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सूचना के अधिकार का भविष्य : एक मूल्यांकन'

 

डॉ. प्रतिभा

भिजन के हाथों से आमजन के हाथों में सत्ता सौंपने की दिशा में प्रथम पग है 'सूचना का अधिकार'। किसी प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव में सरकारी कार्यक्रमों के लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच सकेंगे। इस पारदर्शिता को लाने का सुगम मार्ग है 'सूचना का अधिकार'।

परंतु आश्चर्य का विषय है कि 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' अर्थात् अन्धकार से प्रकाश की यात्रा की कामना करने वाले भारत देश में नागरिको को अभिव्यक्ति और वाणी की स्वतंत्रता तो दी गयी है, किंतु जन-नीतियों तथा आय-व्यय के विवरण जानने का कोई कानूनी हक नहीं दिया गया। वस्तुतः 1923 के 'सरकारी गोपनीयता कानून' के कारण पूरी विकास प्रक्रिया गोपनीयता के एक आवरण में ढंकी थी और आम लोगों को प्रभावित करने वाली नीतियों के विषय में जानने का हक आम लोगों को ही नहीं था। आश्चर्यजनक रूप से औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही ये गोपनीयता आजादी के छः दशकों तक अबाध रूप से चलती रही। सरकारी कामकाज में खुलेपन के अभाव में लोक-अधिकारियों के कार्यों में जवाबदेही की कमी और अक्षमता के कारण सत्ता का दुरूपयोग होता रहा और जनता का धन जन-विकास के कार्यों से हटकर सरकारी अधिकारियों के व्यक्तिगत कार्यों में उपयोग होता रहा। परिणाम अविकास और गरीबी के रूप में सामने आया।

प्रायः संसद और विधानसभाओं इत्यादि में भ्रष्टाचार के सम्बद्ध पूछे जाने पर यह कह कर सूचनाएं नहीं दी जाती थी कि यह सूचना गोपनीय है और देशहित में उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। बेहद गोपनीय और अपारदर्शी तंत्र में भ्रष्टाचार पनपता ही है, क्योंकि भ्रष्टाचार और गोपनीयता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वर्तमान भारत में तो भ्रष्टाचार एक सामाजिक मूल्य के रूप में स्वीकृत हो गया है, जहाँ राजनेताओं,, अफसरों, उद्योगपतियों और अपराधियों के गठजोड़ से ऊपर से नीचे तक चलने वाला भ्रष्टाचार का दुष्चक्र समाज के संसाधनों का दुरूपयोग करता है। जो धन सार्वजनिक कार्यों में लगना चाहिए वह सत्तासीन लोगों की बंदरबाँट में समाप्त हो जाता है।

गोपनीयता की इस प्रवृत्ति और भष्टाचार के लिये समूचे तंत्र को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना का अधिकार अत्यंत कारगर हथियार है। तंत्र में पारदर्शिता होने पर भ्रष्टाचार के लिये उर्वर जमीन तलाशना अत्यन्त मुश्किल हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'न्यूज वीक' में प्रकाशित (1 जनवरी 1996) एक सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार पारदर्शिता के परिणामस्वरूप अपने नागरिकों को सूचना का अधिकार देने वाले देश सबसे कम भ्रष्ट हैं जबकि सूचना का अधिकार न देने वाले देश सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं।

सवाल करने और जवाब माँगने के इस अधिकार की आवाज बुलन्द करने वाले करीब 10 वर्षों के आन्दोलन के बाद भारत में सन् 2005 में केन्द्रीय स्तर पर सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और प्रशासन में जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला कानून (सूचना का अधिकार अधिनियम) लागू हुआ। लोक संस्थाओं के कामकाज के बारे में नागरिकों को जानकारी प्राप्त कराने के इस अधिकार के अन्तर्गत प्रभारी अधिकारियों को 30 दिन के भीतर तथा जीवन एवं स्वतंत्रता के मामले में 48 घंटे के भीतर आम नागरिकों के आवेदन पर वांछित दस्तावेज और प्रतिलिपियां उपलब्ध कराने का प्रावधान है। कोताही और शिथिलता बरतने वाले अधिकारी के विरूद्ध कठोर अनुशासनामक कार्यवाई करने का भी प्रावधान है।

दुनिया के अनेक देशों में सूचना के अधिकार से संबद्ध कानून है लेकिन भारत की खासियत यह है कि यहाँ इस अधिकार के लिये सर्वप्रथम निर्धन और अशिक्षित ग्रामीण जनता ने आवाज उठायी और बाद में जुझारू सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने इस आवाज में मिलाकर इसे और मजबूती तथा विश्वसनीयता प्रदान की। एक प्रकार से यह सरकार की ओर से कृपालु भेंट न होकर स्वयं उनके द्वारा ही अत्यंत श्रमपूर्वक तैयार किया गया सशक्त औजार है जिसके प्रयोग से वे सरकारी भ्रष्टाचार और नाइन्साफी पर रोक लगा सकते हैं।

निःसन्देह सूचना के इस अधिकार ने आम लोगों के इस संघर्ष को मजबूत आधार देते हुए सरकार पर नागरिकों का अधिकार बढ़ाया है और भारतीय लोकतंत्र को मजबूती की ओर अग्रसर किया है। अपने प्रारम्भिक दौर से ही इसकी गूँज पूरे भारत में सुनायी देने लगी है। राजस्थान में अरूणा राय के मजदूर किसान शक्ति संगठन ने ग्रामीण विकास कार्यों में मस्टर रोल और बिल-वाउचर की प्रतिलिपियाँ हासिल कर अकाल राहत कार्यों में घोटालों का पर्दाफाश तथा मुकाबला किया तो दिल्ली में इस अधिकार का प्रयोग करते हुए केजरीवाल और उनके 'परिवर्तन' संगठन ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में दशकों से चले आ रहे भ्रष्टाचार को जगजाहिर किया और पानी के निजीकरण को सफलता पूर्वक रोका। मुंबई के बुद्धिजीवी इस अधिकार के माध्यम से मुंबई नगर-निगम के ठेकों, निर्माण-कार्यों और भू-नीतियों में भ्रष्टाचार को जनता के सामने लाने में सफल रहे।

व्यक्तिगत रूप से भी अनेक मामलों में ग्रामीण विकास, सार्वजनिक वितरण, मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों तथा जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों, साम्प्रदायिक दंगों और समाज के वंचित-शोषित तबकों के विषय में इस अधिकार के माध्यम से अनेक प्रश्न सामने लाये गये। सारतः इस कानून के परिणामस्वरूप लोकसंस्थाएं ज्यादा, जवाबदेह हुईं और एक ओर इसने अधिकारपूर्ण नागरिक तो दूसरी ओर चौकन्नी, पारदर्शी, सक्षम, उत्तरदायी और जवाबदेह सरकार देने का काम किया है।

किंतु सूक्ष्म अवलोकन से सूचना के प्रदान और आदान दोनों ही स्तरों पर कुछ गुँजाइशें नजर आती हैं, जिन्हें चाहें तो एक एक्ट की कमी कह लें या हर परिस्थिति में रास्ते निकाल लेने की भारतीयों की मानसिकता। यथा प्रदाता के स्तर पर :-

० फरियादी को सूचना प्राप्त करने के लिये स्वयं संबद्ध लोकसंस्था तक जाकर आवेदन की औपचारिकता पूर्ण करनी होती है। आवेदन के संबंध में कागजी कार्रवाई भी बहुत ज्यादा है।

० चूँकि कानून में गोपनीयता की व्यवस्था नहीं है अतः पहचाने जाने और तत्संबंधी दुष्परिणामों के डर से बहुत लोग अभी भी इस अधिकार का प्रयोग करने से डरते हैं।

० अनेक प्रसंगों में सूचना पर होने वाले खर्च को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है। छत्तीसगढ़ में धान से संबद्ध सूचना के आवेदन पर किसान को सूचना प्रदान करने का कुल बिल रु0 1,82,2000/- प्रस्तुत किया गया। वहीं पर बिलासपुर में शिक्षकों की भर्ती के संबंध में पूछी गयी सूचना पर सूचना का कुल खर्च रु0 75,000/- प्रस्तुत किया गया।

० वांछित सूचनाएं सही-सही न दी जाकर गोलमोल तरीके से दी जाती है।

० सूचनाएं निर्धारित समय-सीमा में न दी जाकर टाली जाती है, जब तक प्रश्नकर्ता का धैर्य ही न जवाब देने लगे।

० अनेक प्रकरणों में तो सूचना एकदम ही उपलब्ध नहीं कराई जाती।

० आवेदकों की तेजी से बढ़ती संख्या के मद्देनजर भी विशेष प्रयास नहीं किये गये हैं, जिससे ढाँचे के चरमराने की आशंका उत्पन्न हो गयी है।

० कई बार सूचना-कार्य के लिये नियुक्त अधिकारी जवाब देने के कार्य के लिये अपने मुख्य कार्य की अवहेलना कर बैठते हैं क्योंकि उस कार्य की अनदेखी और उपेक्षा के लिये किसी सजा का प्रावधान नहीं है जबकि सूचना के अधिकार से संबद्ध मामलों में सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

अदाता के स्तर पर :-

अनेक बार सूचना के आकांक्षी ही इस कानून के दुरूपयोग की राह पकड़ते है। समर्थ तथा धनी लोग स्वयं के लिये निःशुल्क सूचनाएं प्राप्त करने हेतु गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे निःसन्देह 'सूचना का अधिकार' की भावना का हनन होता है।

तो सूचना का अधिकार का भविष्य और अधिक उज्वल हो, इसके लिये कुछ प्रयास किये जा सकते हैं, जैसे :-

० सर्वप्रथम सूचना देने की क्षमताओं का दुतरफा विस्तार हो। सूचना प्रदाता संस्थानों के स्तर पर- लोक अधिकारी एक विस्तृत 'सूचना प्रबंधन व्यवस्था' ;प्डैद्ध बनाएं, जिसमें आँकड़ों तथा सूचनाओं के संग्रहण और अद्यतन ;न्चकंजमद्ध की उचित व्यवस्था हो और उन्हें सब के साथ बाँटा जा सके। इसके लिये दस्तावेजों के कम्प्यूटराइजेशन तथा सूचना तकनीकी संसाधनों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जाए। संस्थाओं के एतत्संबंधी अधिकारी प्रशिक्षित हों, जो सूचना सहभागिता की आम मांग के साथ न्याय कर सकने की क्षमता रखते हों।

० सवाल- जवाब प्रारम्भ होने पर पूरी प्रक्रिया हेतु एक मॉनिटरिंग एजेंसी हो, उपभोक्ता मंच जैसी, जहाँ न्यायालिका के साथ-साथ आम जनता का प्रतिनिधित्व हो। होना तो यह चाहिए कि मात्र जनता द्वारा मांगे जाने पर ही उसे सूचनाएं न दी जाए बल्कि बिना मांगे भी संबद्ध सूचनाएं उस तक लगातार पहुँचती रहें। ऐसा इंटरनेट इत्यादि के माध्यम से आसानी से समय पर किया जा सकता है।

० एक कॉल सेंटर स्थापित किया जा सकता है, जहाँ मांगी प्रत्येक सूचना और उस पर की गयी कार्यवाई का पूरा विवरण हो (स्वयं सूचना अधिकारी द्वारा वे भी उस पूछे गये प्रश्न का विवरण कॉल सेंटर में प्रस्तुत किया जाये)। यह कॉल सेंटर समय-समय पर सूचना के इच्छुक व्यक्ति अथवा संस्था से पूछे कि क्या आपको मांगी गयी सूचना प्राप्त हुई ? क्या आप प्राप्त सूचना से संतुष्ट हैं ? संबद्ध कार्यालयों से भी पूछा जाये कि अमुक मांगी गयी सूचना पर अभी तक क्या कार्रवाई हुई। दुबारा सूचना मांगे जाने पर पूरी प्रक्रिया इस कॉल सेंटर की देखरेख में ही सम्पन्न हों। यह कॉल सेन्टर क्षेत्रीय स्तर पर स्थापित किये जा सकते हैं और इनके क्षेत्रीय कॉल सेन्टर्स के ऊपर मुख्य कॉल सेंटर स्थापित किया जा सकता है।

० देखा गया है कि लोक संस्थाओं में प्रायः वही व्यक्ति सूचना अधिकारी होता है, जिसको सूचनाएं छिपाने से पर्याप्त लाभ होता हैं, इसलिये सूचना अधिकारी किसी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र (जिस पर कोई अन्य प्रभार न हो) व्यक्ति को बनाया जाये, इसके लिये केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा अपने प्रत्येक विभाग में स्वतंत्र लोक सूचना विभाग खोले जा सकते हैं तथा इन विभागों में प्रत्यक्ष भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से लोक सूचना अधिकारी नियुक्त किये जा सकते हैं यह विभाग सूचना का अधिकार के अन्तर्गत सूचना प्रदान करने के साथ-साथ विभाग की सूचनाओं आँकड़ों तथा वार्षिक प्रतिवेदनों का प्रसार-प्रचार सामान्य रूप से भी करे।

० झूठी जानकारी देना दण्डनीय अपराध हो।

सूचना का अधिकार, चाहे कितना ही प्रभावोत्पादक हो, है तो एक औजार ही, औजार की उत्पादकता तथा परिणाम इसे इस्तेमाल करने वाले की क्षमता, प्रतिभा और परिश्रम पर निर्भर करती है, इसलिये सूचना-अदाता के स्तर पर भी कुछ सुधार अपेक्षित है।

जैसे, गैर सरकारी संस्थाओं तथा व्यक्तियों की क्रमशः सामान्य और विशिष्ट सूचनाओं के संबद्ध माँगों के समुचित प्रबंधन का लयबद्ध प्रयास हो और सूचना साक्षरता बढ़ाने हेतु सामूहिक जागरूता के प्रयास हों। लोगो को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए कि क्या सूचना मांगी जाए और कैसे मांगी जाए ? इसके अतिरिक्त प्राप्त सूचनाओं का सर्वोत्तम उपयोग कैसे हो ताकि राजनैतिक और आर्थिक नीतियों में जन सहभागिता तय होकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। चूँकि भारत की 30 करोड़ निर्धन जनता के मात्र 10 प्रतिशत को सूचना का अधिकार के विषय में कुछ जानकारी है, अतः सरकार, गैर सरकारी संगठन तथा मीडिया को भी उन्हें शिक्षित-प्रशिक्षित करने का चुनौतीयपूर्ण दायित्व लेना होगा। आंदोलनकारी समूह भी अपने प्रश्नों को और धारदार बनाएं जिससे व्यवस्थाएं उन्हें सूचनाएं देने के लिये विवश हो जाए। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सूचना का अधिकार प्रायः प्रशासनिक कार्यों, फैसलों तथा प्रक्रियाओं से जुड़ा है होना यह चाहिए कि सभी पक्षों से इसका जुड़ाव हो। इसका विस्तार कर इसके दायरे में लिमिटेड संस्थानों इत्यादि को भी लाया जाए।

इस प्रकार सभी व्यक्तियों को अधिकाधिक जानकारी मिले, सवाल-जवाब का एक सिलसिला कायम हो और आमजन प्रशासन को पारदर्शिता के आइने में देख सके तभी सूचना के अधिकार का भविष्य सार्थक होगा और सच्चे जनतंत्र वाले भारत के आमजन का भविष्य भी स्वर्णिम आभा से युक्त होगा :-

उस पार है उम्मीदों और उजास से भरी दुनिया

अंधेरा तो बस देहरी के इस पार था।

 

संदर्भ :-

1. अरूण पांडेयः हमारा लोकतंत्र और जानने का अधिकार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001 ।

2. डॉ0 बसंती लाल बावेलः सूचना का अधिकार, राजस्थान पत्रिका, 3 फरवरी 2001 ।

3. प्रेस परिषद द्वारा 1996 में तैयार किंतु संशोधित मॉडल की धारा 2 ।

4. राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम 2000।

5. आउटलुक साप्ताहिक, 6 जून 2005 ।

6. योजना, जनवरी 2007 ।

7. कुरूक्षेत्र, जुलाई 2005 ।

8. सी.एम. बिन्दल एवं अंशु िबन्दलः द राइट जव इन्फॉरमेशन एक्ट 2005, स्नोव्हाइट पब्लि. प्रा. लि., मुंबई।

9. Economic & Political Weekly, March 03.09.2007 Vol XLII NO. 9. 10. मीडिया, केन्द्रीय हिंदी संस्थान त्रैमासिका प्रवेशांक अप्रैल - जून 2006 केन्द्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली केंद्र ( मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार)।

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