बस - जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

‘‘अम्मी, चलो। बम फटा है...’’ सबीना लगभग खींच कर उसे दरवाज़े की ओर ले जाने लगी।

दर्गाह में अब तक तो लोग अलग- अलग जगह बिखरे-बिखरे से थे। लेकिन अब भीड़ इकट्ठा हो जाने से भगदड़ मच गयी। हर कोई जल्दी में था... जान बचाकर वहां से भाग निकलने की फिराक़ में था... वे दोनों भी उसी में शामिल हुईं। लोगों की चीखें... आहें... सीत्कार... बिलखना... दिल दहला देने वाला माहौल और एक अजीब सी उलझन! सायरा ने सबीना का हाथ अच्छी तरह से पकड़ रखा था। ‘‘या अल्ला! रहम कर... मेरे परवरदिगार।’’

सायरा निरंतर बुदबुदा रही थी। ठेलम-पेल, खींचतान और धक्का- मुक्की... किसी को भी सब्र नहीं था। लोग वहां से निकल भागने की फिराक़ में थे, सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए लड़खड़ाकर गिर रहे थे, लुढ़क रहे थे, किसी को किसी की पर्वाह नहीं... एक-दूसरे को खुंदलकर आगे निकलने की होड़, सीढ़ियों पर तथा नीचे भी, इसी अफरातफरी का शिकार बने ज़िंदा-मुर्दा लोगों की बिछावन-सी बन गयी थी... पर किसी को कोई तवज्जो नहीं! बदहवास-सी, पागल बनी भीड़ का कहर! मरना तो किसी को भी नहीं था, फिर भी किसी का किसी से कोई सरोकार नहीं! ख़ुद के ज़िंदा बच निकलने की जद्दोजहद और अपनी... ख़ालिस अपनी हिफाज़त की असहाय कोशिश... अदृश्य नियति के सामने इंसानी बेबसी और मायूसी का कटु यथार्थ... अभी, कुछ देर पहले तक तेज़ रोशनी से नहा रही सड़कों पर अब घनी स्याही, धूल के ग़ुबार और बदक़िस्मती की चपेट में आये लोगों की चिल्लपों का माहौल था। धूल और धुंए के गुबार में ही सायरा- सबीना घुस गयीं। हनुमान मंदिर और दर्गाह परिसर में एक के बाद एक... तीन बम फटे थे। मंदिर का तो जैसे नामो-निशां ही मिट गया था। जान की कीमत पर लोग भाग रहे थे... दिशाहीन से। कदम-कदम पर बिछी लाशें, ज़िंदा कराहते-बिलखते घायल लोग, छिन्न-विच्छिन्न वाहनों की धू- धू, क्षत-विक्षत शरीरों के टूटे-फूटे अवयव, मांस के लोथड़े, सहमी-सहमी निगाहों का सैलाब, बेसहारा हुए लोगों की दम तोड़ती सांसें और नियति का विकट हास्य। जूते... चप्पलें... माल-असबाब, चीथड़ा-चीथड़ा सुख और धज्जी-धज्जी रात! क्या कहें... किससे कहें... धरती की सतह पर खून की जमी पर्त और इंसानियत पर पड़े दाग... हर तरफ मज़ंर यही है, लहू-लहू सा समंदर है - जैसी स्थिति!

अब धीरे-धीरे पुलिसीया गाड़ियों के सायरन बजने लगे। तेज़ लाल रोशनी वाली चक्करी दीप-शिखा वाली रुग्णवाहिकाओं का तांता-सा आने लगा। काम से बाहर गये लोगों के घरवालों को चिंता ने घेर लिया। कुछेक घरों से तो सिसकियों की आवाज़ आने भी लगी थी... कहीं-कहीं स्यापा भी सुनाई पड़ रहा था। इसी मसज़िद के पास अज़हर का ठेला था... वही, चूहे की दवा बेचने वाला अज़हर। उसका अभी तक कोई अता-पता नहीं था। पड़ोसी जावेद भी यहीं, किसी दूकान में काम करता था... वह भी अभी तक लौटा नहीं था। साजदा डबल रोटी का चकत्ता चूसते बैठी थी।

अमीना अभी भी झूले में सो रही थी। दिलावर चाचा हमेशा की तरह चारपाई पर लेटे थे। धमाकों के बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं था।

‘‘अम्मी, मेरे को चूड़ियां लायी?’’ सायरा से लिपटते हुए साजदा ने पूछा। सायरा ने उसे गले लगाया और वह फूट पड़ी। प्रत्याशित अनहोनी के भय से मानो अब तक उसके आंसू सूख गये थे और ज़ुबान को काठ मार गया था। उसके फूट पड़ने से जैसे अब राहत-सी मिली थी। कसकर उसे भींचते हुए वह उसे उत्कटता से चूमती रही। ‘‘मेरी बच्ची...’’

सबीना का दिल अभी भी बाकायदा धड़क रहा था। मौत की खूनी होली का वह दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दिल दहला देने वाला वह नज़ारा पत्थर बन उसके सीने पर सवार हो गया था।

सायरा को चूमते रहने के दौरान ही यकायक सायरा को अहमद याद आया। अहमद भी तो नहीं है घर में! कहां होगा वह? कल रात जो चला गया, सो ग़ायब ही है। कोई खबर नहीं उसकी।

‘‘साजदा, अब्बू आये थे?’’ साजदा को तनिक दूर हटाते हुए, दिल थामकर उसने पूछा। उसके बाद भर्रायी-सी ऊंची आवाज़ में दिलावर चाचा से भी पूछा - ‘‘नहीं तो... क्यों? कहीं कुछ हुआ है क्या?’’ दिलावर चाचा ने हड़बड़ाकर अपनी कमज़ोर निगाहों से इधर-उधर देखते हुए पूछा।

‘‘और कुछ नहीं हुआ, बम फटे हैं...’’ सायरा ने जैसे-तैसे जवाब दिया। ‘‘सबीना, तेरे अब्बू?... किधर होंगे वो? कैसे ढूंढ़ेंगे उन्हें?’’ सायरा चिल्लायी।

कल भोर होने से पहले सिरफिरे अंदाज़ में, अपनी ही पिनक में अहमद घर से निकल गया था। ‘जा मर। दफा हो जा यहां से’ सायरा ने ही उसे धकियाया था। लेकिन इस वक़्त सायरा के पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी थी।

पड़ोसी जावेद के सिर कटे बदन की शिनाख्त उसकी मां को हो गयी थी। उसके बूढ़े मां-बाप की जो हालत हुई थी, उसे देखकर ही रूह कांपने लगती थी। इकलौता जवान बेटा... उसी पर दारोमदार थी और अब वही नहीं रहा। अलबत्ता अज़हर ज़िंदा बच निकला था। किंतु उसका पैर कट गया था। बस्ती के और भी आठ-दस लोग हालाक़ हुए थे। कुछ अन्य घायल भी हुए थे... लेकिन सात दिन हो जाने के बाद भी अहमद अभी तक लौटा नहीं था... ज़िंदा या मुर्दा। मालेगांव-भिवंडी के लोगों, मुमताज के घरवालों से भी पूछताछ की; पर कोई फायदा नहीं हुआ। अंततः हारकर सायरा ने पुलिस में रपट लिखवायी। वैसे तो अहमद इससे पहले कई-कई दिनों तक घर से गायब रहा, पर बाद में वह लौट आता था। सायरा को यकीन था कि अबकी बार भी वह ज़रूर लौट आएगा। और अभी भी उसे पूरी उम्मीद थी।

और ठीक उसी दिन पुलिस चौकी से ख़बर आयी। नुसरत नर्सिंग होम में एक लाश रखी हुई है - जो चार दिन पहले प्राप्त हुई थी। अभी तक लाश का कोई दावेदार नहीं आया है। आपके शौहर का हो, तो पहचानिए...

अब तनाव शिथिल पड़ गया था और स्थिति नियंत्रण में आने लगी थी। अभी तक अपराधियों को पकड़ा नहीं सका था किंतु खोज जारी थी। धमाकों में मृतकों की संख्या हर रोज़ बदल रही थी। मृतकों में हिंदू-मुसलमान दोनों धर्मों के लोग थे। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शव मृतकों के नज़दीकी रिश्तेदारों को सौंपे जा रहे थे। घायलों को भी यथोचित इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी दी जा रही थी। कुल मिलाकर स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होने लगी थी।

नर्सिंग होम में पहुंचने तक सायरा का पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया।

हाथ-पांव में कंपकंपी तो थी ही। उसका दिल कहता था वह अहमद यक़ीनन नहीं हो सकता। सबीना भी उसके साथ ही थी। लाश पर से कफन हटाया जाने लगा, तो सायरा पलकें भींचकर बुत-सी खड़ी रही।

लाश की स्थिति इतनी खराब थी कि उसकी शिनाख़्त करना मुश्किल था।

एक तो वह अधजली लकसी-सा दिख रहा था... ठूंठ। इसके अलावा वह क्षत- विक्षत भी हो गया था। आंख की कोटर से मांस की बोटी लटक रही थी... चेहरे का आधा हिस्सा कटा-फटा सा था... सिर के नीचे स्ट्रेचर पर खून का इत्ता बड़ा थक्का जमा हुआ था... बांया पैर उलट-पुलट गया था।

‘‘ईऽऽऽ... या अल्लाह...’’ सायरा चीख पड़ी।

‘‘आपका घरवाला है न ये? ग़ौर से दखिए।’’

अहमद है ये? देखा नहीं जा रहा था, लेकिन देखना पड़ रहा था... बार-बार। क्योंकि वह अहमद ही था - उसने पहचान लिया था। और अब वह ढाडें मारकर रोने लगी।

‘‘हाय अल्ला! ये क्या हुआ?’’ शुरू-शुरू में तो सबीना इंकार करती रही क्योंकि उसे यकीन नहीं होता था... ‘‘नहीं, अब्बू नहीं है ये...’’ लेकिन अंततः उसे स्वीकार करना ही पड़ा... और वह भी फूट पड़ी।

अहमद अब इस दुनिया में नहीं रहा, सायरा का दिल अभी भी इस हक़ीक़त को मानता नहीं था। गायब रहने के बाद अचानक एक दिन वह प्रगट होता था। लगता था कि अब भी वह ज़रूर आएगा।

उसकी अनुपस्थिति में सुकून मिलता था।

घर में सभी लोग राहत महसूस किया करते थे। अतः ऐसा भी लगता था कि वह न आए तो ही अच्छा है। और अब वह इस दुनिया में रहा ही नहीं, तो उसके न होने की भी आदत डालनी ही पड़ रही थी। सायरा को वह आख़िरी वाक्य बार- बार याद आने लगा था... ‘तू मर, जा यहां से। दफा हो जा। मैं समझूंगी कि बेवा हो गयी हूं...’ कहकर सायरा ने उसे पीछे से धकियाया था। अहमद के आख़िरी दिनों में सायरा को उसके व्यवहार से उकताहट-सी होने लगी थी। क्योंकि वह खुद तो बरबाद हो ही गया था और सायरा की ज़िंदगी भी उसकी वजह से तबाही के कगार पर खड़ी थी... बल्कि अब तो वह सबीना को भी ले डूबने पर आमादा हो गया था... उसने एकाध भी भला काम किया अपने परिवार के लिए? नादिर के गुज़र जाने पर सायरा का कचूमर बना डाला था उसने। उसके बाद भी हर बार वह उसे ‘ज़हरीली औरत’ ही कहा करता था... शुरू-शुरू में एकाध बार साड़ी- वाड़ी लाया होगा, बस। उसके बाद कभी प्यार से दो बातें भी की उसने... वह शौहर था, तो बीवी होने के नाते दुख व्यक्त करना ही चाहिए, इसलिए रोना-धोना है हमारा? या कि उसके प्रति कोई लगाव भी था? या अपनों से बिछुड़ने का ग़म?

अहमद की अधजली लाश देखकर सबीना की ज़ुबान को तो जैसे काठ मार गया था। साजदा के पास तो अपने बाप की कोई स्मृति थी ही नहीं। उसके वक़्त भी सायरा को बेटे की ही उम्मीद थी... वह साजदा से बात ही नहीं करता था... और अमीना के बारे में कुछ कहने का सवाल ही नहीं उठता था। दिलावर चाचा अलबत्ता बीच-बीच में उसे याद कर थोड़ी देर सुबकते रहने के बाद चुप हो जाते थे।

अहमद का एक भाई मालेगांव में रहता था। अहमद की दफन-विधि पूरी होने तक बमुश्किल वह दिलावर चाचा के साथ रहा... सायरा का भाई भी तुरंत लौट गया... दोनों ने कुछ रुपये भी उसे दिये।

मुमताज की मां भी आयी थी।

धर्मादा संस्था की ओर से रोज़ाना खाने के पैकेट आते थे। सरकार की ओर से आर्थिक सहायता की घोषणा तो हुई थी किंतु निर्धारित रकम आदि के ब्यौरे अभी आने बाकी थे। और इसमें समय भी लग सकता था। सायरा पूरी जद्दोजहद के साथ एक नयी ज़िंदगी शुरू करने की दिशा में बड़ी शिद्दत से कदम उठाने का प्रयास कर रही थी। हर तरह के आंधी-तूफान के थपेड़ों को सहते हुए तीन-तीन बेटियों की जिम्मेदारी...

उस दिन ज़रीना आयी थी। वैसे तो हर दूसरे दिन वह आती रही थी। वह खूब रोयी... खूब रोयी। वह तो जैसे ढहकर ढूह हो गयी थी। शौहर के इंतिकाल के बाद उसने एक सहारा ढूंढ़ लिया था... वह भी अब जाता रहा। उसे विलाप करते देखकर सायरा के मन में सवाल उठता था कि कहने के लिए तो सहारा-वहारा ठीक है किंतु हक़ीक़त में कितना समय अहमद उसके लिए दे पाया था? क्या वाक़ई वह अहमद पर जान छिड़कती थी? जिसे वह ‘सहारा’ कहती है, वह महज़ जिस्मानी भूख तक ही सीमित है... क्या उसी को वह प्यार मानती है?

‘‘दीदी, आपने सुना भी होगा... एक औरत ने ही रखे थे बम साइकिल पर।’’ फिर एक गहरी सांस लेने के बाद उसने आगे कहा, ‘‘वो भी मर गयी उसी धमाके में। कोई कहते हैं कि वह हिंदू औरत थी... कोई बोलता है मुसलमान थी।’’ बातों- बातों में उसने बुर्के के बटन खोले। रोने तथा पसीने की वजह से चेहरा चिपचिपा हो रहा था, सो उसने बुर्के की बांह से रगड़कर उसे पोंछ-पोंछ कर साफ किया। सबीना ने पानी का गिलास उसे पेश किया, तो वह पूरा पानी पी गयी।

‘‘यक़ीन नहीं होता कि एक औरत इतना बुरा काम कर सकती है। औरत होकर भी इस कदर बेरहमी?’’

सायरा ने एक उसांस छोड़ी। कल रात साजदा के पांव की उंगली में चूहे ने दांत गड़ाया था, सो उसमें घाव हो गया था। वह चटाई पर सो रही थी और उसकी घायल उंगली पर मक्खियां भिनभिनाने लगी थीं। सायरा उन्हें हाथ से दूर भगा रही थी।

‘‘सच पूछो, तो औरतें कुछ भी कर सकती हैं... मर्दों की बराबरी से। ऐसा थोड़े ही है कि सिर्फ मर्द ही चुस्त-चौकस होते हैं!’’

‘‘बम के धमाके करवाने को आप चुस्त-चौकस कहती हैं, दीदी?’’ ‘‘मेरे कहने का मतलब है झरीना, औरत जितनी मोमदिल होती है, उतनी ही संगदिल भी हो सकती है वह... जरूरत पड़ने पर...’’

‘‘खैर। आपने यह भी सुना होगा कि सरकारी राहत का एलान भी हुआ है... जो लोग हलाक़ हुए हैं उनके रिश्तेदारों को... रकम कितनी है, मालूम? पूरे पांच लाख!’’ ज़रीना ने आंखों की पुतलियां तानकर सूचना दी।

‘‘पांच लाख?’’ सबीना ने आंखें फाड़कर आश्चर्य व्यक्त किया। सायरा भी तनिक चौंक गयी।

‘‘हां! मिनिस्टर आने वाले हैं।’’

सायरा ने मन-ही-मन पुनरुच्चार किया ‘पांच लाख’। इस जनम में इतने सारे रुपये हम देख नहीं पाएंगे। ज़ुबान पर इतनी बड़ी रकम का हिसाब भी कभी नहीं आया। सपने भी देखे थे, तो ग़रीबी के ही... अब तो अहमद रहा नहीं। ज़िंदगी में कभी सुकून तो मिला नहीं... और अब तो वह ज़िंदगी भी उजड़ गयी।

लेकिन... लेकिन अहमद के न रहने से ज़िंदगी संवर सकती है? शराबी पति की मौत इतनी कीमती होती है? ज़रीना ने दुपट्टे से आंखें पोंछ लेने के बाद भर्राई-सी आवाज़ में कहा, ‘‘अहमद भले ही नहीं रहा, लेकिन भला कर गया आपका... भुगतना तो पड़ा आपको... पर उसका फल मिला मीठा- मीठा बरसों का दुख-दर्द माला-माल कर गया आपको। वरना मेरा भाग देखो... रखैल सो रखैल ही रही! इतना मार खा-खा के क्या मिला मेरे को?’’

सायरा उसकी बातों का रूख समझ गयी। इसी बीच ज़रीना ने सीधे अपना दावा ही पेश किया, ‘‘मेरा भी हिस्सा रहेगा न दीदी, उसमें?’’ ज़रीना की ललचायी आंखों की इस चाल से सायरा को गुस्सा आया।

‘‘ऐसा क्यों सोचती है तू? मैं हूं न... जानती हूं, तुझे भी काफी सहना पड़ा है... थोड़ा बहुत तुझे भी तो दूंगी मैं?’’

‘‘थोड़ा यानी कितना?’’

ज़रीना का लालच... सायरा उसे घूरती रही कुछ पल। अनपढ़, उजड्ड समझती थी वह ज़रीना को! हिसाब मांग रही है, हक़ जतला रही है - अहमद की रखैल बने रहने का। हर्जाना मुझसे मांग रही है... ‘‘हाथ में कुछ मिलने से पहले ही हिसाब...’’ सायरा की आवाज़ कुछ-कुछ तीखी हो गयी थी...

ज़रीना के चले जाने के बाद सायरा अनमनी-सी हो गयी थी... पांच लाख... उसे यक़ीन नहीं होता था। इतनी पूंजी मिल जाए तो ज़िंदगी का नूर ही बदल जाएगा... क्या-क्या किया जा सकता है इन रुपयों से? ज़मीन खरीदेंगे... वहां अपना मकान बनाएंगे... दिल की साध पूरी कर लेंगे... अमीना, साजदा को अच्छी तालीम देंगे... बढ़िया स्कूल में उन्हें भर्ती करेंगे। अहमद की उधारी चुकाएंगे। सबीना की शादी... साजदा, अमीना की पूरी ज़िंदगी बाकी है... नयी सिलाई मशीन खरीदेंगे... अभी जो मशीन है वह बहुत तकलीफ दे रही है... सायरा योजना की रूपरेखा गुन रही थी।

पांव की उंगली का दर्द साजदा को बीच- बीच में जब कुरेदता था तो वह पैर पटकने लगती थी। कराहती भी थी। सायरा का ध्यान उस ओर नहीं था क्योंकि वह हिसाब लगाने में मगन जो थी। लेकिन कराहते हुए जब उसने ‘अब्बूऽ...’ कहा तो सायरा होश में आयी! रुपयों के चक्कर में यह तो मैं भूल ही गयी कि अहमद अब इस दुनिया में नहीं है। और उसके न रहने की ही यह कीमत है। उसकी मौत के बदले सरकार दे रही है यह हर्जाना। ज़रीना ने सिर्फ जिक्र किया तो हमारी नीयत कहां-से-कहां पहुंच गयी! क्या फ़र्क रहा उसमें और हम में? उसने अपना हिस्सा क्या मांगा... हमने तो अपनी पूरी ज़िंदगी की जोड़-तोड़ शुरू कर दी...

‘‘अम्मी, पांच लाख मिलेंगे हमें? मिलेंगे न? अम्मी, मेरे को एक चेन बना के दो। बाकी कुछ नहीं चाहिए मेरे को।’’ सबीना ने फरमाइश की।

उस पर आंखें तरेरने को सायरा का दिल किया तो सही, किंतु उसने अपनी गर्दन ऊपर उठायी ही नहीं। सबीना को कोई जवाब दिये बिना वह साजदा के पांव को सहलाती रही।

इस हादसे के बाद अहमद के कई देनदार पैदा हुए और बकाया वसूलने के लिए वे सायरा के घर का दरवाज़ा खटखटाने लगे थे। सही-सही मालूम नहीं पड़ रहा था, कि क्या वाक़ई अहमद पर इतने सारे लोगों की उधारी थी, या कि ये पलटन पांच लाख की पैदाइश थी।

मुमताज की मां ने भी चलते-चलते हल्का-सा संकेत दे ही दिया था, कि मेरी बेटी को जीते जी कोई सुख तो मिला नहीं। लेकिन इसमें से कुछ हिस्सा मिल जाए तो सुलताना की शादी के वक़्त काम में आएंगे रुपये... अपनी बेटी की ज़िंदगी तबाह हुई अहमद की खातिर और अब उसी की मौत के मुआवजे में हिस्सा मांगने वाली मुमताज की मां...

पड़ोसी जावेद की दिहाड़ी पर तो उनका चूल्हा जलता था... इकलौते बेटे की मौत की वजह से उसके मां-बाप की ज़िंदगी अब मौत का कुंआ बन गयी थी उनके लिए... लेकिन सरकारी मुआवजे की घोषणा से उनके दुखों के पैनेपन की धार पर भोंथरी हो गयी थी। अज़हर का एक पांव कट गया था। किंतु डॉक्टरों का अनुमान था कि उसके पैर में अभी भी कुछ छर्रे बाकी हैं। लेकिन वे छर्रे अमानत बनकर उसके बदन में ही बने रहेंगे। क्योंकि उसके इलाज में लाख-डेढ़ लाख खर्च करने में उसे कोई तुक नजर नहीं आ रहा था। चूहे मारने की दवा बेचने की जगह इस पूंजी से कोई नया कारोबार शुरू करने के ऊंचे ख्वाब वह देखने लगा था।

कई तरह के छोटे-बड़े घाव... जिस्मानी तथा रूहानी भी... उन्हें साथ लेकर ही जीने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मौत की आहें-कराहें तथा आसान-सी लगने वाली ज़िंदगी के चीथड़ा-चीथड़ा दुखों को कांधे पर ढोते हुए पल-पल मौत का सामना करने की मजबूरी... लेकिन ये घाव ही अब उत्तर- जीवियों के जीने का सहारा बन रहे थे। उनकी बाकी ज़िंदगी को मूल्यवान बना रहे थे। मुर्दा लाशें ही अब ज़िंदा बचे लोगों को खुशियां बख्शने का औज़ार बन गयी थीं... सायरा के घर की स्थिति भी इससे जुदा नहीं थी। आसपास के मातमी और ग़मज़दा माहौल में सायरा के पास सिलाई का काम आना भी बंद हो गया था। पहले का कुछ काम भी अधूरा पड़ा था... लेकिन इसके बावजूद खाने-पीने की कोई चिंता नहीं थी, जैसे पहले हुआ करती थी। धर्मादा संस्थाओं की ओर से खाने के पैकेट अभी भी बराबर आते थे। यथा समय, बिना खिचखिच नियमित खाना मिलता रहने से सबीना, साजदा खुश थीं। दिलावर चाचा के गले से नीचे कौर उतरता ही नहीं था; पर अब वे भी दबा के खाने लगे थे और उनका हाज़मा भी ठीक हो गया था। सायरा के थन भी अब दुधारू बन गये थे और आकार भी ग्रहण करने लगे थे। उसकी शुष्क, पपड़ी बनी चूचियां भी अब स्निग्ध तथा खिली-खिली-सी दिख रही थीं।

अमीना भी अब स्वस्थ और मोटी-सी हो चली थी।

अहमद के बिना, उसकी अनुपस्थिति में खुशहाल बसर का एक नया रास्ता खुल गया था... उसके ख़ारिज हो जाने के बाद ही... मंगलवार के दिन अमीना गैसेज से परेशान थी। उसे जैसे-तैसे शांत करने में सायरा जुटी थी, इतने में कारपोरेटर ने दरवाज़े पर दस्तक दी। उसने बताया, ‘‘कल मंत्री महोदय आएंगे। सवेरे ठीक ग्यारह बजे दर्गाह के पास डेथ सर्टिफिकेट लेकर आ जाना... समझ गयीं?’’

‘‘कल पैसा भी मिलेगा? पक्की?’’ अमीना को सबीना के हवाले करते हुए सायरा ने उनसे कहा, ‘‘इसके पहले भी दो बार ऐसा ही बोलकर ले गये आप हमें... लेकिन मंत्री-वंत्री कोई नहीं आया। पैसा पक्का मिलने वाला हो तो बताइए...?’’ ‘‘हां हां, पक्का मिलेगा। सरकार को दूसरे भी तो काम होते हैं... इसीलिए आगे- आगे टलता गया मामला... लेकिन आज मैंने ही मंत्रीजी का फोन उठाया... ग्यारह बजे आ जाना।’’

वह चला गया। अमीना भी थोड़ी देर बिलबिलाते रहने के बाद सो गयी। पिछले कुछ दिनों से सबीना रात को सोने के लिए जावेद के घर जाती थी; क्योंकि उसके बूढ़े मां-बाप को रात के वक़्त कोई-न-कोई पास में चाहिए होता था। साजदा भी बिस्तर में जाते ही सो गयी। पिछले दो चार दिनों से घने बादल छाये थे, सो हवा में बहुत ज़्यादा उमस थी। और आज तो इस कदर तल्खी थी, कि साजदा ने नींद में ही फ्रॉक उतार फेंकी। लबालब घने बादलों की स्याही मानो रात के अंधेरे पर हावी हो रही थी।

थोड़ी देर बाद मंद-मंद बयार बहने लगी। और हल्की-सी बूंदा-बांदी भी हुई... एहसान जतलाने के अंदाज़ में, लेकिन उसके बाद फिर से बेतहाशा उमस सा दौर...! ...लेकिन अंततः तरस खाकर मेघ धुंआधार बरसने लगे।

‘‘बीच में एकाध बार अमीना कुनमुनायी तो थी; पर थन चूसने के मूड में शायद वह नहीं थी। झूले की रस्सी से एक ही बार ज़ोरों से हिलाते ही सो गयी चुपचाप। अब सायरा भी सुकून से बिस्तर में चली गयी। इतने में दरवाज़ा धड़ा-धड़ बजने लगा। कोई लात मार रहा था दरवाज़े पर। सायरा सहम गयी... देर रात गये, बेवक़्त कौन हो सकता है ये...? कल ही फारूख धमकी देकर गया था। जल्द-से- जल्द बकाया चुकाने की चेतावनी उसने दी थी। वही तो नहीं न आया होगा?...’’ दरवाज़े पर आवाज़ बढ़ती ही जा रही थी. किंतु कानों में उंगली दबाकर वह अनसुने अंदाज़ में दुबकी रही बिस्तरे में ही।

‘‘सायरा... सा...य...रा...’’ भर्रायी- सी किंतु क्षीण आवाज़। सायरा तपाक से उठ बैठी। यह तो अहमद की पुकार लगती थी! लपक कर वह गयी और कलेजा थामकर उसने दरवाज़ा खोला। ‘‘हाय अल्ला! आप? आप... इस हालत में?’’ वह चीख पड़ी। अधमरा-सा... लड़खड़ाता... लहूलुहान... लुटा-पिटा... भीगा हुआ अहमद... कपड़े भी तार-तार हुए थे। दरवाज़ा खुलते ही वब झूमते हुए भीतर आया और धराशायी हो गया... धड़ाम् से। उनके गिर पड़ते ही आसपास की धरती भी जैसे कांप उठी। साजदा हड़बड़ाकर जाग तो गयी थी, पर तुरंत फिर से सो गयी। वह गहरी नींद में थी।

सायरा ने फुर्ती से दरवाज़ा ओढ लिया और अहमद के पास बैठ गयी। उसके भीगे बदन से दुर्गंध-सी आ रही थी। सायरा को मितली-सी होने लगी। अहमद का दिल तेजी से धड़कने लगा था और उसे कराहने में भी तकलीफ होने लगी थी। वह पानी मांग रहा था। सायरा बत्ती जलाये बिना ही पानी का गिलास ले आयी। किंतु अहमद में गर्दन उठाकर गिलास होंठों से लगाने की भी ताकत नहीं थी। मुश्किल से दो- चार बूंद उसके मुंह में जा पाए। अवचेतन में पड़े अहमद को अविश्वास के साथ ही सायरा घूरती रही। उसे हैरत हो रही थी कि उस दिन उसकी आंखें धोखा कैसे खा गयीं?

जिसे उसने अहमद समझा वह शख़्स कौन था? अहमद की मौत को आसानी से कुबूल कर नयी ज़िंदगी भी शुरू कर दी उन्होंने... सच वो था कि सच ये है? उस दिन से लेकर आज तक की इस अवधि को स्वप्न कहा जाए या कि दुःस्वप्न?

अमीना को भूख लगी थी। वह झूले में रोने लगी थी। सायरा ने फुर्ती से उसे झूले में से निकालकर थनों से लगाया।

लेकिन उसकी निगाहें औंधे मुंह लेटे अहमद की सांसों पर ही टिकी थी। बुरी तरह से पिट गया लगता है... लेकिन इतने दिन कहां छुपा रहा?... पुलिस की निगाहों से कैसे बच निकला...?

थन चूसने की ‘पुच पुच’ आवाज़ रात के सन्नाटे को भंग कर रही थी। इसी बीच, अहमद को घूरते हुए ही यकायक उसे झटका-सा लगा, कल पांच लाख मिलने हैं - धमाके में हुई अहमद की मौत के मुआवजे के तौर पर... लेकिन यह तो वापस आ गया है... ज़िंदा है... फिर क्या होगा?

ख़ुशहाल ज़िंदगी के सपने का क्या होगा...?

पेट भर गया तो अमीना अब शांत हुई थी। उसे जल्दी से सायरा ने झूले में लिटाया और अहमद के पास आ पहुंची। ‘‘किसी ने देखा तो नहीं आपको?

क्यों? किसी ने पिटाई की आपकी? घर आते वक़्त किसी से हुई हाथापाई?... बोलिए ना... कुछ तो बताइए...’’ वह अहमद के कानों में फुसफुसाती रही। उसकी एक आंख साजदा और दिलावर चाचा पर भी थी...

किसी की नींद नहीं खुलनी चाहिए... अहमद कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं था। या तो उसकी हालत इतनी ज़्यादा खराब थी कि वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा था, या फिर सायरा के सवाल उसके कानों तक पहुंच ही नहीं पाए थे।

उसका कराहना निरंतर जारी था और टांगों को झटकते हुए उन्हें मोड़कर पेट की ओर वह लाना चाहता था।

क्या किया जाए...? घर में दवा भी कहां है? साजदा के पांव की उंगली में लगाने के लिए लायी दवा... लेकिन किस हिस्से में लगायें? सायरा ने उससे पूछा भी, ‘‘दवा लाऊं?’’ उसने कोई जवाब नहीं दिया। आख़िरकार वह साजदा के बगल में लेट गयी... सिर्फ करवटें बदलती रही... अहमद की मुंह चिढ़ाती आकृति उसकी आंखों के सामने नाचने लगी।

साजदा ने फ्रॉक तो उतार फेंकी थी फिर भी सायरा ने उसकी चादर ठीकठाक की; और अब याद आयी उसे वह मनहूस रात... सबीना की छाती को टटोलने की अहमद की बदज़ात हरकतें... उसका बाप कहलाने वाला यह हैवान... हरामज़ादा!

खूंख्वार भेड़िया! इसी ने मुमताज को भी... मुमताज ने बहस भी की थी, ‘‘हमें अच्छी ज़िंदगी जीने का हक क्यों नहीं, दीदी?

इसी दोजख में बिलबिलाते रहने के लिए मजबूर क्यों हैं हम?’’

‘‘पा...नी.... पा...नी... पा...’’ कराहते अहमद के मुंह से बमुश्किल एकाध हरूफ़ ही बाहर निकल पा रहा था। सायरा उठकर पानी का गिलास ले आयी। उसके मुंह से बूंद-बूंद पानी डालने के दौरान सायरा के ध्यान में आया कि उसके होंठ खुलते ही नहीं थे और पानी भीतर जाने के बजाय बाहर ही आता रहा था... उसकी गर्दन गीली हो रही थी।

‘‘किधर थे आप? किसी ने देखा आपको? कुछ तो बोलिए...’’ उससे कुछ बुलवाने के लिए सायरा ने दो-एक चांटे भी उसे रसीद किये। धीरे-धीरे उसकी आवाज़ भी ऊंची होने लगी थी। बीच में ही उठकर वह गयी और साजदा की दवा की डिबिया ले आयी।

‘‘अहमदऽ बेटाऽ’’ दिलावर चाचा के मुंह से नींद में ही यह टेर यूं ही सुनाई दी।

बीच-बीच में वे इसी तरह से बुदबुदाते रहते थे। सायरा के लिए उनकी यह आदत नयी तो नहीं थी, फिर भी वह चिंहुक गयी। वह साजदा को थपकाती रही किंतु उसका ध्यान दिलावर चाचा पर केंद्रित था। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी और सायरा की छटपटाहट उभार पर थी।

‘‘कहां थे आप? बोलोऽ वापिस क्यों आए?’’ फिर एक बार अहमद के करीब आकर उसे झकझोरते हुए सायरा ने उससे पूछा। पर कोई जवाब नहीं। उसके घुटने और जंघा के बीच में छुरा घोंपने का घाव दिखाई देता था।

‘‘नेपाल... नेपाल ग...या माल... मारा...’’ अहमद बुदबुदाया। किंतु उसका बोलना साफ सुनाई नहीं देता था। जंघा के पास हुए गहरे घाव का रिसना भले ही कम हुआ हो, पर अभी भी वह गीला था। सायरा को याद आया, नादीर की मृत्यु के बाद अहमद ने इसी तरह से उसकी पीठ का कचूमर बनाया था और उसकी हड्डी-पसली एक हो गयी थी। मन में आया कि शुरू पिटाई... ऐसी ही स्थिति थी... पहरेदार की तरह घर में ही रुका रहता था और सायरा की गतिविधियों पर नज़र रखता था।

अहमद की मौत के साथ ही ये सब मनहूस यादें रफा-दफा हो चुकी थीं... लेकिन... ‘‘पानी... खा...ना दे... पा... भूऽख... रो...टी’’ अहमद का आहें भरना फिर से शुरू हो गया था।

सायरा चौके में गयी और फिर एक गिलास पानी लायी है। भूख-भूख कह तो रहा है पर... क्या खायेगा ये... दूध भी नहीं है घर में। उसके पास में बैठकर गर्दन को नीचे-ऊपर करते हुए उसे पानी पिलाने की भरसक कोशिश वह करती रही। किंतु अब पुष्टि हो चुकी थी कि उसका मुंह खुलता ही नहीं।

‘‘लीजिए... पानी पी लीजिए... मुंह खोलिए...’’ लेकिन अहमद की ओर से कोई रिस्पॉन्स ही नहीं था... कोई हलचल नहीं।

उसकी आंखें मुंद गयी थीं आप ही... भींचकर मुंदी आंखें... जैसे पलकें सिल दी गयी हों। भौंहों के पास एक गहरा घाव। माथे पर, गाल पर चाकू से गोदने की निशानियां...

...शराब पीने के बाद उसकी हालत ऐसी ही हो जाया करती थी। तथापि अचानक कहां से उसे ताक़त प्राप्त होती थी, पता नहीं; वह पीटने लगता था, बस। धुनाई... मरम्मत... कुचलना... मसलना और अधमरा हो जाना... और उसके बाद गठरी बने उसी बदन के साथ नोच-खसोट - नहीं चाहिए मुझे दोबारा वही जानलेवा दौर और आहों की मनहूस दोजख।

‘‘तू क्यों वापस आया रे, हरामज़ादे!’’ वह भीतर-ही-भीतर चिल्लायी, ‘‘मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ता तू? वही मारपीट... नोच- खसोट... रोना-बिलखना... झरीना... सबीना... और कल साजदा भी... या अल्ला! इसे गड़ा ही रहने देता...’’ हर पल सायरा की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। क्या इलाज हो सकता है इसका? कब पिंड छूटेगा यंत्रणाओं के इस दौर से?...

पल-दो-पल एक अजीब-सा पागलपन उसके दिमाग पर सवार हुआ।

अहमद को ठेलकर वह चौके में आयी। फिर अहमद के पास... फिर चौके में, पानी का गिलास रखने... इसी बीच उसका ध्यान चूहे मारने की ज़ालिम दवा की शीशी पर गया। अज़हर ने चेतावनी दी थी, ‘‘भाभीजी, बुहत ही ज़ालिम दवा है। बच्चों की पहुंच से इसे दूर रखिए...’’ हां, अहमद का काम तमाम हो जाएगा इससे... लेकिन वह तो अपनी मौत मरेगा... हालत इतनी खस्ता है कि... ज़हर खिलाने की ज़रूरत ही नहीं... हाय अल्ला! ये क्या सोच रही हूं मैं... ज़हर खिलाकर उसे... दिल में उठे इसी तूफान के थपेड़ों की मार से उसका समूचा बदन पसीना-पसीना हो गया। नहीं मरा अहमद तो? ...सरकारी मुआवजा? ...बच्चियों की ज़िंदगी से फिर वही खिलवाड़... अब उसकी आंखों में तैरने लगी मुमताज। ‘देख लूंगी दीदी, उस हैवान को। वो मज़ा चखाऊंगी कि...। या तो वह रहेगा, या मैं रहूंगी...’ मुमताज के इन शब्दों ने उसे भरपूर ताकत बख़्श दी।

उसने ज़हर की शीशी उठा ली। अहमद लगभग मरा हुआ था... मैं कुछ भी कर सकती हूं... है मुझ में हिम्मत मुमताज जैसी... गिलास के पानी में उसने दो- चार बूंद ज़हर मिलाया। अब फिर से वही, पुरानी याद उसे डंक मारने लगी... गहरे... और गहरे - नादीर की मौत के बाद उसे पूरे दिन उसने भूखा रहने दिया था मुझे... एक घूंट पानी भी मयस्सर नहीं हुआ था... खाली पेट, सूख रहा गला, पपड़ी बने होंठ, बदन में टूटन... एक घूंट पानी के लिए गुहार लगायी, तो एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद की थी अहमद ने... ‘पानी चाहिए? ख़ूनी डायन! अपने थन से दूध निकाल के पी ले... अपना ही ज़हर पी के मर जा मुंहजली! मेरे बच्चे को खा गयी चुडैल!’ कहकर एक लात मारी थी कमर में अहमद ने... दूध से लबालब थन ठसक रहे थे... झर रहे थे... और दो साल की सबीना के सामने ही उसने सायरा को...

‘‘हरामज़ादा!’’ दांत-होंठ भींचकर सायरा बुदबुदायी। उसके पुराने, कितने ही घावों से बह रहे विषाक्त खून से वह लहू- लुहान हो गयी। उन मनहूस यादों का क़तरा- क़तरा उसके कलेजे को तार-तार कर गया। उसका रोंया-रोंया जैसे फुंफकारता था... एक अजीब-सी उलझन... आर-पार की कशमकश और बंद गली का आख़िरी मकान! मुमताज ने खुद को मिटा दिया।

अब मैं भी... नहीं... नहीं... इसी उधेड़बुन में सायरा ने चूहे के ज़हर की शीशी का ढक्कन फिर एक बार खोला... ‘‘पानी भी नहीं पी सकता न तू, देख...’’ सायरा ने कुर्ती के बदन खोलकर कुछ बूंद ज़हर चूचियों पर चुपड़ लिया। त्वचा में भारी जलन-सी होती रही। लेकिन इससे कई गुना ज़्यादा वेदनाओं का पहाड़ सिर पर उठाने का माद्दा इस वक़्त संगदिल बनी सायरा के बदन में समोया था...

अहमद हमारे लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए जब मर चुका है... और सरकार जब उसकी मौत का मुआवजा हमें दे रही है... तो क्यों ज़िंदा रहे यह हैवान? उसके बिना भी तो बसर कर ही रहे हैं हम! मेरी बेटियों के हिस्से में बेहतर ज़िंदगी आनी चाहिए। मेरी नीयत यदि खराब हो गयी है तो खराब ही सही... पर हमें जीना है... सुकून से जीना है...

‘बांझ कहता है न तू मेरे को? फिर भी तू मेरे जिस्म को नोचने के लिए ही आता है न मेरे पास! तो मैं भी दिखाती हूं मेरी जिस्म के जलवे तुझे... आना पड़ेगा तेरे को मेरे पास...’ कहकर आग की लपटों के हवाले हुई मुमताज... और अब ख़ब्त की मुब्तिला हुई सायरा... इस क़दर पगलायी हुई, कि जिसे अहमद सिर्फ भोगता रहा और चूसता रहा। घटिया औरत कहकर ताने मारता रहा, उलाहना देता रहा था - अपने जिस्म को उसने अब बम बनाया था।

सायरा अहमद के करीब आयी। उसके बदन से आ रही बदबू को जज़्ब करते हुए वह उससे चिपट गयी। नन्ही अमीना के सिर के बालों को सहलाने वाली उन्हीं उंगलियों से उसने अहमद के सिर के जंगल को कसकर थामते हुए अपनी ओर खींच लिया और...

सवेरे का झुटपुटा होने में अभी समय बाकी था। बारिश की नमी से सराबोर दिशाओं में रोशन होने से पहले की सरगर्मियां जारी थीं। दिन तो निकलने ही वाला था - मालामाल कर देने वाला..

सबीना पड़ोसी जावेद के मां-बाप के साथ उन्हीं के घर में गहरी नींद सो रही थी... साजदा और झूले में अमीना भी मस्ती से... दिलावर चाचा अलस्सुबह की नमाज़ अदा करने के लिए कुछ ही देर बाद शायद...

- औरत का जिस्म सिर्फ भोगने के लिए होता है इस बात पर मुहर लगाने वाले अहमद के बदन को, उसी की औरत की, अब तक अननुभूत विस्फोटक की ताक़त अब उसे धू-धू कर जला रही थी...

 

अनुवादक : प्रकाश भातम्ब्रेकर

'चिंतन दिशा' से साभार

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