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July 2015
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(गिरीश पंकज के उपन्यास एक गाय की आत्मकथा का विमोचन)

 

 

दिनेश कुमार माली,

तलचेर,ओडिशा

 

'एक गाय की आत्मकथा' ही क्यों ?

‘एक गाय की आत्मकथा’ गिरीश पंकज जी का आधुनिकता के प्रभाव से विकृत होती मानवीय चेतना को झकझोरने वाला शिक्षाप्रद उपन्यास है, जो न केवल वर्तमान समय वरन मानव सभ्यता के उद्भव से लगाकर वेद-पुराण सारे धार्मिक ग्रन्थों के रचयिताओं, धर्मगुरुओं, राज-नेताओं, गांधी, विनोबा भावे, शंकराचार्य जैसे महान विद्वानों द्वारा गो-वध पर रोक लगाने के आवाहन को चरितार्थ करने के पीछे छुपे उद्देश्यों के प्रासंगिकता पर पूरी तरह से खरा उतरता है।

गिरीश पंकज जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय लगभग एक दशक पुराना है,इसलिए मैं यह कह सकता हूँ कि वे जितने मितभाषी है, उतने ही ज्यादा मृदुभाषी भी है।यह ही नहीं,वे बहुत ही कम शब्दों में अधिक से अधिक सारगर्भित बातों को रखने में सिद्धहस्त हैं। व्यंग्य की दुनिया में तो उनका कहना ही क्या! गैलेक्सियों में चमकते हुए एक सितारे की तरह वह दैदीप्यमान है।सृजन गाथा में लगातार कई वर्षों से प्रकाशित हो रहे उनके स्थायी स्तंभ “विक्रम वेताल” का मैं नियमित पाठक व प्रशंसक रहा हूँ, उनकी व्यंग्य-रचनाएँ समाज के यथार्थ को उजागर करने के साथ-साथ एक नव संदेश भी देती है, अपने सामाजिक मूल्यों,चारित्रिक गुणों,मान-मर्यादा तथा विरासत में प्राप्त संस्कृति की रक्षा के लिए।

 

इस किताब पर कुछ लिखने से पूर्व बार-बार मेरे मन में एक ही सवाल आ रहा था कि आखिरकार गिरीश पंकज जी जैसे बड़े रचनाकार को “एक गाय की आत्मकथा” जैसे छोटे विषय पर इतना बड़ा उपन्यास लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या वह हाईफ़ाई व हाइटेक आधुनिक संवेदनहीन समाज को कुछ सिखाना चाहते है? उन्हें विकास के नाम पर प्रकृति व संस्कृति के दोहन को रोकने की शिक्षा देना चाहते हैं? आज भी वह बात अच्छी तरह याद है,बचपन में जब छोटी क्लास में हम पढ़ते थे, तब होमवर्क में गाय की आत्मकथा जैसे निबंध लिखने के लिए शिक्षक देते थे। आज भी स्मृति-पटल पर एक छात्र द्वारा परीक्षा के पेपर में लिखा गया वाक्य “गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है” की जांच की दौरान शिक्षक के द्वारा लिखा गया कमेंट “बछिया के तुम ताऊ जी, जीरो नंबर पाओ जी” का व्यंग्य तरोताजा हो कर उभरकर सामने आता है और अतीत की उन यादों में खोकर मंद-मंद मुस्कराने के लिए बाध्य कर देता है। मेरे कहने का अर्थ यह था कि हमारी शिक्षा की प्रारम्भिक नींव की शुरूआत भी गाय से होती है, बचपन से ही हमारे भीतर अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार गाय को ‘गौ-माता', गंगा नदी को ‘गंगा माँ,’ हमारे देश को ‘भारत माता तथा सरस्वती प्रतिमा को सरस्वती-माँ के नाम से पुकारकर एक रागात्मक रिश्ता दर्शाते हुए भारतीय दर्शन के पावन परिवेश को उजागर करने का प्रचलन रहा है। इस उपन्यास में गिरीश पंकज जी ने 17 अध्यायों की रचना की है, जिसमें उन्होंने देशभर की अनेक पत्र-पत्रिकाओं पुस्तकों तथा शोध-ग्रंथों का संदर्भ लिया है,जिसमें ‘कल्याण’ मासिक पत्रिका ‘गौ अंक’, गीताप्रेस गोरखपुर, राम चरित मानस, युग निर्माण योजना डॉ॰ नेमीचन्द की पुस्तक ‘कत्लखाने:सौ तथ्य', किसान और गाय स्वामी मंसूक दास ‘पेटा’ की वेव साइट विकास दावे की पौराणिक एवं आधुनिक गौ भक्ति कथाएँ आदि प्रमुख हैं। यही नहीं, उपन्यास के अंदर सभी धर्मों जैसे मुस्लिम, जैन, सिख, बौद्ध, ईसाई सभी धर्मों के ग्रंथों का सटीक सहारा लेते हुए यह सिद्ध किया है कि किसी भी धर्म में गो-वध का उल्लेख नहीं है, वरन सारे धर्म गो रक्षा के पक्षधर है

 

राजस्थान के एक किसान परिवार में पैदा होने के कारण मुझे गिरीश पंकज जी के उपन्यास “गाय की आत्मकथा” को आत्मसात करने में बिलकुल भी समय नहीं लगा, क्योंकि मैंने अपने घर के मुख्य व्यवसाय पशु-पालन व खेतीबाड़ी के कार्यों को अत्यंत ही नजदीक से देखा। यह उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य शक्ति मुझे अपने अतीत में ले जा रही हो और उस बाल्य व किशोर जीवन के स्मृति-पटल पर अंकित दृश्य एक-एककर पुनर्जीवित हो रहे हो।अरावली पर्वत के तलहटी में बसी मेरी जन्म-स्थली सिरोही नगरी के कालकाजी तालाब के पीछे वाला हमारा हरा-भरा खेत,गेहूं और 'रजगे' की क्यारियों में हाथ में फावड़ा लिए सिंचाई करती माँ, 'ओडू' के पास खूँटें से बंधी चारे के लिए रंभाती गाय और नहर के उस पार से गुलाबी साफा पहने अपने कार्यालय जिला कोषालय से घर लौटते पिताजी। सब-कुछ एक-एककर याद आने लगा था। साइकिल के पीछे कैरियर पर चारे व सूखी लकड़ी की गठरी बाँधें खेत से घर की ओर जाता बड़ा भाई। बीच रास्ते में हिन्दू श्मशान घाट। इस उपन्यास की एक-एक पंक्ति मेरे अवचेतन मन के किसी सुषुप्त कोने को जगा रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे हो-न-हो, मैं भी इस उपन्यास के किसी पात्र की भूमिका अदा कर रहा हूँ और सशक्त भाषा-शैली इतना ज्यादा प्रभावित कर रही थी कि मुझ जैसे एक अकर्मण्य पाठक के भीतर एक कर्मयोगी पात्र सजीव हो उठा हो। धन्य हो उस लेखनी को जो मुझे याद दिला रही थी,घर के अलंदू भरे गुवाल में आठ-दस गायों का झुंड तथा उनकी सेवा-सुश्रूषा करती,चारा डालती,पानी पिलाती,गोबर उठाती व छत पर कंडे बनाती माँ की स्मृतियाँ। गायों के बीमार होने की अवस्था में बांस की वेजनुमा खोखल से दवाई पिलाना, प्रसूता गाय द्वारा बछड़ों को जन्म देने जैसे सजीव दृश्य क्या भूले जा सकते हैं!

एक वृतचित्र की तरह मेरी आँखों के सामने उपन्यास पढ़ते समय सब-कुछ गुजर रहा था मानो मैं सिनेमाघर में बैठकर कोई मर्मस्पर्शी फिल्म देख रहा हूँ।मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत कई भावुक दृश्यों की तरह शाम को घर आती गायों का अपने बछड़ों के लिए रंभाना,अपने  निश्चित खूँटे पर जाकर चुपचाप खड़ी होकर अपने बांधने का इंतजार करना तथा अपने चारा डालते मालिकों के प्रति गल-कंबल हिला कर आभार व्यक्त करना देख मैं अचंभित होता जा रहा है। क्या पाशविक संवेदनाओं में मानवीय संवेदनाएँ अध्यारोपित हो सकती है? पशु मनुष्य की संवेदनाओं को ग्रहण कर सकता है, मगर मनुष्य पशु के हृदय की बात को समझ सकता है? यह कैसा साहचर्य व कैसी जैव-मित्रता है? वह दृश्य आज भी मेरे लिए अविस्मरणीय है जब हमारी गाय का बछड़ा किसी साँप के काटने अथवा बीमारी की वजह से मर गया था और गाय की आँखों से उसका मृत-देह देखकर लगातार आँसू गिर रहे थे,फिर भी खेत में काम कर रहे उस ग्वाले की लालच के बारे में क्या टिप्पणी करूंगा जिसने उसकी पिछली दोनों टांगों को रस्सी के टुकड़े से बांधकर दूध दोहना शुरू किया। इस पर जब गाय ने सींग हिलाकर,पूंछ फेंककर तथा आगे के पाँव पटककर अपनी असहमति और आपत्ति का प्रदर्शन किया तो उस छद्मवेशी गोपाल ने मरे हुए बछड़े को किसी चमार को देकर उसका चमड़ा उधेड़ कर उसमें घास-फूस भरकर उसका पुतला बनाकर गाय के सामने लाकर रख दिया ताकि गाय उसे असली समझकर दूध देने के लिए तत्पर हो जाए। मगर यह किसी पशु के साथ 'इमोशनल ब्लैकमेल' नहीं तो और क्या है? क्या गाय संवेदनशील प्राणी नहीं है? क्या उसे जिंदा या मुर्दा बछड़े के भीतर अंतर महसूस नहीं हो सकता है? क्या वह अपनी आँखों के सामने अपने मरे हुए बछड़े का पुतला देखकर असलियत नहीं समझ पाएगी? मगर लालची मनुष्य को गाय की संवेदना से क्या लेना-देना, उसे तो पैसे कमाने से मतलब होता है। क्या पाप क्या,पुण्य। सारा भारतीय दर्शन ‘जियो और जीने दो’, “जैव-मैत्री” के सारे सिद्धान्त, सारी विचार-धारा पल भर के लिए उनकी लोलुपता के आगे समाप्त हो जाती है।

अगर मनुष्य पुनर्जन्म में विश्वास करता है और चौरासी लाख योनियों के आवागमन के चक्कर में पड़ने से बचने के लिए सोचता तो इस तरह के घातक कार्य कभी नहीं करता। अगर आत्मा का पुनर्जन्म होता है तो आज जो मनुष्य गाय को खा रहा है तो कल उसी गाय की आत्मा एक कसाई का रूप धारण कर अगले जन्म में गाय का शरीर धारण किए हुए उसी मनुष्य का भक्षण कर सकती है।अगर यह सृष्टि का नियम है तब तो मनुष्य को किसी भी मूक प्राणी का वध करना नहीं चाहिए। एक दृश्य मुझे आज भी विचलित करता है कि  जब हमारी गाय,जिसे माँ गोमती कहकर पुकारती थी, अचानक एक ऐसी बीमारी की चपेट में आई कि वह अपने खूंटे से उठ नहीं पा रही थी और बैठी-बैठी वह अपनी मृत्यु का इंतजार कर रही थी। माँ उस गाय को नहलाती,धुलाती गरम पानी में कपड़ा भिगो कर उसके गल-कंबल का सेंक करती,मगर गोमती की आँखों से झर-झर टपकते आँसू माँ के हृदय को विचलित कर देते थे। वह अन्यमनस्क हो जाती थी और एक विचित्र-सी परेशानी दुख या यंत्रणा के भाव उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देने लगते थे। मेरे लिए वह घटना कितनी हृदय-विदारक थी,जब गाय ने अपना शरीर त्याग दिया तो माँ फूट-फूटकर रोई थी और तीन-चार दिन तक उसने खाना भी नहीं खाया था। वह तो इतनी शोक-विह्वल हो चुकी थी मानो घर के किसी आत्मीय सदस्य की मृत्यु हो गई हो। माँ,भले ही,अनपढ़ थी,मगर उसकी संवेदनाएँ, भावनाएँ और जानवरों के प्रति भी प्रेम हमारे लिए अनुकरणीय था।

बचपन की मधुर स्मृतियों में एक और दृश्य साकार होने लगता है, जब मैं भूरे-सफ़ेद रंगों से चित्रित ललाट वाले नवजात बछड़े को दोनों हाथों से आलिंगन करते हुए सीढ़ियों से चलकर छत पर ले जाकर सर्दी की गुलाबी धूप में उसके साथ खेलता था। माँ चिल्लाती रहती थी,उसे डर लगा रहता था कि कहीं वह बछड़ा गिर न जाएँ,मगर हम सभी बच्चे उस बछड़े के ललाट पर हाथ फेर कर अपने प्यार का इजहार करते हुए पुचकारते थे। सही अर्थों में, गिरीश पंकज जी के इस उपन्यास में मैं अपनी आत्म-कथा खोजने लगा था। सिरोही के राम झरोखा मंदिर में सायंकालीन की जाने वाली ईश्वर-स्तुति में तुलसीदास जी का दोहा “गो धन, गजधन, बाजी धन, और रत्न धन खान/जब आवे संतोष धन, सब धन धूल समान आज भी स्तुत्य है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन समाज के अभिजात्य वर्ग की संपन्नता को दर्शाने में “गो-धन” की मुख्य भूमिका बताई है।मगर समय के परिवर्तन के कारण आजकल गायों को धन की श्रेणी में न गिनकर केवल इसे मांसाहार की एक सामग्री के रूप में विकसित समाज देखने लगा है। भारतीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं में गाय की जितना महत्त्व दर्शाया गया है,आधुनिक मनुष्य उन सारी बातों को भूलकर धन लोलुपता का शिकार होता जा रहा है। परकाया प्रवेश करने वाले वैदेही आदिगुरु शंकराचार्य की तरह गिरीश पंकज जी ने गाय के शरीर में अपनी आत्मा को प्रवेश कराकर उसके सुख-दुख,  वेदना,व्यथा सभी का प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए उसकी आत्मकथा को इस उपन्यास के स्वरूप  में लिखने के लिए कितनी मेहनत की होगी, इसका अनुमान लगाना भी मेरे लिए नामुमकिन है।

 

कसाईखानों में सर्वदेवमयी गाय की आर्तनाद देवतागण क्यों नहीं सुनते ?

गिरीश पंकज जी के इस उपन्यास का कलेवर बहुत ही ज्यादा विस्तृत है। अगर इसके सत्रह अध्यायों के साथ इसमें पुरोवाक भी जोड़ा जाए तो इस उपन्यास में श्रीमद भागवत गीता की तरह अठारह अध्याय हो जाते हैं। यह ग्रंथ केवल गाय तक ही सीमित नहीं है, वरन सृष्टि के समस्त जन्तु-जगत् के हितार्थ जैव-मैत्री का संदेश देता है। इस उपन्यास के प्रथम अध्याय की शुरूआत अथर्ववेद के निम्न श्लोक से होती है:-

“माता रुद्राणाम दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:।

प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिम वघिष्ट ।।"

इस श्लोक में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहन और घृतरूप अमृत के खजाने की उपमा से सुशोभित करते हुए स्तुति की गई है। यहीं नहीं,समुद्र मंथन से उत्पन्न कामधेनु गाय में सभी देवताओं के प्रवेश कर जाने वाले मिथक द्वारा गाय को सर्वदेवमयी होने का घटना का जहां उल्लेख किया है, वहीं वर्तमान समय में गाय की काया में समस्त देवताओं का निवास होने के बावजूद प्रतिदिन लाखों गायों के कसाईखानों में कटते समय उनकी आर्तनाद को किसी भी देवता द्वारा न सुने जाने के कारण लेखक ने उनकी उपस्थिति पर प्रश्नवाचक खड़ा किया है। कहने का अर्थ यह है कि वेदों, पुरानों तथा अन्य ग्रन्थों में गाय की महत्ता को लेकर जितने मिथक गढ़े गए हैं, क्या प्रकृत में वे सब क्या मिथ्या है? उपन्यासकार ने यहाँ अपनी सुपरिचित व्यंग्य शैली में आधुनिक समाज अपने वृद्ध माँ-बाप को वृद्धाश्रम में भेजकर जिस तरह अपनी कुटिल मानसिकता का परिचय देता है तो उन्हें गायों को निर्ममतापूर्वक काटे जाने के लिए कसाईबाड़ा, कसाईखाना, कसाईघर, वधशाला या स्लोटर हाउस में भेजे जाने पर तो क्यों  दुख होगा ?

जब मैंने गूगल पर किसी विदेशी स्लोटर हाउस अल-कबीर का वीडियो पहली बार देखा तो देखकर रोंगटे खड़े हो गए। किस तरह तीन-चार दिन से भूखी प्यासी गायों को रेलिंग से बंधे हुए खांचे में भेजी जाता है, जिसमें उसकी गर्दन फंस जाती है और तुरंत ऊपर आरा मशीन की तेज धार वाली ब्लेड एक ही क्षण में सिर धड़ से अलग कर देती है। एक तरफ कटा हुआ गाय का मुंड, दूसरी तरफ खून से लथपथ धड़, जिसे क्रेन की तरह एक मशीन अपने शिकंजे में पकड़  लेता है और दूसरे कटर मशीन द्वारा उसकी चमड़ी उधेड़ जाती है। शेष में बचा रह जाता है लटकता हुआ मांस का लोथड़ा,जिसे तीव्र गति से चलने वाली आरा मशीन उस लोथड़े का दो-भागों में विभक्त कर देती है। इन लोथड़ों को पानी के तेज फव्वारों से धोया जाता है और फिर उनका रसायनिक परीक्षण किया जाता है। इतना करने के बाद अलग-अलग माप के टुकड़ों में काटकर पॉलीथीन में भरा जाता है और वजन करने के बाद ‘ओके’ का पोस्टर छिपकाया जाता है। बस, पोलिथीन में पैक गाय के मांस का उत्पाद विश्व-बाजार की निर्यात वस्तु का रूप ले लेती है। जिसे आत्मकेंद्रित, स्वादकेन्द्रित, अर्थकेंद्रित और पाखंडजीवी समाज चटकारे ले लेकर खाता है । उपन्यासकार गिरीश पंकज ने स्पष्ट किया है कि भूमाफिया, कोलमाफिया की तरह हमारे देश में बड़ी तेजी से गोमाफिया भी पनपने लगा है।

गिरीश पंकज जी ने अत्यंत ही प्रभावशाली भाषा शैली में लोकधेनु अर्थात सामान्य गायों पर किए जाने वाले अत्याचारों का खुलासा किया है कि ब्रह्माजी द्वारा देवताओं की विशाल सेना भेजकर ‘देवासुर संग्राम’ की कहानी वाले दृष्टांत के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि वशिष्ठ मुनि की कामधेनु को देवनार जंगल से चुराने के प्रयासों में असुरों के विफल हो जाने के कारण वे सामान्य गायों पर अपना बदला निकाल रहे हैं,तभी तो उस संग्राम में मरे हुए असुरों के रक्तबीजों से उत्पन्न दानवी संस्कारों से युक्त मानव अभी भी पुरातन गो मांस के स्वाद को नहीं भूल पाया है और गायों को देखकर उनके दबे हुए संस्कार पुनः जागृत हो जाते हैं। यही देवपुर धीरे-धीरे औपनिवेशिक परिवर्तन का शिकार होने लगा। जंगल कटने लगे और उसकी जगह पर विशाल अट्टालिकाओं वाली गगनचुंबी इमारतें ‘देवनार विहार’,‘टाइगर पार्क’,‘डीयर इंकलेव’,'करुणा एवेन्यू', ‘महावीर सिटी’जैसी हाइटेक कॉलोनियां बनने लगी। उपन्यासकार ने यहाँ भी अपनी प्रखर व्यंग्य-बाण में गायों के इस संहार के कारण उन्हें विलुप्त होने वाली प्रजाति के साथ जोड़कर देखा कि वह समय भी दूर नहीं है जब धरती पर जीवित गाय कभी देखने को मिलेगी। आने वाली पीढ़ी को गायों के चित्र, प्रतिमा अथवा इन्टरनेट में दिखाकर संतुष्ट होना पड़ेगा कि गाय इस तरह का एक घरेलू चौपाया पशु हुआ करता था, जिसके दुग्ध से सारी सृष्टि का पालन होता था, मगर मांसाहारी लोगों की लपलपाती जीभ ने उन सारे जंतुओं को हमेशा-हमेशा के लिए ग्रास कर लिया। कितना पैथेटिक समय होगा वह हमारी पीढ़ी के लिए!

गिरीश पंकज जी ने उपन्यास को सजीव भाषा शैली प्रदान करने के साथ-साथ उसमें मर्मांतक आरोपण करने के लिए सरायपुर के कसाइयों के चंगुल से छूटी दो गायों श्वेता और श्यामा के आपसी आलाप-प्रलाप के माध्यम से बदलते सामाजिक परिवेश में गायों की स्थिति के यथार्थ तत्त्वों को बखूबी उजागर किया है। सारा उपन्यास पाठकों के समस्त इस तरह दृश्य प्रस्तुत करता है मानो कोई चित्रपट पर अलग-अलग मनोभावों का प्रकट करती हुई कोई मार्मिक फिल्म देखी जा रही हो, जिसमें कहीं वैदिक जमाने की नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के दृश्य तो कहीं त्रेता युगीन गायों की स्तुति-आराधना तो कहीं द्वापर में गाय चराते श्री कृष्ण और तो कलियुग में कल-कारखानों में कटती गायों के दृश्य एक-एक कर गुजर रहे हो ।

 

एक सवाल यहाँ अवश्य उठता है कि आधुनिक युग की संस्कृति है या विकृति ? लोग मॉडर्न कहलाना पसंद करता है। अपने आपको सभ्य घोषित करता है, मगर गाय तो क्या जो भी जानवर सामने दिखाई दे, चाहे वह हिरण, बकरी, सूअर, कुत्ता, तितर, बटेर, तोता, मैना, कबूतर, मुर्गा-मुर्गी, मछली से लेकर चूहा, छछूंदर, छिपकली और चींटी तक क्यों न हो,वह उसे चटकर जाता है मानो सूट-बूट, टाई पहने आधुनिक मानव पाषाणयुग की कन्दराओं में रहने वाला  प्रागैतिहासिक इंसान की तरह जंगली जीवन जी रहा हो।क्या उसे खाने को और कुछ नहीं मिल रहा है ? क्या खेती,बाग-बगीचों के फल और अन्य वानस्पतिक सामग्री उसकी आवश्यकता पूरी नहीं कर पा रही है आहार के रूप में ? तो फिर क्यों वह अपने हाथ में पत्थर के हथियार लिए घूमता है? मानव विकास की चरमोत्कर्ष की गाथा गाने वाले ग्रंथ वृहत्पाराशर  स्मृति और अथर्ववेद धरे के धरे रहे जाते है। राम और कृष्ण-कन्हैया की धरती पर आज तीस हजार कसाई खाने हैं।

कभी देश की आजादी के समय सौ करोड़ गौ वंश था और आज आजादी के साथ अड़सठ साल बाद घटकर मात्र आठ करोड़ है। मनुष्य को केवल पैसा चाहिए, उसके कानों में गायों की चीखें जूं तक बनकर नहीं रेंगती है। कुछ फर्क नहीं पड़ता उनकी अंतरात्मा पर। यही ही नहीं गौशालाओं के घटने तथा मधुशालाओं के बढ्ने के चिंता व्यक्त करते हुए पुरानी कहावत गली-गली गो रस बिके मदिरा बैठ बिकाय की तर्ज पर अपनी स्वरचित कहावत 'जगह-जगह मदिरा बिके, दूध नजर न आए' द्वारा उपन्यासकार ने वर्तमान स्थिति पर परिहास करने के साथ-साथ  'जिसे चाहिए दूध,वह सिंथेटिक ही पाए द्वारा आधुनिक समाज की यथार्थता पर करारा व्यंग किया है। क्या यही सोच आधुनिक सभ्यता की पराकाष्ठा है ? क्या समाज वह बात भूल गया जब मंगल पांडे ने बारूद में गोमांस की भनक मिलने पर 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी और ‘गदर’ की पहली पृष्ठभूमि का निर्माण हुआ था ? क्या हम भूल गए,महान स्वतन्त्रता नेताजी लोकमान्य तिलक का वह आवाहन जब भी देश आजाद होगा, गोवध पर सर्वप्रथम रोक लगेगी?  क्या याद नहीं गांधीजी का वह दो टूक वक्तव्य, ‘ऐसे स्वराज से मेरा क्या लेना-देना,जहां गो वध किया जाता हो,गाय का सवाल मेरे लिए स्वराज से बढ़कर है।'?  क्या हमने संत विनोबा भावे की उस बात को भी नहीं भुला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था पवित्र कुरान और बाइबिल के अनुसार भी अप्रत्यक्ष रूप से गो हत्या करना जघन्य पाप है ? ये ज्वलंत सवाल ही नहीं,वरन उपन्यासकार ने लाल बहादुर शास्त्री, लोक नायक जय प्रकाश नारायण, देवराहा बाबा, जवाहर लाल नेहरु आदि के गोवध निषेध के बारे में विचारों का उल्लेख करते हुए उपन्यास को अत्यंत ही प्रेरणादायी व शिक्षाप्रद बनाया है। रही गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले कानून की बात,जिसमें 19 नवंबर 1947 को दातार सिंह की अध्यक्षता वाली सरकारी समिति की अनुशंसाओं को एक तरफ रखकर 23 अप्रेल 1958 को पशुवध को व्यक्ति का मौलिक अधिकार घोषित किया है और भगवान महावीर, बुद्ध, ईसा मसीह, पैगंबर मोहम्मद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती गांधी और विनोबा भावे जैसे महापुरुषों की सोच पर तुषारापात कर दिया।

 

कहाँ चला गया वह उन लोगों का महान कथन "यतो गावस्ततो वयं' अर्थात  जहां गाय हैं, वहाँ हम हैं। काश! गाएँ बोल पाती। काश! वे वोट दे पाती। चार्ल्स डिकन्स के ‘एनिमल फार्म’ की तरह गायें भी अपने संगठन का प्रतिनिधित्व करती हुई लोकतन्त्र के ढांचे में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती। पूजा-पाठ के पाखंडी लोगों पर गिरीश जी की कविता “चाहे लाख करो तुम पूजा/ तीरथ करो हजार/ अगर किया पशुओं का वध तो/ सबकुछ है बेकार" ने लालच में फंसे गुमराह समाज को सचेत किया है। यही ही नहीं, श्वेता और श्यामा के बीच चल वही प्रासंगिक बातों के मध्य  ‘संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे’ जैसे सरकारी विज्ञापनों को भी उपन्यासकार आड़े हाथों लेने से नहीं चुके हैं कि किस अंडे से चूजा निकलेगा या नहीं,इसका निर्णय सरकार लेगी ?

 

'मॉडर्न इंडिया' में 'बीफ' का बढ़ता प्रचलन

द्वितीय अध्याय में उपन्यासकार श्यामा गाय के मुख से गोवर्धन पूजा के दिन यादव समाज द्वारा कृष्ण भगवान का यशगान तथा राऊत समाज द्वारा नाचते दोहों को पढ़ते हुए गायों की पूजा का परंपरा को आधुनिक शहरी संस्कृति में इसे पिछड़े वर्ग की दकियानूसी सोच का परिणाम बताया है! आधुनिक युग में जहां बच्चों को पिज्जा,बर्गर, हॉट-डॉग या बीफ के प्रति ज्यादा अभिरुचि है वहाँ उन्हें दूध,घी और मक्खन से क्या लेना-देना! आज के लोगों में जहां कुत्तों के प्रति ज्यादा रुझान है,वहाँ उन्हें गो-शावकों से क्या मतलब? वरन उन्हें गांव के कसाईखाने में  भेजने में भी बिलकुल तकलीफ नहीं होती है। मुझे फेसबुक पर भारत के कसाईखानों के कुछ दृश्य देखने को मिले थे, जिन्हें देखते ही दिल दहल जाता है। कसाई लोग किस तरह सींगों से पकड़ कर भूख-प्यास से बिलखती गाय को नीचे जमीन पर गिरा देते हैं, और फिर तेज धार वाली  कटार से मरोड़ी हुई गर्दन से झूल रहे गल-कंबल को काटने लगते हैं। किसी तरह निरीह आँखों से वह गाय इन जल्लाद यमदूतों की आँखों में अपनी मृत्यु देखने लगती है।  देखते-देखते चारों तरफ खून ही खून बहने लगता है। फिर कटे सिर को दूर फेंककर उसके धड़ की चमड़ी उधेड़ने लगते हैं और कितनी बेदर्दी से उसकी मांस के लोथड़ों को निर्दयतापूर्वक काटा जाता हैं। इस  दृश्य को लिखने में जब मेरी कलम रुक-रुककर रोने लगती हैं तो पता नहीं,किस तरह अपने सीने पर एक विशाल पत्थर रख कर गिरीश पंकज जी ने उन दृश्यों को सजीवता पूर्वक लिखने का साहस किया होगा,वह भी एक बड़े उपन्यास के रूप में। शायद जो वेदना कभी पन्ना धाय ने अपनी आँखों के सामने अपने बेटे की गर्दन कटते देख सही होगी,वैसे ही गाय के गर्दन कटने की सोचकर उनकी आत्मा लिखते-लिखते कितनी बार रोई होगी! क्योंकि ये दृश्य तभी लिखे जा सकते हैं, जब गायों की हत्या के दर्द को उपन्यासकार ने बुरी तरह से अपने भीतर समेटा होगा।

'आर्यावर्त' कहलाने वाला विश्व-गुरु भारत का यह भी एक भयावह चेहरा है,'.मार्डन इंडिया' का,जहां संवेदना,नैतिकता,उपदेश सब कुछ बेमानी हो चुके हैं और बचा रह गया है केवल भ्रष्टाचार,पाखंड,धन-लोलुपता का भोथरापन।  उपन्यासकार ने श्वेता और श्यामा के संवादों के मध्य प. बिहारीलाल जी के परिवार का भी किस्सा दिया है जिसने आजादी के दौरान हो रहे धार्मिक उन्मादों के मध्य आततायी मुसलमानों के भय से गोमांस न खाकर अपने परिवार को धर्म-भ्रष्ट होने से बचाने के लिए सपरिवार आत्महत्या करना मंजूर कर लिया था। ऐसे ही आज भी कुछ संवेदनशील हिन्दू परिवार विद्यमान हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं होगी, ओड़िशा के कटक शहर  में एक बस ड्राइवर बारात लेकर महानदी का पुल पार कर रहा था कि कुछ बारातियों ने जबर्दस्ती उसके मुंह में गोमांस डाल दिया। विक्षुब्ध मन से उसने अपना जीवन निरर्थक समझा और कंडक्टर को बस से नीचे उतारकर कहा कि वह उसकी माँ को जाकर कह देगा कि उसने उसका धर्म भ्रष्ट करने वालों से प्रतिशोध ले लिया है, यह कहकर उसने पुल के रेलिंग से इतनी ज़ोर से अपनी बस को टक्कर दी कि कुछ ही पल में वह बस महानदी में हमेशा-हमेशा के लिए जल समाधि में लीन हो गयी।

कितनी घोर विरोधी आस्था है अभी भी कुछ लोगों में गोमांस  भक्षण के खिलाफ! और ऐसे कई किस्से सुनाई पड़ते हैं कि बेटा पढ़ने के लिए विदेश चला जाता है और वहाँ की विदेशी संस्कृति में .रच-बच जाता है,यहाँ तक कि गो-मांस का सेवन करना भी सीख जाता है और जब वह इंडिया अपने घर लौटता है तो अपने पिताजी को 'बीफ' का डब्बा उपहार स्वरूप प्रदान करता है। डिब्बा में 'बीफ' देखते ही पिताजी को गहरा सदमा लग जाता है और हृदयघात से तत्काल मृत्यु हो जाती है। हमारे देश में एक ऐसा वर्ग है, जो न केवल गोमांस वरन किसी भी प्रकार के मांस से परहेज करता है,जबकि दुनिया में एक दूसरा वर्ग ऐसा भी है जो शाकाहारी गायों को भी हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए मांस खिलाता है ताकि वे ज्यादा से ज्यादा दूध दे सके। नतीजा क्या है ? "मेडकाऊ' जैसी खतरनाक बीमारियाँ पैदा होने लगती हैं। इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत है सभी धर्मों के पाखंडियों को इसमें लतेड़ा गया है, जो गायों के नाम पर अर्थ-अर्जन करना चाहते हैं। क्या हिंदू,क्या मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध,जैन सभी धर्म। इन धर्मों के संस्थापकों तथा पवित्र ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए उपन्यासकार गोवध निषेध की महता को स्थापित करने को पूरी तरह सफल हुए हैं। बीच-बीच में, सरकार द्वारा कत्लखानों की स्थापना से अर्थ-व्यवस्था में सुधार जैसे विषय पर करारा व्यंग्य करते हुए गिरीश जी निठारी कांड जैसे अमानुषिक कुकर्मों को भी समाज के सामने प्रस्तुत करने से नहीं चुके हैं। कुछ लोग गायों की जगह बैलों की हत्या करते हैं, इस पर प्रहार करने से गिरीश जी पीछे नहीं रहे। .जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज का कथन कि कसाई खाने ले जाई जा रही एक गाय की जान बचाना एक मंदिर बनाने के बराबर पुण्य का कार्य है, इस पर मैं यह कहना चाहूँगा कि इस उपन्यास के रचनाकार गिरीश जी ने सहस्र मंदिरो को बनाने के बराबर पुण्यकार्य किया है, जिसे पढ़ कर सहस्र पाठकों के दिल में परिवर्तन आएगा और वे मांसाहार से उपराम लेकर शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो जाएंगे, जिससे सैकड़ों जीव जंतुओं की प्राणों की रक्षा हो सके।

 

गायों का देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

अध्याय तीन में सरायपुर की 'कपिला गोशाला' का वर्णन किया गया है। यही ही नहीं, गायों की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले महंत रामपुरी,हेडगेवार, विनोबा-भावे,महावीर बुद्ध,गांधी जैसे उद्दात्त चरित्रों का उल्लेख कर अत्यंत ही पुनीत कार्य किया है। जहां द्वापर युग में गायों की देख-भाल की जाती थी, वहीं आधुनिक युग में गायों के नाम पर “गौ सेवा आयोग” तथा “गौशाला’ खोलकर लाखों रुपए हथियाए जाते हैं और जनता को इमोशनल ब्लैकमेल भी किया जाता है। गौ प्रेमी विद्वान सर विलियम बोर्न के अनुसार किसी गाय के बिना राष्ट्र की कल्पना करना असंभव है। दूसरे विद्वान के अनुसार, गाय राष्ट्र के दुग्ध भवन की देवी है, जो भूखों को खिलाती है, नंगों को पहनाती है और रोगी को निरोगी करती है। उपन्यासकार ने गायों से हमारी देश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ने वाले  प्रभाव को जिस तरह से दर्शाया है,वैसा कभी सन 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक “सत्यार्थ प्रकाश” के दशमसमुल्लास: में दर्शाया था,पाठकों के लिए जिसका अधोलिखित उद्धरण करना उचित रहेगा।

" जिसमें उपकारक प्राणियों की हिंसा अर्थात जैसे एक गाय के शरीर से दूध, घी, बैल, गाय उत्पन्न होने से एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर सहस्र छः सौ मनुष्य को सुख पहुंचता है वैसे पशुओं कों न मारे, न मारने दे। जैसे किसी गाय से बीस सेर और किसी से दो सेर दूध प्रति दिन होवे उसका मध्य भाग। ग्यारह सेर प्रत्येक गाय से दूध होता है, कोई गाय अठरह और कोई छः महीने तक दूध देती है। उसका मध्य भाग बारह महीने हुए, अब प्रत्येक गाय की जन्म भर के दूध से 24960 मनुष्य एक बार में तृप्त हो सकते हैं, उसके छः बाछियाँ छः बछड़े होते हैं उनमें से दो मर जाएँ तो भी दस रहे, उनमें से पाँच बछड़ियों के जन्म भर के दूध को मिलाकर 124600 मनुष्य तृप्त हो सकते हैं अब रहे पाँच बैल वे जन्म भर में 5000 मन अन्न न्यून से न्यून उत्पन्न कर सकते हैं, उस अन्न में से प्रत्येक मनुष्य तीन पाव खावे तो अढ़ाई लाख मनुष्यों की तृप्ति होती है, दूध और अन्न मिला 374600 मनुष्य तृप्त होते हैं, दोनों संख्या मिला के एक गाय की एक पीढ़ी में 475600 मनुष्य एक बार पालित होते हैं और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ाकर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता हैं इससे भिन्न बैलगाड़ी सवारी भार उठाने आदि कामों से मनुष्यों के बड़े उपकार होते है तथा गाय दूध में अधिक उपकारक होती है और जैसे बैल उपकारक होते हैं भैंसे भी हैं परंतु गाय के दूध घी से जितने बुद्धिवृद्धि से लाभ होते हैं उतने भैंस के दूध से नहीं, इससे मुख्योपकारक आर्यों ने गाय को गिना है और जो कोई अन्य विद्वान होगा वह भी इसी प्रकार समझेगा। बकरी के दूध से 24920  आदमियों का पालन होता है, भैंस,हाथी, घोड़े, ऊंट, भेड़, गधे आदि से बड़े उपकार होते हैं। इन पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा ।

 

देखो! जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे तभी आर्यवर्त्त वा अन्य भूगोल के देशों में बड़े आनंद में मनुष्य प्राणी वर्त्तते थे, क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुतायत  होने से अन्न रस पुष्कल प्राप्त होते थे, जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकर  गौ आदि पशुओं के मारने वाले मद्यपानी राज्याधिकारी हुए हैं तब से क्रमशः आर्यों के दुख की बढ़ती होती जाती है, क्योंकि – "नष्टे मूले नैवे फलां न पुष्पम"(जब वृक्ष का मूल काट दिया जाय तो फल फूल कहाँ से हो?)"

 

गो-शालाओं में 'मिठलबरें'

अध्याय 4 में उपन्यासकार गिरीश पंकज जी ने कपिला गोशाला में गायों की देख भाल कर रहे सेठों की वास्तविकता को उजागर करते हुए गो मित्रों और गो सेवक बन रहे इन चेहरों के पीछे छुपी हुई असली सूरत को सामने लाया है। आडंबर की आड़ में गाय केवल पैसा कमाने की मशीन बन जाती है और गौ-सेवा या समाज-सेवा महज एक दिखावा। ऐसे लोगों के लिए उपन्यासकार ने छत्तीसगढ़ की भाषा का शब्द ‘मिठलबरा’ प्रयुक्त किया है। उसका अर्थ होता है एक ऐसा आदमी जो झूठा व्यवहार करे मगर बातचीत में बड़ा मीठा हो। ऐसे दमडीमल सेठों का गायों के दुख दर्द और संवेदनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। यहाँ तक कि मरे हुए बछड़े को गाय के सामने रखकर उनका दूध निकालना अपना असली धर्म समझते हैं,जैसा कि प्रारम्भ में मैंने अपने संस्मरण में लिखा है। उनके लिए न तो करुणा, न दया जैसे शब्द लागू होते हैं। इस अध्याय की एक खास और विशेषता है जिसमें गायों के अत्यंत ही सुंदर-सुंदर नामों का उल्लेख है जैसे शुभ्रा, सुवर्ण कपिला, गोल पिंगला, रक्त पिंगाक्षी, खुर पिंगला, पूछ पिंगला, श्वेत पिंगला, स्वर्णआभा, गल पिंगला, पाटला आदि। अथर्ववेद में गायों की महिमा का बखान करने वाले अनेक श्लोक दिए है उसमें से एक श्लोक यह है : -

“प्रजावती: सूयवसे रुशंती: शुदधा अप: सुप्रषाणे पिवन्ती:

मा व स्तेन ईशत माघशंस: परि वो  रुद्रस्य हेतिर्वूनक्तु”

 

अर्थात हे गायो तुम अधिक से अधिक बच्चों को जन्म दो, चरने के लिए तुम्हें हरा-भरा चारा मिले, तुम सुंदर तालाब में शुद्ध पानी पियो। तुम चोरो से बचो। हिंसक जानवरों से भी बचो। रुद्र का शस्त्र तुम्हारी रक्षा करे। मगर आज के जमाने में इन श्लोकों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। उपन्यासकार ने गौतम ऋषि और सत्यकाम का संदर्भ देते हुए ब्रह्म ज्ञान के समस्त सूत्रों में गो सेवा को प्रमुख बताया है। मगर धूर्त सेठ लोग ‘गो अनंत गो कथा अनंत’ कहकर इसका अनुकरण नहीं करते। इस अध्याय में गो चारण बंधुओं के कुछ गानों का भी समावेश किया गया है। गो सेवा आयोग से गायों की देखभाल के लिए अनुदान झटकने वाली गौ शाला द्वारा कमजोर और बांझ गायों को कसाई खाने भेजने की साजिश का पर्दाफाश उपन्यासकार द्वारा करने पर मंत्रालय द्वारा की गई सिफ़ारिशों का जिक्र कर गिरीश पंकज जी ने ‘चारा घोटाला’ की तरह ‘गौशाला घोटाला’ को सामने लाया। श्वेता और श्यामा गायों की वार्तालाप के मध्य उपन्यास के इस अध्याय के अंत में राजस्थान के पथमेड़ा नामक जगह पर बनी गो शाला आनंदवन राजस्थान की ओर ले जाते हैं। जहां भगवान कृष्ण अपने गायों को चराने के लिए रुक गए थे और पथमेड़ा में पर्याप्त चारागह देखकर कृष्ण भगवान ने यहीं विश्राम करने का मन बनाया था। आज यह दुनिया की सबसे बड़ी गोशाला है, जहां २ लाख गाय रहती है। इस गोशाला का निर्माण दत्तशरणनन्द महाराज ने सन1993 में कुछ गो भक्तों द्वारा पाकिस्तान ले जाए जा रही आठ गायों को कसाईयों के खूनी पंजों से मुक्त करवाकर शुरू किया था और आज इस कलयुग में आनंदवन मानो द्वापर की याद दिला रहा हो। यहाँ सारी गाय मुक्त हो कर विहार करती है। खाने-पीने की कोई कमी नहीं। नियमित रूप से बीमार गायों की देखभाल होती है। पंचगण्य (गोबर, गो मूत्र, दूध, दही और घी) से तरह-तरह की दवाइयाँ बन रही है। सत-साहित्य का प्रकाशन प्रकाशन हो रहा है। बच्चों को भारतीय संस्कारों की शिक्षा-दीक्षा मिल रही है।

 

मनुष्यों में बढ़ती मांसाहार प्रवृति

अध्याय पाँच में उपन्यासकार ने बकरा, कुत्ता, तीतर, बटेर, गौरैया, तोता,बिल्ली नए-नए पात्रों को जोड़ कर उनकी समस्याओं के बारे में ध्यान आकृष्ट करते हुए समस्त मानव समाज के समग्र जीव-दया की अपील की है, क्योंकि मनुष्य इन सभी जानवरों को भी खाने से नहीं छोड़ा है। किसी शायर ने कहा है –

“हम निर्बल है मूक जीव बस ऐसे ही रह जाते हैं

सुबह सलामत देखते हैं पर शाम हुई कट जाते हैं

कितने हैं इंसान लालची, गिरे हुए यह मत पूछो

मांस मिले गर खाने को तो मजहब से हट जाते हैं।"

सभी जीव-जंतुओं ने मनुष्यों के मन में विलुप्त हो रही करुणा और पत्थर दिल इन्सानों के भीतर इस भागमभाग और निपट बाजारू युग में सबकी विवेकहीनता को परिभाषित करते हुए मनुष्यों के भीतर जीव-दया,करुणा का उपहास उड़ाने वाली मांसाहारी आदमियों की अपराधबोध हीनता पर दुख प्रकट किया है।

 

शास्त्रों में गो-रक्षा और गो-दान ;-

छठे अध्याय में महर्षि वशिष्ठ के इक्ष्वाकु वंश के सौदास राजा से गायों का दान मांगना ‘यतो गावस्ततो वयम’, भगवान राम द्वारा त्रिजट ब्राह्मण सहस्र करोड़ गायों का दान करना, बाल्मीकि रामायण में महाराज दशरथ द्वारा यज्ञ के अवसर पर दस लाख गायों का दान देने  (गवां शतसहस्रानि दश तथ्यों ददौ नृप:), तुलसीदासकृत रामचरित मानस में ‘विप्र धेनु, सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार’ या ‘सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई, जौ हरिकृपा हृदय बस आई’ जैसी उक्तियों द्वारा गोभक्ति कि अवधारणा तथा सोने के सींग मढ़ी एक हजार गायों को राजा जनक द्वारा याज्ञवल्क्य ऋषि को दान दिए जाने वाले दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए गायों की महिमा पर विशेष प्रकाश डाला है। रघुवंश के महाराज दिलीप की गोसेवा का महाकवि कालीदास के महाकाव्य ‘रघुवंश’ में सुंदर वर्णन है। विनोबा भावे द्वारा गोवध को रोकने के आमरण अनशन पर बैठने, गो प्रेमी कृष्ण भगवान की दिनचर्या गाय, गोपियाँ और ग्वाल बालों के साथ, यहाँ तक गाय चराने जाते समय भी यशोदा माया द्वारा गायों को पशु कहने पर रूठ जाना, सूरदास द्वारा पदों की रचना, गायों के झुंड में ‘वत्सासुर’ बनकर कृष्ण को मारने का षड्यंत्र, कृष्ण द्वारा धारोष्ण दुग्धपान करना आदि यथार्थ व मिथकीय ज्ञान से भरा हुआ यह उपन्यास पाठक को त्रेता व द्वापर युग की याद दिलाता है। भगवान शंकर, अश्विनी कुमार, माँ पार्वती आदि के गो रक्षा से संबंधित दृष्टांत दिए गए हैं, जिसमें अत्यंत ही सुंदर नामों वाली उन्नत गायों जैसे मनोरमा,गौरा,नंदा,गोपिका,कृष्णा,नंदिनी,गौरमुखी,नीला-वनिता,सुपुत्रिका,स्वरूपा,शंखिनी,सुदती, सुशालिका,अमिनता,मित्रवर्णा के नामों का उल्लेख है। ये सब दृष्टांत उपन्यासकार की न केवल गायों के प्रति अगाध-आस्था,प्रेम व भक्ति के प्रतीक है, वरन आधुनिक समाज में गो-वध को लेकर बढ़ती दुष्प्रवृत्तियों से निजात पाने के लिए एक अनुकरणीय ग्रंथ की रचना करना ही उनका विशेष उद्देश्य है।

 

इस्लाम धर्म में गो-वध निषेध

सातवें अध्याय में ‘इस्लाम’ धर्म में गो-वध निषेध के प्रति क्रांतिकारी विचारों से लेखक ने  अवगत कराया है,अगर सही कहूँ तो ऐसे विचार मैंने अपने जीवन में पहली बार पढ़े, कि इस्लाम धर्म भी गायों को सम्मान की दृष्टि से देखता है। ‘इस्लाम’ अरबी के सलाम धातु से निकला है, जिसका अर्थ होता है किसी को भी दुख नहीं देना।‘ मोहम्मद साहब ने जीवन भर दुख देखा, मगर दया का काम करते रहे। कुरान-पाक में लिखा है- ‘दया धर्म का मूल है’। कुर्बानी के बारे में उपन्यासकार का कहना है कि कुर्बानी ‘सिंबालिक’ दी जा सकती है। अल्लाह के हुक्म के अनुसार, जिस जानवर के पेट में दूध हो, उसकी कुर्बानी तो कभी भी नहीं दी जा सकती। खुदा ज़िबह किए जानवरों का मांस नहीं चाहता, वह केवल तुम्हारी श्रद्धा चाहता है। चींटी को भी नहीं सताना चाहिए, उसमें भी जान है। ‘इजहारेहम’ में इन सारी चीजों का उल्लेख मिलता है। तभी तो मुगलकाल के अधिकतर बादशाह अदभूत गो प्रेमी थे। सब के सब गो-मांस के विरोधी थे। उन्होंने गो हत्या पर रोक लगा दी थी। अबुल फजल द्वारा रचित आईने अकबरी में एक जगह लिखा है कि सुंदर धरती भारत में गाय मांगलिक समझी जाती है। उसकी भक्ति-भाव से पूजा होती है। इस जीव से राज्य का बड़ा काम चलता है, इसलिए गो मांस निषिद्ध है और इसे छूना भी पाप है। अकबर के जमाने में गौ शालाओं के संचालन का कानून बना था। अकबर ने गो स्वामी विटठलनाथ को कुछ गायें और ज़मीनें दान दी थी, ताकि गोस्वामी गोपालन कर सकें। 5 जून सान 1593 इसवीं में अकबर ने फरमान जारी किया था, जानें कि जहां की तामिल करने काबिल हुक्म जारी किया गया कि इसके बाद करोड़ी व जागीरदारान परगने मथुरा, सहरा संगोध व ओड़े के इर्द-गिर्द मोर ज़िबह न करें और शिकार न करें और आदमियों कि गायों को चरने से न रोकें। फिर भी अकबर के जमाने में चोरी-छिपे हो रही गोहत्याओं पर दृष्टिपात करने के लिए अकबर के नौ रत्नों के प्रकांड विद्वान कवि नरहरी ने दरबार में अपने साथ एक गाय ले जाते हुए उसके गले में छप्पय बांधा था। जिसे पढ़कर सुनाने पर अकबर की आँखें खुल गई। यह छप्पय इस प्रकार था : -

 

अरिहु दंत तृन धरई ताहि भारत न सबल कोई ।

हम संतत तृन चरहि वचन उच्चरही दीन होई ।

हिंदुहि मधुर न देहि कटुक तुरकहीं न पियावहीन ।

पाय विशुद्ध अति श्रवहीन बच्च महि ठमन जवाहीन ।

सुन शाह अकबर ! अरज यह करत गऊ जोरे करन ।

सौ कौन चुके मोहिं मारियतु मुहेयु चाम सेवत चरन ।।

जैसे हि अकबर ने यह छ्प्पय सुना, तो गायों कों अभयदान देने का फरमान जारी किया।

कुरान पाक के दूसरे अध्याय का नाम “सुर-ए-बकर” जिसका हिन्दी में अर्थ है गायों का अध्याय अर्थात कुरान में भी प्रकाश डाला गया है। मुक़द्दस कुरान में कहा गया है कि बैल कि सींग पर पृथ्वी विराजमान है। जब बैल पृथ्वी को एक सींग से दूसरे सींग पर लेता है तो पृथ्वी हिलती है और भूकंप आता है। गाय के पानी को भी पाक माना गया है, कितनी बड़ी बात है यह। खुदाबन्द कहते है – जो बैल को मारता है वह उस आदमी कि मानिंद है जो मनुष्य को मारता है । मैं तो घर का बैल न लूँगा और न तेरे बाड़े का बकरा, क्योंकि जंगल के सारे जानवर मेरे हैं। क्या मैं बैल का गोश्त खाता हूँ या बकरी का लहू पिता हूँ ? अल्लाह के पास गोश्त और खून हरगिज नहीं पहुँचते। हाँ, तुम्हारी परहेजगारी जरूर पहुँचती है। फिर भी बकरीद के दीन कलकत्ता और दूसरे शहरों में हजारों गायों काट दी जाती है। हदीसशरीफ़ में तीन चीजों पर सख्त पाबंदी  है। ‘काते-उल-शजर’ यानि हरे पेड़ को काटना, ‘बाय-उल-बशर’ मनुष्य को बेचना, ‘जाबह-उल-बकर’ का अर्थ  है गाय की हत्या। इस प्रकार के अनेकानक उदाहरण देकर न केवल उपन्यासकार ने गो-वध के प्रति मन में नफरत पैदा करने तथा मुस्लिम धर्म के उन पहलूओं को उजागर करना जो गो-वध पर प्रतिबंध लगाते हैं। साथ ही साथ,हिन्दू और मुस्लिम लोगों के मध्य भाईचारा, प्रेम तथा सौहार्द्र पैदा करना है।

 

मिथकों में गाय :-

आठवें अध्याय में फिर से उपन्यासकार द्वापर युग की तरफ ले जाते हैं और बीच में देशी गाय तथा जर्सी गायों के विभेद को दर्शाते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि जर्सी गायों की तुलना में देशी गाय ज्यादा श्रेष्ठ हैं। यही नहीं पुराण, महाभारत का अश्वमेध प्रकरण, भविष्य पुराण, स्कन्द पुराण जैसे धार्मिक ग्रन्थों का संदर्भ लेते हुए अनेकानेक रोचक कहानियों के माध्यम से “कपिला तीर्थ” आदि की उत्पत्ति का जिक्र किया है। इसी तरह राजा विश्वामित्र, मुनि वशिष्ठ के मध्य कामधेनु को लेकर हुए संघर्ष की कहानी भी अपने आप में गो भक्ति का विशेष संदेश देती है। इस तरह राजा कार्तवीयार्जुन द्वारा ‘सुरभि’ गाय को लेकर जमदग्नि ऋषि (परशुराम के पिता) से जबर्दस्त हुए बहस और अहंकारी राजा द्वारा जबरदस्ती गाय को ले जाने के कारण परशुराम द्वारा उस सहस्र बाहु वरदानी राजा के एक-एक हाथ को फरसा से काट काटकर गिराने वाले की कहानी अपने आप में उन जमाने के सामाजिक संस्कारों में गो भक्ति के लक्षण परिलक्षित करती है। इसी तरह च्यवन ऋषि तथा राजा नहुष के मध्य हुए संवादों में गाय का महत्त्व उभरकर सामने आया है। भले ही इन कहानियों में मिथक चरित्र रहे हो,मगर उनका एक मूल-संदेश गायों की सुरक्षा के उपाय तत्कालीन समाज की समृद्धि का परिचय देती हैं।

 

गायों की नस्लें, पशु निर्दयता अधिनियम के प्रावधान एवं बीस थ्योरी:-

अध्याय नौ में गो-शाला में रहने वाली गायों की समस्याओं को उपन्यासकार ने सामने लाया है तथा जर्सी गायों के बारे में गो विशेषज्ञ घावरी के वक्तव्य की जर्सी नामक द्वीप में सुअर के जींस से जर्सी गायों की नस्ल को विकसित करने का वैज्ञानिक तथ्य सामने लाया है तथा जर्सी गायों के प्रति बढ़ते आकर्षण को खत्म करने के लिए भारत की उत्तम नस्लों के बारे में भी उल्लेख किया है। जिसमें हरियाणा नस्ल की गाय, काठियावाडी की गीर, मैसूर की अमरूमहाल, हल्लीकार, फंगायम, बरगुर, आलमदादी और गुजूरात की कोकरेज, मध्यभारत की ‘’मालवी’, ‘निगाड़ी’, ‘नागौरी’, पंजाब की ‘साहिवाल’, ‘हांसी’, महाराष्ट्र की ‘कृष्णावेली’, राजस्थान की ‘राठ’, ‘खिलारी’, ‘देवनी’ ‘डांगी’, ‘मेवाती’ नागौरी आदि की भी व्याख्या की है। दूध दोहने के कई तरीकों तथा इंजेक्शन द्वारा ज्यादा दूध निकालने के दुष्परिणाम के साथ-साथ पशु निर्दयता अधिनियम के प्रावधानों तथा पशुओं की क्रूर हत्याओं से भूकंपीय तरंगों के पैदा होने की “बीस थ्योरी’, कचड़ों के ढेरों पर भूखी गायों का लोहे की किले, हेयरपिन, तार की टुकड़े, बटन और पॉलीथीन की थैलियों आदि खाने जैसी समस्याओं को भी सामने लाने का उपन्यासकार ने प्रयास किया।

 

राष्ट्रवादी गो-भक्त संघ, मुस्लिम गो-रक्षा संघ एवं सर्वधर्म गोरक्षा संघ

अध्याय दस में राष्ट्रवादी गो-भक्त संघ की स्थापना, गो सेवा आयोग की प्लानिंग तथा उनके फर्जी तौर तरीकों पर भी प्रकाश डाला गया। अध्याय ग्यारह में ‘सर्व धर्म गो रक्षा संघ’ द्वारा गो-वध को प्रतिबंधित करने के प्रयासों में राष्ट्रीयता व अस्मिता का सवाल बनाते हुए सभी धर्मों में इस पर किया गया समर्थन पर प्रकाश डाला गया है, इस संघ में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्म गाय की सुरक्षा के प्रश्न पर 'करो या मरो' अभियान पर सहमत होकर ‘राजधानी चलो’ मुहिम में शामिल होने के सूत्रपात को प्रकाशित किया है। सभी सदस्य गाय के चित्र बने हुए टी-शर्ट पहने हुए थे,जिन पर  'काऊ इज द ग्लोबल मदर', 'सेव द काऊ', 'काऊ इज अवर नेशनल एनिमल' और 'आई लव काऊ' जैसे तरह-तरह के नारे लिखे हुए थे। मीडिया के ओपिनियन मेकर ‘थिंक टैक’ विज्ञापन बैंक आदि भी सोशल मुददों की माध्यम से कसाई खाने में देवनार और अल-कबीर जैसे कसाई खाने में हो रही निर्ममतापूर्वक गो हत्याओं की जानकारी देने के साथ-साथ सरकार पर गो वध कानून मीडिया की प्राथमिकता होनी चाहिए मगर वास्तव में ऐसा नहीं हैं। उपन्यासकार के आधुनिक मीडिया पर करारा कटाक्ष करते हुए लिखा है कि मीडिया टी॰आर॰पी (टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट) हीरो हीरोइनों के प्रेम-प्रसंग माफिया डॉन, नाग-नागिन के  पुनर्जन्म की कहानी जैसे अंधविश्वास फैलाने जैसे कामों में लगा रहता है, न कि गो वध रोकने के लिए कानून बनाने के लिए दबाव डालने वाले काम।

अध्याय बारह में सर्वधर्म संघ के साथ-साथ मुस्लिम गो-रक्षा संघ के सदस्यों द्वारा गो रक्षा के लिए उठाए हुए कदमों का उल्लेख है। मुजफर भाई जैसे प्रमुख सदस्य ने बाबर हुमायूँ के वसीयतनामा, फिरोज साह तुगलक, काश्मीर के बादशाह जेनूल-आबदिल, सुल्तान नसुरुदीन खुसरो, फारुख शेख, बादशाह आलम, बादशाह आदिल शाह जैसे सैकड़ों नामों पर प्रकाश डाला, जिन्होंने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि गो हत्या न हो पाए। उन्होनें अपनी खुद की गो-शालाए भी बनवाई थी। यहाँ तक कि गायों को ध्यान में रखते हुए कुछ क़व्वालियाँ, गजल और शेर भी लिखे थे। एक उदाहरण के तौर पर –

 

गऊ माता को जो काटेगा, समझो वह इंसान नहीं

कौन भला यह कहता है कि वो हिंसक शैतान नहीं

कहता हूँ मैं बड़ी बात यह सुन ले अपना पूरा देश

बिना गाय के देश हमारा सचमुच हिन्दुस्तानी नहीं

चलो बताओ गऊ माता को सबको बड़ी जरूरत है

बिन इनके अपने भारत की दुनिया में पहचान नहीं

गाय बचेगी, देश बचेगा, हम भी सेहतमंद रहे

बिना गैया के मेरे भैया बिलकुल ही उत्थान नहीं ।

अध्याय तेरह आधुनिक सूचना क्रान्ति के उपयोग से गो रक्षा के लिए अनेक शहरों में इन्टरनेट और मोबाइल पर ‘एसएमएस’ के जरिए सैकड़ो लोगों का जुनून पैदा करने का वैसा ही कार्य हुआ जैसा पहले कभी जेपी ने गांधी, विनोबा और लोहिया के विचारों को मथकर ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का हुजूम पैदा किया था। मुस्लिम फकीर गौप्यारा शाह की शिक्षा कुरान शरीफ ‘हल जनाउल इहसानि इल्लल इहसानु’ मतलब यह कि अहसान का बदला अहसान के सिवाय और क्या हो सकता है? इसलिए सच्चा मुसलमान गाय के अहसान को भूल नहीं सकता। दाऊद अलक के ग्रंथ ‘जुहूर’ में भी अल्लाताला हुक्म देते है कि ‘ जो इंसान गाय की हत्या करता है, वह आदमी की हत्या करता है। गांधीजी के अनुसार जब कहीं कोई गाय काटी जाती है तो मुझे लगता है कि मुझे काटा जा रहा है।

 

ईसाई धर्म में गोवध निषेध

फादर स्टीफन का उद्बोधन कि प्रभु ईसा मसीह का जन्म एक गऊ-शाला में हुआ था, अतः वह गाय-प्रेमी थे ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में लिखा हुआ है कि “तू किसी की जान मत ले। जंगल में किसी भी जीव का वध मत कर। तू मांस का भक्षण मत कर। अमेरिका के मालकम आर बैर स्पेन के अबूसार –गाय तो बिना ताज की महारानी है। पूरी पृथ्वी पर उसका शासन चलता है। वह जितना लेती है उससे कई गुना हमें लौटाती है।

 

सिख धर्म में गो-वध निषेध

सिख धर्म में दसवें गुरु गोविंद सिंघ जी मे खालसा पंथ की स्थापना करते हुए कहा था कि यह पंथ आर्य धर्म, गौ-ब्राह्मण, साधु-संत और दीन दुखी जन की रक्षा के लिए बना है। उन्होंने अपने ‘दशम ग्रंथ’ में एक जगह लिखा है,

'यही देहु आज्ञा तुर्क को सपाऊँ, गो घात का दुख जगत से हटाऊँ।

यही आस पूरन करो तौं हमारी मिटे कष्ट गौऊन छुटे खेद भारी।'

सन 1871 में पंजाब में मलेर कोटला में नामधारी सिखों ने गो रक्षा के लिए अपनी कुर्बानियाँ दी थीं। मुगलों के समय तो गायें सुरक्षित थीं लेकिन अंग्रेजों का शासन आने के साथ ही गायें कटने लगी थी। तब नामधारी सिखों ने कसाईघरों पर हमले किए और जिन लोगों ने गायों की हत्या की, ऊन लोगों को मौत के घाट उतार दिया। गुरु तेज बहादुर जी गुरु अर्जुन देव जी सहित अधिकतर सिख गुरुओं ने गौ रक्षा के लिए बलिदान दिया था। महाराजा रणजीत सिंह ने सत्ता संभालते ही गो हत्या पर रोक लगाई थी। भगवान कृष्ण की तरह गुरु नानक देव भी बाल्यकाल में गाय चराने जंगल जाते थे।

 

गाय का दूध शाकाहार या मांसाहार ? :-

सतनाम पंथ के जनक गुरु घासीदास के भक्त महंत जनक राम जी के अनुसार जब 18 दिसंबर 1756 में गुरु घासी दास के जन्म के समय उनकी माता के छाती में दूध नहीं उतर रहा था तो किसी महात्मा ने फौरन एक गाय और बछिया भेंट की थी, जिसके दूध से उनका लालन-पालन हुआ। आगे जाकर उन्होंने समता, समानता और विश्वबंधुत्व का संदेश दिया। उनके अनुसार जिसका गाय का बछड़ा मर गया हो उसका दूध नहीं पीना चाहिए क्योंकि उस समय गाय दुखी है। उस समय गाय का दूध निकालना निरी पशुता है। उन्होंने मांसाहार न करने के लिए भी प्रेरित किया। यहाँ तक कि लाल भाजी खाने से भी मना किया, क्योंकि उसका रंग लाल है खून-सा दिखता है और लाल रंग देखने से उग्रता आती है। सतनाम पंथ की यह विवेचना पढ़ते ही मेरे मन में फिर से एक बार ‘शाकाहार’ और ‘मांसाहार’ की परिभाषाओं की तरफ ध्यान जाने लगा। क्या गाय का दूध शाकाहार है ? अगर शाकाहारी है तो वनस्पतियों से पैदा होता, मगर यह तो गाय की दुग्ध-ग्रंथियों के रस का उत्सर्जन है जो उसके शरीर के मांस की विभिन्न ग्रंथियों से होते हुए पार होती है। अतः सामान्य परिभाषा के अनुसार गाय का दूध तो मांसाहारी होना चाहिए। इस तथ्य को आधार लेते हुए बिहार स्कूल ऑफ योग, मुंगेर वाले दूध से बनी चाय भी नहीं पीते हैं। इसी तरह सतनाम पंथ अथवा जैन धर्म में ‘प्याज’, ‘लहसुन’, ‘गाजर’, तथा ‘लालभाजी’ को मांसाहार की श्रेणी में गिनकर उनके सेवन पर प्रतिबंध है, जबकि ये चारों तो वनस्पति से पैदा होते हैं। कभी ऐसी ही विवादास्पद विवेचना मैं अपने मित्र श्रीकांत प्रधान के साथ कर रहा था तो उन्होंने ‘एजलेस बॉडी टाइमलेस माइंड’ पुस्तक के विश्व प्रसिद्ध लेखक दीपक चौपड़ा का उदाहरण देते हुए कहा था कि जिन चीजों में एमीनो एसिड की मात्रा ज्यादा हो तो वे सारा सामग्रियाँ ‘मांसाहार’ की श्रेणी में आती है और जिन सामग्रियों में एमीनो एसिड की मात्रा नहीं हो या न्यून हो तो उन्हें ‘शाकाहार’ की श्रेणी में गिना जाता है। चूंकि एमीनो एसिड की उपस्थिति लाल रंग को दर्शाती है। इस शोध के आधार पर दूध ‘शाकाहार’ की श्रेणी में आता है जबकि ‘प्याज’, ‘लहसुन’, ‘गाजर’, तथा लालभाजी ‘मांसाहार’ के वर्ग में गिने जाते है अर्थात दूध में एमीनो एसिड नहीं होता है,जबकि प्याज’, ‘लहसुन’, ‘गाजर’, तथा लालभाजी आदि में एमीनो एसिड होता है।  जैन धर्म तो ‘अहिंसा परमो धर्म:’ की अवधारणा पर भी खड़ा है, मगर कुछ विधर्मी जैन लोग पैसों की चाह में गो हत्या जैसे जघन्य अपराधों में शामिल हो जाते है। इस तरह इस अध्याय में ‘सर्वधर्म गो रक्षा संघ’ के उद्देश्य सार्थक होते नजर आते हैं।

 

गौ-शालाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार :-

अंतिम तीन अध्यायों में फिर से कई कथानकों, अंतर्वस्तुओं और विषयों का विस्तार हुआ है । इंजेक्शन लगाकर गायों से दूध निकालने पर मनुष्य की सेहत पर होने वाले कुप्रभाव गौशालाओं में प्राप्त भ्रष्टाचार को जहां उपन्यासकार ने जिस पारदर्शिता से पाठकों के समक्ष रखा है, उसी साफ़गोई से ‘कामधेनु मिष्ठान भंडार’, ‘कामधेनु पंचगव्य चिकित्सा केंद्र’ आदि के माध्यम से दूध से बनने वाली मिठाइयों तथा दवाइयों को भी पाठकों के सामने रखा है। सोलहवें अध्याय में गो सेवकों पर की गई गोलीकांड का वर्णन इतना सजीव है, मानो आँखों के सामने जालियांवाला बाग की घटना घटित हो रही हो। सरकार कत्लखानों पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहती है, मगर गो रक्षा के लिए उत्तेजित जनता राजधानी में व्यापक रूप से रैली का आयोजन करती है। इधर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र गाय, उधर डगमगाती अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कत्लखानों को रियासत देने पर तूली सरकार। अंतिम अध्याय में ‘रहीम गौ शाला’ में आराम से रह रही श्वेता-श्यामा गायें बेहद बूढ़ी हो जाती है। तब तक पूरे विश्व में ‘विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा’ का माहौल बन जाता। तभी उपन्यास के क्लाइमैक्स में अचानक परिवर्तन आ जाता है, कि ‘रहीम गौशाला’ की लोकप्रियता को देखकर कोई आदमी श्यामा गाय को जहर खिलाकर मार देता है, ताकि गौ-मांस का निर्यात कर सरकार विदेशी मुद्रा कमाती रहे और उसकी यह करतूत न केवल रहीम गौ शाला ले दुश्मन बढ़ाने बल्कि खालबाडा के कसाईयों को भी चाँदनी ले आती है । श्यामा गाय को मरा  देखकर श्वेता भी दम तोड़ देती है कि पशुओं में भी संवेदनाएँ होती है । एक का दुख दूसरा देख नहीं पाता।

उपन्यास का उपसंहार

अंत में जनकवि सतीश उपाध्याय की गीत रचना की प्रस्तुति के द्वारा लेखक ने गाय के असहायपन को सामने लाया है :-

‘मैं गाय हूँ मिटता हुआ अध्याय हूँ।

लोग कहते हैं माँ मगर, मैं तो बड़ी असहाय हूँ

चाहिए सबको कमाई, बन गई दुनिया कसाई,

खून मेरा मत बहाओ, माँ को अपनी मत लजाओ

बिन कन्हैया के धरा पर, भोगती अन्याय हूँ,

मैं गाय हूँ, मैं गाय हूँ।

मगर उन्होंने एक आशा भी जगाई है कि एक न एक दिन लोग हर तरह की जीव-हिंसा के सवाल पर सोचेंगे जरूर, सारा पशु-धन बचेगा, अहिंसा जीतेगी और यह खूबसूरत दुनिया अहिंसा के सहारे ही सुखमय और आधुनिक जीवन जी सकेगी।

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डॉ. दीपक आचार्य

पिण्ड और ब्रह्माण्ड का सीधा रिश्ता है जो दिखता भले न हो लेकिन इसके मुकाबले संबंधों की प्रगाढ़ता कहीं और देखी नहीं जा सकती। जिन पंच तत्वों से प्राणियों का निर्माण हुआ है वे प्रकृति से ही प्राप्त हैं और उन्हीं का पुनर्भरण करते हुए जीव अपनी निर्धारित आयु पूर्ण करता हुआ स्वाभाविक जीवन जीता है।

सृष्टि में रहने वाले हर जड़ और चेतन तत्व का संबंध प्रकृति से सीधा जुड़ा हुआ है। अंश और अंशी का संबंध ही है ये। इन सभी में जो चैतन्य तत्व है वह परमात्मा का ही अंश है। प्रकृति को मातृभाव से देखने और आदर-सम्मान देने पर वह हमारा भरण-पोषण, संरक्षण, पल्लवन, पुष्पन और फलन आदि सब कुछ बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक करती है और खुद धन्य होती है।

लेकिन यह सब तभी तक था जब तक कि प्रकृति और हमारा संबंध आत्मीयता भरा और श्रद्धायुक्त था। जब से हमने प्रकृति का शोषण करना आरंभ कर दिया है, भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण प्रारंभ कर दिया है, धर्म की अपने-अपने हिसाब से परिभाषाएं गढ़ ली हैं, हिंसा, अन्याय, अत्याचार का ताण्डव मचाने लगे हैं, हरामखोरी की आदत बना डाली है, मानवीय मूल्यों का गला घोंट कर रख दिया है और मानवता को फांसी दे दी है, तभी से प्रकृति भी रुष्ट है और भगवान भी।

प्रकृति पहले संतुलित थी, हर कोई प्रसन्नता और आनंद के साथ जीवननिर्वाह करता था, आत्म संतोष का माहौल था और मानवीय मूल्यों का अखूट खजाना इतना भरा हुआ था कि सब तरफ इसका प्रभाव साफ-साफ नज़र आता था।

आज सब कुछ उलटा-पुलटा होता जा रहा है। मर्यादाओं की सारी सीमाएं हम लाँघ चुके हैं, प्रकृति के मनमाने शोषण को हम अपनी जीवनचर्या का अहम् हिस्सा बना चुके हैं, वह सब कुछ करने को अपना अधिकार मान चुके हैं जो एक अच्छे इंसान को कभी नहीं करना चाहिए।

नैतिक मूल्यहीनता के भयानक दौर में गुजरते हुए हम हर व्यक्ति और वस्तु का मूल्य आंक कर ही व्यवहार करने लगे हैं। अपने मूल्य को बढ़ाने के लिए हम दूसरों के मूल्य को कम आंकने और उन्हें मूल्यहीनता की स्थिति में लाने के लिए जो कुछ कर रहे हैं वह अपने आप में सारी की सारी लक्ष्मण रेखाओं की सायास हत्या कर दिए जाने से कम नहीं है।

एक तरफ हम प्रकृति का शोषण कर रहे हैं और दूसरी तरफ मूल्यविहीन जीवन जीते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मामले में भी भेदभाव अपना रहे हैं। पुरुषार्थ चतुष्टय में से हमने धर्म और मोक्ष को भुला दिया है जबकि हमारी पूरी जिन्दगी अर्थ और काम पर ही केन्दि्रत होकर रह गई है और उसी के पीछे हम पड़े हुए हैं। हमने यह समझ लिया है कि प्रकृति हमारे अपने ही लिए है और जो कुछ सामने दिख रहा है उसे हथियाते रहो, बाद वालों की चिन्ता हमने कभी नहीं की।

इसी प्रकार भगवान और धर्म को भी हमने अपने-अपने ढंग से भुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। हमें पता है कि धर्म और भगवान के नाम पर श्रद्धा, विश्वास और आस्थाओं का सदियों से बना-बनाया ऎसा मंच हमें मिल गया है कि जिसमें हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

औरों को भरमाने की थोड़ी सी कला सीख लेने पर धर्म के नाम पर श्रद्धा को किसी भी तरह से और किसी भी हद तक भुनाया जा सकता है। कभी गुरुओं के नाम पर, कभी भगवान के नाम पर भरमाने का चलन देश के हर हिस्से में परवान पर रहा है। और लोग बड़ी ही विनम्रता और प्रसन्नता के साथ गुमराह होते हुए भी कृतज्ञता ज्ञापित करते रहकर हमारे लिए हमेशा लाभदायी बने रहेंगे। जो जितना अधिक इस कला में माहिर है वही जमाने भर के बादशाहों में अपनी गिनती करवा लेता है।

जरूरी नहीं कि इस बादशाहत का स्वाद गृहस्थी और धंधेबाज लोग ही उठा सकते हों। ‘‘असारे खलु संसारे’’ का राग अलाप कर संसार छोड़ बैठे बड़े-बड़े वैरागी बाबाओं, महंतों और योगियों से लेकर आम आदमी तक भी इस पद और प्रतिष्ठा को पा सकता है जिसके पीछे वैभव और पैसों का समन्दर लहराने लगता है।

हम सारे के सारे लोग अपने आपको धर्म परायण, ईश्वर भक्त, सेवाभावी, समाजसेवी और परोपकारी कहने और कहलवाने में खुश होते हैं लेकिन धर्म के मूल मर्म से अनभिज्ञ हैं। धर्म के नाम पर हम जो कुछ कर रहे हैं वह आडम्बर से अधिक कुछ नहीं है।

हर साल अच्छी बारिश की कामना से लोग बेजुबान जानवरों की बलि चढ़ाते हैं। हालांकि हाल के वर्षो में इस पर अंकुश लगा है लेकिन यह परंपरा आज भी बहुत से स्थानों पर बदस्तूर जारी है। कई जगह हवन-यज्ञ के नाम पर कालेधन और चन्दे से बड़े-बड़े यज्ञ-यागादि और अनुष्ठान होते हैं। ऎसे ही धर्म की आड़ में बहुत सारे कर्म होते हैं।

बावजूद इस सबके सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकंप और बहुत सारी प्राकृतिक आपदाओं का जोर हर तरफ बना रहता है। और तो और धर्म स्थलों और तीर्थों को अपने अपने स्वार्थ में इतना दूषित कर दिया है कि वे भी अब सुरक्षित नहीं रहे। दर्शन और प्रसाद के नाम पर पैसा बनाने का जो धंधा हमने चला रखा है वह यही सिद्ध करता है कि दुकानदारी के चलते भगवान कहीं पलायन कर चुके हैं और बचा रह गया है धंधा।

प्रकृति का कहर टूट पड़ने लगा है हर तरफ। जब इतने सारे कर्मकाण्ड होते रहे हैं फिर भी प्रकृति रुष्ट और कुपित क्यों है, इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं है। बरसात लाने के लिए कई जगह शिवलिंग को जलमग्न कर देने के टोटके का सहारा लिया जाता रहा है। भगवान को प्रसन्न करके मनचाही मुराद या वरदान पाना तो इतिहास सिद्ध है लेकिन भगवान को तंग करके बरसात लाने का काम हम इंसान ही कर सकते हैं। यह तंग करना अपने आप में भगवान की ब्लेकमेलिंग है। यह दुस्साहस न असुर कर सके, न पुराने जमाने के लोग।

इन दिनों सर्वत्र प्राकृतिक आपदाओं का माहौल है और इसका मूल कारण यही है कि हमने प्रकृति और भगवान को भी नहीं छोड़ा है, उनका भी इस्तेमाल करने लगे हैं। धर्म को हमने धंधा बना लिया है और भगवान के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं वह अपने आपमें आसुरी कर्मों से भी गया बीता है।

कभी हम अपने आप में सोचें कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह प्रकृति पूजा और धर्म है क्या? अपनी आत्मा अपने आप गवाही दे देगी। सर्वत्र फैल रहे अधर्म के कारण से प्रकृति और भगवान हमसे किस कदर नाराज है इसका अनुमान लगा पाने में आज हम नाकाबिल और नासमझ हैं मगर हम अपनी इसी नालायकी भरी औकात पर बने रहे तो यह मान लें कि यह भविष्यवाणी बेदम नहीं है कि जिसमें संकेत किया गया है कि दुनिया की आबादी आने वाले पाँच-छह वर्ष में आधी से भी कम रह जाएगी। आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कुछ बचा कर, सहेज कर जाएं। प्रकृति का आदर करें, धर्म, सत्य और न्याय का मार्ग अपनाएं और पृथ्वी को पाप के भार से बचाएं।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी भाषा-क्षेत्र की समावेशी अवधारणा रही है, हिन्दी साहित्य की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है, हिन्दी साहित्य के इतिहास की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है और हिन्दी साहित्य के अध्ययन और अध्यापन की भी समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है। हिन्दी की इस समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा को जानना बहुत जरूरी है तथा इसे आत्मसात करना भी बहुत जरूरी है तभी हिन्दी क्षेत्र की अवधारणा को जाना जा सकता है और जो ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र रच रही हैं तथा हिन्दी की ताकत को समाप्त करने के षड़यंत्र कर रही हैं उन ताकतों के षड़यंत्रों को बेनकाब किया जा सकता है तथा उनके कुचक्रों को ध्वस्त किया जा सकता है।

वर्तमान में हम हिन्दी भाषा के इतिहास के बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हुए हैं। आज बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। आज हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने के जो प्रयत्न हो रहे हैं सबसे पहले उन्हे जानना और पहचानना जरूरी है और इसके बाद उनका प्रतिकार करने की जरूरत है। यदि आज हम इससे चूक गए तो इसके भयंकर परिणाम होंगे। मुझे सन् 1993 के एक प्रसंग का स्मरण आ रहा है। मध्य प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री को मध्य प्रदेश में ‘मालवी भाषा शोध संस्थान’ खोलने तथा उसके लिए अनुदान का प्रस्ताव भेजा था। उस समय भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह थे जिनके प्रस्तावक से निकट के सम्बंध थे। मंत्रालय ने उक्त प्रस्ताव केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक होने के नाते लेखक के पास टिप्पण देने के लिए भेजा। लेखक ने सोच समझकर टिप्पण लिखा: “भारत सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मध्य प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा बुन्देली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्य है”। मुझे पता चला कि उक्त टिप्पण के बाद प्रस्ताव को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया।

एक ओर हिन्दीतर राज्यों के विश्वविद्यालयों और विदेशों के लगभग 176 विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में हजारों की संख्या में शिक्षार्थी हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन और शोध कार्य में समर्पण-भावना तथा पूरी निष्ठा से प्रवृत्त तथा संलग्न हैं वहीं दूसरी ओर हिन्दी भाषा-क्षेत्र में ही अनेक लोग हिन्दी के विरुद्ध साजिश रच रहे हैं। सामान्य व्यक्ति ही नहीं, हिन्दी के तथाकथित विद्वान भी हिन्दी का अर्थ खड़ी बोली मानने की भूल कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य को जिंदगी भर पढ़ाने वाले, हिन्दी की रोजी , खाने वाले रोटी हिन्दी की कक्षाओं में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों को विद्यापति, जायसी, तुलसीदास, सूरदास जैसे हिन्दी के महान साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ाने वाले अध्यापक तथा इन पर शोध एवं अनुसंधान करने एवं कराने वाले आलोचक भी न जाने किस लालच में या आँखों पर पट्टी बाँधकर यह घोषणा कर रहे हैं कि हिन्दी का अर्थ तो केवल खड़ी बोली है। भाषा विज्ञान के भाषा-भूगोल एवं बोली विज्ञान (Linguistic Geography and Dialectology) के सिद्धांतों से अनभिज्ञ ये लोग ऐसे वक्तव्य जारी कर रहे हैं जैसे वे इन विषयों के विशेषज्ञ हों। क्षेत्रीय भावनाओं को उभारकर एवं भड़काकर ये लोग हिन्दी की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा को नष्ट करने पर आमादा हैं।

जब लेखक जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषाविज्ञान विभाग का प्रोफेसर था, उसके पास विभिन्न विश्वविद्यालयों से हिन्दी की उपभाषाओं / बोलियों पर पी-एच. डी. एवं डी. लिट्. उपाधियों के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध जाँचने के लिए आते थे। लेखक ने ऐसे अनेक शोध प्रबंध देखें जिनमें एक ही पृष्ठ पर एक पैरा में विवेच्य बोली को उपबोली का दर्जा दिया दिया गया, दूसरे पैरा में उसको हिन्दी की बोली निरुपित किया गया तथा तीसरे पैरा में उसे भारत की प्रमुख भाषा के अभिधान से महिमामंडित कर दिया गया।

इससे यह स्पष्ट है कि शोध छात्रों अथवा शोध छात्राओं को तो जाने ही दीजिए उन शोध छात्रों अथवा शोध छात्राओं के निर्देशक महोदय भी भाषा-भूगोल एवं बोली विज्ञान (Linguistic Geography and Dialectology) के सिद्धांतों से अनभिज्ञ थे।

सन् 2009 में, लेखक ने नामवर सिंह का यह वक्तव्य पढ़ाः

“हिंदी समूचे देश की भाषा नहीं है वरन वह तो अब एक प्रदेश की भाषा भी नहीं है। उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों की भाषा भी हिंदी नहीं है। वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ यथा अवधी, भोजपुरी, मैथिल आदि हैं”। इसको पढ़कर मैने नामवर सिंह के इस वक्तव्य पर असहमति व्यक्त करने तथा हिन्दी के विद्वानों को वस्तुस्थिति से अवगत कराने के लिए लेख लिखा। हिन्दी के प्रेमियों से लेखक का यह अनुरोध है कि इस लेख का अध्ययन करने की अनुकंपा करें जिससे हिन्दी के कथित बड़े विद्वान एवं आलोचक डॉ. नामवर सिंह जैसे लोगों के हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ डालने के मंसूबे ध्वस्त हो सकें तथा ऐसी ताकतें बेनकाब हो सकें। जो व्यक्ति मेरे इस कथन को विस्तार से समझना चाहते हैं, वे मेरे ‘क्या उत्तर प्रदेश एवं बिहार हिन्दी भाषी राज्य नहीं हैं ?’ शीर्षक लेख का अध्ययन कर सकते हैं।

(देखें रचनाकार पर मेरे लेख का लिंक –

(नामवर के इस वक्तव्य पर असहमति के तीव्र स्वर दर्ज कर रहे हैं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन)

रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख : क्‍या उत्‍तर प्रदेश एवं बिहार हिन्‍दी भाषी राज्‍य नहीं हैं?

http://www.rachanakar.org/2009/09/blog-post_08.html#ixzz3WJTL8oNS

मेरे इस लेख को पढ़कर उस समय मुझे कांग्रेस, भाजपा, सपा, जनता दल (यूनाइटिड), राजद, तेलुगु देशम आदि राजनैतिक दलों के अनेक नेताओं तथा राष्ट्रीय विचारों के मनीषियों के फोन प्राप्त हुए तथा उन्होंने मेरे विचारों की पुष्टि की कि हिन्दी भाषा-क्षेत्र में जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं, उनकी समष्टि का नाम हिन्दी है।

प्रत्येक भाषा-क्षेत्र में भाषिक भेद होते हैं। हम किसी ऐसे भाषा क्षेत्र की कल्पना नहीं कर सकते जिसके समस्त भाषा-भाषी भाषा के एक ही रूप के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान करते हों। यदि हम वर्तमानकाल में किसी ऐसे भाषा-क्षेत्र का निर्माण कर भी लें जिसकी भाषा में एक ही बोली हो तब भी कालान्तर में उस क्षेत्र में विभिन्नताएँ विकसित हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि किसी भाषा का विकास सम्पूर्ण क्षेत्र में समरूप नहीं होता। परिवर्तन की गति क्षेत्र के अलग-अलग भागों में भिन्न होती है। विश्व के भाषा-इतिहास में ऐसा कोई भी उदाहरण प्राप्त नहीं है जिसमें कोई भाषा अपने सम्पूर्ण क्षेत्र में समान रूप से परिवर्तित हुई हो।

भाषा और बोली के युग्म पर विचार करना सामान्य धारणा है। पाश्चात्य भाषाविज्ञान के बासी सिद्धांतों के आधार पर अपने को बुद्धिमान मानने वाले व्यक्ति भाषा को विकसित और बोली को अविकसित मानते हैं। भाषा और बोली के भेद का इतना प्रचार-प्रसार हुआ है कि आम धारणा बन गई है जिसके कारण सामान्य व्यक्ति भाषा को शिक्षित,शिष्ट, विद्वान एवं सुजान प्रयोक्ताओं से जोड़ता है और बोली को अशिक्षित, अशिष्ट, मूर्ख एवं गँवार प्रयोक्ताओं से जोड़ता है। आधुनिक भाषाविज्ञान इस धारणा को अतार्किक और अवैज्ञानिक मानता है। आधुनिक भाषाविज्ञान भाषा को निम्न रूप से परिभाषित करता है - "भाषा अपने भाषा-क्षेत्र में बोली जाने वाली समस्त बोलियों की समष्टि का नाम है"।

(विशेष अध्ययन के लिए देखें –

(क) प्रोफेसर महावीर सरन जैन : हिन्दी भाषा का बदलता स्वरूप, क्षितिज, (भाषा-संस्कृति विशेषांक), अंक -8, पृष्ठ 15-19, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बम्बई (मुम्बई) (1996)

(ख) प्रोफेसर महावीर सरन जैन : अलग नहीं हैं भाषा और बोली, अक्षर पर्व, अंक -6, (पूर्णांक – 23), वर्ष -2, पृष्ठ 15-16, देशबंधु प्रकाशन, रायपुर (दिसम्बर, 1999) )

तत्त्वतः बोलियों की समष्टि का नाम भाषा है। ‘भाषा क्षेत्र’ की क्षेत्रगत भिन्नताओं एवं वर्गगत भिन्नताओं पर आधारित भाषा के भिन्न रूप उसकी बोलियाँ हैं। बोलियाँ से ही भाषा का अस्तित्व है। इस प्रसंग में, यह सवाल उठाया जा सकता है कि सामान्य व्यक्ति अपने भाषा-क्षेत्र में प्रयुक्त बोलियों से इतर जिस भाषिक रूप को सामान्यतः ‘भाषा’ समझता है वह फिर क्या है। वह असल में उस भाषा क्षेत्र की किसी क्षेत्रीय बोली के आधार पर विकसित ‘उस भाषा का मानक भाषा रूप’ होता है।

इस दृष्टि के कारण ऐसे व्यक्ति ‘मानक भाषा’ या ‘परिनिष्ठित भाषा’ को मात्र ‘भाषा’ नाम से पुकारते हैं तथा अपने इस दृष्टिकोण के कारण ‘बोली’ को भाषा का भ्रष्ट रूप, अपभ्रंश रूप तथा ‘गँवारू भाषा’ जैसे नामों से पुकारते हैं। वस्तुतः बोलियाँ अनौपचारिक एवं सहज अवस्था में अलग-अलग क्षेत्रों में उच्चारित होने वाले रूप हैं जिन्हें संस्कृत में ‘देश भाषा’ तथा अपभ्रंश में ‘देसी भाषा’ कहा गया है। भाषा का ‘मानक’ रूप समस्त बोलियों के मध्य सम्पर्क सूत्र का काम करता है। भाषा की क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्नताएँ उसे बोलियों के स्तरों में विभाजित कर देती हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बोलियों के स्तर पर विभाजित भाषा के रूप निश्चित क्षेत्र अथवा वर्ग में व्यवहृत होते हैं जबकि प्रकार्यात्मक धरातल पर विकसित भाषा के मानक रूप, उपमानक रूप, विशिष्ट रूप (अपभाषा, गुप्त भाषा आदि) पूरे भाषा क्षेत्र में प्रयुक्त होते हैं, भले ही इनके बोलने वालों की संख्या न्यूनाधिक हो।

प्रत्येक उच्चारित एवं व्यवहृत भाषा की बोलियाँ होती हैं। किसी भाषा में बोलियों की संख्या दो या तीन होती है तो किसी में बीस-तीस भी होती है। कुछ भाषाओं में बोलियों का अन्तर केवल कुछ विशिष्ट ध्वनियों के उच्चारण की भिन्नताओं तथा बोलने के लहजे मात्र का होता है जबकि कुछ भाषाओं में बोलियों की भिन्नताएँ भाषा के समस्त स्तरों पर प्राप्त हो सकती हैं। दूसरे शब्दों में, बोलियों में ध्वन्यात्मक, ध्वनिग्रामिक, रूपग्रामिक, वाक्यविन्यासीय, शब्दकोषीय एवं अर्थ सभी स्तरों पर अन्तर हो सकते हैं। कहीं-कहीं ये भिन्नताएँ इतनी अधिक होती हैं कि एक सामान्य व्यक्ति यह बता देता है कि अमुक भाषिक रूप का बोलने वाला व्यक्ति अमुक बोली क्षेत्र का है।

किसी-किसी भाषा में क्षेत्रगत भिन्नताएँ इतनी व्यापक होती हैं तथा उन भिन्न भाषिक-रूपों के क्षेत्र इतने विस्तृत होते हैं कि उन्हें सामान्यतः भाषाएँ माना जा सकता है। इसका उदाहरण चीन देश की मंदारिन भाषा है, जिसकी बोलियों के क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हैं तथा उनमें से बहुत-सी परस्पर अबोधगम्य भी हैं। जब तक यूगोस्लाविया एक देश था तब तक क्रोएशियाई और सर्बियाई को एक भाषा की दो बोलियाँ माना जाता था। यूगोस्लाव के विघटन के बाद से इन्हें भिन्न भाषाएँ माना जाने लगा है। ये उदाहरण इस तथ्य को प्रतिपादित करते हैं कि पारस्परिक बोधगम्यता के सिद्धांत की अपेक्षा कभी-कभी सांस्कृतिक एवं राजनैतिक कारण अधिक निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

हिन्दी भाषा क्षेत्र में भी ‘राजस्थानी’ एवं ‘भोजपुरी’ के क्षेत्र एवं उनके बोलने वालों की संख्या संसार की बहुत सी भाषाओं के क्षेत्र एवं बोलने वालों की संख्या से अधिक है। ´हिन्दी भाषा-क्षेत्र' में, सामाजिक-सांस्कृतिक समन्वय के प्रतिमान के रूप में मानक अथवा व्यावहारिक हिन्दी सामाजिक जीवन में परस्पर आश्रित सहसम्बन्धों की स्थापना करती है। सम्पूर्ण हिन्दी भाषा क्षेत्र में मानक अथवा व्यावहारिक हिन्दी के उच्च प्रकार्यात्मक सामाजिक मूल्य के कारण ये भाषिक रूप ‘हिन्दी भाषा’ के अन्तर्गत परिगणित हैं।

‘हिन्दी भाषा क्षेत्र' के अन्‍तर्गत भारत के निम्‍नलिखित राज्‍य एवं केन्‍द्र शासित प्रदेश समाहित हैं –

उत्‍तर प्रदेश

उत्‍तराखंड

बिहार

झारखंड

मध्‍यप्रदेश

छत्‍तीसगढ़

राजस्‍थान

हिमाचल प्रदेश

हरियाणा

दिल्ली

चण्डीगढ़।

भारत के संविधान की दृष्‍टि से यही स्‍थिति है। ये सभी “क” वर्ग के अन्तर्गत आने वाले राज्य हैं अर्थात् हिन्दी भाषी राज्य हैं। संविधान के अनुच्छेद 345 के अनुसरण में इस सभी राज्यों की मुख्य राजभाषा हिन्दी है। नीचे हिन्दी भाषा-क्षेत्र के राज्यों के सन् 1950 से सन् 1975 की अवधि के राजभाषा अधिनियमों का विवरण प्रस्तुत है -

क्रमांक

राज्य/ राज्यों/ के नाम

राजभाषा

राजभाषा अधिनियम

1,

बिहार (झारखंड सहित)

हिन्दी

बिहार राजभाषा अधिनियम, 1950

2.

हरियाणा

हिन्दी

हरियाणा राजभाषा अधिनियम, 1969

3.

हिमाचल प्रदेश

हिन्दी

हिमाचल प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1975

4.

मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित)

हिन्दी

मध्य प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1957

5.

राजस्थान

हिन्दी

राजस्थान राजभाषा अधिनियम, 1956

6.

उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड सहित)

हिन्दी

उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1951

भाषाविज्ञान का प्रत्‍येक विद्‌यार्थी जानता है कि प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में भाषिक भिन्‍नताएँ होती हैं। हम यह प्रतिपादित कर चुके हैं कि प्रत्येक ‘भाषा क्षेत्र' में क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्‍नताएँ होती हैं तथा बोलियों की समष्‍टि का नाम ही भाषा है। किसी भाषा की बोलियों से इतर व्‍यवहार में सामान्‍य व्‍यक्‍ति भाषा के जिस रूप को ‘भाषा' के नाम से अभिहित करते हैं वह तत्‍वतः भाषा नहीं होती। भाषा का यह रूप उस भाषा क्षेत्र के किसी बोली अथवा बोलियों के आधार पर विकसित उस भाषा का ‘मानक भाषा रूप'/'व्‍यावहारिक भाषा रूप' होता है। भाषा विज्ञान से अनभिज्ञ व्‍यक्‍ति इसी को ‘भाषा' कहने लगते हैं तथा ‘भाषा क्षेत्र' की बोलियों को अविकसित, हीन एवं गँवारू कहने, मानने एवं समझने लगते हैं।

हम इस संदर्भ में, इस तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं कि भारतीय भाषिक परम्‍परा इस दृष्‍टि से अधिक वैज्ञानिक रही है। भारतीय चिन्तन और पाश्चात्य चिन्तन में आधारभूत अन्तर रहा है। भारतीय चिन्तन चक्रीय एवं समावेशी रहा है जबकि पाश्चात्य चिन्तन का आधार द्विधाभवन (bifurcation) रहा है। पाश्चात्य चिन्तन में इसी कारण प्रत्येक प्रत्यय का द्विचरी विभाजन करने की परम्परा रही है। उदाहरणार्थ –

(1) पाश्चात्य चिन्तन शिष्ट और अशिष्ट का द्विचरी विभाजन करती है। शिष्ट साहित्य और संस्कृति और अशिष्ट साहित्य और संस्कृति। उनके यहाँ अशिष्ट साहित्य को “Folk Literature” एवं अशिष्ट संस्कृति को “Folk Culture” कहा जाता है। भारतीय चिन्तन परम्परा इनको क्रमशः "लोक साहित्य" एवं "लोक संस्कृति" नाम से पुकारती हैं। “Folk” एवं “लोक” शब्दों की अर्थवत्ता का अन्तर स्पष्ट है। एक परम्परा जिसको असंस्कृत, अशिक्षित एवं भदेस मानती है, उसको दूसरी परम्परा आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पांडित्य की चेतना और अहंकार से शून्य ऐसा जीवन स्वरूप मानती है जो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, "ग्रामों और नगरों में फैली हुई समूची जनता जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है”, और डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में, “हमारे जीवन का समुद्र है जिसमें भूत-भविष्य-वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है। वह राष्ट्र का अमर स्वरूप है, कृत्स्न ज्ञान और सम्पूर्ण अध्ययन में सब शास्त्रों का पर्यवसान है। “लोक” और लोक की धात्री, सर्वभूतरता पृथ्वी और लोक का व्यक्त रूप मानव, यही हमारे नये जीवन का अध्यात्म शास्त्र है। इसका कल्याण हमारी मुक्ति का द्वार और निर्माण का जीवन रूप है। “लोक”, पृथ्वी और मानव इस त्रिलोकी में जीवन का कल्याणतम रूप है”।

(2) पाश्चात्य चिन्तन द्विभाषिकता और बहुभाषिकता को शिष्ट समाज के भाषा-व्यवहार की विसंगत परिणति, समाज की सहज भाषिक सम्प्रेषण व्यवस्था में बाधक, मानव-मन की सर्जनात्मक शक्ति की क्षय-कारक मानता है। भारतीय परम्परा में द्विभाषिकता और बहुभाषिकता भारतीय समाज की सहज, स्वाभाविक एवं यथार्थपरक स्थिति रही है। भारत के अधिकांश आचार्य, साधु, मुनि, संत द्विभाषी एवं बहुभाषी रहे हैं। क्या शंकाराचार्य से अधिक मेधावी व्यक्ति की कल्पना की जा सकती है। पाश्चात्य परम्परा जिसको “मानव मन की सर्जनात्मक शक्ति की क्षय-कारक” मानती हैं उसको भारतीय परम्परा ने “मानव–मन की सर्जनात्मक प्रतिभा के विकास एवं वृद्धि का कारक” माना है।

(3) पश्चिमी भाषाविज्ञान भाषा और बोली का द्विचरी विभाजन करता रहा है। भाषा को शिष्ट लोगों के द्वारा बोले जाने वाला भाषिक-रूप एवं बोली को अशिष्ट, अशिक्षित एवं असभ्य लोगों के द्वारा बोले जाने वाला भाषिक-रूप मानता रहा है। मगर प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (Functional Linguistics) एवं समाजभाषाविज्ञान (Socio linguistics) के विकास के बाद अब यह सर्वमान्य है कि भाषा-क्षेत्र में बोले जाने वाले समस्त भाषिक-रूपों की समष्टि का नाम “भाषा” है। भारत में भाषाविज्ञान की जो किताबें लिखी गई हैं और महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ी और पढ़ाई जा रही हैं, वे भ्रामक और बासी ज्ञान पर आधारित हैं। इस संदर्भ में उल्लेख्य है कि भारतीय परम्‍परा ने भाषा के अलग अलग क्षेत्रों में बोले जाने वाले भाषिक रूपों को ‘देस भाखा’ अथवा ‘देसी भाषा' के नाम से पुकारा तथा घोषणा की कि देसी वचन सबको मीठे लगते हैं - ‘ देसिल बअना सब जन मिट्‌ठा।'

(विशेष अध्‍ययन के लिए देखें - प्रोफेसर महावीर सरन जैन : भाषा एवं भाषा विज्ञान, अध्‍याय 4 - भाषा के विविधरूप एवं प्रकार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (1985)

हिन्दी भाषा क्षेत्र में हिन्‍दी की मुख्‍यतः 20 बोलियाँ अथवा उपभाषाएँ बोली जाती हैं। इन 20 बोलियों अथवा उपभाषाओं को ऐतिहासिक परम्‍परा से पाँच वर्गों में विभक्‍त किया जाता है - पश्‍चिमी हिन्‍दी, पूर्वी हिन्‍दी, राजस्‍थानी हिन्‍दी, बिहारी हिन्‍दी और पहाड़ी हिन्‍दी।

पश्चिमी हिन्‍दी – 1. खड़ी बोली 2. ब्रजभाषा 3. हरियाणवी 4. बुन्‍देली 5. कन्‍नौजी

पूर्वी हिन्‍दी – 1. अवधी 2. बघेली 3. छत्‍तीसगढ़ी

राजस्‍थानी – 1. मारवाड़ी 2. मेवाती 3. जयपुरी 4.मालवी

बिहारी – 1. भोजपुरी 2. मैथिली 3. मगही 4. अंगिका 5. बज्जिका

पहाड़ी - 1. कूमाऊँनी 2. गढ़वाली 3. हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली हिन्‍दी की अनेक बोलियाँ जिन्‍हें आम बोलचाल में ‘ पहाड़ी ' नाम से पुकारा जाता है।

टिप्पण –

मैथिली –

मैथिली को अलग भाषा का दर्जा दे दिया गया है हॉलाकि हिन्‍दी साहित्‍य के पाठ्‌यक्रम में अभी भी मैथिली कवि विद्‌यापति पढ़ाए जाते हैं तथा जब नेपाल में मैथिली आदि भाषिक रूपों के बोलने वाले मधेसी लोगों पर दमनात्‍मक कार्रवाई होती है तो वे अपनी पहचान ‘हिन्‍दी भाषी' के रूप में उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार मुम्‍बई में रहने वाले भोजपुरी, मगही, मैथिली एवं अवधी आदि बोलने वाले अपनी पहचान ‘हिन्‍दी भाषी' के रूप में करते हैं।

छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी –

जबसे मैथिली एवं छत्तीसगढ़ी को अलग भाषाओं का दर्जा मिला है तब से भोजपुरी को भी अलग भाषा का दर्जा दिए जाने की माँग प्रबल हो गई है। हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का सिलसिला मैथिली एवं छत्तीसगढ़ी से आरम्भ हो गया है। मैथिली पर टिप्पण लिखा जा चुका है। छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी के सम्बंध में कुछ विचार प्रस्तुत हैं। जब तक छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा था तब तक छत्तीसगढ़ी को हिन्दी की बोली माना जाता था। रायपुर विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. रमेश चन्द्र महरोत्रा का सन् 1976 में एक आलेख रायपुर से भाषिकी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ जिसमें हिन्दी की 22 बोलियों के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी समाहित है।

(डॉ. रमेश चन्द्र महरोत्रा : “ Distance among Twenty-Two Dialects of Hindi depending on the parallel forms of the most frequent sixty-two words of Hindi” भाषिकी प्रकाशन, रायपुर (1976)

भोजपुरी के सम्बंध में आजकल समाचार पत्रों में जो कुछ पढ़ने को मिल रहा है, वह चिन्ता का कारक है। इससे यह पता चला कि कुछ शक्तियाँ भोजपुरी को हिन्दी भाषा से अलग भाषा की मान्यता दिलाने के लिए पूरी ताकत से सक्रिय हैं। ये शक्तियाँ भोजपुरी को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना चाहती हैं। इस अभियान का नेतृत्व तथाकथित भोजपुरी विश्व सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष और दिल्ली भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दुबे कर रहे हैं। मैं श्री अजित दुबे जी पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। केवल उनसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि वे श्री राहुल सांकृत्यायन, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, संत काव्य के मर्मज्ञ श्री परशुराम चतुर्वेदी और भाषावैज्ञानिक डॉ. उदय नारायण तिवारी आदि मनीषियों के ग्रंथों का पारायण करने की अनुकम्पा करें। भोजपुरी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिलाने के समर्थक कई लोगों से मेरी चर्चा हुई। वे डॉ. उदय नारायण तिवारी कृत "भोजपुरी भाषा और साहित्य" शीर्षक ग्रन्थ का हवाला देकर अपने मत की पुष्टि करना चाहते हैं। लेखक डॉ. उदय नारायण तिवारी जी के भोजपुरी के सम्बंध में विचारों के सम्बंध में कुछ निवेदन करना चाहता है। लेखक को जबलपुर के विश्वविद्यालय में डॉ. उदय नारायण तिवारी जी के साथ सन् 1964 से लेकर सन् 1970 तक साथ-साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भोजपुरी की भाषिक स्थिति को लेकर अकसर हमारे बीच विचार विमर्श होता था। उनके जामाता डॉ. शिव गोपाल मिश्र उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष व्याख्यानमाला आयोजित करते हैं। दिनांक 26 जून, 2013 को मुझे हिन्दुस्तानी एकाडमी, इलाहाबाद के श्री बृजेशचन्द्र का ‘डॉ. उदय नारायण तिवारी व्याख्यानमाला’ निमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ। व्याख्यान का विषय था - ‘भोजपुरी भाषा’। लेखक ने उसी दिन व्याख्यान के सम्बंध में डॉ. शिव गोपाल मिश्र को जो पत्र लिखा उसका व्याख्यान के विषय से सम्बंधित अंश पाठको के अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत हैं –

डॉ. उदय नारायण तिवारी जी ने भोजपुरी का भाषावैज्ञानिक अध्ययन किया। उनके अध्ययन का वही महत्व है जो सुनीति कुमार चटर्जी के बांग्ला पर सम्पन्न कार्य का है। इस विषय पर हमारे बीच अनेक बार संवाद हुए। कई बार मत भिन्नता भी हुई। जब लेखक भाषा-भूगोल एवं बोली-विज्ञान के सिद्धांतों के आलोक में हिन्दी भाषा-क्षेत्र की विवेचना करता था तो डॉ. तिवारी जी इस मत से सहमत हो जाते थे कि हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अंतर्गत भारत के जितने राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेश समाहित हैं, उन समस्त क्षेत्रों में जो भाषिक रूप बोले जाते हैं, उनकी समष्टि का नाम हिन्दी है। खड़ी बोली ही हिन्दी नहीं है अपितु यह भी हिन्दी भाषा-क्षेत्र का उसी प्रकार एक क्षेत्रीय भेद है जिस प्रकार हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अन्य अनेक क्षेत्रीय भेद हैं। मगर कभी-कभी उनका तर्क होता था कि खड़ी बोली बोलने वाले और भोजपुरी बोलने वालों के बीच बोधगम्यता बहुत कम होती है। इस कारण भोजपुरी को यदि अलग भाषा माना जाता है तो इसमें क्या हानि है। जब लेखक कहता था कि भाषाविज्ञान का सिद्धांत है कि संसार की प्रत्येक भाषा के ‘भाषा-क्षेत्र’ में भाषिक भिन्नताएँ होती हैं। हम ऐसी किसी भाषा की कल्पना नहीं कर सकते जिसके भाषा-क्षेत्र में क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्नताएँ न हों। इस पर डॉ. तिवारी जी असमंजस में पड़ जाते थे। अनेक वर्षों के संवाद के अनन्तर एक दिन डॉ. तिवारी जी ने मुझे अपने मन के रहस्य से अवगत कराया। उनके शब्द थेः

“जब मैं ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अपने अध्ययन के आधार पर विचार करता हूँ तो मुझे भोजपुरी की स्थिति हिन्दी से अलग भिन्न भाषा की लगती है मगर जब मैं संकालिक भाषाविज्ञान के सिद्धांतों की दृष्टि से सोचता हूँ तो पाता हूँ कि भोजपुरी भी हिन्दी भाषा-क्षेत्र का एक क्षेत्रीय रूप है”।

(लेखक द्वारा दिनांक 26 जून, 2013 को विज्ञान परिषद्, प्रयाग (इलाहाबाद) के प्रधान मंत्री डॉ. शिव गोपाल मिश्र को लिखा पत्र)।

जो विद्वान यह तर्क देते हैं कि डॉ. उदय नारायण तिवारी ने "भोजपुरी भाषा और साहित्य" शीर्षक ग्रंथ में "भोजपुरी" को भाषा माना है, उस सम्बंध में, लेखक विद्वानों को इस तथ्य से अवगत कराना चाहता है कि हिन्दी में प्रकाशित उक्त ग्रंथ उनके डी. लिट्. उपाधि के लिए स्वीकृत अंग्रेजी भाषा में लिखे गए शोध-प्रबंध का हिन्दी रूपांतर है। डॉ. उदय नारायण तिवारी ने कलकत्ता में सन् 1941 ईस्वी में पहले ‘तुलनात्मक भाषाविज्ञान’ में एम. ए. की परीक्षा पास की तथा सन् 1942 ईस्वी में डी. लिट्. उपाधि के लिए शोध-प्रबंध पूरा करके इलाहाबाद लौट आए तथा उसे परीक्षण के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जमा कर दिया। आपने अपना शोध-प्रबंध अंग्रेजी भाषा में डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या के निर्देशन में सम्पन्न किया तथा डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त होने के बाद इसका प्रकाशन ‘एशियाटिक सोसाइटी’ से हुआ। इस शोध-प्रबंध का शीर्षक है - ‘ए डाइलेक्ट ऑफ भोजपुरी’। डॉ. उदय नारायण तिवारी ने इस तथ्य को स्वयं अपने एक लेख में अभिव्यक्त किया है।

(देखें - श्री उदय नारायण तिवारी : आचार्य सुनीति कुमार चटर्जी – व्यक्तित्व तथा वैदुष्य, सरस्वती, पृष्ठ 169-171 (अप्रैल, 1977))

राजस्थानी –

“श्रीमद्जवाहराचार्य स्मृति व्याख्यानमाला” के अन्तर्गत “विश्व शान्ति एवं अहिंसा” विषय पर व्याख्यान देने सन् 1987 ईस्वी में लेखक का कलकत्ता (कोलकोता) जाना हुआ था। वहाँ श्री सरदारमल जी कांकरिया के निवास पर लेखक का संवाद राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाने वाले तथा राजस्थानी में “धरती धौरां री” एवं “पातल और पीथल” जैसी कृतियों की रचना करने वाले कन्हैया लाल सेठिया जी से हुआ। उनका आग्रह था कि राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा मिलना चाहिए। लेखक ने उनसे अपने आग्रह पर पुनर्विचार करने की कामना व्यक्त की और मुख्यतः निम्न मुद्दों पर विचार करने का अनुरोध किया –

(1) ग्रियर्सन ने ऐतिहासिक दृष्टि से विचार किया है। स्वाधीनता आन्दोलन में हमारे राष्ट्रीय नेताओं के कारण हिन्दी का जितना प्रचार प्रसार हुआ उसके कारण हमें ग्रियर्सन की दृष्टि से नहीं अपितु डॉ. धीरेन्द्र वर्मा आदि भाषाविदों की दृष्टि से विचार करना चाहिए।

(2) राजस्थानी भाषा जैसी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। राजस्थान में निम्न क्षेत्रीय भाषिक-रूप बोले जाते हैं –

1. मारवाड़ी

2.मेवाती

3.जयपुरी

4. मालवी (राजस्थान के साथ-साथ मध्य-प्रदेश में भी)

राजस्थानी जैसी स्वतंत्र भाषा नहीं है। इन विविध भाषिक रूपों को हिन्दी के रूप मानने में क्या आपत्ति हो सकती है।

(3) यदि आप राजस्थानी का मतलब केवल मारवाड़ी से लेंगे तो क्या मेवाती, जयपुरी, मालवी, हाड़ौती, शेखावाटी आदि अन्य भाषिक रूपों के बोलने वाले अपने अपने भाषिक रूपों के लिए आवाज़ नहीं उठायेंगे।

(4) भारत की भाषिक परम्परा रही है कि एक भाषा के हजारों भूरि भेद माने गए हैं मगर अंतरक्षेत्रीय सम्पर्क के लिए एक भाषा की मान्यता रही है।

(5) हिन्दी साहित्य की संश्लिष्ट परम्परा रही है। इसी कारण हिन्दी साहित्य के अंतर्गत रास एवं रासो साहित्य की रचनाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

(6) राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित हिन्दी कथा साहित्य एवं हिन्दी फिल्मों में जिस राजस्थानी मिश्रित हिन्दी का प्रयोग होता है उसे हिन्दी भाषा क्षेत्र के प्रत्येक भाग का रहने वाला समझ लेता है।

(7) मारवाड़ी लोग व्यापार के कारण भारत के प्रत्येक राज्य में निवास करते हैं तथा अपनी पहचान हिन्दी भाषी के रूप में करते हैं। यदि आप राजस्थानी को हिन्दी से अलग मान्यता दिलाने का प्रयास करेंगे तो राजस्थान के बाहर रहने वाले मारवाड़ी व्यापारियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

(8) भारतीय भाषाओं के अस्तित्व एवं महत्व को अंग्रेजी से खतरा है। संसार में अंग्रेजी भाषियों की जितनी संख्या है उससे अधिक संख्या केवल हिन्दी भाषियों की है। यदि हिन्दी के उपभाषिक रूपों को हिन्दी से अलग मान लिया जाएगा तो भारत की कोई भाषा अंग्रेजी से टक्कर नहीं ले सकेगी और धीरे धीरे भारतीय भाषाओं के अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा।

(देखें - भारत में भारतीय भाषाओं का सम्मान और विकास) http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/M/MahavirSaranJain/bharat_mein_Bhartiya_bhashaon_ka_samman_vikaas_Alekh.htm

पहाड़ी –

डॉ. सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘पहाड़ी' समुदाय के अन्‍तर्गत बोले जाने वाले भाषिक रूपों को तीन शाखाओं में बाँटा –

(अ) पूर्वी पहाड़ी अथवा नेपाली

(आ) मध्‍य या केन्‍द्रीय पहाड़ी

(इ)पश्‍चिमी पहाड़ी।

हिन्‍दी भाषा के संदर्भ में वर्तमान स्‍थिति यह है कि हिन्‍दी भाषा के अन्‍तर्गत मध्‍य या केन्‍द्रीय पहाड़ी की उत्‍तराखंड में बोली जाने वाली 1. कूमाऊँनी 2. गढ़वाली तथा पश्‍चिमी पहाड़ी की हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली हिन्‍दी की अनेक बोलियाँ हैं जिन्‍हें आम बोलचाल में ‘ पहाड़ी ' नाम से पुकारा जाता है।

हिन्‍दी भाषा के संदर्भ में विचारणीय है कि अवधी, बुन्‍देली, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि को हिन्‍दी भाषा की बोलियाँ माना जाए अथवा उपभाषाएँ माना जाए। सामान्‍य रूप से इन्‍हें बोलियों के नाम से अभिहित किया जाता है किन्‍तु लेखक ने अपने ग्रन्‍थ ‘ भाषा एवं भाषाविज्ञान' में इन्‍हें उपभाषा मानने का प्रस्‍ताव किया है। ‘ - - क्षेत्र, बोलने वालों की संख्‍या तथा परस्‍पर भिन्‍नताओं के कारण इनको बोली की अपेक्षा उपभाषा मानना अधिक संगत है। इसी ग्रन्‍थ में लेखक ने पाठकों का ध्‍यान इस ओर भी आकर्षित किया कि हिन्‍दी की कुछ उपभाषाओं के भी क्षेत्रगत भेद हैं जिन्‍हें उन उपभाषाओं की बोलियों अथवा उपबोलियों के नाम से पुकारा जा सकता है।

(देखें - डॉ. महावीर सरन जैन : भाषा एवं भाषाविज्ञान, पृष्‍ठ 60, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (1985)

यहाँ यह भी उल्‍लेखनीय है कि इन उपभाषाओं के बीच कोई स्‍पष्‍ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। प्रत्‍येक दो उपभाषाओं के मध्‍य संक्रमण क्षेत्र विद्‌यमान है।

विश्‍व की प्रत्‍येक भाषा के विविध बोली अथवा उपभाषा क्षेत्रों में से विभिन्न सांस्‍कृतिक कारणों से जब कोई एक क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक महत्‍वपूर्ण हो जाता है तो उस क्षेत्र के भाषा रूप का सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र में प्रसारण होने लगता है। इस क्षेत्र के भाषारूप के आधार पर पूरे भाषाक्षेत्र की ‘मानक भाषा' का विकास होना आरम्‍भ हो जाता है। भाषा के प्रत्‍येक क्षेत्र के निवासी इस भाषारूप को ‘मानक भाषा' मानने लगते हैं। इसको मानक मानने के कारण यह मानक भाषा रूप ‘भाषा क्षेत्र' के लिए सांस्‍कृतिक मूल्‍यों का प्रतीक बन जाता है। मानक भाषा रूप की शब्‍दावली, व्‍याकरण एवं उच्‍चारण का स्‍वरूप अधिक निश्चित एवं स्‍थिर होता है एवं इसका प्रचार, प्रसार एवं विस्‍तार पूरे भाषा क्षेत्र में होने लगता है। कलात्‍मक एवं सांस्‍कृतिक अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम एवं शिक्षा का माध्‍यम यही मानक भाषा रूप हो जाता है। इस प्रकार भाषा के ‘मानक भाषा रूप' का आधार उस भाषाक्षेत्र की क्षेत्रीय बोली अथवा उपभाषा ही होती है, किन्‍तु मानक भाषा होने के कारण चूँकि इसका प्रसार अन्‍य बोली क्षेत्रों अथवा उपभाषा क्षेत्रों में होता है इस कारण इस भाषारूप पर ‘भाषा क्षेत्र' की सभी बोलियों का प्रभाव पड़ता है तथा यह भी सभी बोलियों अथवा उपभाषाओं को प्रभावित करता है। उस भाषा क्षेत्र के शिक्षित व्‍यक्‍ति औपचारिक अवसरों पर इसका प्रयोग करते हैं। भाषा के मानक भाषा रूप को सामान्‍य व्‍यक्‍ति अपने भाषा क्षेत्र की ‘मूल भाषा', केन्‍द्रक भाषा', ‘मानक भाषा' के नाम से पुकारते हैं। यदि किसी भाषा का क्षेत्र हिन्‍दी भाषा की तरह विस्‍तृत होता है तथा यदि उसमें ‘हिन्‍दी भाषा क्षेत्र' की भाँति उपभाषाओं एवं बोलियों की अनेक परतें एवं स्‍तर होते हैं तो ‘मानक भाषा' के द्वारा समस्‍त भाषा क्षेत्र में विचारों का आदान प्रदान सम्‍भव हो पाता है। भाषा क्षेत्र के यदि आंशिक अबोधगम्‍य उपभाषी अथवा बोली बोलने वाले परस्‍पर अपनी उपभाषा अथवा बोली के माध्‍यम से विचारों का समुचित आदान प्रदान नहीं कर पाते तो इसी मानक भाषा के द्वारा संप्रेषण करते हैं। भाषा विज्ञान में इस प्रकार की बोधगम्‍यता को ‘पारस्‍परिक बोधगम्‍यता' न कहकर ‘एकतरफ़ा बोधगम्‍यता' कहते हैं। ऐसी स्‍थिति में अपने क्षेत्र के व्‍यक्‍ति से क्षेत्रीय बोली में बातें होती हैं किन्‍तु दूसरे उपभाषा क्षेत्र अथवा बोली क्षेत्र के व्‍यक्‍ति से अथवा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा के द्वारा बातचीत होती हैं। इस प्रकार की भाषिक स्‍थिति को फर्गुसन ने बोलियों की परत पर मानक भाषा का अध्‍यारोपण कहा है।

(डायग्‍लोसियाः वॅर्ड, 15, पृष्‍ठ 325 – 340)

गम्‍पर्ज़ ने इसे ‘बाइलेक्‍टल' के नाम से पुकारा है।

(स्‍पीच वेरिएशन एण्‍ड दः स्‍टडी ऑफ इंडियन सिविलाइज़ेशन, अमेरिकन एनथ्रोपोलोजिस्‍ट, खण्‍ड 63,पृष्‍ठ 976- 988)

हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में अनेक क्षेत्रगत भेद एवं उपभेद तो है हीं; प्रत्‍येक क्षेत्र के प्रायः प्रत्‍येक गाँव में सामाजिक भाषिक रूपों के विविध स्‍तरीकृत तथा जटिल स्‍तर विद्‌यमान हैं और यह हिन्दी भाषा-क्षेत्र के सामाजिक संप्रेषण का यथार्थ है जिसको जाने बिना कोई व्यक्ति हिन्दी भाषा के क्षेत्र की विवेचना के साथ न्याय नहीं कर सकता। ये हिन्‍दी पट्‌टी के अन्दर सामाजिक संप्रेषण के विभिन्‍न नेटवर्कों के बीच संवाद के कारक हैं। इस हिन्‍दी भाषा क्षेत्र अथवा पट्‌टी के गावों के रहनेवालों के वाग्‍व्‍यवहारों का गहराई से अध्‍ययन करने पर पता चलता है कि ये भाषिक स्‍थितियाँ इतनी विविध, विभिन्‍न एवं मिश्र हैं कि भाषा व्‍यवहार के स्‍केल के एक छोर पर हमें ऐसा व्‍यक्‍ति मिलता है जो केवल स्‍थानीय बोली बोलना जानता है तथा जिसकी बातचीत में स्‍थानीयेतर कोई प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता वहीं दूसरे छोर पर हमें ऐसा व्‍यक्‍ति मिलता है जो ठेठ मानक हिन्‍दी का प्रयोग करता है तथा जिसकी बातचीत में कोई स्‍थानीय भाषिक प्रभाव परिलक्षित नहीं होता। स्‍केल के इन दो दूरतम छोरों के बीच बोलचाल के इतने विविध रूप मिल जाते हैं कि उन सबका लेखा जोखा प्रस्‍तुत करना असाध्‍य हो जाता है। हमें ऐसे भी व्‍यक्‍ति मिल जाते हैं जो एकाधिक भाषिक रूपों में दक्ष होते हैं जिसका व्‍यवहार तथा चयन वे संदर्भ, व्‍यक्‍ति, परिस्‍थियों को ध्‍यान में रखकर करते हैं। सामान्‍य रूप से हम पाते हैं कि अपने घर के लोगों से तथा स्‍थानीय रोजाना मिलने जुलने वाले घनिष्‍ठ मित्रों से व्‍यक्‍ति जिस भाषा रूप में बातचीत करता है उससे भिन्‍न भाषा रूप का प्रयोग वह उनसे भिन्‍न व्‍यक्‍तियों एवं परिस्‍थितियों में करता है। सामाजिक संप्रेषण के अपने प्रतिमान हैं। व्‍यक्‍ति प्रायः वाग्‍व्‍यवहारों के अवसरानुकूल प्रतिमानों को ध्‍यान में रखकर बातचीत करता है।

किसी भाषा क्षेत्र की मानक भाषा का आधार कोई बोली अथवा उपभाषा ही होती है किन्‍तु कालान्‍तर में उक्‍त बोली एवं मानक भाषा के स्‍वरूप में पर्याप्‍त अन्‍तर आ जाता है। सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र के शिष्‍ट एवं शिक्षित व्‍यक्‍तियों द्वारा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा का प्रयोग किए जाने के कारण तथा साहित्‍य का माध्‍यम बन जाने के कारण स्‍वरूपगत परिवर्तन स्‍वाभाविक है। प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्‍यक्‍ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। हम पाते हैं कि इस मानक हिन्‍दी अथवा व्‍यावहारिक हिन्‍दी का प्रयोग सम्‍पूर्ण हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में बढ़ रहा है तथा प्रत्‍येक हिन्‍दी भाषी व्‍यक्‍ति शिक्षित, सामाजिक दृष्‍टि से प्रतिष्‍ठित तथा स्‍थानीय क्षेत्र से इतर अन्‍य क्षेत्रों के व्‍यक्‍तियों से वार्तालाप करने के लिए इसी को आदर्श, श्रेष्‍ठ एवं मानक मानता है। गाँव में रहने वाला एक सामान्‍य एवं बिना पढ़ा लिखा व्‍यक्‍ति भले ही इसका प्रयोग करने में समर्थ तथा सक्षम न हो फिर भी वह इसके प्रकार्यात्‍मक मूल्‍य को पहचानता है तथा वह भी अपने भाषिक रूप को इसके अनुरूप ढालने की जुगाड़ करता रहता है। जो मजदूर शहर में काम करने आते हैं वे किस प्रकार अपने भाषा रूप को बदलने का प्रयास करते हैं - इसको देखा परखा जा सकता है।

सन् 1960 में लेखक ने बुलन्द शहर एवं खुर्जा तहसीलों (ब्रज एवं खड़ी बोली का संक्रमण क्षेत्र) के भाषिक रूपों का संकालिक अथवा एककालिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन करना आरम्भ किया।

(डॉ.. महावीर सरन जैन : बुलन्दशहर एवं खुर्जा तहसीलों की बोलियों का संकालिक अध्ययन (ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली का संक्रान्ति क्षेत्र, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद (1967)

सामग्री संकलन के लिए जब लेखक गाँवों में जाता था तथा वहाँ रहने वालों से बातचीत करता था तबके उनके भाषिक रूपों एवं आज लगभग 55 वर्षों के बाद के भाषिक रूपों में बहुत अन्तर आ गया है। अब इनके भाषिक-रूपों पर मानक हिन्दी अथवा व्यावहारिक हिन्दी का प्रभाव आसानी से पहचाना जा सकता है। इनके भाषिक-रूपों में अंग्रेजी शब्दों का चलन भी बढ़ा है। यह कहना अप्रासंगिक होगा कि उनकी जिन्दगी में और व्यवहार में भी बहुत बदलाव आया है।

मानक हिन्दी अथवा व्यावहारिक हिन्दी का सम्पूर्ण हिन्दी भाषा क्षेत्र में व्‍यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्‍मक प्रचार-प्रसार के कारण, यह हिन्दी भाषा-क्षेत्र में प्रयुक्त समस्‍त भाषिक रूपों के बीच संपर्क सेतु की भूमिका का निर्वाह कर रहा है।

हिन्‍दी भाषा का क्षेत्र बहुत विस्‍तृत है। इस कारण इसकी क्षेत्रगत भिन्‍नताएँ भी बहुत अधिक हैं।‘खड़ी बोली' हिन्‍दी भाषा क्षेत्र का उसी प्रकार एक भेद है ; जिस प्रकार हिन्‍दी भाषा के अन्‍य बहुत से क्षेत्रगत भेद हैं। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ हैं जिनमें पारस्‍परिक बोधगम्‍यता का प्रतिशत बहुत कम है किन्‍तु ऐतिहासिक एवं सांस्‍कृतिक दृष्‍टि से सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र एक भाषिक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी क्षेत्र के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने क्षेत्रगत भेदों को हिन्‍दी भाषा के रूप में मानते एवं स्‍वीकारते आए हैं। कुछ विद्वानों ने इस भाषा क्षेत्र को ‘हिन्‍दी पट्‌टी’ के नाम से पुकारा है तथा कुछ ने इस हिन्‍दी भाषी क्षेत्र के निवासियों के लिए 'हिन्‍दी जाति' का अभिधान दिया है। "आज ‘हिन्दी जाति’ भारत के बड़े भूभाग पर अवस्थित है, जिसमें उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तरांचल. हिमांचल, दिल्ली, हरियाणा आदि प्रदेशों के भूभाग सम्मिलित हैं। यों तो आज सम्पूर्ण भारत में धीरे-धीरे हिन्दी का विस्तार हो रहा है। उक्त के अतिरिक्त मारीशस, सूरिनाम, फीजी, ट्रिनीडाड आदि कई देशों में हिन्दी सदियों से वाग्व्यवहार की भाषा रही है”।

(देखें – डॉ. रघुवंश मणि पाठक – हिंदी जाति एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी के विविध संदर्भ, पुरोवाक्, बलिया हिन्दी प्रचारिणी सभा, बलिया)

हम बलपूर्वक यह कहना चाहते हैं कि हिन्‍दी, चीनी एवं रूसी जैसी भाषाओं के क्षेत्रगत प्रभेदों की विवेचना यूरोप की भाषाओं के आधार पर विकसित पाश्‍चात्‍य भाषाविज्ञान के प्रतिमानों के आधार पर नहीं की जा सकती।

जिस प्रकार अपने 29 राज्‍यों एवं 07 केन्‍द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर भारतदेश है, उसी प्रकार भारत के जिन राज्‍यों एवं शासित प्रदेशों को मिलाकर हिन्‍दी भाषा क्षेत्र है, उस हिन्‍दी भाषा-क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उनकी समाष्‍टि का नाम हिन्‍दी भाषा है। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के प्रत्‍येक भाग में व्‍यक्‍ति स्‍थानीय स्‍तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्‍तर-क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्‍तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्‍यावहारिक हिन्‍दी का प्रयोग होता है। आप विचार करें कि उत्तर प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्‍नौजी, अवधी, बुन्‍देली आदि भाषाओं का राज्‍य है। इसी प्रकार मध्‍य प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा बुन्‍देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्‍य है। जब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की बात करते हैं तब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के अन्‍तर्गत जितने राज्‍य हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम ही तो संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका है। विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी जानते हैं कि कभी देश के नाम से तथा कभी उस देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा होती है। वे ये भी जानते हैं कि देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा भले ही होती है, मगर राजधानी ही देश नहीं होता। इसी प्रकार किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है ः मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इसी प्रकार खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्‍दी का विकास अवश्‍य हुआ है किन्‍तु खड़ी बोली ही हिन्‍दी नहीं है। तत्‍वतः हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम हिन्दी है। हिन्‍दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने के षडयंत्र को विफल करने की आवश्‍कता है तथा इस तथ्‍य को बलपूर्वक रेखांकित, प्रचारित एवं प्रसारित करने की आवश्‍यकता है कि सन् 1991 की भारतीय जनगणना के अन्तर्गत भारतीय भाषाओं के विश्‍लेषण का जो ग्रन्‍थ प्रकाशित हुआ है उसमें मातृभाषा के रूप में हिन्‍दी को स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या का प्रतिशत उत्‍तर प्रदेश (उत्‍तराखंड राज्‍य सहित) में 90.11, बिहार (झारखण्‍ड राज्‍य सहित) में 80.86, मध्‍य प्रदेश (छत्‍तीसगढ़ राज्‍य सहित) में 85.55, राजस्‍थान में 89.56, हिमाचल प्रदेश में 88.88, हरियाणा में 91.00, दिल्‍ली में 81.64, तथा चण्‍डीगढ़ में 61.06 है। http://www.rachanakar.org/2012/09/blog-post_3077.html#ixzz2eqRRA0uA

हिन्दी भाषा-क्षेत्र एवं मंदारिन भाषा-क्षेत्र –

जिस प्रकार चीन में मंदारिन भाषा की स्थिति है उसी प्रकार भारत में हिन्दी भाषा की स्थिति है। जिस प्रकार हिन्दी भाषा-क्षेत्र में विविध क्षेत्रीय भाषिक रूप बोले जाते हैं, वैसे ही मंदारिन भाषा-क्षेत्र में विविध क्षेत्रीय भाषिक-रूप बोले जाते हैं। हिन्दी भाषा-क्षेत्र के दो चरम छोर पर बोले जाने वाले क्षेत्रीय भाषिक रूपों के बोलने वालों के बीच पारस्परिक बोधगम्यता का प्रतिशत बहुत कम है। मगर मंदारिन भाषा के दो चरम छोर पर बोले जाने वाले क्षेत्रीय भाषिक रूपों के बोलने वालों के बीच पारस्परिक बोधगम्यता बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के लिए मंदारिन के एक छोर पर बोली जाने वाली हार्बिन और मंदारिन के दूसरे छोर पर बोली जाने वाली शिआनीज़ के वक्ता एक दूसरे से संवाद करने में सक्षम नहीं हो पाते। उनमें पारस्परिक बोधगम्यता का अभाव है। वे आपस में मंदारिन के मानक भाषा रूप के माध्यम से बातचीत कर पाते हैं। मंदारिन के इस क्षेत्रीय भाषिक रूपों को लेकर वहाँ कोई विवाद नहीं है। पाश्चात्य भाषावैज्ञानिक मंदारिन को लेकर कभी विवाद पैदा करने का साहस नहीं कर पाते। मंदारिन की अपेक्षा हिन्दी के भाषा-क्षेत्र में बोले जाने वाले भाषिक-रूपों में पारस्परिक बोधगम्यता का प्रतिशत अधिक है। यही नहीं सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-क्षेत्र में पारस्परिक बोधगम्यता का सातत्य मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि हम हिन्दी भाषा-क्षेत्र में एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा करे तो निकटवर्ती क्षेत्रीय भाषिक-रूपों में बोधगम्यता का सातत्य मिलता है। हिन्दी भाषा-क्षेत्र के दो चरम छोर के क्षेत्रीय भाषिक-रूपों के वक्ताओं को अपने अपने क्षेत्रीय भाषिक-रूपों के माध्यम से संवाद करने में कठिनाई होती है। कठिनाई तो होती है मगर इसके बावजूद वे परस्पर संवाद कर पाते हैं। यह स्थिति मंदारिन से अलग है जिसके चरम छोर के क्षेत्रीय भाषिक-रूपों के वक्ता अपने अपने क्षेत्रीय भाषिक-रूपों के माध्यम से कोई संवाद नहीं कर पाते। मंदारिन के एक छोर पर बोली जाने वाली हार्बिन और मंदारिन के दूसरे छोर पर बोली जाने वाली शिआनीज़ के वक्ता एक दूसरे से संवाद करने में सक्षम नहीं हैं मगर हिन्दी के एक छोर पर बोली जाने वाली भोजपुरी और मैथिली तथा दूसरे छोर पर बोली जाने वाली मारवाड़ी के वक्ता एक दूसरे के अभिप्राय को किसी न किसी मात्रा में समझ लेते हैं।

यदि चीन में मंदारिन भाषा-क्षेत्र के समस्त क्षेत्रीय भाषिक-रूप मंदारिन भाषा के ही अंतर्गत स्वीकृत है तो उपर्युक्त विवेचन के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट क्षेत्रीय भाषिक-रूपों को भिन्न-भिन्न भाषाएँ मानने का विचार नितान्त अतार्किक और अवैज्ञानिक है। लेखक का स्पष्ट एवं निर्भ्रांत मत है कि हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने के षड़यंत्रों को बेनकाब करने और उनको निर्मूल करने की आवश्यकता असंदिग्ध है। हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है। उसे उसके ही घर में तोड़ने का अपराध किसी को नहीं करना चाहिए।

(देखें - हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है; इसे उसके अपने ही घर में मत तोड़ो) http://www.pravakta.com/hindi-is-the-language-of-hindustan

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव

बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

yakub memon to be hanged

प्रमोद भार्गव

1993 के मुंबई बम धमाकों में शामिल याकूब मेमन की फांसी की सजा बरकरार रहेगी। सर्वोच्‍च न्‍यायालय की तीन सदस्‍सीय खंडपीठ ने उसकी दया याचिका और मौत के वारंट पर उठाए सवाल खारिज कर दिए हैं। इस सुनवाई की खास बात यह रही कि तीनों न्‍यायाधीश फांसी देने की राय पर एकमत रहे हैं। इसके साथ ही महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल ने भी याकूब की दया याचिका निरस्‍त कर दी। इन फैसलों से अब याकूब को नागपुर के केंद्रीय कारागार में तय समय पर फांसी दिया जाना निश्‍चित है। हालांकि इस याचिका के पहले भी दो बार न्‍यायालय याकूब की याचिका खारिज कर चुकी थी। इसके पहले राष्‍ट्रपति से भी दया याचिका खारिज हो चुकी है। राष्‍ट्रपति से याचिका खारिज होने के बाद अपवादस्‍वरूप ही सुप्रीम कोर्ट किसी याचिका पर सुनवाई करता है। बावजूद सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने याचिका पर सुनवाई की और फांसी की सजा को यथावत रखा। टाडा अदालत ने 2007 में याकूब को फांसी की सजा सुनाई थी। चूंकि इस अदालत की अपील उच्‍चतम न्‍यायालय में करने का प्रावधान नहीं है,इसलिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय में ही टाडा से सजा पाए अपराधियों की अपील की जा सकती है और अपील पर निराकरण के बाद दया याचिका लगाई जा सकती है। याकूब की दया याचिका पर तीन बार सुनवाई करके शीर्ष न्‍यायालय ने यह साफ कर दिया है कि आरोपी याकूब को न्‍याय के अधिकार के सभी विकल्‍प मुहैया कराए गए हैं।

याकूब मेमन ने याचिका में दया की गुजारिश करते हुए कहा था कि वह पिछले 21 साल से जेल में है और मुबंई धमाकों का मुख्‍य साजिशकर्ता नहीं है,इसलिए उसे राहत दी जाए। हालांकि वह अपने कबूलनामे और टाडा अदालत को दिए बयान में पहले ही स्‍वीकार चुका था,कि वह साजिश में शामिल जरूर रहा है, लेकिन मुख्‍य मास्‍टरमांइड नहीं है। किंतु पुलिस तफ्‍तीश में पाया गया कि वह न केवल मुख्‍य साजिशकर्ता था,बल्‍कि उसके घर में ही बम बनाए गए और उन्‍हें उसी की कार में ले जाकर घनी आबादी वाले इलाकों में भी रखा गया। जब ये बम विस्‍फोट हुए तो पूरी मुंबई दहल गई। इस देशघाती हमले में 257 लोग मारे गए थे और 712 जख्‍मी हुए थे। साथ ही कई करोड़ की चल-अचल संपत्ति नष्‍ट हो गई थी। यही नहीं देश में यह ऐसा पहला हमला था,जिसमें पहली बार देश के भीतर आरडीएक्‍स और एके-57 तथा एके-47 जैसे घातक विस्‍फोटक व हथियारों का इस्‍तेमाल हुआ था। नागपुर के केंद्रीय कारागर में बंद याकूब मेमन को अब 30 जुलाई को सुबह 7 बजे फांसी दे दी जाएगी।

इतना बड़ा देशद्रोही होने के बावजूद चंद स्‍वंय सेवी संगठन,कुछ आरटीआई कार्यकरता,सलमान खान और करीब 300 विशिष्‍ट लोगों ने याकूब को मृत्‍युदंड की बजाय आजीवन करावास की मांग की थी। इन्‍होंने मृत्‍युदंड को नए सिरे से बहस का मुद्‌दा बना दिया था। जबकि भारतीय दंड संहिता में जब तक मौत की सजा का प्रावधान है,तब तक जघन्‍य अपराधों में अदालत मौत की सजा देती रहेंगी। इस सजा को खत्‍म करने का अधिकार केवल संसद को है। और संसद एकमत से हत्‍या की धारा 302 और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की धारा 121 को विलोपित करने का विधेयक पारित करा ले,ऐसा निकट भविष्‍य में संभव भी नहीं है। याकूब मेमन भारत देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोपी था। इसी प्रकृति के संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू और मुंबई हमले के पाकिस्‍तानी हमलावर अजमल आमिर कसाब को मृत्‍युदंड के बाद फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका है। ये तीनों ही मामले दुर्लभतम होने के साथ देश की संप्रुभता को चुनौती देने की राष्‍ट्रद्रोही मुहिम से जुड़े थे।

यहां यह भी गौरतलब है कि खालिस्‍तान समर्थक आतंकी देविदंर पाल सिंह भुल्‍लर का अपराध भी याकूब,अफजल और कसाब की प्रकृति का है,इसीलिए भुल्‍लर मामले में 12 अप्रैल 2013 को अदालत ने कहा भी था कि दया याचिका पर फैसले में देरी फांसी की सजा माफ करने का आधार नहीं बन सकती है। दरअसल जघन्‍य से जघन्‍यतम अपराधों में त्‍वरित न्‍याय की तो जरूरत है ही,दया याचिका पर जल्‍द से जल्‍द निर्णय लेने की जरूरत भी है। शीर्ष न्‍यायलय ने कहा भी था कि दया याचिका पर तुरंत फैसला हो,लेकिन राष्‍ट्रपति के लिए क्‍या समय सीमा होनी चाहिए,यह सुनिश्‍चित नहीं नही है। लिहाजा अकसर राष्‍ट्रपति दया याचिकाओं पर निर्णय को या तो टालते हैं या फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल देते हैं। हालांकि महामहिम प्रणब मुखर्जी इस दृष्‍टि से अपवाद हैं। राष्‍ट्रपति बनने के बाद अफजल गुरू,अजमल कसाब और याकूब की दया याचिकाएं उन्‍होंने ही खारिज करते हुए,इन देशद्रोहियों को फांसी के फंदे पर लटकाने का रास्‍ता साफ किया था। जबकि पूर्व राष्‍ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने या तो दया याचिकाएं टालीं या मौत की सजा को उम्र कैद में बदला। यहां तक कि उन्‍होंने महिला होने के बावजूद बलात्‍कार जैसे दुष्‍कर्म में फांसी पाए पांच आरोपीयों की सजा आजीवन कारावास में बदलीं थीं। पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम आजाद भी किसी अपराधी को फांसी की सजा देने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाए थे।

हालांकि किसी भी देश के उदारवादी लोकतंत्र में न्‍याय व्‍यवस्‍था आंख के बदले आंख या हाथ के बदले हाथ जैसी प्रतिशोघात्‍मक मानसिकता से नहीं चलाई जा सकती है,लेकिन जिन देशों में मृत्‍युदंड का प्रावधान है, वहां यह मुद्‌दा हमेशा ही विवादित रहता है कि आखिर मृत्‍युदंड सुनने का तार्किक आधार क्‍या हो? इसीलिए भारतीय न्‍याय व्‍यव्‍स्‍था में लचीला रुख अपनाते हुए गंभीर अपराधों में उम्र कैद एक नियम और मृत्‍युदंड अपवाद है। इसीलिए देश की शीर्षस्‍थ अदालतें इस सिद्धांत को महत्‍व देती हैं,कि अपराध की स्‍थिति किस मानसिक परिस्‍थिति में उत्‍पन्‍न हुई? अपराधी की समाजिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक स्‍थितियों व मजबूरियों का भी ख्‍याल रखा जाता है। क्‍योंकि एक सामान्‍य नागरिक सामाजिक संबंधों की जिम्‍मेदारियों से भी जुड़ा होता है। ऐसे में जब वह अपनी बहन,बेटी या पत्‍नि को बलात्‍कार जैसे दुष्‍कर्म का शिकार होते देखता है तो आवेश में आकर हत्‍या तक कर डालता है।

भूख,गरीबी और कर्ज की असहाय पीड़ा भोग रहे व्‍यक्‍ति भी अपने परिजनों को इस जलालत की जिदंगी से मुक्‍ति का उपाय हत्‍या में तलाशने को विवश हो जाते हैं। जाहिर है,ऐसे लाचारों को मौत की सजा के बजाय सुधार और पुनर्वास के अवसर मिलने चाहिए। क्‍योंकि जटिल होते जा रहे समय में दंड के प्रावधानों को तात्‍कालिक परिस्‍थिति और दोषी की मनोवैज्ञानिक स्‍थिति पर भी आंकना जरूरी है। हमारे देश में न्‍याय को अपराध के विभिन्‍न धरातलों की कसौटियों पर कसना इसलिए भी जरूरी है,क्‍योंकि हमारे यहां पुलिस व्‍यक्‍ति की सामाजिक,राजनीतिक, शैक्षिक व आर्थिक हैसियत के हिसाब से भी दोषी ठहराने में भेद बरतती है। इसीलिए देश में सामाजिक आधार पर विश्‍लेषण करें तो उच्‍च वर्ग की तुलना में निचली जातियों से जुड़े लोगों को ज्‍यादा फांसी दी गई हैं। यही स्‍थिति अमेरिका में है। वहां श्‍वेतों की अपेक्षा अश्‍वेतों को ज्‍यादा फांसी दी गई हैं। इस समय पश्‍चिमी एशियाई देशों में भी फांसी की सजा देने में तेजी आई है। इनमें ईरान, इराक, सउदी अरब और यमन ऐसे देश हैं,जहां सबसे ज्‍यादा मृत्‍युदंड दिए जा रहे हैं।

दया याचिका पर सुनवाई के लिए यह मांग हमारे यहां उठ रही है कि इसकी सुनवाई का अधिकार अकेले राष्‍ट्रपति के अधिकार क्ष्‍ोत्र में न हो? इस बाबत एक बहुसदस्‍सीय जूरी का गठन हो। इसमें सर्वोच्‍च न्‍यायालय के प्रधान न्‍यायाधीश, उप राष्‍ट्रपति, लोकसभा अध्‍यक्ष, विपक्ष के नेता और कुछ अन्‍य विशेषाधिकार संपन्‍न लोग भी शामिल हों? यदि इस जूरी में भी सहमति न बने तो इसे दोबारा शीर्ष अदालत के पास प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के लिए भेज देना चाहिए। इससे गलती की गुंजाइश न्‍यूनतम हो सकती है? इसके उलट एक विचार यह भी है कि राष्‍ट्रपति के पास दया याचिका भेजने का प्रावधान खत्‍म करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही अंतिम फैसला माना जाए ? यह विचार ज्‍यादा तार्किक है। क्‍योंकि न्‍यायालय अपराध की प्रकृति और अपराधी की प्रवृत्ति के विश्‍लेषण के तर्कों से सीधे रूबरू होती है। फरियादी का पक्ष भी अदालत के समक्ष रखा जाता है। जबकि राष्‍ट्रपति के पास दया याचिका पर विचार का एकांगी पहलू होता है? जाहिर है न्‍यायालय के पास अपराध और उससे जुड़े दंड को देखने के कहीं ज्‍यादा साक्ष्‍यजन्‍य पहलू होते हैं। लिहाजा तर्कसंगत उदारता अदालत ठीक से बरत सकती है ? बहरहाल याकूब का मृत्‍युदंड यदि आजीवन कारावास में बदल दिया जाता तो इससे आतंकवादियों के हौसले बुलंद होते, लिहाजा इसे फांसी के फंदे पर लटकाया जाना जरूरी था

 

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

फोन 07492 232007

लेखक वरिष्‍ठ साहित्‍यकार एवं पत्रकार है।

शताब्दी वर्ष              इस्मत चुगतईः एक दुस्साहसी नगमानिगार

- राजीव आनंद
    इस्मत चुगतई, जिन्हें 'इस्मत आपा' के नाम से भी जाना जाता है, उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादस्पद लेकिन सर्वप्रमुख लेखिका थी। इस्मत आपा ने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया। उन्होंने निम्न मघ्यवर्गीय मुस्लिम तबके की दबी-कुचली लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है


    इस्मत आपा का साहित्यिक फलक काफी व्यापक था जिसमें उन्होंने अपने अनुभव के विविध रंग को उकेरा है। अपनी उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' में उन्होंने अपने ही जीवन के अनुभवों को स्त्री के नजरिए से समाज को दिया है। अपनी कहानी 'लिहाफ' जिसके कारण वो खासी मशहूर हुई और आज भी है, उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए समलैंगिकता के मुद्दे पर कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था, जिसके लिए उन्हें अश्लीलता को लेकर लगाए गए इल्जाम और मुकदमें के रूप में चुकानी पड़ी थी। उन्हें कहानी 'लिहाफ' के लिए लाहौर हाईकोर्ट में समलैंगिकता के आरोप पर मुकदमा लड़ना पड़ा, ये अलग बात है कि इस्मत आपा झूकने के वजाए मुकदमा को लड़ी और मुकदमा अंतत जीत गईं। उन्होंने आज से लगभग आठ दशक पहले पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों के मुद्दों को स्त्री के नजरिए से संजीदा मगर चुटीले अंदाज में पेश करने का जोखिम उठाया था। साहित्य और समाज में चल रहे स्त्री विमर्श को उन्होंने आज से आठ दशक पहले ही प्रमुखता दी थी।


    अपने समय से आगे की सोच रखने वाली इस्मत आपा अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी वजह से उनके पात्र जिंदगी के बेहद करीब नजर आते हैं। महिलाओं के सवालों के साथ उन्होंने समाज की कुरीतियों, विसंगतियों, कुव्यवस्थाओं को अपने पात्रों के माघ्यम से बखूबी पेश किया। उन्होंने मुहावरेदार गंगा-जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे हिन्दी-उर्दू की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। उनके साहित्य में करारा व्यंग्य मौजूद है। उनकी रचनाओं में सबसे आकर्षित करने वाली बात उनकी साहसी शैली थी। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज के बारे में निर्भीकता से लिखा और उनकी इसी दृष्टिकोण की वजह से साहित्य में उन्हें खास मुकाम हासिल हुआ।


    इस्मत आपा की साहित्यिक उपलब्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उर्दू साहित्य के चार स्तम्भों में मंटो, कृष्ण चंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी के साथ इस्मत आपा भी शामिल हैं। ये भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि आलोचकों ने इन चार स्तम्भों में मंटो और इस्मत आपा को उंचे स्थान पर रखते हैं क्योंकि इनकी लेखनी से निकलने वाली भाषा, शैली, कथ्य और मुद्दे ने उर्दू साहित्य को नई पहचान और ताकत दी।


    इस्मत आपा अपने उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' के संबंध में कहतीं है कि ''कुछ लोगों ने ये भी कहा कि टेढ़ी लकीर मेरी आपबीती है, मुझे खुद से आपबीती लगती है। मैंने इस नॉवेल को लिखते वक्त बहुत कुछ महसूस किया। मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है। उनके साथ आँसू बहाए हैं और कहकहे लगाए हैं। उसकी कमजोरियों से जल भी उठी हूँ, उसकी हिम्मत की दाद भी दी है। उसकी नादानियों पर रहम भी आया है और शरारतों पर प्यार भी आया है। ऐसी हालत में अगर मैं कहूँ कि ये मेरी आपबीती है तो कुछ ज्यादा मुबालगा तो नहीं, और जगबीती और आपबीती  में भी तो बाल बराबर का फर्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस नहीं हो तो वह इंसान ही क्या ? और बगैर परायी जिंदगी को अपनाए हुए कोई कैसे लिख सकता है।'' इस्मत आपा आगे कहती हैं कि ''शम्मन की कहानी किसी एक लड़की की कहानी नहीं है। ये हजारों लड़कियों की कहानी है। उस दौर की लड़कियों की कहानी है जब पाबंदियों और आजादी के बीच एक खला में लटक रही थी। और मैंने ईमानदारी से उनकी तस्वीर इन सफात से खींच दी है ताकि आने वाली लड़कियां उससे मुलाकत कर सकें और समझ सके कि एक लकीर क्यों टेढ़ी होती है और क्यों सीधी हो जाती है।''


    15 अगस्त 1915 को उतर प्रदेश के बदायूँ में जन्मी इस्मत आपा ने दिल खोल कर निर्भीक ढ़ंग से लिखा। उनका पहला उपन्यास 'जिद्दी' 1941 में प्रकाशित हुआ तथा उनकी पहली कहानी 'गेंदा' सन् 1949 में उस दौर की उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका 'साकी' में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानी संग्रहों में 'चोटें, छुईमुई, एक बात, कलियाँ, एक रात, दो हाथ दोजखी, शैतान' है। उनकी प्रसिद्ध उपन्यासों में ' जिद्दी, टेढ़ी लकीर, एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, सौदाई, बहरूप नगर, जंगली कबूतर, बांदी, अजीब आदमी' प्रमुख है। 'कागजी है पैराहन' उनकी आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने बड़ी बेबाकी से हर कुछ लिखा है। इस्मत आपा ने अनेक फिल्मों की पटकथा लिखी और फिल्म 'जुगनू' में अभिनय भी किया था। उनकी पहली फिल्म 'छेड़छाड़' 1943 में रिलीज हुई थी। वे कुल तेरह फिल्मों से जुड़ी रही। उनकी आखरी फिल्म 'गर्महवा' 1973 में आई थी, जिसके लिए कैफी आजमी के साथ इस्मत आपा को 1975 में फिल्म फेयर का उत्कृष्ट कहानी का अवार्ड भी मिला था। उन्हें 'टेढ़ी लकीर' उपन्यास के लिए 1974 में गालिब अवार्ड से नवाजा गया था। 1982 में उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा 1989 के लिए राजस्थान उर्दू अकादमी ने 1990 में इकबाल सम्मान से नवाजा था।


    24 अक्टूबर 1991 में 76 वर्ष की उम्र में मुबंई में उनका देंहात हुआ। अपनी वसियत के अनुसार मुबंई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया। अपनी कालजयी कहानियां और उपन्यासों के लिए इस्मत आपा रहती दुनिया तक स्मरणीय रहेंगी।

 


राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड
संपर्क-9471765417

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