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पर्यावरण पर गहराता संकट वैश्विक चुनौती

5 जून पर्यावरण दिवस पर विशेष...
paryavaran par sankat

डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
० संकल्प मात्र से समस्या नहीं सुलझेगी


पर्यावरण संरक्षण के प्रति पहले की गई लापरवाही अब चिंता के रूप में सामने आ रही है। आम लोगों के साथ ही अब सरकार भी पर्यावरण के प्रति चिंतित दिखाई पड़ रही है। पर क्या हम इसे पर्यावरण के संदर्भ में एक अच्छी पहल मान ले? केवल चिंता व्यक्त करने मात्र से समाधान हो जाता तो शायद हिन्दुस्तान में किसी प्रकार की समस्या नहीं रहती। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति को देख चिंतित है, तो यह देखना भी लाजिमी है कि सरकारी खर्चों में पर्यावरण संबंधी विषयों के लिए कितनी हिस्सेदारी रखी गयी है। मार्च 2015 के आम बजट में उद्योगों एवं यातायात को पर्यावरण से संबंधित कर मित्रवत उपायों के साथ साथ ‘नमामी गंगे मिशन’ को मजबूत करने की बात कही गई है। इसके साथ ही स्वच्छ भारत कोष की स्थापना ने भी पर्यावरण के लिए सकारात्मक सोच को बढ़ावा देते हुए अनेक उपायों की व्यवस्था की है। देखा जाए तो विज्ञान और तकनीकी के इस य़ुग में जिस तरह विकास की बातें की जा रही है, उससे पर्यावरण पर गहराता संकट पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती बन गया है। हम देख रहे है कि विकास के समावेशी विचार ने किस तरह पर्यावरण को दांव पर लगा रखा है।


पर्यावरण की चिंता करते हुए यदि हम गोष्ठियों और सभाओं तक सीमित रह जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम अशुद्ध वातावरण में जीने विवश होंगे। हमारे विकास की भौतिकवादी और पूंजीवादी विचारधारा ने पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। हर शहर, हर गांव और हर महानगर में दिन प्रतिदिन गगनचुंबी भवनों का निर्माण हो रहा है, किंतु हमारे जंगलों को बचाने कोई प्रयास नहीं दिख रहे है। उलटा निर्माण कायरेां के चलते वनों का अंधाधुंध कटाई भी किसी से छिपी नहीं है। अब बड़े शहरों में शुद्ध हवा की कल्पना भी बेमानी लगने लगी है।

 

हमें यह बात नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण की अनदेखी के कारण ही आए दिन भूकंप और खतरनाक समुद्री तूफान जनजीवन को नष्ट कर रहे है। देश की सरकार को यह मानते हुए कि जब तक पर्यावरण शुद्ध है, तभी तक समाज भी जीवित है, अपने बजट में पर्यावरण के लिए पर्याप्त व्यवस्था रखनी चाहिए। मौजूदा नई सरकार ने पर्यावरण के प्रति जो चिंता दिखाई है, वह वास्तव में हिम्मत बढ़ाने के साथ ही साथ जागरूकता पैदा करने वाली भी है। सरकार द्वारा शुरू किया गया स्वच्छ भारत मिशन साफ सफाई और पर्यावरण को लेकर एक जिम्मेदारी भाव पैदा करने वाला हो सकता है। सरकार ने इसी मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए बजट में 1446 करोड़ रूपये प्रावधान किया है। कुल बजट में से 688 करोड़ रूपये वानिकी तथा वन्य जीवन हेतु एवं 758 करोड़ पारिस्थितिकीय तथा पर्यावरण हेतु आबंटित किया गया है। बजट में जिन पर्यावरणीय मुद्दों पर चिंता व्यक्त की गई है उनमें-गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने से लेकर, नमामी गंगे मिशन, भारत को स्वच्छ बनाने की दिशा में स्वच्छ भारत कोष की स्थापना, बढ़ते कॉर्बन उत्सर्जन को रोकना, इलेक्ट्रीक वाहनों को बढ़वा देना, सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करना आदि सम्मिलित किये गये है।


मानव सभ्यता के विकास की कहानी वास्तव में प्रकृति अथवा पर्यावरण के अंधाधुंध उपयोग की डरावनी कहानी कही जा सकती है। बीती शताब्दी में सभ्यता के विकास के साथ-साथ शहरीकरण, और औद्योगीकरण का तेजी के साथ विस्तार हुआ। विस्तार की उक्त गति में मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन किया। जब इसका परिणाम पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में हमारे सामने आया, तब हमारी नींद टूटी और ऐसा महसूस होने लगा कि हमने पर्यावरण के साथ काफी लापरवाहीपूर्ण बर्ताव किया है। अंधाधुंध विकास और टिकाऊ विकास के बीच का अंतर पर्यावरण को मजबूती दे सकता है। टिकाऊ विकास कोई कठिन काम नहीं, बशर्ते इसके लिए हम स्वयं को प्रकृति को हिस्सा माने और पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण को विकसित करें। कुछ छोटे छोटे उपाय कर हम टिकाऊ विकास को प्रोत्साहित कर भावी पीढ़ी के लिए भविष्य को सुखद और संरक्षित रूप में संजो सकते है। इसे कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है।


1. विकास के लिए प्रौद्योगिकी को विकसित किया जाए, जो ऊर्जा युक्त कम जोखिम वाली और मानवीय हो।
2. मानवीय जनसंख्या के आधार को पर्यावरण की धारण क्षमता तक सीमित रखा जाए।
3. ऊर्जा के लिए सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसी तकनीक का उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
4. पर्यावरण शिक्षा पर विशेष ध्यान केंद्रित करना भी लाभकारी हो सकता है।
5. वनों की रक्षा करते हुए दावानलों पर नियंत्रण एवं कटाई पर रोक लगाना उचित हो सकता है।
6. पर्यावरण को संरक्षित रखने कीटनाशकों और उर्वरकों के प्रयोग में सावधानी बरतनी होगी।
7. पर्यावरण के लिए कानून बनाते हुए क्रियान्वयन की पारदर्शिता और शक्ति के प्रति गंभीरता बरतना भी जरूरी होगा।


वर्तमान समय में विकास और पर्यावरण साथ साथ चले, ऐसे विकल्पों की तलाश करनी होगी। घटते जंगल और कटते पौधे, कम होते वन्य प्राणी, गायब या विलुप्त हेा हरे पशु पक्षी, बढ़ता वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग भी हमारी चिंता में शामिल होना चाहिए। इन सारे मुद्दों पर सरकार को गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा। साथ ही आम जनता के रूप में भी हमारी यह जिम्मेदारी है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने स्वच्छ और स्वस्थ भारत के निर्माण में अपने जिम्मेदारियों को भली भांति महसूस करें, और उस पर अमल करने दृढ प्रतिज्ञ हो। बिना हमारे योगदान के सिर्फ सरकार के भरोसे पर्यावरण जैसी संवेदनशील समस्या का अंत शायद संभव नहीं है 

 

 


                                    
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा). 
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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