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बारिश बनारस और भूली हुई कहानी ....

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- असित कुमार मिश्र

जगेसर मिसिर ने प्लेटफॉर्म से बाहर जैसे ही पहला कदम रखा बारिश थोड़ी और तेज हो गई। मिसिर जी ने तंज से मुस्कुरा के आँख भर देखा बनारस को और सोचा-बीस साल बाद भी मेरे लिए एकदम नहीं बदला यह शहर। पहले भी बेवफा था अब भी बेवफा ही है। आटो वाले ने पूछा-कहाँ चलना है साहब? कहीं भी ले चलो-बेख्याली में ही कह गए मिसिर जी।

 

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थोड़ी बरसात में ही भींग जाता है बनारस। खुद में सिमटी हुई सी कोई लज्जाशील नववधू की तरह। सब कुछ एक में मिलता हुआ सा...।नहीं नहीं,द्वैत का शहर है ये। मिसिर जी ने सिर निकाल कर निहारा बनारस को। गोदौलिया में सड़क पर घुटनों तक पानी बहता हुआ। आटो वालों की टें-टें,पें-पें। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़। दुकानों से झाँकते दुकानदार। तनिष्क का सुनहरा चमकता हुआ बड़ा सा साइनबोर्ड और उसी के नीचे भीख माँगती हुई एक छोटी सी बच्ची। सड़क के गढ्ढों में पानी भर जाने से हिचकोले खाती स्कूटी वाली लड़कियाँ। गिरने का खौफ चेहरे की आभा को बदल रहा है। ठीक सामने माल के लाउन्ज में अपनी बेटियों के साथ सेल्फी लेता कोई बाप। थोड़ा और आगे एक खाली जगह पर कुछ बूढ़ी गायों का हूजूम सब्जियों के छिलकों के साथ प्लास्टिक को अपना आहार बनाते हुए आवारा कुत्तों का मुखर विरोध झेल रही हैं। पीछे बाउन्ड्री पर गेरुआ अक्षर पिघल रहा है-'गौ सेवा-राष्ट्र सेवा'।

बारिश रुक गई है,लोग फिर पश्चिम भाग रहे हैं। पश्चिम वाले पूरब आ रहे हैं। आटो से उतर कर जगेसर मिसिर ने देखा-सड़क के एक ओर दीवार के पास पाँच-छह लोग कतार से आड़े तिरछे खड़े हैं। एक लड़का सिगरेट पीते हुए 'यहाँ पेशाब करना मना है' इस सर्वप्रसिद्ध सूत्रवाक्य को अपनी बौछार से मिटा देना चाहता है। पास की दुकान में बैठकर जैसे ही मिसिर जी ने चाय का आर्डर दिया तभी थोड़ी दूर जमीन पर बैठा हुआ भिखारी उठ कर पास आ गया और बोला-'बाबूजी एक समोसा दिला दो। बड़ी भूख लगी है' मन में क्रोध लिये उन्होंने दुकानदार को आवाज़ दी-एक समोसा दे दो भई इसको। बूढ़ा भिखारी गर्म समोसे पर टूट पड़ा है। दो मिनट बाद फिर वहीं जाकर बैठ जाता है।

चाय खत्म हो गई है। घड़ी ग्यारह बजा रही है। मतलब अभी चार घंटे बाद उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में नवनिर्मित 'कालिदास पुस्तकालय' का उद्घाटन करना है। हांलाकि कार आई ही होगी स्टेशन उन्हें लेने के लिए। पर वो अकेले ही जीना चाहते थे इस शहर को आज बीस साल बाद। पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डाला तो नोटों के साथ एक कागज़ का टुकड़ा भी निकल आया। जिसे आचार्या जी ने देते हुए कहा था कि यह किताब मुझे हर हाल में चाहिए। टुकड़े पर लाल कलम से लिखा था-जानकीदास तेजपाल मेन्शन-अलका सरावगी। दुकान से निकलते ही एक बुढ़िया भिखारिन ने दीनता से कहा-बाबूजी पांच रुपये दे दो। बड़ी भूख लगी है। खीझकर डाँटने को थे पर बुढ़िया की दीनता देखकर रुक गए। उन्होंने पांच रुपए दे दिए। बुढ़िया ने एक समोसा खरीदा और उसी बूढ़े भिखारी के पास बैठकर खाने लगी। आधा समोसा भिखारी भी खा रहा है। शायद पति-पत्नी होंगे दोनों। बुढ़िया आधे समोसे में भी संतुष्ट हो गई। बूढ़ा डेढ़ समोसे में भी संतुष्ट न हो पाया हो शायद। यह अद्भुत संतुष्टि का भाव प्रकृति ने बस नारी को ही दिया है।

लंका से पचास कदम पहले रविदास गेट के पास मिसिर जी टहल रहे हैं। उन्हें एक किताब खरीदनी है। जिसे बिट्टू की माँ ने मँगवाया है। वो हिन्दी की उपन्यास कहानियाँ पढ़ती हैं। हालाँकि पंडीजी बार बार टोकते हैं-अरे ई स्त्री विमर्श सास-बहू वाला सीरियल है। कौन पूछता है हिन्दी के उपन्यास कहानियों को...।पर पंडिताइन हमेशा की तरह मौन हो जाती हैं। अचानक बी०एच०यू० गेट के बाएँ एक बड़ा सा बोर्ड देखकर चौंक गए। उस पर लिखा था-"साहित्य-रत्न पं०जगेश्वर मिश्र द्वारा कालिदास पुस्तकालय का उद्घाटन दिनांक29/06/2015 को दिन में तीन बजे.... आधा बोर्ड रिक्शेवालों से ढंका था।

पुरानी स्मृतियों ने विह्वल कर दिया। ठीक इसी जगह बीस साल पहले परमिला से आखिरी बार मिले थे। आचार्य की परीक्षा में परमिला ठीक उनके आगे बैठी थी। जगेसर ने कहा था-परमिला बस यह योगदर्शन वाले प्रश्न का उत्तर बता दो। नहीं तो डिवीजन गड़बड़ा जाएगा। लेकिन परमिला ने नहीं बताया था उत्तर। और इसी जगह पर जगेसर का हाथ पकड़ कर परमिला ने कहा था-मिसिर जी! आप फर्स्ट-सेकेंड से ऊपर की चीज हैं। देखिएगा इसी जगह आपके नाम के बड़े बड़े बोर्ड लगेंगे....। पर जगेसर मिसिर आहत होकर उसी रात बनारस छोड़कर शान्तिनिकेतन चले गए। और आज संस्कृत के मूर्धन्य विद्वानों में इनकी गणना होती है। परमिला का क्या हुआ कुछ पता नहीं। हाँ, उन्होंने खूब यश कमाया। दो पुत्र भी हुए पत्नी भी प्रोफेसर...। परमिला की भी शादी हो ही गई होगी। दो-चार बच्चे भी होंगे ही। अब तक तो सब कुछ भूल ही गई होगी। बनारस की ही थी न परमिला। और बनारस मतलब बेवफा शहर....

तभी किताब वाले ने कहा-नहीं बाबूजी! यह किताब तो खत्म हो गई। दूसरे तीसरे चौथे दुकानों पर भी यही उत्तर मिला-अलका सरावगी के किताब दो दिन भी बाज़ार में नहीं टिकते। पंडीजी की आत्मश्लाघा को चोट लगी। क्या ऐसे भी लेखक हैं हिन्दी में? अब पंडीजी पचास कदम दूर शारदा पुस्तक केंद्र में खड़े हैं। चमरौधा जूता पानी में भींगकर पाँव से छलक पड़ता है। बड़ी भीड़ है दुकान में। आगे वाली महिला के हाथ में उसी उपन्यास को देखा तो थोड़ी राहत मिली।चलो यहाँ मिल ही जाएगी। उन्होंने दुकानदार से कहा-भई,एक 'जानकीदास तेजपाल मेन्शन' देना! दुकानदार ने कहा-बाबूजी यही एक पीस बच रही थी। जिसे मैडम जी ने खरीद लिया। अब अगले हप्ते आइएगा।

अचानक आगे की औरत ने कहा-अरे बेटा! मुझे जानकीदास तेजपाल मेन्शन नहीं, 'शेष कादंबरी' चाहिए थी। इस तरह वापस हुई वह किताब जगेसर मिसिर के हाथों में चमक रही है। बड़ी स्निग्धता है किताब में। बड़ी अपनी सी महक भी....ऐसी ही महक परमिला की किताबों से भी आती थी। अचानक उन्हें लगा कि आगे वाली औरत कहीं परमिला ही तो नहीं थी? चौंककर ढ़ूंढ़ने लगे, पर वो औरत चली गई थी। पंडीजी ने व्यग्र भाव से दुकानदार से पूछा-बेटा! यह औरत कौन थी? दुकानदार ने अन्मयस्क स्वर में कहा-डा०परमिला मैडम थीं। ओह! पंडीजी आसमान से गिरे। डरते डरते अगला सवाल किया-इनकी शादी बच्चे वगैरह? दुकानदार ने थोड़ा रुखे स्वर में कहा-क्या साहब! शादी-ब्याह के चक्कर में पड़ी होतीं तो इन्हें 'बनारस की महादेवी' कहा जाता?

आसमान साफ हो गया है अब। पंडीजी के मन में भी बहुत कुछ साफ़ हो गया है। दोपहर के दो बज रहे हैं। दशाश्वमेघ घाट की सीढ़ियाँ बारिश के बाद और भी धुली-धुली लग रही हैं। पंडित जगेसर मिसिर गंगा में डुबकियाँ लगा रहे हैं। गंगा का मटमैला पानी उनके अन्तरमन को पवित्र कर रहा है। एक और नदी है जो उनके आँखों से बह रही है.... अगर आँसुओं से कोई किताब लिखी जाती तो पंडीजी पहला वाक्य ही लिखते-बनारस मुझे माफ़ करना। तुम बेवफ़ा नहीं थे....

असित कुमार मिश्र

बलिया

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(ऊपर का चित्र - विम्मी मनोज की कलाकृति)

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