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भाषाविज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषाविज्ञान के अध्ययन की दिशाएँ


प्रोफेसर महावीर सरन जैन
किसी भाषा विशेष की कालक्रमिकता तथा एककालिकता के संदर्भों तथा एकाधिक भाषाओं अथवा बोलियों के तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन की निम्नलिखित दिशाएँ अथवा अध्ययन पद्धतियाँ हैं।

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान (Historical Linguistics)

उन्नीसवीं शताब्दी तक ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन का महत्व रहा। जितने अध्ययन सम्पन्न हुए उनमें भाषाओं की ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विवेचना की गई। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अन्तर्गत कालक्रमानुसार भाषागत विकास का अध्ययन तथा भाषा के प्रत्येक स्तर में होने वाले परिवर्तनों के कारण सहित विवेचना की जाती है। इधर भाषा-वैज्ञानिक ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ते हुए ज्ञात भाषिक रूपों के तुलनात्मक विवेचना एवं पुनर्निर्माण (reconstruction) द्वारा अज्ञात एवं लुप्त रूपों को प्राप्त करने की दिशा में प्रयत्नशील है।
20वीं शताब्दी के पूर्व भाषावैज्ञानिक संकालिक अथवा वर्णनात्मक भाषाविज्ञान को कोई महत्त्व नहीं देते थे। इस सम्बन्ध में एच. पाल. का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने अपना वक्तव्य दिया था कि ऐतिहासिक भाषा पद्धति के अतिरिक्त अन्य कोई पद्धति वैज्ञानिक नहीं है। एच. पाल. ने संकालिक एवं वर्णनात्मक विज्ञान की वैज्ञानिकता का खंडन किया है। पाल के समय किसी विषय के वैज्ञानिक अध्ययन में तथ्यों की कारण सहित व्याख्या प्रस्तुत की जाती थी। पाल ने इसी कारण प्रतिपादित किया कि भाषा का अध्ययन करते समय कारणों की विवेचना केवल भाषा का ऐतिहासिक अध्ययन ही कर सकता है। अतएव ऐतिहासिक भाषाविज्ञान ही वैज्ञानिक अध्ययन है; वर्णनात्मक अथवा संकालिक नहीं। इसी कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों की विवेचना उसके ऐतिहासिक विकास के सन्दर्भ में की गई। किसी भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन से तात्पर्य उस भाषा के विकास तथा उसमें हुए परिवर्तनों की विवेचना से होता था।
Cf. M. Ghatage : Historical Linguistics and Indo-Aryan Languages, p.1, (University of Bombay, 1962))
भारतीय भाषाओं के संदर्भ में निम्न अध्ययन द्रष्टव्य हैं –
1. डॉ. सुनीति कुमार चैटर्जी - The origin and development of the Bengali language, Calcutta University press, Calcutta (1926)
2. Kataki, Banikanta : Assamese: Its Formation and Development, Gauhati, Assam: Government of Assam (1941)
3. डॉ. बाबू राम सक्सेना – अवधी का विकास ( Evolution of Awadhi (a branch of Hindi) – डी. लिट् की थीसिस का हिन्दी परिवर्द्धित रूपांतर)
4. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा - (1)La langue Braj (Published by Adiren-Maisonneuve, 5, rue de Tournon, Paris (1935)
5. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा - ब्रजभाषा का विकास (डी. लिट्. उपाधि के लिए फ्रेच भाषा की थीसिस का परिवर्द्धित हिन्दी रूपांतर)
6. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा – हिन्दी भाषा का विकास, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण, (1933)
7. डॉ. उदय नारायण तिवारी – भोजपुरी भाषा और साहित्य (डी. लिट्. उपाधि के लिए अंग्रेजी भाषा में ‘ए डाइलेक्ट ऑफ भोजपुरी’ शीर्षक शोध-प्रबंध का परिवर्द्धित हिन्दी रूपांतर)
8. डॉ. उदय नारायण तिवारी – हिन्दी भाषा का उद् गम और विकास, भारती भंडार, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण (1955)
9. डॉ. माता बदल जायसवाल – मानक हिन्दी का ऐतिहासिक व्याकरण, महामति प्रकाशन, इलाहाबाद (1979)
10. आर.पी. कुलकर्णी - मराठी भाषा – उद् गम और विकास
11. Kataki, Banikanta : Assamese: Its Formation and Development, Gauhati, Assam: Government of Assam (1941)
12. Pandit, P.B. : "Historical Phonology of Gujarati Vowels", Language 37, Deccan College, Poona(1961)
13. Meenakshisundaran, T.P. : A History of Tamil Language, Poona: Deccan College (1965)
14. Andronov, Mikhail Sergeevich . A Grammar of the Malayalam Language in Historical Treatment. Wiesbaden: Harrassowitz, (1996)
15. Bloch, J. : The Formation of Marathi Language. (Translated by Dev Raj Chanan), Motilal Banarasidas (1970)
16. Sir Ralph Lilly Turner : A Comparative and Etymological Dictionary of the Nepali Language.
17. Sir Sir Ralph Lilley Turner : A Comparative Dictionary of the Indo-Aryan Languages
ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के विशेष अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ
1. Winfred P. Lehmann, Historical Linguistics: An Introduction (Second Edition) (Holt, 1973)
2. R. L. Trask (ed.), Dictionary of Historical and Comparative Linguistics (Fitzroy Dearborn,)
3. April McMahon, Understanding Language Change (Cambridge University Press, 1994)
4. Roger Lass, Historical linguistics and language change. (Cambridge University Press, 1997)
5. Theodora Bynon, Historical Linguistics (Cambridge University Press, 1977)





तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Linguistics)

तुलनात्मक भाषाविज्ञान से तात्पर्य प्रायः प्राचीन भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से प्रसूत निष्कर्षात्मक अध्ययन से लिया जाता रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी तक यूरोप में भाषा विषयक अध्ययनों में ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टियों से अधिक विचार किया गया।
सन् 1767 में फ्रांसीसी पादरी कोर्डो ने संस्कृत के कुछ शब्दों की तुलना लैटिन के शब्दों से की। इससे भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन की शुरुआत मानी जा सकती है। इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बोडन-चेयर के प्रोफेसर तथा संस्कृत व्याकरण, संस्कृत-अंग्रेजी कोश, अंग्रेजी-संस्कृत कोश आदि विश्वविख्यात रचनाओं के प्रणेता सर मोनियर विलियम्स जोंस ने जनवरी, 1784 में ‘द एशियाटिक सोसायटी’ की नींव डालते हुए संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया। इन्होंने प्रतिपादित किया कि भाषिक संरचना की दृष्टि से संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन सजातीय हैं। सन् 1786 में इन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया तथा स्थापना की कि यूरोप की अधिकांश भाषाएँ तथा भारत के बड़े हिस्से तथा शेष एशिया के एक भूभाग में बोली लाने वाली भाषाओं के उद्भव का मूल स्रोत समान है। इस स्थापना से आदि-भारोपीय भाषा के सिद्धांत की उद्भावना हुई। जर्मन भाषावैज्ञानिक फ्रेंज बॉप की सन् 1816 में संस्कृत के क्रिया रूपों की व्यवस्था पर फ्रेंच में पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें इन्होंने संस्कृत, परशियन, ग्रीक, लैटिन एवं जर्मन के उद्भव के कार्य को प्रशस्त किया। सन् 1820 में इन्होंने अपनी अध्ययन परिधि में क्रिया रूपों के अतिरिक्त व्याकरणिक शब्द भेदों को समाहित किया। इनका संस्कृत, ज़ेंद, ग्रीक, लैटिन, लिथुआनियन, प्राचीन स्लाविक, गॉथिक तथा जर्मन भाषाओं के तुलनात्मक व्याकरण का ग्रंथ (1833-1852) में प्रकाशित हुआ। इसमें विभिन्न भाषाओं की शब्दगत रचना के आधार पर इनकी आदि-भाषा के अस्तित्व के विचार की पुष्टि की गई। डेनिश भाषी रैज्मस रैस्क ने सन् 1811 में आइसलैंड की भाषा तथा सन् 1814 में प्राचीन नार्स भाषा पर अपने कार्यों के द्वारा यह प्रतिपादित किया कि भाषा के अध्ययन में शब्दावली से अधिक महत्व स्वन (ध्वनि) एवं व्याकरण का है।

ग्रिम नियमः

रैस्क से प्रभावित होकर जर्मन भाषी जेकब ग्रिम ने अध्ययन परम्परा को आगे बढ़ाया। सन् 1818 से 1837 के बीच इनका जर्मन व्याकरण से सम्बंधित ग्रंथ चार भागों में प्रकाशित हुआ। इसमें इन्होंने विभिन्न युगों में विवेच्य भाषाओं के शब्दों में होने वाले स्वनिक-परिवर्तन अथवा स्वन-परिवृत्ति के नियमों का प्रतिपादन किया जो ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में ‘ग्रिम नियम’ से जाने जाते हैं। इन नियमों के आधार पर इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न युगों में भाषाओं में होने वाले स्वन-परिवर्तनों की नियमित प्रक्रिया होती है।

ग्रैसमेन नियमः

जर्मन भाषावैज्ञानिक हेरमन ग्रैसमेन ने ‘ग्रिम नियम’ के अपवादों को स्पष्ट किया तथा प्राचीन ग्रीक एवं संस्कृत के स्वनिम प्रक्रम की असमानता को ‘ग्रैसमेन नियम’ से स्पष्ट किया। उनके दो नियम प्रसिद्ध हैं। पहला नियम आदि-भारोपीय-भाषा एवं संस्कृत तथा प्राचीन ग्रीक से सम्बंध रखता है। इनकी यह स्थापना है की आदि-भारोपीय भाषा के शब्दों के पहले अक्षर के महाप्राण व्यंजन के बाद यदि दूसरे अक्षर में भी महाप्राण व्यंजन हो तो संस्कृत एवं ग्रीक भाषाओं के शब्दों में प्रथम अक्षर का महाप्राण व्यंजन अल्पप्राण में बदल जाता है। दूसरे नियम के अनुसार आदि-भारोपीय-भाषा के शब्दों में प्रयुक्त ‘स्’ ग्रीक में ‘ह्’ में परिवर्तित हो जाता है; अन्य भाषाओं में यह परिवर्तन नहीं होता। ग्रैसमेन के नियम भी निरपवाद नहीं हैं।

केन्तुम् वर्ग और सतम् वर्ग की भारत-यूरोपीय भाषाएँ :

अस्कोली नामक भाषाविज्ञानी ने 1870 ई0 में भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं को दो वर्गों में बाँटा। इन भाषाओं की ध्वनियों की तुलना के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आदि-भारत-यूरोपीय भाषा की कंठ्य ध्वनियाँ कुछ शाखाओं में कंठ्य ही रह गईं और कुछ में संघर्षी (श, स, ज़) हो गईं। इस प्रवृत्ति की प्रतिनिधि भाषा के रूप में इन्होंने लातिन और अवेस्ता को लिया और सौ के वाचक शब्दों की सहायता से अपने निष्कर्ष को प्रमाणित किया। लातिन में सौ को केन्तुम् कहते हैं और अवेस्ता में सतम्। इसीलिए इन्होंने समस्त भारत-यूरोपीय भाषाओं को केन्तुम् और सतम् वर्गों में विभाजित किया।
सतम् वर्ग                              केन्तुम् वर्ग
1. भारतीय - शतम्              1. लातिन - केन्तुम्
2. ईरानी - सतम्                  2. ग्रीक - हेकातोन
3. बाल्तिक - जि़म्तस           3. जर्मेनिक - हुन्द
4. स्लाविक - स्तो                 4. केल्टिक - केत्
                                                 5. तोखारी - कन्ध
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जिस भाषाओं के विकासगत अध्ययनों की तुलना की जा सकती है उसी प्रकार एककालिक अथवा संकालिक संदर्भ में निष्पन्न विभिन्न भाषाओं अथवा एक ही भाषा की बोलियों की तुलना भी प्रस्तुत की जा सकती है।उन्नीसवीं शताब्दी तक ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन का ही महत्व रहा।
बीसवीं शताब्दी से दो भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं की समानता और भिन्नताओं की तुलना की जाने लगी है। यह कार्य किसी भाषा को अन्य भाषियों एवं विदेशियों को सिखाने में सहायता एवं सुविधा के लक्ष्य को ध्यान में रखकर किया जाता है। इस अध्ययन पद्धति को व्यतिरेकी भाषाविज्ञान (Contrastive Linguistics) कहते हैं। " दो भाषाओं की व्यवस्थित तुलना से समान, भिन्न तथा अर्द्ध-समान संरचनाओं को ज्ञात किया जा सकता है और इससे यह जाना जा सकता है कि लक्ष्य भाषा सीखते समय अन्य अथवा विदेशी भाषी को किन किन स्थानों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है"।
(Cf. Lado, Robert : Linguistics Across Cultures, University of Michigan Press. (1957))
भारतीय भाषाओं के संदर्भ में निम्न अध्ययन द्रष्टव्य हैं –
1..John Beams, A comparative grammar of the modern Aryan languages of India: to wit, Hindi, Panjabi, Sindhi, Gujarati, Marathi, Oriya, and Bangali. London: Trübner, 1872–1879. 3 vols.
2..A. F. R. Hoernle. A Comparative Grammar of the Gaudian Languages with Special Reference to the Eastern Hindi, London, 1880; also published as A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the Other Gaudian Languages, London, 1880.
3. Grierson, George Abraham. Seven Grammars of the Dialects and Sub dialects of the Bihari Language (1883–87) 3 vols.
4. Grierson George Abraham, Linguistic Survey of India, 11 Vols. in 19 Parts Delhi, Low Price Publ. (2005)
5. Robert Caldwell: A Comparative Grammar of the Dravidian or South-Indian family of languages.
6. Sir Ralph Lilley Turner : A Comparative and Etymological Dictionary of the Nepali Language.
7. Sir Ralph Lilley Turner : A Comparative Dictionary of the Indo-Aryan Languages
8.Dr. S.N. Ganeshan: A Comparative Grammar of Hindi and Tamil, (University of Madras)
9. Sukkumar Sen.: A Comparative Grammar of Middle Indo-Aryan (1960)
10. सुकुमार सेन – पालि – प्राकृत – अपभ्रंश (लोक भारती प्रकाशन)
तुलनात्मक भाषाविज्ञान के विशेष अध्ययन के लिए द्रष्टव्य –
1. Raimo Anttila, Historical and Comparative Linguistics (Benjamins, 1989)
2. RL. Task (ed.), Dictionary of Historical and Comparative Linguistics (Fitzroy Dearborn, 2001)


वर्णनात्मक भाषाविज्ञान’ (Descriptive Linguistics)

बहुत से विद्वान विवरणात्मक भाषा विज्ञान का प्रयोग करते हैं। भाषाविज्ञान की विभिन्न अध्ययन पद्धतियों में एक प्रकार ‘वर्णनात्मक भाषाविज्ञान’ (Descriptive Linguistics) है। विवरणात्मक (narrative) कथन की शैली का नाम है। कुछ समाजभाषावैज्ञानिक कथा अथवा बातचीत के विश्लेषण के तरीके के लिए ‘विवरणात्मक’ शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।
अमेरिकी सम्प्रदाय के बोआस (1858--1942) का अधिकांश जीवन अमेरिकी महाद्वीप के आदिम समाजों की संस्कृति के अध्ययन में व्यतीत हुआ। आपने ´हैंडबुक ऑफ अमेरिकन इंडियन लैंग्वेजिज़' के प्रथम खण्ड की भूमिका में ´अमेरिकी वर्णनात्मक भाषाविज्ञान सम्प्रदाय' की आधार शिला रखी। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में ´विश्लेषण की तकनीकों´ को शुरु करने की दृष्टि से बोआस एवं उनके शिष्य सपीर का महत्व सबसे अधिक है। इन दोनों ने अपने शिष्यों के साथ आदिम समाजों के क्षेत्रों में जाकर अध्ययन किया। इनके अध्ययनों से भाषाविज्ञान में निम्नलिखित परिवर्तन हुए तथा नवीन पद्धतियों एवं संकल्पनाओं ने जन्म लिया-
1.ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान के स्थान पर एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान को महत्व दिया जाने लगा।
2.शब्द एवं अर्थ की अपेक्षा भाषा के व्याकरण के नियमों को जानने पर बल प्रदान किया जाने लगा। इसके लिए ध्वनि के धरातल पर ध्वनियों के स्थान पर ध्वनिमों अथवा स्वनिमों का तथा व्याकरण के धरातल पर परम्परागत व्याकरण के मॉडल में विवेच्य भाषा के उदाहरणों को रखने के स्थान पर उस भाषा की अपनी विशिष्ट व्यवस्था और संरचना के नियमों का अध्ययन करना अभीष्ट हो गया। परम्परागत व्याकरण में किसी क्लासिकल लैंग्वेज के व्याकरण के साँचे अथवा ढाँचे में आधुनिक भाषा के उदाहरणों को रख देने की प्रवृत्ति कार्य करती है। बीसवीं शताब्दी के पूर्व यूरोप की अधिकांश भाषाओं के परम्परागत व्याकरण प्राप्त होते हैं। परम्परागत व्याकरण यूरोप की एककालिक अथवा संकालिक भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप न होकर लैटिन एवं ग्रीक व्याकरणों का अनुगमन करके लिखे गए। इसी प्रकार हिन्दी के परम्परागत व्याकरण भी संस्कृत व्याकरण को आदर्श मानकर लिखे गए। इनमें संस्कृत भाषा की संरचना के अनुरूप जो नियम संस्कृत व्याकरणों में निर्धारित किए गए थे, उन नियमों के साँचों में, हिन्दी भाषा के उदाहरणों को रख दिया जाता था। आज भी हिन्दी के परम्परागत व्याकरणों में संस्कृत की भाँति आठ कारक माने जाते हैं। संस्कृत में संज्ञा के कारकीय स्तर पर 8 भेद हैं। एक संज्ञा शब्द के एक ही वचन में कारकानुसार 8 भेद हो जाते हैं। किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था संस्कृत में है। हिन्दी की व्यवस्था भिन्न है। हिन्दी में केवल दो कारक हैं – (1)अविकारी कारक (2) विकारी कारक। सम्बोधन को भी मिलाने पर तीन कारक। हिन्दी भाषा के परम्परागत व्याकरणों में, जिनको कारक चिह्न बताया जाता है, वे कारक नहीं अपितु परसर्ग हैं। इसी प्रकार लैटिन व्याकरण को आधार लेकर अंग्रेजी के जो व्याकरण लिखे गए थे उनमें प्रत्येक क्रिया के तीन पुरूष एवं प्रत्येक के एकवचन एवं बहुवचन भेद किए जाते थे। वस्तु स्थिति यह है कि ´होना´ (To be) क्रिया को छोड़करए शेष अन्य समस्त क्रियाओं के वर्तमान काल में दो रूप मिलते हैं तथा भूतकाल में केवल एक रूप मिलता है। वर्णनात्मक एवं संरचनात्मक भाषावैज्ञानिक विवेच्य भाषा की अपनी व्यवस्था और संरचना का विश्लेषण एवं विवेचन करते हैं।
3. सामग्री के विश्लेषण और वितरणगत स्थितियों के आधार पर व्यवस्थागत इकाइयों को जानने के लिए नई तकनीकों का विकास हुआ।
4.भाषा के क्षेत्र में जाकर सूचक से भाषिक सामग्री प्राप्त करने पर बल दिया गया।
सूचक के उच्चारों को इन्टरनेशनल फोनेटिक एल्फाबेटिक लिपि में लिखना अनिवार्य हो गया।
5.यह माना गया कि प्रत्येक भाषा की द्वैध व्यवस्था होती है।
6.ध्वनिमिक व्यवस्था में ध्वनि विवेचन का महत्व समाप्त हो गया। उसके स्थान पर ध्वनिमिक अथवा स्वनिमिक अध्ययन किया जाने लगा। किसी भाषा में दो ध्वनियों का वितरण किस प्रकार का है – यह जानना महत्वपूर्ण हो गया। ध्वनिमक अथवा स्वनिमिक व्यवस्था के अध्ययन का मतलब पूरक वितरण एवं / अथवा स्वतंत्र परिवर्तन में वितरित ध्वनियों का एक वर्ग अर्थात ध्वनिम अथवा स्वनिम बनाना तथा व्यतिरेकी अथवा विषम वितरण में वितरित ध्वनियों को अलग अलग ध्वनिम अथवा स्वनिम के रूप में रखने की पद्धति का विकास हुआ।
7.रूपिम व्यवस्था में उच्चार की लघुतम अर्थवान अथवा अर्थयुक्त इकाइयाँ (रूप) प्राप्ति के बाद वितरणगत स्थितियों के आधार पर रूपप्रक्रियात्मक संरचना का अध्ययन होने लगा।
8.सूचक से प्राप्त भाषिक सामग्री को प्रमाणिक मानकर उसके आधार पर भाषा के प्रत्येक स्तर पर विश्लेषण एवं वितरणगत तकनीकों के आधार पर भाषिक इकाइयों को प्राप्त करना तथा उसके बाद उनकी श्रृंखलाबद्ध संरचना के नियम बनाना लक्ष्य हो गया।
ग्लीसन ने वर्णनात्मक भाषाविज्ञान को भाषाविज्ञान की मूल शाखा कहा है।

वर्णनात्मक भाषाविज्ञान एवं संकालिक भाषाविज्ञान

संकालिक अध्ययन का महत्व द्वितीय महायुद्ध के पश्चात से आरम्भ हुआ है। इस अध्ययन को सम्पन्न करने में वर्णनात्मक पद्धति का उपयोग किया गया। संकालिक अध्ययन प्रस्तुत करते समय अध्येता किसी क्षेत्र विशेष के भाषा-भाषियों द्वारा एक निश्चित समय में व्यवहत भाषा की ध्वनि, रूप एवं वाक्य की व्यवस्थाओं की विशिष्टताओं का वर्ण करता है। ‘संकालिक भाषाविज्ञान’ एवं ‘वर्णनात्मक भाषाविज्ञान’ के पारस्परिक सम्बन्ध के बारे में तीन प्रकार की विचारधारायें है।
1. संकालिक भाषाविज्ञान एवं वर्णनात्मक भाषाविज्ञान पर्याय शब्द हैं।
2. कुछ भाषावैज्ञानिक संकालिक भाषाविज्ञान एवं वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में यह अन्तर करते हैं कि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में काल विशेष में किसी निश्चित प्रदेश के भाषियों की भाषा का सामान्य अध्ययन किया जात है, किन्तु संकालिक भाषाविज्ञान में उन भाषियों के वर्गीय भेदों का भी अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।
3. तीसरी विचारधारा यह है कि संकालिक भाषाविज्ञान काल एवं क्षेत्र से सम्बद्ध है जबकि ‘वर्णनात्मक भाषाविज्ञान’ अध्ययन की पद्धति है। इस दृष्टि से ‘वर्णनात्मक-अध्ययन-पद्धति’ द्वारा संकालिक, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक तीनों प्रकार के अध्ययन सम्पन्न हो सकते हैं।
भारतीय भाषाओं के संदर्भ में निम्न अध्ययन द्रष्टव्य हैं –
1. Hiremath. R.C.: The structure of kannada, Karnataka university Dharwar (1961)
2. Krishnamurti, Bhadriraju: Telugu Verbal Bases: A Comparative and Descriptive Study (1961)
3. Ghatage, A.M.: A Survey of Marathi Dialects. The State Board for Literature and Culture, Bombay. (1962 -1972.)
4. प्रबोध बेचरदास पंडित : गुजराती भाषानूं ध्वनि स्वरूप अने ध्वनि परिवर्तन, गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद (1966)
5. Gill,H.S. : The Linguistic Survey project of the Punjabi University, Patiala (1968)
6. Kacharu, Braj B. : Reference Grammar of Kashmiri, University of Illinois (1969)
7. महावीर सरन जैन : परिनिष्ठित हिन्दी का वर्णनात्मक विश्लेषण (Descriptive Analysis of Standard Hindi) (सन् 1967 में जबलपुर के विश्वविद्यालय की प्रथम डी. लिट्. उपाधि के लिए स्वीकृत शोध-प्रबंध) (दो खण्डों में प्रकाशित)
(क) परिनिष्ठित हिन्दी का ध्वनिग्रामिक अध्ययनः (Phonemic Study of Standard Hindi)( लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद (1974)
(ख) परिनिष्ठित हिन्दी का रूपग्रामिक अध्ययनः (Morphemic Study of Standard Hindi) (लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद (1976)
8. Goswami, Golockchandra: Structure of Assamese (1982)
9. Bhattacharya, P.C.: A Descriptive Analysis of the Boro Language. Department of Publication, G.U.: The Register, Gauhati University. (1997)
10. Annamalai, E.; Steever, S.B.: "Modern Tamil", in Steever, Sanford, The Dravidian Languages, London: Rutledge, pp. 100–128. (1998)
11. V. I. Subramanian (chief. Editor): Survey of Malayalam Dialects and Dravidian Encyclopedia (3 Volumes), Mouton and Co., Netherlands.
वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन के लिए द्रष्टव्य –
1. Edward Sapir: Selected Writings in Language, Culture and Personality, ed. by David G. Mandelbaum. Berkeley, CA: University of California Press (1949)
2. Gleason, H. A.: An Introduction to Descriptive Linguistics, New York (1955)
3.Lehmann, Winfred P. : Descriptive Linguistics: An Introduction, 2nd edition, New York (1972)



उपर्युक्त अध्ययन पद्धतियों के अतिरिक्त भाषाविज्ञान के अध्ययन की निम्न पद्धतियों अथवा दिशाओं अथवा सम्प्रदायों को जानना भी जरूरी है।

संरचनात्मक भाषाविज्ञान (Structural Linguistics)

संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा की ‘संरचना’ को विवेच्य मानता है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान का लक्ष्य किसी भाषा की निजी व्यवस्थागत विशिष्टताओं को विश्लेषित करना है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के शब्दार्थ की विवेचना की अपेक्षा उसकी व्यवस्था और संरचना के नियमों को नियमबद्ध करने पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित रखता है।
भारत में पाणिनी ने अपने ग्रंथ 'अष्टाध्यायी´ में अपने समय में उदीच्य क्षेत्र के गुरुकुलों में बोली जाने वाली मानक संस्कृत की व्यवस्था और संरचना को सूत्रों में नियमबद्ध किया।सस्यूर ने संरचना के महत्व की आधारशिला रखी। अमेरिका में संरचनावादी भाषाविज्ञान का सूत्रपात ब्लूमफील्ड आदि विद्वानों ने किया। ब्लॉक, ट्रेगर, हॉकेट आदि भाषावैज्ञानिकों ने इसको विकसित किया जिसकी परिणति जैलिग हैरिस एवं चॉम्स्की के कार्यों में हुई। कतिपय विद्वान व्यवस्था (System) एवं संरचना (Structure) का पर्याय रूप में प्रयोग करते हैं। सामान्य अर्थ में ये पर्याय हैं। विशिष्ट अर्थ में दोनों में अन्तर हैं। विशिष्ट अर्थ में व्यवस्था का रूपतालिकात्मक तथा संरचना का विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों के अध्ययन के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। इसकी विवेचना भाषा-संरचना प्रकरण में की जा चुकी है। इस सम्बन्ध में आर. एच. रॉबिन्स ने संरचना एवं व्यवस्था का अन्तर प्रतिपादित किया है।
“संरचना मूलतः विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों के अध्ययन के लिए प्रयुक्त होता है। व्यवस्था रूपतालिकात्मक सम्बंधों का अध्ययन करती है। संरचना में इकाइयों के विन्यासक्रमात्मक अन्तर्ससम्बंधों का अध्ययन किया जाता है। व्यवस्था में किसी रचना में एक रूपावली में स्थापन्न होने वाले शब्द आदि तत्त्वों के रूपतालिकात्मक अन्तर्सम्बंधों का अध्ययन किया जाता है”।
(General Linguistics: An Introductory Survey, P.49 (1964))
भाषा की व्यवस्था को प्रो0 हिल ने तीन लक्षणों द्वारा समझाया है।
(1)प्रत्येक व्यवस्था की भाँति ही भाषा में भाषिक इकाइयों की आवर्ती साँचें में संरचना होती है। जब साँचें का कोई अंश दृष्टिगोचर होता है, तब सम्पूर्ण व्यवस्था के बारे में उसी विधि से अनुमान किया जा सकता है जिस विधि से दो कोण और एक पार्श्व रेखा के ज्ञात होने पर त्रिकोण बनाया जा सकता है।
(2)भाषा व्यवस्था के सम्बंध में यह भी कहा जा सकता है कि भाषा के उच्चारण में एक इकाई के द्योतक (शब्द) के स्थान पर उसी कोटि के दूसरे द्योतक (शब्द) को स्थानापन्न किया जा सकता है। प्रत्येक वाक्य में भाषिक इकाइयों की श्रृंखला होती है। मूल रचना के बिना किसी परिवर्तन के प्रत्येक कोटि की इकाई के स्थान में आने वाले एक शब्द की जगह उसी कोटि के अन्य शब्दों को स्थापन्न किया जा सकता है। ऐसा करने से वाक्य के अर्थ में अन्तर आता है, उसकी रचना में नहीं।
(3)भाषा व्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि भाषा के शब्दों को वर्गों में वर्गबद्ध किया जा सकता है। संसार की अपरिमित इकाइयों की अपेक्षा ये अधिक निश्चित, परिमित तथा आसानी से परस्पर पहचाने जा सकते हैं।
(Hill, Archibald A.: Introduction to Linguistic Structures, pp. 5-6, (1958)
प्रत्येक भाषा में अर्थहीन इकाइयों के विशेष क्रम से सार्थक इकाइयाँ बनती हैं। इन सार्थक इकाइयों के दो प्रकार होते हैं : (1) शब्दकोषीय (2) व्याकरणिक। शब्दकोषीय इकाइयाँ विचार तत्त्व को व्यक्त करती हैं। व्याकरणिक इकाइयाँ सम्बंध तत्त्व को व्यक्त करती हैं। व्याकरण भाषाविज्ञान के रूप का वह स्तर है जहाँ बद्ध व्यवस्थाएँ होती हैं। इस कारण उनके निश्चित नियम बनाए जा सकते हैं।भाषा की द्वैध व्यवस्था उसकी विशिष्टता को प्रकट करती है। इस सम्बन्ध में डॉ. पी. बी. पंडित ने लिखा है:
“मानव भाषा एक अनन्य व्यवस्था है। इस व्यवस्था की दो उपव्यवस्थाएँ हैं: (1) ध्वनि घटकों की व्यवस्था (2) ध्वनि घटकों के साथ आवर्तनों की व्यवस्था; जिसको व्याकरण कहते हैं। मानव भाषा की व्यवस्था में यह द्वैत इतना स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि एक उप व्यवस्था को समझाने के लिए कभी दूसरी उपव्यवस्था का आधार लेने की आवश्यकता नहीं। यह व्यवस्थागत द्वैत मानव भाषा का एक विशिष्ट लक्षण है। उच्चारण और अर्थ दोनों घटनाएँ भाषा व्यवस्था की बाहर से स्पर्शती घटनाएँ हैं”।,
डॉ. प्रबोध बेचरदास पंडित– गुजराती व्याकरण में जाति और परिणाम (हिन्दी अनुशीलन, धीरेन्द्र वर्मा विशेषांक, पृष्ठ 2, वर्ष 13, अंक 1-2)
भाषिक-संरचना का विवेचन करते समय यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि प्रत्येक भाषा में संरचना के अनेक स्तर होते हैं। प्रत्येक स्तर की संरचना होती है तथा उसमें संभावित अभिरचनाओं का निश्चित समुच्चय होता है। किसी स्तर की इकाई के संरचकों के विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों की अभिरचनाएँ ही उस स्तर की संरचना का निर्माण करती हैं। संरचना जिन तत्त्वों से निर्मित होती है उनमें विन्यास की व्यवस्थाएँ होती हैं तथा उनमें क्रमिक सम्बन्धों की योजना होती है। “एक विशिष्ट संरचना संरचक इकाइयों के वर्गों का एक विशिष्ट संयोजन है”।
(Harris, Zellig S.: String Analysis of Sentence Structure, p. 7. (1964))
“एक संरचना संरचक इकाइयों के पारस्परिक विन्यास एवं क्रमिक सम्बन्धों का निरूपण करती है। किसी भी विश्लेषित स्तर पर व्याकरणिक इकाइयों की बद्ध व्यवस्थाएँ संरचना के संरचक इकाइयों के पारस्परिक निश्चित मूल्य बताने के लिए होती हैं”।
(Firth, J. R.: ´Ethnographic Analysis and Language with reference to Malinowski’s views' In ´Man and Culture', P.107 (1957))
"‘इकाई' शब्द नहीं हैं। वे तो वर्गों की प्रतीकात्मक अमूर्तताएँ हैं जो संरचनात्मक श्रृंखला की स्थितियों में कार्य करने की क्षमता रखते हैं"।
(Firth, J. R.: A Synopsis of Language Theory – Studies in Linguistic Analysis, P. 17. (1957))
इस प्रकार संरचनात्मक भाषाविज्ञान में जब व्यवस्था एवं संरचना का भेदक अर्थ में प्रयोग किया जाता है तब ´व्यवस्था' रूपावली का अध्ययन करती है तथा ´संरचना' से तत्वों के विन्यासक्रमात्मक सम्बंधी विशेषताओं का पता चलता है। जब व्यवस्था एवं संरचना में भेद नहीं किया जाता तब व्यवस्था एवं संरचना का समान अर्थ में प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए हॉकिट ने संरचना के स्थान पर व्यवस्था शब्द का प्रयोग किया है। हॉकिट ने कहा है कि भाषा की व्यवस्था जटिल होती है। अनेक स्तरों एवं उनके तत्त्वों की व्यवस्थाओं के संदर्भ में हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक भाषा ´जटिल व्यवस्थाओं´ की ´व्यवस्था' होती है। हॉकिट ने भाषा की पाँच उप-व्यवस्थाएँ मानी हैं जिनमें से तीन को केन्द्रीय के रूप में स्वीकार किया है –
व्याकरणीय व्यवस्था (The Grammatical System): रूपिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।
स्वनिमिक व्यवस्था (The Phonological System): ध्वनिग्रामों अथवा स्वनिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।
रूपस्वनिमिक व्यवस्था (The Morphophonemic System): व्याकरणिक एवं स्वनिमिक व्यवस्थाओं को परस्पर संबद्ध करने वाली संहिता। (संधि व्यवस्था)। इन्हें केन्द्रीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका उस भाषेतर वातावरण से, जहाँ भाषा का प्रयोग किया जाता है, प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता।
(A Course in Modern Linguistics, P. 137, (1958))

संरचनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन पद्धति की सीमाएँ

भारत के जो भाषावैज्ञानिक अमेरिका में सन् 1955 से लेकर सन् 1960 ईस्वी में रहकर तथा वहाँ से आधुनिक भाषाविज्ञान की पद्धति और प्रविधि को हृदयंगम करने के बाद भारत लौटे, उनके दिलोदिमाग पर वर्णनात्मक भाषाविज्ञान और संरचनात्मक भाषाविज्ञान पूरी तरह आच्छादित था। समर स्कूल ऑफ लिंग्विस्टिक्स की कक्षाओं में ये विद्वान यह रेखांकित करते थे कि भाषा अध्ययन का लक्ष्य किसी भाषा की विशिष्ट व्यवस्था और संरचना को विवेचित करना है। सन् 1958 की कक्षा में, हमने ध्वनियों के उच्चारण, परम्परागत व्याकरण के मॉडल के अनुरूप आधुनिक भाषा के व्याकरणिक रूपों का अध्ययन तथा शब्दों के अर्थ की मीमांसा को ही वांछनीय होना जाना था। मगर अब जो ज्ञान परोसा जा रहा था, वह अनजाना और नया था। उस ज्ञान का सार था कि किसी भाषा की ध्वनियों के उच्चारण की और शब्दों के अर्थ की मीमांसा करना भाषा अध्ययन का मूल लक्ष्य नहीं है। विवेच्य भाषा की ध्वनिम अथवा स्वनिम व्यवस्था और व्याकरणिक व्यवस्था को विवेचित करना ही अभीष्ट है। दो भाषाओं में दो ध्वनियों का उच्चारण होने में तथा उन भाषाओं में उनके प्रकार्यात्मक मूल्य को जानने में अन्तर है। हमें विवेच्य भाषा में ध्वनियों की वितरणगत स्थितियों को आधार मानकर अध्ययन करना चाहिए। किसी भाषा में जो ध्वनियाँ परस्पर अविषम वितरण में वितरित हों, उनको एक ध्वनिम इकाई में समेटा जा सकता है। परस्पर विषम अथवा व्यतिरेकी वितरण में वितरित होने वाली ध्वनियाँ भिन्न ध्वनिमों अथवा स्वनिमों का निर्माण करती हैं।
रूपिमिक खंडन अथवा विश्लेषण का सिद्धांत था कि किसी भाषा में प्राप्त ऐसे उच्चारों में, जिनमें कुछ अंश में समान ध्वनिमों का क्रम और समान अर्थ हो तथा कुछ अंश में भिन्न ध्वनिमों का क्रम और भिन्न अर्थ हो तो ऐसे उच्चारों को समान और भिन्न अंशों के बीच से खंडित कर दो। इस सिद्धांत के अनुसार हिन्दी में उदाहरण के लिए /लड़का, लड़के, लड़की, लड़कियाँ/ जैसे उच्चारों में समान अंश /लड़क्- / को आधार घटक मानते हुए हमने सन् 1960 में एक शोध निबंध लिख डाला। इसका विवरण निम्न है –
हिन्दी संज्ञा शब्द – पदग्रामिक विश्लेषण एवं वर्गबंधन (नागरीप्रचारिणी पत्रिका, मालवीय शती विशेषांक,वर्ष 66, अंक 2-3-4, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1961)।
इसका पुनर्प्रकाशन डॉ. उदय नारायण तिवारी की पुस्तक (भाषाशास्त्र की रूपरेखा) में हुआ (सन् 1963)।
इसके बाद उस कालखण्ड में हिन्दी के ‘व्याकरण’ अथवा ‘संज्ञा रूपों’ पर जो कार्य सम्पन्न हुए, उनमें इसी पद्धति को अपनाया गया। इस पद्धति से हिन्दी संज्ञा रूपों का अध्ययन करने के कारण उत्पन्न जटिलताओं का आभास मुझे तब हुआ जब मैंने डॉ. अशोक केलकर के निर्देशन में सम्पन्न डॉ. मुरारी लाल उप्रैतिः का शोध प्रबंध पढ़ा। इसका प्रकाशन सन् 1964 में ‘हिन्दी में प्रत्यय विचार’ शीर्षक से हुआ।
डॉ. मुरारी लाल उप्रैतिः ने हिन्दी संज्ञा अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग संज्ञाओं में से / -आ, -इ, -ई, -उ, -ऊ, / इत्यादि को अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग की विभक्ति माना। उदाहरण के लिए, डॉ उप्रैतिः ने /लड़का, कोड़ा, दस्ताना, भतीजा, बगीचा, गाना, चरवाहा, रुपया/ इत्यादि आकारान्त संज्ञाओं में से /-आ/ को विश्लेषित या खंडित किया और /-आ/ को अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग की विभक्ति माना। इस पद्धति का अनुगमन करने के कारण हिन्दी के आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त इत्यादि सभी स्वरांत शब्दों के प्रातिपदिक व्यंजनान्त हो गए। इस पद्धति से विश्लेषण करने से हिन्दी संज्ञा अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग रूपिम (morpheme) के ढेर सारे उपरूप (allomorph) हो गए। इनकी वितरणगत स्थितियों की विवेचना ध्वन्यात्मक आधार पर करना असम्भव हो गया। वितरण बताने के लिए प्रत्येक उपरूप के आगे हजारों लाखों शब्दों की सूची प्रस्तुत करना अनिवार्य हो गया।इससे व्याकरण लेखन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया।
मैंने यह उदाहरण इस कारण प्रस्तुत किया गया है जिससे संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों के भाषा अध्ययन को ‘अर्थ को बीच में लाए बिना’ करने के आग्रह के दुष्परिणामों को समझा जा सके। इस प्रकार संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों के भाषा अध्ययन को अर्थ निरपेक्ष पद्धति से करने के मोह के कारण अनेक विसंगतियों ने जन्म लिया।

चॉम्स्की का रचनांतरण व्याकरण (Transformational Grammar)

हॉकेट एवं चॉम्स्की ने वर्णनात्मक एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययनों में केवल बाह्य संरचना को जानने की सीमा को पहचाना। हॉकेट ने बाह्य संरचना (surface structure) के स्तर पर समानता किन्तु गहन संरचना (deep structure) के स्तर पर अन्तर होने के उदाहरण अपनी पुस्तक में दिए हैं। इसको हिन्दी के संदर्भ में दो वाक्यों के उदाहरणों से समझा जा सकता है।
1.अच्छा घर 2. अच्छा लड़का। इन वाक्यों में ‘घर’ एवं ‘लड़का’ संज्ञा शब्द हैं। मगर हम यह तो कह सकते हैं कि 1. लड़का आ रहा है। 2. लड़का जा रहा है। 3. लड़का पढ़ रहा है। मगर हम इन वाक्यों में ‘लड़का’ के स्थान पर ‘घर’ का प्रयोग नहीं कर सकते। इनके अन्तर को बाह्य संरचना के स्तर पर नहीं पहचाना जा सकता। चॉम्स्की ने गहन संरचना को जानने के लिए रचनांतरण व्याकरण (Transformational Grammar) का मॉडल प्रस्तुत किया। रचनांतरण व्याकरण के नियमों से किसी भाषा की गहन संरचना की खोज की जा सकती है। रचनांतरण व्याकरण के स्तर पर हिन्दी के उपर्युक्त उदाहरणों से हम यह ज्ञात कर पाते हैं कि ‘लड़का’ सजीव वर्ग या चेतन वर्ग की संज्ञा है। ‘घर’ निर्जीव वर्ग या अचेतन वर्ग की संज्ञा है।
रचनांतरण व्याकरण में सामान्यतः वाक्य का विभाजन सबसे पहले दो भागों में किया जाता है।
वाक्य = + संज्ञा पदबंध क्रिया पदबंध
ये परम्परागत व्याकरण के उद्देश्य और विधेय कोटियों के समानान्तर हैं। रचनांतरण अनेक प्रकार से होता है। यह सामान्य कथन अथवा आधार-वाक्य के किसी अंश/ किन्हीं अंशों में योजन (addition) लोप (deletion) एवं परिवर्तन (change) के द्वारा होता है।
प्रत्येक भाषा में सामान्य कथन अथवा आधार से रचनांतरित होने वाले वाक्यों के नियम होते हैं। हिन्दी से नकारात्मक रचनांतरण के एक उदाहरण द्वारा इसे स्पष्ट किया जा सकता है।
नकारात्मक वाक्य – इसके भी अनेक उपभेद हैं। उदाहरण -
सामान्य नकारात्मक रचनांतरण
लड़का सोता है <=> लड़का नहीं सोता
नकारात्मक भाववाच्य रचनांतरण
लड़का सोता है <=> लड़के से सोया नहीं जाता
हिन्दी से बाह्य संरचना एवं गहन संरचना के अन्तर को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
लड़का सोता है
गाड़ी चली
चोर घबड़ाया

बाह्य संरचना की दृष्टि से तीनों वाक्यों की संरचना में उद्देश्य + विधेय का समान क्रम है। मगर इनका जब हम भाववाच्य रचनांतरण करते हैं तो गहन संरचना के स्तर पर इनका अन्तर स्पष्ट हो जाता है। तालिका के प्रथम वाक्य का हिन्दी में भाववाच्य रचनांतरण होता है। अन्य वाक्यों का नहीं होता।
सामान्य अथवा आधार वाक्य भाववाच्य रचनांतरण
लड़का सोता है। लड़के से सोया नहीं जाता।

हिन्दी में "गाड़ी से चला नहीं जाता" एवं "चोर से घबड़ाया नहीं जाता" जैसे वाक्य प्रयुक्त नहीं होते।

चॉम्स्की का प्रजनक व्याकरण (Generative Grammar)

वे केवल प्राप्य भाषिक सामग्री के विश्लेषण और विवेचन करने तक ही नहीं रुके। उन्होंने यह विचार दिया कि भाषावैज्ञानिक का लक्ष्य यह पता लगाना होना चाहिए कि किसी भाषा में एक वाक्य से अन्य कितने सम्भावित वाक्यों का प्रजनन हो सकता है।
चॉम्स्की ने संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों की भाँति अर्थ को नहीं नकारा। उन्होंने संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों की भाँति अर्थ की उपेक्षा नहीं की। मगर प्रकार्यवादियों की भाँति उन्होंने अर्थ को केन्द्रक भी नहीं बनाया। उनका मत है कि किसी भाषा में ऐसे व्याकरण सम्मत वाक्यों की रचना हो सकती है जो अर्थ की दृष्टि से संगत न हों। चॉम्स्की ने यह विचार प्रस्तुत किया कि प्रत्येक भाषा का देशीय भाषा-भाषी (native speaker) अपनी भाषा के अर्थ सम्मत वाक्यों का ही आभ्यंतरीकरण (internalization) करता है। हमको भाषा के देशीय भाषा-भाषी (native speaker) से प्राप्त भाषिक सामग्री का विश्लेषण करना चाहिए। इस कारण अर्थ की दृष्टि से असंगत वाक्य हमारी विवेच्य सामग्री में नहीं आएँगे। बाह्य स्तर पर जिन वाक्यों का अर्थ भेद अथवा प्रकार्य स्पष्ट नहीं होता, उनका अर्थ भेद अथवा प्रकार्य उनके रचनांतरण से स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार चॉम्स्की अर्थ की व्याख्या को वाक्य-विश्लेषण में अन्तर्निहित मानते हैं। वे संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों की भाँति अर्थ को नकारते तो नहीं हैं मगर हैलिडे आदि प्रकार्यवादियों की भाँति उसकी प्रधानता भी स्वीकार नहीं करते। इसकी विवेचना आगे की जाएगी।

चॉम्स्की का सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar)

अगले चरण में चॉम्स्की जैसे भाषावैज्ञानिकों ने यह प्रतिपादित किया है कि मनुष्य में भाषा अर्जन की जन्मजात सामर्थ्य होती है। चॉम्स्की ने यह प्रतिपादित किया कि पृथ्वी ग्रह पर हर सामान्य बच्चे में संज्ञानात्मक प्रतिभा होती है। इस संज्ञानात्मक प्रतिभा के कारण प्रत्येक मनुष्य बालक भाषाई सामर्थ्यवान प्राणी है। चॉम्स्की ने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य के डीएनए में व्याकरण ज्ञान के जीन्स विद्यमान होते हैं। वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने 'सार्वभौमिक व्याकरण' (Universal Grammar) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने संसार को यह ज्ञान दिया कि अंग्रेजी और फ्रेंच आदि भाषाओं का भेद सतही है। दुनिया भर की सभी भाषाओं में अन्तर्निहित 'सार्वभौमिक व्याकरण' है। भाषा सामर्थ्य के कारण मनुष्य के शिशुओं के लिए भाषा को सीखना एक वृत्ति है। चॉम्स्की ने 'सार्वभौमिक व्याकरण' के जिन नियमों का निर्धारण किया वे यूरोपीय भाषाओं पर लागू हो जाते हैं। इस कारण चॉम्स्की के विचारों से लगभग चार दशकों तक भाषाविज्ञान आक्रांत रहा।
यह तो स्वीकार्य है कि मनुष्य प्रजाति में ‘भाषा’ के लिए स्पष्ट जैविक गुण विद्यमान हैं जो उसे पशु जगत से अलग कर देते हैं। मानव के मस्तिष्क में 'भाषा सीखने की सामर्थ्य’ है। यह सामर्थ्य पशु जगत से अलग है। मनुष्य भाषा के केवल शब्दों को सीखने तक सीमित नहीं रह जाता। वह वाक्य-स्तर के वाक्यों की रचना प्रक्रिया को आत्मसात कर लेता है। रचना में एक स्थान पर आने वाले उसी कोटि के शब्द प्रतिस्थापन्न कर पाता है। वह एक वाक्य से दूसरे वाक्य का प्रजनन भी कर लेता है। उसके मस्तिष्क में भाषा के व्याकरण के नियम रहते हैं। वह उन नियमों को भले ही बताने में समर्थ नहीं होता। चॉम्स्की ने तर्क दिया कि किसी भाषा का बोलने वाला जब अपनी भाषा के ऐसे वाक्य को सुनता है जो उस भाषा के व्याकरण के नियमों से मेल नहीं खाता तो उसे ऐसा वाक्य सुनना अटपटा लगता है। चॉम्स्की ने प्रतिपादित किया कि वह भले ही अपनी भाषा के व्याकरण के नियमों का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं होता मगर वे नियम उसके मस्तिष्क में विद्यमान रहते हैं।
इसी आधार पर उसने भाषिक-सामर्थ्य अथवा भाषिक-क्षमता (Linguistic competence) एवं भाषायी-निष्पादन (Linguistic Performance) में भेद किया। मनुष्य का मस्तिष्क अपनी स्मृति क्षमता के कारण हजारों शब्दों एवं जटिल व्याकरण के नियमों को याद कर पाता है। मनुष्य में ही प्रतीकों का उपयोग करने का गुण विद्यमान है। मनुष्य के शरीर के वाग्यंत्र के विभिन्न अवयव भी अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं। हमारे गले में स्थित घोषतंत्री फेफडों से आगत वायु को विभिन्न प्रकार से नियंत्रित कर पाती हैं। हमारी जीभ भी विभिन्न स्थानों पर गतिशील होकर विभिन्न ध्वनियों के उच्चारण में कारक बनती है। अलिजिह्वा के नियंत्रण के कारण निरनुनासिक, अनुनासिक और अनुनासिकता की भेदक ध्वनियों का उच्चारण सम्भव हो पाता है। हमने "मानव भाषा का निर्माण एवं विकास" शीर्षक आलेख में इसकी विवेचना की है।
रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - मानव भाषा का निर्माण एवं विकास
http://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html#ixzz3GtPCdIHh

चॉम्स्की ने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य प्रजाति में ‘भाषा’ के लिए स्पष्ट जैविक गुण विद्यमान हैं जो उसे पशु जगत से अलग कर देते हैं। चॉम्स्की अपने इस प्रतिपादन तक ही नहीं रुके। इससे आगे बढ़कर उन्होंने यह दावे किया कि प्रत्येक मनुष्य का बच्चा भाषा का सॉफ्टवेयर लेकर पैदा होता है। उनके इस दावे ने अनेक विवादों को जन्म दिया। संसार की समस्त भाषाओं में अन्तर्निहित व्याकरण के नियमों के सभी सम्भव सेट के रूप में प्रस्तुत चॉम्स्की का 'सार्वभौमिक व्याकरण' भी विवादास्पद है।
हम पाते हैं कि हिन्दी क्षेत्र में पैदा बच्चा हिन्दी सीखता है। टोक्यो में पैदा बच्चा जापानी सीखता है। लंदन में पैदा हुआ बच्चा अंग्रेजी सीखता है। मगर चॉम्स्की का मानना है कि यह अन्तर सतही हैं। सतह पर ये भाषाएँ बहुत अलग लगती हैं। लेकिन भाषाओं के गहन संरचना के स्तर पर एक सार्वभौमिक व्याकरण ऑपरेटिंग सिस्टम काम करता है। सार्वभौमिक व्याकरण की आधारभूत अवधारणा है कि संसार की विभिन्न भाषाओं में सार्वभौम नियम विद्यमान हैं। भाषा का वाक्य मानव मस्तिष्क में विद्यमान अमूर्त संकल्पना है। उसका व्यक्त रूप उच्चार है।
मगर चॉम्स्की ने सार्वभौमिक व्याकरण के जिन नियमों का प्रतिपादन किया वे नियम यूरोपीय भाषाओं पर तो सटीक बैठते हैं मगर बहुत सी गैर यूरोपीय भाषाओं पर लागू नहीं होते। चॉम्स्की का भाषा सामर्थ्य का सिद्धांत तो स्वीकार्य है। भाषा सीखने की सामर्थ्य केवल मनुष्य में ही होती है। मानवेतर प्राणी भाषा की कुछ ध्वनियों, शब्दों एवं वाक्यों को बोलना तो सीख सकते हैं। मगर उनमें मनुष्य के समान भाषा के वाक्यों को प्रजनन करने की क्षमता नहीं होती। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि मनुष्य का बच्चा उसी भाषा को सीखता है जिस भाषा के बोलने वालों के बीच उसका पालन पोषण होता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य के बच्चे में भाषा सीखने की सामर्थ्य जन्मजात होती है मगर वह उस भाषा को सीखता है जिनके बीच उसका पालन पोषण होता है।
भारोपीय परिवार की यूरोपीय भाषाओं के अतिरिक्त अन्य भाषा परिवारों की भाषाओं के अध्येता जब 'सार्वभौमिक व्याकरण' के नियमों के आलोक में अपनी अपनी भाषा का अध्ययन सम्पन्न करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं तो उनको चॉम्स्की के 'सार्वभौमिक व्याकरण' के नियमों की कमियाँ उजागर हो रही हैं।

संप्रेषणपरक व्याकरण (Communicative Grammar)

संप्रेषणपरक व्याकरण में व्याकरण के सैद्धांतिक पक्ष की अपेक्षा भाषा के व्यावहारिक पक्ष पर बल रहता है। व्याकरण के नियमों को कंठस्थ कराने पर नहीं अपितु अध्येता में भाषिक संप्रेक्षण की क्षमता के विकास पर ध्यान केन्द्रित रहता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि अध्येता प्राप्त संदेश का प्रभावी ढंग से जबाब दे सके तथा किसी भी सामाजिक परिस्थिति और परिवेश में प्रभावी ढंग से संवाद कर सके।
"कोई मानव समूह शून्य से शून्य में यात्रा नहीं करता। वह अपने परिवेश में उगता है और संस्कृति में विकसित होता है। चॉम्स्की के ‘भाषिक-सामर्थ्य’ के साथ-साथ ‘सम्प्रेषणीय सामर्थ्य’ के विचार-प्रत्यय में भी सत्यता है। ‘भाषा’ ही नहीं; हमें ‘भाषा के सम्बंध में तथ्य’ भी जानने चाहिए। ‘भाषा के सम्बंध में तथ्य’ से अभिप्राय भाषा की उन विशेषताओं से है जो तकनीकी-भावार्थ में भाषिक नहीं हैं मगर जिनके बिना भाषा समाज में एक व्यक्ति की ‘सम्प्रेषणीय सामर्थ्य’ क्षत-विक्षत हो जाती है। ‘बात करना’ तथा ‘बात करने की कला’ में अन्तर है। जिसमें सम्प्रेषणीय सामर्थ्य है, वह जानता है कि भाषा समाज में किससे, कब, किस विषय पर, कैसे बात करनी चाहिए"।
(महावीर सरन जैन – भाषा एवं भाषाविज्ञान (लोक भारती प्रकाशन, (महावीर सरन जैन – भाषा एवं भाषाविज्ञान लोक भारती प्रकाशन 1985)
संप्रेषणपरक व्याकरण का लेखक व्याकरण के प्रत्येक नियम को संदर्भ और प्रयोग के साथ स्पष्ट करता है। विषय की प्रस्तुति में, उसका सारा ध्यान इस पर रहता है कि अध्येता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में और विशेष रूप से अपने कार्य स्थल में, मौखिक तथा लिखित दोनों रूपों में प्रभावी ढंग से संप्रेषण कर सके। संक्षेप में, यही संप्रेषणीय सक्षमता है। सन् 1998 में, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ने हिन्दी भाषा के लिए इस दिशा में पहल की थी। (देखें - व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण और वार्तालाप (चतुर्भुज सहाय एवं अरुण चतुर्वेदी)( प्रयोजनमूलक हिन्दी पाठ्यपुस्तक माला – 2, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, 1998)
संप्रेषणपरक व्याकरण को अपने छात्रों की व्याकरण की क्षमताओं को विकसित करने, प्रासंगिक संरचनाओं और शब्दावली का उचित प्रयोग करने तथा मौखिक और लिखित संदर्भों में प्रभावी ढंग से संवाद करने आदि भाषिक क्षमताओं को विकसित करने में समर्थ होना चाहिए।

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (Functional Linguistics)

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के भी अनेक सम्प्रदाय हैं। इनमें हैलिडे का व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) अधिक चर्चित है। प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के अन्य सम्प्रदायों के बारे में संकेत करते हुए हैलिडे के व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान की अपेक्षाकृत विस्तृत चर्चा की जाएगी।

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान एवं प्राग स्कूल

अमेरिकन संरचनावादी भाषावैज्ञानिक भाषा विश्लेषण में अर्थ की उपेक्षा करते हैं किन्तु प्राग स्कूल के भाषावैज्ञानिकों ने अर्थ का परित्याग नहीं किया। प्राग स्कूल के भाषावैज्ञानिकों ने भाषा के आशय (Content) को महत्वपूर्ण माना। उनका विचार था कि भाषा का आशय उच्चार के संदर्भ से निर्दिष्ट होता है। यही भाषा का प्रकार्य है। शब्द के अर्थ का मतलब केवल शब्दकोशीय अर्थ ही नहीं है अपितु इसमें शैलीगत एवं संदर्भगत अर्थ भी समाहित हैं। इनकी मान्यता है कि भाषा का प्रयोक्ता अपने विचारों का सम्प्रेषण करता है। भाषा शून्य में नहीं अपितु समाज में बोली जाती है। भाषा सामाजिक वस्तु है। सम्प्रेषण में वक्ता श्रोता को केवल तथ्यपरक सूचना ही नहीं देता। वह सम्प्रेषित तथ्य के बारे में अपने निजी भावों को भी प्रकट करता है। संदर्भ के बिना भाषा के वक्ता के आशय को नहीं समझा जा सकता। वक्ता अपनी बात से श्रोता में मनोनुकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न करना चाहता है। भाषा की व्यवस्था में सम्प्रेषण व्यापार के सभी प्रकार्यों का स्थान है।
इस स्कूल की स्थापना सन् 1926 ईस्वी में हुई। इसके मूल संस्थापक विलेम मथेसिउस थे जो कैरोलाइन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। प्राग स्कूल या सम्प्रदाय में कार्य करने वाले भाषावैज्ञानिकों में निकोलायी सेर्गेयेविच त्रुवेत्स्कॉय, आन्द्रे मार्टिने तथा रोमन याकोब्सन के नाम प्रमुख हैं। इनके विचारों की यह सामान्य उल्लेखनीय विशेषता है कि ये सभी भाषा की संदर्भाश्रित शैलियों को महत्वपूर्ण मानते हैं। इनका मानना है कि भाषा का वक्ता सामाजिक संदर्भों में अलग अगल शैलियों का व्यवहार करता है। निकोलायी सेर्गेयेविच त्रुवेत्स्कॉय ने स्वनिम के क्षेत्र में प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का प्रयोग किया। आन्द्रे मार्टिने ने ध्वनि-परिवर्तन पर विचार किया और परस्पर स्वनिमों की प्रकार्यात्मक उपयोगिता की व्याख्या करने का प्रयास किया। इसी काल में आस्ट्रिया में मनोवैज्ञानिक कार्ल ब्रुल्हर ने भाषा को सम्प्रेषण व्यवहार के एक साधन के रूप में मानने पर बल प्रदान किया। वक्ता भाषा के माध्यम से श्रोता से अपना कथन कहता है। इस प्रकार भाषा व्यापार के तीन प्रमुख तत्त्व हैं – (1) वक्ता (2) श्रोता (3) विषय संदर्भ। ये तीनों तत्त्व सम्प्रेषण के साथ जुड़े रहते हैं। इन तीनों के आधार पर उन्होंने भाषा के तीन प्रकार्य होना प्रतिपादित किया।

रोमन याकोब्सन का प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान

रोमन याकोब्सन ने भी भाषा के तीन आधारभूत तत्त्व माने। वक्ता की दृष्टि से अभिव्यक्ति प्रकार्य, श्रोता की दृष्टि से प्रभाविक प्रकार्य और संदर्भ की दृष्टि से साम्प्रेषणिक प्रकार्य। इसका विस्तार करते हुए उन्होंने भाषा के छह प्रकार्य माने।
1.वक्तृबोधक अभिव्यंजक प्रकार्य (Expressive Function)
2.कामनार्थक प्रकार्य (Conative Function)
3.अभिधापरक प्रकार्य (Donative Function)
4.सामाजिक सम्बोधन परक प्रकार्य (Phatic Function)
5.कूट सम्प्रेषणपरक प्रकार्य (Codifying Function)
6.काव्यात्मक प्रकार्य (Poetic Function)
प्रकार्यवादियों के अनुसार भाषा की संरचना प्रकार्य के अनुरूप परिवर्तित होती है। रोमन याकोब्सन ने भाषा के प्रकार्यों का निर्धारण किया तथा इनके संदर्भ में भाषा के स्वनिमों के प्रभेदक अभिलक्षों का अध्ययन सम्पन्न किया। इन्होंने स्वनिम को प्रभेदक अभिलक्षणों के गुच्छ के रूप में परिभाषित किया।
ध्वन्यात्मक (phonetic)
स्वनिमिक (phonological)
व्याकरणिक (grammatical)
परिस्थितीय अथवा अर्थ विषयक (situational or semantic)
(J.R.Firth: Synopsis of Linguistic Theory (Studies in Linguistic Analysis – Special Volume of the Philological Society, pp. 11-23)

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान एवं लंदन स्कूल (प्रोफेसर फर्थ)

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान पर विचार करते समय लन्दन स्कूल के प्रोफेसर फर्थ का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। प्रोफेसर फर्थ के मत के अनुसार भाषा के विश्लेषण का उद्देश्य उसके अर्थ का विवरण प्रस्तुत करना है जिससे हम भाषा के जीवंत प्रयोगों को आत्मसात कर सकें। भाषा एक अर्थपूर्ण प्रक्रिया है। प्रोफेसर फर्थ का मत है कि भाषा अर्थपूर्ण भाषा-व्यवहार है। भाषा का अध्ययन अर्थ की विभिन्न रीतियों अथवा वृत्तियों के संदर्भ में करना अभिप्रेत है। भाषा और अर्थ जटिल रूप से अंतःपाशित (interlocked)) हैं। एकपक्षीय व्यवस्थापरक (mono systemic) विवरण भाषा के सभी पहलुओं की व्याख्या करने में असमर्थ है। प्रोफेसर फर्थ ने भाषा और अर्थ के जटिल रूप से अंतःपाशित पहलुओं को स्पष्ट करने के लिए भाषा अध्ययन को कई स्तरों पर करने की अनुशंसा की है। उदाहरणार्थ –
ध्वन्यात्मक (phonetic)
स्वनिमिक (phonological)
व्याकरणिक (grammatical)
परिस्थितीय अथवा अर्थ विषयक (situational or semantic)
(J.R.Firth: Synopsis of Linguistic Theory (Studies in Linguistic Analysis – Special Volume of the Philological Society, pp. 11-23)

संरचनात्मक भाषाविज्ञान और प्रोफेसर फर्थ के विचारों के अन्तर को इससे समझा जा सकता है कि जहाँ संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा का अध्ययन ‘अर्थ को बीच में लाए बिना’ की मान्यता को ध्यान में रखकर करने जोर देता है वहीं इसके उलट प्रोफेसर फर्थ का विचार था कि भाषा का विश्लेषण हम जिस स्तर पर क्यों न करें, वह विश्लेषण प्रत्येक स्तर पर अर्थ का ही विश्लेषण है।
"अर्थ प्रसंगाश्रित सम्बंधों (contextual relations) की संश्लिष्टता है और ध्वनि, व्याकरण, शब्दकोष निर्माण और अर्थविज्ञान इनमें से प्रत्येक के अपने उचित संदर्भ में प्रसंगाश्रित सम्बंधों की संश्लिष्टता के घटक होते हैं"।
(J.R.Firth: The Technique of Semantics (Papers in Linguistics, P.19)

इस प्रकार फर्थ के मतानुसार भाषा का विश्लेषण सभी स्तरों पर अर्थ का ही विश्लेषण है। इस कारण प्रोफेसर फर्थ ने भाषा को ध्वनि, व्याकरण, शब्दकोश आदि कई व्यवस्थाओं से निर्मित पूर्ण व्यवस्था माना। उनके शब्द हैं कि ये सभी व्यवस्थाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और समग्र रूप से अर्थ का प्रतिपादन करती हैं।
J.R.Firth: The Teaching of Semantics, P. 19, in Papers in Linguistics, London. (1957)

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान एवं साइमन डिक का प्रकार्यात्मक व्याकरण (Functional Grammar)-

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में जिन भाषावैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किए, उनमें साइमन डिक, हैलिडे, रॉबर्ट वान वैलिन के नाम अधिक चर्चित हैं। सन् 1970 और सन् 1980 के दशकों में साइमन डिक का प्रकार्यात्मक व्याकरण (Functional Grammar) प्रभावशाली रहा। डिक ने प्रकार्यात्मक व्याकरण को इस प्रकार परिभाषित किया है – "प्रकार्यात्मक रूपावली मॉडल में भाषा की अवधारणा मूल रूप से यह है कि मनुष्य समाज के अन्य सदस्यों के साथ सामाजिक सम्पर्क के लिए भाषा का एक साधन के रूप में प्रयोग करता है। दूसरे शब्दों में कोई भी प्राकृतिक भाषा अपने उपयोगकर्ताओं की संप्रेषण क्षमता से सम्बद्ध होती है"।
विशेष अध्ययन के लिए देखें – (1.Dick, S. C. : Studies in Functional Grammar. London (1980) 2.Dick, S. C. : Functional Grammar. Dordrecht/Cinnaminson NJ: Foris (1981))

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान एवं रॉबर्ट वान वैलिन का भूमिका और संदर्भ व्याकरण (Role and reference grammar)-

रॉबर्ट वान वैलिन द्वारा विकसित भूमिका और संदर्भ व्याकरण (Role and reference grammar) के ढाँचे को प्रकार्यात्मक विश्लेषण के ही अन्तर्गत रखा जाना उचित है। इन्होंने भी किसी भाषा के वाक्य का विवरण भाषा की अर्थ संरचना और सम्प्रेषण व्यापार के संदर्भ में ही करने जोर दिया है।
विशेष अध्ययन के लिए देखें –(1.Foley, W. A., Van Valin, R. D. Jr. : Functional Syntax and Universal Grammar. Cambridge: Cambridge Univ. Press (1984)। 2.Van Valin, Robert D., Jr. (Ed.) : Advances in Role and Reference Grammar. Amsterdam: Benjamins (1993))

प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान एवं हैलिडे का व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL):

हैलिडे का व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान भी भाषा के प्रकार्यों की अवधारणा के चतुर्दिक केन्द्रित भाषा के अध्ययन का सिद्धांत है। व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भी प्रकार्यात्मक है। यह भी मानता है कि विशेष प्रकार्यों को सम्पन्न करने के लिए भाषा का विकास होता है। व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा को सामाजिक संदर्भ में व्याख्यायित करने का सिद्धांत है। भाषा सामाजिक संदर्भानुसार परस्पर विनिमय होने वाले अर्थ को व्यक्त करने का एक संसाधन है। इसी कारण व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक व्याकरण भाषा के अर्थ को विवेच्य मानता है। भाषा के प्रयोक्ता भाषा का प्रयोग सामाजिक संदर्भगत अर्थ को व्यक्त करने के लिए करते हैं। इसी कारण हैलिडे का कथन है कि भाषा का प्रयोक्ता किन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भाषा का प्रयोग एक संसाधन के रूप में कर रहा है – इस पर भाषावैज्ञानिक को अपनी दृष्टि केन्द्रित रखनी चाहिए। हैलिडे का स्पष्ट विचार है कि भाषा का महत्व उसके सामाजिक उपयोग में निहित है और इस पर अनिवार्य रूप से उपभोक्ता की दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए। हैलिडे ने प्रोफेसर फर्थ के विचारों को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने अर्थ के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियों तथा संदर्भों को भी समाविष्ट किया। हैलिडे ने माना कि भाषा के अध्ययन में संदर्भ प्रमुख है जो भाषा को सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ने का काम करता है।
हैलिडे संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों की तरह भाषा को केवल व्यवस्था नहीं मानते अथवा उसे केवल सभी व्याकरणसम्मत वाक्यों का सेट नहीं मानते। उनकी मान्यता है कि सभी संदर्भों में प्रयुक्त समस्त भाषिक रूपों का अध्ययन ही विवेच्य है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान ने भाषा की विशिष्ट संरचना के अध्ययन को ही विवेच्य माना। सवाल उठता है कि व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) में भाषाई संरचना की क्या भूमिका है?
संरचनात्मक भाषाविज्ञान में विश्लेषण की इकाई "वाक्य" है।व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) में विश्लेषण की इकाई "पाठ" है। इसकी मान्यता है कि भाषा की लघु इकाई ( ध्वनि आदि) का अध्ययन भी पाठ द्वारा व्यक्त अर्थ में उसके योगदान की पृष्ठभूमि में किया जाना चाहिए। संदर्भ के अनुरूप वांछनीय अर्थ को व्यक्त करने के लिए यह भाषिक संरचनाओं की भूमिका को प्राकृतिक मानता है। भाषिक संरचनाओं का अध्ययन पाठ को इकाई मानकर तथा सामाजिक संदर्भानुसार करने की अनुशंसा करता है।
जीवन के समस्त प्रयोजनों की सिद्धि के लिए भाषा का प्रयोग होता है और इसी कारण प्रत्येक भाषा की अनेक प्रयुक्तियाँ (Registers) होती हैं। जनभाषा की अपनी कोई विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली नहीं होती। किसी कार्य क्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाली विशिष्ट शब्दावली ही ‘प्रयुक्ति’ है जिसके लिए अंग्रेजी में “Register” शब्द का प्रयोग होता है जिसका पारिभाषिक अर्थ है –“एक रजिस्टर एक विशेष उद्देश्य के लिए या किसी विशेष सामाजिक सेटिंग में इस्तेमाल भाषा की एक किस्म है”। इसका अर्थ यही है कि विशेष कार्य क्षेत्र में जब हम अपनी भाषा का इस्तेमाल करते है तो उसकी विशिष्ट किस्म हो जाती है। यह विशिष्ट किस्म उस कार्य क्षेत्र की विशिष्ट शब्दावली, वाक्यांशो और मुहावरों के कारण बनती है। व्यक्ति के कार्य क्षेत्र अनगिनत हैं। हिन्दी में “Register” के लिए प्रयुक्ति शब्द का प्रयोग होता है। अनगिनत कार्य क्षेत्रों के अनुरूप भाषा की प्रयुक्तियाँ भी अनगिनत हैं। कहावत है - ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’। इसी प्रकार कार्य क्षेत्र अनगिनत तथा भाषा की प्रयुक्तियाँ भी अनगिनत। प्रत्येक कार्य क्षेत्र में कुछ विशिष्ट शब्दों का चलन हो जाता है। जब पहली बार कोई व्यक्ति किसी अपरिचित कार्य क्षेत्र में जाता है तो वहाँ कुछ नए शब्दों को सुनता है। एक दो दिन में वह उस कार्य क्षेत्र के उन विशिष्ट शब्दों के प्रयोग का आदी हो जाता है।
भाषा मानवीय अनुभवों का प्रतिपादन करता है। मानवीय अनुभवों का संसार अपरिमित है। इस कारण भाषा में एक कथ्य के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग होता है। एक शब्द के संदर्भ के अनुसार अनेक अर्थ होते हैं। एक शब्द के अनेक प्रयोग होते हैं। भाषा का प्रयोगकर्ता अपनी भाषा में उपलब्ध विकल्पों में से संदर्भ को ध्यान में रखकर किसी विकल्प का चयन करता है। भाषा में उपलब्ध विकल्प भाषा के विभिन्न स्तरों पर मिलते हैं। भाषा के तीन बुनियादी स्तर होते हैं।
1. ध्वनि
2. शब्द-व्याकरण
3. अर्थ
इस कारण शोधकर्ता को अपने अनुसंधान के विषय और उद्देश्य को ध्यान में रखकर तत्सम्बंधित भाषा के स्तर विशेष के प्रासंगिक अथवा संदर्भगत पहलुओं की दृष्टि से अपना विश्लेषण करना चाहिए। भाषा बहुपक्षीय व्यवस्थाओं की व्यवस्था है। "भाषा सम्भावित अर्थों को व्यक्त करने का संसाधन है" भाषा की इस परिभाषा को इष्ट मानते हुए व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान अनुसंधान की विषयवस्तु और उद्देश्य के अनुरूप शोधकर्ता को शोध-प्रविधि में लचीलापन रुख अपनाने की सलाह देता है।
व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा में प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध समस्त सम्भावित विकल्पों को समग्रता में देखता है और संदर्भ के अनुरूप प्रयोग का अध्ययन करने पर बल देता है। इसमें "व्यवस्थागत प्रयोग" का मतलब है भाषा में प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध समस्त सम्भावित विकल्पों में से संदर्भ के अनुरूप भाषा-प्रयोक्ता द्वारा चयन। भाषिक प्रकार्य की विवेचना के समय हिन्दी के संदर्भ में इसे सर्वनाम के प्रयोग से समझाया जा चुका है।
व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा की वाक्यात्मक संरचनाओं के अध्ययन के साथ साथ भाषा के प्रकार्यों को वरीयता प्रदान करता है। सामाजिक स्तर पर भाषा की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। भाषा में वक्ता और श्रोता जब परस्पर सम्भाषण करते हैं तो परिस्थियों, परिवेश एवं विषय के संदर्भ के अनुरूप भाषा की शैलियों का चयन करते हैं। भाषा के द्वारा सम्पन्न होने वाले प्रकार्यों से संरचना के सभी स्तर प्रभावित एवं नियंत्रित होते हैं। व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) में इसके लिए पारिभाषिक शब्द "मेटाफंकशन्स" का प्रयोग होता है।
व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) तथा डिक के प्रकार्यात्मक व्याकरण में यह अन्तर है कि व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा की संरचना के सभी स्तरों पर विचार करता है। हेलिडे भाषा को कई व्यवस्थाओं से निर्मित व्यवस्था मानते हैं। इसी अन्तर के कारण इसको केवल प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान न कहकर व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के नाम से जाना जाता है।
व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) में, 'स्तरीकरण' शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग होता है। इसमें भाषा का विश्लेषण चार स्तरों पर किया जाता है –
1.संदर्भ अथवा प्रसंग (Context)
2.व्यवस्थापरक अर्थविज्ञान (Systemic Semantics)
3.शब्द-व्याकरण (Lexico-Grammar)
4.स्वनिम विज्ञान – लेखिम विज्ञान (Phonology – Graphology)
इनको अपेक्षाकृत विस्तार से इस प्रकार समझा जा सकता है।

(1)संदर्भ अथवा प्रसंग (Context)-

व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा का अध्ययन सामाजिक पृष्ठभूमि में सम्पन्न करता है। वह अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित रखता है कि भाषा सामाजिक संदर्भों से किस प्रकार नियंत्रित एवं परिचालित होती है।संदर्भ को ध्यान में रखकर भाषा का विश्लेषण इसकी केंद्रीय अवधारणा है। इसके लिए भाषाविज्ञान संदर्भानुसार अर्थ को व्यक्त करने के लिए एक व्यवस्थित संसाधन है। इसके अन्तर्गत फील्ड, टेनर और मोड इन तीन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग होता है। फील्ड से अभिप्राय है कि भाषा का विषय क्या है। टेनर वक्ताओं की सामाजिक भूमिकाओं को स्पष्ट करता है। मोड से अभिप्राय है कि संप्रेषण का माध्यम क्या है और उस माध्यम के अनुरूप भाषा का रूप किस प्रकार रूपायित होता है। भाषा मौखिक है अथवा लिखित है अथवा दृश्य-श्रव्य रूपों के साथ भाषा का प्रयोग हो रहा है। हम सब जानते हैं कि जब हम भाषण देते हैं तथा जब लेखन के द्वारा अपने भावों अथवा विचारों को व्यक्त करते हैं तो भाषा के स्वरूप में अन्तर आ जाता है।

(2)व्यवस्थापरक अर्थ विज्ञान (Systemic Semantics) अथवा संकेतप्रयोग विज्ञान (Pragmatics) –

इसको तीन घटकों में विभाजित किया जाता है।
(क) संप्रत्ययमूलक अर्थविज्ञान (Ideational Semantics)
(ख) अन्तर्वैयक्तिक अर्थविज्ञान (Interpersonal Semantics)
(ग) पाठ अर्थविज्ञान (Textual Semantics)
व्यवस्थापरक अर्थविज्ञान के उपर्युक्त घटकों के अनुरूप सभी भाषाओं के तीन प्रकार्य अथवा मेटाफंकशन्स (metafunctions) होते हैं –
(क) रचित अनुभव – भाषा मानवीय अनुभव की विवेचना करता है। यह अनुभव एक ओर बाह्य जगत के बारे में होते हैं तो दूसरी ओर अन्तर्मन का अनुभव संसार होता है। इस अनुभव का प्रतिपादन भाषा करती है। रचित अनुभव के अर्थ संसार में उदाहरण के लिए भाषा के प्रयोक्ता की बाह्य जगत के सम्बंध में अभिवृत्ति और तदनुरूप भाषा के अभिवृत्तिपरक अर्थ (attitudinal meaning) का अध्ययन किया जाता है।
(ख) सामाजिक सम्बंध (वक्ता और श्रोता के पारस्परिक सम्बंधों के अनुरूप भाषा-प्रयोग के अर्थ संसार का अध्ययन।
(ग) उपर्युक्त दोनों प्रकार्यों को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों से रचित पाठ। यह पहले कहा जा चुका है कि संरचनात्मक भाषाविज्ञान जहाँ वाक्य को इकाई मानकर भाषा का विश्लेषण करता है, वहीं हैलिडे ने पाठ को इकाई मानकर भाषा के अध्ययन करने का प्रस्ताव किया है।
उपर्युक्त तीनों प्रकार्य समन्वित रूप से सम्पन्न होते हैं। इस कारण भाषा का विश्लेषण भाषा के द्वारा व्यक्त तीनों प्रकार्यों में भाषा की संरचनात्मक संगठन की भूमिका को स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। इसको सुविधा के लिए अलग अलग व्याकरण, अर्थ एवं प्रसंग या संदर्भ के नाम से पुकारा जा सकता है। मगर भाषा में सामान्यीकृत दृष्टि से ये तीनों जो प्रकार्य करते हैं उनको व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान में मेटाफंकशन्स कहा जाता है।
Halliday, M.A.K.: Text as semantic choice in social contexts.
Reprinted in full in Linguistic Studies of Text and Discourse. Volume 2 in the Collected Works of M.A.K. Halliday. Edited by J, J. Webster. London and New York: Continuum. pp. 23–81 (1977).

(3)व्याकरण-शब्द (Lexico-Grammar) –

इसके अन्तर्गत उच्चारों में शब्दों के वाक्यात्मक संगठन का अध्ययन किया जाता है। व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान की संकल्पना है कि व्याकरण-शब्द (lexicogrammar) वाक्य रचना, शब्दकोश, और रूपविज्ञान को सम्बद्ध करती है। हैलिडे का कथन है कि उपर्युक्त तीन घटकों को समन्वित रूप में वर्णित किया जाना चाहिए। इस कारण यदि किसी भाषा का कोश भाषा के तीनों घटकों (वाक्य रचना, शब्दकोश, और रूपविज्ञान) को समेटकर बनाया जाएगा तो वह कोष उस भाषा की प्रकृति को व्यक्त करने में कारगर होगा। प्रयोग की दृष्टि से किसी भी भाषा में अनेक विकल्प मिलते हैं। इसको दो मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) वक्ता अथवा श्रोता की भूमिका। कौन कब किससे कहाँ किस विषय पर बात कर रहा है। इसके अनुरूप भाषा में अनेक विकल्प मिलते हैं। भाषा के शब्दों की अनेक प्रकार्यात्मक भूमिकाएँ होती हैं। समाजभाषाविज्ञान में इस बारे में विशेष विवेचन किया जाएगा। (2) विशिष्ट प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयोजनमूलक भाषा के रजिस्टर्स अथवा प्रयुक्तियाँ।
व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) में, शब्दों का अध्ययन उनकी प्रकार्यात्मक भूमिकाओं की दृष्टि से किया जाता है। हैलिडे ने इन भूमिकाओं को ध्यान में रखकर शब्दों की वाक्यात्मक भूमिकाएँ कर्ता अथवा अभिकर्ता (Agent), माध्यम (Medium), थीम (Theme), और मूड (Mood) आदि के रूप में वर्गीकत करके उनकी व्याख्या की है। भाषा के एक रजिस्टर में जिन शाब्दिक वाक्यात्मक अभिरचनाओं की अधिक आवृत्ति हो रही है, भाषा के दूसरे रजिस्टर में उससे भिन्न शाब्दिक वाक्यात्मक अभिरचनाओं की आवृत्ति हो सकती है। हैलिडे के इस विवेचन से किसी क्षेत्र विशेष के कर्मचारियों एवं अधिकारियों को उनके प्रयोजन की भाषा सिखाने में विशेष सहायता प्राप्त होती है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ने अलग अलग क्षेत्रों में प्रयुक्त प्रयोजनमूलक हिन्दी के रजिस्टरों पर बहुत काम किया है। यही कारण है कि संस्थान जिस क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है, उनको ध्यान में रखकर पाठ्य सामग्री में संशोधन एवं परिवर्द्धन करता है। इससे बहुत कम समय में प्रशिक्षणार्थियों को कार्य साधक ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि रेलवे के स्टेशनों पर रेल के आने जाने आदि का समय बतलाने वाले घोषकों को प्रयोजनमूलक हिन्दी में प्रशिक्षित करना है तो यह उनके मतलब के 60 से 80 शब्दों से निर्मित वाक्यों का उच्चारण सिखाकर सम्पन्न हो सकता है।
इस दृष्टि से विशेष अध्ययन के लिए देखें –
(Halliday, M. A. K. : A Short Introduction to Functional Grammar. London: Arnold (1985/1994/2004))

भाषा में प्रत्येक शब्द के प्रयोग के संदर्भ होते हैं। हैलिडे ने इसकी विवेचना शब्द सहसम्बंध
(collocation) के उदाहरणों द्वारा की है। भाषिक प्रकार्य की विवेचना के प्रकरण में इसको हिन्दी के उदाहरणों से स्पष्ट किया जा चुका है।

(4)स्वनिम विज्ञान – लेखिम विज्ञान (Phonology – Graphology) -

स्वनिम विज्ञान इस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है कि टैक्स्ट में ध्वनियाँ किस प्रकार संगठित होती हैं। इसके अन्तर्गत खण्डात्मक स्वनिमों के साथ साथ भाषा के अधिखण्डात्मक अभिलक्षणों को विशेष महत्व प्रदान किया जाता है। लेखिम विज्ञान इस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है कि टैक्स्ट में लिखित प्रतीक एक प्रणाली के रूप में किस प्रकार संगठित होते है। (अक्षर,वाक्य, पैराग्राफ, आदि)।
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प्रोफेसर महावीर सरन जैन
सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान
123, हरि एन्कलेव
बुलन्द शहर – 203001
mahavirsaranjain@gmail.com







































































































































































































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