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हास्य-व्यंग्य : नए भूत का बाडी-प्रवेश

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प्रमोद यादव

रेल की पटरी के किनारे विशालकाय पीपल के पेड़ पर उनींदा सा लटका हुआ भूत किसी के आने की आहट से चौकन्ना हुआ..देखा- कोई नया जवान भूत सामने आ लटक गया..

उसने आँखें मलते कहा - ‘ नए-नए लगते हो ?

‘ हाँ जी..अभी-अभी ट्रेन से कटकर आ रहा हूँ.. और आप ? ’ नए ने पूछा .

पेड़ पर लटके पहले भूत ने जवाब दिया- ‘ हफ्ते भर से लटका हूँ यार..यहीं बगल के हाईवे पर एक्सीडेंट हो गया था..’

‘ अच्छा..अच्छा..क्या अब तक रहने लायक कोई बाडी नहीं मिला ? ‘ नए ने प्रश्न किया.

‘ अरे नहीं दोस्त .. बाडी तो कई मिले..पर अब तक कोई मनमाफिक नहीं मिला..’

‘ मनमाफिक ? कैसा मनमाफिक भाई ? ‘

 

‘ अरे लम्बी कहानी है यार .. दो लाख की एक नई बाईक लिया था..हफ्ता भर भी नहीं चलाया कि हाईवे में एक हाईवा ने मेरा “ हरि ओम “ कर दिया..मुझे बाइक सहित रौंद दिया..तब से यहीं बैठा हूँ..इस इंतज़ार में कि कोई ऐसा ही बाईकवाला गुजरे तो उसके बाड़ी में घुंसू..ताकि मेरी अतृप्त आत्मा को शान्ति मिले..अब तक बाईस हजार बाईक यहाँ से गुजर चुके पर जिस माडल का बाईक मुझे चाहिए..वो अब तक नहीं गुजरा..अब तुम अपनी बताओ..तुम इत्तिफाकन एक्सीडेंट हुए या ख़ुदकुशी की ? ‘

‘ क्या बताऊँ भूत भाई..बड़ी दुखभरी कहानी है मेरी...अच्छी-खासी जिंदगी जी रहा था..कि एक बेवफा के इश्क में बर्बाद हो गया..उसने प्यार मुझसे किया और शादी किसी और से कर ली..बस..मैं बेवफाई बर्दाश्त न का सका और ट्रेन में कट टुकडे- टुकडे हो प्यार में कुर्बान हो गया..’

‘ बड़े छोटे दिल के निकले यार..’ पहले वाले भूत ने कहा- ‘ इत्ती सी बात पर टुकडे- टुकडे हो गए..ये तुमने अच्छा नहीं किया..इससे अच्छा तो ये होता कि तुम उसके टुकडे- टुकडे कर देते..कम से कम चैन से जीते तो रहते..यूं भूत बन भटकना तो नहीं पड़ता..’

‘ कैसी बातें करते हो भाई..जिससे इतना प्यार किया उसके टुकडे- टुकडे कर देता ? ‘

 

‘ अरे मेरे भोले भगत..ज़माना बदल गया है..अब कोई यहाँ लैला-मजनूं .. हीर-रांझा या शीरी-फरहाद..की तरह प्यार नहीं करता.. आजकल की लड़कियां कुछ ज्यादा ही एडवांस हो गई हैं..किसी का भी मोबाइल खंगाल लो..हरेक के आठ-दस बॉयफ्रेंड तो मिल ही जायेंगे..उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वो किससे प्यार करती है..तुमने ज्यादा समझदारी दिखा के अच्छा नहीं किया..तुम्हे आत्महत्या का इरादा बदल लड़की ही बदल लेना था..पर तुम तो मजनूं के औलाद निकले..खैर...बताओ..तुम्हारा फ्यूचर प्लान क्या है ?..कहाँ रहना है अब तुम्हें ? ‘

‘ बड़े भैया..मैं तो एकदम ही नया-नया हूँ इस क्षेत्र में.....मुझे नहीं मालूम कि क्या मेरे लिए माकूल होगा..आपको जैसे बाईक वाले की तलाश है वैसे ही मेरे लिए कोई अच्छा सा बाडी तलाश दो जिसके भीतर घुस मैं प्यार-व्यार सब भूल जाऊं..मेरी सारी संवेदनाएं जहां घुसते ही मर जाए. और बड़े सुकून से रह सकूँ..’

 

‘ ठीक है..कुछ सोचता हूँ कि तुम्हारे लिए कौन उचित होगा..तब तक तुम पेड़ में लटक थोडा सुस्ता लो..’

नया भूत आँखें भींच आराम से लटक गया.

तभी सायरन बजाते एक लालबत्ती वाली सफ़ेद रंग की कार पीपल के पेड़ के पास आकर रुकी..कार से एक भारी-भरकम काया वाला आदमी झक सफ़ेद पाजामा –कुरता पहने उतरा..सिर पर सफ़ेद गांधी टोपी थी जिसे उसने बेदर्दी से उतार सीट पर फेंका.. फिर पीपल से थोडी दूरी बना वह खेत में उतरा और हल्का होने जल्दी-जल्दी पाजामें का नाडा खोलने लगा..पीपल पर चिंतन में लटका भूत उसे देखते ही एकाएक चिल्ला उठा- ‘ यूरेका...यूरेका..’

नया भूत घबराकर उठ गया.. पूछा –‘ क्या हुआ.. क्या हुआ.. ’

‘ अरे पा लिया..पा लिया..उठो..उठो..तुम्हारे लिए नया घर ढूंढ लिया..वो देखो..वो जो हल्का हो रहा हैं न..उसमें हौले से घुस जाओ..वो तुम्हारे हिसाब से फिट है...आराम-तलब वाला लगता है..ए.सी. में घूमता है,, वहीँ तुम्हें ठंडक मिलेगी..जल्दी जाओ.. तुरंत ही गृह-प्रवेश कर लो..कहीं शुभ घडी निकल न जाए..आल द बेस्ट..बाय... बाय.. टा..टा...’

पलक झपकते ही नया भूत मूत्र विसर्जित करते वी.आई.पी. ( मंत्रीजी ) के भीमकाय बाडी में प्रवेश कर गया..उसके घुसते ही वो हाथी काया काफी कसमसाया और बड़ी मुश्किल से कार तक पहुँच पाया.. उसके बैठते ही फिर एक बार पीपल के भूत ने नए भूत को हाथ हिला ‘ दस्वीदानियाँ ‘ कहा ..और पलक झपकते ही लालबत्ती वाली कार हाइवे पर सरपट दौड़ते सायरन बजाते गायब हो गई..पीपल के भूत ने एक जोर की अंगड़ाई ली जैसे कोई बहुत ही भारी काम से निवृत्त हुआ हो और फिर पहले की तरह आराम से लटक गया.

एक घंटे बाद ही नया भूत वापस उड़ते सामने आ लटक गया..उसे देख पीपल वाला हतप्रभ रह गया..पूछा- ‘ कैसे ? ‘

उसने कहा- ‘ रांग नंबर..’

‘ क्या हुआ ? ‘ भूत ने पूछा.

 

‘ अरे क्या बताऊँ भैया..आपने भी कहाँ धंसा दिया..उसमें तो आलरेडी एक ताकतवर और जाहिल किस्म का भूत घुसा हुआ है..निष्ठुर और बिगडैल तो है ही..मियाँ को बात करने की भी तमीज नहीं..मैं घुसा क्या कि उसने जोर-जोर से धकियाना ही शुरू कर दिया..कहने लगा- “यहाँ मेरा एकक्षत्र राज्य है..खिसको यहाँ से.. “ मैंने कहा कि भाई मैं अतिथि हूँ.. अतिथि देवो भव ..कुछ तो ख्याल करो..तो उसने भद्दी सी गाली देते कहा- “ सारी दुनिया को मैं सिखाता हूँ..तू मुझे तमीज सिखाएगा..चल निकल बाहर..दुबारा इधर मुड़कर देखना भी नहीं.. नहीं तो तेरी उलटी टांग को और अल्टी-पल्टी कर उसमें फीता बाँध मंत्रीजी की तरह काट दूंगा....जानता नहीं ये वी.वी.आई.पी. की बाडी है.. मोटी चमड़ी वाले मंत्रीजी की काया है....तुम जैसे कमजोर भूत इसे नहीं झेल सकते....इसके रोम-रोम में मैं बसा हूँ..इसके सिर पर मेरे सिवा कोई और सवार हो ही नहीं सकता..चलो फूटो यहाँ से..” बड़ा ही अभद्र भूत था मित्र ..मेरा तो पल भर में ही दम घुटने लगा था..इसके पहले कि वो धक्का दे निकालता मैं स्वयं ही “बेआबरू हो तेरे कूचे से निकले “ की तरह निकल आया...’

 

‘ चलो ..ठीक किया..मुझे मालुम होता कि बाडी खाली नहीं तो काहे तुम्हें भेजता यार ..खैर.. तुमने पूछा नहीं कि कौन था वह ? क्या नाम था उसका ? मैं तो ऐसे किसी ताकतवर भूत के बारे में कभी सुना नहीं.. जरुर ही कोई डॉन टाईप का भूत रहा होगा..’ पीपल वाले भूत ने कहा.

‘ पूछा था..उसने कुछ विचित्र सा नाम बताया था ..हाँ..याद आया..उसने अपना नाम “भ्रष्टाचार” बताया था..’

 

सुनना भर था कि पीपल वाला भूत एकदम से गायब हो गया.. उसके नदारत होते ही नया भूत भी डर के मारे पीपल के पेड़ से उड़ नीचे हाईवे से गुजरती एक स्कूटी सवार नाजनी के सुन्दर शरीर में तीर की गति से प्रवेश कर गया...शुरू-शुरू में नई बाडी उसे थोडा अनकम्फर्टेबल लगा..थोड़ी शर्म भी आई पर अब वह मजे से है..

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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