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क्रन्तिकारी मौलवी अहमदुल्लाह शाह

(पुण्यतिथि : 5 जून, 1858 पर विशेष )

शैलेन्द्र चौहान

शांतिमय रे ने अपनी किताब '1857 और भारतीय मुसलमान' में  लिखा है कि 'पारम्परिक इतिहासकार नाना साहब, तात्या टोपे,  झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और कुंअर सिंह का नाम वीर योद्धाओं के रूप में लेते हैं। जाहिर तौर पर उन्हें भुलाया नहीं जा सकता. मंगल पांडे को, जिन्होंने बंगाल में विद्रोह का झंडा उठाया था, उन्हें भी याद किया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग फैजाबाद के शहर काजी मौलवी अहमदुल्लाह को याद करते हैं जिन्होंने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह संगठित करने में प्रमुख भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारी सेनाओं ने अंग्रेजों को इतना गहरा नुक्सान पहुँचाया कि उन्होंने उनके ज़िंदा या मुर्दा पकडवाने पर 50,000 रुपये का ईनाम घोषित कर दिया।' अब आप देखिए कि सुनियोजित तरीके से इतिहास को किस तरह विकृत किया जा रहा है। संघ के ठेकेदार और तो और स्वतंत्रता  सेनानियों तक को नहीं बख्स रहे हैं

बीजेपी के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' में देवेन्द्र स्वरुप का एक लेख छपा था। उसके अनुसार 'सावरकर ने 1909 में 1857 का "भारतीय स्वातंत्र्य समर" शीर्षक से जो इतिहास लिखा उसमें मौलवी अहमदुल्लाह का जो "फैजाबाद के मौलवी" के नाम से लोकप्रिय हो गए थे, एक स्वतंत्र अध्याय में भारी महिमामंडन किया है। स्वाभाविक ही, सावरकर के द्वारा ऐसे गौरवशाली चित्रण के कारण मौलवी अहमदुल्लाह को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रतिष्ठित जागरण पत्र "पाथेय कण" (जयपुर) ने "राष्ट्र-संत" की उपाधि से विभूषित करना उचित समझा है। इसमें सन्देह नहीं कि 8 जून, 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह के नेतृत्व में बंगाल रेजीमेंट में बगावत का झंडा फहरा कर फैजाबाद जेल में बंद सब कैदियों के साथ मौलाना अहमदुल्लाह को भी मुक्त कराया, तब से 15 जून 1858 को पुवायां रियासत के द्वार पर रणभूमि में अपना सर कटाने तक मौलाना अहमदुल्लाह ने क्रांति की अगली पंक्ति में रहकर असामान्य संगठन कुशलता, सैनिक क्षमता, साहस और शौर्य का परिचय दिया। परन्तु इन सब गुणों के पीछे उनकी मूल प्रेरणा क्या थी, उनकी विचारधारा क्या थी, उनका अंतिम लक्ष्य क्या था? इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए मौलाना का पूरा जीवन परिचय देखना आवश्यक हो जाता है।

सावरकर ने 8 जून, 1857 से पहले के मौलाना के जीवन पर इसके अलावा कोई प्रकाश नहीं डाला है कि वे अवध के किसी तालुकेदार घराने के थे और अंग्रेजों के द्वारा अवध की स्वतंत्रता के अपहरण से आहत होकर उन्होंने देश और धर्म की सेवा में अपना सर्वस्व-न्योछावर करने का संकल्प ले लिया। वे मौलवी बन गए और पूरे हिन्दुस्तान में अलख जगाने के लिए निकल पड़े। सावरकर लिखते हैं कि अवध के नवाब के घर में उनका कथन, कानून माना जाता था। उन्होंने आगरा में एक गुप्त सोसायटी का निर्माण किया था। वे क्रांतिकारी पेम्फ्लेट भी लिखते थे। उनके एक हाथ में तलवार थी तो दूसरे हाथ में कलम थी।

फैजाबाद में वे कब पहुंचे, क्यों पहुंचे, उनकी गिरफ्तारी क्यों हुई, उन्हें प्राणदंड की सजा क्यों दी गई इन सब बातों पर सावरकर जी ने कोई प्रकाश नहीं डाला है।' यह सब मनगढंत किस्सा इस व्यक्ति ने संघ की विशेष घृणा की नीति के तहत गढ़ा है यह उनके अगले कथन से स्पष्ट हो जाता है। 'वे (सावरकर) 1857 की क्रांति को भावी स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शक और राष्ट्रीय एकता की आधार भूमि बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे इसलिए उन्होंने यथासंभव आपसी कलह, मतभेदों और विश्वासघात के प्रसंगों की उपेक्षा कर के शौर्य, बलिदान, कट्टर ब्रिटिश विरोध और हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को पुष्ट करने वाले प्रसंगों पर ही ध्यान केन्द्रित रखा। अहमदुल्लाह कौन थे, कहां के रहने वाले थे, इसकी खोज के पचड़े में वे नहीं पड़े। यद्यपि उन्होंने एक फुटनोट में अवध की घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी गबिन्स का 1858 में प्रकाशित यह कथन उद्धृत किया है कि मौलवी मद्रास से आया था। (सावरकर, 1947 संस्करण, पृष्ठ 251)।

अब दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सैयद जहीर हुसैन जाफरी ने पाकिस्तान और भारत में प्रकाशित अरबी एवं उर्दू स्रोत सामग्री के आधार पर लिखा है कि मौलवी अहमदुल्लाह का जन्म मद्रास के चीना पट्टन (कहीं कहीं चंगलपुट भी लिखा है) के नवाबी खानदान में हुआ था और वे मौलवी या सन्त से अधिक तलवार की कला में माहिर थे। उन्होंने अपनी युद्धकला का पहला परिचय हैदराबाद के निजाम के आदेश पर एक बागी हिन्दू राजा का दमन करके दिया था।' यानि जो बात सावरकर की समझ में नहीं आई वह इस विद्वेषी लेखक की समझ में आ गई। भारतीय इतिहास के एक विस्मृत नायक मौलवी अहमदुल्लाह शाह 1857 के स्वाधीनता संग्राम के वे महान सेनानी थे जिन्हे अंग्रेजी हुकूमत कभी परास्त नहीं कर सकी।

इंटरनेट पर रजनीश साहिल की एक पोस्ट है - 'फेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं। इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है। जो सूची सामने आई उसमें 25-30 से अधिक हिन्दू नाम नहीं दिखे। ठीक ऐसी ही स्थिति हिन्दू व आदिवासी नायकों से जुड़ी कई पोस्ट्स पर दूसरे समुदायों की दिखी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक़उल्ला खान, महात्मा गाँधी आदि कुछ नामों जिन्हें कि शुरू से ही पूरे मुल्क की मोहब्बत हासिल रही को छोड़ दें तो आज़ादी के कई नायकों, ख़ासकर जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, के ज़िक्र वाली कई पोस्ट्स का सोशल मीडिया पर यही हाल है। यह स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में हर मज़हब के लोगों ने अपना योगदान दिया, वह साझी लड़ाई थी। इस लिहाज़ से उसका गर्व सामूहिक होना चाहिए न कि हिन्दू-मुसलमान के खेमे में बंटा हुआ।

सिद्धो-कान्हू से लेकर गाँधी तक किसी भी स्तर पर जंग-ए-आज़ादी जारी रखने वालों का ज़िक्र कम-ज़्यादा भले ही होता रहा हो, गर्व की बुनियाद साझा रही है जिसमें अब दरार नज़र आने लगी है। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हो या फिर हकीक़त, साझी संस्कृति और विरासत की हिमायत करने वालों की भरमार है। फिर क्यों है कि किसी एक मज़हब/क़ौम से संबधित नायकों से जुड़ी पोस्ट को शेयर करने वालों में दूसरे मज़हब/क़ौम के लोगों की संख्या ज़्यादा नहीं है?' इसके अंत में जो लेखक की राय है देखा गया है कि सभी समुदायों की एकता चाहने वाले लोग भी अपनी क़ौम के नायक को शेयर करेंगे, दूसरे को लाइक मारकर निकल लेंगे। ज़ाहिर है कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बस किसी लम्हे में उनके भीतर छुपी बैठी यह दूरी निर्णय लेती है और वे ऐसा कर देते हैं। यह एक तरह से पहला चरण है। जब यह भावनाएँ और भुना ली जाती हैं तो लोग अपनी, अपने मज़हब की आलोचना न सुनने व दूसरे की खामियों का ज़िक्र कर अपने अहं को तुष्टि पहुँचाने के स्तर तक पहुँच जाते हैं। सोशल मीडिया पर कई बार यह बहुत साफ़ दिखाई देता है। कभी ऐसी पोस्ट्स के लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स को गौर से देखिएगा जो किसी धर्म की ख़ामियों/विरोधाभास पर लिखी गई हैं।

अगर हिन्दू धर्म के बारे में लिखा गया है तो मुसलिम समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर हिन्दू बुरा-भला कह रहे होंगे और अगर बात इस्लाम की है तो हिन्दू-मुसलमानों की जगह बदली हुई होगी। इन दिनों आदिवासी दर्शन और हिन्दू धर्म को लेकर जो बहस है उसमें भी तकरीबन ऐसा ही है। आगे यह स्थिति सिर्फ़ धर्म के दंभ व अपमान के स्तर पर पहुँचती है और नतीजा वह होता है जो बीते दिनों मुज़फ्फ़रनगर, सहारनपुर और त्रिलोकपुरी में दिखाई दिया। ऐसी घटनाएँ साफ़ इशारा हैं कि सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के दिमाग को किस हद तक अपने कब्ज़े में ले रही हैं। वे लोगों को अपने मज़हब व क़ौम से प्रेम करना नहीं सिखा रहीं बल्कि दूसरों के प्रति नफ़रत और असहिष्णुता के बीज बो रही हैं। लोगों को पता भी नहीं चलता और चुपके से कोई पूर्वाग्रह उनके भीतर बिठा दिया जाता है।

नतीजतन एक-दूसरे से दूरी बढ़ रही है और यही तो ये ताक़तें चाहती हैं। इसके बिना उनकी वह इमारत खड़ी नहीं हो सकती, जिसमे ज़ात, पंथ, वर्ण, क्षेत्र और शुद्ध-अशुद्ध के तमाम तरह के कमरे मौजूद हैं, जहाँ मुल्क के लिए शहीद होने वाला भी किसी एक क़ौम के लिए गौरव हो जाता है, और दूसरी क़ौम उसे अनदेखा करके गुज़रने लगती है। फ़िक्र की बात यह है कि लोगों की भावनाओं को भुनाकर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का अब कोई एक तरीका नहीं है। सांप्रदायिक ताक़तों ने अपने प्रतीकों और कार्यपद्धति में भी बदलाव किया है। भगत सिंह की पगड़ी का भगवा हो जाना, बिरसा मुंडा की जन्मस्थली पर ‘भगवान बिरसा मुंडा’ लिखा जाना, मसला सामाजिक या राजनीतिक ही क्यों न हो उसे इस्लाम से जोड़ दिया जाना, ‘इस्लाम के मुताबिक’ कहकर ज़ारी किये जा रहे उकसाऊ फतवे और हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा लगाने जैसे अभियान, सब इसी दिशा में बढ़े कदम हैं। अब तो लोगों को अपने इतिहास से ही काट देने की क़वायद भी तेज़ हो चुकी है। ऐसे समय में साझी संस्कृति – साझी विरासत के ईमानदार पक्षधरों की ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हर उस रास्ते पर नज़र रखी जाये जहाँ से सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के ज़ेहन तक पहुँच सकती हैं। 

जगदीश्वर चतुर्वेदी ने 1857 पर काम किया है उन्होंने जो पक्ष हमारे सामने उजागर किया है वह उस वक़्त निकलने वाले पर्चों पर प्रकाश डालता है। 1857 के एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि बागी फौजियों को जनता का समर्थन प्राप्त था। जनता को विश्वास था कि अंगरेजों के शासन में हिंदुस्तानियों की जान, माल और आबरू सुरक्षित नहीं थी। वह अंगरेजों की धोखेबाजी और शातिराना चालों को खूब समझ रहे थे। एलाननामों के द्वारा स्वतंत्रता के सिपाहियों ने जनता को यकीन दिलाया था कि हिंदुस्तानियों की हुकूमत में पूरी धार्मिक आजादी होगी जैसे कि पहले थी। हर आदमी अपने दीन-धर्म पर कायम रहेगा, हर किसी की इज्जत-आबरू कायम रहेगी और किसी बेगुनाह का कत्ल नहीं किया जाएगा। किसी का माल जोर-जबरदस्ती से हासिल नहीं किया जाएगा। शाहजादा फिरोज शाह ने अपने एलाननामे में यह विश्वास दिलाया था कि बादशाही के बाद देश के हर वर्ग को व्यवसाय, नौकरी में आसानी होगी और जमींदारों को भी अंगरेजों के अत्याचार से राहत मिलेगी। कुछ एलाननामे, जैसे मौलवी लियाकत अली का एलाननामा फारसी शब्दों और कुरआन की आयतों से भरा हुआ है। इस एलाननामा का आरंभ खुदा के नाम से और पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा से होता है।

एक विशेष एलाननामा पत्रिका फतहुल-इसलाम 1857 की जंगे-आजादी का एक अमूल्य दस्तावेज है। इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम नहीं मिलता लेकिन पत्रिका के विषय और दूसरे विवरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने जो 'फैजाबाद के मौलवी' के नाम से भी प्रसिध्द थे, निकाला था। इस पत्रिका में अंगरेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने की अपील की गई है। इस पत्रिका की भाषा सामान्य है। इसमें अरबी और फारसी के शब्द कम हैं। पत्रिका में सेनानियों को युध्द के तरीके सिखाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा इस एलाननामे में नेतृत्व के बारे में समझाया गया है जो दिलचस्प है, 'अक्ल और दीन (धर्म) की शर्म भी यही कहती है कि मलेका विक्टोरिया काफिरा और दीन की दुश्मन, अंगरेजों की ताबेदारी से मुसलमान अमीर (बादशाह) की ताबेदारी और बादशाह के ताबेदार राजा की ताबेदारी करोड़ों दर्ज अफ्जल (उत्तम) है... और सब हिंदू दिलो-जान से इसलाम और बादशाह के खैर-खाह थे।

तो अब भी वही हिंदू और वही मुसलमान हैं और वही किताब है। अपने दीन पर वह रहें और अपने दीन पर हम रहेंगे। हम उनकी मुहाफिजत (सुरक्षा) करेंगे वो हमारी मदद और मुहाफिजत करेंगे। ईसाइयों ने हिंदू और मुसलमान दोनों को ईसाई करना चाहा था, अल्लाह ने बचा लिया। उल्टे वो आप ही खराब हो गए।' इस पत्रिका के अंत में अंगरेजों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने को कहा गया है और यह निवेदन किया गया है, 'सारे हिंदू और मुसलमान उनकी किसी किस्म की नौकरी न करें।'  फैज़ाबाद के एक ताल्लुकदार परिवार में जन्मे अहमदुल्लाह साहब हैदराबाद में शिक्षा प्राप्त करने के बाद बहुत कम उम्र में ही लेखक और धार्मिक उपदेशक बन गए थे। उनकी धार्मिक शिक्षाओं में विदेशी हुकूमत और शोषण के विरुद्ध धर्म-युद्ध भी शामिल था। वे क्रांतिकारी पर्चे निकालते थे और गांव-गांव घूमकर लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद के लिए प्रेरित करते थे। जब 1856 में  मौलवी अहमदुल्लाह शाह लखनऊ पहुंचे तो पुलिस ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों को रोक दिया।

प्रतिबन्ध के बावज़ूद जब उन्होंने लोगों को आज़ादी की लड़ाई के लिए उकसाना बंद नहीं किया तो 1857 में उन्हें फैज़ाबाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहांपुर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग भड़काने में अग्रणी भूमिका निभाई। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान मौलवी साहब को विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियों की उस 22 वीं इन्फेंट्री का प्रमुख नियुक्त किया गया जिसने चिनहट की प्रसिद्द लड़ाई में हेनरी लारेन्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना के साथ अभूतपूर्व युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ब्रिटिश सेना बुरी तरह परास्त हुई थी। युद्ध के बाद उन्हें जीते जी ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस नहीं पकड़ सकी। अपनी वतनपरस्ती, अप्रतिम साहस और विलक्षण युद्ध-कौशल के कारण अपने जीवन-काल में ही वे किंवदंती बन गए थे।

लोगों का मानना था कि उनमें कोई ईश्वरीय या जादुई शक्ति थी जिसके कारण अंग्रेजों द्वारा उन्हें हराना या मार डालना असम्भव था। हुकूमत को उनपर पचास हजार का इनाम घोषित करना पड़ा था। इसी इनाम की लालच में पुवायां के अंग्रेज-परस्त राजा जगन्नाथ सिंह ने उन्हें अपने घर पर आमंत्रित कर 5 जून, 1858 को धोखे से गोली मारकर हत्या कर दी। स्वाधीनता संग्राम के इस महान सेनानी के बारे में देश का इतिहास लगभग चुप है जिसके बारे में तत्कालीन ब्रिटिश अफसर थॉमस सीटन ने लिखा था - 'a man of great abilities, of undaunted courage, of stern determinations and, by far, the best soldier among the rebels.' आज़ादी के विस्मृत नायक मौलवी अहमदुल्लाह शाह को लाखों सलाम ! 

संपर्क : 34/242, सेक्टर -3, प्रताप नगर, जयपुर – 302033 (राजस्थान),  मो.न. 07727936255, Email : shailendrachauhan@hotmail.com

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