मंगलवार, 28 जुलाई 2015

2015 मैनबुकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता - लासलो क्रेस्नाहोरकोई : दर्द में सौंदर्य तलाशते लेखक

                      2015 मैनबुकर इंटरनेशनल प्राइज विजेता
          लासलो क्रेस्नाहोरकोई : दर्द में सौंदर्य तलाशते लेखक

हंगरी के लासलो क्रेस्नाहोरकोई को वर्ष 2015 का बुकर इंटरनेशनल पुरूस्कार उन्हें उपन्यास के क्षेत्र में हासिल किए गए बेहतरीन उपलब्धि के लिए दिया गया है। यह पुरूस्कार प्राप्त कर लासलो, इस्माइल केडेयर, चिनुआ असाबे, एलिस मुनरो, फिलिप रॉथ और लाडिया डेविस, जिन्हें क्रमशः 2005, 2007, 2009, 2011 और 2013 में यह पुरूस्कार दिया जा चुका है कि पंक्ति में शुमार हो गए हैं।
    लासलो के तीन उपन्यास शैतानटैंगों, मेलनकॉली ऑफ रेसिस्टेंस तथा वार एंड वार का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले हंगरी में रह रहे ब्रिटिश कवि जार्ज जिटेंस का मानना है कि ''लासलो की किस्सागोई विशाल काली नदी  है, जिसमें लावा शब्दों के रूप में बहती है, जो पाठकों को कई अंधेरी गुफाओं में विचरण के लिए ले जाती है।''


    एक अन्य सुप्रसिद्ध अमेरिकी आलोचक जेम्स वुड ''लासलो को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के महान लेखकों जैसे क्लाउड सिमोन, डेविड फास्टर वालेस, थॉमस बर्नहार्ड के समकक्ष मानते हुए कहते है कि लासलो अपने असाधारण रूप से लंबे, स्पंदनयुक्त कभी न रूकने वाले वाक्यों के कारण उक्त लेखकों से अलग उभर कर सामने आते है।''


    5 जनवरी 1954 को हंगरी में जन्में लासलो क्रेस्नाहोरकोई अपनी स्कूली शिक्षा के बाद कानून की पढ़ाई भी किया लेकिन संवेदना रहित कानून उन्हें ज्यादा दिनों तक आकर्षित न कर सका और वे साहित्य की खोज में लग गये। यू ंतो साहित्य में उनकी दिलचस्पी बचपन से ही थी लेकिन युवा होने के बाद अपनी मातृभाषा में लिखे साहित्य का उन्होंने गहन अघ्ययन किया। लासलो का कहना है कि ''वे हमेशा साहित्य को खोजते रहे और शायद साहित्य भी उन्हें खोज रहा था।'' साहित्य में रूचि होने के कारण लासलो ने लौरैंड विश्वविद्यालय में हंगरी के सुप्रसिद्ध लेखक सांडोर मारई के लिखे साहित्य पर अपना शोध ग्रंथ लिखा। अपनी शिक्षा हासिल करने के दौरन ही वे एक प्रकाशन संस्थान से जुड़े जिसकी वजह से वे हंगरी तथा अन्य देशों के अनेक साहित्यकारों के संपर्क में आए, जो भविष्य में उन्हें सदा के लिए साहित्य की दुनिया में ला खड़ा किया।


    फ्रेंज काफ्का को रोल मॉडल मानने वाले लासलो दीवानगी की हद तक काफ्का के साहित्य से जुड़े रहे हैं। लासलो कहते है कि ''वे अक्सर काफ्का के साहित्य को पढ़ते रहें हैं और जब वे काफ्का को नहीं पढ़ रहे होते हैं उस समय भी वे काफ्का के संबंध में ही सोचते रहे हैं। वे बहुत देर तक काफ्का के साहित्य से दूर नहीं रह सकते लिहाजा खाते-पीते, उठते-बैठते वे हमेशा काफ्का के ही किसी न किसी उपन्यास या कृति के सानिघ्य में रहते आए हैं।

काफ्का से दूरी उन्हें इतना बेचैन करता रहा है कि उन्हें तुरंत ही काफ्का के किसी उपन्यास की जरूरत महसूस होने लगती है और वे काफ्का को पढ़ने लगते हैं।'' यही वजह है कि पुरूस्कार मिलने पर लासलो सबसे पहले फ्रेंज काफ्का को धन्यवाद दिया उसके पश्चात उन्होंने दॉस्तोयेव्स्की, जिमी हैड्रिक, वीटल्स, स्कूल के उस अघ्यापक को जो उन्हें ग्रीक और लैटिन सिखाया, अपनी पहली पत्नी को जो उनके उपन्यासों को बकवास कहती रही तथा अपनी दूसरी पत्नी को जो उनके लिखे सभी कृतियों की हमेशा तारीफ करती रही, अपने प्रकाशक और अनुवादक का धन्यवाद ज्ञापन किया। भारत के लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपने धन्यवाद ज्ञापन में उन्होंने गौतम बुद्ध का भी नाम लिया, उनका कहना था कि गौतम बुद्ध ने उन्हें धर्म का मार्ग दिखाया।


    कहने की आवश्यकता नहीं है कि फ्रेंज काफ्का को अपना साहित्यिक नायक मानने वाले लासलो फ्रेंज काफ्का की ही तरह स्पंदनयुक्त लंबी-लंबी पंक्तियां लिखते रहें हैं। लासलो का कहना है कि ''अक्षर, जिनसे शब्द जन्म लेते हैं और फिर इन शब्दों से कुछ छोटी पंक्तियां, फिर कुछ और पंक्तियां, जो अक्सर बहुत लंबी हो जाती है, कई बार कई पन्नों जितनी लंबी। 35 साल से यही सिलसिला चल रहा है और मैं इन सालों में भाषा में सौंदंर्य तलाशता रहा हूँ। शायद नरक में जाकर ही मौजमस्ती का समय मिल जाए।''


    गरीबी या मुफलिसी जो भी कहा जाए पर यह सच है कि लासलो ने वो वक्त भी देखा है जब उनके पास लिखने के लिए मेज भी नहीं था और उन्हें अपने दिमाग में ही वाक्यों की रचना, पुर्नरचना, उसका संशोधन करने की आदत पड़ गयी थी और जब वाक्य स्वाभाविक रूप से पूरा हो जाया करता था तब उसे लासलो कागज पर उतार लिया करते थे। उन्होंने अपना सारा लेखन इसी तरह किया है और शायद आज भी ऐसे ही लेखन करते होंगे क्योंकि 'ओल्ड हैविट डाई हार्ड' यानी पुरानी आदत बड़ी मुश्किल से जाती है।


    1985 में प्रकाशित लासलो की प्रथम कृति 'शैतानटैंगो' उन्हें अपने देश में ही नहीं अपितु विश्व साहित्यिक फलक पर सितारे की तरह चमका दिया। इसी उपन्यास पर उनके मित्र तथा हंगरी के सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक बेला तार ने 1994 में इसी नाम से फिल्म बनाई, जिसकी पटकथा लासलो ने ही लिखा था। फिल्म काफी लोकप्रिय हुई थी और सराही भी गई थी। फिल्म की वजह से लोगों में मूल उपन्यास को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ गयी तथा उनके बाद के उपन्यासों में मेलनकॉली ऑफ रेसिस्टेंस, वार एंड वार, एनिमल इनसाइड, जो पढ़ चुके थे, 'शैतानटैंगों' पढ़ने के लिए उत्सुक और व्यग्र हुए। 'सियाबो देयर बिलो' लासलो की नयी कृति है जो इसी वर्ष मई महीने में इंग्लैंड में प्रकाशित हुई है, जिसमें जापानी देवी सियाबो पृथ्वी पर लौटती है।


    कई अर्थो में लासलो का पहला उपन्यास 'शैतानटैंगों', उनके बाद में लिखे गए उपन्यासों से भिन्न है। लासलो ने खुद ही इस 'भिन्नता' को स्पष्ट करते हुए कहा था कि ''उन्होंने 'शैतानटैंगों' अपने पाठकों के मनोरंजन के लिए नहीं लिखा था बल्कि यह उपन्यास उन्होंने उन लोगों के लिए लिखा था, जो दर्द देने वाले सौंदर्य को पंसद करते है, जो जिंदगी से पलायन नहीं करना चाहते बल्कि जिदगी को बार-बार जीना चाहते है और जिन्हें उपन्यास में अपनी खुद की भूमिका भी नजर आती है।'' लासलो कहते है कि ''हमारे पास महान साहित्य नहीं है लेकिन पाठकों को इसकी जरूरत है किसी औषधि या किसी छलावे के तौर पर नहीं बल्कि उन्हें किसी ऐसी लेखक की तलाश है, जो उन्हें यह बता सके कि ऐसी कोई औषधि है ही नहीं।''


    लासलो न सिर्फ एक उम्दा साहित्यकार है अपितु वे एक चिंतक, एक दार्शनिक भी हैं, जो अपनी आत्मकथ्य को प्रभावशाली ढ़ंग से समाज तक पहुँचाने की कोशिश करता है, जो अपने घोर निराशावाद तथा दुनिया से मोहभंग को एक तंजात्मक तरीके से नाटकीय अभिव्यक्ति देना चाहता है। लासलो की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि समकालीन विश्व साहित्य में नए-नए रूपकों, शिल्पों, स्वरूपों तथा अभिव्यक्तियों की खोज करते रहें हैं। उपन्यासकार एडम थिर्लवेल ने ठीक कहा है कि ''लासलो के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी बात कहने के लिए अपने खुद खोजे गए रूपकों, शिल्पों और स्वरूपों का प्रयोग किया है। समकालीन साहित्य में और कहीं भी ऐसा देखने को नहीं मिलता।''


    मैनबुकर इंटरनेशनल प्राइज मिलने से पहले लासलो को हंगरी का सर्वोच्च कोसुथ पुरूस्कार तथा अमेरिका का किसी अंग्रेजी में अनूदित विश्व का सर्वश्रेष्ठ कृति को दिया जाने वाला सुप्रसिद्ध पुरूस्कार हासिल है

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड
संपर्क-9471765417

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------