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सामाजिक बोध, प्रिंट मीडिया' तथा मानवाधिकारी

तरूशिखा सुरजन

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने कहा था, '' यदि मुझे कभी यह निश्चित करने के लिए कहा गया कि अखबार और सरकार में से किसी एक को चुनना है तो मैं बिना हिचक यही कहूंगा कि सरकार चाहे न हो, लेकिन अखबारों का अस्तित्व अवश्य रहे।''

एक समय था जब अखबार को समाज का दर्पण कहा जाता था। समाज में जागरूकता लाने में अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह भूमिका किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, विश्व के तमाम प्रगतिशील विचारों वाले देशों में समाचार पत्रों की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। मीडिया में और विशेष तौर पर प्रिंट मीडिया में जनमत बनाने की अद्भुत शक्ति होती है। नीति निर्धारण में जनता जानने में और नीति निर्धारकों तक जनता की बात पहुंचाने में समाचार पत्र एक सेतु की तरह काम करते हैं।

समाज पर समाचार पत्रों का प्रभाव जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने इतिहास पर डालनी चाहिए। लोक मान्य तिलक, महात्मा गांधी और पं0 नेहरू जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अखबारों को अपनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार बनाया। आजादी के संघर्ष में भारतीय समाज को एकजुट करने में समाचार पत्रों की विशेष भूमिका थी। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली हो गई थी कि अंग्रेजों ने प्रेस के दमन के लिए हर संभव कदम उठाए। स्वतंत्रता के पश्चात लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और वकालत करने में अखबार अग्रणी रहे। आज मीडिया अखबारों तक सीमित नहीं है परंतु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया की तुलना में प्रिंट मीडिया की पहुंच और विश्वसनीयता कहीं अधिक है। प्रिंट मीडिया का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि आप छपी हुई बातों को संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं और उनका अध्ययन भी कर सकते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी भी निश्चित रूप से बढ़ जाती है। मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी के शेर से आप में से ज्यादातर वाकिफ होंगे कि :-

न खेचों कमान, न तलवार निकालो।

गर तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।

अब मानवाधिकार की बात करें तो संविधान में उल्लेखित मौलिक अधिकार मोटे तौर पर मानवाधिकार ही हैं। हर व्यक्ति को स्वतंत्रता व सम्मान के साथ जीने का अधिकार है चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, वर्ग का क्यों न हो। लोकतंत्र में मानवाधिकार का दायरा अत्यंत विशाल है। राजनैतिक स्वतंत्रता, शिक्षा का अधिकार, महिलाओं के अधिकार, बाल अधिकार, निशक्तों के अधिकार, आदिम जातियों के अधिकार, दलितों के अधिकार जैसी अनेक श्रेणियां मानवाधिकार में समाहित हैं। यदि गौर किया जाए तो कुछ ऐसी ही विषयवस्तु पत्रकारिता की भी है। पत्रकारों के लिए भी मोटे तौर पर ये संवेदनशील मुद्दे ही उनकी रिपोर्ट के स्त्रोत बनते हैं। परंतु मानवाधिकार मुख्यतः एक राजनैतिक अवधारणा है, जिसका विकास और निर्वहन लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के अंतर्गत ही संभव है। व्यक्ति की राजनैतिक स्वतंत्रता, राजसत्ता के खिलाफ स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार ही मानवाधिकार का मूल है।

भारत जैसे देश में जहां गरीबी व अज्ञानता ने समाज के एक बड़े हिस्से को अंधकार में रखा है, वहां मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता जगाने में, उनकी रक्षा में तथा आम आदमी को सचेत करने में अखबार समाज की मदद करते हैं। हम स्वयं को लोकतंत्र कहते हैं तो हमें यह भी जान लेना चाहिए कि कोई भी राष्ट्र तब तक पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक नहीं हो सकता जब तक उसके नागरिकों को अपने अधिकारों को जीवन में इस्तेमाल करने का संपूर्ण मौका न मिले। मानवाधिकारों का हनन मानवता के लिए खतरा है। आम आदमी को उसके अधिकारों के बारे में शिक्षित करने में मीडिया निश्चित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सूचना के प्रचार-प्रसार से लेकर आम राय बनाने तक में मीडिया अपने कर्तव्य का भली-भांति वहन करता है। एक विकासशील देश में जहां मानवाधिकारों का दायरा व्यापक है, वहां मीडिया के सहयोग के बिना सामाजिक बोध लगभग असंभव है।

भारत में पूर्णतः स्वतंत्र प्रेस की परिकल्पना आरंभ से ही रही है। 1910 के प्रेस एक्ट के खिलाफ बोलते हुए पं0 जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि :-

' I Would rather have a completely free press with all the dangers involved in the wrong use of the freedom in a suppresed or regulated press'

उन्होंने यह बात 1916 में कही थी। स्वतंत्रता पश्चात प्रेस की स्वतंत्रता को समझते हुए संविधान में इसका प्रावधान किया गया। यहां यह उल्लेखित करना आवश्यक होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ उसके मालिक, संपादक और पत्रकारों की निजी व व्यवसायिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं होती बल्कि यह उसके पाठकों की सूचना पाने की स्वतंत्रता और समाज को जागरूक होने के अधिकार को भी अपने में समाहित करती है। प्रेस का सबसे बड़ा कर्तव्य समाज को जागरूक करना होता है। अपने अधिकारों की जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक होने से मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। आखिरकार जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी होगी, ऐसे व्यक्ति ही उनकी मांग कर सकते हैं तथा सरकार व अधिकारियों को अपने व दूसरों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मजबूर कर सकते हैं। इस विशाल देश में मानवाधिकार हनन के अधिकांश मामले ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं, जहां की जनता शहरी जनता की बनिस्बत कम जागरूक होती है। अनेक गैर सरकारी संगठन इन क्षेत्रों में कार्य करते हैं। उसके लिए भी मीडिया के सहयोग के बिना कार्य करना संभव नहीं है। मीडिया समाज की आवाज शासन तक पहुंचाने में उसका प्रतिनिधि बनता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई मीडिया अथवा प्रेस जनता की आवाज है? आखिर वे जनता किसे मानते हैं ? उनके लिए शोषितों की आवाज उठाना ज्यादा महत्वपूर्ण है अथवा क्रिकेट की रिपोर्टिंग करना, आम आदमी के मुद्दे बड़े हैं अथवा किसी सेलिब्रिटी की निजी जिंदगी ? आज की पत्रकारिता इस दौर से गुजर रही है जब उसकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। समय के साथ मीडिया के स्वरूप और मिशन में काफी परिवर्तन हुआ है। अब गंभीर मुद्दों के लिए मीडिया में जगह घटी है। अखबार का मुखपृष्ठ अमूमन राजनेताओं की बयानबाजी, घोटालों, क्रिकेट मैचों अथवा बाजार के उतार-चढ़ाव को ही मुख्य रूप से स्थान देता है। गंभीर से गंभीर मुद्दे अंदर के पृष्ठों पर लिए जाते हैं तथा कई बार तो सिरे से गायब रहते हैं। समाचारों के रूप में कई समस्याएं जगह तो पा लेती हैं परंतु उन पर गंभीर विमर्श के लिए पृष्ठोें की कमी हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में हम देख रहे हैं कि मानवाधिकारों को लेकर मीडिया की भूमिका लगभग तटस्थ है। हम इरोम शर्मिला और सलवा जुडूम के उदाहरण देख सकते हैं। ये दोनों प्रकरण मानवाधिकारों के हनन के बड़े उदाहरण है, लेकिन मीडिया में इन प्रकरणों पर गंभीर विमर्श अत्यंत कम हुआ है। राजनैतिक स्वतंत्रता के हनन के मुद्दे पर मीडिया अक्सर चुप्पी साध लेता है। मीडिया की उदासीनता स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है। लोकतंत्र में राजद्रोह की कोई अवधारणा नहीं है और न होनी चाहिए। अपनी बात कहने का, अपना पक्ष रखने का अधिकार हर व्यक्ति के पास है, चाहे वह अपराधी ही क्यों ना हो। राजसत्ता का अहंकार व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को यदि राजद्रोह मानने लगे तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। मीडिया को अपनी उदासीनता छोड़कर मानवधिकारों के हनन को रोकने की दिशा में सार्थक कार्य करना होगा।

भारत तथा विश्व में मानवाधिकार हनन के मुद्दों पर प्रिंट मीडिया की क्या भूमिका रही है, इसके कुछ और उदाहरण आपके समक्ष रखना चाहती हूं। पहले बात करते हैं दक्षिण अफ्रीका की जहां रंगभेद की नीति ने वर्षों तक नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन व दमन किया। दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकन व इंग्लिश अखबारों की इस मुद्दों पर अलग-अलग भूमिका रही। एक ओर जहां अफ्रीकन अखबारों में इसे सही ठहराते हुए हमेशा शासन के पक्ष को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर इंग्लिश प्रेस ने शासन की आलोचना करते हुए भी राजनीतिक आंदोलन को आपराधिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। परंतु जैसे-जैसे रंगभेद के खिलाफ जनता का आंदोलन मजबूत हुआ, इंग्लिश प्रेस की नीति भी बदली। इस पूरे आंदोलन के दौरान रिपोर्टिंग की भाषा ने चाहे वह अफ्रीकन अखबार रहे हो अथवा इंग्लिश वस्तुस्थिति को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। कुल मिलाकर रंगभेद के खिलाफ लड़ने में प्रिंट मीडिया मुख्यतः शासन के पक्ष में रहा और यह सबक मिला कि विकासशील समाज के लिए बंधनमुक्त, सेंसरमुक्त मीडिया कितना आवश्यक है।

हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी मानवाधिकार हनन के सैकड़ों मामले होते हैं। वहां का प्रिंट मीडिया मुख्यतः उर्दू व अंग्रेजी में है। अंग्रेजी अखबारों के साधन व पहुंच उर्दू अखबारों की तुलना में कही अधिक है। अतः रिर्पोटिंग में भी अंतर होना स्वाभाविक है। इसके अलावा अंग्रेजी अखबारों के रिपोर्टर एक निश्चित परिभाषित बीट के लिए कार्य करते हैं। वहीं उर्दू रिपोर्टरों को अमूमन एक साथ कई बीट के लिए रिपोर्टिंग करनी होती है। ऐसे में मानवाधिकार हनन मामलों की जो समझ और ट्रेनिंग उन्हें होनी चाहिए, उसकी कमी रिपोर्टिंग में नजर आती है। पाकिस्तान में सामाजिक, राजनैतिक व धार्मिक प्रतिबंधों के चलते भी इन मामलों को जिस तरह उठाना चाहिए, वह नहीं हो पाता। इन चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के प्रिंट मीडिया ने राजसत्ता द्वारा नागरिकों के मानव अधिकार हनन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और अनेक बार राजसत्ता के कोप का शिकार बने। अनेक पत्रकारों की गिरफ्तारी हुई, कई अखबार बंद कर दिए गए और कईयों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी।

भारत में मानवाधिकार हनन का पहला बड़ा मुद्दा जो मीडिया में आया था, वह था भागलपुर जेल में कैदियों की आंखे फोड़ने का मामला। इसके बाद मुबंई की आर्थर रोड़ जेल में महिला कैदियों के साथ दुर्व्यवहार व उनके शोषण की खबर ने सरकार को पूरे महाराष्ट्र में जेलों की स्थिति की जांच करने पर मजबूर कर दिया। इस तरह की रिपोर्टिंग ने प्रिंट मीडिया को मानवाधिकारों की रक्षा में बड़ा साथी बना दिया था। यह अलग बात है कि चाहे वह गुजरात के दंगों का सच हो, कश्मीर में बेगुनाहों की मौत का सच हो, उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहरण का सच हो अथवा विनायक सेन और नक्सलवाद का सच हो, प्रिंट मीडिया ने इन मुद्दों को अपनी प्रतिबद्धता व सामर्थ्यानुसार ही स्थान दिया है। हालांकि रोजाना जीवन के तो अनेक मानवाधिकार हनन मामले प्रिंट मीडिया के बगैर आम जनता तक सच्चाई से पहुंच नहीं पाते। इलेक्ट्रॅानिक मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में यह अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि सच्चाई क्या है। आज प्रिंट मीडिया को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से तगड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इलेक्टॉ्रनिक मीडिया अपने स्वरूप और सामर्थ्य की वजह से दर्शकों को 24 घंटे उपलब्ध है। टीआरपी की चाह में टीवी न्यूज चैनल सिर्फ गंभीर विमर्शों तक सीमित नहीं हैं अपितु वे फिल्मी चकाचौंध, सास-बहू के किस्सों, क्रिकेट की दुनिया के अलावा अंधविश्वासों तक को अपने प्रोग्राम में काफी स्थान देते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया का भी स्वरूप् बदलने लगा है और अखबारों के पन्ने भी झकझोरने के बजाय गुदगुदाने का काम करने लगे हैं।

मीडिया मालिकों की पूंजीवादी सोच के अलावा पत्रकारों की तैयारी भी एक बड़ा मसला है। एक समय था जब पत्रकार होना सम्मानजनक माना जाता था। बड़े-बड़े साहित्यकारों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी लेखनी के झंडे गाड़े। प्रेमचंद, माखनलाल चतुर्वेदी, महादेवी वर्मा से लेकर अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर आदि दिग्गज साहित्यकारों ने पत्रकार के रूप में भी सामाजिक बोध जगाने के अपने दायित्व का निर्वहन किया और राजनैतिक पत्रकारिता से ज्यादा रूचि मानवीय पत्रकारिता में दिखाई। कहने का तात्पर्य यह है कि उस दौर के पत्रकारों में विषय की, समाज की गहरी समझ थी, उसे लेखन रूप में प्रस्तुत करने के लिए भाषा और भावना थी तथा सामाजिक प्रतिबद्धता थी। आज ये गुण कहीं खो से गए हैं। निजी हितों का दबाव इतना बढ़ गया है कि पत्रकारों की प्रतिबद्धता पल-पल बदलती रहती है। अपने कार्य के प्रति समर्पण में भी कमी नजर आती है। कहीं वे घटनास्थल तक पहुंच नहीं बना पाते तो कई बार उन्हें घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझना नहीं आता तो कई बार भाषा के गलत इस्तेमाल से समाचार का भाव ही बदल जाता है।

इसके लिए आवश्यक है कि पत्रकारों को आरंभ से ही मानवाधिकार मामलों की भी ट्रेनिंग दी जाए। उनके विषयों में भारतीय संविधान में उल्लेखित मौलिक अधिकारों की पढ़ाई, कानून की समझ इत्यादि शामिल किए जाएं तथा कार्य क्षेत्र में भी उन्हें पुलिस बीट, लीगल बीट आदि पर भेजने से पहले कुछ ट्रेनिंग दी जाए। आधी अधूरी तैयारी व सतही समझ से मुद्दे कमजोर पड़ जाते हैं और उनके समाधान की राह कठिन हो जाती है। यदि मीडिया को समाज को राह दिखानी है तो स्वयं उसे सही राह पर चलना होगा।

एक सफल लोकतंत्र वही होता है जहां जनता जागरूक होती है। अतः सुशासन के लिए मीडिया का कर्तव्य बनता है कि वह लोगों का पथ प्रदर्शन करे। उन्हें सच्चाई का आइना दिखाए और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो हमारा मूल मानवधिकार है, वह सिर्फ भाषण देने तक सीमित नहीं है बल्कि उसका उद्देश्य समाज में उचित न्याय का साम्राज्य स्थापित करना होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है हर कीमत पर हर व्यक्ति के मानवाधिकारों की रक्षा की जाए और उनका सम्मान किया जाए। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक बोध जगाने में प्रिंट मीडिया की स्वतंत्रता इसी से सार्थक होगी।

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से साभार)

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