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वैश्विक पुनर्जागरण का श्रीगणेश : अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष आलेख ( 21 जून 2015 के लिए)

- डॉ. दीपक आचार्य

 

दशकों के बाद वह गौरवशाली मौका आया है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं कि पूरी दुनिया भारतीय पहल के अनुरूप आज योग का अनुकरण करेगी। विश्वगुरु के गौरव को हासिल करने और संसार भर के पुनर्जागरण में भारतीय महाशक्ति की प्रभावी और अहम् भूमिका के श्रीगणेश का दौर आरंभ हो चला है।

दुनिया भर को संस्कृति, सभ्यता और निरन्तर उत्थान का पाठ पढ़ाने वाला हिन्दुस्तान अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ वह दुनिया के पीछे भागने वाला नहीं है बल्कि दुनिया उसका अनुकरण करने को उतावली होने लगी है।

इस सब का श्रेय जाता है हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को, जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्पोें, राष्ट्रीय चरित्र और अद्वितीय नेतृत्व कौशल से ऎसी वैश्विक छाप छोड़ी है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

धर्म-अध्यात्म, योग और जीवन जीने की हमारी विलक्षण पद्धति है जिसके हर पहलू का वैज्ञानिक आधार है जो ऋषि-मुनियों द्वारा सदियों के परीक्षणों के बाद सिद्ध किया हुआ है और इसमें तनिक भी गलती या खामी की कोई गुंजाइश नहीं है।

योग परमाण्वीय कणों से लेकर परिवेशीय आधारों का सृजक रहा है। समष्टि और व्यष्टि का प्रत्येक कण और घटना योग-वियोग के सिद्धान्त पर आधारित है।  योग को किसी जाति, पंथ और सम्प्रदाय से जोड़ना बेमानी है।

योग अपने आप में सृजन और विकास की वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य अपनी सीमित शक्तियाें का विस्तार योग की ऊर्जा पाकर असीमित कर सकता है, अपनी क्षमताओं को अधिकतम स्तर पर विकसित कर समाज, देश और संसार के काम आ सकता है और इंसान के रूप में सृष्टि को बहुत कुछ दे पाने की स्थिति में आ सकता है।

योग मानव जीवन की आचार संहिता को आधार प्रदान करता है जिसके माध्यम से मानवीय मूल्यों, प्रकृति और परिवेश के प्रति संवेदनाओं, पिण्ड और ब्रह्माण्ड तक में संतुलन और सकारात्मक शक्तियों के विकास, आत्मिक ऊर्जा के उत्थान आदि सभी को अपार गति प्राप्त होती है और इसका फायदा दुनिया के प्रत्येक जीव और सम्पूर्ण जगत को मिलता है और वैश्विक स्तर पर ऎसा माहौल सृजित होता है जो कल्याणकारी दुनिया का ऎतिहासिक पैगाम देता है। 

इस दृष्टि को योग को सिर्र्फ शारीरिक सौष्ठव तक ही सीमित रखना उचित नहीं होगा।  पिण्ड और ब्रह्माण्ड के बीच गहरा और अनन्य संबंध है। मूलाधार से लेकर सहस्रार तक चक्रभेदन, कुण्डलिनी जागरण जैसी बातों को द्वितीयक प्राथमिकता पर रख दिया जाए तब भी सेहत की रक्षा के लिए योग व्यायाम जरूरी हैं।

वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता सेहत बनाने और बनाए रखने की है। आज दुनिया की अधिकांश आबादी किसी न किसी रूप में बीमार ही है। कोई मानसिक बीमार है, कोई शारीरिक और बहुत सारे दोनों प्रकार से रुग्ण हैं।

हमारे बहुत सारे अंग समय से पहले ही शिथिल हुए जा रहे हैं और इनका उपयोग करने के लिए बाहरी उपकरणों और जात-जात की मशीनों की जरूरत पड़ने लगी है। अंगों की क्षमता और संतुलन तक गड़बड़ाने लगे हैं।

बात सिर्फ शरीर की बाहरी संरचना तक ही सीमित नहीं है बल्कि शरीर के आंतरिक अंग-उपांग भी ऊर्वरकों और रसायनिक प्रदूषणों की वजह से शिथिल और बीमार होने लगे हैं। अब न खान-पान अच्छा रहा है, न आबोहवा।

इन सभी प्रकार के हालातों में शरीर में रोजाना घुस आने और पैदा होते रहने वाले विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल फेंकने के लिए यह जरूरी है कि इस प्रकार का योग-व्यायाम किया जाए कि शरीर के लिए अनुपयोगी तत्व किसी न किसी प्रकार से शरीर से बाहर निकलें और शरीर इनसे रोजाना मुक्त होकर तरोताजा बना रहे।

जिसका शरीर स्वस्थ होगा उसका मन भी स्वस्थ होगा और जीवन मस्त होगा। हर इंसान विश्व की वह छोटी इकाई है जिसका  मानसिक और शारीरिक स्वास्थ सुदृढ़ होना परमावश्यक है। इस दृष्टि से योग और व्यायाम से बढकर और कुछ भी नहीं हो सकता। इसमें सब कुछ मुफ्त है और दुनिया का हर इंसान आसानी से कर सकता है। 

यह योग ही वह माध्यम है जो बीमारियों, दवाइयों पर खर्च से बचाता है और लम्बी आयु देता है। इस दृष्टि से हमारे प्रधानमंत्रीजी का प्रयास सदी का ऎतिहासिक यथार्थ है जिसे दुनिया ने स्वीकार कर लिया है।

आईये हम सब वसुघैव कुटुम्बकम् की भावना से योग को अपनाएं और दुनिया को दिखा दें कि भारत का हर इंसान योग के मामले में कितना आगे है।

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की सभी को शुभकामनाएं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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