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खत्म होती भाषाएँ

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शैलेन्द्र चौहान

आज विश्व में बहुतेरी भाषाएँ मरने के कगार पर हैं। 96 प्रतिशत भाषाएँ केवल चार प्रतिशत आबादी द्वारा ही बोली जाती हैं। 500 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 100 ही है; 1500 भाषाओं को 1000 से कम लोग बोलते हैं और 5000 भाषाओं को 100,000 से कम बोलने वाले हैं। चिंता का विषय यह है कि धीरे-धीरे एक के बाद एक भाषा ख़त्म होती जा रही है। ध्यान देने वाली बात है कि न केवल भाषाएँ मरती हैं बल्कि एक भाषा के साथ सामुदायिक इतिहास, बौद्धिक और सांस्कृतिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान भी मर जाती हैं! दरअसल यह हम सबकी स्थायी क्षति है! करीब 3000 भाषाएँ अगले 100 साल में मर जाएँगी। हर दो सप्ताह में एक भाषा मर रही है

जितनी अधिक विविधता है, उतना ही अधिक खतरा है। 21 जनवरी 2008 को अलास्का प्रान्त की मैरी स्मिथ जोन्स की मृत्यु हो गयी थी। मेरी जोन्स की मृत्यु महज एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं कही जा सकती। वह दक्षिणी मध्य अलास्का की एयाक भाषा बोलने वाली अंतिम जीवित व्यक्ति थी। उनकी मौत के बाद एयाक भाषा बोलने वाला एक भी व्यक्ति नहीं बचा और इस प्रकार भाषायी विविधता वाले कोलाज से एक रंगचित्र हमने खो दिया। यह अजीब लग सकता है कि  भाषाएँ मरती हैं और वे लगातार मर रही हैं। यह एक सचाई है। भाषाओं के मरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं। अगर बोलने वालों की संख्या महज दो-एक है, तो साधारण सर्दी, खांसी, बुखार भी उस भाषा के मरने का तात्कालिक कारण बन सकता है।

बाहरी ताकतों में सैन्य, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या शैक्षिक अधीनता, नरसंहार, प्राकृतिक आपदाएँ, बाँझपन, रोग, सांस्कृतिक/ राजनैतिक/आर्थिक आधिपत्य, राजनीतिक दमन आदि कारण हो सकते हैं। आंतरिक ताकतों में सांस्कृतिक सात्मीकरण एक बड़ा कारण है। भाषा-भाषी समुदाय की अपनी भाषा के प्रति नकारात्मक सोच भी एक बड़ा कारण है। भारी उत्प्रवासन और तेज नगरीकरण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। डेविड क्रिस्टल के द्वारा परिभाषित भाषा की मौत के तीन चरण अंगिका और ऐसी ही किसी भाषा पर सटीक बैठ सकती है। मौत की ओर के तीन कदम में पहला है प्रभु भाषा बोलने का दबाव। बेहतर जीवन पाने की आशा में यह कदम लिए जाते हैं। धीरे-धीरे जनसंख्या द्विभाषी होती जाती हैं और आरंभिक द्विभाषीय स्वरूप धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और आदमी एक ही प्रभु भाषा बोलने की कोशिश करने लगता है और अंततः एक ही भाषा बोलने लगता है। लोगों को अपनी भाषा बोलने में शर्म आने लगती है और वह भाषा खत्म हो जाती है।

लुप्तप्राय भाषा को उसकी संकट की गंभीरता की स्थिति के आधार पर चार प्रकारों में बाँटा गया है। अंगिका अपने आरंभिक चरण में है। नाजुक यानी Vulnerable स्थिति में अधिकतर बच्चे तो उस भाषा को अब भी बोलते हैं लेकिन यह सीमित क्षेत्रों तक और अंततः घर तक सीमित रह गया है। दूसरी स्थिति निश्चित रूप से लुप्तप्राय यानी Definitely endangered में बच्चे बतौर मातृभाषा अपनी भाषा को बोलना बंद कर देते हैं।

अत्यधिक लुप्तप्राय यानी Severely endangered स्थिति में उस भाषा को बोलने वाले केवल पुरानी पीढ़ी के लोग हैं लेकिन माता-पिता अब अपनी भाषा को अपने बच्चों के साथ नहीं बोलते हैं। विकट लुप्तप्राय यानी Critically endangered स्थिति में उस भाषा को बोलने वाले केवल दादा-दादी-नाना-नानी की पीढ़ी के लोग होते हैं और वे लोग भी अपनी भाषा को आंशिक रूप से बोलते हैं। कुछ भारतीय भाषाएँ भी उसकी जद में है।

197 भाषाएँ भारत में मरने के कगार पर हैं उनमें से एक है अंगिका। यूनेस्को के भाषायी एटलस को देखें तो पाएँगे कि अंगिका की स्थिति नाजुक है। अंगिका संकट की आरंभिक स्थिति में दर्ज की गयी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस भाषा को बचाने का प्रयत्न किया जाये। उस क्षेत्र के निवासियों को भाषा बचाये रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाये। संस्कृतिकर्मियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने संस्कृति कर्म में अंगिका का अधिक से अधिक प्रयोग करें, साहित्यकार साहित्य रचें और अंगिका का शब्दकोष, व्याकरण विद्यालयों में पढ़ाया जाये। और भी कुछ व्यवहारिक उपाय हो सकते हैं। बहरहाल यह जाग्रति अत्यंत आवश्यक है।

 

संपर्क : 34/242, सेक्टर -3, प्रताप नगर, जयपुर – 302033 (राजस्थान), मो.न. 07838897877 , Email : shailendrachauhan@hotmail.com

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