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हास्य व्यंग्य - जो ना समझे वो अनाडी है......

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सुशील यादव

समझने के लिए जिस चीज की जरूरत होती है वो है अकल....। अकल का वैज्ञानिक आकलन चाहे जैसा भी हो, मनोवैज्ञानिक आकलन कहता है, आदमी अपने आसपास की रोज की घटनाओं पर जो सहज, तात्कालिक प्रतिक्रिया दे दे वही ‘अकल’ है ।

लोग हजारों पैकेट मेगी खा लिए, मगर किसी को ना सूझी कि देख लें इसके अन्दर क्या है ....?सरकार गंभीर बीमारियों की जड़ ,सिगरेट ,गुटका तम्बाखू पर इतना तल्ख नहीं होती जो ‘मेगी’ पर हो गई ।साल भर पुरानी पेंडिंग रिपोर्ट के बीच भी लोग टनों मेगी खाए होंगे, मगर अफसरान एक ही दिन में सारे चिराग बुझाने पर आमादा हो गए ।कहीं अपने तन्त्र में कुछ तो गड़बड़ है।

बाबा लोग पुत्र जनक दवाई धडल्ले से बेच लेते हैं .....।ये वैज्ञानिक सर्वमान्य तथ्य है,कि बिना ‘वीर्य’ के कोई जीव-धारण प्रक्रिया महाभारत और रामायण काल के बाद लगभग बंद हो गई।’ अपने बाबा’ इस कलयुग में किस ‘वीर्य’ का इस्तेमाल करते हैं वे ही जाने ........? गये काल के ग्रन्थों की बातें हैं ,जहाँ वरदान से कही घड़े में सौ पुत्र जन्म ले लेते थे ,कहीं किसी अभिमंत्रित फल खा लेने से स्त्रियाँ गर्भ धारण किया करती थी। इस काल में , ‘चमत्कारी-पुरुष’ लोगों के ‘वहम’ को भुनाने की , कोई भी गुंजाइश उधार नहीं छोड़ते ।उधर जहाँ कुंआरेपन को अक्षत रखने का भी प्रयोजन किया जाता था,लोक- लाज,लिहाज , बदनामी के डर से ये रिलेक्शेसन भी दिया जाता था कि बच्चा योनी के अलावा और कहीं से भी पैदा किये जा सकते हैं ।कोई कान से पैदा करना प्रिफर कर लेती थी,कोई और कहीं से ....... यथा नाम रखने की भी सुविधा हो जाती थी ...’कर्ण’ .....।और तो और अनंत काल के ऊर्जा श्रोत ‘सूर्य’ ,हवा(पवन-पुत्र), पानी(मत्स्य कन्या) भी बच्चा देने के कारक हुआ करते थे बस प्रार्थना ,तप ,तपस्या में लींन होने की हैसियत देखी जाती थी।इस बच्चे को आज के जमाने के स्कूल में दाखिला लेते समय आपने पिता का नाम ‘सूर्य’ बताया जाता तो, दाखिला मास्टर जी, बाकायदा उसमे कुमार,प्रकाश,मल,सेठ जोड़ कर यूँ कर देंगे छात्र, कर्ण आत्मज सेठ सूर्य प्रकाश, सूरजमल, सूर्यभान ,श्री सूर्य कुमार आदि ....।

हमने सविस्तार इशारा कर दिया कि बच्चा कैसे पैदा होते थे ,अब टेस्ट ट्यूब के जमाने में, कैसे होना चाहिए, बाबाओं का चक्कर छोडिये, गर्भाधान के पौराणिक कथाओं से अपने आप को बाहर निकालिए केवल और केवल वैज्ञानिक तरीका अपनाइए वो भी तब जब सहज से उपलब्ध न हो ।

जो ना समझे .....?

बात हम इशारों में करें और आप न समझे ...इतने नादान नहीं हैं आप ....।जिनको कभी वीसा नहीं मिलता था ,जिनकी छवि बिगड़ी हुई थी ,वो आज अपनी छवि को लेकर अति उत्साहित हैं ।दुनिया को दिखाने निकल पड़े हैं देखो किसी जमाने में हमें वीसा के काबिल न समझा गया था ,इतने बुरे नहीं थे हम .....।वे हर देश को छान लेना चाहते हैं .....अपनी सोच की पाठशाला की नीव रखके ‘नीतिग्य’ होने का, प्रमाण देने को लालायित हैं ।यहाँ तक उन्होंने ,बंगलादेशीय दौरे में जमीन को आपसी समझ से बटवारा किये जाने को, बर्लिन की दीवार गिरने के समकक्ष बता के, ये भी मंशा जाहिर कर दी की,चूकि हम गरीब देशों के राष्ट्र मुखिया लोग हैं अत: हमारी बात बड़े देशों में न सुनी जाएगी ,वरना इस बात पर ‘नोबल पुरूस्कार’ देने की सोची जा सकती है ।

जो ना समझे .....?

भाइयों, दिल्ली चलो ....!एक जमाने का नारा हुआ करता था ।अब राजनीति के विद्यार्धियों के लिए यही दिल्ली , थ्योरी ,प्रेक्टिकल,शोध और करियर बनाने का एकमात्र स्थल बन गया है ।’रामलीला’ मैदान एक ऐसा तीर्थ है जिसने कई दिग्गजों के करियर बनाए ,डूबती नैय्या को पार लगाया ,नये नेताओं की उपजाऊ फसल दी ।इसी में उभरे, मफलर लेस मेंन....।ये अगर सब्जी –भाजी का धंधा करते तो आज भिंडी ,परवल ,आलू,प्याज के आसमां छूते दाम नहीं न दीखते ...? इन्हें बोना ...सींचना ...सहेजना ....काटना ...बेचना अच्छा आता है ।या समझ लो दिनों दिन पारंगत होते जा रहे हैं ।अपनी बात समय पर ‘बोते’ हैं,खाद मिट्टी अपने सहायकों से डलवा लेते हैं। ‘काटने’ का समय आता है, तब स्वयं हाजिर हो जाते हैं ।मौसम का ज्ञान इन्हें इनके विपक्षी-जीव से आप ही आप मिल जाता है ।ये जड़ खोदने के स्पेशलिस्ट हैं ,आप ‘पेड़’ पर इशारा कर दो ,उसकी खामियां गिना दो क्या मजाल वो आगे खड़ा रह जावे ।वे जनता से पूछने का ढोंग करने निकल जायेंगे ,क्या कहते हो भाइयों ,गिरा दें ......।जनता बेचारी को ...अलाव तापने के लिए गिरा हुआ पेड़ मिले तो वो क्यूँ न कहेगी.... गिरा दो ......।वे लगे हुए हैं .....।

लगता है बिजली-पानी के बाद,इस प्रायोगिक खेल में ,दिल्ली ‘ताज़ी-हवा’ को भी न मुहताज हो जाए .......

जो ना समझे ......?

अब , बिहार की खलबली देखिये ।माझी पेड़ पर पके आम रोज गिनते हैं ...केल्कुलेट करते हैं एक आम की बाजार में कीमत पन्द्रह रुपये एक पेड़ में दो सौ सत्ताईस आम ,बगीचे में एक सौ तिहत्तर पेड़, सो मल्टीप्लाई इट ........।फिर धनिया ,अदरक,पोदीना मिर्ची ,कटहल ,लीची अलग ..... ।वे इस मामले में तैनात सुरक्षा जवानों के पे ...भत्ते पर होने वाले खर्चों को नहीं हिसाबतें जो केवल उनकी बदौलत हो रहा है ।वे बंगला काबिज नहीं होते तो एक-दो संतरी से सन्तरों को सुरक्षित रखा जा सकता था । ।

उधर दूसरी खलबली भी है सामने चुनाव है ।अब की बार ,दबंग से मुकाबले की संभावना है ।इस संभावना ने दुश्मन के दुश्मनों को, आपस में मिलाने का काम कर दिया है ।कहते हैं ,भय ,संकट और सुनामी में कट्टर से कट्टर दुश्मन पडौसी भी सहज सहायता के लिए एकजुट हो जाते हैं । देखे, वे सीट बंटवारे के दिन या सी एम के नाम पर, कब सर-फुटव्वल पर आमादा-उतारू होते हैं ....?

चलते-चलते..... ,इस चुनावी शोरगुल में, ’पप्पू कांट डांस साला’...... की आवाज किस तरफ से आ रही है ......कोई बताये तो सही ....?

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

 

susyadav7@gmail.com

०९४०८८०७४२०

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(ऊपर का चित्र - रूपा गोस्वामी की कलाकृति)

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