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'कारण कार्य व प्रभाव गीत'

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डॉ. श्याम गुप्त

मेरे द्वारा सृजित, गीत की  एक नवीन -रचना-विधा  -कृति में ..जिसे मैं ....'कारण कार्य व प्रभाव गीत' कहता हूँ ....इसमें कथ्य -विशेष का विभिन्न भावों से... कारण उस पर कार्य व उसका प्रभाव वर्णित किया जाता है …. इस छः पंक्तियों के प्रत्येक पद या बंद के गीत में प्रथम दो पंक्तियों में मूल विषय-भाव के कार्य या कारण को दिया जाता है तत्पश्चात अन्य चार पंक्तियों में उसके प्रभाव का वर्णन किया जाता है | अंतिम पंक्ति प्रत्येक बंद में वही रहती है गीत की टेक की भांति | गीत के पदों या बन्दों की संख्या का कोई बंधन नहीं होता | प्रायः गीत के उसी मूल-भाव-कथ्य को विभिन्न बन्दों में पृथक-पृथक रस-निष्पत्ति द्वारा वर्णित किया जा सकता है | तीन गीत प्रस्तुत हैं---
 


१......कितने जीवन मिल जाते हैं ||

             (  पिता की सुहानी छत्र -छाया जीवन भर उम्र के, जीवन के  प्रत्येक मोड़ पर,  हमारा मार्ग दर्शन करती है....प्रेरणा देती है और जीवन को रस-सिक्त व गतिमय रखती है और उस अनुभवों के खजाने की छत्र-छाया में  हम न जाने कितने  विविध ...ज्ञान-भाव-कर्म युक्त  जीवन जी लेते हैं...)


 

पिता की छत्र-छाया वो ,

हमारे  सिर  पै होती है  |

          उंगली पकड़ हाथ में चलना ,

          खेलना-खाना, सुनी कहानी |

      बचपन के सपनों की गलियाँ ,

           कितने जीवन मिल जाते हैं

 

वो  अनुशासन की जंजीरें ,

सुहाने  खट्टे-मीठे  दिन |

           ऊब  कर  तानाशाही  से,

            रूठ जाना औ हठ  करना |

      लाड प्यार श्रृद्धा के पल छिन,

            कितने जीवन मिल जाते हैं ||

 

सिर पर वरद-हस्त होता है ,

नव- जीवन की राह सुझाने |

             मग की कंटकीर्ण उलझन में,

             अनुभव ज्ञान का संबल मिलता|

       गौरव आदर भक्ति-भाव युत,

               कितने जीवन मिल जाते हैं ||

 

 

 

 

स्मृतियाँ बीते पल-छिन की,

मानस में बिम्वित होती हैं |

              कथा उदाहरण कथ्यों -तथ्यों ,

              और जीवन के आदर्शों की |

       चलचित्रों की मणिमाला में ,

               कितने जीवन मिल जाते हैं ||

 

श्रृद्धा -भक्ति के ज्ञान-भाव जब ,

तन-मन में रच-बस जाते हैं |

               जग के द्वंदों को सुलझाने,

               कितने भाव स्फुरित  रहते |

               ज्ञान-कर्म और नीति-धर्म युत,

               कितने  जीवन मिल जाते हैं ।।

 

 


२.-कितने दीपक जल उठते हैं----....

अन्धकार पर प्रकाश की जय,
दीपावली का पर्व सुहाए।

धन, संमृद्धि, सौभाग्य बृद्धि हित ,
घर घर लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस हटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.

मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नवजीवन मुखरित कर देता।

आशा औ आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ २.

दीपशिखा सम छबि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच बस जाती।

मधुर मिलन के स्वप्निल की,
रेखा सी मन में खिंच जाती।
नयनों में सुंदर सपनों के,
कितने दीपक जल उते हैं॥ ३.


अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आंख गढाने लगता।

वीरों के नयनों में दीपित ,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन मन गण में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.

जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।

नये-नये ,विज्ञान ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.

 

 

 

३. कितने भाव मुखर हो उठते .....


ज्ञान दीप जब मन में जलता,

अंतस जगमग होजाता है |

            मिट जाता अज्ञान तमस सब,

            तन-मन ज्ञान दीप्त हो जाते |

            नव-विचार युत, नव-कृतित्व के,

            कितने भाव मुखर हो उठते ||

 

प्रीति-भाव जब अंतस उभरे,

द्वेष-द्वंद्व सब मिट जाता है |

           मधुभावों से पूर्ण ह्रदय हो,

           जीवन मधुघट भर जाता है |

           प्रेमिल तन-मन आनंद-रस के,

           कितने भाव मुखर हो उठते ||

 

मदमाती यौवन बेला में,

कोइ ह्रदय लूट लेजाता |

          आशा हर्ष अजाने भय युत,

           उर उमंग उल्लास उमड़ते |

           इन्द्रधनुष से विविध रंग के,

           कितने भाव मुखर हो उठते ||

 

सत्य न्याय अनुशासन महिमा,

जब जन-मन को भा जाती है |

          देश-भक्ति हो, मानव सेवा,

          युद्ध-भूमि हो, कर्म-क्षेत्र हो |

          राष्ट्र-धर्म पर मर मिटने के,

          कितने भाव मुखर हो उठते ||
                                        

--डा श्याम गुप्त

के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२,

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