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"महावीर उत्तरांचली" की 30 लघुकथाएँ

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लघुकथाकार
"महावीर उत्तरांचली" की  लघुकथाएँ


(१.) आत्ममंथन

"सम्पूर्ण विश्व में मेरा ही वर्चस्व है," भूख ने भयानक स्वर में गर्जना की।

"मै कुछ समझी नहीं," प्यास बोली।

"मुझसे व्याकुल होकर ही लोग नाना प्रकार के उद्योग करते हैं। यहाँ तक की कुछ अपना ईमान तक बेच देते हैं, " भूख ने उसी घमंड में चूर होकर पुन: हुंकार भरी, "निर्धनों को तो मै हर समय सताती हूँ और अधिक दिन भूखे रहने वालों के मै प्राण तक हरण कर लेती हूँ। अकाल और सूखा मेरे ही पर्यायवाची हैं। अब तक असंख्य लोग मेरे कारण असमय काल का ग्रास बने हैं।"

यकायक मेघ गरजे और वर्षा प्रारम्भ हुई। समस्त प्रकृति ख़ुशी से झूम उठी। जीव-जंतु। वृक्ष-लताएँ। घास-फूस। मानो सबको नवजीवन मिला हो! शीतल जल का स्पर्श पाकर ग्रीष्म ऋतू से  व्याकुल प्यासी धरती भी तृप्त हुई। प्यास ने पानी का आभार व्यक्त करते हुए, प्रतिउत्तर में "धन्यवाद" कहा।

"किसलिए तुम पानी का शुक्रिया अदा करती हो, जबकि पानी से ज़्यादा तुम महत्वपूर्ण हो?" भूख का अभिमान बरकरार था।

"शुक्र है मेरी वजह से लोग नहीं मरते, गरीब आदमी भी पानी पीकर अपनी प्यास बुझा लेते हैं। क्या तुम्हें भी अपना दंभ त्यागकर अन्न का शुक्रिया अदा नहीं करना चाहिए?"

प्यास के इस आत्म मंथन पर भूख हैरान थी


(२.) शिक्षक

"आप हर परिस्थिति में इतने शांत, धीर-गंभीर कैसे रहते हैं?" उसने आश्चर्य से कहा।

"मैं जीवन के रहस्य को समझ गया हूँ बेटा," वृद्ध व्यक्ति ने अपनी उम्र से आधे उस जिज्ञासु युवा से कहा, "क्या मै तुम्हे बेटा कहने का अधिकार रखता हूँ।"

"हाँ-हाँ क्यों नहीं, आप मेरे पिता की आयु के हैं," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे कुछ ज्ञान दीजिये।"

"बचपन क्या है?" यूँ ही पूछ लिया वृद्ध ने।

"मूर्खतापूर्ण खेलों, अज्ञानता भरे प्रश्नों और हंसी-मज़ाक़ का समय बचपन है।" उसने ठहाका लगाते हुए कहा।

"नहीं वत्स, बाल्यावस्था जीवन का स्वर्णकाल है, जिज्ञासा भरे प्रश्नों, निस्वार्थ सच्ची हंसी का समय।" वृद्ध ने गंभीरता से जवाब दिया। फिर पुन: नया प्रश्न किया, "और जवानी?"

"मौज-मस्ती, भोग-विलास और एशो-आराम का दूसरा नाम जवानी है।" युवा तरुण उसी बिंदास स्वर में बोला।

"दायित्वों को पूर्ण गंभीरता से निभाने, उत्साह और स्फूर्ति से हर मुश्किल पर विजय पाने, नए स्वप्न संजोने और सम्पूर्ण विश्व को नव
दृष्टिकोण देने का नाम युवावस्था है।" वृद्ध ने उसी धैर्य के साथ कहा।

"लेकिन वृद्धावस्था तो मृत्यु की थका देने वाली प्रतीक्षा का नाम है।" वह तपाक से बोला। शायद वह बुढ़ापे पर भी वृद्ध के विचारों को जानना चाहता था, "जहाँ न ऊर्जा का संचार है, न स्वप्न देखने की ज़रूरत। बीमारी और दुःख-तकलीफ का दूसरा नाम जीवन संध्या। क्यों आपका क्या विचार है?" उसने मानो वृद्ध पर ही कटाक्ष किया हो।

"वत्स, तुम फिर गलत हो। जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया रखो।" वृद्ध ने अपना दृष्टिकोण रखा, "वृद्धावस्था उन सपनों को साकार करने की अवस्था है, जो तुम बचपन और जवानी में पूर्ण नहीं कर सके। अपने अनुभव बच्चों और युवाओं को बाँटने की उम्र है यह। रही बात मृत्यु की तो किसी भी क्षण और किसी भी अवस्था में आ सकती है, उसके लिए प्रतीक्षा कैसी?"

"आप यदि मेरे गुरु बन जाएँ तो संभव है मुझे नई दिशा-मार्गदर्शन मिल जाये," नतमस्तक होकर वह वृद्ध शिक्षक के चरणों में गिर पड़ा।


(३.) नई बात

"काश! तुम लोगों ने मुझे इंसान ही रहने दिया होता, भगवान् नहीं समझा होता!" प्रभु विन्रम स्वर में बोले।

"प्रभु ऐसा क्यों कह रहे हैं? क्या हमसे कुछ अपराध बन पड़ा है?" सबसे करीब खड़े भक्त ने करवद्ध हो, व्याकुलता से कहा।

"अगर मै सच्चा इंसान बनने की कोशिश करता तो संभवत: भगवान् भी हो जाता!" प्रभु ने पुन: विन्रमता के साथ कहा।

"वाह प्रभु वाह।" आज आपने 'नई बात' कह दी," भक्त श्रद्धा से नतमस्तक हो गया और वातावरण में चहुँ ओर प्रभु की जय-जयकार गूंजने लगी।

भगवान् बनने की दिशा में वह एक कदम और आगे बढ़ गए।


(४.) प्रतिक्रिया

टेम्स नदी के तट पर बैठे गोरे आदमी ने काले व्यक्ति से अति गंभीर स्वर में कहा, "काला, ग़ुलामी और शोषित होने का प्रतीक है। जबकि गोरा, आज़ादी और शासकवर्ग का पर्याय! इस पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया है?"

काले ने गोरे को ध्यान से देखा।  उसकी संकीर्ण मनोदशा को भांपते हुए शांत स्वर में काले  ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, "जिस दिन काला बग़ावत कर देगा, उस दिन गोरे की आज़ादी ख़तरे में पड़ जाएगी और काला खुद शासन करना सीख जाएगा।"

"कैसे?" उत्तर से असंतुष्ट गोरे ने पूछा। उसकी हंसी में छिछोरापन साफ़ झलक रहा था।

"देखो," अपनी उंगली से काले ने एक और इशारा किया, "वो सामने सफ़ेद रंग का कुत्ता देख रहे हो!"

"हाँ, देख रहा हूँ।" गोरे व्यक्ति ने उत्सुक होकर कहा।

"उसे गोरा मान लो।" काले ने बिंदास हंसी, हँसते हुए कहा।

"ठीक है।" अब गोरा असमंजस में था।

"जब तक वह शांत बैठा है, हम उसे बर्दाश्त कर रहे हैं। ज्यों ही वह हम पर भौंकना शुरू करेगा या हमें काटना चाहेगा, हम उसका सर फोड़ देंगे।" इतना कहकर काले ने खा जाने वाली दृष्टि से गोरे की तरफ देखा। इस बीच कुछ देर की ख़ामोशी के बाद काला पुनः बोला, "फिर दो बातें होंगी?"

"क्या?" कुछ भयभीत स्वर में गोरा बोला।

"या तो वह मर जायेगा! या फिर भाग जायेगा!" इतना कहकर काले ने गोरे को घुरा, "तुम्हें और भी कुछ पूछना है?"

"नहीं।" गोरे ने डरते हुए कहा और वहां से उठकर चल देने में अपनी भलाई समझी।


(५.) भोग

"आ ठकुराइन ... आ बैठ।" मंदिर के पुजारी पंडित राम आसरे ने अपने सामने बड़े आदर-सत्कार के साथ बूढी ठकुराइन को बिठाया और शाम के समय ईश्वर को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद, ठकुराइन के सामने परोस दिया।

"भोजन ग्रहण करो ठकुराइन ... राधा बिटिया ने बड़े मन से बनाया है।" पुजारी जी ने आग्रह किया और ठकुराइन की आँखें छलछला आईं। यह देखकर पुजारी जी की बिटिया राधा क्रोधित हो गई लेकिन चुपचाप रही।

"राधा ज़रा लौटे में जल तो भर ला बेटी।" पंडित जी ने बिटिया को आदेश दिया।

भोजन के उपरान्त लाख-लाख आशीष देकर ठकुराइन लाठी टेकती हुई वहां से चली गई। मंदिर की सीढियाँ उतरने में पुजारी जी ने भी ठकुराइन की सहायता की।

जब पुजारी जी मंदिर में वापिस लौटे तो बिटिया को क्रोधित अवस्था में देखकर चौंके।

"बाबा आपने ऐसा क्यों किया? मैंने बड़े जतन से ठाकुर जी के लिए प्रसाद बनाया था और आपने ठकुराइन को खिला दिया," राधा के स्वर में खिन्नता झलक आई।

"बिटिया तुम्हारा क्रोध करना उचित है। तुम तो जानती ही हो कि दो महीने पहले जब ठाकुर साहब का निधन हुआ था तो ठकुराइन के दोनों निकम्मे बेटों धीरू और वीरू ने सारे सामान और सम्पति के साथ-साथ माँ का भी बंटवारा कर दिया। यह तय किया कि एक-एक दिन छोड़कर दोनों माँ को भोजन देंगे। इस तरह आधे महीने एक बेटा भोजन देगा तो आधे महीने दूसरा। वीरू परसों अपनी पत्नी के साथ साले की शादी करने हेतु ससुराल चला गया। चौधरी को यह कहकर कि दो दिन में वीरू अपने ससुराल से लौट आएगा। इस बीच एक दिन का भोजन तो चौधरी ने करवा दिया। अगले दिन धीरू ने भी अपने हिस्से का भोजन ठकुराइन को करवा दिया मगर वीरू आज भी अपने ससुराल से नहीं लौटा है। इसलिए ठकुराइन  सुबह से भूखी-प्यासी बैठी थी।  आज किसी ने भी ठकुराइन को भोजन के लिए नहीं पूछा। रास्ते में अचानक मेरी भेंट ठकुराइन से हुई तो सारी बात का पता चला। ठकुराइन ने बड़ी व्याकुलता से कहा था--पंडित जी सांझ होने को आई है और मैं सुबह से भूखी हूँ।" इतनी कहानी कहने के उपरांत पंडित जी ने राधा से ही प्रश्न किया, "अब तू ही फैसला कर बेटी ... गांव का एक व्यक्ति सुबह से भूखा है और हम भोजन कर रहे हैं तो हमसे बड़ा नीच कौन होगा? पत्थर के ठाकुरजी तो एक वक़्त का उपवास सह सकते हैं लेकिन हाड-मांस की ठकुराइन वृद्धावस्था में पूरे एक दिन भूख कैसे बर्दाशत करेगी?" कहते-कहते पुजारी जी की आँखें भर आईं, "बेटी, सही अर्थों में मेरी जीवन भर की पूजा-अर्चना आज सफ़ल हुई है।"

"बाबा ..." राधा की आँखों में आंसू थे और अपने पिता के लिए गर्व भी।


(६.) ठहाका

"साहब, भारत में माता के नौ रूपों की पूजा होती है," मंदिर के सामने माता की मूर्ति को नमन करते हुए राजू गाइड ने अमेरिकन टूरिस्ट से अंग्रेजी में कहा और नवरात्रों का महत्व तथा माता के रूपों का विस्तार से वर्णन करने लगा, "इतना ही नहीं साहब, यहाँ की सती स्त्रियों ने तो अपने तप के प्रभाव से यमराज के चंगुल से अपने पति के प्राण तक वापिस मांग लिए। यहाँ गाय को गौमाता कहा जाता है। और तो और नदियों तक में माता की छवि देखी  जाती है जैसे मोक्षदायनी गंगा मईया, यमुना, कृष्णा, कावेरी, गोदाम्बरी, गोमती आदि। विश्व का पहला अजूबा ताजमहल शाहजहाँ और मुमताज़ के अमर प्रेम का उत्कृष्ट उद्धाहरण है," इसके बाद भी राजू गाइड उस टूरिस्ट को हिन्दुस्तान की न जाने क्या-क्या खूबियाँ गिनाने लगा और ऐसा कहते वक्त उसके चेहरे पर अति गर्व का भाव था।

"लेकिन तुम्हारे यहाँ आज भी कन्या के जन्म पर मातम क्यों मनाया जाता है," उस टूरिस्ट ने बड़ी गंभीरतापूर्वक कहा।

"प ... प ... पता नहीं साहब," सिर खुजाते हुए राजू गाइड बड़ी मुश्किल से बोल पाया था और अगले ही पल उसके हिंदुस्तानी होने का गौरव न जाने कहाँ गुम हो गया।

"रिलेक्स राजू गाइड तुम तो सीरियस हो गए, मै तो यूँ ही मज़ाक में पूछ रहा था," कहकर उस टूरिस्ट ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया। साथ देने के लिए राजू भी हंसा, मगर उसका चेहरा उसकी हंसी में बाधक था।


(७.) एन० आर० आई०

"देख कुलवंत ज़माना बहुत ख़राब है। आजकल एन० आर० आइज़ ने नया ट्रेंड चला रखा है। कई जगह ऐसे केस हो चुके हैं कि यहाँ कि भोली-भाली लड़कियों या विधवा औरतों को विदेश जाने का लालच देकर अप्रवासी भारतीय उनसे शादी का नाटक रचा लेते हैं और अपनी छुट्टियों को रंगीन बनाकर वापिस चले जाते हैं, हमेशा के लिए..."

"नहीं-नहीं मेरा मनिंदर ऐसा नहीं है, उसने मुझे शादी से पहले ही सोने की अंगूठी भेंट की थी और कहा था इंग्लैंड में वह बहुत बड़े बंगले का मालिक है। जिसे शादी के बाद वह मेरे नाम कर देगा और कुछ ही समय बाद जल्द से जल्द वह मुझे भी इंग्लैंड ले जायेगा..."

"रब करे ऐसा ही हो कुलवंत, तेरा बच्चा इंग्लैंड में ही आँखें खोले..."

असहनीय प्रसव पीड़ा में भी कुलवंत कौर के कानों में अपनी सखी मनप्रीत के कहे शब्द गूंज रहे थे। उसे यकीन नहीं रो रहा था कि उसके साथ भी छल हुआ है, "तो क्या मै उस हरामी का पाप जन रही हूँ ... जो परदेश जाकर मुझे भूल ही गया, पिछले छह महीनों से जिसने एक फ़ोन तक नहीं किया ... हाय! मै क्यों उसके झांसे में आई ... लन्दन में उसका आलीशान बंगला, थेम्स नदी की सैर... इंग्लैंड की सुपरफार्स्ट ट्रेने ... आह! इन वादों की आड़ में वह गिद्ध
दिन-रात मुझे नोचता रहा ... मेरे भोले-भले जज्बातों से खेलता रहा ... काश! उसके इरादों का पहले पता चल जाता तो ..."

छल-कपट की ग्लानि में प्रसव की पीड़ा गौण हो गई। उसकी नवजात बच्ची की किलकारियां वातावरण में गूंजने लगी। एन० आर० आई० मनिंदर का विश्वाशघाती चेहरा उसकी आँखों में घूमने लगा। अतः उसका भी जी चाहा कि नवजात बच्ची की किलकारियों के बीच वह भी दहाड़े मारके रोने लगे।


(८.) तिलचट्टे

"वो देखो दाने-पानी की तलाश में निकलती तिलचट्टों की भीड़।" लेबर चौक के चौराहे पर हरी बत्ती की प्रतीक्षा मैं खड़ी कार के भीतर से किसी ने मजदूरों के समूह पर घिनोनी टीका-टिप्पणी की।
"हराम के पिल्ले," कार के निकट मेरे साथ खड़ा कलवा उस कार वाले पर चिल्लाया, "हमारा शोषण करके तुम एशो-आराम की जिंदगी गुज़ार रहे हो और हमे तिलचट्टा कहते हो। मादर .... ।" माँ की गाली बकते हुए कलवे ने सड़क किनारे पड़ा पत्थर उठा लिया। वह कार का शीशा फोड़ ही देता यदि मैंने उसे न रोका होता।  कार वाला यह देखकर घबरा गया और जैसे ही हरी बत्ती हुई वह तुरंत कार को दौड़ाने लगा।

"कलवा पागल हो गए हो क्या तुम?" मैंने उसे शांत करने की कोशिश की। 

"हाँ-हाँ पागल हो गया हूँ मैं। हम मजदूरों की तबाह-हाल जिंदगी का कोई आमिरजादा मजाक उडाए तो मैं बर्दास्त नहीं कर सकता। साले का सर फोड़ दूंगा। चाहे वह टाटा-बिडला ही क्यों न हो?" कलवा पर जनून हावी था।

"जल्दी चल यार फैक्ट्री का सायरन बजने वाला है, कहीं हॉफ-डे न कट जाये," और दोनों मित्र मजदूरों की भीड़ मैं ग़ुम हो गए।

दिन तक माहौल काफी बदल चुका था।  सभी मजदूर बाहर काके के ढाबे पर दिन की चाय पीते थे। गपशप भी चलती थी. जिससे कुछ घडी आराम मिलता था। चाय तैयार थी और मैंने दो गिलास उठा लिए और एक कलवा को पकड़ते हुए कहा," साहब के मिजाज़ अब कैसे हैं? सुबह तो बड़े गुस्से मैंने थे!"

"अरे यार दीनू रोज की कहानी है," कलवा ने गरमा-गरम चाय को फूंकते हुए कहा, "घर से फैक्ट्री ... फिर फैक्ट्री से घर... अपनी पर्सनल लाइफ तो बची ही नहीं... सारा दिन मशीनों की न थमने वाली खडखडाहट। चिमनी का गलघोटू धुआँ। किसी पागल हाथी की तरह सायरन के चिंघाड़ने की आवाज़।  कभी न ख़त्म होने वाला काम... क्या इसलिए उपरवाले ने हमे इन्सान बनाया था?" आसमान की तरफ देखकर जैसे कलवा ने नीली छतरी वाले से प्रश्न किया हो, "सुबह के टेम, सही बोलता था, वह उल्लू का पट्ठा--हम तिलचट्टे हैं। क्या कीड़े-मकोड़ों की भी कोई जिंदगी होती है? क्या हमें भी सपने देखने का हक है?"

"तुम्हारी बात सुनकर मुझे पंजाबी कवि पाश की पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं," मैंने हँसते हुए कहा।

"यार तू बंदकर अपनी सहितियक बकवास। जिस दिन फैक्ट्री में कदम रखा था, बी० ए० की डिग्री मैं उसी दिन घर के चूल्हे मैं झोंक आया था।" कहकर कलवा  ने चाय का घूँट भरा।

"सुन तो ले पाश की ये पंक्तियाँ, जो कहीं न कहीं हमारी आन्तरिक पीड़ा और आक्रोश को भी छूती है," मैंने जोर देकर कहा।

"तू सुनाये बिना मानेगा नहीं, चल सुना," कलवा ने स्वीकृति दे दी।

"सबसे खतरनाक है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना
घरों से रोजगार के लिए निकलना और दिहाड़ी करके लौट आना
सबसे खतरनाक है हमारे सपनो का मर जाना,"

मेरे मुख से निकली 'पाश' की इन पंक्तियों ने आस-पास के वातावरण में गर्मी पैदा कर दी। काके चायवाले ने हैरानी से भरकर कहा," अरे तुम दोनों
तो बड़ी ऊँची-ऊँची बातें करने लगे हो."

"काके नपुंसक लोग बातें ही कर सकते हैं और कुछ नहीं!" कहकर कलवा ने ठहाका लगाया, "जरा अपना टीवी तो आन कर, कुछ समाचार ही देख लें।"
टीवी पर रात हुए रेलवे दुर्घटना के समाचार को दिखाया जा रहा था।  दुर्घटना स्थल के तकलीफ देह चित्र। रोते-बिलखते परिवारजन।  रेलमंत्री द्वारा मुवावजे की घोषणा।  मृतकों को पांच-पांच लाख और घायलों को दो-दो लाख।

"बाप रे..." पास खड़े मजदूर ने आश्चर्ये से कहा, "यहाँ दिन-रात मेहनत करके  मरने से भी स्साला कुछ नहीं मिलता! रेल दुर्घटना में पांच-पांच लाख!"

"काश! मृतकों और घायलों में हम भी होते!" उस मजदूर की बातों के समर्थन में जैसे कलवा धीरे से बुदबुदाया हो।

मेरे हाथ से चाय का गिलास छूट गया और मैंने अपने जिस्म पर एक झुरझुरी-सी महसूस की।


(९.) लुत्फ़

"रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरे …", "चुपके-चुपके रात-दिन आंसू …", "पिया रे, पिया रे … लागे नहीं म्हारो जिया रे", एक से बढ़कर एक खूबसूरत ग़ज़लें, नज्में, सूफियाना गीत-संगीत के नशे में राजेश डूबा हुआ था। शाम का समय। कक्ष में हल्का अँधेरा और डी. वी. डी. प्लेयर से आती मदहोश करती आवाज़ें। कभी महंदी हसन, कभी ग़ुलाम अली तो कभी उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान … सभी बेजोड़। सभी एक से बढ़कर एक स्वर।सभी पुरसुकून से भर देने वाली आवाजें।

सोफे पर आराम से बैठा राजेश एक हाथ में व्हिस्की का गिलास और दूसरे हाथ में सिगरेट। पुरे वातावरण में शराब, धुआं और संगीत इस तरह घुल-मिल गए थे कि तीनों को अलगकर पाना असंभव था।

"डिंग-डांग … डिंग-डांग …." डोर बैल बजी तो राजेश संगीत की दुनिया से वास्तविकता में लौट आया, 'कौन कम्बख्त … इस वक़्त! ' वह मदिरा के खुमार में धीमे से बुदबुदाया। "आ जाओ दरवाज़ा खुला है!" बाकि संवाद उसने बुलंद आवाज़ में कहा। द्वार के कपाट खुले तो, "अरे अखिलेश तुम!"

"वाह भाई राजेश, देश में आग लगी हुई है और तुम मज़े से दुश्मन देश के कलाकारों की ग़ज़लें सुन रहे हो … " अखिलेश चिल्लाया, "पता है बीती रात हमारे पांच फौजी शहीद कर दिए कमीनों ने …."

"अरे यार अखिलेश मूड खराब मत करो। किसी भी कलाकार को देश, काल और सीमा में मत बांधो, वह सबके लिए होते हैं।"

"आज़ादी के बाद से चार बड़े हमले। संसद पर हमला। छब्बीस ग्याहरा। उनके जिहादियों द्वारा जगह-जगह बम विस्फ़ोट … कैसे भूल सकते हो तुम, बदमाश पडोसी की करतूत को!"

"बड़ा पैग लेगा या छोटा …" राजेश ने उसकी बातों को दरकिनार करते हुए कहा।

"बड़ा …" अखिलेश बोला और मेज़ पर रखे सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट निकालकर सुलगा ली।

"कभी -कभी तो खुंदक आती है, हमारी निकम्मी सरकार क्या कर रही है? अलगाव को हवा देती राजनीति को बंद क्यों नहीं करते ये लोग! रोज़-रोज़ की यह चिक-चिक ख़त्म क्यों नहीं करते? एक सख्त कानून बनाकर क्यों नहीं देशद्रोहियों को फांसी देते?" कहकर सिगरेट के दो-तीन कश लगाने के बाद अखिलेश ने व्हिस्की का पैग हलक से नीचे उड़ेल दिया। फिर प्लेट में रखे चिकेन का लुत्फ़ लेने लगा।

"वोट बैंक… जाति-धर्म की राजनीति … लालफीताशाही … मुनाफाखोरी … पूंजीवाद … भ्रष्टाचार … लोकतंत्र की सारी कड़ियाँ, एक-दुसरे से जुडी हैं। क्या-क्या ठीक करोगे मेरे भाई? " राजेश ने पहली बार भीतर के आक्रोश को अभिव्यक्ति दी, "चुपचाप लेग पीस चबाओ… दारू पियो … और चिंता-फ़िक्र को धुंए में उडा दो … उस्ताद गायकों की ग़ज़लों का लुत्फ़ लो … " कहकर राजेश ने रिमोट से स्वर का स्तर बढ़ा दिया और दोनों मित्र एक दूसरी ही दुनिया में खोने लगे।

 
(१०.) संवेदना

"एक ज़बरदस्त टक्कर लगी और सब कुछ ख़त्म …" अपने मोबाइल से हवलदार सीताराम ने इंस्पेक्टर पुरुषोत्तम को ठीक वैसे ही और उसी अंदाज़ में कहा, जैसा कि उसने एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह के मुख से सुना था, "सर ड्राईवर को चीखने तक का मौका नहीं मिला। एक चश्मदीद ने मुझे यह सब बताया … खून के छीटे …"

"ज़्यादा विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है बेवकूफ़। तुम्हे पता नहीं मैं हार्ट पेशंट हूँ …." इंस्पेक्टर पुरुषोत्तम ने टोकते हुए कहा।

"सॉरी सर" सीताराम झेंपते हुए बोला।

"ये बताओ, दुर्घटना हुई कैसे?" पुरुषोत्तम का स्वर कुछ गंभीर था।

"सर ये वाक्या तब घटा, जब एक कार सामने से आ रहे ट्रक से जा टकराई।"

"ट्रक ड्राइवर का क्या हुआ? कुछ पैसे-वैसे हाथ लगे की नहीं।"

"पैसे का तो कोई प्रश्न ही नहीं सर"

"क्यों?"

"वह मौके से फरार हो गया था. मैं दुर्घटना स्थल पर बाद में पंहुचा था।"

"तुम्हे दो-चार दिन के लिए निलंबित करना होगा।"

"क्यों सर?"

"तुम मौके पर कभी नहीं पंहुचते?"

"सॉरी सर!"

"अबे सॉरी कह रहा है बेवकूफ। क्या जानता नहीं दुर्घटनाएं हमारे लिए फायदे का सौदा होती हैं? आज के दौर में बिना ऊपरी कमाई के गुज़र -बसर करना मुश्किल है। जितने अपराध … उतनी आमदनी … " पुरुषोत्तम ने विस्तार पूर्वक सीताराम को समझाया, "खैर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है … ट्रक और कार की अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करो, शायद कुछ कीमती सामान हाथ आ जाये। एक काम करो मुझे ट्रक और कार का नंबर लिखवा दो.… इससे इनके मालिकों का पता चल जायेगा तो वहां से कुछ फायदा-मुनाफ़ा …" कहते-कहते इंस्पेक्टर के स्वर में चमक आ गई।

"साब जिस जगह दुर्घटना हुई है, वहां अँधेरा है. नंबर ठीक से दिखाई नहीं पड़ रहा है। एक सेकेण्ड सर … मोबाईल की रौशनी में कार का नंबर पढने की कोशिश करता हूँ।" और सीताराम ने जैसे ही कार का पूरा नंबर पढ़कर पुरुषोत्तम को सुनाया वह बुरी तरह चीख पड़ा, "नहीं, ये नहीं हो सकता … ये कार तो मेरे लड़के अमित की है…." और फ़ोन पर पहली बार मानवीय संवेदनाएं उमड़ पड़ी। अब तक जो इंस्पेक्टर दुर्घटना में नफा-नुकसान ही देख रहा था। पहली बार उसके हृदय का पिता जीवित हुआ था।

"संभालिये सर अपने आपको …" सीताराम इतना ही कह सका था कि फ़ोन डिस्कनेक्ट हो गया।


(११.) सोच

सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त आदमी को देखकर भीड़ तरह-तरह की बातें बना रही थी ---

"हाय राम! कितनी बेदर्दी से कुचल गया है ट्रक वाला इसे, शायद ही बचेगा।"

"आग लगा दो ट्रक वाले को… साले अन्धे होकर चलते हैं।"

"बहुत ख़ून बह गया है बेचारे का।"

"अरे कोई हास्पिटल ले चलो बेचारे को शायद बच जाये।"

"अरे भाईसाहब आप तो टैक्सी वाले हैं।"

"तो फिर ..."

"फिर क्या आप अपनी टैक्सी में बिठाकर ले चलिए उसे अस्पताल?"

"इसके ख़ून से जो सीटें खराब होंगी, उसकी धुलाई के पैसे क्या तेरा बाप  देगा?"

"ओये भैन के ... तमीज़ से बोल वरना अभी मिनट में रामपुरी अन्दर कर दूंगा।"

"अरे भाईसाहब, आप लोग क्यों लड़ रहे हो? मैंने एम्बुलेंस और पुलिस वालों को फोन कर दिया है। बस थोड़ी देर में आ जायेंगे।"

"चलो-चलो, सब भीड़ मत लगाओ। ऐसे हादसे तो होते ही रहते हैं।"

इसी तरह भीड़ हटती और छंटती रही। सभी लोग दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति का तमाशा देखते रहे। किसी ने ये नहीं सोचा कि किसी रास्ते या मोड़ पर उनमे से किसी के साथ ऐसा ही कोई हादसा पेश आ सकता है और फिर वहां भी मौजूद होगी, ऐसी ही सोच! ऐसी ही न खत्म होने वाली बातें!

 
(१२.) स्वामी जी

स्वामीजी पर बलात्कार का आरोप लगा! पता नहीं सही था या आधारहीन क्योंकि प्रभु राम की तरह पूजनीय स्वामीजी को अब भी कोई रावन मानने के लिए तैयार न था। फ़िलहाल देश-विदेश में फैले हुए उनके समस्त अनुयायियों में हडकंप मच गया।

"ये सब झूठ है। साजिश है। धोका है। छलावा है। षड्यंत्र है। जालसाज़ी है। सरासर ग़लत है।" स्वामी जी सहित उनके तक़रीबन चाहने वालों ने मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं में कुछ इसी तरह के मिले-जुले बयान दिए।

बलात्कार की शिकार युवती ने जो बयान दिया था। उसके आधार पर स्वामी जी के भव्यतम आश्रम पर पुलिस के रेड पड़ी और अनगिनित आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई। जैसे -- हिरोइन, अफीम, चरस, गंजा स्मैक और विलायती शराब का बहुत बड़ा भण्डार सीलकर दिया गया। इसकी कीमत अंतर्राष्टीय मुद्राकोष में अरबों-खरबों डालर आँकी गई थी। देह व्यापार में लिप्त आश्रम की सैकड़ों युवतियां, जिनमे से अधिकांश विदेशी थीं, बरामद की गईं। उनमे से कुछ काल-गर्ल्स के बयान चौंका देने वाले थे। सत्तारूढ़ व विपक्ष के अनेक मंत्रीगण इन गैरकानूनी कामों में स्वामीजी के भागीदार और सहयोगी बताये गए थे। इसी कारण अब सरकार के गिरने का भी खतरा पैदा हो गया था। क्या आम आदमी, क्या राजनेता सभी की नींद उड़ गई थी। स्वामी जी ने रुपया-पैसा पानी की तरह बहाया मगर मामला शांत नहीं हुआ। अत: राजनीतिज्ञों द्वारा तुरंत आनन-फानन में एक आपात मीटिंग बुलाई गई।
जिसमे स्वामीजी, बलात्कार की शिकार युवती और पक्ष-विपक्ष के फंसे हुए तमाम मंत्रिगण मौजूद थे। जिन्हें मीडिया ने लोकतंत्र का कर्णधार बताया था। बैठक में क्या-क्या कार्यवाही हुई और क्या-क्या फैसले लिए गए, यह उस रात तक परम गोपनीय था। आम-आदमी तक अपना ज़रूरी काम छोड़कर समाचार चैनलों से चिपका हुआ था कि आगे क्या होने वाला है?

सुबह वातावरण पूरी तरह से बदला हुआ था। खादीधारियों ने कैमरे के सामने निम्नलिखित बयान दिए--

"ये स्वामी जी को बदनाम करने की साजिश थी, महज़ घटिया पब्लिसिटी स्टंट था," एक मंत्रीजी सिगरेट का धुँआ उड़ाते हुए बोले।

"स्वामीजी की पीठ पीछे सारे ग़ैर क़ानूनी कम हो रहे थे," दूसरे मंत्री ने पान की पीक थूकी।

"जिन कार्लगर्ल्स ने नेताओं के नाम उछाले, वह सब पाकिस्तान की सर्वोच्च गुप्तचर संस्था आई० एस० आई० के लिए काम करती थीं," कहते हुए तीसरे मंत्रीगण ने गुटके का पूरा पाउच मुंह में उड़ेल लिया।

"पूरा विश्व जान ले की संसद के बाहर पक्ष-विपक्ष एक है। भले ही संसद के भीतर, हमारे बीच कितने ही मतभेद क्यों न हों?" चौथे ने मुट्ठी भींचकर दांत फाड़ते हुए कहा और ऊँचे सुर में चिल्लाया, "हम सब साथ-साथ ..."

"लोकतंत्र ऐसी बेहूदा हरकतों से टूटने वाला नहीं है," पीछे से एक उतावले नेता ने औरों को धकियाते हुए कैमरे के आगे अपना थोबड़ा चमकाते हुए कहा।

इन सब बयानों से ज्यादा चौंका देने वाला सीन, जो सभी समाचार चैनलों ने प्रमुखता से दिखाया, उसे देख सब लोग आश्चर्यचकित थे। स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए सार्वजनिक रूप से उस युवती को बहन कहकर संबोधित किया और राखी भी बंधवाई, जिस युवती पर कल तक स्वामी जी के द्वारा बलात्कार का आरोप लगा था। इसके उपरांत दोनों भाई-बहन एक ही कार में बैठकर हाथ हिलाते हुए विदा हुए।

"यह लोकतंत्र की महान जीत है!" कार के ओझल हो जाने के उपरांत भीड़ में से किसी ने पता नहीं कटाक्ष क्या था या तारीफ़?

 
(१३.) जायज़
घटना नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की है।

काफ़ी बहस के बाद कूली सौ रूपये में राज़ी हुआ तो मेरे 'साले' के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई। एक छोटी-सी लोहे की ठेला-गाड़ी में कूली ने दो बक्से, चार सूटकेश और बिस्तरबंद बड़ी मुश्किल से व्यवस्थित किया और बताये गए स्थान पर चलने लगा।

"इस सामान का वज़न कराया है आपने?" सामने से आते एक निरीक्षक ने मेरे साले की तरफ़ प्रश्न उछाला।

"कहाँ से आ रहे हो?" दूसरा प्रश्न।

"कोटद्वार से ..."

"कहाँ जाओगे?" तीसरा प्रश्न।

"जोधपुर में मेरी पोस्टिंग हुई है। सामान सहित बाल-बच्चों को लेकर जा रहा हूँ।"

"निकालो पाँच सौ रूपये का नोट, वरना अभी सामान ज़ब्त करवाता हूँ।" हथेली पर खुजली करते हुए वह काले कोट वाला व्यक्ति बोला।

"अरे साहब एक सौ रूपये का नोट देकर चलता करो इन्हें ..." कूली ने अपना पसीना पोछते हुए बुलन्द आवाज़ में कहा, "ये इन लोगों का रोज़ का नाटक है।"

"नहीं भाई पुरे पाँच सौ लूँगा।" और कानून का भय देखते हुए उसने पाँच सौ रूपये झाड़ लिए और मुस्कुराकर चलता बना।

"साहब सौ रूपये उसके हाथ में रख देते, तो भी वह ख़ुशी-ख़ुशी चला जाता। उस हरामी को रेलवे जो सैलरी देती है, पूरी की पूरी बचती है। इनका गुज़ारा तो रोज़ाना भोले-भाले मुसाफ़िरों को ठगकर ऐसे ही चल जाता है।"

"अरे यार वह कानून का भय देखा रहा था। अड़ते तो ट्रैन छूट जाती।" मैंने कहा।

"अजी कानून नाम की कोई चीज़ हिन्दुस्तान में नहीं है। बस ग़रीबों को ही हर कोई दबाता है। जिनका पेट भरा है उन्हें सब सलाम ठोकर पैसा देते हैं!" कूली ने ग़ुस्से में भरकर कहा, "मैंने मेहनत के जायज़ पैसे मांगे थे और आप लोगों ने बहस करके मुझे सौ रूपये में राज़ी कर लिया जबकि उस हरामखोर को आपने खड़े-खड़े पाँच सौ का नोट दे दिया।"

कुली की बात पर हम सब शर्मिन्दा थे क्योंकि उसकी बात जायज़ थी।

 
(१४.) मन की परत

लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया
बुढ़ापा देखकर रोया, वही किस्सा पुराना है ................
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ........

रेडियो पर फ़िल्मी गीत बज रहा था। उम्र की ढलान पर बैठे साठ वर्षीय रामेश्वर ने इन बोलों को ध्यान से सुना और दोहराने लगा। बग़ल में बैठा उसका पैंतीस वर्षीय जवान बेटा मोहन, बाबुजी के मुखारबिंद से यह गीत सुनकर मुस्कुरा दिया। वह अपने पांच वर्षीय बेटे गोलू के साथ खेलने में व्यस्त था।

"बेटा मोहन, विधाता ने जीवन भी क्या ख़ूब रचा है? बचपन, जवानी और वृद्धावस्था का ये खेल सदियों से चला आ रहा है। मृत्युबोध का अहसास जितना इस उम्र में सताता है, उतना बचपन और जवानी में नहीं। लगता है दिया अब बुझा या तब बुझा।" रामेश्वर प्रसाद के स्वर में पर्याप्त दार्शनिकता का पुट था।

"सब कुछ नाशवान है पिताजी, मौत के लिए उम्र क्या? उसके लिए तो बुढा, जवान, बालक सब एक समान है।" मोहन ने गंभीरतापूर्वक कहा।

"ये बात नहीं है बेटा, मेरे कहने का अभिप्राय यह था कि लड़कपन हम खेल में खो देते हैं, जो कि ज्ञान प्राप्त करने की उम्र होती है, क्योंकि इस उम्र में न तो कमाने की चिंता होती है, न भविष्य बनाने की फ़िक्र। धीरे-धीरे जवानी की दहलीज़ में आकर यह अहसास होता है कि वह समय कितना अनमोल था। फिर युवावस्था में हम मोहमाया के जंजाल में फंसे रहते हैं तथा जवानी के मद में खोये-खोये रहते हैं। जबकि सार्थक कार्यों को करने की उम्र होती है
यह। घर-परिवार की जिम्मेदारियां, रोज़गार की चिन्ता-फ़िक्र, हर किसी को निगल जाती है, और आदमी खुद का कमाया भी, खुद पर ख़र्च नहीं कर पाता।" रामेश्वर ने व्याकुल होकर कहा, "तुमने प्रेमचन्द की कहानी 'बूढी काकी' पढ़ी थी न?" रामेश्वर के कथन पर मोहन ने 'हाँ' में सर हिला दिया, "कई बूढों की हालत तो इससे भी गई गुज़री है।"

"पिताजी आप भी व्यर्थ की क्या-क्या कल्पनाएँ करते रहते हैं!" मोहन ने मुस्कान बिखेरी, "आपको हमसे कोई कष्ट है क्या? मैंने या सुशीला ने कभी कुछ कहा आपसे?"

"नहीं बेटा ... इस मामले में तो मैं बड़ा भाग्यवान हूँ तुम्हारी तो राम-सीता की जोड़ी है, मुझे तो कष्ट केवल बुढ़ापे से है। शरीर रोगों का घर हो  जाता है, हर तरह की बीमारियाँ बढ़ जाती हैं -- उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तो आम बात है, ज़्यादा खा लो, तो दिक्कत। कुछ पी लो, तो मुसीबत। लिखने वाला आदमी, लिखने के लायक नहीं रहता, उंगलियाँ काँपने लगती हैं। दिमाग़ सोचना बंद कर देता है। हाय! कमबख्त बुढ़ापा! हाय! किसी कवि ने क्या खूब कहा है -- फिर जाकर न आई, वो जवानी देखी, आकर न गया वो बुढ़ापा देखा।"

"आख़िर क्या बात है पिताश्री, आज आप इतना उपदेश क्यों दे रहे हैं!" मोहन ने गोलू को गोदी में बिठाते हुए कहा।
"कुछ नहीं बेटा, मन की परतों में कुछ बातों की काई जमी थी, सो तुमसे बाँट ली।" रामेश्वर ने पुत्र की निर्मूल शंका का समाधान करते हुए कहा, "आज तो क्रिकेट मैच है। रेडियो बंद करके टी०वी० तो लगा ज़रा ... काफ़ी दिनों से सचिन की बैटिंग नहीं देखी ..." कहकर रामेश्वर जिन्दादिली से हंस दिए।

(१५.) थकान और सुकून
"ओहो मैं तंग आ गया हूँ शोर-शराबे से, नाक में दम कर रखा है शैतानों ने।" दफ्तर से थके-हारे लौटे भगवान दास ने अपने आँगन में खेलते हुए बच्चों के शोर से तंग आकर चींखते हुए कहा। पिटाई के डर से सारे बच्चे तुरंत गली की ओर भाग खड़े हुए। उनकी पत्नी गायत्री किचन में चाय-बिस्किट की तैयारी कर रही थी।

"गायत्री मैं थक गया हूँ जिम्मेदारियों को उठाते हुए। एक पल भी सुकून मय्यसर नहीं है।" बैग को एक तरफ फैंकते हुए, ठीक कूलर के सामने सोफे पर फैल कर बैठते हुए भगवान दास ने अपने शरीर को लगभग ढीला छोड़ते हुए कहा। इसी समय एक ट्रे में फ्रिज़ का ठंडा पानी और तैयार चाय-बिस्किट लिए गायत्री ने कक्ष में प्रवेश किया और ट्रे को मेज़ पर पतिदेव के सम्मुख रखते हुए बोली, "पैर इधर करो, मैं आपके जुते उतार देती हूँ। आप ख़ामोशी से तब तक चाय-पानी पीजिये।"

कूलर की हवा में ठन्डा पानी पीने के उपरांत भगवान दास चाय-बिस्किट का आनन्द लेने लगे तो ऑफिस की थकन न जाने कहाँ गायब हो गई और उनके चेहरे पर अब सकून छलक रहा था। वातावरण में अजीब-सी शांति पसर गई थी।

"ये दीवार पर किनकी तस्वीरें टंगी हैं।" गायत्री ने अपने पति से प्रश्न किया।

"क्या बच्चों जैसा सवाल कर रही हो गायत्री? मेरे माँ-बाबूजी की तस्वीरें हैं।" कहते हुए भगवन दास के मनोमस्तिष्क में बाल्यकाल की मधुर स्मृतियां तैरने लगीं। कैसे भगवान दास पूरे घर-आँगन में धमा-चौक मचाते थे! माँ-बाबू जी अपने कितने ही कष्टों-दुखों को छिपाकर भी सदा मुस्कुराते थे।

"क्या आपको और आपके भाई-बहनों पालते वक़्त, आपके माँ-बाबूजी को परेशानी नहीं हुई होगी? अगर वो भी कहते हम थक गए हैं,  जिम्मेदारियों को उठाते हुए। बच्चों के शोर-शराबे से तंग आ चुके हैं, तो क्या आज तुम इस काबिल होते, जो हो?" गायत्री ने प्रश्नों की बौछार-सी भगवान दास के ऊपर कर डाली, "और सारा दिन घर के काम-काज के बीच बच्चों के शोर-शराबे को मैं झेलती हूँ। यदि मैं तंग आकर मायके चली जाऊं तो!" गायत्री ने गंभीर मुद्रा इख़्तियार कर ली।

"अरे यार वो थकावट और तनाव के क्षणों में मुंह से निकल गया था।" मामला बिगड़ता देख, अनुभवी भगवान दास ने अपनी गलती स्वीकारी।

"अच्छा जी, कितनी सहजता से कह दिया आपके मुंह से निकल गया था!" गायत्री नाराज़ स्वर में ही बोली।

"अब गुस्सा थूको और तनिक मेरे करीब आकर बैठो।" चाय का खाली कप मेज़ पर रखते हुए भगवान दास बोले। फिर उसी क्रम को आगे बढ़ते हुए, बड़े ही प्यार से भगवान दास ने रूठी हुई गायत्री को मानते हुए कहा, "जिसकी इतनी खूबसूरत और समझदार बीबी हो, वो भला जिम्मेदारियों से भाग सकता है।" गायत्री के गाल पर हलकी-सी चिकोटी काटते हुए भगवान दास बोले।

"बदमाश कहीं के" गायत्री अजीबो-गरीब अंदाज़ में बोली।  एक अजीब-सी मुस्कान और शरारत वातावरण में तैर गई।

(१६.) परोपकार पुराण
"भाई साहब पूरी ट्रैन में धक्के खाने के बावजूद मुझे कहीं भी सीट नहीं मिली। सारे डिब्बे खचाखच भरे हुए हैं। आपकी मेहरबानी होगी यदि आपके बगल में बैठने की थोड़ी-सी जगह मिल जाये।" याचना भरे स्वर में दुबले-पतले व्यक्ति ने कहा। पसीने और मारे गर्मी से उसका बुरा हाल था। जान पड़ता था यदि कुछ देर और खड़ा  रहा तो वह आदमी अभी गिर पड़ेगा। सभी यात्री भेड़-बकरी की तरह भरे पड़े थे। हर कोई इस फ़िराक में था कि कहीं कुछ जगह मिले तो सीधे ढंग से खड़ा हुआ जा सके।

"हाँ-हाँ, क्यों नहीं बैठ जाओ ... आजकल लोगों के भीतर से परोपकार की भावना ही उठ गई है।" जगह देने वाले व्यक्ति ने अन्य यात्रियों को सुनते हुए कहा। इसके पश्चात् उसने नेकी, परोपकार, धर्म-कर्म और संस्कार आदि विषयों पर लम्बा-चौड़ा व्याख्यान दे डाला। बेचारा दुबला-पतला व्यक्ति, जो परोपकार के बोझ तले दबा था, मज़बूरीवश  बीच-बीच में 'हाँ-हूँ ...' 'हाँ-हूँ ...' करता रहा।
स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो टिकट निरीक्षक उसमे चढ़ गया। खचाखच भरे डिब्बे में वह एक-एक करके सबके टिकट जांचने लगा।

"टिकट निरीक्षक हमारे करीब आ रहा है। अत: मेरी पिछली ज़ेब से टिकट निकाल कर आप टी० टी० को मेरा टिकट देखा दो। भीड़-भाड़ में मेरा हाथ ज़ेब तक नहीं पहुँच रहा है। अगर मैं ज़रा भी उठा या सीट से खिसका तो फिर जगह नहीं मिल पायेगी। तुम्हे पता ही है कितनी मुश्किल से एड्जेस्ट करके मैंने तुम्हे यहाँ बिठाया है," उसने दुबले-पतले व्यक्ति से कहा और अपना परोपकार पुराण जारी
रखा। दुबले-पतले ने उसके आदेश का पालन किया। टी० टी० जब करीब आया तो परोपकारी की जेब से निकला हुआ टिकट  दुबले-पतले आदमी ने टी० टी० को दिखा दिया।

"और आपका टिकट ..." दुबले-पतले व्यक्ति का टिकट देखने के पश्चात् टिकट निरीक्षक ने परोपकारी से पूछा।

"इन्होने दिखाया तो है!" परोपकारी ने दुबले-पतले की तरफ इशारा करके कहा।

"वो तो मेरा टिकट है।" दुबले-पतले ने तेज स्वर में कहा।

"क्या बात कर रहे हो? आपने ये टिकट मेरी जेब से निकाल कर इन्हें दिखाया था ना ..." परोपकारी हैरान था। उसे इस विश्वासघात पर ज़रा भी यकीन नहीं हो रहा था। उसे लगा शायद दुबला-पतला आदमी मज़ाक कर रहा है। अभी थोड़ी देर बाद दुबला-पतला आदमी अपना टिकट टी० टी० को दिखा देगा।

"मैं क्यों आपकी जेब से टिकट निकालूँगा भाईसाहब, ये तो मेरी टिकट है ..." दुबले-पतले व्यक्ति ने बड़ी गम्भीरतापूर्वक कहा और परोपकारी को झूठा साबित कर दिया।

"एक तो तुम्हे बैठने को सीट दी और उसका तुमने ये बदला ..." बाकी शब्द परोपकारी के मुख में ही रह गए क्योंकि गलती उसी की थी एक अनजान आदमी को क्यों उसने जेब में हाथ डालने दिया?

"देखिये आपके पास टिकट नहीं है," टी० टी०  ने परोपकारी से कहा, "नीचे उतरिये। आपको जुर्माना भरना पड़ेगा।" और परोपकारी शर्मिदा होकर टी० टी० के पीछे चल पड़ा।

"जय हो परोपकारी बाबा की।" भीड़ में से किसी ने व्यंग्य किया।

हंसी की एक लहर दौड़ गई। नीचे उतरते हुए वह दुबले-पतले व्यक्ति को घूरकर देख रहा था। जो अब उसी के टिकट की बदौलत उसी के स्थान पर बड़ी बेशर्मी से पैर पसारे बैठ गया था।


(१७.) दिलचस्प आदमी

जून की तपती दोपहरी में बाज़ार की तमाम दुकानें बंद थीं। कुछेक दुकानों के स्टर आधे गिरे हुए थे। जिनके भीतर दुकानदार आराम कर रहे थे। एक व्यक्ति प्यासा भटक रहा था। एक खुली दुकान देखकर उसने राहत की सांस ली।

"लालाजी प्यासे को पानी पिला दो," थकेहारे राहगीर ने मेवे की दुकान पर बैठे सेठजी से कहा। दुर्भाग्यवश तभी बिजली भी चली गई।

"बैठ जाओ, अभी नौकर खाना खाकर आता ही होगा। आएगा तो तुम्हे भी पानी मिलेगा और मेरा गला भी तर होगा।" लालाजी ने फ़रमाया और हाथ के पंखे से खुद को हवा करने लगे।

लगभग दस-पन्द्रह मिनट गुज़र गए।

"लालाजी और किनती देर लगेगी।" करीब दस मिनट बाद प्यास और गर्मी से व्याकुल वह व्यक्ति पुन: बोला।

"बस नौकर आता ही होगा।" लाला स्वयं को पंखा झालते हुए आराम से बोले।

"लालाजी, दुकान देखकर तो लगता है, आप पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा है।" व्यक्ति ने समय काटने हेतु बातचीत के इरादे से कहा।

"पिछली सात पुश्तों से हम सूखे मेवों के कारोबार में हैं और फल-फूल रहे हैं।" लालाजी ने बड़े गर्व से जवाब दिया।

"आप दुकान के बाहर एक प्याऊ क्यों नहीं लगा देते?"

"इससे फायदा।"

"जो पानी पीने आएगा। वो हो सकता है इसी बहाने आपसे मेवे भी ख़रीद ले।"

"तू ख़रीदेगा?"

"क्या बात करते हैं लालाजी," वह व्यक्ति हंसा, "यहाँ सूखी रोटी के भी लाले पड़े हैं और आप चाहते हैं कि मैं महंगे मेवे खरीदूं। ये तो अमीरों के चौंचले हैं।"

"चल भाग यहाँ से तुझे पानी नहीं मिलेगा।" लालाजी चिढ़कर बोले।

"लालाजी, जाते-जाते मैं एक सलाह दूँ।"

"क्या?"

"चुनाव करीब हैं, आप राजनीति में क्यों नहीं चले जाते?"

"क्या मतलब?"

"मैं पिछले आधे घंटे से आपसे पानी की उम्मीद कर रहा हूँ मगर आपने मुझे लटकाए रखा," वह व्यक्ति गंभीर स्वर में बोला, "राजनीतिज्ञों का यही तो काम है।"

तभी बिजली भी लौट आई। ठंडी हवा के झोंके ने बड़ी राहत दी और माहौल को बदल दिया।

"तू आदमी बड़ा दिलचस्प है बे।" लालाजी हँसते हुए बोले, "वो देख सामने, नौकर फ्रिज का ठंडा पानी ले कर आ रहा है। तू पानी पीकर जाना। वैसे कम क्या करते हो भाई?"

"इस देश के लाखों और विश्वभर के करोड़ों युवाओं की तरह बेरोजगार हूँ।" प्यासे आदमी का जवाब सुनकर सेठजी अचम्भित थे।

 
(१८.) आन्दोलन

"भारत माता की।" वातावरण में गूंजता एक स्वर।

"जय।" प्रतिक्रिया स्वरुप कई स्वर एक सुर में गूंजे।

"एक, दो, तीन, चार।" वह स्वर इस बार तीव्र आक्रोश के साथ।

"बंद करो ये भ्रष्टाचार।" उसी आक्रोश को बरकरार रखते हुए सामूहिक स्वर।

पूरे देश में आजकल उपरोक्त दृश्य मंज़रे-आम पर है। लोग गली-मुहल्लों में रैलियां निकाल-निकालकर अन्ना हजारे के 'जनलोकपाल बिल' के समर्थन में सड़कों पर उतर आये हैं। नारों के माध्यम से सरकार और विपक्ष के भ्रष्ट नेताओं तथा बड़े अफसरों तक को फटकार रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों से बैनर और सलोगन्स के साथ आन्दोलन समर्थक दिल्ली के रामलीला मैदान में पधार
रहे हैं। जहाँ अन्ना हजारे पिछले बारह दिनों से अनशन पर बैठे हैं। उनके समर्थक बीच-बीच में उत्साहवर्धन करते हुए नारे लगा रहे हैं। 'अन्ना नहीं आंधी है। देश का दूसरा गांधी है।' 'अन्ना तुम संघर्ष करो। हम तुम्हारे साथ हैं।' चारों तरफ जन सैलाब। भारी भीड़ ही भीड़। लोग ही लोग। टोपियाँ ही टोपियाँ। जिन पर लिखा है -- मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना। इस हंगामे को कवरेज करते सभी चैनलों के मीडियाकर्मी। सभी चैनलों पर इसी तरह की मिली-जुली  ख़बरें और बयानबाज़ी। गरमा-गरम बहसें। गांधी-नेहरू के ज़माने से लेकर जयप्रकाश आन्दोलन  तक को वक्ताओं द्वारा याद किया गया।

 
रामलीला मैदान में उपस्थित "मैं" स्वयं हैरान था-- 'कैसे एक साधारण-सी कद-काठी वाले व्यक्ति ने समूचे राष्ट्र को ही आन्दोलित कर दिया है।' हृदय श्रद्धा से अन्ना हजारे के आगे नत-मस्तक हो गया। मुझे यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई कि अन्ना तेरहवें दिन अपना अनशन तोड़ेंगे। मैंने भी राहत की सांस ली --'चलो देर आये दुरुस्त आये' वाली बात।

कुछ देर मैदान में बिताने के बाद रामलीला मैदान से निकलकर मैं बाहर फुठपाथ पर आ गया। जहाँ सड़क किनारे अन्ना के नाम पर आन्दोलन से जुड़े बैनर, पोस्टर, टोपियाँ, झंडे, स्टीकर आदि बेचने वाले बैठे थे। जिन्हें मैं अक्सर चौराहों पर गाड़ियाँ साफ़ करते, कभी अखबार-किताबें या अन्य सामान बेचते और भीख मांगते भी देखता था।

"अम्मा क्या सचमुच अन्ना कल अपना अनशन ख़त्म कर देंगे।" बड़ी मायूसी से एक आठ-नौ बरस की लड़की ने अपनी माँ से पूछा।

"हाँ बेटी।" उसकी माँ भी उसी मायूसी से बोली।

"ये तो बहुत बुरा हुआ, अम्मा।" बच्ची के स्वर में असीम वेदना उभर आई।

"ऐसा क्यों कह रही हो गुडिया? कोई आदमी बारह दिनों से भूखा है और अपना अनशन ख़त्म करना चाह रहा है। यह तो ख़ुशी की बात होनी चाहिए।" मैंने टोकते हुए कहा, "इसका मातम क्यों मना रही हो?"

"ऐसी बात नहीं है बाबूजी, पिछले दस-बारह दिनों से आन्दोलन का सामान बेचकर हम पेटभर भोजन खा रहे थे। कल अनशन टूटने के साथ ही आन्दोलन भी ख़त्म हो जायेगा!" बच्ची की माँ ने अपना दृष्टिकोण रखा।

"तो!" मैंने आँखें तरेरते हुआ कहा।

"तो बाबूजी, हमें फिर से जिंदा रहने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा! बच्चों को भीख मांगनी पड़ेगी! लोगों की जूठन खाकर पेट भरना होगा। कूड़े-करकट के ढेर में अपनी रोज़ी-रोटी तलाश करनी होगी। पता नहीं दुबारा पेटभर भोजन अब कब नसीब होगा? बच्ची यही सोच-सोचकर परेशान है।" उस औरत ने बड़े ही करुणा भरे स्वर में कहा, "क्या ऐसे आन्दोलन सालभर नहीं हो सकते बाबूजी?" बड़ी ही कातर दृष्टि से उसने मुझसे प्रश्न किया। मैंने पहली बार खुद को असहज महसूस किया और एक सौ रूपये का नोट  जेब से निकालकर उस नन्ही गुड़िया के हाथों में रख दिया . . . जो अपनी माँ के आँचल में छिपने का प्रयास कर रही थी। मैंने इधर-उधर देखा तो कई और बच्चों के हाथ मेरी तरफ बढ़ गए थे। मैंने उन्हें अपना खाली पर्स दिखाकर अपनी लाचारी प्रकट की।

लेकिन माँ-बेटी के दुखी, हतास-उदास चेहरों को देखकर मैं यह सोचने लगा -- "काश! कोई एक आन्दोलन ऐसा भी होता, जिससे इन ग़रीबों को हमेशा पेटभर भोजन मिल पाता!"


(१९.) धर्म निरपेक्ष

अमेरिका से हिंदुस्तान के लिए एक विमान ने उड़ान भरी। एक जिज्ञासु बच्चा अपने पिता के साथ बैठा था।

"पापा, अब हमारा विमान कौन से देश के ऊपर उड़ रहा है?"

"इंग्लेंड ..."

"यहाँ के लोग क्रिसमस मनाते हैं क्या?"

"हाँ बेटा, यह ईसाई मुल्क है। यहाँ सिर्फ़ क्रिसमस ही मनाई जाती है। यूरोप और अमेरिका के अधिकांश देश क्रिसमस ही मनाते हैं।"

"पापा, अब हम कहाँ हैं?" कुछ समय गुज़र जाने के बाद बच्चे ने पुन: प्रश्न किया।

"अब हमारा विमान सऊदी अरब के ऊपर से उड़ रहा है।"

"क्या यहाँ भी क्रिसमस मनाते हैं?"

"नहीं बेटा, यहाँ से पाकिस्तान तक कई मुस्लिम राष्ट्र हैं। यहाँ सिर्फ़ ईद मनाई जाती है।"

"और अब हम कहाँ हैं?" कुछ और समय बीतने के उपरांत बच्चे का वही प्रश्न।

"अब हमारा विमान हिन्दुस्तान में दाख़िल हो चुका है। अब दिल्ली दूर नहीं। हम मंज़िल के क़रीब पहुँचने ही वाले हैं।"

"पापा, यहाँ के लोग क्रिसमस मनाते हैं क्या?" वही प्रश्न।

"हाँ बेटा, यहाँ सभी धर्मों के त्यौहार मनाये जाते हैं। यहाँ ईसाई क्रिसमस मनाते हैं। यहाँ मुसलमान ईद मनाते हैं। यहाँ हिन्दू दिवाली,
होली, दशहरा आदि मानते हैं। यहाँ बौद्ध धर्म वाले बुद्ध पूर्णिमा, जैन धर्म वाले महावीर जयंती मनाते हैं तो सिख समुदाय गुरु पर्व मनाते हैं और पारसी भी अपना त्यौहार मनाते हैं।"

"वाह पापा वाह! इतने सारे त्यौहार! वो भी एक देश में एक ही जगह ... मज़ा आ गया।" बच्चे ने पूरे सफ़र में पहली बार खुश होकर तालियाँ बजाई। अगल-बगल में बैठे अन्य यात्री भी बच्चे की ख़ुशी में शामिल होकर तालियाँ बजा रहे थे।

 

(२०.) बालक और विद्वान

"मृत्यु से अंजान उस नन्हे बालक को देखो अपने दादा के शव के पास कैसे खेल रहा है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं," सन्यासी ने कहा। पृष्ठभूमि पर परिजनों का विलाप जारी था।

"बालक तो निपट अज्ञानी और मृत्यु के रहस्य से अंजान है महाराज, लेकिन मृतक आपका छोटा भाई है फिर आप शोक क्यों नहीं कर रहे? आपकी आँखों में आंसू क्यों नहीं?" समीप खड़े व्यक्ति ने पूछा।

"तुम्हारे प्रश्न में ही उत्तर भी निहित है। बालक इसलिए शोक नहीं कर रहा क्योंकि वह मृत्यु के रहस्य से अनजान है और मै परिचित हूँ। यही जीवन का अंतिम सत्य है। अत: विद्वान् और बालक कभी शोक नहीं करते।" सन्यासी ने शांतिपूर्वक कहा।

शव को अंतिम यात्रा के लिए उठाया गया तो पृष्ठभूमि पर 'राम नाम सत्य है' की आवाजें गूंजने लगीं।


(२१.) सरहद
सरहद पर जैसे ही किसी के आने की सुगबुगाहट हुई। अँधाधुंध गोलियां चल पड़ीं। घुसपैठ करती मानव आकृति कुछ क्षण के लिए तड्पी और वहीँ गिर पड़ी।

"वो मार गिराया साले को ..." वातावरण में हर्षो-उल्लास के साथ स्वर उभरा। दोनों सिपाहियों ने अपनी-अपनी स्टेनगन का मुहाना चूमा।

"ज़रा पास चलकर देखें तो घुसपैठिये के पास क्या-क्या था?" एक सिपाही बोला।

"अरे कोई ग्रामीण जान पड़ता है बेचारा! शायद भूले-भटके से सरहद पर आ गया।" तलाशी लेते वक़्त मृतक के पास से सिवाय एक ख़त के कुछ न निकला तो दूसरा सिपाही अनायास ही बोला।

"ख़त मुझे दो, मै उर्दू पढना जानता हूँ।" पहले सिपाही ने ख़त हाथ में लिया और ऊँचे सुर में पढने लगा--

"प्यारे अब्बू,

बी० ए०/ एम० ए० करने के बाद भी जब कहीं ढंग की नौकरी नहीं मिली और जिम्मेदारियां उठाते-उठत मेरे कंधे टूट गए, लेकिन दुनिया जहान के ताने कम नहीं हुए तो आसान मौत मरने के लिए सरहद पर चला आया हूँ। मै इतना बुजदिल हूँ चाहकर भी खुदकुशी न कर सका ... पर घुसपैठ करते वक़्त यक़ीनन हिन्दोस्तानी सिपाही मुझे ज़रूर जिंदगी की कैद से आज़ाद कर देंगे। ऊपर जाकर
खुद से पूछूँगा तूने हमें इंसान बनाया था तो ढंग की जिंदगी भी तो देता। मुझे माफ़ करना अब्बू तुम्हारे बूढ़े कन्धों पर अपने परिवार का बोझ भी डाले जा रहा हूँ।

तुम्हारा अभागा / निकम्मा बेटा
रहमत अली

तभी दोनों सिपाहियों ने देखा परिंदों का एक समूह पकिस्तान से उड़ता हुआ आसानी से हिन्दोस्तान की सरहद में दाखिल हो गया और उन्हें किसी ने भी नहीं रोका।


(२२.) गोत्र

"द्वार खोल रधिया ..." रजनी ने तेजी से दरवाज़ा पिटते हुए कहा।

तक़रीबन दो मिनट बाद दरवाज़ा खुला।

अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों और बालों को ठीक करते हुए, रधिया का प्रेम दरवाज़े पर रजनी को खड़ा देख मुस्कुराया और अपनी रावनाकार मूछों को ताव देता हुआ वहां से चलता बना।

प्रेमी के चले जाने के करीब एक मिनट बाद रधिया आँखें तरेरते हुए बाहर निकली, "क्या है रे, रजनी की बच्ची सारा खेल ख़राब कर दिया?"

"कैसा खेल?" रजनी चोंकी, "और ये बता किसनवा के साथ अन्दर क्या कर रही थी?"

"भजन-कीर्तन ..." कहते हुए रधिया ने चोली का हुक ठीक किया।

"बेशर्मी की भी हद होती है, यही सब करना है तो शादी क्यों नहीं कर लेती किसनवा से!"

"देख किसनवा हमारे ही गोत्र का है। इसलिए उससे शादी नहीं हो सकती। पंचायत और गांव वाले हमें मिलकर मार डालेंगे जैसे हरिया और लाली को मारा था पिछले साल।"

"और ये सब, जो तुम कर रहे हो क्या ठीक है?"

"देख रजनी अपने गोत्र में शादी करना ग्रामीण समाज की नज़र में भले ही अपराध है, मगर अपने प्रेमी के साथ प्यार का आदान-प्रदान करना, न कभी ग़लत था न होगा।"

(२३.) मकड़ी

शहर का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल। मरी-गिरी चाल में आवाज़ करते हुए बाबा आदम के ज़माने के भारी भरकम पंखे सुस्त गति से अपनी सेवाएँ निरंतर प्रदान कर रहे थे, यह बड़े आश्चर्य की बात थी। अस्पताल की छत और दरो-दिवारें न जाने कब से रंग-रोगन की मांग कर रहे थे। यदा-कदा मकड़ी के ज़ाले दृष्टिगोचर हो रहे थे। जहाँ मकड़ियाँ घात लगाये शिकार के फंस जाने की प्रतीक्षा कर
रही थीं। नाना प्रकार की बीमारियों से जूझते अनेक रोगी यहाँ वार्ड में भर्ती थे। यहीं कोने के एक बेड पर पश्चाताप की मुद्रा में बलदेव सर झुकाए बैठा था। सामने उसका जिगरी दोस्त अखिलेश खड़ा था। रह-रहकर बलदेव के दिमाग में हफ्तेभर पुरानी बातें घूम रही थीं।

"....यार बकवास है यह सब कि  तम्बाकू पीने से कैंसर होता है। पनवाड़ी की दूकान पर लगे कैंसर के सलोगन पर सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए बलदेव हंसा। व्हिस्की का अध्धा जींस की पेंट से थोडा-सा बाहर निकला हुआ था।

"क्यों हंस रहे हो," अखिलेश बोला।

"हंसू न तो क्या करूँ, जब शराब पीने से कैंसर होता है, तो फिर सरकार ने इस पर प्रतिबंधित क्यों नहीं लगाती?"

"तू पागल है सरकार क्यों प्रतिबन्ध लगाएगी? सरकार को सबसे ज़यादा इनकम शराब, बीड़ी-सिगरेट, पान, तम्बाकू-गुटका से ही तो है।" अखिलेश ने जवाब दिया।

"और हंसू क्यों न? पूरे छह बरस हो गए हैं मुझे शराब और सिगरेट पीते हुए ..." अखिलेश के मुंह पर धुआं छोड़ते हुए बलदेव अगला संवाद बोला, "आज तक तो न हुआ ... मुझे यह मुआ कैंसर!"

"ज्यादा मत हंस ... जिस दिन हो गया! पता लग जायेगा दोस्त!" अखिलेश बोला।

"शाप दे रहे हो ... हा ... हा ... हा ..." बलदेव दहाड़े मार के हंसा काफी देर तक हंसा था उस रोज़।

आज परिस्थितियाँ बदलीं हुईं थीं। बलदेव को सचमुच कैंसर हो गया था। रिपोर्ट देखकर वह न जाने कितने समय तक रोता रहा।
"दोस्त मै समय-समय पर तुझे इसलिए आगाह करता था कि मत पियो शराब-सिगरेट, मगर तुम नहीं माने ... अपने बाल-बच्चों के भविष्य का भी ख्याल नहीं किया तुमने।" लम्बे समय की चुप्पी को तोड़ते हुए अखिलेश बोला।

"बाल-बच्चों की ही तो फ़िक्र सता रही है! मेरे बाद उनका क्या होगा?" बलदेव मासूम बच्चे की तरह रोने लगा। छत पर उसकी दृष्टि पड़ी तो देखा एक पतंगा मकड़ी के जाले में फंसा फडफडा रहा है और घात लगाकर बैठी मकड़ी धीरे-धीरे शिकार की तरफ बढ़ रही थी।

"अभी सुबह के साढ़े आठ बजने वाले हैं बलदेव। मै तो चला दफ्तर को, वरना देर हो जाएगी।" सामने लटकी दीवार घडी को देखकर अखिलेश बोला, "रही बात वक्त की तो वह कट ही जाता है ... अच्छा या बुरा सभी का ..."

बलदेव के बाल-बच्चों का क्या होगा? इस प्रश्न का कोई उत्तर फिलहाल दोनों के पास नहीं था। शायद समय की गर्त में छिपा हो। बलदेव को अस्पताल के बेड पर उसी हाल में अखिलेश वहीँ छोड़ आया। बलदेव ने देखा मकड़ी शिकार पर अपना शिकंजा
कस चुकी थी। अखिलेश के जूतों की आहट बलदेव के कानों में देर तक गूंजती रही।


(२४.) दुनिया गोल है

बस खचाखच भरी हुई थी। कई डबल सीटों पर तीन-तीन सवारियाँ मुश्किल से बैठी हुई थीं। एक सज्जन बड़े आराम से पैर फैलाये बैठे थे।

"भाई साहब आपकी बड़ी मेहरबानी होगी, अगर मेरी बीवी को बैठने के लिए सीट मिल जाये। वह बीमार है और इ हालत में नहीं कि ज़्यादा देर खड़ी रह सके। भीड़ की वजह से पहले ही हम दो-तीन बसें मिस कर चुके हैं। परेशान हालत में हमें घंटाभर स्टैंड में ही खड़े-खड़े हो गया।" अनुरोध करते हुई एक व्यक्ति ने कहा। वह तीन वर्षीय बच्चे को गोदी में थामे खड़ा था। उसकी बीवी सचमुच
बीमार दीख रही थी। उस पर मरे थकान और पसीने से लथपथ थी। लगता था अब गिर पड़ेगी या न जाये कब गिर पड़ेगी? वैसे भी प्राइवेट बस वाले इनती रफ़ ड्राइविंग करते हैं कि बैठी हुई सवारियाँ भी परेशान हो उठती हैं। खड़ी सवारियाँ तो राम भरोसे ही रहती हैं।

"सॉरी मैं नहीं उठ सकता ..." बेरुखी से बैठे हुए सज्जन ने कहा, "आप किसी और से कहिये?"

"और सीटों पर तो पहले ही तीन-तीन लोग बैठे हुए हैं। आप भी थोडा-सा एडजेस्ट कर लीजिये।"

"नहीं, मैं क्यों करूँ?"

"प्लीज, भाईसाहब, मेरी बीवी सख्त बीमार है। उसको सीट दे दीजिए।" उस व्यक्ति ने लगभग रो देने वाले अंदाज़ में आग्रह किया, "आपके घर में भी तो माँ-बहन होगी!"

"अब कही न मन की बात। पहचाना कौन हूँ मैं?" कहकर वो व्यक्ति हंस पड़ा।

"नहीं तो ... कौन हैं आप?" उस व्यक्ति ने याद करने की कोशिश की।

"भाईसाहब, हफ्तेभर पहले मैंने भी आपसे यही कहा था, कि आपके घर में भी माँ-बहन होगी ..."

"ओह! तो आप वही हैं!"

"बिलकुल सौ फीसदी वही हूँ।" उस व्यक्ति ने अपनी टोपी उतारकर सर खुजाते हुए कहा। फिर टोपी पहनते हुए वो बोला, "इसलिए तो कहा गया है कि दुनिया गोल है!"

"प्लीज भाईसाहब, मुझे माफ़ कर दीजिये और उस वाक्यात को भूल जाइये।" उस व्यक्ति ने पश्चाताप भरे स्वर में कहा।
"कैसे भूल जाऊं? उस रोज़ मेरी बूढी माँ खड़े-खड़े ही बस में सफ़र करती रही और आप सांड की तरह सीट पर पसरे हुए, मज़े से चने खाते हुए गा रहे थे। याद आया जनाब ... इसलिए मैं तो तुम्हें सीट हरगिज-हरगिज न दूंगा। चाहे तुम्हारी बीमार बीवी चक्कर खाके गिर ही क्यों न पड़े?" कहकर टोपी मास्टर ने इत्मीनान की साँस ली और जेब से चने निकलकर खाने लगा और गुनगुनाने लगा,
"चना ज़ोर गरम बाबू मैं लाया मज़ेदार। चना ज़ोर गरम ...."


(२५.) काले अंग्रेज़

"डैड, मैं छह महीने बाद हिन्दुस्तान जाऊंगा। इसलिए अभी से तैयारियां कर रहा हूँ।" अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के हैरी उर्फ़ 'हरीश' ने अपने पिता जैकी उर्फ़ 'जयकिशन' से कहा।

"कैसी तैयारी, हैरी पुत्तर?" जैकी ने जम्हाई लेते हुए पूछा।

"मैंने ठीक से हिंदी सीखने के लिए यहाँ के एक हिंदी संस्थान में एडमिशन लेना है, ताकि मुझे इण्डिया में कोई दिक्कत न हो और मैं आसानी से वहां के लोगों के बीच तालमेल बैठा सकूँ।" हैरी ने उत्त्साहपूर्वक कहा, "ये रहा हिंदी संस्थान का फ़ार्म।"

"ओह माय डियर हैरी पुत्तर। इण्डिया जाने के लिए हिंदी सीखने की क्या ज़रूरत है। वहां सारा काम अंग्रेजी में चल जाता है।" इण्डिया यानि काले अंग्रेज़ों का देश।" जैकी ने अपने बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, "ये संस्थान का फ़ार्म फाड़कर फैंक दो। बेकार में पैंसा और वक़्त बर्बाद करोगे! आज हिंदी की वैल्यू हिन्दुस्तान में खुद न के बराबर है।"

"डैड क्या आप चुटकला सुना रहे हैं?"

"चुटकला नहीं माय डियर, ये हकीक़त है। आय एम वेरी सीरियस ..." जैकी ने अत्यंत गंभीर होते हुए कहा, "लार्ड मैकाले ने भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा की नींव डालते हुए कहा था --"मैं आने वाले वक़्त में भारतीयों की ऐसी नस्लें तैयार करूँगा, जो तन से तो भारतीय होंगी लेकिन मन से अँगरेज़ ... ब्लाडी इंडियन्स डॉग, काले अँगरेज़।"

और बहस में न पड़ते हुए हैरी ने हिन्दी संस्थान का फ़ार्म डस्टबीन में डाल दिया।


(२६.) जीवन दर्शन

यह लगभग तय हो चुका था कि दार्शनिक को विषपान करना ही पड़ेगा। जब ज़हर से भरा प्याला दार्शनिक के सम्मुख लाया गया तो उनसे पुन: कहा गया -- "अब भी वक़्त है, यदि तुम अपनी विद्वता और सिद्धांतों की झूठी माला उतार फैंको तो हम तुम्हें मृत्यु का वरन नहीं करने देंगे। हम तुम्हे अभयदान देंगे। मगरूर सम्राट की बात सुनकर दार्शनिक ने ज़ोरदार ठहाका लगाया।

"क्यों हँसे तुम?" प्रश्न किया गया।

"सम्राट मेरी मृत्यु तो आज होनी तय है किन्तु आपकी मृत्यु कब तक आपके निकट नहीं आएगी?" प्रश्न के उत्तर में दार्शनिक ने सत्ता के मद में चूर सम्राट से स्वयं प्रश्न किया। वह निरुतर था और अपनी मृत्यु का यूँ उपहास करने वाले इस महान दार्शनिक की जिंदादिली पर दंग भी।

"मुझे मृत्यु का अभयदान देने वाले सम्राट क्या आप सदैव अजर-अमर रहेंगे? कभी मृत्यु का वरन नहीं करेंगे? यदि आप ऐसा करने में समर्थ हैं और मृत्यु को भी टाल देंगे तो मैं अपने सिद्धांतों की बलि देने को प्रस्तुत हूँ।" दार्शनिक की बातों का मर्म शायद सम्राट की समझ से परे था या वह जानकर भी अंजान बना हुआ था। चहूँ और एक सन्नाटा व्याप्त था। हृदय की धडकने रोके सभी उपस्थितजन अपने समय के महान दार्शनिक की बातें सुन रहे थे। जो इस समय भी मृत्यु के भय से तनिक भी विचलित नहीं था।

"मृत्यु तो आनी ही है, आज नहीं तो कल। उसे न तो मैं रोक सकता हूँ न आप, और न ही यहाँ उपस्थित कोई अन्य व्यक्ति। यह प्रकृति का अटल नियम है और कठोर सत्य भी, जो जन्मा है, उसे मृत्यु का वरन भी करना है। इस अंतिम घडी को विधाता ने जन्म से ही तय कर रखा है। फिर मृत्यु के भय से अपने सिद्धांतों से पीछे हट जाना तो कोई अच्छी बात नहीं। यह तो कायरता है और
मृत्यु से पूर्व मृत्यु का वरन कर लेने जैसा ही हुआ न।" दार्शनिक ने बड़ी शांति से कहा।

"मगरूर सम्राट के इर्द-गिर्द शून्य तैर रहा था। दार्शनिक की बातों ने समस्त उपस्थितजनों के मस्तिष्क की खिडकियों के कपाट खोल दिए थे।

"आपने ठीक ही कहा था कि मैं जीवित रहूँगा, मरूँगा नहीं क्योंकि मुझे जीवित रखेगी मेरे विचारों की वह अग्नि, जो युगों तक अँधेरे को चीरती रहेगी। लेकिन कैसी विडम्बना है सम्राट कि मेरे जो सिद्धांत और विचार मुझे अमरता प्रदान करेंगे, उनके लिए आज मुझे स्वयम मृत्यु का वरन करना पड़ रहा है।"

"तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा?" सम्राट ने बेरुखी से पूछा।

"अंत में इतना अवश्य कहूँगा कि जीवन की सार्थकता उसके दीर्घ होने में नहीं, वरन उसका सही अर्थ और दिशा पा लेने में है।" दार्शनिक की विद्वता के आगे सभी नतमस्तक थे और इस असमंजस में थे कि कैसे सम्राट के मन में दया उत्पन्न हो और इस अनहोनी को टाला जाये।
...मगर तभी एक गहरा सन्नाटा सभी के दिमागों को चीरता हुआ निकल गया। जब दार्शनिक ने हँसते-हँसते विष का प्याला अपने होंठों से लगा लिया।


(२७.) साया

रात के घने अँधेरे में एक हाथ जो द्वार खटकने के उद्देश्य से आगे बढ़ा था। वह भीतर का वार्तालाप सुनकर ज्यों-का-त्यों रुक गया।

"चलो अच्छा हुआ कल्लू की माँ, जो दंगों में लापता लोगों को भी सरकार ने दंगों में मरा हुआ मान लिया है। हमारा कल्लू भी उनमे से एक है। अतः सरकार ने हमें भी पाँच लाख रूपये देने का फैसला किया है।"

"नहीं … ऐसा मत कहो। मेरा लाल मरा नहीं, जीवित है, क्योंकि उसकी लाश नहीं मिली है! ईश्वर करे वह जहाँ कहीं भी हो, सही-सलामत और जीवित हो। हमें नहीं चाहिए सरकारी सहयता।"

"चुपकर! तेरे मुंह में कीड़े पड़ें। हमेशा अशुभ-अमंगल ही बोलती है। कभी सोचा भी है—अपनी पहाड़-सी ज़िंदगी कैसे कटेगी? दोनों बेटियों की शादी कैसे होगी? अरे पगली, दुआ कर कल्लू जहाँ कहीं भी हो मर चुका हो। वह सारी उमर मेहनत-मजदूरी करके ही पाँच लाख रुपए नहीं बचा पाता।"

"हाय राम! कैसे निर्दयी बाप हो? जो चंद पैसों की ख़ातिर, अपने जवान बेटे की मौत की दुआ मांग रहे हो। आह!"

"तू यहाँ पड़ी-पड़ी रो-मर, मैं तो चला बहार। कम-से-कम तेरी मनहूस जुबान तो नहीं सुनाई पड़ेगी।"

कहने के साथ ही द्वार खुला। बाहर मौज़ूद था सिर्फ अमावस का घनघोर अँधेरा। जिसमें वह साया, न जाने कहाँ गुम हो गया था, जो बाहर द्वार खटकाने के उद्देश्य से खड़ा था।


(२८.) मुलाकात

"वो क्या ले गए जो सिकंदर के वाली थे। जब गया सिकंदर दोनों हाथ खाली थे।" शमशान के द्वार पर एक पागल फ़क़ीर बड़े ऊँचे सुर में चिल्ला रहा था। शव के साथ आये लोगों ने उस पागल की बात पर कोई विशेष ध्यान न दिया; क्योंकि शमशान में यह आम बात थी। अभी-अभी जिसका शव शमशान में लाया गया था वह शहर के सबसे बड़े रहीस सेठ द्वारकानाथ थे। पृष्ठभूमि में नाते-रिश्तेदारों का हल्का-हल्का विलाप ज़ारी था। लेकिन उनमे अधिकांश ऐसे थे, जो सोच रहे थे—द्वारकानाथ की मृत्यु के बाद अब उनकी कम्पनियों का क्या होगा? बंटवारे के बाद उन सबके हिस्से में कितना-कितना, क्या-क्या आएगा? शहर के अनेकों व्यवसायी महंगे परिधानों में वहां जमा थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था—क्या करें? क्या कहें? वह सिर्फ़ द्वारकानाथ से जुड़े नफ़े-नुकसान की बदौलत वहां खड़े थे।शमशान में भी उन्हें शोक करने से ज़ियादा आनंद अपने बिजनेस की बातों में आ रहा था।  

"और मेहरा साहब क्या हाल हैं? आपका बिजनेस कैसा चल रहा है।" सूट-बूट और टाई पहने व्यक्ति ने अपने परिचित को देखते हुए कहा।
"अरे यार वर्मा क्या बताऊँ?" महरा साहब धीरे से बोले ताकि अन्य लोग न सुन लें, "द्वारकानाथ दो घण्टे और ज़िंदा रह जाते तो स्टील का टेण्डर हमारी कम्पनी को ही मिलता। उनके आकस्मिक निधन से करोड़ों का नुक्सान हो गया।"

"कब तक चलेगा द्वारकानाथ जी के अंतिम संस्कार का कार्यक्रम?" मेहरा से थोड़ी दूरी पर खड़े दो अन्य व्यक्तियों में से एक ने ज़ुबान खोली, "मेरी फ्लाईट का वक्त हो रहा है।"
"यह तो आज पूरा दिन चलेगा। शहर के अभी कई अन्य गणमान्य व्यक्ति, राजनेता भी आने बाकी हैं। सेठ द्वारकानाथ कोई छोटी-मोटी हस्ती थोड़े थे। उनका कारोबार देश-विदेश में काफ़ी बड़े दायरे में फैला हुआ है। जैसे अंग्रेज़ों के लिए कहा जाता था कि उनका सूरज कभी डूबता ही नहीं था। ठीक द्वारकानाथ जी भी ऐसे ही थे।"

"बंद करो यार ये द्वारकानाथ पुराण।" तीसरे व्यक्ति ने बीच में प्रवेश करते हुए कहा, "सबको पता है द्वारकानाथ, बिजनेस का पर्यायवाची थे। खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते, नहाते-धोते हर वक्त बिजनेस का प्रचार-प्रसार, नफ़ा-नुक्सान ही उनकी ज़िंदगी थी। शेयर बाज़ार की गिरती-बढ़ती हर हलचल उनके मोबाईल से लेकर लेपटॉप तक में दर्ज़ होती थी।"

"यार मुझे तो फ्लाईट पकड़नी है और यात्रा के लिए सामान भी पैक करना है।" पहला व्यक्ति बड़ा बेक़रार था।

"अरे यार चुपके से निकल जाओ। तुमने हाज़री तो लगवा ही दी है। अब यहाँ खड़े-खड़े मुखाग्नि थोड़े दोगे। फिर द्वारकानाथ कौन-सा किसी के सुख-दुःख में शामिल होता था। शायद ही पिछले तीन दशकों में कोई लम्हा बीता होगा। जब द्वारकानाथ जी ने अपने लिए जिया हो।" तीसरे व्यक्ति ने कहा।

"बंद करो ये बकवास। तुम यहाँ मातम मनाने आये हो या गपशप करने। शर्मा जी, हमको और आपको भी जाना है, एक दिन वहां।" चौथे व्यक्ति ने तीसरे व्यक्ति से कहा। और बातचीत में मौजूद तीनों व्यक्ति शर्मिदा होकर चुपचाप खड़े हो गए। 

"हाय! हाय! हम अनाथ हो गए।" एक नौकर बोला। बाकी घर के दो-चार अन्य नौकर उससे सहमति दर्शाने लगे।

"हमें कौन देखेगा? सेठजी हमारे पिता की तरह थे।" उस नौकर का बिलाप जारी था।
 
"हाय! हाय! सेठ जी! क्यों चले गए आप? काश आपकी जगह हमें मौत आ जाती।" दूसरे नौकर ने कहा।
"सेठ द्वारकानाथ जी, उठिए न। आज तो आपको और भी कई महत्वपूर्ण डील फ़ाइनल करनी हैं। हमारी कम्पनियों को आज और भी करोड़ों रुपयों का मुनाफ़ा होना था।" सूट-बूट में खड़े व्यक्ति ने द्वारकानाथ के शव से कफ़न हटाते हुए कहा। शायद वह उनका निजी सचिव या कोई मैनेजर था। उनका चिर-निद्रा में सोया हुआ चेहरा ऐसा जान पड़ रहा था जैसे, अभी उठ पड़ेंगे।

"आख़िर मिल ही गया मुलाकात का वक्त तुम्हे, मेरे अज़ीज़ दोस्त!" एक व्यक्ति जो द्वारकानाथ के शव के सबसे निकट खड़ा था। यकायक बोला।

"आप कौन हैं?" मैनेजर ने उस अनजान व्यक्ति से पूछा।

"आप मुझे नहीं जानते, लेकिन द्वारकानाथ मुझे तब से जानता था, जब वह पांचवी क्लास में मेरे साथ पढता था।" उस व्यक्ति ने बड़े धैर्य से कहा।

"लेकिन आपको तो कभी मैंने देखा नहीं! न ही सेठजी ने कभी आपका ज़िक्र किया!" मैनेजर ने कहा।

"वक्त ही कहाँ था, द्वारकानाथ के पास? मैंने जब भी उससे मुलाकात के लिए वक्त माँगा। वह कभी फ़्लाइट पकड़ रहा होता था। या किसी मीटिंग में व्यस्त होता था। मैं उसे पिछले तीस वरसों से मिलना चाहता था!" उस व्यक्ति ने कहा, "और विडंबना देखिये आज मुलाकात हुई भी तो किस हाल में! जब न तो द्वारकानाथ ही मुझसे कुछ कह सकता है! और न ही मैं द्वारकानाथ को कुछ सुना सकता हूँ।"

इस बीच न जाने कहाँ से पागल फकीर भी द्वारकानाथ के शव के पास ही पहुँच गया था। वह कफ़न को टटोलने लगा और शव को हिलाने-डुलाने लगा।

"ऐ क्या करते हो?" द्वारकानाथ के नौकरों ने पागल फ़क़ीर को पकड़ते हुए कहा।

"सुना है यह सेठ बहुत अमीर आदमी था।" पागल फ़क़ीर ने कहा।

"था तो तेरे बाप का क्या?" मैनेजर ने कड़क कर कहा।

"मैं देखना चाहता हूँ। जिस दौलत के पीछे यह ज़िंदगी भर भागता रहा। अंत समय में आज यह कफ़न में लपेटकर क्या ले जा रहा है? हा हा हा …" पागल फ़क़ीर तेज़ी से हंसने लगा।

"अरे कोई इस पागल को ले जाओ।" मैनेजर चिल्लाया।

"नौकर चाकर छोड़ के, चले द्वारकानाथ। दाता के दरबार में, पहुँचे ख़ाली हाथ।" पागल फ़क़ीर ने ऊँचे सुर में दोहा पढ़ा। भूतकाल में शायद वह कोई कवि था क्योंकि दोहे के चारों चरणों की मात्राएँ पूर्ण थीं। नौकरों ने अपने हाथों की पकड़ को ढीला किया और फ़क़ीर को छोड़ दिया। साथ ही सब पीछे को हट गए। वह कविनुमा पागल फ़क़ीर अपनी धुन में अपनी राह हो लिया।

 


(२९.) बंद दरवाज़ा
"चले जाओ, मुझे कुछ भी नहीं कहना है।" दरवाज़ा खोलने वाली स्त्री ने आगंतुकों की भीड़ की ओर देखकर कहा।  धड़ाम की ज़ोरदार आवाज़ के साथ द्वार पुनः बंद हो गया।

"भगवान के लिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो … चले जाओ तुम लोग।" उस स्त्री की सिसकती हुई आवाज़ आगंतुकों को बंद द्वारवाज़े के पीछे से भी साफ़ सुनाई दी।

"देखिये मैडम, दरवाज़ा खोलिए। हम आपका भला करने के लिए ही आये है। हम सभी मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े लोग हैं। आप पर हुए बलात्कार की खबर को सार्वजनिक करके हम उस भेड़िये को बेनकाब कर देंगे जिसने तुम्हारे जैसी न जाने कितनी ही मासूम लड़कियों को ज़िंदगी ख़राब की है।" आगंतुकों की भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।

"अच्छी तरह जानती हूँ तुम लोगों को। ऐसी घटनाओं को मसाला बनाकर खूब नमक-मिर्च लगाकर परोसते हो, एक चटपटी खबर की तरह। अपने चैनल को इस तरह नाम और प्रचार देते हो और खूब विज्ञापन बटोरते हो।"

"देखिये मैडम, आप गलत सोच रही हैं। हम व्यावसायिकता की दूकान चलाने वाले लोग नहीं हैं। समाज के प्रति हमारी कुछ नैतिक ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। सच को सार्वजनिक करना ही हमारा मूल उद्देश्य है।"

"हाँ जानती हूँ, कितने नैतिकतावादी हो तुम लोग! सच की आड़ में कितना झूठ परोसते हो तुम लोग! तुम समाज का क्या हित करोगे? तुमने लोगों की संवेदनाओं का व्यवसाय करना सीख लिया है। दफ़ा हो जाओ सबके सब, दरवाज़ा नहीं खुलेगा।"

बंद दरवाज़े के पीछे से ही उस स्त्री को मीडिया वालों के सीढियाँ उतरने की आवाज़े सुनाई दीं। बंद पीछे से ही पड़ोसियों को देर रात तक उस स्त्री की सिसकियाँ सुनाई दीं।

(३०.) सोया हुआ 
आई० ए० एस० के एग्जाम की तैयारियों में इन दिनों रामस्वरूप सिंह की नींद उड़ी हुई थी। परीक्षा की तैयारी में उसने दिन-रात एक कर दिए थे। रामस्वरूप के जीजा प्रेम सिंह अपने वक्त के आई० ए० एस० टॉपर थे। तभी से रामस्वरूप ने उन्हें अपना आदर्श मान लिया था। उन्ही के जैसा उच्च अधिकारी बनने का स्वप्न लिए वह अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु इन दिनों जीजा जी के आवास स्थान में ही अपना डेरा डाले हुए था। इसका मुख्य लाभ तो यह था कि समय-समय पर राम स्वरूप को अपने जीजाजी से परीक्षाओं के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण टिप्स मिल जाती थी। जो उसकी एग्जाम की तैयारियों में अहम रोल अदा कर रही थी। यह सरकारी बांगला था। जो सरकार की तरफ से प्रेम सिंह को रहने के लिए मिला था। यहाँ लम्बा-चौड़ा लॉन भी था। जहाँ अक्सर चहल-कदमी करते हुए शांतिपूर्वक पढ़ा जा सकता था। फिर जीजाजी के बच्चे अन्य शहर में पढ़ते थे। अतः हॉस्टल में ही रहते थे। इसलिए बंगले में असीम शांति पसरी हुई थी। जो पढाई के लिए आदर्श स्थिति होती है। लॉन के दूसरी तरफ़ सर्वेंट क्वार्टर था।  जहाँ धर्म सिंह नाम का एकमात्र नौकर रहता था। जो बेहद हंसमुख और हाज़िर-जवाब आदमी था। रामस्वरूप जब आई० ए० एस०एग्जाम की कठिन पढाई से बोर हो जाता था तो समय पास करने और दिल बहलाने के लिए वह अक्सर धर्म सिंह के क्वार्टर में चला जाता था।
 
रोज़ की भांति रात्रि भोजन के उपरान्त रामस्वरूप  लॉन में चहल-कदमी करते हुए पढ़ रहा था। रामस्वरूप को सिगरेट पीने की लत थी। वह अक्सर जीजा जी और दीदी से चोरी-छिपे सिगरेट पीता था। आज भी उसे सिगरेट पीने की तलब हुई। जेब में हाथ गया तो सिगरेट बाहर आई मगर संयोग से आज वह माचिस नहीं रख पाया था। अब तक बंगले की बत्ती बुझ चुकी थी। यदि इस समय बंगले में माचिस लेने गया तो जीजाजी की नींद टूट सकती है।उसने देखा सर्वेन्ट क्वार्टर की लाइट जली हुई है। शायद धर्म सिंह अभी सोया नहीं है। चलो आज उसी से माचिस ले ली जाये। इसी बहाने कुछ गपशप भी हो जाएगी तो पढाई के लिए मन हल्का जायेगा।

"धर्म सिंह, सो गए क्या?" दरवाज़े से ही रामस्वरूप ने पुकारा।
"नहीं साहब! आ जाओ दरवाज़ा खुला है।" धर्म सिंह ने लेटे-लेटे ही भीतर से कहा।
"माचिस दे थोड़ा सिगरेट की तलब मिटा लूँ।" भीतर पलंग के एक छोर पर बैठते हुए रामस्वरूप बोला। उसने किताब मेज़ पर रखी और सिगरेट को होंठों से लगा लिया।
"तुम्हारा हिसाब-किताब बढ़िया है धर्म सिंह।" धर्म सिंह से माचिस की डिब्बी लेते हुए रामस्वरूप बोला। उसने एक तिल्ली सुलगा ली और सिगरेट के मुहाने पर लगाकर वह सिगरेट सुलगाने में व्यस्त हो गया।
"क्या बढ़िया हिसाब-किताब है साहब!" हलकी-सी जम्हाई लेते हुए धर्म सिंह हैरानी से बोला।
"खा-पीकर चैन से सो जाते हो।" सिगरेट का कस लेने के उपरांत रामस्वरूप ने कहा। धुँआ वातावरण में इधर-उधर तैरने लगा। फिर बात को आगे बढ़ाते हुए बोला, "तुम्हे न वर्तमान की चिंता, न भविष्य की फ़िक्र। मुझे देखो परीक्षा की तयारी में कई दिनों से ठीक ढंग से सो नहीं पा रहा हूँ। किताबो में ऑंखें गढ़ाते हुए रात के दो-ढाई बज जाते हैं।" इस बीच सिगरेट का एक और ज़ोरदार कस लेने के लिए रामस्वरूप रुका। कस लेने के बाद उसने कहना जारी रखा, "मेरी स्थिति पर किसी शाइर ने क्या खूब कहा है-- फ़िक्रे दुनिया में सर खपाता हूँ। मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ?"

"सही कह रहे हो साहब!" आख़िर धर्म सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी, "हम सोये हुए लोग हैं। आप जागे हुए लोग हैं।"

"क्या मतलब?" रामस्वरूप सिंह ने चौंकते हुए कहा।

"मतलब यह कि आज मैं आपके जीजा जी और दीदी के बर्तन-भांडे धो रहा हूँ। कल को आप भी अफसर हो जायेंगे तो मेरे बच्चे आपके बर्तन-भांडे धोएंगे।"

"धर्म सिंह आप गलत समझ रहे हो मेरे कहने का यह अर्थ नहीं था!" शर्मिंदगी महसूस करते हुए रामस्वरूप ने अपनी बात की सफाई देनी चाही मगर उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह कहे तो क्या कहे?

"जानता हूँ साहब! आपके कहने का यह अर्थ नहीं था।" धर्म सिंह ने हँसते हुए कहा, "लेकिन सच्चाई तो यही है साहब।"

"अच्छा अब मैं चलता हूँ।" हंसी की एक गंभीर लकीर चेहरे पर लिए रामस्वरूप मेज़ से अपनी किताब उठाकर धर्म सिंह के कक्ष से बाहर चले आये। यह सोचते हुए शायद बेइरादा ही सही उन्हें ऐसी कठोर बात नहीं कहनी चाहिए थी।

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लघुकथाकार : महावीर उत्तरांचली

(शायर, कवि व कथाकार)

 

निदेशक—उत्तरांचली साहित्य संस्थान (नई दिल्ली)

उपसम्पादक—कथा संसार (त्रै-मासिक, ग़ाज़ियाबाद)

साहित्य सहभागी—बुलंदप्रभा  (त्रै-मासिक, बुलंदशहर)


बी-४ /७९, पर्यटन विहार, वसुंधरा एन्क्लेव, दिल्ली ११००९६
चलभाष : ९८१८१५०५१६
ईमेल : m.uttranchali@gmail.com

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