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व्यापमं : केंद्रीकृत भर्ती परीक्षा के दुष्परिणाम

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प्रमोद भार्गव
मध्यप्रदेश व्यावसयिक परीक्षा मंडल यानी व्यापमं देश का शायद एकमात्र ऐसा बड़ा घोटाला है,जो इससे संबंधित लोगों की बड़ी संख्या में हो रही मौतों के कारण वैश्विक चर्चा का हिस्सा बना है। इसकी व्यापकता देखते हुए यह कहना मुश्किल ही है,कि सीबीआई इसकी अतल गहराई में उतरकर हरेक सूत्र को पकड़ पाएगी ?  दरअसल व्यापमं के माध्ययम से इतना बड़ा घोटाला इसलिए संभव हो पाया,क्योंकि इसके सुपुर्द 55 प्रकार की भर्ती परीक्षाएं कराई जा रही थीं। लिहाजा प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं का यह एक ऐसा बड़ा नाभि-केंद्र बन गया,जिसके जरिए लिपिक, वनकर्मी, शिक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी से लेकर डॉक्टर-इंजीनियर सुविधा शुल्क चुकाकर आसानी से बनवाए जा सकते थे। मध्यप्रदेश में राज्य प्रशासनिक सेवा और न्यययिक भर्ती परीक्षाओं को छोड़ अन्य सभी भर्ती परीक्षाओं में प्रवेश के माध्यम का केंद्र व्यापमं बना दिया गया है। यदि ये परीक्षाएं विकेंद्रीकृत प्रणाली द्वारा होती तो शायद इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं हो पाता ? इस नाते परीक्षा पद्धति में भी सुधार की जरूरत है ?


    यदि मध्यप्रदेश में चल रहे ड्रग ट्रायल और व्यापमं का पर्दाफश करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता डॉ आनंद राय की बात मानें तो इस घोटाले की शुरूआत 2005 से पहले ही हो चुकी थी। क्योंकि 5 जुलाई 2009 को इस गड़बड़ी से जुड़ी जो उन्होंने पहली शिकायत की थी,उसके आधार पर जांच समिति भी गठित कर दी गई थी,लेकिन वह कोई सार्थक परिणाम नहीं दे पाई। 2011 में विधायक पारस सकलेचा द्वारा विधानसभा में इस गड़बड़ी से जुड़े सवाल के जबाव में सरकार ने कहा था कि चिकित्सा भर्ती परीक्षा में 14 फर्जी डॉक्टर पाए गए हैं। यह व्यापमं घोटाले से जुड़ा वह पहला तथ्यात्मक बिंदू था, जिसके सार्वजनिक होते ही एक कर्त्तव्यनिष्ठ व सजग सरकार को सतर्क हो जाने की जरूरत थी। लेकिन विडंबना यह रही कि यहां तक आते-आते राजनेता, नौकरशाह और बिचौलियों का एक ऐसा गठजोड़ तैयार हो चुका था,जो न केवल परस्पर हित साधक बने हुए थे,बल्कि एक-दूसरे की पोल-पट्टियों के राजदार भी हो गए थे। नतीजतन न केवल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,बल्कि संवैधानिक पद पर आसीन राज्यपाल रामनरेश यादव ने भी आंखे मुंद लीं। यही नहीं राज्यपाल और उनके बेटे शैलेष यादव भी घोटाले के इस गोरखधंधे से काली-कमाई करने लग गए। आपसी हिमायत के इस खेल ने साबित कर दिया कि हमाम में सब नंगे हैं। यही वजह रही कि नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद ऐसे 11 राज्यपाल हटा दिए गए,जिनकी नियुक्ति संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुई थीं,किंतु मधप्रदेश के राज्यपाल इसी घोटाले में प्राथमिकी में नामजद हो जाने के बावजूद भी नहीं हटाए गए,क्योंकि वे प्रदेश की भाजपा सरकार के काले-कारोबार पर न केवल पर्दा डाल रहे थे,बल्कि खुद शरीक भी हो गए थे


    सर्वोच्च न्यायालय ने जांच सीबीआई के सुपुर्द कर दी है। इससे यह उम्मीद जगी है कि घोटाले से जुड़े जो दो तरह के अपराध हुए हैं,उनकी तहकीकत गंभीरता से होगी। घोटाले में पहला दोष शासन-प्रशासन के स्तर पर है,जिसने लालच में आकर इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां कीं कि व्यवस्था की रीढ़ ही चकनाचूर हो गई। दूसरे वे 45 संदिग्ध मौतें हैं,जिनकी तह में सीबीआई को जाना है। ये वे मौते हैं,जिनमें अभियुक्त,अभ्यार्थी और दलाल शामिल हैं। यह मुद्दा नाजुक है,क्योंकि ये मौतें आत्महत्या भी हैं और इनमें से कुछ हत्याएं भी हो सकती हैं। कम से कम 10 मौतें तो ऐसी हैं,जो रहस्यमयी परिस्थितियों हुई हैं,लिहाजा हत्या के दायरे में आ सकती हैं। ऐसी मौतों में चिकित्सा महाविद्यालय,इंदौर की छात्रा नम्रता डामौर की मौत का सच तो करीब-करीब सामने आ ही गया है। 17 जनवरी 2012 को इस छात्रा का शव उज्जैन जिले के कायथा ग्राम के पास रेल पटरी पर मिला था। शव-विच्छेदन करने वाले चिकित्सक डॉ बीबी पुरोहित और डॉ ओपी गुप्ता ने इस मौत को हत्या करार दिया था,क्योंकि नम्रता के शरीर पर मिले निशान हत्या की और इशारा कर रहे थे। लेकिन पुलिस ने पीएम रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए हत्या को आत्महत्या में बदलकर मामला ही रफा-दफा कर दिया था। अब सीबीआई जांच से पता चलेगा कि पुलिस ने यह गैर-कानूनी हरकत किसके दबाव में की ?


    यह देश का पहला ऐसा मामला है,जिसका संख्यात्मक और भौगोलिक दायरा बहुत बड़ा है। इसके तार दिल्ली, छत्तीसगढ़,उत्तरप्रदेश,राजस्थान,बिहार और हिमाचल प्रदेश से जुड़े होने के सबूत सामने आ चुके हैं। इसमें अब तक करीब 3000 लोग आरोपी बनाए जा चुके हैं,जिनमें से 1700 की गिरफ्तारियों भी हो चुकी हैं। शेष फरारी में हैं। गिरफ्तारी हुए रसूखदार लोगों में शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा से लेकर आईपीएस आरके शिवहरे हैं। शिवहरे ने अपने बेटी-दामाद को चिकित्सक बनवाने के साथ बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए तमाम लोगों को सिपाही व थानेदार बनवाया था। व्यापमं की तात्कालीन अध्यक्ष एवं आईएएस रंजना चौधरी भी शक के दायरे में हैं। घोटाले के आरोपी वीरपाल यादव ने दिए बयान में चौधरी को 72 लाख रूपए देने की बात कही है। एसटीएफ उन्हें सरकारी गवाह बनाने को मूड में थी,लेकिन अब सीबीआई जांच में उनका आरोपी बनना तय माना जा रहा है। एक और बड़े आरोपी नितिन मांहिद्रा के कंप्युटर हार्डडिस्क से घोटाले से संबंद्ध लोगों की जो सूची एसटीएफ ने निकाली है, उसमें 'मंत्राणी' शब्द का उल्लेख है। इस शब्द का संबंध परिभाषित नहीं होने के बावजूद साफ संकेत है कि शब्द की प्रतिध्वनि श्यामला हिल्स के ईदर्गिद प्रतिध्वनित हो रही है। जाहिर है, मुख्यमंत्री, राज्यपाल समेत तमाम आईएएस, आईपीएस की मुश्किलें बढ़ गई हैं। एसटीएफ अब तक इस मामले में 28 चालान पेश कर चुकी है। यदि सीबीआई को नए सिरे से जांच व समीक्षा करने में लगेगा कि दाल में कहीं कुछ काला है,तो वह अदालत की अनुमति लेकर पूरक चालान भी पेश कर सकती है। सीबीआई जेल में बंद और जमानत पर रिहा हुए आरोपियों के भी दोबारा बयान लेगी।


    इस मामले में लाभ पाए छात्र और उनके अभिभावक भी आरोपी बनाए गए हैं,इस लिहाज से इसका संख्यात्मक दायरा बहुत बड़ा हो गया है। सीबीआई जांच में घोटाले का संख्यात्मक दायरा और विस्तृत होने की उम्मीद है,क्योंकि वे लोग लपेटे में एक-एक कर आना शुरू हो जाएंगे,जो अपने पद के प्रभुत्व के चलते बचे हुए थे। यही नहीं यह जांच जाने-अनजाने आरोपियों को मनोवैज्ञानिक रूप से भयभीत भी कर सकती है,इसलिए हो सकता है आरोपियों की मौत का सिलसिला फिर चल पड़े ? इस लिहाज से दिग्विजय सिंह के इस बयान को महत्व देने की जरूरत है कि 'जो छात्र और अभिभावक जेल में बंद हैं,उन सभी को सरकारी गवाह बनाकर राहत दी जाए।' दरअसल ये लोग नौकरी के लालच में भ्रष्ट व्यवस्था के शिकार हुए हैं। लिहाजा इन्हें सरकारी गवाह बनाने की पहल की जाती है तो इन्हें मानसिक राहत मिलेगी और ये अवसाद में आकर आत्महत्या करने को विवश नहीं होएंगे।


    सीबीआई जांच की शुरूआत व्यापम की कंप्युटर प्रणाली के विश्लेषक नितिन महिंद्रा की हार्डडिस्क से होगी। इस घोटाले के पर्दाफश करने के सभी नाम,सूत्र और राशि महिंद्रा के कंप्युटर और लैपटॉप से बरामद चार हार्डडिस्कों में दर्ज हैं। इनमें से वह डाटा डीलिट कर दिया है,जिसमें पहुंच वाले लोगों के नाम दर्ज थे। अब डीलिट डाटा को अहमदाबाद की फॉरेन्सिक प्रयोगशाला से रिट्रीव कराया जाएगा। इससे जो एक्सेल शीट मुद्रित होकर निकलेगी,उसे संपूर्ण मानते हुए जांच का प्रमुख आधार बनाया जा सकता है। इस प्रक्रिया से पूरे नाम उजागर हो जाएंगे,ऐसी उम्मीद शिकायत व जांचकर्ताओं को है।
   

यह घोटाला इतना चर्चित हो चुका है कि अब देश के जनमत और मीडिया की तीसरी आंख सीबीआई जांच पर टिकी रहेगी। इसलिए राजनीतिक हस्तक्षेप नामुनकिन है। लेकिन प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं की गुणवत्ता बनी रहे और योग्यतम उम्मीदवार ही निर्विवाद रूप से चुनकर आएं, इस नजरिए से परीक्षा-प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। परीक्षा विकेंद्रीकृत करने के साथ वस्तुनिष्ठ व बहु-पसंद ( मल्टीपल च्वाइस) सवालों को एक हद तक बंद कर देना चाहिए। साथ ही उत्तर पुस्तिका में पेंसिल से गोले अथवा सही का निशान लगाने की पद्धति समाप्त होनी चाहिए। क्योंकि हाल ही में मेडिकल की प्री-पीजी परीक्षा में डीमेट के सहायक समन्वयक योगेश उपरीत को एसआईटी ने हिरासत में लिया है। इसने डीमेट में गड़गड़ी का खुलासा करते हुए बयान दिया है कि डीमेट में अयोग्य उम्मीदवार का चयन गोले काले कराकर किया जाता है। तय है, गोले और निशान लगाने की परीक्षा पद्धति घोटाले का सरल उपाय साबित हो रही है। इनके बजाय वर्णनात्मक सवाल पूछे जाएं, जिनका पर्चा लीक हो जाने के बावजूद आसानी से परीक्षार्थी द्वारा हल किया जाना संभव नहीं है। आईआईटी व यूपीएससी प्रवेश परीक्षा में यही होता है। कालांतर में परीक्षा प्रणाली में सुधार नहीं किया जाता तो सीबीआई जांच के बावजूद जरूरी नहीं कि व्यापमं से जुड़ी परीक्षाओं की साख बहाल हो जाए ?


                                             

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक, वरिष्ठ कथाकार एवं पत्रकार हैं।

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