मंगलवार, 21 जुलाई 2015

ईबुक - हिंदी साहित्य की, अकल्पनीय तेजी से उभरती पत्रिका "मंतव्य" का अंक 3 पढ़ें

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हरे प्रकाश उपाध्याय के संपादन में हिंदी साहित्य की पत्रिका मंतव्य ने अपने शुरूआती 3 अंकों में ही स्पष्ट सा कर दिया है कि किसी साहित्य की पत्रिका को किस संपादकीय कसावट में प्रस्तुत होना चाहिए. इसी वजह से इसके चर्चे चहुँओर हैं. मंतव्य को उत्तरोत्तर प्रगति की शुभकामनाएँ.

पाठकों की सुविधा के लिए हरे प्रकाश उपाध्याय ने इसे ईशू.कॉम पर निशुल्क ऑनलाइन पठन पाठन हेतु प्रस्तुत किया है. वहीं से एम्बेड लिंक प्राप्त कर इसे रचनाकार के पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. क्लिक टू रीड बटन पर क्लिक कर पढ़ने का आनंद लें. चाहें तो सीधे ही ईशू.कॉम के मंतव्य 3 पृष्ठ पर इस लिंक से जा सकते हैं -

http://issuu.com/mantavya5/docs/mantavya___3

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