बुधवार, 10 जून 2015

जहाँ का उत्पाद, वहीं प्रभावी

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

प्रकृति असंख्य उत्पादों की जननी है। हर क्षेत्र का अपना विशिष्ट उत्पाद होता है। पंच तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित पदार्थों का मौलिक प्रभाव उन्हीं क्षेत्रों में शाश्वत रहता है जहाँ इनकी उत्पत्ति होती है। जो जहाँ पैदा हुआ है वह उसी आबोहवा में आसानी से अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होता है और अपना पूरा-पूरा प्रभाव भी दिखाता है।

अपने उत्पत्ति स्थल से जो पदार्थ जितना दूर जाता है उतना इसका प्रभाव कम होता जाता है। अपने क्षेत्र की हर वस्तु अपने ही इलाके में रहने व उपयोग करने पर वास्तविक असरकारक रहती है और इसके भीतर की मौलिकता बनी रहती है।

यही कारण है कि हर वस्तु अपने क्षेत्र में सर्वोच्च सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है। अपने उत्पादन स्थल से जो वस्तु जितनी अधिक दूर जाकर उपयोग में आएगी, उसके भीतर इतनी मौलिकता भी नहीं रहेगी और संभव है कि दूसरे स्थानों में जाकर इसकी सकारात्मकता नकारात्मकता में परिवर्तित हो जाए और अपेक्षित लाभ या सुख भी न दे पाए। यह सारा निष्कर्ष उन वस्तुओं के लिए नहीं है जो केवल दिखावे और आकर्षण के लिए हैं, उपयोग के लिए नहीं।

इसमें सर्वाधिक प्रभावी कारक होती है भौगोलिक स्थिति। जिस क्षेत्र में जो भी पानी, मिट्टी, पत्थर, वनस्पति और दूसरे सारे प्राकृतिक उत्पाद हैं या इनसे बनी वस्तुएं हैं उनका उपयोग उन्हीं क्षेत्रों में किए जाने पर इनका सटीक प्रभाव होता है क्योंकि ये सारे पदार्थ और प्राकृतिक उपादान उस क्षेत्र विशेष के लिए ही बने हुए हैं।

इनका अन्यत्र उपयोग किए जाने पर इनके भीतर से मौलिकता गायब हो जाती है, और ये सिर्फ स्थूल तत्व को ही प्रतिबिम्बित कर पाते हैं। एक क्षेत्र के पेड़-पौधों से उत्पादित फलों का स्वाद दूसरे क्षेत्र में उतना नहीं आता। इसी प्रकार एक क्षेत्र की वनस्पति दूसरे क्षेत्रों में उगायी जाएगी तो उसका मूल स्वाद स्वाभाविक रूप से परिवर्तित हो ही जाएगा।

दुनिया में अपरिमित मात्रा और संख्या में जड़ तत्वों का परिवहन हर क्षण एक से दूसरे क्षेत्र में हो रहा है लेकिन मूल स्थान से दूर जाने पर इनका प्रभाव स्वतः क्षीण हो जाता है।  जो पत्थर जहाँ का है, वहीं लगे तो इसकी शोभा और प्रभाव दोनों असरकारक होते हैं और इनके उपयोग का आनंद भी आता है।

एक क्षेत्र के पाषाणों को दूसरे क्षेत्र में ले जाकर इनका उपयोग करने से स्थान विशेष का आकर्षण और तत्वों का नैसर्गिक संतुलन बिगड़ेगा ही। यही स्थिति हर तत्व के बारे में है। भौतिक तत्वों के बारे में यह स्पष्ट मान लेना चाहिए कि ये क्षेत्र विशेष के लिए ही बने हैं और उनका वहीं उपयोग होना चाहिए।

लेकिन अब हर मामले में घालमेल होने लगा है। इंसान से लेकर पदार्थ तक सभी में मिलावट का दौर चल पड़ा है। फैशनपरस्ती और आकर्षण के चकाचौंध से प्रभावित होकर हम  चाहे दुनिया के कोने-कोने से निर्माण सामग्री, सजावटी और आकर्षण बिखेरने वाले पदार्थ ले आकर अपने यहाँ स्थापित क्यों न कर डालें, इनसे बाहरी आकर्षण भले ही बढ़ा हुआ नज़र आने लगे लेकिन दूसरे स्थानों से लाए गए बाहरी संसाधन और पदार्थों से आत्मीय सुकून पाने की उम्मीद किसी को नहीं करनी चाहिए। उलटे स्थानिक मौलिकता भंग होने की वजह से कई नए खतरे और अनिष्ट सामने आ सकते हैं।

हर क्षेत्र की अपनी अलग-अलग प्रकृति होती है जिसके अनुरूप ही  क्षेत्र विशेष में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि तत्वों का संतुलन बना रहता है। इस निर्धारित आबोहवा में उत्पन्न होने वाले पेड़-पौधों, पाषाणों, मिट्टी, जल आदि सभी प्रकार में स्थानिक विशिष्टता होती ही है और इसी वजह से ये अपने-अपने क्षेत्रों में पूरी मौलिकता और प्रभाव के साथ स्थापित रहते हैं और जो इनका उपयोग करता है उसे सुख व सुकून दोनों की प्राप्ति कराते हैं।

लेकिन जैसे ही इन तत्वों अर्थात पदार्थों को किसी दूसरे क्षेत्र में ले जाया जाकर स्थापित किया जाता है वहाँ की आबोहवा के अनुकूल नहीं होने तथा अपने घटक द्रव्यों के बराबर के तत्वों से दूर होने की वजह से इनका वास्तविक प्रभाव क्षीण हो जाता है।

इसे देखते हुए सभी प्रकार की सामग्री और वनस्पति आदि का उपयोग उन्हीं क्षेत्रों में किया जाना अधिक फायदेमंद रहता है जिन क्षेत्रों में ये पैदा होते हैं। जो सामग्री जहां की है उसका उपयोग उसी क्षेत्र में किए जाने पर किसी भी प्रकार के दोष और अनिष्ट सामने आने की तनिक भी आशंका नहीं रहती है।

सच्चे मन से इस बात को स्वीकारना होगा कि यथासंभव अपने काम-काज और सभी प्रकार के व्यवहार में अपने यहां उत्पादित प्राकृतिक और भौतिक संसाधनों व पदार्थों का उपयोग करें। इससे आर्थिक और सामाजिक विकास का संतुलन भी कायम होगा और भौतिकता के आडम्बर पर भी अच्छी तरह से रोक लग पाएगी। यह परम सत्य हमारी वैयक्तिक सेहत के लिए भी अच्छा है और अपने क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से भी पूरी तरह अनुकूल।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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