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जीवन साथी खुश क्यों नहीं?

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

बहुत आसान सा प्रश्न है और वह यह है कि हम अपने जीवनसाथी को कितना कुछ सुख-सुकून और आनंद दे पाएं हैं या दे पा रहे हैं। भूत और वर्तमान पर ही मूल्यांकन टिका हुआ है, और यही भविष्य की बुनियाद भी तय करने वाला होगा।

आमतौर पर अग्नि के फेरों की साक्षी में, प्रगाढ़ प्रेम में या दूसरी किसी न किसी औपचारिक रस्मों में बंध जाने के बाद हम अपने जीवनसाथी से क्या कुछ अपेक्षाएं रखते हैं और क्या कुछ पूरी हो पाती हैं अथवा ईमानदार कोशिशें होती हैं, इस बारे में गंभीर चिन्तन करना हम सभी का फर्ज है जो कि परिणय बंधन में बंधे हुए हैं।

और कोई दिन मिले न मिल पाए तो कम से कम  शादी की वर्षगांठ पर तो इस विषय पर खुला और बेबाक मंथन होना चाहिए। आम तौर पर हम लोग मैरिज एनिवर्सरी को धूमधड़ाके और मौज-मस्ती के संसाधनों के साथ मना दिया करते हैं लेकिन असल में मैरिज एनिवर्सरी दाम्पत्य बंधन का वार्षिक पर्व और उत्सवी आयोजन होने के साथ-साथ पारस्परिक संबंधों और अपेक्षाओं के बारे में गंभीर चिंतन का रास्ता भी दिखाता है।

यह अलग बात है कि विवाह के कुछ वर्ष बाद अधिकांश युगल एक-दूसरे के प्रति बेफिक्री में जाने कितने दिन-महीने साल गुजार दिया करते हैं। इस अवस्था में जीते हुए खूब सारे लोग साथ-साथ रहते हुए भी ऎसे जीते हैं जिस प्रकार दो मशीनें पास-पास रहकर अपने काम कर रही हों। 

यथार्थ यही है कि हम उन लोगों की कोई कद्र नहीं करते, जो दिन-रात हमारे आस-पास रहा करते हैं। कुछ फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो दाम्पत्य बंधन में बंधे हुए लोगों में से भी काफी सारे लोग एक-दूसरे के साथ रहते और जीते हुए भी ऎसे रहते हैं जैसे कि पराये ही हों। और ऎसा न भी हो तब भी पारस्परिक प्रेम, निष्ठा और श्रद्धा में कमी तो देखी जा ही सकती है।

कुछ प्रतिशत लोग जरूर ऎसे हैं जिनमें दाम्पत्य का वही प्रेम बुढ़ापे तक बना रहता है जैसा कि हनीमून पीरियड में देखा गया हो। अन्यथा कालान्तर में इसमें न्यूनता का आना स्वाभाविक है ही।

घर-गृहस्थी और बच्चों की झंझट की वजह से ऎसा हो सकता है लेकिन बहुत सारे मामले ऎसे भी सामने आते हैं जिनमें दाम्पत्य का शौख चटख रंग कुछ बरस बाद दृष्टिगत नहीं होता। इस अवस्था में दंपत्ति भी साथ-साथ ऎसे ही रहते हैं जैसे कि कोई मजबूरी हो। और मजबूरी भी ऎसी कुछ नहीं, सिर्फ समाज और लोगों को दिखाने भर के लिए  साथ-साथ रहते हैं।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इस मामले में अधिकांशतः पुरुष वर्ग जिम्मेदार है। पुरुषों की मानसिकता स्वेच्छाचारी किस्म की होती है और उन्हें संबंधों के विस्तार की भूख हमेशा बनी रहती है। लेकिन महिलाओं के मामले में ऎसा नहीं कहा जा सकता। वे सुरक्षित दाम्पत्य जीवन के लिए समर्पित रहती हैं और इसे जिन्दगी भर बरकरार रखे रखने के लिए अपनी ओर से जी भर कर प्रयास करती हैं।

स्त्री हमेशा अपना सब कुछ स्वाहा करके भी घर-गृहस्थी को बनाए रखने और इसमें बरकत लाने के हरसंभव प्रयासों में कहीं कोई कमी नहीं रखती। पर पुरुषों का स्वभाव अपने घर-परिवार के प्रति लापरवाह किस्म का होता है। खासकर उनके प्रति तो होता ही है जिनके साथ जीवन भर के लिए बँधे हुए होते हैं।

बहुत सारे पुरुषों में यह मानसिकता भीतर तक ठूँसी हुई होती है कि जो अपना है वो कहाँ जाने वाला है, हमेशा अपना ही रहेगा। स्ति्रयों की इसी अखूट श्रद्धा, एकनिष्ठता और विश्वास का फायदा उठाने वाले पुरुषों की आजकल कोई कमी नहीं है। और शायद अपने लाईफ पार्टनर की इसी नैष्ठिक शुचिता का दुरुपयोग करते हुए पुरुष वह सब कुछ करने लगते हैं जो सद्गृहस्थ के लिए अच्छा नहीं कहा गया है 

आजकल दाम्पत्य के रसों में शाश्वत माधुर्य और विश्वास की कमी का यही एक बड़ा कारण लगता है। वर्जनाएं सभी के लिए हैं और मर्यादाएं भी। लेकिन बात जहाँ जीवनसाथी की हो, वहाँ अपनी ओर से मानसिक या सामाजिक स्तर पर स्वीकारे गए सभी प्रकार के संबंधों को निभाना एक-दूसरे का फर्ज है और गृहस्थी का यही एकमात्र मूलाधार है।. 

दाम्पत्य के दोनों सिरों को इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हमारे जीवन में कोई भी बाहरी इंसान किसी भी रूप में जीवनसाथी का स्थान नहीं ले सकता, न उसका मुकाबला कर सकता है। यह सिर्फ दैहिक धरातल के क्षणिक आनंद और किसी न किसी स्वार्थ का ही सेतु होता है जिसकी नींव में कृत्रिम विश्वास की आरसीसी और स्वार्थ की सीमेंट ही होती है।

जो लोग जीवनसाथी को उपेक्षित कर दूसरों को तवज्जो देने और अपने जीवनसाथी के मुकाबले स्थापित करने की कोशिशें करते हैं उनमें से किसी का भी जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता बल्कि यौवन की खुमारी खत्म होते ही यथार्थ का बोध होने लगता है लेकिन उसके बाद बुढ़ापा इतनी जल्दी आ जाता है कि हमें न संभलने का वक्त मिल पाता है, न प्रायश्चित और पश्चाताप करने का। 

यह वह स्थिति होती है जब हमें अंतरात्मा से इस बात अहसास हो जाता है कि भावनाओं और अतृप्त वासनाओं में बहकर हमने जो कुछ कर डाला है वह हमारे जीवन की वह सबसे बड़ी गलती और पाप था जिसका कोई परिहार अब नहीं है।

और यही पाप हमारे शेष जीवन के आनंद को छीन लेता है और हमें यह पूर्वाभास भी हो ही जाता है कि हमारे विश्वासघात, कृतघ्नता और बहिर्मुखी वृत्तियों के कारण वर्तमान जन्म की निरर्थकता के साथ ही आने वाले जन्म का आनंद भी संदिग्ध हो उठता है।

जीवन साथी पूरी जिन्दगी के लिए होता है, कुछ वर्षों या महीनों के लिए नहीं। और तो और हम सात जन्म तक साथ निभाने का वादा कर एक दूसरे के होते हैं लेकिन एक जन्म में ही कितने साल यह प्रगाढ़ता बनी रहती है, यह सोच का बड़ा विषय है।

कई मामलों में तो जीवनसाथी जीवनशत्रु बनकर उभर आते हैं जहाँ दोनों एक-दूसरे के लिए यह दुआएं करते नज़र आते हैं कि फिर किसी जनम में कभी पाला न पड़े। और काफी सारे लोग परिणय बंधन के कुछ वर्ष बीत जाने के बाद ही अपने भाग्य को कोसने शुरू हो जाते हैं।

जीवन में आनंद और मौज-मस्ती के इच्छुक लोगों को चाहिए कि वे उस पवित्र अग्नि या हृदयस्थ प्रेम का हमेशा ध्यान रखते हुए ईमानदारी से दाम्पत्य का निर्वाह करें। अपनी पूरी जिन्दगी का गणित इसी बात पर निर्भर करता है कि हमारा जीवनसाथी या लाईफ पार्टनर हमसे कितना खुश है, कितना विश्वास करता है। यहाँ स्त्री-पुरुष के भेद से कोई सरोकार नहीं है, मतलब है सिर्फ पारस्परिक श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से। जब भी मौका मिले, आत्मचिन्तन करें कि अपना जीवनसाथी कितना खुश है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र - कोमल रूशिर महाले की कलाकृति का डिटेल)

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