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हास्य-व्यंग्य : काका कल्लन की मजबूरी

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- हनुमान मुक्त

 

 

काका कल्लन प्रतिदिन की तरह आज भी रेलवे प्लेटफार्म पर मुंह में पान दबाए चहल कदमी कर रहे थे। प्लेटफार्म के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की दूरी करीब डेढ़ किमी. थी। एक चक्कर लगाने पर तीन किमी. की यात्रा उनकी पूरी हो जाती और डॉक्टर द्वारा घूमने के लिए बताया गया कोटा भी।

सायंकाल करीब आठ बजे के आसपास उनका यह कार्यक्रम खाना खाने के बाद शुरू होता था उस समय प्लेटफार्म पर लंबी दूरी की कुछेक गाड़ियों का भी आने का समय होता था। जिससे जाने-अनजाने में उन्हें देश की विभिन्न संस्कृतियों के भी दर्शन हो जाया करते थे। पिछले दो तीन बरसों से उनका यह कार्यक्रम निर्बाध गति से चल रहा था।

आज जाने दिन में किसके दर्शन कर लिए कि शाम का सारा का सारा मजा किरकिरा हो गया। हां टीवी चैनल पर प्रधानमंत्रीजी का मजबूरी भरा भाषण रोनी सूरत में अवश्य देखा था। यह जरूर उन्हें कुछ याद सा आ रहा था।

घूमते हुए जैसे ही काका ने अपने मुंह में भरी तंबाकू के पान की पीक का दान प्लेटफार्म के एक कोने में खड़े खों पर किया कि एक पुलिसिया जवान ने उन्हें देख लिया और आकर उनकी बांह पकड़ ली। बोला यह कोई पीकदान है या कचरा पेटी कि आपने पिच्च से पिचकारी छोड़ दी।

अप्रत्याशित रूप से काका कल्लन की बांह पकड़ कर एक पुलिसिया जवान का ऐसा कहना काका को बड़ा नागवार गुजरा। लेकिन मौके की नजाकत को भांपते हुए बड़े ही संयत स्वर में बोले।

भैया। यहां कोई पीकदान दिखाई नहीं दे रहा था और हमारे मुंह में तंबाकू के पान की पीक भरी हुई थी। इसे हम ज्यादा देर तक मुंह में भरे ही नहीं रख सकते। इसलिए हमें यहां थूकना पड़ा।

अच्छा। तुहे आस-पास कोई थूकने का डिब्बा दिखाई नहीं दे रहा है।

इतने सारे डिब्बे रखे हुए हैं। थोड़ी दूर जाकर ही यह क्रिया कर्म कर सकते थे। पुलिसिया जवान ने रोब से कहा।

काका भैया से भैयाजी पर आते हुए बोले। भैयाजी, हमारी मजबूरी समझो हमने तंबाकू का पान खाया है और हमने वैसे भी पीक वहीं थूका है जहां लोग थूकते आए हैं। देखा इस खंभे के चारों ओर कितने पान और गुटखे के निशान बने हुए हैं।

पुलिस वाला झल्लाता सा बोला तुमने मुझे इस देश की बेवकूफ जनता समझ रखा है जो तुम्हारी बेवकूफ भरी मजबूरी को समझ कर चुपचाप तुम्हें थूकता देखता रहूं।

क्या कोई पुरखे कहकर मरे थे कि मुंह में तंबाकू का पान खाकर ही प्लेटफार्म पर घूमने जाना। अपने आपको प्राइम मिनिस्टर समझता है?

भैया इतनी सी पीक थूकने की बात को लेकर तुम हमारे पुरखों तक पहुंच रहे हो। साथ ही हमारे साथ-साथ बेचारे प्राइम मिनिस्टर को भी घसीट रहे हो। जिसने आज तक तंबाकू का पान तो क्या, कभी जनाने पान के दर्शन भी नहीं किए होंगे। हां जनाने हाथों की कठपुतली बन कर धृतराष्ट्र जरूर बने हुए हैं।

पुलिसिया, काका कल्लन की बातों से बोर सा हो गया था। अभी तक काका ने महात्मा गांधी की फोटो वाले कागज उसके सामने नहीं परोसे थे और इतनी देर से बक-बक किए जा रहा था।

चुपचाप दो सौ रुपए निकाल और पेनल्टी भरो, नहीं तो अभी अन्दर करता हूं। बहुत देर से तुम्हारी बकवास सुन रहा हूं।

दो सौ रुपए? अरे काहे के दो सौ रुपए। गांधी के राज में हम आपको अपनी मजबूरी समझा रहे हैं और आप है कि समझने का नाम ही नहीं ले रहें है।

आपने यह जुमला तो सुना ही होगा। ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ अरे भाई हमारी मजबूरी समझने का प्रयास करो। हमने अपनी कैसी रोनी सूरत बना रखी है, कितनी देर से आपके सामने इस सार्वजनिक स्थान पर गिड़गिड़ा रहे हैं तुम्हें इतने पर भी दया नहीं आती।

पुलिसिया काका की बातों से कुछ ज्यादा ही चिढ़ सा गया। बोला, मैं बहुत देर से तुम्हें देख रहा था तुम प्लेटफॉर्म पर महिला सवारियों को देखकर कैसे लार टपका रहे थे। अभी छेड़-छाड़ के आरोप में तुम्हें बंद करने में मुझे देर नहीं लगेगी।

वाह साहब! शराफत की भी कोई हद होती है हम है कि मजबूरी दिखा रहे हैं और आप है कि आरोप पर आरोप मंढते जा रहे हैं। आप क्या जानो, महिलाओं के हमारे ऊपर कितने अहसान हैं? हम क्यों उनको इतना कृतज्ञ दृष्टि से देख रहे थे। वैसे भी किसी को देखना कोई अपराध है क्या?

अब बताओ तुम किस अपराध की मुझसे पेनल्टी वसूल रहे हो। (काका द्वारा थूका गया पीक अब तक खंभे पर सूख चुका था) मैंने कहीं थूका ही नहीं और तुम हो कि जबरदस्ती मुझसे पैसा मांग रहे हो। चलो तुम्हारे बड़े साहब के पास, अभी तुम्हारी शिकायत करता हूं कि प्लेटफॉर्म पर सभ्रान्त नागरिकों को डरा-धमका कर पैसा वसूल कर रहा है।

काका को गिरगिट की तरह एकदम रंग बदलता देख पुलिसिया झेंप गया। अचानक उसे कुछ कहते और करते नहीं बना। थोड़ी देर हतप्रभ रहकर बोला 

अच्छा अब तक तो मजबूरी दिखा रहे थे। ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ जुमला सिखा रहे थे और अब इतनी सी देर में इतनी मजबूती कहां से आ गई?

नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं हैं। जहां जहां मजबूरी होती है वहां हमें अपनी मजबूरी दिखानी ही पड़ती है। गांधी को हर हाल में याद करना ही पड़ता है। बिना गांधी के हम कुछ भी कर सकने में पंगु है।

काका कल्लन प्लेटफॉर्म पर चहल कदमी करते हुए बाहर निकल आए और पुलिसिया जवान अपनी राह पर।

 

Hanuman Mukt

93, Kanti Nagar

Behind head post office

Gangapur City(Raj.)

Pin-322201

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