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शक नहीं श्रद्धा, विरोध नहीं विश्वास

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वर्तन परिवर्तन

१२. शक नहीं श्रद्धा, विरोध नहीं विश्वास...

-हर्षद दवे.

 

मानव प्रकृति की एक विशेषता है: कदम कदम पर कन्फ्यूज होना और खुद पर भरोसा न रखना. हर दूसरे या तीसरे दिन असफलता की कसक या अपेक्षित परिणाम न मिल पाने की है: क्या इस माथापच्ची या व्यथा-वेदना का कोई 'अकसीर इलाज' नहीं है? है, मेरे टीस मन में उभर ही आती है. ऐसा होना सहज है क्यों कि जिंदगी का हर मोड अनप्रिडीक्टेबल होता है पर क्या इसीलिए हमें अपना बहुमूल्य जीवन लगातार टेंशन, भय, फ़िक्र, बेचैनी में ही बिताना चाहिए? नहीं. फिर ऐसा सवाल मन में उठता पास इस का जवाब है और मैं इसे मेरे जीवन में बरसों से आजमाता आ रहा हूँ. सच मानों तो मुझे इस 'अकसीर इलाज' से ही सदैव एनर्जी और ऊर्जा मिलती रही है.

रन-वे से टेक ऑफ करता हुआ एक हवाई जहाज ऊपर आसमान में पहुंचा. फिर हवामान की खराबी के कारण वह हवाई जहाज हजारों फीट ऊपर हिलने डुलने लगा. यात्रीगण परेशान. चिंताग्रस्त. भयभीत. सब पर मौत का भय हावी हो गया. कुछ लोग लाइफ जैकेट चढाने लगे तो कुछ ईश्वर को याद करने लगे. पर एक छोटा सा बच्चा इन हरकतों से बेखबर अपनी सीट पर बिंदास अपने खिलौने से खेल रहा था. ऐसा लगता था जैसे उसे इस मुसीबत का बिलकुल अंदाजा नहीं, न ही उसे इस बात की कोई परवाह थी.

कुछ देर बाद सब ठीक ठाक हो गया. प्लेन स्थिर हो गया. अच्छे से हवाई जहाज का लेंडिंग भी हो गया. यात्रियों की जान में जान आई. इत्मीनान से सारे यात्री बहार आ गए. जब एक यात्री से रहा नहीं गया तो उस ने बच्चे से पूछ ही लिया: 'बेटे! जब सारे यात्री घबराहट के मारे अपनी सांसें गिन रहे थे तब तू बड़ा बेफिक्र हो कर कैसे खेलता रहा? क्या तुझे ज़रा भी डर नहीं लगा?'

'नहीं!' बच्चे ने खिलौने की चाभी घुमाते हुए कहा, 'मेरे मन में बिलकुल डर नहीं था क्यों कि हवाई जहाज के पायलट मेरे पिताजी खुद थे. मुझे यकीन था, वे मुझे कुछ नहीं होने देंगे!'

हमारी जिंदगी के पायलट तो स्वयं ईश्वर है और जब हमारी जीवननैया खुद ईश्वर पार लगानेवाले हो तो हम क्यों फ़िक्र करें? हमें उन पर पूरा भरोसा रखना चाहिए न!

जब हम बेवजह फ़िक्र करते है तो उस का मतलब है सर्जनहार पर शक करना. इस शक को विश्वास और श्रद्धा में बदल डालो फिर देखो, लेंडिंग सफल व सुरक्षित ही होगा!

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-हर्षद दवे.

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