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जिज्ञासाओं का शमन करें वरना अंधकार बना रहेगा

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डॉ. दीपक आचार्य

 

बहुत सारे लोग सब कुछ होते हुए भी मायूस रहते हैं, उनके चेहरों से मुस्कान गायब रहती है और एक अजीब तरह की मनहूसियत हमेशा छायी रहती है। यह उदासी और बुझे हुए चेहरे न सिर्फ कार्यस्थलों और परिवेशीय भ्रमण के दौरान नज़र आते हैं बल्कि घर-परिवार में भी यों ही बने रहते हैं जबकि इतने अधिक पारिवारिक माहौल और उल्लास के क्षण इनके सामने बने रहते हैं।

खूब सारे लोग इस अजीब तरह की मानसिकता में जी रहे अपने आप में ही ऎसे खोये हुए रहते हैं जैसे किसी ने इन्हें ख़्वाबों में नज़रबंद ही कर दिया हो।  इस किस्म के लोग जीवन में किसी भी क्षण बिन्दास नहीं रह सकते। इन लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये जब कभी मुस्कुरा भी देते हैं तो लोग इसके कई-कई अर्थ निकालते हुए मुस्कान के रहस्यों पर शोध करने लग जाते हैं। आम तौर पर षड़यंत्रकारी और अपराधी लोग जीवन में बहुत कम हँस पाते हैं।

बहुत सारे लोग ऎसे भी हैं जिन्हें किसी ने कभी हँसमुख या बेफिक्र नहीं देखा।  भगवान ने इंसान को खूब  सारा दिया है। इतना सारा कि वह देख-देख कर ही प्रसन्न रह सकता है, उपभोग के उपरान्त की तो बात कुछ और ही है। 

भरा-पूरा कुटुम्ब, समाज और क्षेत्र है जिसमें फुलवारियों की तरह इन्द्रधनुषी लोग हैं और नित परिवर्तनकारी सुनहरे दृश्य, जो आँखों से लेकर तमाम इन्दि्रयों तक को सुख देने वाले हैं। विचारों के झोंके आते-जाते रहते हैं, नवीन संदेशों से भरे हुए बादलों को ताजगी भरी हवाएँ जाने कहाँ से कहाँ तक दौड़ा-दौड़ा कर ले जाती हैं और हममें से ही कुछ लोग हैं जो सब कुछ होते हुए भी हमेशा दुःखी, संतप्त और सशंकित रहते हैं।

इन सबका मूल कारण आदमी के भीतर उमड़ने-घुमड़ने वाले प्रश्न और जिज्ञासाओं का समंदर है। बहुत सी बातें हैं जिनके बारे में आदमी जानना, समझना और देखना चाहता है, इनकी उत्पत्ति के कारणों को जानना चाहता है और अपने आप में हर वस्तुस्थिति से स्पष्ट होना चाहता है। लेकिन जब वह इसे नहीं जान पाता है, उसे अपने प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होने का मौका नहीं मिल पाता है अथवा जिज्ञासाओं के शमन का अवसर नहीं मिल पाता, तब वह भीतर ही भीतर घुटता रहता है।

कई बार अज्ञात आशंकाओं, भ्रमों और शंकाओं को पालना बहुत से लोगों की आदत बन जाती है और यही आदत उन्हें किसी भी क्षण नकारात्मक सोचने से मुक्त नहीं रखती। हर क्षण ये लोग कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं।

दिमाग और दिल में जमा होते रहने वाले अनसुलझे प्रश्न और समाधानहीन जिज्ञासाओं की वजह से आदमी अपने आप में ऎसा संग्रहालय हो जाता है जिसमें वह सब कुछ है जो अंधेरे कोनों में दुबका या कैद रखा है।  हमारे मन के भीतर का यह अंधकार ही जितना अधिक परिपक्वावस्था प्राप्त करता जाता है उतना हमारे आनंद को छीनता हुए चेहरे का ओज-तेज खत्म कर डालता है और हम सभी लोग अजीब सी मुर्दानगी और मायूसी में जीने के आदी हो जाते हैं।

यह वह अवस्था है जब हमारे भीतर जानने की तीव्रतर जिज्ञासा होती है लेकिन इनके समाधान का कोई अवसर नहीं है। हमारे जो प्रश्न आज हैं उनके उत्तर गूगल बाबा या नेट पर कहीं नहीं हैं। इनका उत्तर या तो पुरातन ग्रंथों, उपनिषदों, वेदों और बोध कथाओं से भरे ग्रंथों का नियमित स्वाध्याय दे सकता है अथवा किसी का संचित अनुभव। और ये दोनों ही बातें हमारे जीवन से लगभग गायब ही हो चुकी हैं।

इंसान में अब एक अजीब तरह का एकाकीपन भी आ गया है जहाँ उसे किसी से मिलना-जुलना और अपनी बात शेयर करना पसंद नहीं है। मित्रता के पैमाने भी बदलते जा रहे हैं। बिना स्वार्थ के हम मुँह तक नहीं खोलते और न किसी की ओर देखना पसंद करते हैं।

यही वजह है कि हमारे भीतर प्रश्नों और जिज्ञासाओं का भण्डार निरन्तर जमा होता चला जाता है और इनका संतोषजनक समाधान हमें प्राप्त नहीं होता।  इंसान के जीवन में यदि कहीं कोई अंधकार का सर्जक है तो वे बातें ही हैं जिनके बारे में उसे पता नहीं है अथवा उनके बारे में कहीं से कोई सटीक या संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।

जब तक यह अंधकार रहता है तब तक कोई भी इंसान बिन्दास, सुखी और मस्त नहीं रह सकता। आज सर्वाधिक आवश्यकता हमारे भीतर के अंधकार को दूर करने की है। जिस अनुपात में हमारे भीतर के प्रश्नों का उत्तर मिलना आरंभ हो जाएगा, जिज्ञासाओं का शमन होता चला जाएगा, उस अनुपात में हमारे भीतर से अंधकार समाप्त होकर रोशनी का दरिया भरता जाएगा।

जब हम सभी प्रश्नों का और समस्त जिज्ञासाओं का समाधान भी पा चुके होते हैं तब की स्थिति हमारे लिए हर प्रकार से मौलिक लावण्य से परिपूर्ण होती है। इसका सीधा सा प्रभाव हमारी वाणी और चेहरे पर पड़ता है जिसमें ओज और तेज आता है तथा जो हमारे सामने आता है वह ख्िंाचा चला आता है।

यह आकर्षण पैदा करना ही अपने आप में बुद्धत्व है और यहीं से सत् चित् और आनंद की शाश्वत भावभूमि का निर्माण होता है जो मनुष्य के रूप में हमें परिपूर्णता प्रदान करता है।  हमारे पास पूरी दुनिया का वैभव हो लेकिन यह बुद्धत्व न हो, तो सारा संसार बेकार है। दूसरी ओर भौतिक वैभव का महा अकाल हो, जिन्दगी सामान्य सी हो लेकिन जीवन जिज्ञासा और प्रश्नों से एकदम मुक्त है तो कुछ न होते हुए भी महा आनंद की भावभूमि में विचरण करते हैं।

आईये आज ही से प्रण लें कि जो जिज्ञासाएं और प्रश्न हैं, उनको बाहर निकालें और हर प्रकार के प्रश्नों से मुक्त होकर जीवन का असली आनंद प्राप्त करें। यही मनः सौन्दर्य अपने आप में सम्पूर्ण जीवन सौंदर्य का जनक है जिसके आगे सारे के सारे ब्यूटी पॉर्लर फेल हैं।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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