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एल्बर्ट आइंस्टाइन

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(नन्हें एल्बर्ट को उसकी पांचवी वर्षगांठ पर उसके माता-पिता ने एक दिक्सूचक भेंट में दिया था। इस भेंट ने उसके दिमाग में बहुत से प्रश्न उत्पन्न कर दिए और फिर क्या वह  अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढ पाया?

इस पुस्तक की लेखिका मैरी जोसफ़ ने दिल्ली और बम्बई के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी पढ़ाई है और अपने प्रिय पाठकों, बच्चों के लिए कई पुस्तकें लिखी है। इसका अनुवाद हिन्दी के लेखक श्री महावीर सिंहल ने किया है. इसे जाने-माने व्यक्तित्व श्री अरविन्द गुप्ता के ईबुक संग्रह से, अनुमति से साभार यूनिकोडित कर पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है.)

दूर देश जर्मनी में

उल्म जर्मनी में एक छोटा नगर है। इस नगर में रहते थे हरमन और पोलीन आइंस्टाइन। श्री आइंस्टाइन का एक छोटा सा कारोबार था। उन दिनों समस्त यूरोप और अमेरिका में बिजली की खोज हो गई थी और लोग अपने घरों में बिजली का उपयोग करने लगे थे। आइंस्टाइन महोदय लोगों को बिजली के उपकरण मुहैया कराया करते थे।

हरमन और पोलीन दोनों खुशहाल पति-पत्नि थे। उनके जीवन में 14 मार्च 1879 का दिन बहुत खुशी का दिन था, जब उनके पुत्र ने जन्म लिया। उन्होंने बच्चे का नाम एल्बर्ट रखा। पोलीन को अपने शिशु से बहुत प्यार था। वह उसे अपनी छाती से चिपकाए रहती और आश्चर्य भरे प्रेम से उसे निहारती रहतीं। माताएं अक्सर अपने बच्चों को बहुत ध्यान से देखती हैं। वे देखती हैं कि उनका बच्चा सही तरह से बड़ा हो रहा है या नहीं। एल्बर्ट जैसे बड़ा हुआ उसकी माता के सामने एक समस्या खड़ी हो गई। वह बोलता नहीं था। उसकी मां को इस बारे में बहुत चिन्ता हुई, लेकिन उसने उम्मीद नहीं छोड़ी। पिता ने सोचा कि एल्बर्ट एक सुस्त शिशु है। लेकिन तब तो वह सोच भी नहीं सकते थे कि उनका बेटा एल्बर्ट बड़ा होकर ऐसा होनहार बनेगा जिस पर सारे विश्व को गर्व होगा।

जब एल्बर्ट दो वर्ष का हुआ तब उसकी छोटी बहन माझा का जन्म हुआ। वह अपनी छोटी बहन को देखकर उसने कितनी प्यारी और बहुत प्रसन्न हुआ। कहा ''यह

छोटी बच्ची है। मैं जीवन भर इसका दोस्त रहूंगा। '' और इस तरह दोनों भाई-बहन जीवन भर एकदूसरे के दोस्त बने रहे।

बचपन में एल्बर्ट शान्त स्वभाव का और शर्मीला था। उसका कोई मित्र नहीं था। वह अपने पड़ोस में रहने वाले बच्चों के साथ भी नहीं खेलता था। उसे ज्यादा खेलकूद पसन्द नहीं थे। बच्चे बहुत भोले- भाले होते हैं। वे प्राय: युद्ध-खेलों में रुचि लेते हैं। वे जैसा अपने

इर्द-गिर्द देखते है वैसा ही करते हैं। तुमको अपने आस-पास की सिर्फ अच्छी बातें सीखनी चाहिए।

एल्बर्ट के माता- पिता म्यूनिख में रहने लगे थे। बच्चे म्यूनिख की सड़कों पर सेना की परेड देखा करते और उसकी नकल भी करते। लेकिन एल्बर्ट ऐसा नहीं था। वह सिपाहियों को देखते ही रोने लगता। उसे सिपाहियों पर बहुत दया आती। वह प्राय: अपने पिता से कहता कि वह बड़ा होकर सिपाही नहीं बनेगा। उसे अन्य बच्चों की तरह सिपाही बनने में कोई रूचि नहीं थी। एक तरह से उसे सिपाहियों पर दया आती थी।

जब भी वह सिपाहियों को परेड करते देखता तो वह अपने पिता से कहता '' पापा ये सिपाही तो मशीन की तरह बेजान हैं इनको आजादी नहीं है। '' एल्बर्ट के लिए आजादी ही सब-कुछ थी और वह शान्ति को महत्व देता था। फिर जब वह युवक हुआ तब उसने महात्मा गांधी की तरह ही अहिंसा अपना कर आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी।

इस तरह बचपन में एल्बर्ट अपने में ही मस्त रहता। वह या तो सोचता रहता या स्वयं ही ऐसे खेल खेलता जो कुछ शिक्षाप्रद होते। अक्सर उसकी बहन माजा उसके

साथ होती। उसके माता-पिता प्रत्येक रविवार को बाहर घूमने जाते और उसे उसी दिन का इन्तजार रहता। उसे घूमना बहुत पसन्द था। वह नदी के किनारे बैठ जाता और दूर ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और विशाल आसमान को देखता रहता। इन यात्राओं से अर्ल्वट को प्रकृति से हमेशा के लिए लगाव हो गया था। ब्रह्माण्ड कैसे चलता है इसके बारे में प्रबल जिज्ञासा उसके मन में थी।

एक रविवार की सुबह

एक रविवार की सुबह बहुत महत्वपूर्ण थी। उस दिन एल्बर्ट की वर्षगांठ थी। वह पांच वर्ष का हो गया था। एल्बर्ट ने प्रसन्न होकर माजा से कहा, '' माजा, देखना है आज मेरी वर्षगांठ पर मुझे क्या उपहार मिलता है। '' उस दिन वह इतना प्रसन्न था कि सवेरे जल्दी ही जाग गया था। फिर उसने माजा को भी जगा दिया। वह अपनी खुशी माजा के साथ बांटना चाहता था। तभी उसके माता-पिता आ गए। उन्होंने एल्बर्ट को वर्षगांठ की शुभकामनाएं दी। फिर उन्होंने उसे उपहार स्वरूप एक छोटा-सा डिब्बा दिया। एल्बर्ट ने उसमें कुछ गोल और चमकीला-सा देखा। वह एक चुम्बकीय दिकसूचक (magnetic compass) था। वह बहुत प्रसन्न हुआ और

उसे देखता ही रहा। उसने देखा कि इस दिकसूचक की सुई हमेशा उत्तर दिशा की तरफ ही रहती है। उसके दिमाग में बहुत से प्रश्न आए कि ऐसा कैसे और क्यों होता है? फिर उसने ऐसे उपहार के लिए अपने माता-पिता को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया।

उस दिन जब एल्बर्ट पहाड़ी पर घूमने गया तो उसके दिमाग में बहुत से प्रश्न थे जिनका उत्तर उसके पास नहीं था।

पोलीन पियानो बजाने में निपुण थी। वह प्रतिदिन. पियानो बजायाकरती थी। इस कारण घर के पूरे वातावरण में संगीत गूंजता रहता था। सवेरे जब एल्बर्ट सोकर उठता तो उसके कानों में संगीत की ध्वनि पड़ती रहती। पोलीन की यह इच्छा थी कि उसके बच्चे भी संगीत में रूचि लें। उसका विचार था कि जीवन में संगीत बहुत जरूरी है और संगीत जीवन को सुखद बनाता है।

एल्बर्ट भी छ वर्ष की उप में वायलिन बजाना सीखने लगा। उसकी मां ने देखा कि संगीत से एल्बर्ट प्रसन्न रहता है और संगीत उसके जीवन में खुशियां भरता है।

यह संगीत हमेशा के लिए एल्बर्ट अई जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया। जब वह और बड़ा हुआ तो बाइबिल के एक विद्वान चरित्र सोलोमन से बहुत प्रभावित हुआ। बाइबिल ईसाइयों और यहूदियों का पवित्र प्रन्ध है। सोलोमन की रचनाओं को पढ़ने के बाद एल्बर्ट ने स्वयं भी लिखा, और उसे संगीतबद्ध किया। उसने ईश्वर की आराधना में भजन भी गाये। प्रसिद्ध वैज्ञानिक होने के बाद आइंस्टाइन ने इस भूमण्डल के बारे में सिद्धान्त बनाये। लेकिन वह जहां भी कहीं जाता वायलिन हमेशा उसके साथ होती।

बचपन के दिन

बचपन में एल्बर्ट को स्कूल में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वह स्कूल को ज सैनिक छावनी की तरह समझता था। और उसे म्यूनिख की सड़कों पर परेड करते सिपाहियों की याद हो आती थी। वह समझता था कि स्कूल एक ऐसी जगह है जहां आजादी नहीं होती। एल्बर्ट विचारों की आजादी को बहुत प्रमुख मानता था। वह अपने अध्यापक द्वारा कहे गए विचारों को 'क्यों का त्यों मानने को तैयार नहीं था। वह कहता था कि किसी विचार को तभी मानना चाहिए जब अपने को समझ में आ जाए। कमी-कभी वह अपने अध्यापक से बीजगणित के ऐसे सवाल पूछता. जिनका उत्तर अध्यापक के पास भी नहीं होता। तब अध्यापक को गुस्सा आ जाता और एल्बर्ट को सजा मिलती।

अपने अध्यापकों के लिए बहुत होशियार होने के अलावा एल्बर्ट की एक समस्या और थी। वह एक यहूदी था।

तुम यह जानना चाहोगे कि क्या यहूदी होना भी कोई समस्या है?

ऐसी समस्या का कोई कारण नहीं होता। यह तो मनुष्यों द्वारा ही बनाई हुई होती है। अगर किसी देश में किसी एक मत को माननेवालों की संख्या ज्यादा हो तो वे दूसरे मत के माननेवालों की, जिनकी संख्या कम हो, जिन्दगी दूभर बना देते हैं। जर्मनी में ईसाई ज्यादा संख्या ' में रहते थे।

एल्बर्ट ईसाई नहीं था। वह तो यहूदी था।? इस कारण अक्सर जब वह स्कूल में पढ़ने जाता तो रास्ते में ईसाई लड़के उसे परेशान करते और उसका मजाक बनाते। इस बात से उसके जीवन में अलगाव की भावना आ गई थी।

अकेलेपन की इस भावना ने उसके दिमाग पर बहुत असर डाला। वह अपने-आप में अकेला रहने लगा। लेकिन एल्बर्ट के बचपन में एक मित्र अवश्य बना जो उससे उम्र में बड़ा था। वह था मैक्स टेमले। यहूदियों में सप्ताह में एक बार किसी गरीब यहूदी को खाने पर बुलाने का रिवाज था। आइंस्टाइन परिवार भी इस रिवाज को निभाता था और हर सप्ताह .गुरुवार को मैक्स टेमले को खाने पर बुलाता था। मैक्स चिकित्साशास्त्र का विद्यार्थी था। वह एल्बर्ट के लिए विज्ञान की बहुत-सी पुस्तकें लाता था।

इन पुस्तकों को देखकर एल्बर्ट कहता, '' ये कितनी सुन्दर पुस्तकें हैं मैक्स। '' पुस्तकों में बने चित्रों को देखकर एल्बर्ट अपने मित्र मैक्स से बहुत से सवाल पूछता। बड़ा होने पर एल्बर्ट इन पुस्तकों के बार में मैक्स से तर्क करता। इस विचार-विमर्श से एल्बर्ट का दिमाग ' और अधिक विकसित हो गया। मैक्स उससे विज्ञान और दर्शन के बारे में चर्चा करता। एल्बर्ट उससे पूछता, '' मैक्स दर्शन क्या होता है। ''

मैक्स उत्तर देता, '' दर्शन, जीवन और ब्रह्माण्ड के अर्थ का अध्ययन है। तेरह वर्षीय एल्बर्ट मैक्स की बातों को सुनकर उन प्रश्नों के बारे में सोचने लगता जिनके विषय में उसने आज तक कभी सोचा ही नहीं था।

एक दिन एल्बर्ट ने मैक्स से पूछा, मैक्स यह ब्रह्माण्ड कैसे काम करता है 1 ''

इसका उत्तर मैक्स के पास नहीं था। उसका दिमाग एल्बर्ट की सोच के अनुसार विकसित नहीं था। वैज्ञानिकी द्वारा खोजे गए तथा मनुष्यों द्वारा माने गए विचारों को एल्वर्ट अपने विचारों की कसौटी पर परखता। वह जानता था कि अंतरिक्ष और समय के बारे में और अधिक जानने की आवश्यकता है। एल्बर्ट उस समय इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए अंतरिक्ष में नहीं जा सकता था, इसलिए वह इसके-बारे में अपने मन में सोचता रहता। जब वह बड़ा हुआ तो भौतिकी उसका प्रिय विषय बन गया। क्योंकि भौतिकी ही प्राकृतिक संसार के अध्ययन का विज्ञान है।

प्यारे चाचा जैकब

एल्बर्ट का चाचा जैकब परिवारके साथ रहता था। वह एक प्रशिक्षित इंजीनियर था। एल्बर्ट अपने चाचा को बहुत चाहता था। जैकब ने ही एल्वर्ट के मन में गणित के प्रति रूचि जगायी थी। एक दिन वह एल्बर्ट के साथ पहाड़ियों पर घूमने गया। उसने एल्वर्ट से पूछा एल्वर्ट तुम पशुओं को प्यार करते हो न ''

हां चाचा? मैं पशुओं को बहुत प्यार करता हूँ',एल्वर्ट ने उत्तर दिया।

देखो,बीज गणित में बहुत से अज्ञात पशु रहते हैं। हमें कोशिश करके उनको ढूंढना है जैकब ने कहा। एल्वर्ट ने पूछा क्या हम ऐसा कर सकते हैं।'' हां जब हम किसी अज्ञात पशु को ढूंढना चाहते हैं तब हम उसे बीजगणित में एक्स (X) मान लेते हैं और जब तक उसका पता नहीं लगा लेते उसे ढूंढ़ते ही जाते है' जैकब ने समझाया।

''यह तो बहुत अच्छा लगता है चाचा, मैं इसके बारे में और ज्यादा जानना चाहता हूँ'' एल्बर्ट ने कहा।

जैकब यह जानता था कि इस बारे में एल्बर्ट की जिज्ञासा किस तरह बनी रह सकती है। अत: उसने कहा 'आज इतना ही बहुत है। अब घर लौटने का समय हो गया है। आओ घर चलें'' और फिर वे दोनों घर वापस लौट आए।

वास्तव में एल्बर्ट के मस्तिष्क के विकास के लिए सही जगह उसका घर ही था। यही वह स्थान था जहां उसकी सही शिक्षा प्रारम्भ हुई थी। एल्वर्ट के पिता ने उसमें वैज्ञानिक अउनुसंधानों में रूचि जगायी और उसे प्रोत्साहित भी किया था। कक्षा में एल्बर्ट को बहुत अच्छे अंक न मिलने पर भी उन्होंने उसे कभी भी बुरा-भला नहीं कहा और नहीं उसके मार्ग में बाधा पहुंचाई।

एक दिन सर्दी के मौसम में एल्वर्ट जब स्कूल से घर लौटा तो उसके पिता ने उसे कागज में लिपटी एक वस्तु दिखाते हुए कहा, ''देखो मैं तुम्हारे लिए यह क्या लाया

एल्बर्ट कुछ भी नहीं समझ सका। उसने पूछा, '' इसमें क्या है पापा। ''

यह रेखागणित की एक पुस्तक थी। मिश्र में अलैक्जैण्ड़िया के प्रसिद्ध गणितज्ञ युक्लिड की वह पुस्तक जिसमें उनके विचार लिखे हुए थे। एल्बर्ट को यह पुस्तक बहुत पसन्द आई।

एल्बर्ट जब पन्द्रह वर्ष का हुआ तब उसके पिता के कारोबार में कुछ समस्याएं हो गई। इस कारण उन्हें अपना कारोबार बन्द करना पड़ा।

एक दिन उसके पिता ने कहा '' एल्वर्टू मैं तुमको एक बुरी खबर दे रहा हूं। मुझे हम सबके लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ करने के लिए इटली के मिलान नगर में जाना पड़ेगा। लेकिन तुम हमारे साथ नहीं चल सकोगे। तुम्हें म्यूनिख में रहकर जिमनेलियम स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी करनी होगी। ''

पिता की बात के उत्तर में एल्बर्ट ने कहा '' मैं जिमनेलियम स्कूल से नफरत करता हूं। वे लोग हमें बिलकुल आजादी नहीं देते। वह तो एक तरह से सैनिक छावनी ही है। और फिर मैं अकेला रहना भी नहीं चाहता।

मैं तो परिवार के साथ रहना चाहता हूं। ''

लेकिन कभी-कभी हमें ऐसे काम भी करने पड़ते हैं जिन्हें हम पसन्द नहीं करते। मनुष्य को बड़ा होने के लिए ऐसे बहुत से काम करने पड़ते हैं। एल्बर्ट को भी बड़ा होना था और जिमनेलियम स्कूल की पढ़ाई पूरी करनी थी।

जिमनेलियम स्कूल जर्मनी का श्रेष्ठतम स्कूल था जहां छात्रों को विश्वविद्यालयों के लिए तैयार किया जाता था। माता-पिता के म्यूनिख से जाने के बाद एल्बर्ट बहुत उदास रहने लगा। वह जिमनेलियम स्कूल में अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सका। वह इटली में अपने परिवार के पास चला गया। एल्बर्ट को इटली बहुत पसन्द था। इटली में बड़े और अच्छे संग्रहालय थे। ऊंचे-ऊंचे खूबसूरत भवन चौड़ी और साफ सड़कें तथा कला और सांस्कृतिक केन्द्र थे। यहां बहुत से दर्शनीय स्थल भी थे। पढ़ने और सोचने के लिए भी बहुत कुछ था। इटली में जो समय एल्बर्ट ने गुजारा वह उसके जीवन का सबसे सुखद समय रहा।

एल्बर्ट स्नातक बना

सोलह वर्ष की उम्र में एल्बर्ट स्वीटरजरलैंड में आरू (aarau) के एक स्कूल में पढ़ने गया। यहां वह विटेलर परिवार के साथ रहा। विटेलर महोदय एक स्कूल में अध्यापक थे। अक्सर एल्बर्ट इस परिवार के साथ पहाड़ों पर दूर-दूर की यात्राओं पर जाया करता था। इस परिवार के साथ एल्बर्ट की अच्छी मित्रता हो गई। फिर बाद में उसकी बहन माजा का विटेलर महोदय के पुत्र पॉल. के साथ विवाह भी हो गया।

एल्बर्ट के जीवन में यही वह समय था जबकि उसने भौतिकी के अध्ययन में गहरी रूचि दिखाना शुरू किया। उसे यहां योग्य और विद्वान अध्यापक मिले। उसने स्कूल की प्रयोगशाला का उपयोग भी किया। यहां अध्ययन करते समय वह सोचता रहता, ' कोई अगर रोशनी की किरण को पकड़ना चाहे तो क्या हो ? ' एल्बर्ट के इसी प्रश्न

ने बाद में उसके सापेक्षता के सिद्धान्त ( Relativity) को जन्म दिया।

उस समय के बहुत से वैज्ञानिकों का यह मत था कि अंतरिक्ष में हवा से भी पतला बहुत ही सूक्ष्म द्रव्य सारे शून्य स्थल में व्याप्त है जिसे ईथर (Ether) कहते हैं। लेकिन यह सिद्ध नहीं होने के कारण युवक एल्बर्ट इसे मानने को तैयार नहीं था।

एल्बर्ट ने ज्यूरिख में ' स्विस--डेरल इन्व्हीट्‌यूट आफ टेकनॉलॉजी में प्रवेश किया और स्नातक की डिग्री प्राप्त की। स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने सोचा कि ' अब मैं विद्यार्थियों को पढ़ा सकता हूं। ' लेकिन वह म्यूनिख के जिमनेलियम के अध्यापकों से भिन्न अध्यापक होना चाहते थे। एल्बर्ट सोचते थे वैसा हुआ नहीं । अन्य अध्यापक एल्बर्ट के अधिक ज्ञान के कारण डर गए। इसलिए एल्बर्ट को नौकरी नहीं मिली। अन्त में जब वह तेईस वर्ष के हुए तब उन्हें स्वीटजरलैंड की राजधानी बर्न में एक नौकरी मिल गई। स्विस पैटेंट दफ्तर में उन्हें कार्य मिल गया। अब उन्हें अपने शोध लेखों को लिखने तथा प्रकाशित कराने का भी बहुत समय मिला। उन्होंने डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के लिए मेहनत और लगन से काम करना प्रारं भ किया। अंत में उनका परिश्रम रंग लाया।

और उन्होंने डाक्टरेट (पीएच.डी) की डिग्री प्राप्त कर ली। अब वह विश्वविद्यालय में पढ़ाने के योग्य हो गये थे। ज्यूरिख विश्वविद्यालय में एल्बर्ट की एक, प्रोफेसर के रूप में हो गई और लोगों ने उन्हें एक महान वैज्ञानिक मान लिया। इसी समय अमरीका के दो महान वैज्ञानिक माइकलसन और मार्ले रोशनी की गति को मापने का काम कर रहे थे। लेकिन उन्हें अपने काम में सफलता प्राप्त नहीं हो पाई थी। आइंस्टाइन ने बताया कि इन वैज्ञानिकों का अपने प्रयोग में असफल रहने का कारण यह था कि वास्तव में रोशनी की गति हमेशा एक सी रहती है और संसार में सभी वस्तुएं सापेक्ष या तुलनात्मक हैं।

जब तुम छोटे बच्चे थे तब तुमने किन्हीं दो वस्तुओं के तुलनात्मक अध्ययन के बारे में पढ़ा होगा। रेलवे फाटक पर खड़ा व्यक्ति 90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जाती हुई गाड़ी को देखकर गाड़ी की उस रफ्तार को बहुत तेज बताएगा जबकि 120 किलोमीटर की रफ्तार से चल रही गाड़ी में बैठे व्यक्ति को उसकी रफ्तार बहुत कम लगेगी। एल्बर्ट आइंस्टाइन को अपने इसी सापेक्षता के सिद्धान्त थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के कारण ही एक विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक माना जाता है ।

विज्ञान- पर एक नई दृष्टि

आइजक न्यूटन भी एक महान वैज्ञानिक थे। वह आइंस्टाइन से पहले हुए थे। उन्होंने कहा है कि समय (time) हमेशा एक जैसा रहता है।

आइंस्टाइन ने अपने सापेक्षत्व सिद्धान्त द्वारा सिद्ध कर दिया कि समय भी अन्य दूसरी वस्तुओं के सापेक्ष है । उसके इस सिद्धान्त ने समय अंतरिक्ष गति और गुरूत्वाकर्षण के नए विचारों के द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही बदल दिया। इस सिद्धान्त पर आधारित आइंस्टाइन के प्रसिद्ध समीकरण ई = एम सी^2 (E=MC^2) के कारण ही परमाणु बम बन सका।

अपने एक शोधपत्र में आइंस्टाइन ने कहा है कि रोशनी को हम छोटे-छोटे बिन्दुओं की एक धारा कह सकते हैं। इसी के कारण विधुत नेत्र की बुनियाद रखी गई। इसी के कारण ध्वनि चलचित्र टॉकी' टेलीविजन तथा अन्य अनुसंधान कार्य संभव हुए। आइंस्टाइन को अपनी इसी खोज के करण भौतिकी के विश्व प्रसिद्ध नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। सारा संसार आइंस्टाइन की प्रशंसा करने लगा। जगह-जगह सम्मान-समारोह आयोजित किए गए। लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी वह हमेशा नम्र बने रहे। वह सभी मनुष्यों को बराबर समझते थे। किसी देश के राष्ट्रपति और उनकी प्रयोगशाला की सफाई करने वाली से दोनों को वह बराबर इज्जत देते थे.। यही सच्ची महानता है। आइंस्टाइन विश्व शान्ति और समानता में विश्वास रखते थे तथा महात्मा गांधी को इन्हीं गुणों के कारण महान् पुरूष मानते थे।

प्राय: जब तुम अपनी क्या में अध्यापक की बात सुन रहे होते हो तो कभी तुम्हारा' ध्यान उस पर न हो। इसके कई कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि दूसरे बच्चे बातें कर रहे ही या अध्यापक द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय-में तुम्हारी रुचि न हो जिससे तुम्हारा ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाता हो । लेकिन आइंस्टाइन में अपना ध्यानकेन्द्रित करने की बहुत शक्ति थी।. वह विषय में खूब रूचि लेकर पढ़ते. और हमेशा हर जगह अपने काम के बारे में ही सोचते रहते। इसी के सम्बन्ध में एक दो उदाहरण भी प्रसिद्ध है। एक बार आइंस्टाइन एक पुल पर खड़े अपने एक मित्र का इन्तजार कर रहे थे। उनके मित्र को वहां आने में देर हो गई थी। कुछ देर बाद मित्र ने आकर उनसे क्षमा मांगते हुए कहा, एल्वर्ट मुझे दुःख है कि तुम्हें मेरा इन्तजार करना पड़ा। ''

लेकिन आइंस्टाइन ने उत्तर दिया, '' इसमें क्षमा मांगने की क्या बात है मित्र? मैं तो अपना काम कर रहा था। मैं अपना काम कहीं भी कर सकता हूं - एक पुल पर स्नानघर में या भोजन करते समय। ''

इसी तरह का एक दूसरा उदाहरण यह भी है :

एक दिन आइंस्टाइन अपने घर में स्नान करने स्नानघर में गए। जब उन्हें वहां बहुत देर हो गई तब उनकी बहन माजा सोचने लगी कि अभी तक एल्बर्ट स्नानघर से बाहर क्यों नहीं आया। वह अनिष्ट की आशंका से डर गई। घबरा कर उसने स्नानघर का दरवाजा खटखटाया। स्नानघर से बाहर निकलते हुए उन्होंने अपनी बहन माजा से कहा, मुझे माफ करना माजा बहन। मैं अन्दर एक समस्या का हल खोज रहा था और मुझे लगा कि में अपनी प्रयोगशाला में ही बैठा हूं। ''

अपनी खोजों के कारण आइंस्टाइन इतने प्रसिद्ध हो गए कि बहुत से वैज्ञानिक शोध-केन्द्र उनका नाम अपने नाम के साथ जोड़ने का प्रयत्न करने लगे। जर्मनी के कैसर विल्हम ने एक वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया था। ' क्रैसर' जर्मन भाषा में ' बादशाह' को कहते हैं। आइंस्टाइन को इस अनुसंधान केन्द्र में काम करने का निमंत्रण भी दिया गया था।

अमरीका में नया जीवन

जर्मनी में कुछ वर्ष बाद हिटलर बहुत ताकतवर राजनेता हो गया। वह यहूदियों से नफरत करता था। आइंस्टाइन एक यहूदी थे इसलिए भविष्य की आशंका को देखते हुए उन्होंने जर्मनी छोड़ने का विचार किया। संयुक्त राज्य अमरीका ने आइंस्टाइन को अपने यहां रहने का निमंत्रण दिया और सन 1933 में उन्होंने जर्मनी छोड़ दिया।

आइंस्टाइन जब जहाज से उतरे तब बहुत से फोटोग्राफरों और संवाददाताओं ने उन्हें घेर लिया। लेकिन आइंस्टाइन ने स्वयं को इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं समझा। उन्होंने हंसी-हंसी में कहा न्यूयार्क की महिलाएं हर वर्ष कुछ नई वेशभूषा पसन्द करती है इस वर्ष यह फैशन सापेक्षत्व है। ०

आइंस्टाइन ने कभी भी अपनी प्रसिद्धि का बखान नहीं किया। उसने अपने नाम का इस्तेमाल शोषितों और निराश्रितों की भलाई और शान्ति के लिए किया। लेखक शिक्षाविद, वैज्ञानिक, कलाकार और अभिनेता समाज में व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करते हैं और समाज का मार्गदर्शन करते हैं। समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी ज्यादा होती है और वे चुप नहीं बैठ सकते। माना कि आइंस्टाइन एक शान्तिप्रिय व्यक्ति थे और स्वभाव से अपने में ही सीमित रहते थे पर वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति खामोश नहीं रहे। वह जानते थे कि एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक होने के कारण लोग उनकी बात सुनेंगे और उस पर ध्यान देंगे। इसीलिए उन्होंने अपनी प्रतिभा का भरपूर उठाया और इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत व्यक्तियों की सहायता हो पाई।

आइंस्टाइन के मन में महात्मा गांधी के प्रति अपार आदर था। वह जानते थे कि महात्मा गांधी के सामने अंग्रेजी हुकूमत झुकी और भारत स्वतंत्र हुआ है।

पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने जब आइंस्टाइन से भेंट की तब उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए अहिंसा और शान्ति के मार्ग की बहुत प्रशंसा की। उनका विचार था कि जब राष्ट्र आपस में प्रतिस्पर्धा करेंगे तो उसका नतीजा युद्ध होगा। अपने सम्पूर्ण जीवन में आइंस्टाइन विश्वशान्ति प्रेम और सहिष्णुता के लिए कार्य करते ' रहे।

लेकिन जीवन भर आइंस्टाइन को एक बात का दुःख बना रहा। उनके वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण बाद में वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का आविष्कार किया। चूंकि उनकी खोज ने ही अन्य वैज्ञानिकों को परमाणु बम बनाने को प्रेरित किया था अत: आइंस्टाइन को परमाणु बम का जन्मदाता भी कहा जाने लगा। लेकिन जब द्वितीय विश्व युद्ध में जापान देश के दो नगरों हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम गिराए गये और ये नगर बिलकुल नष्ट हो गये तब आइंस्टाइन को बहुत दुःख हुआ। इस भयानक विनाशलीला का दृश्य जीवन भर उनके दिमाग से नहीं निकल पाया। उन्होंने मानवता की भलाई, विश्वशान्ति और भाईचारे के लिए अधिक काम करना प्रारम्भ किया।

एल्बर्ट फिर भी अकेला

आइंस्टाइन ने मानवता की भलाई और मनुष्य का जीवन अधिक सफल बुनाने के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन फिर भी वह किसी के घनिष्ट मित्र नहीं हो सके। उन्होंने स्वयं एक बार अपने बारे में यह कहा है कि 'वह तो. भीड़ में अकेले ही व्यक्ति है। वह किसी समूह का हिस्सा नहीं हो सकते।

उनका यह विश्वास था कि मनुष्य को स्वयं की खुशी और प्रसन्नता के लिए अन्य मनुष्यों तथा वस्तुओं से ज्यादा नहीं जुड़ना चाहिएं.। उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर कार्य करते रहना चाहिए। आइंस्टाइन का लक्ष्य हमेशा इस सृष्टि को जानने का रहा। उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया और अपनी वैज्ञानिक खोजों से समस्त प्राणियों को आश्चर्यचकित किया। उनका मत था कि जब मनुष्य में कुछ नया करने की ललक होगी तभी वह कला और विज्ञान की गहराइयों में डूबेगा और उनका पता लगायेगा।

आइंस्टाइन के कार्यों ने विश्व में वैज्ञानिक शोध के बन्द द्वार खोल दिये। वैज्ञानिकों को नई-नई खोज करने को प्रेरित किया और उन्हें अपने मार्ग पर चलने की प्ररेणा से।

एल्बर्ट आइंस्टाइन हमेशा बच्चों को बहुत प्यार करते थे । वह बच्चों की उतनी ही इज्जत करते जितनी बड़े व्यक्तियों, जैसे राष्ट्रपति या अन्य महान व्यक्तियों की। वह बच्चों से बड़े प्यार से बातें करते। उनकी बात सुनते और अपनी बात कहते। प्रिसंटन के शान्त नगर में वह हर रोल अपने घर से कार्यालय की ओर घूमते-घूमते जाते और लोग उन्हें खामोश आते-जाते देखते रहते। रास्ते में वह बच्चों का अभिवादन करते और शिशुओं की ' बा-बा' का अनुकरण करते। वह बच्चों से हंसी-ठिठोली भी करते और तरह-तरह की हरकतों से उन्हें हंसाते।

आइंस्टाइन मोजे नहीं पहनते थे।? दिन एक बालिका ने आइंस्टाइन को अगाह किया कि मोजे नहीं पहनने से ठंड लग सकती है। वह बीमार पड़ सकते हैं

और तब उनकी मां उन्हें डाटेंगी। अइंस्टाइन को बच्चों की ऐसी बातें बहुत अच्छी लगती। एक बार उन्होंने बच्चों को लिखा -

बच्चों, यह ध्यान में रखो कि तुम अपने स्कूल में जो नई-नई बातें सीखते हो वे कई पीढ़ियों की देन हैं। ये सब तुम्हें इसलिए बताई गई है ताकि तुम इन्हें समझो और ढंग से संजोकर रखी। इनका सम्मान करो तथा इनमें कुछ और ' अधिक जोड़ो। '

आइंस्टाइन को उनके पहले की पीढ़ी के वैज्ञानिकों ने जो भी दिया उसका उन्होंने सम्मान किया। उसमें अपने वैज्ञानिक आविष्कारों को जोड़ा तथा आने वाली पीढ़ी को सौंपा। अब इस ज्ञान को और आगे बढ़ाने की बारी हमारी है।

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