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ई-बुक : प्राची जुलाई 2015 - पाठकों के पत्र

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आपने कहा है

 

अंक संग्रहणीय होते हैं

आशा है स्वस्थ व सानन्द होंगे. प्राची नियमित रूप से मिल रही है. जैसा कि पूर्व में मैं अपना विश्वास व्यक्त कर चुका हूं कि फिलहाल प्राची भारत की दस सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में अपना स्थान रखती है. धरोहर कहानी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं की धरोहर रचनाएं पत्रिका के प्रत्येक अंक को संग्रहणीय बना देती हैं. आपका संपादकीय पत्रिका को चार चांद लगाता ही है. इन सब के अलावा पत्रिका का वक्त पर प्रकाशित होकर वक्त पर पाठक के हाथ में पहुंच जाना अक्सर विस्मय में डाल देता है. मां शारदा आपके संकल्प एवं जुनून को बनाए रखे, यही प्रार्थना करता हूं.

संजीव अग्रवाल, बक्सर (बिहार)

 

प्रकृति की सीमाओं में अतिक्रमण

वर्ष 2015 के आरंभ से प्राची नियमित पढ़ रहा हूं. वास्तव में आज जब हम साहित्य के हाशिये पर होने एवं पठनीयता के संकट जैसे मुद्दों पर चिंता प्रकट करते हैं तो हमें यह मानने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि हम लिखने पढ़ने वाले कथित बुर्जुआ लोगों ने ही कला और आधुनिकता के नाम पर और अपनी विद्वता प्रतिपादित करने की चेष्टा में साहित्य को विशिष्ट बना दिया. ‘प्राची’ को पढ़ते हुए यह लग रहा है कि यह भीड़ से अलग है. आदरणीय श्री भ्रमर जी के कुशल संचयन-संपादन में साहित्य की जन आकांक्षाओं के प्रति जवाबदेही स्पष्ट झलकती है. कहानियां ‘‘प्राची’’ की पहचान हैं. देश-विदेश के समकालीन रचनाकारों के साथ-साथ कहानियों की समृद्ध प्राचीन धरोहर से जो नगीने चुनकर आप हम पाठकों को परोसते हैं वह लाजवाब है. इस अंक में शामिल इवान तुर्गनेव, अमृता प्रीतम एवं टी जानकी रमण की कहानी अब तक कई-कई बार पढ़ चुका हूं. झकझोरती हैं ये कहानियां. हमें अपनी जीवन दृष्टि पर सोचने-पुनर्विचार करने को प्रेरित करती हैं. इन कहानियों को मैंने अपनी चर्चा का भी विषय बनाया और अपने परिचित मित्रों को भी पढ़ने को दिया.

दोस्तोवोस्की की एक कहानी में प्रेम और परिवार की अपेक्षाओं में उलझा नायक एकाधिक बार कहता है ‘विपत्ति आइए एक संवेदना आज के दौर में हमें क्या हो गया है. आज हम किस की बराबरी कर रहे हैं. जब मैं अपने आस-पास किसी ऐसी घटना को देखता हूं जो मानवता को चुनौती देती है तो सोचता हूं-हमारे अन्दर किस चीज की कमी है. आज हमारी खुद से लड़ाई है, जिस में अक्सर मानवता हार जाती है. ऐसा कौन सा जुर्म है, जिसकी सजा कानून में नहीं है. फिर क्यूं हम दूसरे के जुर्म की सजा कानून से पहले तय कर देते हैं. कुछ लोग जो ऐसा करते हैं उनकी वजह से कभी-कभी सारी मानवता शर्मसार हो जाती है. क्यूं हम प्रकृति के नियमों को तोड़ रहे हैं. अभी कुछ दिन पहले मैने एक वीडियो देखा जो आंन्ध्रप्रदेश से आया था. जिसमें एक लड़की को कुछ दबंग किस्म के लोग सरेआम जलाकर मार देते हैं. वीडियो देखकर ऐसा लगा जैसे वो आग उस लड़की के शरीर को नहीं जला रही थी, वो आग इंसानियत और मानवता को जला रही थी. मैं नहीं जानता उस लड़की का जुर्म क्या था. लेकिन इतना जानता हूं कि कोई भी जुर्म इंसानियत और मानव प्रेम से बड़ा नहीं है. फिर क्या हमारा कानून और संविधान ऐसा करने का अधिकार देता है. अगर ऐसा है, तो क्या अंतर है एक जुर्म करने वाले और हम में. क्या कानून कमजोर है? ऐसा करने वालों ने कानून और इंसाफ को चुनौती दी है. अगर यह कानून और समाज को नीचा दिखाने की कोशिश है तो यह समाज के लिए कंलकित भी है. हमें अपनी सोच को बदलना होगा. समाज में हो रहे गलत कामों के खिलाफ आवाज उठानी होगी. अपने कद से ज्यादा ऊंची अपनी सोच करनी होगी तभी हम एक सुंदर, सुसज्जित एवं शांतिप्रिय समाज का निर्माण कर पायेंगे.

इंदर सिंह (तपस्या),नई दिल्ली

 

मुखपृष्ठ अत्यंत आकर्षक है

प्राची मासिक अप्रैल 2015 में कृश्न चन्दर की कहानी ‘गुलदुम’ में बूढ़ा शिकारी ‘‘अब्दुल्ला आग तापते हुए अपनी नीली-नीली आंखें घुमाकर’’ चार पंक्तियों का लंबा वाकय प्रवाहमय है. ‘नीली आंखों वाली लड़की’ उपन्यास एक अन्य लेखक ने लिखा है. इस अंक का मुखपृष्ठ अत्यंत आकर्षक है. इस माह वर्षा हो जाने से किसानों की गेहूं की फसल नष्ट हो गयी है. बालिका को गेहूं की फसल में देखकर आकाश से बरसे आपदा (वर्षा) की ओर ध्यान बरबस चला जाता है. बालिका के सारे सपने गेहूं की बालियों अकेले नहीं आती’. आपने आम जन-किसानों के सन्दर्भ में सम्पादकीय में यही बात उठाई है. यदि आपदा प्राकृतिक भी है तो हमारे द्वारा उत्पन्न पारिस्थितिक असंतुलन इसके लिए जिम्मेदार है. हम ही प्रकृति के सीमाओं का अपने हित में अतिक्रमण कर रहे हैं. कंक्रीट के जंगलों के लिए वन-संपदा का दोहन. अपने मनोरंजन के लिए पहाड़ों पर रिसोर्ट और समंदर में रेल और संग्रहालय बनाने की हमारी होड़ कहीं न कहीं तो बैक फायर करेगी ही. प्रेमचंद के किस्सों के किसान आज भी जस के तस हैं और जमींदार अपनी जमीन बिल्डरों को बेच शहरी हो गए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा के खेतिहर इलाके अब ढोल डांगर के लिए नहीं अपितु अपने ऊंचे कंक्रीट टावरों और मेट्रो के लिए जाने पहचाने जाने लगे हैं. पहाड़ों का टूटना, भूकंप और असमय वर्षा जैसी स्थितियां मानव को प्रकृति की चेतावनी हैं. वरना एक दिन खोखले विकास के नाम पर हमारे पास आधुनिक भवन, सड़कें और साधन तो होंगे लेकिन खाने को अन्न नहीं. मैगी, पित्जा और बर्गर भी अनाज से बनते हैं, ये बात इक्कीसवीं सदी की नर्सरी पढ़ी-पीढ़ी नहीं तो कम से कम हम तो जानते हैं. मिलें हवा से नहीं चलतीं. प्राची के मई अंक में संगृहित गजलें, कवितायें, आलेख और स्तम्भ सभी पसंद आये. साधुवाद आपका.

अभिनव अरुण, वाराणसी (उ.प्र.)

 

सुन्दर और वैचारिक रचनाएं

प्राची मासिक पत्रिका अप्रैल 2015 आज दिनांक14 अप्रैल बैशाखी और गरीबों के मसीहा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयन्ती के शुभ अवसर पर मिली. पढ़ कर बहुत आनन्द आया. इसमें लिखी सभी रचनाएं, गजल, लेख एवं कहानियां बहुत अच्छी व सुन्दर वैचारिक हैं. खासकर यूसुफ खान साहिल की गजलें- ‘गर्दिश-दौर में...मुफलिस की कीमत आंकता कौन है’ और ‘सता ले दुनिया...पाएगी मुझे मिटा कर.’ रतन सिंह की कहानी ‘दिल-दरिया’ जिसमें प्यार भावना, सेवा, मिट्टी की खुशबू और निर्मल जल ने मुझे खूब भावविभोर किया. वैसे तो सभी लेख और रचनाएं भी कम नहीं है पर मुझे गजलों का बहुत शौक है जो कि गजल काफी दिलचस्प हैं- ‘जान के जी...अब न कुछ दीं ही रहा बाकी न इंसा ही रहा.’ बहुत सुन्दर है. इन सब को पढ़ कर मेरे दिमाग में भी एक गजल आ गई-

ऐ खुदाया तेरी खुदाई देख ली.

नजर से नजर की जुदाई देख ली.

प्यार लुटाता है खूब औरों पर,

अपनों से मिली तन्हाई देख ली.

लोग कहते हैं तू है बड़ा रहमान,

करके भी तुमसे बहुत दुहाई देख ली.

हकीकत से भागते हैं सब ही दूर,

अमीरी गरीबी के बीच खाई देख ली.

‘राज’ जी रहा था प्यार के भरम में,

मैंने यहां कर के भलाई देख ली.

प्राची के सभी सदस्यों, संचालकों और संपादकों को बहुत बहुत बधाई. खासकर डॉ. भावना शुक्ल, सहायक संपादिका को ढेर सारी बधाई व साधुवाद जिनके सौजन्य से मुझे इस पत्रिका को पढ़ने का अवसर मिला. साथ में अपनी धर्मपत्नी सुषमा भण्डारी जी का भी धन्यवाद व शुक्रिया जो इस पत्रिका की सदस्य हैं.

राजेंद्र ‘राज’ भण्डारी, नई दिल्ली-110075

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संपादक

राकेश भ्रमर

rakeshbhramar@rediffmail.com

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