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ई-बुक - प्राची, जुलाई 2015 : स्वातंत्र्योत्तर उपन्यास

साहित्य

उपन्यास लेखन पर विशेष (दो अंकों में)

अंतिम भाग

 

स्वात्रंत्योत्तर उपन्यास

मधुरेश

 

मनोहर श्याम जोशी

मनोहर श्याम जोशी अपने ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ (1980) से उपन्यास की ओर आए. रचनावस्तु से अधिक यह अपनी प्रयोगशीलता के कारण चर्चित हुआ- विवादास्पद होने की सीमा तक. यह उपन्यास के स्वीकृत और उपलब्ध ढांचे को तोड़ता है और व्यक्तित्व के विघटन की त्रासदी को पर्याप्त खिलंदरे अंदाज में उद्घाटित करता है. इसकी अपेक्षा कुमांयूनी जीवनी की पृष्ठभूमि में, एक प्रेम-कथा के रूप में लिखित ‘कसप’ (1981) अधिक सार्थक एवं संभावनापूर्ण रचना का उदाहरण है. लेकिन एक प्रेम-कथा के रूप में परिकल्पित होने के बावजूद ‘कसप’ उससे अधिक कुछ है. अपनी प्रकृति में वह एक पहाड़ी नदी जैसा है जो निकलते समय महज एक पतली सी धार भर होती है. ‘कसप’ में मनोहर श्याम जोशी ने कुमायूं के मध्यवर्गीय समाज को उसके सारे आकर्षण और अंतर्विरोधों के साथ अंकित किया है. ‘कसप’ का यह प्रीतिकर विस्तार ही उसे एक विशिष्ट और सार्थक रचना बनाता है-खासकर ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ की तुलना में. लेकिन अपने बाद के उपन्यासों-‘हरिया हरकुलिस की कहानी’ (1994) और ‘हमजाद’ (1996) में वे फिर ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ की तुलना में प्रचलित फॉर्म को तोड़ने की जिद, जुमलेबाजी और शब्दों से खेलने की प्रवृत्ति इनमें सब कहीं देखी जा सकती है. सुधीश पचौरी ने ‘हमजाद’ को उत्तर-आधुनिकता की प्रतिनिधि रचना के रूप में उछालने की कोशिश भी की. हो सकता है उत्तर-आधुनिकता सचमुच यही हो. ये दोनों उपन्यास अशोभन और विकृत के प्रति अपने गैर-रचनात्मक उत्साह के कारण ही चर्चा में अधिक रहे हैं, उछालकर कुल मजा लेने के अंदाज में.

स्वाधीनता ने लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को तोड़ा था और लगभग समूचे देश को हताशा और मोहभंग की एक ऐसी अंधी सुरंग में धकेल दिया था जिसमें घुटन, बेबसी और अंधेरे के सिवा कुछ नहीं था. लेकिन सब कुछ के बावजूद उसने समाज की जड़ता को एक झटके से ही तोड़ दिया और विभाजन की विभीषिका के बाद जब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हुई तो कुल मिलाकर ऐसा भी लगा कि हम एक पर्याप्त बदले हुए परिवेश में हैं. पुनर्वास और रोजी-रोटी के लिए पंजाब से आए लोगों के संघर्ष में पुरुषों के साथ स्त्रियां भी शामिल थीं. लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई के अधिक अवसर थे और काम-काजी महिलाओं के तौर पर धीरे- धीरे उनकी एक नई पहचान बन और उभर रही थी. शिक्षा और नौकरी की संभावनाओं ने और पंजाबी समाज एवं संस्कृति के अपेक्षाकृत खुलेपन और वर्जनाहीनता ने उत्तर भारतीय समाज को भी गहराई से प्रभावित किया था. लड़कों की बेरोजगारी की तुलना में लड़कियों के लिए नौकरी के अवसर अधिक थे. इस कारण घर-परिवार और समाज में उनकी परम्परागत स्थिति में अंतर आना स्वाभाविक था. कुल मिलाकर पहली बार उन्हें एक ऐसी पहचान मिल रही थी जिसमें उनके अधिकार और आत्मविश्वास की विशिष्ट भूमिका थी. स्वाधीनता के पूर्व और बाद साहित्य के क्षेत्र में महिलाओं के अनुपात और उनके लेखन में आए लेखिकाओं के लिए आत्माभिव्यक्ति को प्रेरित किया और उन्होंने अपने और अपने परिवेश के प्रति एक भिन्न, खुली और मुक्त दृष्टि से लिखा. उपन्यास के क्षेत्र में भी आम तौर से वे ही लेखिकाएं सामने आईं जो नई कहानी आंदोलन में अपनी पहचान बनाकर स्त्री-लेखन को एक सीमित दायरे से बाहर ला चुकी थीं. इस लेखन का विस्तार और पार्ट किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता है. कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा, मन्नू भण्डारी और काफी-कुछ शशि प्रभा शास्त्री को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए-

 

कृष्णा सोबती

आंचलिकता के आंदोलन के संदर्भ में इस ओर संकेत किया जा चुका है कि भले ही अपने अंतर्निहित अंतर्विरोधों के कारण वह आंदोलन अल्पजीवी रहा हो, लेकिन साहित्य पर उसका प्रभाव पर्याप्त दूरगामी था. अनेक विशिष्ट, अल्प परिचित और सुदूरवर्ती क्षेत्रों के पात्रों, भाषा और परिवेश से साहित्य को एक ऐसा प्रीतिकर विस्तार मिला जो पहले या तो था नहीं, या फिर बहुत सीमित रूप में ही मौजूद था. इस रचनात्मक पहल ने अनेक संभावनाओं का उद्घाटन किया. अपने पहले उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ (1958) में ही कृष्णा सोबती ने पंजाब की खास मिट्टी से बनी जिस नायिका को प्रस्तुत किया वह अपनी त्वचा और उसके नीचे रंगों में बहते खून के प्रति बहुत सच्ची और ईमानदार है. कृष्णा सोबती की नायिकाएं बिना किसी प्रगल्भ प्रदर्शन के अपनी देह की सत्ता और गरिमा को पहचानती हैं. अपनी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति को ढंकने-तोपने में विश्वास न करके वे भारी जोखिम और भर्त्सना झेलकर भी, धरती से फूटे अंकुर की तरह, उसे बाहर आने का अवसर देती हैं. ‘मित्रों मर जानी’ भले ही एक लंबी काहनी के रूप में चर्चित रही हो, लेकिन मित्रों की देह-धर्म की स्वीकृति उनके रचनात्मक सरोकारों को समझने के लिए कदाचित् सबसे अच्छा उदाहरण है. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ (1972) ‘जिंदगीनामा’ (1979) और ‘दिलोदानिश’ (1993) में अपनी नायिकाओं की इसी परम्परा को वे विस्तार देती हैं.

स्त्री-स्वाधीनता और नारी मुक्ति के सवाल को वे अपनी धरती और मिट्टी से जोड़कर देखती हैं और समूचे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उसकी अनिवार्यता को रेखांकित करती हैं. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ की रत्ती अपने प्रति बचपन में किए गए अत्याचार को ही अपने परवर्ती विचलन का आधारभूत कारण मानती है. देह के प्रति बरती गई क्रूरता ने ही देह के प्रति उसे उदासीन बना दिया है और बाद में दिवाकर के रूप में लौट आती है. कृष्णा सोबती का ‘जिन्दगीनामा’ पंजाब की लोक-संस्कृति की गंध से तो सराबोर है ही, वह एक तरह से उस सांझा-संस्कृति के प्रति उनके ॠण-शोध का भी प्रयास है जो उनके संस्कारों में खून की तरह रची-बसी है. इस संदर्भ में वे बलवंत सिंह के पर्याप्त निकट पड़ती हैं. बलवंत सिंह यदि अविभाजित पंजाब के पौरुष, जवांमर्दी और जिंदादिली को अंकित करते हैं तो कृष्णा सोबती पंजाब की सोंधी गंध और संवेदना में रची स्त्री के कद्दावर और चुनौतीपूर्ण रूप को. कृष्णा सोबती ने ‘जिंदगीनामा’ के केंद्र में भले ही शाहनी को रखा है, लेकिन यह पंजाब में हिंदू-मुसलमानों की सांझा-संस्कृति के बीच के लंबे काल-खण्ड में घटित सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को बहुत प्रामाणिक रूप में अंकित करता है. अन्याय के प्रति हथियार उठाने वाली प्रतिरोध-चेतना, जो सिक्खों का मूलधर्म है, ही ‘जिंदगीनामा’ के फलक को एक उल्लेखनीय विस्तार देती है. उसके केंद्र में भले ही एक गांव है-डेरा जट्टां-लेकिन उसके तीज-त्यौहार, मेले-उत्सव पर्व प्रयोजन और सामाजिक-राजनीतिक चेतना पूरे पंजाब की जिंदगी को मूर्त करते हैं.

अपने इसी अर्थ विस्तार के कारण वह जिंदगीनामा है-पंजाब की सांझा और संश्लिष्ट संस्कृति का जिंदगीनामा ‘दिलो दानिश’ दिल्ली की पृष्ठभूमि में लिखा गया है. इसमें उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बींसवी शताब्दी के शुरू की दिल्ली है-इंसानी रिश्तों को अर्थ देती. अतीत के काल-खण्ड को अपनी रचना की पृष्ठभूमि के रूप में उठाकर ‘कृष्णा सोबती’, चाहे वह ‘जिंदगीनामा’ का अविभाजित पंजाब हो या फिर ‘दिनोदानिश’ की दिल्ली, उस पर ऐतिहासिक प्रामाणिकता की गहरी पच्चीकारी करती हैं. ‘दिनोदानिश’ में वे प्रेम और परिवार के तनाव के बीच उस स्त्री को संपूर्णता में अंकित करने का प्रयास करती है जिसे उस दौर में ‘रखैल’ कहा जाता था. वकील परम नारायण अपने पेशे के सिलसिले में महक बानो के संपर्क में आते हैं और यह संपर्क एक जटिल और नाजुक रिश्ते में बदल जाता है जिसमें परिवार, धर्म और सम्प्रदाय सब होते हुए भी जैसे नहीं हैं. यह महक बानो के ‘औरत’ होने की कहानी है-जब वह अंगिया, ओढ़नी और सलवार से भिन्न एक स्वतंत्र और फैसला लेने वाली औरत के रूप में संघर्ष करके अपनी पहचान बनाने में सफल होती है.

 

उषा प्रियंवदा

उषा प्रियंवदा नई कहानी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटक रही हैं-रचनात्मक स्तर पर नई कहानी की प्रकृति को समक्झने के लिए उनकी कहानियों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है. अपनी एक चर्चित कहानी ‘‘पचपन खंभे लाल दीवारें’’ को ही विस्तार देकर उन्होनें उपन्यास का रूप दिया जो 1961 में प्रकाशित हुआ. नई कहानी में प्रतीक विधान के प्रति लेखकों के गहरे आकर्षण में यह उपन्यास भी अछूता नहीं है. कहानी लड़कियों के एक होस्टेल पर केंद्रित है. पचपन खंभों और लाल दीवारों वाली होस्टेल की यह विशाल इमारत, अपनी सारी विराटता के बावजूद, रूढ़ियों, प्रवादों और बंधन की प्रतीक है जहां सुषमा को अपने से उम्र में कुछ छोटे नील से मिल पाने तक की छूट नहीं है. उनका प्रसंग शीघ्र ही अनेक प्रकार के प्रवादों का शिकार होता है.

एक परम्परागत बंद समाज में युवामन की आकांक्षाओं और वर्जना के तनाव को, सुषमा के माध्यम से लेखिका ने संवेदना और विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत किया है. उषा प्रियंवदा ने सिर्फ तीन उपन्यास लिखे हैं. इसके बाद, लंबे काल-खण्ड में उनके दो उपन्यास और प्रकाशित हुए-‘रुकोगी नहीं...राधिका’? (1967) और ‘जय-यात्रा’ (1984), ये उपन्यास एक तरह से लेखिका की अपनी मनःस्थिति का ही ग्राफ प्रस्तुत करते हैं. नई कहानी आंदोलन के बाद ही उषा प्रियंवदा बाहर चली गई थीं-फुल ब्राइट स्कॉलरशिप पाकर. फिर वे वहीं अमेरिका में बस गई. रुकोगी नहीं...राधिका? की राधिका एक ऐसी भारतीय युवती है जो अमेरिकी समाज में अपने को बहुत सहज नहीं पाती और जब वह लम्बे प्रवास के बाद भारत लौटती है तो यहां भी घर परिवार, समाज और देश की स्थितियां बहुत भिन्न हैं. इस उपन्यास से संबंधित एक संस्मरणात्मक टिप्पणी में वे लिखती हैं, हर बार भारत आने पर मैं वही अनुभूतियां जीती हूं जिन्हें मैंने राधिका में डाला. राधिका, उसकी भाव-भूमि, उसके विचार उसके मानदण्ड, उसकी संवेदनाएं उसकी रुचियां, उसके विद्रोह, यह बस मेरे अंदर शायद बरसों से संचित होता आ रहा था’ (आधुनिक उपन्यास, सं. भीष्म साहनी, पृ. 271) राधिका को औचट अकेलापन कहीं न कहीं लेखिका की अपनी मनोदशा का ही प्रतिफल था. लेखिका ने स्वीकार किया है कि, जिसे राधिका के संदर्भ में इलेक्ट्रा-कॉम्प्लेक्स कहा जाता रहा है, पिता के प्रति अचेतन में उसका वह लगाव एक तरह से भारत के प्रति उसकी व्यग्रता का ही एक रूप था. भारतीय परिवेश में जैसे राधिका अपने को ही खोजने और पाने का प्रयास करती है और जब वैसा नहीं हो पाता है तो, गहरे संशय और तनाव के बीच, वह वापस लौट जाती है.

उषा प्रियंवदा अमेरिकी समाज को पर्याप्त आलेाचनात्मक दृष्टि से देखती है. नई पुस्तक ‘शून्य तथा अन्य रचनाएं’ में भारतीय पाठकों को अमेरिका से लिखे उनके कुछ पत्र संकलित हैं. इनमें से एक पत्र में वे अमेरिकी समाज में स्त्री की विडंबनापूर्ण नियति का उल्लेख करती हैं. सिगरेट के एक विज्ञापन का हवाला देते हुए वे बताती हैं कि जब अमेरिकी युवती खुल्लम खुल्ला सिगरेट पीने को स्वतंत्र है, लेकिन उसे वह स्वतंत्रता अभी भी हासिल नहीं है जो तीसरी दुनिया या विकासशील देशों की स्त्रियों को प्राप्त है. अभी दो वर्ष पहले तक वहां स्त्री का वेतन, एक ही काम के लिए पुरुषों के वेतन से तीस प्रतिशत कम होता था. उस बहुतायत वाले समाज में स्त्रियों को वह सब अप्राप्य बना है, जो हमारे यहां उनका अधिकार बन चुका है. अपने ‘जय-यात्रा’ में वे अमेरिकी समाज और जीवन के प्रति एक प्रवासिनी भारतीय युवती अनु के आकर्षण को अंकित करके उसकी आधारभूत विडंबनाओं का उद्घाटन करती हैं.

मन्नू भण्डारी

उपन्यास के क्षेत्र में मन्नू भण्डारी का हस्तक्षेप राजेंद्र यादव के साथ लिखित सहयोगी उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ (1962) से शुरू होता है-जब अपनी कहानियों से वे पर्याप्त ख्याति पा चुकी थीं. ऐसे प्रयोगशील और सहयोगी उपन्यासों की अपनी सीमाएं होती हैं. सीमाएं यहां भी स्पष्ट हैं. लेकिन उपन्यास के लिए स्वीकृति देने के पीछे उनके मन में कहीं यही भाव था कि पुरुष-दृष्टि से भिन्न, अपनी दृष्टि से लेखिका को अपनी स्त्री-पात्रों को संवारने-सहेजने का अवसर मिलेगा. राजेंद्र यादव के सारे कथित असहयोग के बावजूद, मन्नू भण्डारी द्वारा लिखित अंश अधिक सहज और स्वतः स्फूर्त बन पड़े हैं. लेकिन एक उपन्यासकार के रूप में उनकी वास्तविक पहचान उनके दो स्वतंत्र परवर्ती उपन्यासों से ही बनती है-‘आपका बंटी’ (1971) और ‘महाभोज’ (1979) से. ‘आपका बंटी’ स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में, बदले हुए स्त्री-पुरुष संबंधों के परिप्रेक्ष्य में, संबंध-विच्छेद की त्रासदी को बच्चे की दृष्टि से देखने का प्रयास है. बहुत सी आवर्जनाओं और निषेधों से मुक्त होकर अपनी जिंदगी पर अपना अधिकार मानकर जीने की प्रवृत्ति इस समाज में तेजी से विकसित हुई है.

शकुन और जय, अपने-अपने प्रसंग में, संबंध-विच्छेद की इस जटिल प्रक्रिया से गुजर कर फिर काफी-कुछ सामान्य जीवन जीने की स्थिति में आ जाते हैं. लेकिन बंटी के साथ ऐसा नहीं होता. अलग-अलग परिवेशों में अंकित बंटी की मानसिकता में घटित परिवर्तन वस्तुतः उसके विकास के अलग-अलग स्तर हैं जो एक निश्चित क्रम में ही सार्थक हैं. इस परिवेश से भागकर भी मुक्ति की राह जैसे उसके लिए बंद है. बंटी इस पूरे उपन्यास का नियोजक सूत्र है और अंततः शकुन ही उसके बारे में सही दृष्टि अपनाने में सफल होती है-जिसमें उसे माध्यम के रूप में समझे जाने के बजाय उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वीकृति पर बल दिया गया है. बंटी के आंतरिक संसार को अंकित करने के लिए लेखिका ने बहुत सहज ओर अनारोपित शिल्प अपनाया है. उसका संपूर्ण जादुई संसार, परी-जगत और राजकुमार-राजकुमारियों की कहानियां, पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां तक एक विशिष्ट भूमिका ग्रहण करते दिखाई देते हैं. कॉलेज के बंगले से केवल पौधे ही नहीं उखाड़े जाते हैं, बंटी भी उखाड़ता है-ठीक उन्हीं पौधों की तरह. शशियां सिर्फ उसके रंगों की ही नहीं टूटती हैं, उसकी अपनी जिंदगी के भी सारे रंग बिखर जाते हैं. और ये सारे संकेत उपन्यास के टेक्सचर का एक जरूरी हिस्सा बनकर आते हैं.

मन्नू भण्डारी का ‘महाभोज’ अंतर्वस्तु के विस्तार का एक विस्मयकारी और अभूतपूर्व उदाहरण है. महिला-लेखक और लेखन की परम्परागत छवि को वह एक झटके से ध्वस्त करता है. भारतीय राजनीति के अमानवीय चरित्र पर इससे तीखी टिप्पणी मुश्किल है. कमलेश्वर के ‘काली आंधी’ के साथ रखकर इस अंतर को आसानी से समझा जा सकता है. भारतीय समाज में, राजनीतिक जीवन में घुसपैठ करती मूल्यविहीनता और तिकड़म को ‘महाभोज’ गहरी संलग्नता के साथ उद्घाटित करता है. दा-साहब के दोहरे व्यक्तित्च को, उनके अंदर के शैतान और ऊपर के सत-रूप को, मन्नू भण्डारी ने आश्चर्यजनक विश्वसनीयता से साधा है. विसेसर, बिंदा ओर हीरा उस दलितवर्ग के प्रतिनिधि पात्र हैं जिनके शव पर राजनीति के गिद्ध जीम रहे हैं.

 

शशिप्रभा शास्त्री

शशिप्रभा शास्त्री ने भी स्वाधीनोत्तर भारतीय समाज में स्त्री जीवन की समस्याओं को केंद्र में रखकर अनेक उपन्यास लिखे हैं. उनके उपन्यासों में ‘अमलतास’ (1968) ‘नावें’ (1974) ‘सीढ़ियां’ (1976) ‘उम्र एक गलियारे की’ (1989) और ‘मीनारें’ (1992) आदि का उल्लेख किया जा सकता है. वे स्त्री को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अंकित करती हैं और सामाजिक संदभरें के बीच ही उसके अस्तित्व को अर्थ देती हैं. रचनावस्तु और सर्जनात्मकता के स्तर पर वे भले ही किसी विस्फोटक उपलब्धि का कोई साक्ष्य प्रसतुत न कर पाती हों, लेकिन नारी के संघर्ष और तनाव की एक विश्वसनीय उपस्थिति उनके यहां र्प्याप्त आश्वस्तकारी है. प्रेमानुभाव की जटिलता को ‘सीढ़ियां’ प्रमाणिकता के साथ अंकित करता है. ‘उम्र एक गलियारे की’ की सुनंदा-पुरुष के वर्चस्व के विरोध में एक सक्रिय प्रतिरोध बनकर उपस्थित है. देवेश और नवल के बीच फंसी सुनंदा के मनोद्वन्द्व को लेखिका ने संवेदना और हार्दिकता से अंकित किया है. सुनंदा इस सत्य को संप्रेषित कर पाने में अंततः सफल होती है कि...‘नारी की जिंदगी समतल जमीन नहीं है, उसके नीचे मरुस्थल, पहाड़, खाइयां बहुत कुछ होते हैं’...(उम्र एक गलियारे की, पृ.41) नारी की संपूर्णता का यह आग्रह ही, समूचे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में, वस्तुतः शशिप्रभा शास्त्री को इस दौर की एक उल्लेखनीय लेखिका बनाता है.

स्वाधीनता के बाद के भारत में एक ओर यदि राष्ट्रीय विकास के समाजवादी नारों और परियोजनाओं का शोर था, वहीं समूचा समाज एक जनविरोधी राजनीति की गिरफ्त में फंसता जा रहा था. रजवाड़ों और सामंती परिवारों के लोग बाकायदा राजनीति में उतर रहे थे और सत्ता की राजनीति सामंतवाद के नए टापुओं में बदल रही थी. यह दौर मुख्य रूप से क्षमता और प्रतिभा के अनादर का दौर है. जैसी स्थितियां थीं, उनमें अच्छाई के प्रति एक गहरी होती उदासीनता को देखा जा सकता है. यह राजनीति के व्यवसाय और उद्योग में बदलने का दौर है जिसका संकेत मन्नू भण्डारी के ‘महाभोज’ में होने की चर्चा की जा चुकी है. सारी संवेदना के क्षरण के बाद वहां राजनीति एक क्रूर और पथराए हुए चेहरे में बदल रही है. स्वाधीनता के बाद को उपन्यास सामाजिक विद्रूपताओं के विविधवर्गी यथार्थ को पर्याप्त विश्वसनीय रूप में उभारने ओर अंकित करने की कोशिश करता है-अपने सारे विचलन और भटकाव के बावजूद. इस यथार्थ के प्रतिनिधि लेखकों में कमलेश्वर, गिरीश अस्थाना, शिवप्रसाद सिंह, शानी, मार्कण्डेय, हृदयेश, बदीउज्जमां, गिरिराज किशोर और जगदीश चंद्र आदि का उल्लेख किया जा सकता है.

 

कमलेश्वर

नई कहानी आंदोलन में कमलेश्वर की भूमिका के विशेष उल्लेख का यहां कोई अवसर नहीं है. कस्बई जीवन के यथार्थ को उनकी उस दौर की कहानियां गहरी मानवीय संवेदना के साथ अंकित करती हैं. इसी कस्बई पृष्ठभूमि पर उनका पहला उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियां’ (1957) ‘हंस’ के अमृतराय और बाल कृष्ण राव द्वारा संपादित अर्द्धवार्षिक संकलन में संपूर्ण रूप में प्रकाशित हुआ था. इसमें उनके अपने सुपरिचित क्षेत्र एटा-मैनपुरी के जन-जीवन का अंकन अनेक प्रकार की संभावनाएं जगाने में सफल हुआ था. जाति और बिरादरी के खानों में बंटी मानवता के उत्तरदायी कारणों को उन्होंने सही परिप्रेक्ष्य में देखने और पहचानने की कोशिश की थी. लेकिन आगे चलकर कमलेश्वर इन संभावनाओं और अपनी प्र्राथमिकताओं के बीच जिसका चयन करते हैं वह सब रचनात्मकता की दृष्टि से र्प्याप्त दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध होता है. नई कहानी के आंदोलन के एक प्रमुख सूत्रधार की भूमिका उनकी सर्जनात्मकता को प्रभावित करती है और उन्हें एक सफल सेल्समैन की भूमिका में बिठा देती है. वे मार्क्सवाद और वामपंथी शक्तियों के नाम पर सत्ता के समर्थन और सहयोग की राजनीति में उतर जाते हैं. ‘लौटे हुए मुसाफिर’ (1961) में वे फिर भी पाकिस्तान के नाम पर छले गए आर्थिक दृष्टि से विपन्न मुसलमानों की यातना को अंकित करने का प्रयास करते हैं. ‘डाक बंगला’ (1959) में वे औरत को ही डाकबंगला में बदल देते हैं-विवशताओें के नाम पर उसके स्वेच्छावार का तर्क तलाशते हुए. ‘काली आंधी’ (1967) से संबंधित अपने वक्तव्य में वे रजवाड़ों के विरुद्ध कांग्रेस के अपने समर्थन को प्रगतिशीलता का तर्क देते हैं, लेकिन राजनीति के व्यवसायिक और रोमानी उपयोग ने ‘काली आंधी’ को कभी राजनीतिक विद्रूपताओं से वैसी मुठभेड़ की संभावना नहीं पैदा की, जैसा महिला होने के बावजूद मन्नू भण्डारी ‘महाभोज’ में करती हैं. ‘तीसरा आदमी’ (1960) और ‘आगामी अतीत’ (1976) में वे स्त्री-पुरुष संबंधों के सुरक्षित शरण्य में चले जाते हैं और उपन्यासों की व्यावसायिक संभावनाएं तलाशने लगते हैं. इसमें वे निःसंदेह सफल भी होते हैं.

 

गिरीश अस्थाना

गिरीश अस्थाना का ‘धूल भरे चेहरे’ (1956) रिक्शा चालकों पर केंद्रित हैं. आस-पास के गांवों से शहर आकर रिक्शा मालिकों और पुलिस के दोहरे शोषण को शिकार हो कर वे बीमारी, विपन्नता और अभाव में ही समाप्त हो जाते हैं. ‘धूल भरे चेहरे’ उपन्यास वस्तुतः जीवन के नए क्षेत्र और विषय की तलाश का उदाहरण है. रचनात्मक और वैचारिक प्रौढ़ता के साक्ष्य के रूप में उनका ‘धूपछांही रंग’ (1970) अधिक बड़ी संभावनाओं को संकेत देता है. उपन्यास दो भागों में है. उसके पहले खण्ड की दुनिया महायुद्ध की विभीषिका और आतंक की दुनिया है और दूसरे खण्ड की दुनिया एक व्यवसायिक संस्थान की क्षुद्रताओं और स्वार्थों की. इन दोनों संसारों का दर्शक और भोक्ता सुकांत है.

अपनी पारिवारिक विवशताओं के कारण कभी वह ब्रिटिश सेना की नौकरी करता है तो कभी व्यापारिक प्रतिष्ठान की. परन्तु मूल-रूप से वह एक चित्रकार है और अपने इसी कलाबोध के कारण इन अनुभव क्षेत्रों की वास्तविकता को गहराई और वस्तुपरकता से देख पाता है. उसकी संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा ही उसको कहीं टिकने नहीं देतीं. अंततः वह अपनी कला की दुनिया में लौट आता है. युद्ध के दौरान वह गोरों और भारतीय सैनिकों के बीच किए गए भेदभाव का साक्षी रहा है और इसी तरह व्यापारिक प्रतिष्ठान की क्षुद्र एवं टुच्ची दुनिया को भी उसने उसमें धंस कर देखा है. कला की सोद्देश्यता पर बात करते हुए वह एक जगह जौहरी से कहता है, ‘सचमुच इस कुरूप, वीभत्स दुनिया को एक बड़े सर्जिकल आपरेशन की जरूरत है...’ (धूपछांही रंग, पृ. 510) लेकिन प्रतिष्ठान के कुछ प्रमुख व्यक्तियों का व्यंग्य चित्रों के अलावा कहीं भी वह सोद्देश्यता का उपयोग नहीं करता है. उपन्यास फ्लैश बैक में है. अनेक ऐसे प्रसंग भी, जैसे सिल्विया और वॉकर का प्रसंग, उसकी स्मृति का अंग बनकर आए हैं जिनका सुकांत न तो द्रष्टा है, न ही भोक्ता. ‘धूपछांही रंग’ जैसे व्यापक फलक वाले उपन्यास के लिये रचनाशिल्प अधिक संगत नहीं लगता. पाकिस्तान जा चुकी शहनाज की स्मृतियों के बीच भी, सुकांत के रूप में, एक कलाकार के पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन के अंकन की दृष्टि से यह एक उल्लेखनीय उपन्यास है.

 

शिव प्रसाद सिंह

जब शिव प्रसाद सिंह का पहला उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ (1967) प्रकाशित हुआ तो नई कहानी में ग्राम बनाम शहरी कहानी का विवाद ही नहीं, वह पूरा आंदोलन ही समाप्त हो चुका था. आंचलिक उपन्यासों के प्रति अतिरेकपूर्ण आकर्षण भी बीत चुका था और उस आंदोलन के प्रति जो लेखक पर्याप्त खीज और आक्रोश के स्वर में बात करते थे, उनमें शिवप्रसाद सिंह और शानी प्रमुख थे. विजय देवनारायण साही को ‘गोदान’ और ‘वैतरणी’ के प्रतीकों में गहरा साम्य दिखाई देता है. इस संदर्भ में उनकी टिप्पणी है, ‘पता नहीं ‘वैतरणी’ नाम रखते हुए शिव प्रसाद सिंह को ‘गोदान’ के प्रतीक की याद थी या नहीं. दोनों प्रतीकों में कितना साम्य है. उपन्यास पढ़ जाने के बाद इन दोनों उपन्यासों में प्रतीकों को रिश्ता भी दिखने लगा. प्रेमचंद का होरी भी वैतरणी में ऊभ-चूभ कर रहा है. लेकिन पूंछ शायद वैतरणी को पार कराने में मदद कर दे. श्री शिव प्रसाद सिंह के उपन्यास में जिसमें सब ऊभ-चूभ कर रहे हैं. इस वैतरणी को पार नहीं किया जा सकता, सिर्फ इससे भागकर जाया जा सकता है, गाजीपुर में डिग्री कालेज की अध्यापकी करने के लिए...’ (बीहड़ पथ को यात्री, सं. प्रेमचंद जैन, पृ. 91) उपन्यास के नायक विपिन की नियति की ओर संकेत करके साही प्रकारांतर से इस ओर भी संकेत कर देते हैं कि यह आंचलिक उपन्यास क्यों नहीं ंहै. अंचल के प्रति एक नास्टेलजिक मोह के बजाय यह पलायन की विवशता ही है जैसा कि साही स्वयं मानते हैं, इसे आंचलिक के बजाय एक सामाजिक दस्तावेज की कोटि में ले आती है. साही इसे सलीके से किस्सा कहने की दुर्लभ कला का एक अद्भुत उदाहरण मानकर इसकी प्रशंसा करत हैं. शिव प्रसाद सिंह के अन्य सामाजिक उपन्यास ‘गली आगे मुड़ती है’ (1974), ‘शैलूष’ (1989) और ‘औरत’ (1991) का उल्लेख किया जा सकता है. वैसे अनेक लोग उनकी बेटी मंजु की मृत्यु के बाद लिखे गए उनके संस्मरणों ‘मंजुशिमा’ (1989) को भी उपन्यास ही मानते हैं, जो वह नहीं है.

‘गली आगे मुड़ती है’, काशी को केन्द्र में रखकर, युवा-आक्रोश पर लिखा गया है. आंदोलन में समाजविरोधी तत्वों की शिरकत आंदोलन के लक्ष्य को ही नष्ट कर देती है. काशी की अन्तः प्रादेशिक और सामासिक संस्कृति को लेखक किरन, जयंती और लाजो के माध्यम से उद्घाटित करता है-जिनमें किरन गुजराती है और जयंती बंगाली. अपने-अपने ढंग से ये दोनों ही अपनी संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं. रामानंद काशी की राई-रत्ती से परिचित होने के बावजूद, गलियों में भटकता घूमता है क्योंकि लेखक इस तरह शीर्षक को एक तर्क देना चाहता है. काशी पर लिखे गए शिव प्रसाद सिंह के उपन्यासों की श्रृखंला में पहले लिखा जाकर भी यह श्रृखंला का तीसरा और अंतिम खण्ड है. दूसरा खण्ड, मध्य कालीन काशी से संबद्ध, ‘नीला चांद’ (1988) और लिखे जाने के क्रम में अंतिम होने पर कालक्रम की दृष्टि से, वैदिक पृष्ठभूमि पर आधारित ‘वैश्वानर’ (1996) इस काशी-श्रृखंला की पहली कड़ी है. ‘कुहरे में युद्ध’ (1993) और ‘दिल्ली दूर है’ (1993) शिव प्रसाद सिंह के मध्यकालीन दिल्ली और उसके निकटवर्ती जुझौती पर केंद्रित हैं. वाशेक की मुख्य चिंता जुझौती की रक्षा है क्योकि जुझौती की रक्षा करके ही दिल्ली अर्थात राष्ट्र की रक्षा संभव है. एक स्थल पर वह रजिया से कहता हे, ‘मैं दोनों मजहबों के बीच खाई पर लकड़ी के उस कुन्दे की मानिन्द लेटा हूं जिस पर पैर रखकर लोग इधर से उधर और उधर से इधर आ-जा सकते हैं...’ (दिल्ली दूर है, पृ. 317) लेकिन व्यवहार के स्तर पर वाशेक हिन्दू पुनरुत्थानवाद को ही प्रोत्साहित करता है जिसका लाभ, आज की स्थिति में, धर्माध तत्वों द्वारा ही उठाया जायेगा. ग्राम जीवन की अपनी प्रकृत जमीन को छोड़कर, लंबे अंतराल के बाद शिव प्रसाद सिंह की यह रचनात्मक सक्रियता, उन्हें हिंदू पुनरुत्थानवाद और सामन्ती मूल्य-दृष्टि के पक्ष में ही खड़ा करती है. ‘नीला चांद’ में भी ‘जनता’ का प्रायोजित चित्रण उनके इसी द्वन्द्व का संकेत है. ‘शैलूष’ नटों के कबीलाई जीवन पर केंद्रित है. इस संस्कृति के उनके श्रमसाध्य अध्ययन का संकेत भी उपन्यास से मिलता है. कुछ क्षेत्रों में उसके कथित ब्राह्यण विरोधी स्वरूप के कारण उस पर विवाद भी हुआ है. लेकिन ‘शैलूष’ की मुख्य दुर्बलता उसमें आत्मीयता और विश्वसनीयता का अभाव है. लेखक समूचे कबीने के संघर्ष को कुछ व्यक्तियों में रेंड्यूस कर देता है और रचनावस्तु के प्रति किसी सघन सम्पृक्ति के अभाव में यह सारा आयोजन उपन्यास को एक प्रायोजित रचना में बदल देता है.

 

शानी

शानी का रचनात्मक विकास बस्तर के आदिवासी क्षेत्र में हुआ था, जो आधुनिक सुविधाओं से वंचित एक घोर पिछड़ा हुआ क्षेत्र था. उन्होेने ‘कस्तूरी’ (1961) में इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास को केन्द्र में रखकर संक्रमण और तनाव को अंकित करना चाहा था. अपने इसी पहले उपन्यास को उन्होंने बाद में ‘सांप और सीढी’ (1971) शीर्षक से लिखा. शानी के सरोकार एक आंचलिक लेखक के सरोकारों से भिन्न हैं. वे औद्योगिकता की चपेट में आए व्यक्ति और समाज की विडंबना अंकित करना चाहते हैं. एक छोटा-सा अलग-थलग, आत्मलीन सा गांव कैसे इस इस परिवर्तन को झेलता है और झेलने की इस प्रक्रिया में वह क्या से क्या हो जाता है, गहरे अवसाद के साथ शानी इसे उद्घाटित करते हैं. ‘पत्थरों में बंद आवाज’ (1965) भी इसी क्षेत्र की कहानी है. ‘नदी और सीपियां’ (1970) नई कहानी के दौर की प्रतीकात्मकता से आक्रांत, अपनी प्रकृति में काफी कुछ एक रोमानी सा उपन्यास है. इसकी नायिका स्वर्णा जैसे माड़िन नदी का रूपांतर है. उसके चारों ओर भवनाओं की जाने कितनी टूटी-अनटूटी सीपियां पड़ी हैं, खुली या बंद और उन सीपियों की तरह उसके संपर्क में आया कोई भी व्यक्ति उसकी पीड़ा से बेखबर और उदासीन बना रहता है. लेकिन शानी की वास्तविक ख्याति का आधार उनका ‘काला जल’ (1965) है. यह बस्तर के ही दो निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवारों की कहानी के रूप में लिखित है. काला जल वस्तुतः इसी निम्न मध्यमवर्गीय जीवन की जड़ता और सड़ांध का प्रतीक है जिसने जीवन के सारे सौंदर्य और आकर्षण को सोख लिया है.

गंदगी, जोंके और छोटी मछली की सिसांयद यहां की जैसे एक स्थायी पहचान है. उपन्यास में मुहर्रम के जुलूसों और पढ़े गए फातिहा की एक विशिष्ट भूमिका है-वे जैसे उपन्यास के जड़ और अवसाद-भरे परिवेश की पृष्ठभूमि में शोकपूर्ण धुनों की तरह छाए रहते हैं. चूंकि यह उपन्यास बस्तर के एक लंबे काल-खण्ड को समेटता है-शताब्दी के पहले दशक से स्वाधीनता के कुछ बाद तक समय को-इस दूर-दराज क्षेत्र में घटित सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के युटोेपिया के शिकार होते हैं. कहानी का वाचक-मैं-एक पात्र का नाम लेकर फातिहा पढ़ता है, मृत व्यक्तियों की स्मृति में, और उसी से उस पात्र का नाम लेकर फातिहा पढ़ता है, मृत व्यक्तियों की स्मृति में, और उसी से उस पात्र की कहानी शुरू हो जाती है. मिर्जा करामतबेग, इस्लाम बी अथवा बी-दरोगन, रज्जूमियां, सालिहा उर्फ सल्लो आपा, रोशन आदि की कहानियां इसी तरह चलती रहती हैं और उनसे जुड़े और भी पात्र बीच-बीच में आते रहते हैं. इन कहानियों में एक अजब-सा अवसाद शुरू से आखिर तक छाया रहता है. सल्लो आपा जैसी खिलंदरी और खुशमिजाज लड़की इसी परिवेशगत जड़ता की शिकार होकर क्या से क्या हो जाती है. उपन्यास में आए दो मुस्लिम परिवार-छोटो फूफी और बब्बन के-जैसे समूचे भारतीय समाज में मुसलमानों की नियति का भाष्य बन जाते हैं. ‘तब-काला जल’ का नाम भी तय नहीं हुआ था. इस उपन्यास को लेकर शानी के सामने एक जीता-जागता चरित्र (छोटी फूफी) था. मुझे इतना तो मालूम था कि उसे केन्द्र बनाकर एक उपन्यास की तैयारी शानी की है, लेकिन वह इतना बड़ा आकार और इतना व्यापक संदर्भ ग्रहण कर लेगा, इसकी कल्पना न तब शानी ने की थी, न मैंने. विस्तार की जैसी आदत शानी की है, फूफी को उसके समय परिवेश में उभारने के लिए उसका अतीत जरूरी है, लेकिन यह अतीत इतना विस्तृत हो जायेगा कि उसकी अपनी अलग कहानी होगी, कि उसके प्रत्येक पात्र को अपनी संपूर्ण जीवन-यात्रा वहां होगी और पूरा उपन्यास तीन पीढ़ियों का इतिहास होगा, यह तब नहीं सोचा था....(शानी :आदमी और अदीब, सं. जानकी प्र साद शर्मा, पृ. 149) ‘काला जल’ शानी की तो सर्वश्रेष्ठ और प्रतिनिधि रचना है ही, इस संपूर्ण अवधि की भी वह एक उल्लेखनीय और विशिष्ट रचना है.

 

मार्कण्डेय

मार्कण्डेय नई कहानी आंदोलन में ग्राम कथा आंदोलन के मुख्य सूत्रधार थे. अपने एकमात्र उपन्यास ‘अग्निबीज’ (1981) में वे जिस काल को अंकित करते हैं वह कांग्रेसी शासन के सुढ़ीकरण के साथ ही उसके प्रति व्यापक मोह-भंग का काल भी है. जे.पी. और लोहिया के प्रजा समाजवादी पार्टी गठन करके कांग्रेस में फूट और अलगाव का काल भी यही हैं. उपन्यास में गांधीवादी भागो बहिन विनोबा को ‘सरकारी संत’ कहती हैं. साधे काका और विसेसुर स्वाधीनता आंदोलन के सेनानियों की परिणति के प्रतीक -पात्र हैं. मार्कण्डेय ‘अग्निबीज’ में, इस स्थिति के बीच, वैकल्पिक संभावनाओं की खोज करते हैं. वे चार किशोरवय लोगों के प्रति गहरी आशा के साथ देखते हैं जो यौवन की देहरी पर पैर रखने को हैं. इनमें प्रमुख है साधो काका की बेटी श्यामा. उसके साथ ही वाकर का बेटा मुराद, मुसई महतो का सागर और कांग्रेसी विधायक ज्वालासिंह का एक मात्र पुत्र सुनीत भी. श्यामा के ेअघोषित किंतु सर्वस्वीकार्य नेतृत्व में वे आगे बढ़ते हैं. धीरे-धीरे उनके काम की दिशाएं विस्तृत होती जाती हैं. मुराद और श्यामा के पारस्परिक आकर्षण को संयत और सहज रूप में अंकित किया गया है. गांव की जातियों और वर्णों में धिरी-बंधी मानसिकता इसे स्वीकार नहीं कर पाती कि अछूत होकर भी सागर आश्रम के स्कूल में अघ्यापक बने और उन बच्चों को पढ़ाए जिन्हें सवर्णों के ढोर-डंगर चराने हैं. आश्रम में आग लगााकर उसकी हत्या की कोशिश इसी सोच का परिणाम है. छबिया एक जीवंत पात्र की अपेक्षा एक अमूर्त प्रतीक अधिक लगती है. गांव और समाज के हाशिए की जिंदगी से उठकर वह एक ब्राह्यण युवक हुड़दंगी के साथ अपने लिए नई राहों के निर्माण में सफल होती है. लेकिन उसकी यह कथित सफलता इसलिए प्रभावित नहीं करती क्योंकि कुल मिलाकर वह सूचना के स्तर तक ही सीमित रह जाती है. ‘अग्निबीज’ स्वाधीनोत्तर भारतीय ग्राम-जीवन को अंकित करता है-विकल्प की तलाश शामिल है. यद्यपि वामपंथी राजनीति के प्रेरणा-पुरुष हरगोन सिंह और इन किशोरों से संबंधित अनेक प्रसंग सरलीकरण के शिकार होने से बच नहीं सके हैं.

 

हृदयेश

हृदयेश नई कहानी आंदोलन के दौर में विकसित लेखक हैं-लेकिन उससे पूरी तरह अलग और उसके आयोजकों एवं उस दौर की आलोचना की उदासीनता के शिकार. यह सचमुच विडंबनापूर्ण है कि उनके उपन्यास लेखन की शुरुआत उनके कहानी-संग्रह के प्रकाशन की शर्त के रूप में हुई. ‘गांठ’ (1970) वस्तुतः इसी उद्देश्य से लिखा गया. उसके बाद वे उस दिशा में निरन्तर सक्रिय बने रहे हैं और उनके आठ उपन्यास आ चुके हैं- ‘हत्या’ (1971), ‘एक कहानी अंतहीन’ (1972), ‘सफेद घोड़ा काला सवार (1976), ‘सांड’ (1981), ‘पुनर्जन्म’ (1985), ‘दंडनायक’ (1990) और ‘पगली घंटी’ (1995). ‘हत्या’ हृदयेश के अपने कस्बेनुमा शहर के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी है जो ‘गांठ’ की तरह अर्थगर्भित है. ऊपरी तौर पर यह हत्या चंद्रिका प्रसाद उर्फ चुन्नू पहलवान नामक बदमाश की है. लेकिन उपन्यास के शीर्षक का अर्थविस्तार इसे अपनी प्रकृति में एक संश्लिष्ट और बहुस्तरीय रचना का रूप देता है. सरदार तेज सिंह की कच्-कच् की आवाज करती हुई चारा काटने की मशीन, वस्तुतः भोलानाथ का ही प्रतीक है जो कस्बे की किशोर प्रतिभाओं को हतोत्साहित कर के चारे की तरह काटकार उनके भविष्य से खिलवाड़ करती है. ‘हत्या’ स्वाधीनोत्तर भारतीय समाज के नैतिक स्खलन पर एक मार्मिक और अर्थपूर्ण टिप्पणी है. ‘सफेद घोड़ा काला सवार’, अपने ही शहर की अदालत को केंद्र में रखकर, अपने निजी अनुभव के आधार पर, हृदयेश न्यायपालिका और न्याय की समूची प्रक्रिया पर एक बेहद तीखी टिप्पणी करते हैं. व्यंजना, सांकेतिकता और व्यंग्य द्वारा लेखक अति परिचित यथार्थ को नीरस ब्यौरों में बदलने से बचाता है. ऐसा करने के लिए वह यदि अर्थपूर्ण और सर्जनात्मक बिंबों की रचना करता है, वहीं व्यंग्य का भी बहुत सधा हुआ उपयोग करता है. उपन्यास की आंतरिक प्रकृति के अनुरूप जिस शिल्प की तलाश लेखक ने की है, वह उसे विस्तार और नीरसता से तो बचाता ही है, उसे पूरे युग की विसंगतियों और अंतर्विरोधों से भी जोड़ता चलता है. एक गहरी अंर्तदृष्टि के अभाव में कोई भी लेखक इस ओर से अपनी आंख फेरकर इस चुनौती से बच सकता था. लेकिन तब यह अदालतों की नीरस कार्रवाई और गद्यात्मक तफसील का पुलिंदा बन कर रह जाता. हृदयेश की सफलता यह है कि वे इस गद्यात्मकता का अतिक्रमण करते हैं.

 

हृदयेश का सारा लेखन अपने ही छोटे शहर को केंद्र में रखकर हुआ है. अपने आस-पास का बेहद परिचित जीवन रचना की परिधि में आकर केैसे एक नया रूपाकार लेता है, हृदयेश के उपन्यास इसका उदाहरण हैं. ‘सांड’ में वे समूची शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी करते हैं-शहर की कुछ शिक्षा संस्थाओं को आधार बनाकर. यह शहर के तीन अलग-अलग स्तर के विद्यालयों से संबद्ध है. साहू सीताराम द्वारा छोड़ा गया सांड एक विशिष्ट वर्ग की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं का प्रतीक है. जल्दी ही वह सांड किसी साम्राज्य के क्रूर एवं नृशंस शासक की तरह अपनी शक्ति और आतंक के लिए जाना जाने लगता है. हृदयेश बेहद सामान्य से लोगों के बीच से एक प्रतिरोध चेतना विकसित करते हैं. हृदयेश यहां धर्म और संस्कृति की मिथ को निर्ममता से तोड़ते हैं. सांड की हत्या जैसे इस मिथ की हत्या है. ‘दंडनायक’ में वे काकोरी के शहीद ठाकुर रोशन सिंह की तीसरी पीढ़ी को नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं और अपने सामान्य अधिकारों के लिए उसे वही कुछ करना होता है जो ठाकुर रोशन सिंह को कभी ब्रिटिश हकूमत के विरुद्ध करना पड़ा था. ‘पगली घंटी’ इसी शहर की जेल को केंद्र में रखकर समूची व्यवस्था पर टिप्पणी करता है-बहुत कुछ ‘सफेद घोड़ा काला सवार’ को ही अर्थ विस्तार देता हुआ.

 

बदीउज्जमां

बदीउज्जमां अपने उपन्यासों में स्वाधीनोत्तर भारतीय समाज में मनुष्य की नियति को प्रभावित करने वाले सवालों से गंभीरतापूर्वक टकराते हैं. ‘एक चूहे की मौत’ (1971) से उन्होंने अपनी रचनायात्रा शुरू की ओर उनके निधन के आठ वर्ष बाद प्रकाशित उनके उपन्यास ‘सभापर्व’ (1994) तक में उनकी इस बेचैनी को देखा जा सकता है. ‘छाको की वापसी’ (1975) और ‘छठा तंत्र’ (1977) भी अपने-अपने ढंग से यही करते हैं. ‘एक चूहे की मौत’ में बदीउज्जमां एक बेहद क्षीर्ण कथानक के सहारे, काफ्काई ढंग से, प्रतीकों और संकेतों द्वारा एक सरकारी दफ्तर की कहानी कहते हैं. अपने अर्थविस्तार द्वारा सोल्जेनित्सिन के ‘कैंसरवार्ड’ की तरह, दफ्तर से उठकर यह पूरी दूनिया ही एक चूहे खाने में बदलती दिखाई देती है. मानवीय व्यवहार में निहित विवशता और हताशा को उपन्यास में संवेदनाशील अंकन हुआ है. बदीउज्जमां बिहार में गया से संबद्ध थे. यही कारण है कि ‘छाको की वापसी’ और ‘सभापर्व’ में गया की महत्वपूर्ण भूमिका है. ‘छाको की वापसी’ उनकी कहानी ‘परदेसी’ का ही विस्तार है जिसमें वे बिहारी मुसलमान की नियति को परिभाषित करते हैं.

इसकी केंद्रीय समस्या छूटे हुए वतन का दर्द है. पाकिस्तान पहुंचकर भी वह अपने बचपन की गलियों और ताजियों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है. लेखक विभाजन और पलायन की विभीषिका के संदर्भ में राष्ट्रीय मुसलमानों की मनोदशा और असुरक्षा को विश्वसनीय ढंग से अंकित कर सका है. गांधी भाई का हासिल क्या है? दूसरों को वे सेवा के बदले खुशहाली बटोरते देखते रहे हैं, लेकिन उनके बच्चे लावारिस यतीमों की तरह, खुदा की मर्जी पर, पलते रहे हैं. बाद में तो हिंदुओं की एक बलवाई भीड़ उनके शरीर को भालों से चीथ देती है. ‘छठा तंत्र’ संस्कृत के ‘पंचतंत्र’ की शैली में, पशु-पक्षियों के माध्यम से मानवीय सत्य को उद्घाटित करने का प्रयास करता है. यहां लेखक भारतीय राजनीति की मानव विरोधी स्थितियों को उद्घाटित करता है. चूहों और बिल्ली के रूपक द्वारा यहां जनता की नियति का भाष्य तैयार किया गया है.

 

बदीउज्जमां का ‘सभापर्व’ एक लेखक के रूप में, उनकी गंभीर तैयारी और चिंता का साक्ष्य है. कथा का वाचक गया के एक अध्यापक का बेटा है जो महाभारत के ‘सभापर्व’ का प्रतीक लेकर सत्ता और वर्चस्व की बिसात पर मनुष्य की नियति का विश्लेषण करता है. उसके पिता के मित्र, उसके बालेसर चाचा, हजारों वर्षों के इतिहास और संस्कृति की पृष्ठभूमि में, उसके मन में उठने वाले इन सवालों के उत्तर खोजने की कोशिश करते हैं. उपन्यास में साम्प्रदायिकता की समस्या को कहीं सीधे नहीं उठाया गया है, लेकिन फिर भी लेखक का लक्ष्य वही है. इस्लाम, सुफी-संतों और भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के साक्ष्य पर लेखक साम्प्रदायिकता के सवाल को सत्ता और वर्चस्व से जोड़कर देखता है. अपने विश्लेषण के लिए लेखक ‘घर’ से लेकर ‘देश के विभाजन से अनेक साक्ष्य जुटाता है. घर के विभाजन के संदर्भ में अम्मा और छोटी अम्मा दोनों को ही शिकायत है कि उनके हिस्से में काम आया है. दादी अम्मा को दोनों के हितों से अधिक अपनी सत्ता और उससे जुड़े स्वार्थों की चिता है. इसीलिए वे घर में भी विभाजन और फूट द्वारा राज करने की नीति पर अमल करती हैं. इसकी समीक्षा करते हुए भगवान सिंह ने लिखा है, ‘इस रचना को ताना वर्तमान का है और बाना इतिहास और दर्शन का, इसलिए वह लेखक) रचनाकार के साथ-साथ समाज, धर्म और इतिहास के मीमांसक दार्शनिक बन जाते हैं....’ (पुरोवाक्, अंक-2, पृ. 88) इतिहास और दर्शन की इस मीमांसा के कारण ही, विश्रृंखलित कथा-सूत्र वाला यह उपन्यास, पाठ-प्रक्रिया के स्तर पर, जटिल और कुछ दुर्बोध भी लग सकता है.

 

जगदीश चंद्र

जगदीश चंद्र का पहला उपन्यास ‘यादों का पहाड़’ (1966) उनके परवर्ती रचनाकर्म का कोई आभास नहीं देता. उनकी रचना-यात्रा रोमांस से यथार्थ की ओर संतरण करती है. उनके इस परिवर्तित रूप को सर्वाधिक महत्वपूर्ण साक्ष्य ‘धरती धन न अपना’ (1972) में उपलब्ध है और उसके बाद, थोड़े-थोड़े अंतराल से, वे इस दौर के अनेक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय उपन्यास प्रस्तुत करते हैंः ‘आधा पुल’ (1973), ‘मुट्ठी भर कांकर’ (1976), ‘कभी न छोड़े खेत’ (1976), ‘टुण्डा लाट’ (1978) और ‘धरती धन न अपना’ की ही अगली कड़ी के रूप में लिखित उनका ‘नरक कुण्ड में वास’. ‘धरती धन न अपना’ पंजाब की पृष्ठभूमि में, दलितों और हरिजनों के जीवन पर लिखा गया है. काली, ज्ञानो, बन्तो, निहाली, प्रीतो और प्रसिन्नी आदि पात्र मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं. दलित-वर्ग के जीवन को यह बहुत प्रामाणिक साक्षात्कार है, जिसमें उनकी क्षुद्रताओं, द्वेष और स्वार्थों के प्रति लेखक कहीं उदासीन नहीं रहा है. काली गांव की खुली हवा और वैसे ही खुले मन की आशा लेकर गांव लौटता है. लेकिन गांव उसके सपनों को बहुत निर्ममता से तोड़ता है. काली और ज्ञानो के प्रेम प्रसंग को लेखक गहरी संवेदनशीलता के साथ अंकित करता है. काली की लड़ाई के दो मोर्चे हैं.

एक ओर यदि अपने ही समाज की क्षुद्रताओं और स्वार्थों से टकराना होता है, उसकी रूढ़ियों से भी, वहीं उसे चौधरियों से भी संघर्ष करना है जो वर्ग-संघर्ष का ही एक रूप है. इस दुतरफा लड़ाई में ज्ञानो की छांह ही उसका सबसे बड़ा बल है. काली की हताशा गहरे अवसाद को जन्म देती है और उसके संघर्ष को विश्वसनीय बनाती है. ‘नरक कुण्ड में वास’ काली के एक नरक से दूसरे नरक में पुनर्वास की कहानी है. भले ही शहर आकर काली के लिए वास्तविक नरक चमड़े का कारखाना हो, लेकिन उसके पहले के दो पड़ाव भी नरक से दूसरे नरक में पुनर्वास की कहानी है. यह ‘अधर्मी’-उत्पीड़ित वर्ग’- के घोर संघर्ष की कहानी है जिसमें यथार्थ का संश्लिष्ट चित्रात्मक अंकन में ही उसका महत्व निहित है. काली का संघर्ष संघर्ष एक वास्तविक और यथार्थ संघर्ष है जो गहरी हार्दिकता के साथ अंकित है. उपन्यास में यथार्थवाद से मुक्ति की बात करने वाले आलोचकों के लिए जगदीश चंद्र के उपन्यास एक चुनौती की तरह हैं. शहर में घर और परिवार का सपना काली की ऊर्जा का मुख्य स्र्रोत है. उसे शहर में चिड़ियों, चीटियों और चुहियों तक से ईर्ष्या होती है, क्योंकि इनका ‘घर’ है, जबकि वह एकदम बे-सहारा है. किशना के घर-परिवार के प्रति उसका लगाव उसकी इसी भूख को शांत करता है. इस श्रृंखला का तीसरा और अंतिम खण्ड अभी आना है.

जगदीश चंद के उपन्यासों की विशेषताओं की दृष्टि से ‘कभी न छोड़े खेत’ और ‘मुट्ठी भर कांकर’ एक उदाहरण का काम कर सकते हैं. वे ‘विचार’ की अपेक्षा ‘जीवन’ के लेखक हैं-जिसके अंकन और उद्घाटन की प्रक्रिया में ही विचार के स्फुलिंग चमकते हैं. ‘कभी न छोड़े खेत’ में वे जाटों के पुश्तैनी झगड़ों, झूठी आन-बान के फेर में चौतरफा बर्बादी को बहुत यथार्थ ढंग से प्रस्तुत करते हैं. इन झगड़ों और शौर्य को लेकर उनमें कहीं भी गौरव और सराहना का भाव नहीं है. अंतर्निहित व्यंग्य की धारा से वे इसके दुष्परिणामों की ओर संकेत करते चलते हैं. ‘मुट्ठी भर कांकर’ में वे विभाजन के तत्काल बाद की दिल्ली के बदलते हुए चेहरे केा प्रस्तुत करते हैं. संक्रमण और उसके दूरगामी परिणामों को वे सूचनाओं और टिप्पणियों द्वारा संप्रेषित नहीं करते. पंजाबियों की आमद से, उनके पुनर्वास के लिए, गांव वालों की जमीन कंकर के मोल बिकने लगती है और पूरा तंत्र इस स्थिति का लाभ उठाता है. मानवीय व्यवहार के विभिन्न रूपों को जगदीश चंद्र गहरी विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत करते हैं.

 

गिरिराज किशोर

यदि रचना-कर्म में निरंतरता और सक्रियता की भूमिका को देखा जाए तो गिरिराज किशोर इस काल-खण्ड के सर्वाधिक सक्रिय और ऊर्जावान लेखक माने जा सकते हैं. ‘लोग’ (1966) से लेकर ‘ढाई घर’ (1991) तक उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय उपन्यास लिखे हैं. यह भी एक सुखद संयोग है कि अब तक उनका अंतिम उपन्यास ‘ढाई घर’ एक तरह से उनके पहले उपन्यास ‘लोग’ का ही विस्तार है. ‘लोग’ में गिरिराज किशोर सामन्ती समाज को एक बच्चे के दृष्टि बिंदु से देखते हैं. बाबा यशवंत राय के साथ किए जाने वाले अंग्रेज हाकिमों के व्यवहार का, बाबा की सारी खुशामद और सहयोग के बावजूद बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है. यशवंतराय के अहम् के बचाव का संघर्ष गहरे अवसाद और करुणा का प्रभाव छोड़ता है. ‘ढाई घर’ में लगभग इसी दौर के एक जमींदार हरीराय को परिवार के केन्द्र में रखकर समूचे विघटन और बिखराव की प्रक्रिया को अंकित किया गया है-परिवार के आपसी स्वार्थ, द्वेष और षड्यन्त्रों के बीच. गिरिराज किशोर एक व्यापक राष्ट्रीय फलक पर अपने उपन्यासों का ताना-बाना बुनने वाले शायद अपनी पीढ़ी के अकेले लेखक हैं. ‘जुगलबंदी’ (1973) स्वाधीनता आंदोलन के दौर में समानांतर पीढ़ियों की मानसिकता एवं भूमिका की जुगलबंदी का साक्षात्कार है. लेखक अंकित काल-खण्ड की सामाजिक राजनीतिक चेतना को विश्वसनीय रूप में पकड़ सका है. बीरू, उसकी बहू, भिखारिन और इसी प्रकार के छोटे-छोटे अनेक दृश्य हैं जो शिवचरण बाबू की सोच को बदलने में विशेष महत्व रखते हैं.

इन व्यापक फलक वाले उपन्यासों के अतिरिक्त गिरिराज किशोर के ‘चिड़ियाघर’ (1968), यात्राएं (1971), ‘दो’ (1974), ‘यथा प्रस्तावित’ (1982), ‘परिशिष्ट’ (1984) और

‘अर्तध्वंस’ (1990) उपन्यास हैं. इनकी रचना वस्तु में पर्याप्त वैविध्य और विस्तार है. ‘चिड़ियाघर’ में वे रोजगार दफ्तर को केंद्र में रखकर कथानक बुनते हैं. सुदूर क्षेत्रों से नौकरी की तलाश में आये युवा प्रत्याशी और स्थितियों के प्रति उनकी हताशा इस दफ्तर को सचमुच एक चिड़ियाघर में बदलती है. वर्णन बाहुल्य से बचकर छोटे-छोटे चित्रों और संवादों के बीच गिरिराज किशोर अपने कथानक का विकास करते हैं. ‘यात्राएं’ में एक सद्यः विवाहित दम्पत्ति की मानसिकता का आकलन है. एक दूसरे की पहचान का यह उपक्रम वन्या और उसके पति को अनेक बीहड़ क्षेत्रों की यात्रा का अवसर देता है जिसमें कुछ बेहद नाजुक स्थितियों को भी लेखक ने बेहद संयत ढंग से साधा है. ‘यथा-प्रस्तावित’ में वे यदि दफ्तरों की जड़-पहल-विरोधी मानसिकता का अंकन करते हैं तो ‘परिशिष्ट’ में, एक तकनीकी शिक्षण संस्थान को केंद्र में रखकर, दलित वर्ग और आरक्षण के मुद्दे की गहन पड़ताल में प्रवृत्त होते हैं.

जैसा कि संकेत किया गया है गिरिराज किशोर इस दौर के एक विशिष्ट लेखक हैं-अंतर्वस्तु के वैविध्य और विस्तार की दृष्टि से. लेकिन ‘इंद्र सुनें’ (1978), ‘दावेदार’ (1978) और ‘तीसरी सत्ता ’ (1982) आदि उपन्यासों में नई जमीन का आकर्षण उन्हें अमूर्त्तन की अंधी सुरंग की ओर भी ले जाता दिखाई देता है. ‘इंद्र सुने’ में फंतासी का आग्रह और ‘तीसरी सत्ता’ में स्त्री-उत्पीड़न के संदर्भ को भी वैचारिक अस्पष्टता ने धुंधलके से पाट दिया है. एक पारिवारिक और सामाजिक संदर्भ का यह अमूर्त्तन ‘तीसरी सत्ता’ की अन्विति को भंग करता है. यह रचनात्मक विचलन किसी भी लेखक की उपलब्धियों के आगे प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो सकता है. यहां गिरिराज किशोर के संदर्भ में भी ऐसा ही होता है...

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