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बाल कहानी - भय से मुक्ति

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अशोक गुजराती
   धवल की दादी मां गांव से कुछ दिनों के लिए आयी थीं. उसे वे इतनी अच्छी लगीं कि वह रोज़ रात को उनके ही पास सोने लगा. फिर वह उनसे कहानी सुनाने की ज़िद भी करता. दादी अपने परिवेश के अनुसार उसे देवताओं की, राक्षसों की, भूतों की तथा जंगली जानवरों की पारम्परिक कथाएं सुनातीं और वह उन्हें सुनते-सुनते उनसे चिपटकर सो जाता.


   दादी तो चली गयीं वापिस लेकिन उसके दिमाग़ में इन कहानियों ने भय का संचार कर दिया. वह सपने में भी यही सब देखता और सशंक हो चौंक कर उठ बैठता. अक्सर उसके गले से नामालूम-सी चीख निकल जाती तो कभी वह अचानक जाग कर रोने लगता.


   पापा को उसके ये लक्षण ठीक नहीं लगे. उन्होंने उसके यों भयभीत हो जाने का कारण बातों-बातों में जान लिया. तब उन्होंने उसे राक्षस, भूत और खूंख़ार पशुओं के विषय में वास्तविक जानकारी से अवगत कराने की कोशिश की. राक्षस या भूत का कोई अस्तित्व नहीं होता और शेर-भालू-बाघ इत्यादि शहर से बहुत दूर जंगल में होते हैं- यह उसे समझाया.


   धवल होशियार था. उसने इन सच्चाइयों को तुरंत ग्रहण कर लिया. इससे उसका डर कम तो हुआ पर बचपन से मस्तिष्क में भरा बैठा संशय का घोर कुहासा उसे आशंकाओं की खाई से उतना निकाल नहीं पाया.


   उसे मम्मी सुबह-सुबह स्कूल छोड़ने जातीं और छुट्टी होने पर लेने भी आतीं. मम्मी का साथ उसे आ-जा रहे वाहनों अथवा लोगों से बचाता रहता. इस सुरक्षा के चलते उसे कुछ हादसे भी दूर से दिखते रहे... कार की टक्कर लगने से घायल हुए एक बच्चे को और कुछेक गुंडों द्वारा एक व्यक्ति को लूटते-मारते हुए भी उसने देखा. बस यह नया आतंक उसके मग़ज़ में घुस बैठा. वह राक्षस, भूत या वन्य प्राणियों के स्थान पर अब लोगों से और स्कूटर-बाइक-मोटर आदि से भय खाने लगा.


   मम्मी के ध्यान में यह आते ही उन्होंने उसके पापा को बताया कि धवल आसपास हो रही अकस्मात आहटों से, भीड़-भाड़ से याकि तेज़ आ रहे वाहनों से बहुत ज़्यादा ख़ौफ़ खाता है. पापा को यह चिन्ताजनक लगा कि ऐसे तो वह बड़ा होकर इस निष्ठुर दुनिया का सामना कर नहीं पायेगा. हो सकता है वह उम्र के साथ सम्भल जाये लेकिन कहीं उसके अपरिपक्व मन का यह वहम स्थायी रूप ले ले तो...


   रविवार को वे तैयार होकर मार्केट जाने निकले, जो उनके घर से निकट ही था. धवल हठ पर उतर आया कि वह भी चलेगा. पापा मान गये. दोनों जब बाज़ार में पहुंचे तो पापा ने उसे एक दुकान के पास रोक कर कहा, 'धवल तू यहीं रुक, मैं अभी आता हूं, कहीं जाना नहीं.'


   देर तक धवल वहीं खड़ा लोगों और गाड़ियों की भाग-दौड़ देखता रहा. उसे इससे हल्की-सी सिहरन तो हो रही थी परन्तु पापा के कहीं पास ही होने के भरोसे से वह निर्भय बना रहा. उसे स्वयं पर क्रोध भी आता रहा कि ये सारे तो अपने में ही मगन हैं, इनसे भला मैं क्यों घबराता रहता हूं...


   काफ़ी समय बीत गया पर पापा नहीं लौटे. अब धवल के लिए परीक्षा की घड़ी थी. उसने इतनी देर में अपने-आप में भरपूर साहस इकट्ठा कर लिया था कि वह जिन बेकार की चीज़ों से अब तक आतंकित होता रहा है, वे तो सामान्य-सी हैं. उसकी आयु के चन्द बच्चों को उसने अकेले इधर-उधर आते-जाते देखा तो उसकी हिम्मत भी बढ़ी- क्या वह बिना पापा के घर तक जा नहीं सकता... यह रास्ता उसका जाना-पहचाना है और उसे पता है कि सड़क के बायें से चलना होता है...


   और लो, वह घर आ गया- कोई दुर्घटना नहीं हुई, किसीने उसे छेड़ा भी नहीं.... वह बेहद ख़ुश हुआ. तभी उसने पापा को अपने पीछे आते हुए देखा. पापा ने उसे शाबासी दी कि वह किसी के सहारे के बग़ैर यहां तक आ पहुंचा. फिर यह भी बताया कि वे कहीं गये नहीं थे, उस पर ही नज़र रखे हुए थे. अपनी इस सफलता पर धवल को गर्व हो आया कि वह डरपोक नहीं है, वह फ़िज़ूल ही अब तक डरता रहता था.
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली-110 095. सचल : 9971744164.

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