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वर्तन परिवर्तन : मनुष्य का कर्तव्य

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वर्तन परिवर्तन - हर्षद दवे

१३. मनुष्य का कर्तव्य

जेल से भागे हुए एक कैदी के पीछे पुलिस लगी हुइ थी. कैदी जंगल में छिप गया परन्तु उसे लगा आसमान से गिरे तो खजूर में अटके! एक शेर बिलकुल उसके सामने आ गया! कुछ परेशान सा लग रहा था वह. बाहर पुलिस और सामने साक्षात् यमराज! पर यह क्या? शेर ने उस पर हमला नहीं किया. कैदी ने ध्यान से देखा तो नजर आया कि शेर के पंजे में एक कांटा चुभा हुआ था. उसे शेर पे तरस आ गया, उस ने कांटा निकाल दिया. शेर आराम से जंगल में चला गया.

किन्तु बाद में सैनिकोने ने उस कैदी को पकड़ लिया. राजा ने उसे सब के सामने मृत्यु दंड दिया. एक दिन सभी नगरजनों के सामने उसे शेर के पिंजड़े में डाल दिया गया. परन्तु शेर ने उस को नहीं मारा. क्यों? शेर अपने पंजे से कांटा निकालनेवाले मनुष्य को कैसे मार सकता था! यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप का सोचना बिलकुल सही है. बचपन में इसी कथा के माध्यम से समझाया जाता था कि अच्छे काम का नतीजा हमेशा अच्छा ही होता है.

जीवन में यह बहुत बड़ी बात है. एक आदमी है जो उपकार को भूल जाता है. ऐसी कइं घटनाएं हैं जो कुत्ते की वफादारी को या प्राणीयों के प्रेम को दर्शातीं हैं. ऐसी फ़िल्में भी हमने देखीं हैं जैसे कि 'हाथी मेरे साथी'. परन्तु एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति इतना स्नेह-प्रेम नहीं दर्शाता! शायद मनुष्य सोच पाता है, क्या यही तो कारण नहीं इस का ? वह हरएक बात को तर्क या लाभ-हानि की दृष्टि से ही देखता है. शायद मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपना कोई नुक्सान न होने पर भी दूसरे की उन्नति होती देखकर प्रसन्न नहीं होता!

जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के बारे में सोचता नहीं है या उसकी अवज्ञा करता है तब वह अपना मनुष्यधर्म चूक जाता है. मनुष्य के कर्तव्य का पालन करना प्रत्येक मानवी का धर्म है. अतः इसे पढ़ने के बाद यदि आप समर्थ हैं तो कम से कम किसी को हफ्ते में एक बार अवश्य सहायता करें. तब देखना, आप को भीतर से अजब सा सुकून मिलेगा.

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hdjkdave@gmail.com

वर्तन परिवर्तन श्रृंखला के अंतर्गत लिखित हर्षद दवे के कुछ अन्य आलेख यहाँ पढ़ें

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