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अभिषेक स्मृति : एक प्रेरक व्यक्तित्व

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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम - डा0 अभिषेक -स्मृति : एक प्रेरक व्यक्तित्व

लेखक - डा0 कृष्णावतार उमराव 'विवेकनिधि'

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मनुष्य का जीवन सुख-दुःखों का पिटारा है। आम आदमी जीवन के उन सुखों में प्रसन्न रह कर तथा दुःखों में रो-धोकर अपना समय व्यतीत करता है। किन्तु कवि हृदय, अति संवेदनशील और भावुक हुआ करता है। तालाब में फेंकी गई कंकड़ी से उत्पन्न लहरों की भाँति ही कवि हृदय में सुख-दुःख के क्षणों में तदनुरूप भावनाओं का उद््दोलन हुआ करता है। जब वह प्रसन्न होता है तो श्रंगार परक गीत लिखता है, हास्य रचना करता है किन्तु जब हृदय में कोई आघात लगा हो तो उसकी वेदना जिस कविता या रचना को जन्म देती है, वह सभी के हृदय को भाव-विह्वल कर देती है।

अनेक कवि-रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी प्रिय पुत्री, पुत्र या अपने पति, पत्नी के विछोह में कवितायें लिखी हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अपनी प्रिय पुत्री सरोज को बेहद स्नेह करते थे पुत्री के असमय बिछोह में उन्होंने ''सरोज-समृति'' के रूप में एक लम्बी कविता लिखी थी। मथुरा रिफाइनरी के अभियन्ता श्री सन्तोष कुमार सिंह ने भी एक दुर्घटना में , असमय काल-कवलित हुए अपने पुत्र आलोक की स्मृति में ''आलोक-स्म्ृति'' लिखकर अपनी वेदना को उन्होंने संजोकर रखा है तो हाथरस के श्री चन्द्रपाल शर्मा 'रसिक' ने अपनी पत्नी के विछोह को - ''ये नई कहानी नहीं'' पुस्तक के रूप में संजोकर रखा है। इसी तरह और भी कितने स्मृति लेख मिल जायेंगे जो दुःखी हृदय से निसृत हुए होंगे।

प्रस्तुत पुस्तक -''डा0अभिषेक-स्मृति : एक प्रेरक व्यक्तित्व''' भी ऐसी ही स्मृति पुस्तिका है जिसमें एक पिता का, एक माँ का, एक बहन का, एक भाई का एवं परिचितों व मित्रों का करुण-क्रन्दन हृदय से फूट-फूट कर शब्दों के रूप मे बाहर आया है जिसे डॉ0 अभिषेकं -स्मृति के रूप में समेटने का साहस डा0 कृष्णावतार विवेकनिधि ने किया है।

सभी जानते हैं कि वरिष्ठ साहित्यकार डा0 विवेकनिधि की तीन सन्तानों में से एक जेष्ठ पुत्र डा0 अभिषेक जिसे घर में बबलू नाम से पुकारा जाता था, एक होनहार, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व था।

''होनहार विरबान के होत चीकने पात'' की कहावत को चरिचार्थ करते हुए उसने बचपन से ही अपनी प्रतिभा से सभी को चमत्कृत करना प्रारम्भ कर दिया था। प्रत्येक कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हुए उसने ई0एन0टी0 में डॉक्टरेट करने तक अनेक गोल्ड मैडल प्रात्प किए थे तथा 6 जून 2014को मालद्वीप में आयोजित मैराथन दौड़ में दौड़ते-दौड़ते बेहोश हो जाने के बावजूद भी दौड़ में प्रथम आकर अपने देश भारत का व अपने परिवार का नाम ऊँचा कर गया।

वास्तव में डा0 अभिषेक का सरल एवं स्नेही व्यक्तित्व था। इस पुस्तक में साहित्यकार श्री सन्तोष कुमार सिंह ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति - '' अभिषेक -स्मृति : स्मृतियों की मंजूषा'' के रूप में की है तो डा0 सुरेश पाण्डेय ने डा0 अभिषेक के बचपन की स्मृतियों का रेखाचित्र - ''अंजुरी भर स्मृतियाँ'' के अन्तर्गत खींचा है। फैज-ए-आम सीनियर सैकेण्डरी स्कूल के प्रधानाचार्य श्री जफरुद्दीन ने -''सफलता के उच्च सोपानों को लांघने वाला प्रतिभाशाली प्रेरक बना डा0 अभिषेक'' शीर्षक से डा0 अभिषेक के विद्यार्थी जीवन पर प्रकाश डाला है। वहीं हृदय की पीड़ा की अभिव्यक्ति स्वर्गीय पुत्र बबलू की माँ श्रीमती चन्दादेवी ने अपने लेख - ''मेरा लाड़ला बेटा अभिषेक'' में की है।

डा0 अभिषेक की पारिवारिक पृष्ठभूमि, बचपन, शिक्षा, चिकित्सकीय शिक्षा प्राप्त करना, तत्पश्चात इलाहाबाद और आगरा में सेवायें देना और फिर मालद्वीप की सेवायें एवं अन्त में मैराथन दौड़ का वर्णन, अन्दर तक से टूट चुके पिता डा0 विवेकनिधि ने डा0 अभिषेक-स्मृति पुस्तक में समाहित किया है। वहीं पिता की घनीभूत वेदना को उजागर करती दो कवितायें भी पुस्तक में समाहित हैं।

इस 80 पृष्ठीय पुस्तक का प्रकाशन 'सारंग प्रकाशन, सारंग विहार, मथुरा' द्वारा किया गया है। अन्तिम 28 पृष्ठों पर स्वर्गीय पुत्र का जीवनवृत चित्रों के माध्यम से उजागर किया है।

आप सबके बीच डा0 विवेकनिधि ने हृदय की पीड़ा को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करके दुःख को अल्प करने का प्रयास अवश्य किया है परन्तु ये ऐसी वेदना है जिसे भुला पाना मानव के बस की बात नहीं है फिर भी जीवन जीने का साहस जुटाने में सहायक अवश्य होंगे, मुझे ऐसी आशा है।

समीक्षक -

डा0 दिनेश पाठक 'शशि

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