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ई-बुक - प्राची, जुलाई 2015 - लघुकथा : सुबह का भूला

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लघुकथा
सुबह का भूला
राजेश माहेश्वरी

प्रातः काल के समय प्रतिदिन की दिनचर्या के अनुसार परिधि, जो कि एक संभ्रांत परिवार की पुत्रवधु थी. अपने मोहल्ले एवं आस-पास के गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा  प्रदान कर उन्हें पढ़ाती थी. उसकी कक्षा में तीन-चार दिन पहले ही एक बालक बबलू जिसकी मां का देहांत हो चुका था और पिता मजदूरी करके किसी प्रकार अपने परिवार का पालन पोषण करते थे, प्रारंभिक शिक्षा हेतु आया था. वह शिक्षा के प्रति काफी गंभीर था एवं मन लगाकर पढ़ना चाहता था.


उसी समय अचानक उसका पिता नाराज होता हुआ आया और बच्चे को कक्षा से ले गया. वह बड़बड़ा रहा था, कि मैडम आपकी पढ़ाई का क्या औचित्य है, मैं गरीब आदमी हूं और स्कूल की पढ़ाई का पैसा मेरे पास नहीं है. इसे बड़ा होने पर मेरे समान ही मजदूरी का काम करना है. थोड़ा बहुत पढ़ लेगा तो अपने आप को पता नहीं क्या समझने लगेगा. हमारे पड़ोस में रामू के लड़के को देखिए बारहवीं पास करके दो साल से घर में बैठा है. उसे बाबू की नौकरी मिलती नहीं और चपरासी की नौकरी करना नहीं चाहता क्योंकि पढ़ा-लिखा है. आज अच्छी-अच्छी डिग्री वाले बेरोजगार हैं जबकि बिना पढ़े-लिखे, धोबी, नाई, बूट-पालिश आदि काम करके अपना पेट पालने के लायक धन कमा लेते हैं. आप तो इन बच्चों को इकट्ठा करके बड़े-बड़े अखबारों में अपनी फोटो छपवाकर समाजसेविका कहलाएंगी परंतु मुझे इससे क्या लाभ? इतना कहते हुए वह परिधि के समझाने के बाद भी बच्चे को लेकर चला गया.


एक माह बाद एक दिन वह बच्चे को वापिस लेकर आया. अपने पूर्व कृत्य की माफी मांगते हुए बच्चे को वापिस पढ़ाने हेतु प्रार्थना करने लगा. परिधि ने उससे पूछा कि ऐसा क्या हो गया है कि आपको वापिस यहां आना पड़ा? मैं इससे बहुत खुश हूं कि चलो ‘‘देर आया दुरुस्त आया’’ पर आखिर ऐसा क्या हुआ?


बबलू के पिता ने बताया कि एक दिन उसने लॉटरी का एक टिकट खरीद लिया था, जो एक सप्ताह बाद ही खुलने वाला था. इसकी नियत तिथि पर सभी अखबारों में इनामी नंबर की सूची प्रकाशित हुयी थी. उसने एक राहगीर को समाचार पत्र दिखाते हुए अपनी टिकट उसे देकर पूछा कि भइया जरा देख लो ये नंबर भी लगा है क्या? मैं तो पढ़ा लिखा हूं नहीं, आप ही मेरी मदद कर दीजिए. उसने नंबर को मिलाते हुए मुझे बधाई दी कि तुम्हें पांच हजार रुपये प्राप्त हुए हैं इसके लिए तुम्हें कार्यालय के कई चक्कर काटने पड़ेंगे तब तुम्हें रकम प्राप्त होगी. यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें पांच हजार रुपये देकर यह टिकट ले लेता हूं और आगे की कार्यवाही करने में मैं स्वयं सक्षम हूं. यह सुनकर मैंने पांच हजार रुपए लेकर खुशी-खुशी वह टिकट उसको दे दिया और अपने घर वापस आ गया. उसी दिन शाम को मेरा एक निकट संबंधी मिठाई पटाखे वगैरह लेकर घर आया. उसने मेरी टिकट नोट कर लिया था. उसने मुझे बधाई देते हुए कहा कि तुम बहुत भाग्यवान हो, तुम्हारी तो पांच लाख की लॉटरी निकली है. मैं यह सुनकर अवाक् रह गया. जब मैंने उसे पूरी आप बीती बताई तो वह बोला कि अब हाथ मलने से क्या फायदा. यदि तुम कुछ पढ़े लिखे होते तो कम से कम नंबर तो पढ़ने योग्य हो जाते. इसलिए कहा जाता है कि ‘‘जहां सरस्वती जी का वास होता है, वहां लक्ष्मी जी का वास रहता है’’. यह कहकर वह दुःखी मन से वापस चला गया.


‘‘मैं रात भर सो न सका, अपने आप को कचोटता हुआ सोचता रहा कि बबलू को शिक्षा से वंचित रखकर मैं उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा हूं. मैंने सुबह होते-होते निश्चय कर लिया था कि इसको तुरंत आप के पास लाकर अपने पूर्व कृत्य की माफी मांगता हुआ आपसे अनुरोध करूंगा कि आप जितना पढ़ा दे उसके आगे भी मैं किसी भी प्रकार से जहां तक संभव होगा वहां तक पढ़ाऊंगा.’’ परिधि ने उसे वापिस अपनी कक्षा में ले लिया और वह मन लगाकर पढ़़ाई करने लगा.


बीस वर्ष उपरांत एक दिन परिधि ट्रेन से मुंबई जा रही थी. रास्ते में टिकट निरीक्षक टिकट जांच करने के लिए आया तो उसे देखते ही उसके चरण स्पर्श करके बोला, मां आपका आशीर्वाद चाहिए. परिधि हतप्रभ थी कि ये कौन है और ऐसा क्यों कर रहा है? तभी उसने कहा कि आप मुझे भूल रही हैं, मैं वही बबलू हूं जिसे आपने प्रारंभिक शिक्षा दी थी. जिससे उत्साहित होकर पिताजी के अथक प्रयासों से उच्च शिक्षा प्राप्त करके आज रेलवे में टिकट निरीक्षक के रूप में कार्यरत हूं. परिधि ने उसे आशीर्वाद दिया.
   
संपर्कः 106, नयागांव, रामपुर
           जबलपुर (म.प्र.)

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