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सामाजिक न्याय और मानव-अधिकार'

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डॉ0 प्रतिभा

मनुष्य को 'सामाजिक प्राणी' के रूप में देखे जाने की पारम्परिक अवधारणा के पीछे मानवीय जीवन में सामाजिकता और परस्पर अन्योन्याश्रिता के महत्व का बड़ा योगदान है पशु-समाज के विपरीत मानवीय समाज के संचालन में जैविक प्रेरणाओं से कहीं अधिक भूमिका सामाजिक-सांस्कृतिक प्रेरणाओं की होती है। इसी कारण मानवीय न्याय की प्रकृति में सबल द्वारा निर्बल के उपभोग के स्थान पर सबल द्वारा निर्बल की रक्षा तथा सबल निर्बल की रक्षा का भाव निहित है। वर्तमान में कल्याणकारी राज्य, सुरक्षात्मक प्रावधान तथा मानव - अधिकार जैसी अवधारणाएं न्याय की इसी प्रकृति से उपजी हैं। भारतीय परम्परा में न्याय की संरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है। स्वतंत्र भारत में नयाय को संविधान द्वारा संस्थापित एवं संरक्षित किया गया है।

समाजिक न्याय को मानव के समग्र एवं प्रत्येक सामाजिक संदर्भ तथा व्यक्ति और समाज की प्रत्येक पारस्परिकता को न्यायपूर्ण बनाने के तंत्र के रूप में परिभाषित किया जाता है। 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'मानवाधिकार घोषणा' से प्रारम्भ होकर सामाजिक न्याय आज प्रत्येक राष्ट्र में लोकतंत्र तथा कल्याणकारी विकास का प्रतीक बन गया है। जहां तक सामाजिक न्याय के निर्धारक मूलभूत तत्वों का प्रश्न है तो स्वतंत्रता और समानता का नाम सर्वप्रथम लिया जा सकता है।

व्यक्ति को अस्तित्व रक्षा से विकास की ओर ले जाने वाली स्वतंत्रता मात्र विचार, वाक् विश्वास की स्वतंत्रता न होकर प्रत्येक प्रकार के शोषण तथा अन्याय से भी स्वतंत्रता है। इसी प्रकार समानता के व्यापक अर्थ में अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में दूसरे के लक्ष्यों को भी समाहित किया जाना सम्मिलित है। इस प्रकार सामाजिक न्याय का यह भी अर्थ है कि समाज के सभी व्यक्तियों को अपने जीवन अस्तित्व को बनाए रखने तथा व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास हेतु अवसर की समानता हो। जीवित रहने की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के अवसर जुटाने के साथ ही मनुष्य के विकास के पर्याप्त अवसर जुटाना भी सामाजिक न्याय का तकाजा हैं, क्योंकि विकास के अभाव में जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं है। इसी कारण कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षात्मक प्रावधान भी सामाजिक न्याय के ही दायरे में आते हैं।

तात्पर्य यह है कि सामाजिक न्याय के लिए स्वतंत्रता तथा समानता दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं। जहां स्वतंत्रता व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियों के विकास के लिए आवश्यक है, वहीं समानता के अभाव में समाज में कुछ व्यक्ति तो वर्चस्व कायम कर लेते हैं, और शेष बहुत पीछे रह जाते हैं और यह स्थिति व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए अत्यंत घातक होती हैं। इस प्रकार सामाजिक न्याय के विचार ने आधुनिक युग के व्यक्ति की स्वतंत्रता व समानता के विविध प्रावधानों के साथ वर्ण, लिंग जन्मजात भेदभाव की समाप्ति तथा शोषण व बेगार से मुक्ति पर जोर दिया हैं।

सामाजिक न्याय और मानव-अधिकार

परमपिता द्वारा सभी को समान रूप से प्रदान किए गए मानवमात्र के मूलभूत अथवा स्वाभाविक अधिकार अर्थात् मानव अधिकार में वैयक्तिक पक्ष का महत्व अधिक है। इन अधिकारों के माध्यम से समूह के अतिक्रमण से व्यक्ति की रक्षा होती है और व्यक्ति को अपने विकास हेतु उपयुक्त अवसर व स्वतंत्रता प्राप्त होती है। जबकि सामाजिक न्याय की धारणा में वैयक्तिक पक्ष की तुलना में सामूहिक पक्ष पर अधिक जोर दिया जाता- और सामाजिक न्याय की अवहेलना की दशा में मानव अधिकारों को सीमित भी कर दिया जाता है।

इस प्रकार सामाजिक न्याय की प्राप्ति में मानव अधिकार जरूरी हैं, किंतु यदि कोई व्यक्ति अपने अस्तित्व अर्थात जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है तो स्वतंत्रता, समानता और शोषण के विरूद्ध अधिकार से उसे कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि जीवन की रक्षा तथा भरण-पोषण के लिए वह दूसरों के हाथों स्वयं को शोषित होने देने को मजबूर होगा। अतः मानव के अस्तित्व एवं विकास के लिए इन दोनों के मध्य सार्थक तादात्म्य अनिवार्य है।

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत से सम्बद्ध पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, नगालैंड तथा अरूणाचल प्रदेश आदि राज्यों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय की व्याख्या के प्रसंग में यह कथन आवश्यक हो जाता है कि पूर्वी भारत तो मूख्य भूभाग से संपृक्त है, किंतु देश के सुदूर पूर्व में उत्तर की ओर स्थित पूर्वोत्तर प्रदेश भौगोलिक अलगाव, दुरूहता, दुष्कर संपर्क तथा प्रचारात्मक अभाव के कारण अभी भी देश के मुख्य भू-भाग में लगभग अपरिचित है। वहां प्रायः मात्र असम को ही पूरे पूर्वोतर के पर्याय के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में उग्रवाद, प्रशासनिक उदासीनता और गतिहीनता से त्रस्त यह क्षेत्र अपने विकास का पर्याय बनने का इच्छुक है।

इन प्रदेशों की सामाजिक न्याय से जुड़ी समस्याएं अथवा चुनौतियाँ राष्ट्रीय चुनौतियों से बहुत भिन्न नहीं हैं, तथापि स्थानीयता से उपजी कतिपय विशिष्ट चुनौतियों के विषय में बात करना आवश्यक हो जाता है। इनमें कुछ निम्नवत हैः- गरीबी और भुखमरी :-

मानवीय गरिमा और आत्म सम्मान की घातक होने के कारण गरीबी मानव- अधिकारों के हनन् का सबसे बड़ा कारण है। जहाँ भूख है, वहाँ शान्ति तो हो ही नहीं सकती। अतः गरीबी को खत्म कर मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराये बिना मानव- अधिकार के लिए लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित सभी विकासशील देशों में जनसंख्या का 1/5 भाग रात को भूखा सोता है, 1/4 को पीने के पानी सहित मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं तथा कुल जनसंख्या का 1/3 भीषण गरीबी का जीवन जी रहे हैं। इंडिया टुडे (26.सितंबर.2007) की एक रिपोर्ट के अनुसार 1 अरब से अधिक की भारतीय जनसंख्या में से 30.1 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्य भी इसके अपवाद नहीं हैं। दशकों से इन राज्यों में अर्थिक विकास दरमंद रही है, जिससे बेरोजगारी बढ़ी मानवीय शक्ति की बरबादी हुई और उग्रवादी समूहों में भर्तियाँ बढ़ी। पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम मामला हो, अथवा उड़ीसा के गाँवों में भूख से त्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्या के मामले, हमें यह सोचने के लिए विवश होना पड़ा है कि नई सामाजिक व्यवस्था निर्मित किए बिना भारत की बहुसंख्यक जनता के लिए मौलिक अधिकारों का कोई अर्थ ही नहीं है।

स्त्रियों, बच्चों तथा कमजोर वर्गों से सम्बद्ध चुनौतियाँ स्त्री लिंगभेद :-

विविध कानूनों, संविधान संशोधनों, उच्चतम न्यायालय के दिशा- निर्देशक निर्णयों, पंचवर्षीय योजनाओं तथा विविध सम्मेलनों के द्वारा स्त्री उत्थान के प्रयास हो रहे हैं, तथापि भ्रूणहत्या, पोषण, शिक्षा और नौकरी में भेदभाव तथा सामान्य शोषण से अनवरत भेदभावों की श्रृंखला भी जारी है।

दैहिक शोषण के अवैध व्यापार के लिए आंध्र और कर्नाटक के बाद पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। और वहाँ की राजधानी कोलकाता इस व्यापार का स्वर्ग, जहाँ 700 रू0 से एक लाख रू0 के बीच बिकती बच्चियाँ दिखाई दे जाती है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर में असम में प्रतिवर्ष स्त्रियाँ तथा 200 बच्चियाँ दैहिक शोषण की इस आग में भस्म हो जाती हैं।

घरेलू और बाहरी मोर्चों पर एक समान सक्रिय स्त्रियों के बाहुल्य से नगालैंड और अरूणाचल प्रदेश के विषय में प्रायः यह धारणा है कि यहाँ स्त्रियाँ पर्याप्त बेहतर स्थिति में हैं। यह धारणा कुछ हद तक दहेज तथा दुल्हन दाह के न होने सही भी प्रतीत होती है, परंतु नेशनल कमीशन फॉर वीमैन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार यहाँ महिलाओं, विशेष रूप से घरेलू महिलाओं के विरूद्ध हिंसा में तेजी से वृद्धि हो रही है।

बाल श्रम :-

इसी प्रकार हमारे समाज के सबसे कमजोर, संवेदनशील, नाजुक और बेआवाज सदस्य बच्चों के प्रति बरती जा रही उदासीनता पर्याय चिन्तनीय है। उनके पोषण और स्वास्थ्य की शोचनीय दशा, शारीरिक- मानसिक शोषण तथा सबसे बढ़कर बाल-मजदूरी की कड़वी हकीकत। पूरे भारत में अंधेरे सीलन भरे कमरों में अस्वाथ्यकर परिस्थितियों में आधे पेट भोजन तथा अपर्याप्त कपड़ों में 20.20 घंटे काम करते करीब 15 करोड़ बच्चे दासता की जंजीरों में जकड़े है।

पश्चिम बंगाल में 5-14 साल की वय के 11: बच्चे बालश्रम के शिकंजे में हैं। राज्य स्तर पर कुल श्रम का 31: बच्चों के द्वारा किया जाता है जो राष्ट्रीय औसत (2.6:) से अधिक है। यहां बड़ी संख्या में छोटे बच्चे ईंट उद्योग, बीड़ी उद्योग तथा कृषि -कार्यों के अतिरिक्त कार्यालयों और दुकानों में भी श्रम रत हैं। यहां तक कि सफाई और कूड़ा उठाने जैसे कार्य भी इन बच्चों के जिम्मे है। चिन्तनीय तथ्य यह है कि ये बच्चे लैगिंक शोषण के भी आसान शिकार हो रहे हैं।

इस संदर्भ में चुनौतियां मात्र बाल-श्रम को रोकने, प्रतिबंधित करने, तथा पुनर्वास की ही नही है; अपितु कानूनी पहल के साथ-साथ सामाजिक जागृति पैदा करने की भी है।

स्वास्थ्य (एड्स) :-

स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता, विशेषतः गरीब-पीड़ित वर्गों को उनके मानव-अधिकारों से वंचित करती है। इस क्षेत्र में एड्स सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। नगालैण्ड में एड्स रोगियों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी दर और एड्स रोग से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती है कि यह रोग संक्रमित समूहों से आम जनता -विशेषकर ग्राम्य जनता में फैल रहा है। दूसरे एड्स से जुड़े चारित्रिक कलंक अथवा सामाजिक बाहिष्कार ने एड्स रोगियों के अधिकारों के हनन में मुख्य भूमिका निभायी है।

आतंकवादः-

वैसे तो आतंकवाद पूरे विश्व के लिए चुनौती है, परंतु दशकों से इसकी विभीषिका झेल रहे भारत से बेहतर यह बात कौन जान सकता है कि आंतकवाद से सीधी चोट मानव अधिकार की मूल भावना को ही लगती है, और इसका सबसे अधिक प्रभाव निर्दोषों पर पड़ता है।

पूर्वोत्तर से स्वतंत्रता के पश्चात् ही अलगाववादी आन्दोलनों की शुरूआत हो गयी। पहले नगा लोगों ने आजाद होने की घोषणा की, फिर 60 के दशक में मिजो आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। त्रिपुरा और असम में भी आन्दोलनों ने जोर पकड़ लिया। वर्तमान में अरूणाचल प्रदेश के तीन जिले चारों तरफ, चांगलाग तथा लोहित आंतकवादी गतिविधियों से त्रस्त हैं। नगालैंड में एन.एस.सी.एम. के दो धड़ों (जी.एम) तथा (के.) के मध्य आपसी प्रतिद्वन्द्विता में भी जनता सैंडविच बनी है।

ये आन्दोलन मूल रूप से अभावों से उपजे थे। दशकों से अर्थिक विकास की मंद गति और बढ़ती बेरोजगारी से नष्ट मानव-शक्ति ने अलगाववादी समूहों में राह खोजी। आगे चलकर ये आन्दोलन बांग्लादेश से अवैध आगमन के विरोध और स्थानीय मूल-निवासियों के अधिकारों की रक्षा की मांग में बदल गए।

निस्संदेह सामाजिक न्याय तथा मानव अधिकारों का आदर करने वाला व्यक्ति आंतकवाद का पोषण कर ही नहीं सकता। और एक निर्दोष नागरिक के मानव अधिकारों का हनन् करने वाले आतंकवादी को सजा तो मिलनी ही चाहिए, पर एक मानव होने के नाते उसके भी मानव अधिकार हैं, जिनका हनन् कानून व न्याय की परिधि में ही हो, एक आनुपातिक संतुलन लिए हुए हो, यह ध्यान रखना भी अत्यावश्यक है।

हम आए दिन फर्जी मुठभेड़, हिरासत में यातना, हिरासत में मौत और अवैध हिरासत की बातें सुनते हैं। निस्संदेह इससे मानवता की अंतरात्मा पर चोट लगती है और पुलिस तथा सुरक्षा- बलों द्वारा स्वमूल्यांकन से इसका हल निकल सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का कथन डी.के.बसु केस में ''हिरासत में यातना मानव की गरिमा पर क्रूरतम हमला है और जब कभी मानव की गरिमा घायल एवं विखंडित होती है, तब सभ्यता एक कदम पीछे चली जाती है, और ऐसे हर वक्त पर मानवता का ध्वज आधा झुक जाना चाहिए।''

आप्रवासन (घुसपैठ)

अरूणाचल तथा नगालैंड की एक बड़ी समस्या बांग्लादेश के संदिग्ध नागरिकों की अवैध घुसपैठ भी है। अरूणाचल में ये घुसपैठिये असम से होते हुए आंतरिक रेखा पार कर बस गए हैं। इसी प्रकार नगालैंड भी अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों के निशाने पर हैं, जो मणिपुर तथा असम में के सीमावर्ती इलाकों से छिप-छिप कर नगालैंड असम में प्रवेश करते रहे हैं।

आप्रवासन से यहाँ के मूल निवासियों का सामजिक और अर्थिक जीवन प्रभावित हो रहा है। विशेषतः विद्यार्थियों और युवाओं को यह सामजिक तनाव उग्रवादी समूहों में भरती होने को प्रेरित कर रहा है।

धर्मान्तरण :-

पिछली एक सदी में पूर्वोत्तर के धार्मिक परिदृश्य में असाधारण परिवर्तन देखने को मिला है। धर्मान्तरण की एक तीव्र गति ईसाइयत की ओर हुई। कुछ राज्यों में तो पूरी की पूरी जनसंख्या का ही धर्मान्तरण हो गया।

आकड़ों की दृष्टि से देखें तो नगालैण्ड में 1901 में ईसाई जनसंख्या यदि 0.59: थी तो वह 1951 में बढ़कर 46.05 और 1991 में 87.47: हो गयी। क्षेत्र में कमोबेश सभी राज्यों में धर्मान्तरण की यही तस्वीर है।

निश्चित रूप से प्रत्येक व्यक्ति के धार्मिक अधिकार हैं, जिनके अनुसार वह किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है, परंतु भूखी जनता को रोटी का टुकड़ा डालकर, अनपढ़ को शिक्षा को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सांस्कृतिक दोहन का औचित्य कदापि सिद्ध नहीं किया जा सकता तथा स्थानीय जनजातियों की लोक संस्कृति को भ्रष्ट रूप में प्रस्तुत करके धर्म-परिवर्तन किया जाना निस्संदेह समस्या अथवा चुनौती के रूप में लिया जाना चाहिए।

अब हमारे और आपके लिए प्रश्न यह कि इन चुनौतियों का हल क्या हो ? सबसे महत्त्वपूर्ण हल भारतीयता अैर भारतीय संस्कृति से ही निकलकर आता है, कि प्रत्येक व्यक्ति अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों के प्रति भी सजग हो तो प्रत्येक व्यक्ति जब परिवार और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करेगा, तो परिवार और समाज उसके अधिकारों की रक्षा का दायित्व निभाएंगे, और इस स्थिति में अधिकारों के हनन् की स्थिति ही उत्पन्न नहीं होगा। हमें जो चाहिए- दूसरों को भी देने को तैयार-समान्तर, स्वतंत्रता गीता कहती है :-

आत्मौपम्येन सर्वत्र सम पश्यति यो अर्जुन

सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमोमतः

तो वहीं महाभारत कहता है :-

जो स्वयं जीवित रहना चाहता है, वह दूसरों के प्राण कैसे ले सकता है ? अपने लिए जो-जो सुविधा मनुष्य चाहता है, वही दूसरों को भी सुलभ कराने की बात हमें सोचनी चाहिए। दूसरे व्यष्टि के साथ-साथ समष्टि।

अर्थात् मानव अधिकार के साथ-साथ सामाजिक न्याय का भी ध्यान रखा जाए तो स्थितियां स्वयमेव सहज और सरल हो सकेगी, संदेह नहीं।

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1. इंडिया टुडे (अंग्रेजी) सितंबर 24, 2007।

2. इंडिया टुडे (हिंदी) 26 सितंबर 2007 ।

3. सामाजिक न्याय एवं दलित संघर्ष डां0 रामगोपाल सिंह राज. हिंदी ग्रंथ अकादमी, जयपुर।

4. सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय डॉ0 रामगोपाल चतुर्वेदी अनुसंधान व विशद अध्ययन संस्थान जयपुर।

5. इन्टरनेट।

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से साभार)

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