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विश्व जनसंख्या दिवस विशेष आलेख - विनाश की ओर बढ़ती मानवता


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· अनिल कुमार पाण्डेय
 

विश्व जनसंख्या दिवस कोई साधारण दिवस नहीं, बल्कि सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। विश्व में सुपर सोनिक गति से बढ़ती जनसंख्या के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के उद्देश्य से ही यह दिवस मनाया जाता है। ये बात अलग है कि इस तरह के उद्देश्यपूर्ण दिवसों की जानकारी हमें टीवी, रेडियो और अखबारों से ही प्राप्त होती है। भला हो सोशल मीडिया का जिस पर हफ्ते-दस दिन पहले ही इन दिवसों से संबंधित जानकारियां आना शुरु हो जाती हैं। ११ जुलाई १९८७ के दिन जब विश्व की जनसंख्या पांच अरब के आंकड़े को पार कर गई तब सयुंक्त राष्ट्र ने जनसंख्या वृद्धि को लेकर दुनिया भर में जागरुकता फैलाने कि लिए यह दिवस मनाने का निर्णय लिया । तभी से इस विशेष दिन को परिवार नियोजन के संकल्प दिवस के रुप में मनाया जाने लगा। आज विश्व के सभी राष्ट्र जनसंख्या विस्फोट से चिंतित हैं। विकासशील राष्ट्र जहां जनसंख्या के बीच सामंजस्य बैठाने में लगे हैं, वहीं विकसित राष्ट्र पलायन और अच्छे रोजगार की चाहत में बाहर से आने वाले शरणार्थियों से परेशान हैं।

वर्तमान में विश्व की जनसंख्या सात अरब का आंकड़ा पार कर चुकी है। विश्व को इस आंकड़े तक पहुंचाने में भारत का अहम योगदान है। २०११ की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या तकरीबन १ अरब २१ करोड़, १ लाख, ९३ हजार ४२२ है। वहीं भारत की पिछले दशक की जनसंख्या वृद्धि दर तकरीबन १७.६४ प्रतिशत के करीब रही जो कि अन्य देशों की तुलना में बहुत ज्यादा है। वहीं राज्यों की जनसंख्या की तुलना अन्य देशों की जनसंख्या से की जाय तो भारत में ही कई देश बसते से नज़र आते हैं। जैसे उत्तर प्रदेश की जनसंख्या ब्राजील से,मध्यप्रदेश की जनसंख्या थाईलैंड से,ओडिशा की अर्जेंटीना से, गुजरात की दक्षिण अफ्रीका से और महाराष्ट्र की मैक्सिको से ज्यादा है। अगर वर्ष २०३० तक जनसंख्या वृद्धि दर की स्थिति यही रही तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा आबादी वाला देश बन जाएगा। यह देश की ऐसी उपलब्धि होगी जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता । ऐसा इसलिए कि विश्व के कुल क्षेत्र का मात्र २.४ प्रतिशत ही हमारे पास है। यानि कि वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में भी हमारे पास संसाधन उपलब्ध नही हैं और हम जनसंख्या के मामले में रिकार्ड पर रिकार्ड बना रहे हैं।

जनसंख्या का यह विस्फोट किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है। बढ़ती जनसंख्या के कारण ही बेरोजगारी की समस्या आज अपने विकराल स्वरुप में हम सबके सामने है। गांवों में संसाधनों की उपलब्धता सीमित होती है। ऐसे में बढ़ती जनसंख्या का बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की तरफ पलायन स्वाभाविक है। इस पलायन के चलते एकाएक बढ़ी जनसंख्या से शहरों की अधोरचना चरमरा जाती है। आवास की समस्या के चलते ही लोगों को झोपड़ियों का सहारा लेकर अस्वस्थकर परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है। और बच्चों को शिक्षा व सही परवरिश नहीं मिलती वह अलग।

कुछ जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में बढ़ती हुई जनसंख्या चिंता की बजाय वरदान साबित हो सकती है। तर्क है कि जनसंख्या बढ़ेगी तो खपत भी बढ़ेगी,जिसेक चलते भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार बन जाएगा। लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा लेकिन यह तर्क देने वाले शायद ये भूल जाते हैं कि देश वैसे भी संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। पेट्रोलियम के दाम बढ़ने मात्र से देश में हाहाकार मच जाता है। माना कि ऐसा संभव भी हो तो क्या हमारे प्राकृतिक संसाधन असीमित और अपरिमित मात्रा में हैं ? जो हमेशा चलते रहेंगे ? और हम उनका दोहन इसी तरह बेरहमी पूर्वक करते रहेंगे। प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में हैं। जिनकी निकट भविष्य में खत्म होने की पूरी आशंका है। ऐसे में एक सवाल ये भी उठता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को क्या देंगे- धूल, धुंआ, प्रदूषण या फिर भुखमरी,बेरोजगारी या लाचारी। आज जरुरत है संपोषणीय विकास की जो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ ही उनके नवीनीकरण को भी सुनिश्चित कर सके ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन संसाधनों का उपभोग कर सके।

सुरसा की तरह बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने का एकमात्र साधन परिवार नियोजन और इसके प्रति लोगों में बढ़ती जागरुकता है। लोगों को इस बढ़ती जनसंख्या के संभावित भयावह परिणाम बताने के साथ ही सरकार को भी कई ऐसे संवैधानिक प्रावधान करने होंगे जिनसे अनियंत्रित होते जन सैलाब को नियंत्रित किया जा सके। चीन की एक बच्चा नीति के कारण ही आज चीन की जनसंख्या अपेक्षाकृत नियंत्रित है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन भारत की परिस्थितियां अलग हैं, इस नीति के अनुशरण से देश के बहुसंख्यक वर्ग को अल्पसंख्यकों में तब्दील हो जाने का खतरा है तो वहीं अल्पसंख्यकों के बहुसंख्यक बनने के सपने के टूटने का खतरा है। परिस्थितियां विषम हैं । लिहाजा कुछ कठोर कदम उठाने की महती आवश्कता है। भारत विश्व का पहला देश है जहां पर जनसंख्या को नियंत्रित करने के उद्देश्य से परिवार नियोजन कार्यक्रमों की शुरुआत की गई थी। पहल अच्छी थी लेकिन अपेक्षाकृत जन सहयोग न मिलने से इसके परिणाम आशाजनक नहीं मिले और आज भी ये कार्यक्रम जनसंख्या नियंत्रण और जागरुकता फैलाने के नाम पर महज एक खानापूर्ति का जरिया बने हुए हैं।

अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार डेली न्यूज में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जानवरों की प्रजातियों में ३० प्रतिशत तक की कमी आई है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि इंसान अधिकाधिक मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है। वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण ही जलवायु परिवर्तन और पेयजल की अनुपलब्धता जैसी कई समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। इस रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि अगर मानव प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी प्रकार से करता रहा और विश्व की जनसंख्या इसी गति से बढ़ती रही तो वर्ष २०३० तक हमें पृथ्वी जैसे दो ग्रहों की आवश्यकता और पड़ेगी। समस्या गंभीर है लिहाजा इस समस्या पर लेख लिखने और चंद लोगों के पढ़ने मात्र से इस समस्या का निदान संभव नहीं है, बल्कि इस समस्या के समाधान के लिए देश के हर एक व्यक्ति को परिवार नियोजन के लिए कृत संकल्पित होना पड़ेगा, नहीं तो ज्वालामुखी के लावे की तरह बढ़ता ये जन सैलाब एक दिन सम्पूर्ण मानवता के विनाश का कारण होगा 

 
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अनिल कुमार पाण्डेय
लेखक पत्रकारिता एवम् जनसंचार विषय में डॉक्टोरल रिसर्चर हैं।
(पत्रकारिता एवम् जनसंचार)
Email- mcrpsvvanil@gmail.com












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