सोमवार, 22 जून 2015

खत्म हो स्कूलों की नीरसता

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शिक्षा का मन्दिर कहे जाते हैं स्कूल। एक बालक के जीवन की नींव घर के साथ-साथ , स्कूल में भी पड़ती है। इसलिए आजकल अभिभावक अपने बच्चों के लिए किसी स्कूल का चयन बड़ी तत्परता और सावधानी से करते हैं।

विद्यालय बेशक शिक्षा प्रदान करने का केन्द्र है, लेकिन यह शिक्षा शुष्क न हो। काव्य की भाषा में जैसे वीर -रस या भक्ति-रस होते हैं , वैसे ही शिक्षा-रस हो। स्कूल ऐसे मॉडल के रुप में सामने आए कि बच्चे स्कूल से नफरत न करके उसकी तरफ आकर्षित हों। वहां कोरी पढ़ाई ही न हो , बल्कि बालमन के अनुरुप वातावरण हों। शिक्षकों का व्यवहार बच्चों के प्रति कोमल हो। बच्चों की गलती पर गरजें-बरसें नहीं, हल्की बूंदों की बौछार करें। अभिभावकों की महत्वकांक्षा, होमवर्क व टयूशन के बोझ तले दबे बच्चों को कहीं तो राहत मिले। माता पिता इस बात का गर्व तो कर सकते हैं कि उनके बच्चे एक बढ़िया स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं , लेकिन सर्वाधिक तनावग्रस्त भी यही बच्चे हैं।

विद्यालय मात्र कंक्रीट की चारदीवारी से घिरा न हो। इसके भीतर पेड़-पौधों की बहार हो, छोटी सी सही , एक पुष्पवाटिका अवश्य होनी चाहिए। खेलकूद , सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि समय समय पर करवाए जाएं। नजदीक के अच्छे व प्रसिद्ध स्थानों पर घूमाने ले जाएं। शिक्षकों की रचानात्मक सोच भी अपने ढंग से कुछ नया कर सकती है। इससे बच्चों के शैक्षिक ढांचे में गुणात्मक सुधार आएगा वहीं स्कूलों की एकरसता टूटेगी। विविधता आने से बच्चों में स्कूल के प्रति एक प्रकार का खिंचाव उत्पन्न होगा। रविंद्रनाथ टैगोर ऐसी ही शिक्षा प्रणाली के समर्थक थे। उनका कहना था कि जिस शिक्षक के भीतर का बालक सो गया है उसे पढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है।

शिक्षा पद्धति कैसी हो? इस बात पर बहस हो सकती है। परन्तु इसकी नीरसता समाप्त करने के लिए सबको एकमत होना चाहिए। हरियाणा राज्य में बरवाला के निकट राजकीय प्राथमिक पाठशाला रिहौड़ में एक प्रयोग किया गया। मार्च-अप्रैल,2013 में यहां पर 45 दिन का " तत्परता " कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में विद्यालय एवं कक्षा के प्रति उत्साह व रुचि का संचार करना था। परीक्षा और पुस्तकों का भय दूर करके इनके प्रति लगाव पैदा करने की कोशिश की गई। मंच पर बोलना, पेंटिंग, सड़क सुरक्षा के साथ- साथ कबाड़ से खिलौने बनाने के गुर भी सिखाए गए। इस तरह के प्रयास सभी विद्यालयों में किये जाने चाहिएं।

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हरदेव कृष्ण, ग्राम व डाकखाना - मल्लाह -134102

जिला पंचकूला ( हरियाणा )

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