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ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 - धरोहर कहानी : गलती

धरोहर कहानी

 

गलती

द्विजेन्द्र नाथ मिश्र ‘निर्गुण’

 

प्रतिभा,

सखी मेरी तुम सदा की बुद्धिमती हो, मैं जानती हूं. हर बात की तह तक पहुंचना तुम्हारी सदा की आदत है. तुम्हारी जिज्ञासा सही है, मेरे पत्र में अनकांशियली कुछ ऐसा जरूर लिख गया होगा जो तुम्हें स्ट्राइक कर गया. तुम मेरी अंतरंग हो. छिपाना अनावश्यक लग रहा है. लो, सुन लो पूरी कहानी.

अपना शहर छोड़कर इस अनजान नगर में चली तो आई, पर पीछे बहुत पछताई पर गौरव की मान-मर्यादा की, पैसे की, आवाज की, रहन-सहन की किसी तरह की कोई परेशानी यहां मुझे नहीं हुई. सब कुछ कल्पना के परे ही मिला. सब तरह का चैन, सब तरह की सुख-सुविधा तो भी एक भारी असंतोष दिन रात मेरे मन में उमड़ता रहा. यह किस चीज का अभाव था. तुम्हें स्पष्ट करके बतला रही हूं.

मेरा यह रूप जिसे तुम अब तक अपार्थिव कहती रही हो, मेरी यह निर्दोष यौवन-भरी देह, जिस पर हाथ फिराते तुम आंखें मूंद लेती थीं, मेरी भाव-भंगिमायें, मुस्कराहटें, जिन्हें लख कर तुम कभी धीरे से सांस खींच कर कह उठती थीं, ‘मर जायेंगे हम तो’-यह सब जैसे यहां आकर निरर्थक हो गया प्रतिभा.

वहां तुम सब के साथ बराबर छात्रा ही थी. यहां मैं प्रोफेसर हूं. और यह प्रोफेसर होना ही जैसे मेरे लिये गुनाह हो गया.

यहां कभी किसी ने मेरा रास्ता न रोका, कोई मेरी बगल से सट कर न निकला, किसी ने धीरे से आह नहीं भरी, किसी ने हौले से सीटी नहीं बजाई, किसी ने आंखों में आंखें डाल कर नहीं देखा, कोई नहीं मुसकराया. कुछ भी नहीं हुआ किसी दिन. और मैं सिर्फ एक प्रोफेसर रह गई.

तुम तो जानती हो, लिबासों का मुझे शौक रहा है, और मैं कपड़े पहिनना जानती हूं. रंगों के चुनाव, मैचिंग तुम सब सहेलियां मुझ से पूछती रहती थीं. सखी, मेरा वह वेश-विन्यास यहां जैसे मिट्टी के मोल का हो गया. सब्ज परी और महाश्वेता, खूनी और कातिल-सारे रंग उसी एक प्रोफेसर के रंग में यहां तिरोहित हो गये जैसे.

और ऐसी रूप-रस-रंग-हीन जिन्दगी मैं जीती रही. विद्या और ज्ञानोपार्जन करके मानो मैंने नया जन्म ले लिया. डॉक्टरेट के चुगे में नारी बिलकुल छिप गई. चुगा रह गया सामने.

और तब क्या हुआ? मेरे ही डिपार्टमेंट में मेरे सीनियर प्रोफेसर ने अपने जन्म-दिन पर मुझे आमंत्रित किया. वह विधुर है, मैं जानती थी. दो भतीजे उसके साथ रहते थे. मैं वहां पहुंची, तो मिश्रा बहुत घबराया हुआ था. पता चला कि वक्त पर उसका रसोइया दगा दे गया, यानी कि बीमार पड़ गया. मुझे बड़ी हंसी लगी. दोनों भतीजे भीतर अंगीठी पर कढ़ाई रखे बैठे थे, और एक-दूसरे पर नाराज हो रहे थे. मैंने संकोच तज कर, सब काम अपने सिर ले लिया. दावत फिर बाकायदा हुई. रात गये बिदा होने लगी, तो मिश्रा अतिशय विनम्र होकर मुझे बहुत दूर तक पहुंचाने आया, और गद्गद् होकर कहने लगा-‘‘आज का दिन शायद कभी नहीं भूल पाऊंगा.’’ मैं सिर्फ हंसती रही, और यहीं मानो श्री गणेश हुआ घनिष्ठता का. मिश्रा के यहां मेरा आना-जाना होने लगा. और मेरे यहां वह पूछ-पूछ कर आता रहा.

लेकिन प्रतिभा, कोई ऐसी बात न हुई, जो मेरे अन्तराल में कहीं अंकित हो जाती-स्मरणीय और अस्वादनीय. हर व्यवहार और हर बात और हर वाक्य संयत और शिष्ट बना रहा.

सीमायें लाभप्रद भले ही हों, सुखकर नहीं होतीं, प्रतिभा. मुझे मिश्रा के सामीप्य से, उसकी विद्वता से कभी-कभी ऊबन होने लगती, कि यह पुरुष कभी कुछ ऐसा क्यों नहीं करता, जो शिष्टता से परे हो, कुछ अशोभन क्यों नहीं होता इससे? थोड़ा असभ्य होता किसी रोज.

और ठीक इन्हीं दिनों के बीच आकस्मिक घटना हो गई. मैंने जो मकान किराये पर ले रखा है, वह दो मंजिला है. नीचे एक बाल-बच्चेदार गृहस्थ रहते थे. ऊपर के दोनों कमरे मेरे पास हैं. एक खाने-पीने के लिये है, और दूसरे में पढ़ना-लिखना और सोना होता है.

मकान के ठीक सामने एक शिव-मन्दिर है छोटा-सा. उसमें सुबह-शाम एक पुजारी आकर पूजा कर जाता है, और जाते समय ताला जड़ जाता है. बरसात के दिन थे, और पानी प्रायः रोज ही गिरता था. पानी उस दिन भी बरस रहा था. नोट्स लिखना समाप्त करके, मैं अपने दरवाजे पर आ खड़ी हुई. पानी झमाझम गिर रहा था. अचानक देखा, कि सामने बन्द मन्दिर की जरा-सी सीढ़ियों पर कोई खड़ा है, हाथ में एक बैग लिये, किवाड़ों से सटा. कौन है यह? आड़ी-तिरछी गिरती धारें उसके जूतों को भिगो रही थीं. होगा कोई. मैं अपने कमरे में आ बैठी. पानी और जोर पकड़ गया. सहसा मुझे याद आया, कि दरवाजे के कोने में कोयले रखे हैं. भीग तो नहीं गये? कोयले सुरक्षित थे. मेरी नजर फिर सामने के मन्दिर पर चली गई. हाय, वह आदमी अब भी उसी तरह खड़ा भीग रहा था. मैं शायद भावुक हो गई थी उस बेला. रहा नहीं गया. नीचे उतर गई. दरवाजे पर सामने खड़ी होकर, मैंने जोर से पुकार कर कहा-‘‘इधर आ जाओ.’’

तुम्हें सुनकर थोड़ा अचरज जरूर लगेगा. मैंने उसे खुद चाय बना कर पिलाई. घंटा भर बाद खाना खिलाया. बिस्तर दिया उसे, और रात को अपने ही कमरे में लिटाया. सारी रात मेघ बरसता रहा. और एक नितान्त अपरिचित व्यक्ति मेरे पास सोता रहा.

दिन निकल आया. नित्य-कमरें से निबट कर, मैंने उसे जगाया, तो एक बार कम्बल से सिर निकाल कर, आंखें मूंदे हुए ही बोला-‘‘सोने दो मुझे.’’ और फिर कम्बल में गायब.

उसकी इस चेष्टा पर हंसकर चली आई मैं. अब क्या करूं? दूसरे कमरे में चाय का पानी चढ़ा कर, किताब पढने लगी.

अचानक सुन पड़ा- ‘‘नमस्ते, साहब.’’

सिर घुमा कर देखा, जो जनाब खड़े थे. हाथ जोड़े युवावस्था का स्वस्थ, सुडौल शरीर, सिर पर अस्त-व्यस्त बाल, सरल सी दृष्टि. वह दृष्टि मेरे चेहरे पर जमी हुई थी. अकारण ही उठ कर खड़ी हो गई. जाओ, जल्दी से निबट आओ. चाय का पानी खौल गया है.’’

‘‘अभी आया, साहब,’’ कहकर, वह लपका. लेकिन फिर पलट कर बोला-‘‘साहब, तुम चाय मत बनाना. मेरी बनाई चाय पीना.’’

वह उधर चला गया, तो उसका यह ‘साहब’ कानों में गूंजता रहा जैसे, और हंसी आती रही.

और चाय सचमुच स्वादिष्ट लगी उस दिन. मुसकराता हुआ, पूछने लगा-‘‘कहो, साहब, चाय का टेस्ट ठीक है? तबियत खुश हुई?’’

‘‘बढ़िया है.’’

सुनते ही तपाक से बोला-‘‘तो, साहब, अब मैं ही रोज चाय बनाया करूंगा सुबह-शाम. ...शाम को किस वक्त?’’

‘‘चार, साढ़े चार बजे.’’

बोला-‘‘ठीक है. चार बजे मेरी छुट्टी हो जाया करेगी. भीगता चला आऊंगा.’’

अवाक् रह गई सुन कर. तो क्या अब यहीं रहने का इरादा है इसका? और मुझ से इसने पूछा तक नहीं कुछ. और इसने कैसे मान लिया, कि मैं इसे अपने पास रहने दूंगी?

लेकिन, सखी, तुम सुनकर संभवतः एक बार फिर चौंकोगी. हुआ वही, जो उसने कहा था. यानी कि वह सचमुच ही मेरे पास रहने लगा.

बात यह थी, कि जिस फैक्टरी में रामकिशन को काम मिला था, वह अभी-अभी चालू हुई थी. रामकिशन मैकेनिक था. इन लोगों के लिये क्वार्टर्स बन रहे थे. महीने-दो महीने की देरी थी. और उस बेला रामकिशन ने विनय-भरे शब्दों में यों कहा था मुझ से-

‘‘साहब, इस शहर में किसी को नहीं जानता मैं. पहिले दिन की ड्यूटी पूरी करके लौटा था. मेरे कस्बे का एक आदमी रहता था यहां, इसी गली में. बड़ी मुश्किल से उसका डेरा ढूंढ़ पाया, तो पता चला, कि वह यहां की नौकरी छोड़ कर कलकत्ते चला गया. अब कहां जाऊं, कहां रात बिताऊं, सोच नहीं पा रहा था. ऊपर से मेघ बरसने लगे, तो यहीं रुक कर खड़ा हो गया. भगवान् की करुणा देखो, साहब, कि तुम्हें भेज दिया मेरे पास. रात को सुख की नींद सोया यहां. मुझ परदेशी को कौन इस तरह पुकारता, कौन सुलाता अपने पास? साहब, जोर कुछ नहीं है मेरा, हक भी कुछ नहीं है. तुम्हारी मेहरबानी हो जाय, तो ये दिन काट लूंगा यहीं. कहीं एक किनारे सो जाया करूंगा रात को, साहब. यकीन करो, कोई बुरा आदमी नहीं हूं. मेरी शक्ल देख लो, साहब, आवारा नहीं हूं?’’

प्रतिभा, मेरी समझ में नहीं आ रहा था, कि क्या कहूं उससे. और क्या यह सच नही था, कि उसकी शक्ल उसकी दृष्टि, उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व उपेक्षणीय नहीं लगा मुझे? और क्या यह यच नहीं है, कि एक पूर्ण पुरुष के सम्पर्क की कल्पना से कहीं मेरे मन में लोभ जैसा, हल्का-सा आनन्द जैसा गूंज रहा था?

और उसके मन का विश्वास देखो, उसका साहस देखो, कि मेरे मौन होते ही फौरन पूछ बैठा-‘‘वह कोने वाली छोटी-सी कोठरी है न, साहब. उसे साफ कर लूं अपने लिये?’’

भोजन? इसके खाने की क्या व्यवस्था होगी? बोला, कि किसी होटल में खा लिया करेगा.

‘‘होटल में क्यों? यहीं खाना तुम.’’-मैंने बिना रुके कह दिया.

क्यों कह दिया, नहीं जानती. मेरा खाना एक मिसरानी बनाती है. उस दिन से दो जनों का खाना बनने लगा.

मिसरानी ने मुझ से किसी दिन नहीं पूछा, ‘यह कौन है तुम्हारा?’ यदि वह पूछती, तो मैं क्या जवाब देती? क्या मैं उससे यह बात कह देती, कि परदेशी है कोई, अनजान है, बेसहारा है, और मैंने उसे पनाह दे दी है? यह सत्य प्रकट करने की सामर्थ्य मुझ में थी क्या? शायद नहीं थी. शायद मैं मिसरानी से यही कहती, ‘रिश्तेदार है मेरा?’ यह झूठ ही बोलती शायद. सत्य से भय क्यों लगता है? झूठ क्यों आवश्यक है? सही और गलत. प्रतिभा, परिभाषायें बड़ी दुरूह लगती हैं. जिसे हम गलत समझते हैं, उसे क्यों करते हैं? सही रास्ते इतने संकीर्ण क्यों हैं? और क्या भीतर की आवाज का कोई मूल्य नहीं है हमारे लिए? महज बाह्य बातों पर हमारी यह जिंदगी चल रही है-यह बोध कितना कष्टदायी है.

रामकिशन कि मेरे पास रहते मुश्किल से तीन-चार दिन हुए होंगे, कि प्रोफेसर महोदय आ गये अचानक ही उस रविवार को. रामकिशन ने मेरे बिना कहे ही उस कमरे में चुपचाप चाय तैयार की. फिर बड़े करीने से ट्रेन उसे सजा कर हमारे पास ले आया.

‘‘साहब, चाय?’’

प्रोफेसर उसे देख कर चौंके एक बार. एक बार आपादमस्तक रामकिशन को अवलोका, तो रामकिशन ने थोड़ा झुक कर, हाथ जोड़ कर कहा-‘‘नमस्ते साहब?’’

प्रोफेसर अपना सिगरेट केस घर भूल आये थे. रामकिशन गली की दूकान से सिगरेट खरीदने दौड़ गया, तो प्रोफेसर ने जाने कैसे स्वर में मुझसे पूछा-‘‘यह बांगड़ू कहां से पकड़ लिया?’’

मुझे ‘बांगड़ू’ शब्द पर हंसी आ गई. पर प्रोफेसर न हंसे. मैंने पूरा किस्सा बयान कर दिया उनके आगे, तो सीरियस होकर बोले-‘‘यह तुमने अच्छा नहीं किया. कहीं ऐसा न हो, कि यह अनजान परदेशी, जिसे तुमने यों पनाह दे रखी है, तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारा सारा कीमती सामान लेकर रफूचक्कर हो जाय. बहुत गलत काम किया है तुमने.’’

क्या जवाब दूं, सोच नहीं पा रही थी, कि रामकिशन लौट आया. जाने क्यों, उस दिन प्रोफेसर फिर ज्यादा देर बैठे नहीं मेरे पास.

मेरा मन जाने कैसा-कैसा हो रहा था, कि रामकिशन मेरे आगे आ खड़ा हुआ, और सामने पड़ी छोटी मेज पर कुछ नोट रख कर बोला-‘‘ये रुपये हैं, साहब. अपने पास रख लो. और ये झुमके हैं मेरी बहिन के. परदेश का मामला है. रुपये तो और थे नहीं मेरी बहिन के पास. सो ये झुमके दे दिये, कि ‘कभी कोई आपद-विपदा आ पड़े, तो बेच लेना इन्हें.’ मां-बाप कोई नहीं रहे. मेरी बहिन ने ही मुझे पाला-पोसा. मेरे जीजा ने मुझे पढ़ाया-लिखाया. रख लो, साहब, इन्हें. मिसरानी आती होगी. सब्जी ले आऊं. ये चाय के बरतन तुम मत धोना, साहब. मैं अभी आया.’’

प्रोफेसर अभी-अभी कह कर गये हैं ‘‘बहुत गलत काम किया है तुमने.’’ मिसरानी भी शायद यही कहती और मेरे पिता भी शायद यहीं कहते. सब यही कहते, मैं जानती हूं. तो भी इस गलत काम को मैं किये जा रही हूं. कैसे आश्चर्य है....

प्रतिभा,

तुमने मेरा पत्र पढ़कर जाने क्या-क्या सोचा होगा. लेकिन अधूरी कहानी पर कोई भ्रान्त धारणा मत बना लेना, सखी. इस लम्बी कथा को पूरा सुनकर ही तुम कुछ कहना.

आज रामकिशन को मेरे पास रहते पूरे दो महीने हो गये. दिनोें का हिसाब मैं नहीं रख पाती शायद. पर पिछले महीने की और इस महीने की तनख्वाह रामकिशन ने मुझे लाकर सौंपी है. इसी से जानती हूं.

इन दो महीनों में क्या मैं कुछ बदल गई हूं? मुझे तो कुछ भी ऐसा नहीं लगता. परन्तु प्रोफेसर मिश्रा कहते हैं-‘‘तुम बदल गई हो, करुणा.’’

पता नहीं, उनका कहना सच है, कि महज भ्रम है उनका. इस भ्रम का कारण क्या है?

एक छुट्टी के दिन प्रोफेसर से मिलने जा रही थी, कि अचानक ही जीने से मेरा पैर फिसल गया, और मैं सरकती चली गई बीच की सीढ़ी तक. खड़ाक्-पड़ाक् की आवाज सुन पाकर, रामकिशन ऊपर से भागा आया. मैं आंखें मूंदे दीवार से सटी बैठी थी निश्चल, पीड़ा सहती.

‘‘कहीं चोट लग गई क्या, साहब?’’ रामकिशन मेरे ऊपर झुक कर, स्नेह से पूछने लगा. और जवाब न पाकर, मेरी बांह पकड़ कर बोला-‘‘उठो, साहब...उठो अब.’’

‘‘नहीं उठा जाता,’’ मैंने चेष्टा कर के कहा हौले से-‘‘पैर में मोच आ गई है.’’

और पलक मारते रामकिशन ने मुझे अपनी बांहों में उठा लिया, और पलक मारते मुझे ऊपर लाकर पलंग पर लिटा दिया. और सामने खड़ा होकर, धीरे से बोला-‘‘आंखें खोलो, साहब.’’

और मेरी आंखों में आंखें डाल कर, कहने लगा, मोह भरी वाणी से-‘‘नीचे देख कर चलना चाहिये. कदम संभाल कर रखना चाहिये. कहां दर्द है पैर में? बतलाओ तो.’’

मोच सचमुच आ गई थी. रामकिशन तो जैसे हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गया. जाने कहां-कहां से, जाने किस-किस से पूछ कर तरह-तरह के पत्ते और तेल पुलटिये गरम करके लगाता रहा.और हजार बार उसने मेरे पैर को छुआ होगा. सखी, तुम पढ़कर जरूर हंसोगी, और जरूर कहोगी-फिल्मी कहानी का प्लॉट है यह तो.’ लेकिन प्रतिभा, मैं क्या करूं? मैं जान-बूझ कर गिरी थी क्या? मैं चाहती थी क्या, कि ऐसा हो कि रामकिशन अपनी बांहों में मुझे उठा ले? विश्वास करो, सखी, सभी कुछ अप्रत्याशित हुआ था. तीसरे दिन फिर छुट्टी पड़ गई. और मैं रामकिशन को साथ लिये, प्रोफेसर के यहां पहुंची, तो वे जैसे हतप्रभ हो गये. क्या रामकिशन को मेरे साथ रिक्शे में मेरी बगल में देख कर?

बुझे से स्वर में बोले-‘‘कई दिनों से तुम दिखलाई नहीं पड़ी?’’

‘‘इन्होंने ठीक कर दिया,’’ मैंने पास की कुर्सी पर मौन बैठे रामकिशन की ओर संकेत करके, मुसकराते हुए कहा-‘‘नसों के डॉक्टर हैं अच्छे-खासे.’’

प्रोफेसर ने बलपूर्वक हंस कर कहा-‘‘मशीनों का काम छोड़ कर यही नसों की डॉक्टरी की दूकान क्यों नहीं खोल देते?’’

रामकिशन ने फौरन प्रतिवाद किया-‘‘प्रोफेसर साहब, मशीनरी से मुझे मुहब्बत है. बेजान कल-पुर्जों में जान डाल देना बहुत प्यारा लगता है मुझे. कुछ पूछना चाहता हूं आप से. इजाजत है?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना है?’’

रामकिशन ने जरा आगे को झुक कर कहा-‘‘यह देखिए, मेरे काम की एक किताब है रूसी भाषा में. मेहनत करके इसे पढ़ रहा हूं. लेकिन जगह-जगह कुछ लफ्ज छूट जाते हैं. आप के पास कोई डिक्शनरी हो अगर, तो कृपा करके मुझे दे दीजिए. हिफाजत से रखूंगा.’’

प्रोफेसर उलट-पलट करके उस किताब को देखते रहे. फिर किताब पर ही नजर जमाये हुए बोले-‘‘मेरे पास ऐसी डिक्शनरी कोई नहीं है. वे लोग रूसी साहित्य बेचते हैं. उनके पास शायद हो डिक्शनरी. देखो, चौक से जो रास्ता स्टेशन की ओर जाता

है...’’

रामकिशन उठ कर, चला गया नमस्ते कर के, तो मुझसे पूछने लगे-‘‘इतनी इंग्लिश जानता है यह?’’

‘‘इंटर पास हैं. एक डिप्लोमा भी किया है. दूसरे डिप्लोमा कोर्स की तैयारी कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा है तब तो.’’ और फौरन ही बात पलट कर, पूछने लगे-‘‘वह निबन्ध तैयार हो गया तुम्हारा?’’

‘‘अभी नहीं,’’ मैंने संकुचित होकर कहा, तो जरा खिन्न होकर बोले-‘‘अवकाश में क्या करती रहती हो सारे दिन? इसके साथ ताश-शतरंज खेलती हो क्या?’’

मैने कोई जवाब न दिया.

आत्मीयता के स्वर में बोले-‘‘कान्फ्रेंस में तुम्हें वह पेपर पढ़ना है. मैं तुम्हें आगे बढ़ाना चाहता हूं. कितना काम तुम्हें करना है. और तुम-’’

मैंने कहा-‘‘मैं कर लूंगी सब.’’

 

प्रोफेसर ने मानो आश्वस्त होकर कहा-‘‘देखो, दुनिया यह अन्योन्याश्रित है. तुम्हें मैं हर तरह की सहायता दूंगा. लेकिन मुझे भी तो तुम्हारी जरूरत है.’’

आखिरी वाक्य उन्होंने जोर देकर कहा था. एक बार कहने को हुई, ‘मैं प्रस्तुत हूं.’ परन्तु शब्द मेरे गले में फंस कर रह गये थे जैसे. इस ‘जरूरत’ का स्पष्ट अर्थ क्या है? और ‘प्रस्तुत’ की क्या व्याख्या होगी इनके मन में?

प्रतिभा, शब्द की शक्ति कितनी विशाल होती है. शब्द की महिमा ऋषियों ने गाई है. इन्हीं शब्दों के साथ हमारी जिन्दगी के बहुत से आनन्द-उल्लास और रहस्य-भेद विजड़ित हैं. हाय, यदि यह ‘शब्द’ न होता मानव के पास, तो वह कितना पंगु होता.

देखो तो, क्या सुना रही थी तुम्हें, और कहां बहक गई. मैं प्रोफेसर के भ्रम की बात कह रही थी न? अब लगता है, कि रामकिशन के साथ मेरे इस घनिष्ट सम्पर्क को देख कर ही शायद उन्होंने कहा था-‘‘करुणा, तुम बदल गयी हो.’’

पर मैं तुमसे पूछती हूं-आदमी सारी जिन्दगी किसी एक बंधी बधाई लीक पर ही चले, क्या यह जरूरी है? प्रोफेसर से परिचय होने का यह अर्थ तो नहीं, कि मैं किसी अन्य पुरुष के संपर्क में आऊं ही नहीं. सच पूछो, तो मुझे उनका यह भाव जरा भी रुचिकर नहीं लगा.

अब आगे की बात सुनो तुम.

रात को सोने से पहिले थोड़ी देर रामकिशन से गपशप करने की जैसे मुझे आदत पड़ गई थी. उस रात को रामकिशन ने कहा-‘‘प्रोफेसर साहब बहुत विद्वान हैं. विद्वानों की जिन्दगी ही दूसरी होती है. मैं तुम से सच कहता हूं, साहब, उस दिन उनके कमरे में जाकर बैठा, तो यों लगा कि जैसे किसी मन्दिर में चला आया हूं. चारों ओर किताबें-ही-किताबें. कैसा पवित्र वातावरण था वहां का.’’

मैंने पूछा-‘‘तुम्हें ऐसी जिन्दगी अच्छी लगती है? अपनी यह फैक्टरी वाली जिन्दगी तो तुम्हें बड़ी गन्दी लगती होगी, क्यों?’’

‘‘नहीं, साहब,’’ रामकिशन आधे अंधेरे, आधे उजाले में बोला-‘‘ऐसी बात तो नहीं है. तुम्हें मालूम नहीं है, साहब, मेरी फैक्टरी में फौज का सामान तैयार होता है. वे जो फ्रंट पर अपनी जान हथेली पर लिये पसीना बहाते हैं. पैसा जरूर लेते हैं साहब. तनख्वाह न लें, तो पेट कैसे भरे? लेकिन हमारी फैक्टरी का हर मेहनतकश मजदूर बराबर यह याद किये रहता है, कि उन भाइयों के लिये वह यहां कल-पुर्जों से जूझ रहा है, जो वहां दुश्मन से जूझ रहे हैं, मौत से जूझ रहे हैं. हमें तो बड़ा नाज है अपनी फैक्टरी पर, अपने काम पर. यहां तो बड़ा नाज है अपनी फैक्टरी पर, अपने काम पर. यह जो अपने देश की मिट्टी है न, यह जमीन है न, यह हमारी मां है, साहब. तो मां की इज्जत-आबरू बचाने वाले वे सूरमा, और उनके सेवक हम. हमारी जिन्दगी कम पवित्र नहीं है, साहब. ऐसी बात मत कहना अब कभी. देखो, साहब, गन्दगी कहां है? तुम सोचो जरा. गन्दगी तो वहां है, जो सिर्फ अपने लिये जीते हैं, जिन्हें सिर्फ ऐशो-आराम से मतलब है. उन खुदगर्ज और मक्कार आदमियों के दरम्यान तुम गन्दगी के दर्शन कर लो. बाकी सारी जिन्दगानियां पाक हैं-एक डोम से लेकर एक पुजारी तक, एक मजदूर से लेकर इंजीनियर तक, एक प्राइमरी स्कूल के टीचर से लेकर आला दर्जे के प्रोफेसर तक. ये तमाम लोग अपने दिलोदिमाग लगा कर, अपना खून-पसीना एक करके सेवा कर रहे हैं. तुम्हारी, तो तुम भी इनकी सेवा करो. यह तुम्हारा सब से बड़ा फर्ज है, और यही तुम्हारी जिन्दगी का मकसद है. अपना यह इतना बड़ा देश है. हमारे नेता इसे आजाद कर गये. अब इसे बचाओ तुम, बढ़ाओ तुम, सारी ताकत लगा कर. मैं गलत कह रहा हूं, साहब?’’

लेटी थी मैं. उठ कर बैठ गई. मैंने पूछा-‘‘तो तुम अपनी मौजूदा जिन्दगी से खुश हो, और उम्र भर इसी नौकरी पर बने रहना चाहते हो, क्यों?’’

रामकिशन अंधेरे में ही हंस कर बोला-‘‘यह तुमसे किसने कह दिया, साहब, कि मैं उम्र भर यहीं नौकरी करूंगा? मेरे लिये क्या स्कोप नहीं है आगे बढ़ने का? प्रभु की करुणा बनी रहे. मैं तो किसी दिन इंजीनियर होकर रहूंगा, साहब. तुम जाने क्या कह रही हो यह?’’

‘‘और इंजीनियर होकर खूब धन कमाओगे, क्यों?’’

‘‘साहब, तुम आज मुझसे नाराज हो क्या? ऐसी जली-कटी बातें कह रही हो मुझसे? ये देखो, साहब, ये जनेऊ है मेरा. इसे छूकर कह रहा हूं. लानत भेजता हूं उस पैसे पर, थूकता हूं मैं उस धन पर जो बेईमानी से, रिश्वत से मिले. तरक्की और बात है, साहब. पैसा पैदा कराना दूसरी बात है. तुमने तो दोनों को एक ही दायरे में बांध दिया. तुम्हारा नजरिया गलत है, साहब. तरक्की का मतलब अगर पैसा ही है, तो ये मारवाड़ी हुए तुम्हारी नजरों में सबसे बडे. क्यों, साहब, मारवाड़ी बनिये को ही तुम सबसे अधिक उन्नति करने वाला मानती हो क्या?’’

क्या जवाब दूं इसे, सोचने लगी. सहसा प्रोफेसर की बात याद आ गई. मैंने पलंग पर गिर कर कहा-‘‘अच्छा, सो जाओ जाकर अब. बहुत रात हो गयी.’’

रामकिशन उठ कर चला गया. जाकर शायद सो भी गया. मुझे नींद न आयी. प्रोफेसर कह रहे थे, कि वे दो किताबें, जो उन्होंने पिछली साल लिखी थी, कोर्स कमेटी ने मंजूर कर ली हैं. कोर्स कमेटी के अध्यक्ष उनके हेड हैं. उन्हीं के कहने से सब हुआ है. और अब दो नई किताबें और लिखनी है, और उस काम में मुझसे सहायता चाहते हैं. पेमेंट की बात भी कही थी दबी जुबान से. पता चला, कि इस पुस्तकों के व्यापार से काफी पैसा कमाया जा सकता है. थोड़ा श्रम चाहिये, थोड़ी बुद्धि चाहिये, और कमेटियों में अपना सोर्स चाहिये. कहने लगे-‘‘मेरे गुरु प्रोफेसर वर्मा की प्रायः पचास किताबें बाजार में चल रही हैं. हर साल नया एडीशन होता है इन किताबों का, और हाई स्कूल से लेकर एम. ए. तक की किताबें उनके नाम पर चलती हैं. क्या तुम समझती हो, कि यह इतना उन्होंने स्वयं लिखा है? कतई नहीं. ऊंची कक्षाओं के विद्यार्थी, उनके शिष्य और पी.एच.डी. के छात्र, जिनकी गरदन उनकी मुट्ठी में है, वे लिखते हैं ये किताबें, जिन पर प्रोफेसर वर्मा का नाम छपता है. प्रति वर्ष हजारों रुपया रायल्टी से पाते हैं. अपने आलीशान बंगले के पिछवाड़े एक बड़ा भारी प्लॉट खरीदा था पिछली साल. वहां पूरी कॉलोनी बनवा रहे हैं एक. स्थायी संपत्ति हो जायेगी उनकी औलाद के लिये. तो, भाई, ऐसे ही चलता है आजकल. हम इधर ध्यान दें अगर, तो काफी लाभ उठा सकते हैं. तीन साल के लिये वर्मा जी फिर बोर्ड के कन्वीनर हो गये हैं. इस योजना में तुम साथ न दोगी, तो कैसे काम हो पायेगा?’’

मुझे मालूम है कि मिश्रा ने भी एक प्लॉट खरीद लिया है छोटा-सा, और नई हाउसिंग स्कीम के अनुसार वहां बंगला बनवा रहे हैं. मुझे यह भी मालूम है, कि मिश्रा ने एक पेपर मिल्स के शेयर्स खरीद रखे हैं. और मिश्रा घोर मितव्ययी आदमी है. पैसा तो मुझे भी चाहिये. मेरे पिता रिटायर होने वाले हैं, और आमदनी घट गई है. मिश्रा के साथ सहयोग करना तो अच्छा ही है.

दूसरे दिन मैंने प्रोफेसर मिश्रा के मकान पर पहुंच कर जब कहा-‘‘काम दीजिए मुझे.’’ वे खिल उठे जैसे. प्रसन्न भाव से बोले-‘‘मैं अभी तुम्हारी ही याद कर रहा था. निशात में एक नई इंगलिश पिक्चर आई है. कॉलेज में कहना ही भूल गया. चलो, देख आयें.’’

मैं इसके लिये असहमत ही थी. लेकिन वे बार-बार आग्रह करने लगे, तो मैं चली गयी उनके साथ पिक्चर देखने. रात को नौ बजे सिनेमा-हाल से निकले, तो मिश्रा बोले-‘‘चलो, पैदल ही चलते हैं थोड़ी दूर. चौराहे पर रिक्शा ले लेंगे. यहां तो ये लोग दूने पैसे मांगते हैं.’’ चलने लगी उनके कदम-ब-कदम.

नहीं जानती, यह प्रश्न उनके मन में कब से उमड़-घुमड़ रहा था. आज यह फिल्म देख कर या बहुत दिन पहले से ही? सूनी पड़ी फुटपाथ पर धीरे-धीरे कदम बढ़ाते कहने लगे-‘‘प्यार क्या चीज है? जीवन की अनिवार्य आवश्यकता, या मात्र मनोरंजन? लक्जरी है क्या? और इसकी सीमा-रेखायें क्या है? लक्ष्य क्या है इसका? उपलब्धि क्या है प्यार की?...बोलो कुछ.’’

मैंने कहा-‘‘मैं कुछ नहीं जानती. आप बताइये.’’

मिश्रा ने आगे बढ़ते हुए कहा-‘‘सच पूछो अगर, तो मैं भी कुछ ज्यादा नहीं जानता. कभी सोचा ही नहीं इस विषय पर. पर एक चीज होती है आदमी की जिन्दगी में, यह मैं स्वीकार करता हूं. उपादेयता भी शायद है कुछ. लेकिन मैं तुम से एक बात जरूर कह सकता हूं. यदि प्यार आदमी के कर्त्तव्यों में खलल डाले, तो ऐसे प्यार की मैं ताईद नहीं कर सकता. कर्त्तव्य अलग है, प्यार अलग है. दोनों अपनी-अपनी सीमा में रहें. क्यों, तुम्हारा क्या ख्याल है?’’

‘‘आप शायद ठीक कहते हैं,’’ मैंने तनिक क्षुब्ध होकर कहा-‘‘रिक्शा खड़ा है वह. पुकार लीजिए.’’

तीन घंटे की लम्बी थकान से मेरा सिर धमक रहा था. ऐसे में प्रेम की व्याख्या मुझे तनिक भी रुचिकर न लगी.

अपने कमरे में घुसी, तो रामकिशन पद्मासन लगाये, मौन बैठा नजर आया. मैंने संकुचित होकर पूछा-‘‘खाना खा लिया?’’

‘‘अभी नहीं,’’ उसने दो टूक कह दिया, और बैठा रहा यों ही.

जाने कैसी कोफ्त हुई अपने ऊपर, और प्रोफेसर पर मन-ही-मन गुस्सा आया. लेकिन यह रामकिशन कैसा है? इसने एक बार भी न पूछा, कि कहां गयी थी मैं. क्या नाराज है?

‘‘नाराज हो क्या?’’ उसे चुपचाप भोजन करते देख, मैंने टोका, तो ग्रास लिगल कर बोला-‘‘बहुत खुश लग रहा है, साहब.

चुप रह गयी मैं.

खाना रोक कर बोला-‘‘मेरे साथ काम करने वाले एक मिस्त्री की औरत बीमार है. दो बच्चे हैं उसके. तीसरा होने वाला है. पैसा है नहीं. ड्यूटी से लौट कर जाता है थका-हारा, तो खाना बनाता है. औरत कमजोर है बहुत ज्यादा. उसे डाक्टर ने कुछ ताकत की दवायें लिखी हैं, घी-दूध-फल खिलाने को कहा है. और वह सूखी रोटी खा रही है. दवा कहां से आये? और, साहब, उसने किसी से न कहा, कि यों मुसीबतजदां है. मैं तो अभी-अभी आ रहा हूं उसके घर से. दस रुपये जो तुमसे लिये थे, उसी के लिए तो ले गया था, साहब. लेकिन दस रुपये से भला क्या होगा? कल कुछ रुपये और देना.’’

रुपया! जीवन की अनिवार्य आवश्यकता. सब से बड़ी चीज यही है न? चारों ओर इसी की चाहना है. वर्त्तमान और भविष्य, दोनों इसी से गुंथे हुए हैं. लेकिन इसकी सीमा-रेखाएं क्या है? और प्रोफेसर आज पूछ रहे थे-प्यार की सीमा-रेखाएं क्या हो सकती हैं. लेकिन प्यार और पैसा, इन दोनों के बीच भी क्या कोई सीमा-रेखा निर्धारित है? सोचती-सोचती सो गई मैं.

दूसरे दिन रामकिशन शाम को लौटा, तो बहुत खुश था. खुश-खुश बोला-‘‘सब इन्तजाम हो गया उसका. किस कदर प्यार है उसे मिस्त्री से. देख कर दंग हो गया. एक अदना जात की अदना औरत. साहब, तुम देखती, तो कहती.’’

मेरी समझ में कुछ न आया, तो स्पष्ट किया रामकिशन ने, कि शादी से पहिले मिस्त्री का किसी से इश्क हो गया था. शादी के बाद शक्ल बदल गयी. पर मन का मोहब्बत बना रहा. और जाने कैसे पता लगा कर वही आश्ना आ पहुंची मिस्त्री के घर. बहुत बुरी तरह लिपट कर रोई अपनी बीमार सौत से, और बहुत-बहुत फटकारा मिस्त्री को. तुमसे सच कहता हूं, साहब, मेरी आंखों में तो आंसू छलछला आये, यह वाकया देख कर.’’

मुझसे प्रोफेसर पूछते थे-‘‘प्यार की उपादेयता क्या है? प्यार की उपलब्धि क्या है? मात्र मनोरंजन, लक्जरी है क्या?’’

मैंने रामकिशन से पूछा यही प्रश्न, वो सीना उभार कर बोला-‘‘प्यार तो दुनिया की सब से बड़ी न्यामत है, साहब. जिसने यह प्यार पाया, सब से बड़ी न्यामत पाई. प्यार के लिये तो सब-कुछ कुर्बान कर देना चाहिए आदमी को. सर्वस्व दे दो तुम, तो भी प्यार की कीमत पूरी नहीं होगी. प्यार माने भगवान. भगवान जैसे पाप-पुण्य से परे हैं, भगवान को जैसे ओर-छोर नहीं है, प्यार के साथ भी वही बात है, साहब. जैसे कोई बेशकीमती हीरा होता है न. आर-पार देख लो, दपदप करता है, निरी जोत ही जोत. वही जोेत प्यार होता है, और कुछ नहीं.’’

एक हल्की-सी ठंडी लहर जैसे मेरे मन में उतर गयी. उसी लहर की शीतलता के बीच मैंने फिर पूछा-‘‘लेकिन अगर प्यार आदमी के कर्तव्य में विघ्न हो, तो?’’

‘‘तुम कैसी बात करती हो, साहब,’’ रामकिशन ने सरल भाव से कहा-‘‘प्यार तो खुद एक कर्त्तव्य है-जिन्दगी का सबसे बड़ा कर्तव्य. बाकी सारे कर्त्तव्य तो बेकीमत हो जाते हैं प्यार के आगे. प्यार तो मिला नहीं तुम्हें. प्यार तो तुमने किया नहीं. अब तुम चाहे कुछ भी कर्त्तव्य बना लो अपना, और अपनी सूखी जिन्दगी गुजार दो. लेकिन, साहब, ओस से कहीं प्यास बुझती है?’’

मैंने नयन मूद लिये थे सुन कर. और रामकिशन मानो आकाश के बीच कहीं खड़ा हौले-हौले बोल रहा था-‘‘प्यार के सहारे दुनिया टिकी है यह. प्यार को तुम अगर मिटा दो, तो दुनिया नेस्त-नाबूद हो जाएगी, चांद से पत्थर बरसने लगेंगे, सूरज आग उगल देगा, समुद्र सूख जायेगा. कोई जिन्दा न बचेगा, सारी सृष्टि स्वाहा हो जाएगी.’’...

इंटर की एक कोर्स-बुक पर नोट्स बना कर ले गई थी मिश्रा के पास. उड़ती नजर से जहां-तहां पांडुलिपि देख कर ही कह दिया-‘‘मैं आज बाहर जा रहा हूं. प्रोफेसर वर्मा ने बुलाया है.’’ रुक कर बोले-‘‘उनकी बड़ी कन्या एम.बी.बी.एस. फाइनल कर रही थी. इरादा था फरदर स्टडी के लिये उसे अमेरिका भेजने का . सो सब गड़बड़ हो गया.’’ रुक कर बोले-‘‘वहीं मेडिकल कॉलेज में सेकेंड इयर के किसी लड़के से घनिष्टता हो गई उसकी .’’ परिणाम बहुत ही भयावह हुआ. लड़की प्रेगनेंट हो गई.’’ रुक कर बोले-‘‘संतान तो खैर नष्ट कर दी गई, लेकिन अब प्रश्न लड़की की शादी का है. वर्मा उसकी शादी कर देना चाहते हैं. जल्दी-से-जल्दी. सो मुझे लिखा है-‘लड़का बतलाओ कोई, जो शारदा को स्वीकार कर ले. संपत्ति का वन थर्ड उस लड़के को दे देंगे.’’

मैंने सिर नीचा किये हुए कहा-‘‘आप कर लीजिए न स्वीकार.’’

सुनकर, चुप रह गये क्षण भर. फिर बोले-‘‘इसी प्रसंग में मुझे बुलाया है. शारदा का वह प्रेमी किसी तरह राजी नहीं हुआ. बात यह है, कि शारदा उस लड़के से चार-पांच साल बड़ी है. अजीब मुसीबत है वह. प्यार कितनी वाहियात चीज है, देखा तुमने? अच्छा तो, अब दूसरी किताब में हाथ लगा दो. पन्द्रह तक अगर तैयार कर सको, तो बेहतर होगा. नमस्ते!’’

मेरा चित्त जाने कैसा हो रहा था. चाय पीते वक्त मैं रामकिशन से आज कुछ न बोली. मेरा मुंह देखता रहा. और फिर कपड़े पहिन कर बाहर निकल गया.

घंटे भर बाद लौट कर आया, तो एक घड़ा था उसके हाथ में.

‘‘यह घड़ा क्यों ले आये? सुराहियां तो हैं.’’ हंसता रहा सुनकर. फिर कपड़े उतार कर, गंजी पहने, मेरे आगे आ बैठा घड़ा लेकर, और स्नेह-भरी वाणी में बोला-‘‘तुम बहुत थक गई हो, साहब. बहुत मेहनत की है किताब लिखने में. तुम्हारा जी बहलाने को ले आया हूं यह बाजा.’’

मुझे कुतूहल हुआ. लेटे से उठ बैठी. तो यह घड़ा नहीं बाजा है. कैसे बजायेगा, देखूं जरा.

रामकिशन ने एक पुराना पैसा निकाला पैंट की जेब से, और घड़े पर हौले-हौले थाप मारता, पैसे से टुन-टुन करने लगा.

 

बड़ी अच्छी लग रही थी वह आवाज.

रामकिशन मुसकराता बोला-‘‘गाना सुनाऊं, साहब?...एक पुरानी गजल सुना रहा हूं. सुनो साहब.’’

दो-तीन बार घड़े पर टुन-टुन करके, रामकिशन ने मेरी ओर ताकते-ताकते गाया-

‘सितमगर हमीं थे सताने के काबिल,

हमारा ही दिल था दुखाने के काबिल.’

मेरी ओर देखता गया, और गाता गया-

‘हमारे ही खूं से किये हाथ रंगीं,

हुए जब वो मेंहदी लगाने के काबिल.’

मेरी आंखों में आंखें डाल कर, ओठों पर मुस्कान लिये, आगे गाया-

‘लिया लब का बोसा, तो झुंझला के बोले

हटो, तुम नहीं मुंह लगाने के काबिल.’

पलकें झुक गयी मेरी. चेहरे पर गर्मी-सी महसूस हुई. और मन में कहीं हल्की-हल्की लहरें-सी उठने लगीं. हल्की-सी सिहरन जैसे सारे तन में व्याप गयी. यह कैसी अनुभूति है?

रामकिशन ने गाना रोक दिया, और जिज्ञासा-भरे स्वर में पूछने लगा-

‘‘अच्छा लगा, साहब? और गाऊं?’’

‘‘गाओ,’’ मैंने पलक झुकाये हुए ही कह दिया.

घड़े पर टुन-टुन हुई, और रामकिशन की सवर-लहरी कमरे में फिर गूंजने लगी-

‘मैं फूल बन के आऊंगा अगली बहार में,

तुम खुद गले लगाओगे गुंथवा के हार में.’

वह गीत, यह तर्ज, यह वाद्य मैं जीवन में पहिली बार सुन रही थी. बिलकुल मन्त्राविष्ट-सी होकर, बीन पर मुग्ध नागिन-सी मैं भीतर जैसे झूम-झूम गई हर ताल पर, विसुभ सी होकर. पलकें झुकी रहीं.

रामकिशन गाता रहा-

‘कब तक दिया करोगे ये झूठी तसल्लियां,

कब तक जिया करेगा कोई इन्तजार में,

मैं फूल बन के आऊंगा अगली बहार में,

बाथरूम में पानी की धार के नीचे बैठी, पुलकित हो रही थी शीतल जल के सुखद स्पर्श से, तो जाने कैसे वही रात वाला रामकिशन का गीत ओठों पर आ गया-‘मैं फूल बन के आऊंगा अगली बहार में.’ गुनगुनाती रही, और धार के नीचे भीगती रही.

देखो मेरी अक्ल को. साड़ी और पेटीकोट पलंग पर ही रखा छोड़ आई. एक बार गुसलखाने से बाहर झांक कर देखा. कोई नहीं था. मात्र तौलिया लपेटे, अपने कमरे की ओर भागी नीची नजर किये. हाय राम! कैसे हो गया यह? हाय, मैं रामकिशन से टकरा गई.

उसने दोनों हाथों से मुझे रोका, और आंखों से आंखें डाल कर, कांपती जुबान से बोला-‘‘साहब-’’

लाज से अधमरी मैं कमरा बन्द करके साड़ी पहिनने लगी, तो मेरे हाथ कांप रहे थे, सीना कांप रहा था, पूरा तन कांप रहा था.

सारे दिन वह दृश्य मेरी नजरों में घूमता रहा. और रामकिशन की ओर आंखें उठाकर देख नहीं पा रही थी चाय पीते वक्त तक.

रात हो गई. और लेट रही मैं उनींदी होकर, तो अचानक ही रामकिशन मेरे सिरहाने आ खड़ा हुआ, और गम्भीर स्वर में बोला-‘‘साहब, कुछ कहना है तुमसे.’’ और उसने हाथ बढ़ाकर, लाइट आफ कर दी. मैं घबरा कर अंधेरे में उठ कर बैठ गई पलंग पर. क्या कहना चाहता है यह? धक्-धक् कलेजा लिये, प्रतीक्षा कर रही थी.

गज भर के फासले पर अंधेरे में डूबे खड़े रामकिशन ने उसी गंभीर आवाज में कहा-‘‘साहब, यह बहुत बुरी बात है. तुम्हें इस तरह नंगे-बदन मेरे सामने नहीं आना चाहिये. साहब, मैं भी इन्सान हूं. साहब, आज बहुत बुरा हुआ है. आइन्दा के लिये ख्याल रखो, साहब. मेरी इन्सानियत को बेआबरू मत करना तुम, हाथ जोड़ता हूं तुम्हारे.’’

अंधेरे में गूंजती वह आवाज चुप हो गई. रामकिशन कब चला गया अपने सोने की जगह, मैंने नहीं जाना. बिलकुल अवसन्न होकर, संज्ञाशून्य सी मैं अपने पलंग पर बैठी, अंधेरे में चारों ओर उड़ते स्फुलिंग देखती रह गई.

प्रतिभा, अपने सम्पूर्ण जीवन में इतनी तुच्छता का बोध मैंने कभी नहीं किया. उस दिन की उस जरा-सी घटना से मैं जैसे हमेशा-हमेशा के लिये रामकिशन के आगे छोटी हो गई. मेरा अहं-भाव खुद मुझे ही जैसे धिक्कारने लगा. अपराध मेरा कुछ नहीं था, तो भी जैसे अपने को अपराधिनी मान लिया मैंने....

प्रतिभा,

यह मेरा तीसरा पत्र है. बहुत बेकरारी में लिख रही हूं आज.

मिश्रा बाहर से जल्दी ही लौट आये थे. पता चला, कि वर्मा जी कि कन्या का मामला तय हो गया. पच्चीस हजार कैश अपने नाम करवा के, उसी लड़के ने शारदा से शादी कर ली, बारात नहीं गई. रजिस्ट्रशन हो गया. जान छूटी झगड़े से.

 

मिश्रा ने हंसते-हंसते सुनाया-‘‘मैं तो तैयार था, लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आई. आखिर उस लड़की को स्वीकार करने में बुराई ही क्या थी? एक जरा-सी गलती हो गई थी उससे. थोड़ा सावधान राहना चाहिये था. शारीरिक भूख कोई अपराध नहीं है. पाप-पुण्य की परिभाषायें ही लोगों ने गलत बना रखी हैं. हमें थोड़ा उदार होना चाहिये, व्यावहारिक होना चाहिये. करुणा, तुमने अपने बारे में क्या सोचा है?’’

चौकी मैं. क्या कहना चाहते हैं ये आज? सोचकर कहा-‘‘कुछ नहीं’’

‘‘कब तक?’’ प्रोफेसर ने कहा-‘‘कुछ तो निर्णय तुम्हें करना ही होगा किसी दिन. ऐसे कब तक चलगा?’’

मैं निरुत्तर रही.

वे बोले-‘‘देखो, व्यावहारिक बनो तुम. मेरे होथ में एक योजना आ रही है. केन्द्रीय सरकार एक लम्बी ग्रन्थमाला का प्रकाशन कर रही है. वर्मा जी उस समिति के मेम्बर हैं. हम क्यों न इस अवसर से लाभ उठायें. वर्मा जी से बात हो गई हेै. उनका स्वास्थ्य भी इधर बहुत क्षीण हो गया है. और अब उन्हें ज्यादा पैसे की भी जरूरत नहीं है. बहुत कमा लिया. बारह जिल्दों का संपादन उनके जिम्में है. वह सब मुझे देने को तैयार हैं. एक रुपया पेज भी अगर मिलता है, तो तकरीबन सात-आठ हजार हुआ. अच्छी-खासी रकम होगी. फिर नाम और यश अलग. बोलो, क्या कहती हो?’’

‘‘ले लीजिये’’. मेरे ओठों पर अनायास ही मुसकान आ गई.

पर मिश्रा सीरियसली बोले-‘‘ले कैसे लूं? अकेले कर पाऊंगा? तुम हामी भरो, तो कदम बढ़ाऊं.’’

मैं चुप रह गई, तो स्वर को स्निग्ध कर के बोले-‘‘देखो, तुम अब थोड़ी गम्भीरता से सोचो इस विषय को. जरा हमराह होकर अगर चलती हो, तो तुम्हें पद, मान, यश और धन, सब सुलभ हो सकते हैं. जीवन की उपादेयता इन्हीं चीजों को ले कर तो है, जानती ही हो तुम. और मेरा बंगला प्रायः बन चुका है. मैं तुम्हें अभी से ऑफर दे रहा हूं. शांति और सुख से रहना वहां. रात को साथ बैठ कर बहुत-सा काम हो सकेगा. वैसे तुम्हारी मर्जी. मैं तुम्हें विवश नहीं कर रहा.’’

मन मेरा बहुत भारी हो गया था. शिथिल-गत होकर लौटी, तो रामकिशन एक चिट्ठी लिये बैठा था. चिट्ठी उसके जीजा ने भेजी थी, और किसी दूर के रिश्तेदार की लड़की से शादी के लिये लिखा था. रामकिशन की राय जाननी चाही थी.

‘‘पढ़ ली, साहब? पूरी चिट्ठी पढ़ ली न? अब बोलो.’’ हंसी आ गई मुझे. मैं क्या बोलूं? शादी तो करनी है न उसे?

बेझिझक बोला-‘‘जरूर करनी है, साहब. लेकिन सलीके की लड़की तो मिले. मन न मिले, तो फिर जीना हराम हो जाता है. वह लड़की, साहब, यों ही है. न ज्यादा खूबसूरत, न बदशक्ल, न ज्यादी भली, न ऐसी बुरी. बस, यों ही है, कामचलाऊ.’’

कामचलाऊ! कहां से चुनकर ले आता है ऐसे शब्द?

मैंने हंसते-हंसते कहा-‘‘कैसी लड़की पाने से तुम खुश रहोगे?...अच्छा, मान लो, कि कोई मेरी जैसी मिल जाय, तब?’’

‘‘क्या पूछती हो, साहब? जिन्दगी का मजा आ जाय, तब तो. सिर-आंखों रखूंगा उसे. प्यार से सराबोर कर दूंगा. उसकी हर ख्वाहिश पूरी करूंगा. जान निछावर कर दूं मैं उस पर.’’

‘‘मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं?’’ प्रसन्नता से पूछा मैंने.

‘‘अब, साहब, यह भी कोई पूछने की बात है? ऐसी बातें मत पूछा करो, साहब, जिनका कहना-सुनना कठिन हो.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ, रजिस्ट्रेशन वाली शादी तुम्हें पसन्द है, कि बाजे-गाजे वाली?’’

‘‘साहब, गाजे-बाजे में जो खूबसूरती है, वह बेमिसाल है. सेहरा बांधकर जाना, अग्निदेवता के आगे बैठकर वचन देना, गांठें बांध कर अग्नि कुड के चारों ओर घूमना, और फिर लड़की वालों की ओर से खातिर-नवाजी. माथे पर लाल रोली के तिलक. औरतों का हुजूम, मीठे-मीठे मजाक. ढोलक पर सुरीले दर्द-भरे गीत. लड़की की विदाई. शहनाई बज रही है, डोला उठ रहा है, लड़की अपने मां-बाप, भाई, सहेलियों से लिपट कर रो रही है. आंसुओं की धारें, मोतियों की लड़ियां बिखर जाती हैं चारों ओर. और फिर सुहागरात. दो धड़कते दिलों का मिलना, घूंघट हटाना, हौले-हौले टूटे-फूटे लाज-भरे बोल. चूड़ियों की खनखनाहट से सब कितना प्यारा लगता है. और यह रहा तुम्हारा रजिस्ट्रेशन, कि दौड़े-छौड़े गये कोर्ट में, और मजिस्ट्रेट के सामने दस्तखत कर आये. बहुत हुआ, तो दस-पांच यार-दोस्तों की टी-पार्टी हो गई. और किस्सा खत्म. न कोई बहू बनी, न कोई दूल्हा बना, और लो शादी हो गई, साहब.’’

मैं जैसे कहीं खो गई थी रामकिशन की बातों में. कुछ बोली नहीं, तो उसने प्रतीक्षा करके पूछा-‘‘क्या सोच रही हो, साहब? तुम्हें यह सब पसन्द नहीं है क्या? बहू बनना अच्छा नहीं लगता क्या?’’

‘‘अच्छा लगता है,’’ मैंने उसकी ओर बिना देखे ही हौले से कहा, खोई-खोई सी होकर-‘‘अपनी पत्नी को बाहर के लोगों से मिलने-जुलने दोगे तुम?’’

‘‘क्यों नहीं मिलने दूंगा? हम एक-दूसरे का यकीन करेंगे.

 

दूसरों से मिलने का यह मतलब तो नहीं है, साहब, कि तुम किसी के गले में बांहें डाल कर मिलो.’’

‘‘ऐसा ही करे तुम्हारी पत्नी, तो क्या करोगे?’’

‘‘टांगें काट दूंगा साली की! जाय मिलने गैर मर्दों से!’’

‘‘माफी नहीं दोगे?’’

‘‘नहीं, साहब. गलती अनजाने हो जाय, तो दूसरी बात है. लेकिन तुम जान-बूझ कर पाप में पैर दो, तो तुम काबिलेरहम हरगिज नहीं हो. पाप तो फिर पाप ही है, साहब.’’

‘‘औरत को गुलाम बना कर रखोगे, क्यों?’’

‘‘साहब, तुम्हारा नजरिया सही नहीं है. औरत तो आदमी की इज्जत-आबरू है. वह जान होती है मर्द की. अपनी जान की तरह मर्द उसकी रक्षा करे, तो वह गुलाम हो गई? वाह, साहब, अच्छी कही तुमने.’’ भावों के उफान मुझे बहाते ले गये, जैसे कहीं कूल-किनारा न हो मेरे लिये. रामकिशन उठकर कब चला गया, याद नहीं पड़ता.

प्रतिभा, रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनायें, जो यों देखने पर अति तुच्छ और नगण्य-सी लगती हैं-क्या इन्हीं घटनाओं को लेकर हमारा सम्पूर्ण जीवन प्रभावित नहीं होता? जीवन की उपलब्धि क्या इन्हीं लघु कार्यकलापों के बीच अन्तर्निहित नहीं है? बड़े काम, बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हमारा जीवन नहीं हैं, ऐसा लगता है. तुम्हें सुनाने के लिये जाने कितना है, पर आज लिख नहीं सकूंगी. सारभूत अब वह घटना, कि जिसने मुझे गेंद की तरह आकाश के बीच उछाल दिया. गेंद तो धरातल पर आ गिरती है. मैं अभागिन जैसे आकाश के बीच टंगी रह गई.

तीन-चार दिन मैं प्रोफेसर मिश्रा के पास जान-बूझकर नहीं गई थी. उन्होने मुझे रामकिशन के साथ सिनेमा-हाउस से बाहर निकलते देख लिया था, और कतरा कर चले गये थे.

अब गई मैं, तो बड़े खुश नजर आये. चहक कर बोल-‘‘प्रोफेसर वर्मा आये थे आज. कलकत्ते के किसी कान्फ्रेंस में शरीक होने जा रहे थे. कुछ घंटों के लिये मेरे पास उतर पड़े. लो, काम तो हो गया अपना. दो-चार दिन में ही केन्द्र से आर्डर आ जायेगा सम्पादन के कार्य का. वर्मा जी अपने सामने आर्डर इशू करा के आये थे. अब, भाई, आ जाओ तुम.’’

एक बार फिर से पूरी योजना सुना दी, और पूछा-‘‘ठीक है न?’’

‘‘ठीक है. मैं अब जाऊंगी. बादल उठ रहे हैं. डर लग रहा है.’’

‘‘बादलों से डरती हो? बादलों को तो लोग प्यार करते हैं. अभी रुको जरा. एक नई चीज दिखाऊं तुम्हें.’’ प्रतिभा, मिश्रा ने जो किया उस दिन, उस डूबती बादलों-भरी सांझ को, वह नितान्त अप्रत्याशित था मेरे लिये. विलायती शराब की बोतल मेरे सामने रखकर कहने लगे ‘‘गुरु जी इसका सेवन करते हैं. यहीं मंगवाकर पी थोड़ी-सी. बाकी छोड़ गये. कह गये, ‘तुम्हारे काम आयेगी.’ तो अब इसका उपयोग आज किया जाय. क्या ख्याल है?’’

‘‘कीजिये उपयोग,’’ मैंने यों ही मुस्करा के कह दिया.

मिश्रा जैसे बहुत आह्लादित हो उठे. छोटे-छोटे दो कांच के प्यालों में वह विलायती शराब-सोडा मिलाकर भर दी, और खिले चेहरे से बोले-‘‘लो, पियो.’’

‘‘मैंने शराब कभी नहीं पी है. मैं नहीं पिऊंगी. आप पी लीजिये.’’

प्रतिभा, यह मेरी निर्बलता थी, कि मात्र कुतूहल था मेरा, साफ-साफ नहीं बतला सकती. पाप की अनौचित्य की एक हल्की-सी आशंका मेरे मन में अवश्य जागी थी, पर मैंने जैसे उस आवाज को दबोच कर दबा दिया.

प्रतिभा, मैंने आखिरकार वह शराब ओठों से लगा ली, और पूरा प्याला गट्-गट् करके पी गई. हां, प्रतिभा, मैंने शराब पी ली मिश्रा के साथ.

बाहर बादल लदे खड़े थे. कमरे में हल्की हरी लाइट और खिड़कियों की राह आते मदमाते पवन के झोंके. जरा देर में ही सुरूर चढ़ने लगा.

मिश्रा मेरी ओर अपलक ताकते हुए, हंसते-मुसकराते हुए पूछने लगे-‘‘कहो, कैसा लग रहा है?’’

‘‘बड़ा अजीब-सा लग रहा है. आपको?’’ मैंने मुस्करा के कहा.

तो मेरे मुख पर आंखें गड़ा कर बोले-‘‘बड़ी दिव्य अनुभूति हो रही है. बड़ा आनन्द-सा है कुछ. अब तक समझो, कि इतने बड़े आस्वाद से वंचित ही रहा मैं.’’

मैंने कोच पर अपना सिर टेक दिया, और नयन मूंद लिये.

बाहर मेघ गिरने लगा था. कितनी सुखद ध्वनि थी. नशे में बहते मिश्रा ने पूछा-‘‘तो तुम मेरे साथ रहोगी न?’’

‘‘रहूंगी,’’ मैंने नयन मूंदे हुए ही कहा.

‘‘हम लेाग हमेशा-हमेशा के लिये साथी रहेंगे न?’’

‘‘रहेंगे,’’ नयन मूंदे ही मैंने कहा.

‘‘हम लोग अपना जीवन सार्थक करेंगे. यश और धन उपार्जित करेंगे...करेंगे न?’’

‘‘करेंगे,’’ नशे की खुमारी में मैंने कहा.

‘‘हम लोग एक-दूसरे को सुख देंगे, खुद भी सुख भोगेंगे,

 

जीवन का वास्तविक आनन्द लूटेंगे...लूटेंगे न?’’

‘‘लूटेंगे,’’ नशे की खुमारी में मैंने कहा.

और तब जाने कैसे मेरा मन बहक गया. एक भला चेहरा, सरल-सी दृष्टि और प्यारा, छल-कपट हीन, शान्त व्यक्तित्व आंखों के आगे मूर्त्त हो उठा क्षण भर में. हौले से मेरे ओंठों से निकल गया-‘‘रामकिशन-’’

‘‘रामकिशन को दफा करो तुम,’’ प्रोफेसर ने स्वर चढ़ा कर कहा-‘‘फौरन दफा कर दो. अपने क्वार्टर में जा कर रहे वह. एक संभ्रांत, उच्च-शिक्षिता नारी के साथ एक साधारण-सा मैकेनिक. बिलकुल अशोभन है यह दृश्य. कहो, अशोभन है. कहो.’’

‘‘अशोभन है,’’ मैंने धीरे से कह दिया.

तो मिश्रा ने मानों बहुत-बहुत खुश होकर कहा-‘‘हम पुराने संस्कार, पुरानी रूढ़ियां कुछ नहीं मानेंगे. यह सब आज के युग में नितान्त व्यर्थ है, कहो तुम.’’

‘‘व्यर्थ है. पाप-पुण्य, सब व्यर्थ है. जीवन का आनन्द जिसमें मिले, वहीं करेंगे हम,’’ मैं मानों जादू के जोर से कहती गई.

‘‘शाबाश!’’ प्रोफेसर उछल कर बोले-‘‘एक-एक प्याला और. जिन्दगी कितनी रंगीन है, कितनी हसीन. लो डार्लिंग, पियो एक जाम और.’’

फिर जैसे होश न रहा मुझे. कमर के पास कुछ दाब-सा महसूस करके, मैंने आंखें चीर कर देखा-मिश्रा मुझसे सटे बैठे थे. मेरी कमर में अपनी बांह लपेटे, मुंह के पास मुंह किये, बड़बड़ा रहे थे-‘‘आवरण हटा दो अब! आवरण हटा दो."

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(संपादक - राकेश भ्रमर , rakeshbhramar@rediffmail.com )

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