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स्त्री विमर्श, भूमण्डलीकरण एवं मानवाधिकार'

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डॉ. स्वाति तिवारी

स्त्री की सामाजिक स्थिति एवं उनके मानव अधिकारों के हनन को केन्द्रित करते हुए किसी विद्वान ने कहा था कि, वह सब जगह है, फिर भी कहीं नहीं। उसके बिना ना सृष्टि बनती है ना समाज, ना घर, ना परिवार पर वह क्या बनती है इसकी चिन्ता किसी को नहीं? उसका होना परिवार के होने की शर्त है पर उसके होने ना होने की परवाह कौन करता है? किसको फर्क पड़ता है। कौन है वह? वह कोई भी हो सकती है किसी घर, किसी भी समाज, किसी भी धर्म, किसी भी वर्ग की। उसकी सम्पन्नता या विपन्नता भी उसकी स्थिति को ज्यादा प्रभावित नहीं करती दुनिया भर में वह सदैव हाशिए पर धकेली जाती है।

आज युग बदल गया, वैश्वीकरण और बाजारवाद के चलते जीवन और परिस्थितियां बदल गई। किन्तु सवाल यह है कि स्त्री की दुनिया कितनी बदली? बदली भी या नहीं ? और जो थोड़े से बदलाव ऊपर से दिखाई देते हैं उनके अन्दर का सच क्या है ? एक सच है कि तमाम बदलावों के बावजूद औरत यानी उपेक्षिता, यानी दोयम दर्जा। या तो वह देवी है जिसे मंदिरों में पत्थरों को तराश कर बिठाया गया है या फिर वह डायन है जिसे पत्थर मार-मारकर मार डाला जाता है। यह सब तो ठीक वह खूंटे पर बधीं गाय-बकरी है जिसे उससे पूछे बगैर दूसरे खूंटे पर बांध दिया जाता है। नहीं तो फिर वह दान की वस्तु है जिसका कन्यादान किया और लिया जाता। करने वाला कन्यादान करके पुण्य कमाता है कहता है एक चिन्ता थी दूर हुई गंगा नहाए। दूसरा दान लेकर महान हो जाता है उसमें देवत्व समा जाता है। रोटी कपड़ा और छत देकर उप.त करता है। फिर चाहे वह राजघराना हो चाहे कंगले की झोपड़ी जब चाहे जुए के दाँव पर लगा सकता है। उसको घर की इज्जत और पगड़ी से तोला जाता है। क्या हम उसके अधिकारों की बात कर रहे हैं? पूछना चाहती हूँ क्या अधिकार वस्तुओं को दिए जाते हैं? नहीं बल्कि उन पर जोर-जबरदस्ती से अधिकार किए जाते हैं - हम आधी दुनिया की इसी वस्तु समझी जाने वाली स्त्री पर विमर्श, वैश्विीकरण और मानव अधिकारों की बात करने जा रहे हैं, जिसके लिए मानवाधिकार आज भी अमृत ही है।

दरअसल हमारे समाज में पारम्परिक तौर पर यह स्थिति कभी नहीं रही कि स्त्रियों को रचनात्मक कार्यक्षेत्र में या पारिवारिक सत्ता श्रृंखला में पुरूष के बराबर का दर्जा दिया गया हो। चाहे परशुराम द्वारा पिता के इशारे पर निरपराध माता के वध का प्रसंग हो, या गौतम का इंद्र द्वारा छली गई अपनी पत्नी को शिला बना देने का, शकुन्तला का निर्वासन हो या सीता का परित्याग, गांधारी का अभिशप्त अंधा वैवाहिक जीवन हो या कुंती का उतना ही अभिशप्त मातृत्व। द्रोपदी का चीरहरण हो चाहे दिल्ली की अनुराधा की भूख और भय से मौत। बसमतिया हो भँवरीबाई, फूलनदेवी हो या नैना साहनी, जैसिका लाल हो, राजस्थान में मार डाली गई नर्स भँवरीबाई इन सब का सफर यह सिद्ध करता है कि हर परिदृश्य की सबसे कमजोर और दबी हुई इकाई स्त्री ही रही है। यहाँ तक कि पुरूषों के अपराधों की सजा भी हमेशा स्त्री को ही दी जाती है। पुरूषों को दी जाने वाली गालियाँ भी अपमानित स्त्रियों को ही करती है। फिर चाहे वह कोई भी हो, वह किसी गाँव खेड़े की अनपढ़ डायन बना दी औरत हो चाहे ब्रिटेन की राजकुमारी प्रिंसेस डायना। श्रृंखला की ये कड़ियाँ क्या कहती है? यही कि क्या औरतों को उनके मानवाधिकार मिले हैं? नहीं ये कहानियाँ कहती हैं कि महिलाओं के विरूद्ध हिंसा, अत्याचार, शोषण, यंत्रणा की समस्या आज भी ज्यों की त्यों है।

महिला उत्पीड़न के मूल में निरक्षरता, रूढ़िवाद और अन्ध-विश्वास जैसे का तैसा है - वैश्वीकरण के चलते जो संचार क्राँति आई है उसने कम से कम हमारी आँखें तो खोल कर रख दी है। अमर्त्य सेन की एक रिपोर्ट में देखा गया है कि भारत में 3 करोड़ सात लाख लड़कियाँ मिसिंग हैं। यह मिसिंग क्या है? पुत्र मोह में मार दी गई लड़कियों की संख्या है यह। नवरात्रि के पर्व पर कन्यापूजन करने वाले देश में पड़ोसी की कन्या को बुलाकर भोजन करवाकर देवी की पूजा करने वाले अपनी कोख में बेटी आने पर कन्या भ्रूण हत्या कर देते हैं। यूनिसेफ की ''राष्ट्रों की प्रगति'' नामक रिपोर्ट में उल्लेख है कि अतीत में सात करोड़ भ्रूण सिर्फ इसलिए मार डाले गए क्योंकि वे कन्या के रूप में जन्म लेने वाले थे।

यूनिसेफ में 1995 की 'भारतीय राज्यों की प्रगति' में अलर्ट करते हुए कहा था कि - 4-5 करोड़ स्त्री आबादी विलुप्त होती जा रही हैं पर हम अलर्ट नहीं हुए अब झकझोर देने वाली सच्चाई हमारे सामने हैं। 2011 की जनगणना में हमें खतरनाक स्थिति दिखाई दे रही हैं। जिसके अनुसार भारत में लिंग अनुपात अब तक के सबसे नीचे के स्तर पर पहुंचकर 914 हो गया है। 27 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में शिशु लिंग अनुपात में लगातार गिरावट देखी गई है। अब हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश सब बेटी बचाओ में लगे हैं। पर बेटियाँ बचेंगी तब जब उन्हें उनके मूल अधिकार दिए जायगें। कब तक उसे समानता, आत्म सम्मान और न्याय से वंचित रखा जायगा। हमारी परम्पराओं ने स्त्री का ऐसा समाजीकरण किया है कि अधीनता, परतन्त्रता को वह खुद गहरे तक आत्मसात कर बैठी है। स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीतिक, स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता यहाँ तक की व्यक्तिबोध जैसे मौलिक अधिकारों से भी वह वंचित है।

वह इस समय संक्रमण काल से गुजर रही है। इस समय वह वस्तु से मनुष्य बनने की प्रक्रिया से गुजर रही है। वे पढ़-लिख रही हैं कारखानों, दफ्तरों में काम कर रही हैं, वे चूड़ी-कंगन वाले हाथों से कम्प्यूटर चला रही हैं। वे डाक्टर, इंजीनियर, लेखक-प्रोफेसर, वैज्ञानिक, पायलट तक बन रही हैं। वे मानवीय गरिमा की खोज में जुटी हुई हैं, पुरूष से प्रेम करती हैं पर अपनी बौद्धिकता को सिद्ध करने में लगी हैं। आधी दुनिया की इन महिलाओं पर भूमंडलीकरण के प्रभाव की बात करते हैं तो इस का विशलेषण करते हुए एक स्त्री पर विशेष दबाव को देखा जा सकता है खासकर भारत जैसे विकासशील देशों की स्त्रियों को न केवल पितृसत्तात्मक सामाजिक अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि वे पश्चिम के प्रौद्योगिकीय वर्चस्व का दबाव भी झेल रही है।

भूंडलीकरण के कारण स्त्रियों के लिए नौकरियों के अवसर तो बढ़े, लेकिन वेतन नहीं बढ़े। पगार के रूप में कुछ धन हाथ में तो आया पर उस पगार पर उनका अधिकार नहीं है। स्त्री के बाहरी कार्य क्षेत्र में सस्ते श्रम से राष्ट्रीय अर्थतंत्र एवं पारिवारिक अर्थव्यवस्था का स्तर तो सुधरा पर उसे अपने ही वेतन से पैसा जेबखर्च की तरह मिला। घर के श्रम की बात ही नहीं है वह तो बेगार है उसकी। सारा दिन घर-दफ्तर में खटने के बाद एक कप चाय भी तैयार नहीं मिलती ऊपर से टूटे बटन पर एक तमगा जरूर मिलता है करती क्या हो सारा दिन अरे तीन दिन से एक टूटा बटन नहीं टका तुमसे? घर तो घर दफ्तरों में भी निर्णय के सारे अधिकार पुरूषों के पास होते हैं। पुरूष अपने वर्चस्व को कायम रखना चाहता है।

भूंडलीकरण के विस्तार ने निश्चय ही दुनिया को सब की मुट्ठी में किया है। एक जबरदस्त संचार क्रांति ला दी है। विस्तार और विकास के दरवाजे खोल दिए हैं बावजूद इसके इस भूमंडलीकरण ने स्त्री के लिए खुले आकाश से ज्यादा एक बड़े बाजार का ही विस्तार किया। उसे व्यक्ति स्वातंत्र्य एवं अधिकार के नाम पर विज्ञापनों से लेकर दुकानों तक वस्तु के रूप में ही इस्तेमाल किया है। उसे सुपर मॉडल से लेकर बार बाला तक, विश्वसुंदरी से लेकर ब्रह्माण्ड सुंदरी बनाकर चकाचौंध की दुनिया के शो-केस में गुड़िया बना रखा है। यह सब उसकी देह के इर्द-गिर्द रचा गया मायाजाल है जहाँ उसकी योग्यता उसकी बौद्धिकता नहीं है उसकी दैहिक सुंदरता है।

भूमण्डलीकरण के इस प्रतियोगी युग में वह मानव बनने की प्रक्रिया से एक बार फिर वस्तु में बदल दी जाती है। चमक-दमक बिना इस ग्लैमरस औरत की इस दुनिया के साथ मजदूरी करती, खेतों में खपती, बोझा ढोती स्त्रियों का कोई मेल नहीं। दाल-रोटी, तन ढकने के वस्त्र के लिए बेहाल स्त्रियों की दुनिया भूमंडीकरण से प्रभावित नहीं है उसे ना भूमण्डलीकरण पता है ना मानव अधिकार। और एक तीसरी दुनिया उन औरतों की भी हैं जो धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, घर-परिवार, रिश्ते-नाश्ते, शर्म, हया और पर्दाप्रथा जैसी हजारों बेड़ियों से आज भी जकड़ी हुई है। सबसे बड़ी संख्या इसी मध्यमवर्गीय समाज की महिलाओं की है जो अपने हक अधिकारों को लेना तो दूर उनके बारे में सोच भी नहीं पाती क्योंकि वह औरत की महिमामंडित छवि में ढाल दी गई है - उसे वही करना होता है जो उससे अपेक्षित है। उसका अपनी देह पर अधिकार नहीं है। उसका अपने गर्भ में पल रही संतान पर अधिकार नहीं है। उसे अपनी पसंद का साथी चुनने का अधिकार नहीं है साथ ही उसे पसंद का कार्यक्षेत्र चुनने का अधिकार नहीं है।

इस स्त्री को अभी भी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता, राजनैतिक स्वतंत्रता , दैहिक, मानसिक स्वतंत्रता, व्यक्तिबोध जैसे मूलाधिकारों के लिए लड़ना है। उसे थोपी हुई परंपराओं का ध्वस्त करना है। उसे अपनी रचनाधर्मिता, रचनात्मकता और रचना-प्रक्रिया तय करनी है। स्वयं को व्यक्ति के रूप में स्थापित करते हुए एक स्पेस चाहिए जो उसे उसके मानवाधिकार दे सके। वही मानव अधिकार जो, एक व्यक्ति की राष्ट्रीयता, उसके निवास, लिंग, जातीय मूल, रंग, धर्म या अन्य स्थिति पर ध्यान दिए बिना सभी मनुष्यों के लिए निहित अधिकार है।

भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संसद और कार्यपालिका को देश में कानून का निर्माण और कार्यान्वयन सौंपा गया है जबकि न्यायपालिका इसके निष्पादन को सुरक्षित करती है। स्त्री और पुरूष को समाजरूपी गाड़ी के दो पहियों के समान माना जाता है। अतः समाज के विकास एवं निर्माण के लिए स्त्री-पुरूष की सहभागिता अनिवार्य है। विकास के साथ-साथ नैसर्गिक सिद्धान्त का पालन एवं पर्यावरण संतुलन के लिए नितांत आवश्यक है। जिसके लिए लैंगिक समानता के साथ-साथ महिलाओं की जनसंख्या को पुरूषों के समान बनाये रखने के लिए महिलाओं के अस्तित्व से जुड़े अधिकारों को प्रोत्साहन और संरक्षण अवश्य देना होगा।

यद्यपि मानवाधिकार पुरूष, महिला दोनों वर्गों की .ष्टि से एक ही है, किन्तु महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार का प्रश्न इसलिए अधिक विचारणीय हो जाता है कि पुरूष सत्तात्मक विश्व में लिंग भेद की परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। वस्तुतः मानव जगत में यदि कोई सबसे प्राचीन असमानता अथवा विभाजक रेखा है, तो वह लिंग भेद ही है। जाति, धर्म, संप्रदाय रंग आदि सभी विभाजक तथा भेद भावनात्मक प्रक्रियाओं का जन्म इसके बाद ही हुआ है। लिंग भेद की अवधारणा ने मानव जीवन को दो ध्रुवों में बाँटकर स्त्री व पुरूष को परस्पर पूरक होने का अवसर न देकर स्त्री को पुरूष का अनुगामी घोषित किया है। महिला मानवाधिकार के दो स्तर का वर्णन किया गया है।

1. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला मानवाधिकार : संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की प्रस्तावना में कहा गया है कि''हम संयुक्त राष्ट्रों के लोग मूलभूत मानवाधिकारों में मानव की गरिमा और महत्व व मूल्य में तथा स्त्री, पुरूष के समान अधिकारों में आस्था व्यक्त करते हैं। साथ ही चार्टर में महिलाओं के समानता के अधिकारों की घोषणा की गई है। ''अनुच्छेद 16(1) के अनुसार वयस्क पुरूष व स्त्रियों को मूल, वंश, राष्ट्रीयता या धर्म के कारण किसी भी सीमा के बिना विवाह और कुटुम्ब स्थापित करने का अधिकार है। अनुच्छेद 23(2) के अंतर्गत बिना भेदभाव के समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार है। अनुच्छेद 26(1) के अनुसार सभी व्यक्तियों को शिक्षा पाने का अधिकार है। चाहे वह स्त्री हो या पुरूष। इस परम्परा में अभी तक विभिन्न विश्व महिला सम्मेलन आयोजित किये जा चुके हैं :-

प्रथम विश्व महिला सम्मेलन सन्1975 मैक्सिको : इस सम्मेलन में वर्ष 1975 से 1984 को महिला दशक के रूप में घोषित किया गया तथा पंचवर्षीय योजनायें बनायी गयीं जिनमें स्त्री शिक्षा लिंग भेदभाव मिटाना महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना, नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी, समान राजनैतिक, आर्थिक , सामाजिक अधिकार देने आदि पर बल दिया।

द्वितीय विश्व महिला सम्मेलन 1980 कोपेनहेगन : इस सम्मेलन में महिलाओं के लिए निम्न लक्ष्य निर्धारित किये गये :

० राजनीति व निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की कानूनी भागीदारी

० महिलाओं के लिए कार्यालय कक्ष आयोग बनाना

० सरकारी और गैर-सरकारी संगठन में सहयोग स्थापित करना

० सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए सभी को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराना

० शिक्षा और प्रशिक्षण में सभी को समानता का दर्जा देना

० रोजगार के संदर्भ में समानता

तीसरा विश्व महिला सम्मेलन 1985 नैरोबी : इस सम्मेलन में विभिन्न देशों से प्राप्त की गई रिपोर्टों से ज्ञात हुआ कि महिला दशक में निश्चित किये गये लक्ष्यों को प्राप्त करने में आंशिक सफलता प्राप्त हुई है। इस सम्मेलन में महिला विकास के लिए प्रगतिशील रणनीति तैयार की गई तथा प्रत्येक देश को अपनी विकासात्मक नीतियों के अनुसार अपनी प्राथमिकतायें तय करने का अधिकार दिया गया।

चौथा विश्व महिला सम्मेलन 1995 बीजिंग : इस सम्मेलन में सरकारी अधिकारों के अतिरिक्त गैर-सरकारी संगठनों ने भाग लिया। इसके निम्न उद्देश्य निर्धारित किये गये :

० महिलाओं को समर्थ बनाने के लिए योजनायें बनाना।

० प्रतिनिधि मण्डलों की प्रगतिशील उपलब्धियों का पुनरावलोकन करना।

० ऐसी कार्ययोजना की रूपरेखा बनाना जिससे प्रगतिशील नीतियों का क्रियान्वयन हो सके।

० इक्कीसवीं शताब्दी की वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक, सामाजिक आदि विकास संबंधी आवश्यकताओं का सामना करने के लिए साधन उपलब्ध कराना।

० ऐसी सामाजिक स्थिति का निर्माण करना जिसमें महिलाओं की प्रगति को प्रोत्साहन मिले।

नई दिल्ली सम्मेलन 1997 : उक्त सम्मेलनों के अतिरिक्त 1997 में 'वीमेन्स पॉलिटिकल वाच'' नामक गैर सरकारी संगठन ने संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से विश्व सांसद सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया। इसका उद्देश्य महिलाओं की सत्ता में भागीदारी बढ़ाना था।

2. भारत में महिला मानवाधिकार : मानवाधिकारों विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की प्राप्ति के क्षेत्र में भारत ने भी लंबे समय से संघर्ष किया है। सदियों से भारत में सती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, अधिकार विहीनता, रूढ़िवादिता समाज का अंग था। परंतु 19वीं शताब्दी में पश्चिमी शिक्षा के आगमन से संस्कृतियों में टकराव हुआ फलस्वरूप महिला अधिकारों की बात की जाने लगी। लोग परंपरागत ढांचे से बाहर निकलकर सोचने लगे। महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जाने लगा। 1917, 1926 और 1927 में क्रमशः भारतीय महिला संघ, भारतीय महिला परिषद व अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना हुई तथा स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के मुद्दों पर विचार किया गया। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों को लागू करने के लिए 1950 में संवैधानिक उपाय किये गये।

संवैधानिक उपाय : भारत में संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग शब्द से प्रारंभ है, जिसका अर्थ है -स्त्री और पुरुष को समानता का दर्जा दिया गया।

संविधान का लक्ष्य नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय विश्वास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा बंधुता को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्र की एकता आश्वस्त करती है। भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के संदर्भ में महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये हैं।

अनुच्छेद 15

० राज्य किसी नागरिक के विरूद्ध किसी आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

० कोई नागरिक केवल धर्म, वंश, जाति, लिंग के आधार पर किसी भी निर्योग्यता दायित्व या शर्त के अधीन नहीं होता।

० अनुच्छेद का कोई भी प्रावधान राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशिष्ट प्रावधान बनाने से नहीं रोक सकता।

अनुच्छेद 16

० राज्य के अधीन किसी पद के संबंध में धर्म, वंश, जाति, लिंग के आधार पर कोई नागरिक अयोग्य नहीं होगा।

अनुच्छेद 21

० यह प्राण दैहिक स्वतंत्रता और संरक्षण के अधिकार की व्यवस्था करता है यह अधिकार स्त्री पुरुष को समान संरक्षण देता है।

अनुच्छेद 39

० पुरुष और स्त्री, नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार है।

० पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो।

० पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का दुरूपयोग न हो।

० अनुच्छेद द्वारा महिलाओं के लिए प्रसूतिकाल में राहत की व्यवस्था तथा काम के स्थान पर मानवीय सुविधा की व्यवस्था करेगा।

अनुच्छेद 43

० यह मजदूरों के लिए वेतन तथा अच्छे जीवन जीने की व्यवस्था करता है

अनुच्छेद 44

० राज्य भारत के समस्त क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान दीवानी संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा

अनुच्छेद 45

० प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध है

० संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किये गये

अनुच्छेद 325,326

० निर्वाचक नामावली में महिला और पुरुष को समान रूप से मत देने और चुने जाने का अधिकार देता है।

० भारत में महिला मानवाधिकारों को मूल अधिकारों के साथ जोड़ा गया है तथा महिलाओं के लिए विस्तृत अधिकारों की विवेचना की गई है तथा इस संदर्भ में संविधान में विभिन्न अधिनियमों को स्थान दिया गया है।

कानून में भी स्त्री को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ प्रावधान हैं जैसे :-

1. सती प्रथा निवारण अधिनियम 1987: इस अधिनियम के अंतर्गत सती कर्म करने के लिए कारावास और जुर्माना दोनों की सजा का प्रावधान है।

2. दहेज निवारण अधिनियम 1961(संशोधित 1986) : इसके अंतर्गत दहेज लेने और देने के लिए दंड की व्यवस्था की गई है तथा दहेज मृत्यु पर 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास का प्रावधान है।

3. अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956(संशोधित 1986) : इसके अंतर्गत व्यवस्था है कि संदिग्ध या अपराधी महिला से पूछताछ, तलाशी एवं गिरफ्तारी केवल महिला पुलिस या महिला सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा की जायेगी।

4. बाल विवाह अवरोध अधिनियम 1929(संशोधित 1976): इस अधिनियम में 1976 में संशोधन कर विवाह की आयु लड़के के लिए 21 वर्ष तथा लड़की के लिए 18 वर्ष की गई तथा अपराध को संज्ञेय बना दिया गया।

5. औषधियों द्वारा गर्भ गिराने से संबंधित अधिनियम 1971 : प्रारंभिक रूप से महिलाएं विशेषज्ञ के माध्यम से गर्भ गिरा सकती है, संबंधित कागजात गुप्त रखे जाएंगे।

6. स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिबन्ध) अधिनियम 1986: इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी महिला को इस प्रकार चित्रित नहीं किया जायेगा जिससे उसकी सार्वजनिक नैतिकता को आघात पहुंचे। इस अधिनियम में फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया है जो ऐसी फिल्मों पर रोक लगायेगा जिनमें महिलाओं की मर्यादा भंग होती हो।

7. विशेष विवाह अधिनियम 1954 : इसमें महिलाओं को पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार प्रदान किया गया है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1954 स्त्रियों को भरण पोषण और दाम्पत्तिक प्रदान करता है।

8. प्रसव पूर्व निदान तकनीकी अधिनियम 1954 इसमें गर्भावस्था में बालिका भ्रूण की पहचान कराने पर रोक लगाई गई है।

9. 73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन 1993: इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को त्रिस्तरीय पंचायतों में एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान है।

10. समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976: इसके अंतर्गत समान कार्य हेतु महिलाओं को भी पुरुषों के समान पारिश्रमिक देने का प्रावधान किया गया है।

भारत की महिलाओं को अनेकानेक कानूनी व्यवस्थाओं के द्वारा अनेक अधिकारों की सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करने के साथ-साथ महिलाओं के लिए सरकार के द्वारा अनेक विकास कार्यक्रमों तथा कल्याणकारी योजनाओं का संचालन भी किया जा सके और देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

सन्दर्भ

1. मानव अधिकार : अन्तर्राष्ट्रीय प्रपत्रों का संकलन खण्ड -1

2. मानव अधिकार : अंतर्राष्ट्रीय प्रपत्रों का संकलन खण्ड -3

3. उपनिवेश में स्त्री : प्रभा खेतान

4. स्त्री मुक्ति : यथार्थ और यूटोपिया - वर्तमान सन्दर्भ अगस्त 2009

5. मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा - स्वाति तिवारी

6. औरत अस्तित्व और अस्मिता - अरविन्द जैन

7. धर्मयुग

8. हमको दियो परदेश : मृणाल पाण्डे

9. नारी के मानवाधिकार - योगेश कुमार 'एडवोकेट'

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( मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से साभार)

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