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श्री हनुमान चालीसा-संक्षिप्त व्याख्या

- दयाधर जोशी

bajarangi bhaijaan raam rasayan

 

श्री गुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।

चार फल-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले श्रीरामचन्द्र भगवान ही हैं। ये चार फल पुरुषार्थ चतुष्टय कहलाते हैं। धर्म और मोक्ष को पुरुषार्थ मुख्य भी कहते हैं।

धर्म

- भगवान में पक्का विश्वास एवं स्वच्छ सत्य व्यवहार की सन्मति भगवान ही देते हैं।

अर्थ

- सांसारिक इच्छाएँ, कामनाएँ, जीवन यापन के लिये धन धान्य, आवास, संतति और सम्पति आदि भी भगवान ही देते हैं।

काम

- पारमार्थिक, सांसारिक इच्छाएँ-कामनाएँ भी प्रभु श्रीराम की कृपा से ही पूर्ण होती हैं।

मोक्ष

- बार बार जन्म-मरण के झंझट से मुक्ति भी प्रभु श्रीराम ही देते हैं।

चूँकि धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ मुख्य कहलाते हैं, अतः धर्म के अनुसार ही अर्थ और काम की प्राप्ति की जानी चाहिये। धन से धर्म श्रेष्ठ है। यदि अर्थ अर्जन धर्मानुकूल नहीं किया जा रहा है तो उसे अनर्थ कहा जाता है। केवल धन को ही सुख का प्रमुख साधन मान लेना मूर्खता है। सुख की प्राप्ति के लिये जीवन में अच्छे संस्कार, संयम व सदाचार अतिआवश्यक है। यदि मन शुद्ध नहीं है, हेतु शुद्ध नहीं है तो निश्चित मानिये सत्कर्म भी पाप बन जाता है। मन में शुद्ध भावना नहीं है तो किया गया सत्कर्म महत्त्वहीन हो जाता है।

यावदे भ्रियते जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनः। अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।

श्रीमद्भाग्वत के इस प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार - व्यक्ति का उतने पर ही अधिकार है जितने में उसका पेट भर जाए। जो इससे अधिक को अपना मानता है वह चोर है और दण्डनीय है। संग्रह का अर्थ है विनाश। आज इस बात को स्वीकार करने वालां या यूं कहें कि इससे सहमत होने वालों की संख्या नगण्य है। इस घारे कलयुग में लगभग सभी लोग अधिकाधिक संचय को अधिक महत्त्व देते हैं। गृहस्थ को अधिक संचय नहीं करना चाहिये। जो कुछ मिले उसे प्रारब्ध समझे और अधिक की चिन्ता न करे। निर्धनता होने पर भी अधर्मपूर्वक धन प्राप्ति की इच्छा न करे, संतोष रखे। मन में संतोष होने पर निर्धनता भी दुःख नहीं देती है। अर्थ को अनर्थ मान कर लोभ को जीतना चाहिये। इतना सख्त विधान इस घोर कलयुग में लागू नहीं हो सकता है। इसे कुछ लचीला बनाना पड़ेगा। मनुष्य सत्य आचरण करे और कड़ी मेहनत करके यदि अर्थ अर्जित कर रहा है तो इसे धर्मानुकूल धन संचय कहने में संकोच नहीं होना चाहिये। व्यक्ति को पदार्थों से बहुत अधिक मोह नहीं करना चाहिये। पदार्थों का उपयोग तो मात्र जीवन-निर्वाह के लिये होना चाहिये। मनुष्य तृष्णा का त्याग पूर्णतः तो नहीं कर सकता है लेकिन जहाँ तक सम्भव हो तृष्णा को त्यागने का प्रयास होना चाहिये। व्यक्ति धनवान है फिर भी सुखी नहीं है। व्यक्ति को सुख मिल सकता है बशर्ते वह भौतिक पदार्थों की जिज्ञासा में न भटके।

व्यक्ति भोग विलास में इतना डूब चुका है कि उसे त्याग की बातें, त्याग से सम्बन्धित चर्चा सुहाती ही नहीं है। व्यक्ति यदि आत्म-ध्यान कर दुष्कर्मों से छूटने की कला सीख ले, अपने जीवन को नियमों में बाँधने का प्रयास करता रहे तो पवित्रता को प्राप्त कर सकता है। अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर सकता है। क्रोध, माया, मान और लोभ में कमी होने पर ही सत्य धर्म का प्रादुर्भाव हो सकता है। सत्य क्या है, सत्य धर्म क्या है, इसका वर्णन शब्दों में करना सम्भव नहीं है। प्रत्येक हिन्दू सत्यनारायण की कथा सुनता है, कथा कराता है लेकिन सत्य को अपनाने का प्रयास नहीं करता।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रबिः।

सत्येन वातिवायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्।।

सत्य से पृथ्वी स्थिर है और सत्य ही से सूर्य तपते हैं, सत्य ही से वायु बहती है, सब सत्य ही में स्थिर है।

गुरु का मानस ध्यान करने से मनरुपी दर्पण पर श्रीगुरु के चरणों की धूल अवश्य ही लगेगी,

इस दृढ़ विश्वास के साथ प्रभु श्रीराम का स्मरण करते रहना चाहिये।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

विद्या, बुद्धि, विवेक के आगार, सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान, अजेय-बल पौरुष के भंडार हैं श्रीराम के चरण-कमलों के मधुकर श्रीहनुमान। श्री हनुमानजी कुशाग्र बुद्धि हैं, अच्छे नीति निर्धारक हैं, बलवान हैं, शूरवीर हैं, पराक्रमी हैं, धैर्यवान हैं। धैर्यवान होना अपने आप में एक बहुत बड़ा गुण है। इनकी विवेकशक्ति, निर्णय लेने की क्षमता, वाक्-पटुता, मन के भावों को पढ़ लेने की क्षमता जैसे विशेष गुण अनुकरणीय हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास अवश्य करना चाहिये।

बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता।

सुदार्ढ्यं वाक् स्फरत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवते्।।

                         आनन्द रामायण भवो १३/१६

जो व्यक्ति निरन्तर हनुमानजी की आराधना करता है वह बुद्धि, बल, सुकीर्ति, धैर्य, साहस, निर्भयता, स्थिरता, स्वस्थता एवं शब्द चातुर्य का प्रसाद बहुत ही सहजता से प्राप्त कर लेता है। विद्या हमें ब्रह्म की प्राप्ति कराती है। हनुमानजी 'बुद्धिमतां वरिष्ठ' भी हैं। इसलिये गोस्वामी तुलसीदास जी इनसे कह रहे हैं, मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कीजिये। क्योंकि बुद्धि तो ईश्वर की कृपा से ही मिलती है। हे नाथ! मेरे क्लेश और इस देह के छः विकारों को दूर करें।

अज्ञान की पाँच वृत्तियाँ - अविद्या (तम), अस्मिता (मोह), राग (महामोह), द्वेष (तमिस्त्र) और अभिनिवेश (अंध तामिस्त्र) क्लेश कहलाती हैं। जन्मना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना, मनुष्य देह के छः विकार हैं।

क्लेशः -

(1) अविद्या - यह मेरा है, यह शरीर मेरा है, यह सम्पत्ति मरेी है, विनाशशील वस्तुओं के प्रति अपनत्व।

(2) अस्मिता - संसार की समस्त भोग्य वस्तुओं के प्रति अपनत्व। ये वस्तुएँ मुझसे नहीं छूटनी चाहिये।

(3) राग - रुप, रस, गंध, स्पर्श आदि के प्रति विशेष आकर्षण एवं आसक्ति।

(4) द्वेष - सुख प्रदान करने वाली वस्तु की प्राप्ति में बाधा।

(5)  अभिनिवेश - यही वस्तु मुझे सुख प्रदान करेगी। सुख पहुँचाने वाली वस्तु दूर न हो जाय। ऐसी वस्तु को व्यक्ति खोना नहीं चाहता।

शरीर के छः विकार - हाड़मांस का बना यह शरीर ही निम्न छः विकारों का निवास स्थान है।

(1) अस्तित्व का अभिमान - बच्चा माँ के गर्भ में दुःखी है। मुझे इस गर्भ से कब छुटकारा मिलेगा?

(2) अपनत्त्व - गर्भ से बाहर आने के बाद तीसरे दिन पिछले जन्म को भूल जाना, जिस माता ने जन्म दिया है उसके प्रति अस्तित्व व जन्म के छठे दिन से पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति अपनत्व भाव उत्पन्न होना।

(3) वृद्धत्व - उम्र बढ़ने के साथ ही अपने को बड़ा समझना, कार्यक्षमता विकसित होते ही अपने आपको कार्यकुशल समझना।

(4) प्रौढ़ - युवावस्था समाप्त होते ही अपने को बुद्धिमान समझना एवं स्वयं की क्षमता का अभिमान होना। अपने को क्षमतावान समझ कर कार्य सम्पादन करना।

(5) क्षीण - धीरे धीरे वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होते हुए चिन्ताओं से घिरे रहना, शारीरिक रोगों की पीड़ा, पराधीनता का भाव उत्पन्न होना और अन्ततः अपने आप को क्षीण समझना।

(6) चिन्तामग्न - बुढ़ापे में अपने भाग्य को कोसते रहना, जवानी को याद करना, मैंने ये किया, वो किया का अहंकार व्यक्त करना, अपने को सामर्थ्यहीन मान कर चिन्तामग्न होना और अन्ततः तड़प-तड़प कर मर जाना। कितना कष्टप्रद होता है यह विकार!

श्री हनुमान रुद्रावतार हैं, ज्ञान प्रदाता हैं। संसार में तरह-तरह के कष्टों से पीड़ित प्राणी के सभी कष्टों को हरने वाले भगवान शिव ही पवनसुत के रुप में इस संसार को यथार्थ ज्ञान देने के लिये अवतरित हुए हैं। बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान की कृपा होने पर ही क्लेश और विकारों से निवृति सम्भव है। हे वीर हनुमान! आप सर्वशक्तिमान हाते े हुए भी निरीह तथा निरभिमान हैं। मेरे क्लेश और विकारों को दूर कर मुझे निरभिमान लेकिन सर्वसमर्थ बनावें। भक्त प्रतिदिन यही प्रार्थना हनुमानजी से करता रहे। जीवन में ध्यान की अमित महिमा है। श्री हनुमानजी का ध्यान करने से इन पाँच महान क्लेशों का दमन सम्भव है।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर  जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।  हनुमानजी संस्कृत भाषा, चारों वेद व छः वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, तिरुक्त, छंद, ज्योतिष) के ज्ञाता हैं। ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य को भली-भाँति समझने वाले हैं।  ये ज्ञान के सागर हैं,

क्योंकि प्रभु श्रीराम द्वारा दिया हुआ वास्तविक ज्ञान इन्हें ही प्राप्त हुआ है। हनुमान जी ने ज्ञान, कर्म, धर्म एवं भक्ति की पूर्ण शिक्षा प्राप्त की और उसे जीवन में अपनाया।

इन सभी विद्याओं की प्रतिमूर्ति बन कर ''ज्ञानिनामग्रगण्यम'' कहलाने का सौभाग्य प्राप्त किया। बाल-लीला करते हुए जिस सूर्यदेव को इन्होंने अपने मुख में रख लिया था वही इनके गुरु बने। अपने गुरु श्रीसूर्यदेव के सानिध्य में रह कर ही ये सभी विद्याओं की प्रतिमूर्ति बने। सौम्यगुणी हनुमान राग, द्वेष और ईर्ष्या से रहित रह कर संसार के प्राणियों का उद्धार करते हैं। हनुमानजी रावण के तेज, विद्या और योग्यता की तारीफ करते हैं। रावण यदि अपने अहंकार, अभिमान का त्याग कर दे तो त्रिलोकी का शासन करने की योग्यता रखता है। इनका कहना है रावण       हमारा विरोधी है। यदि सुधर जावे तो उद्धार के लिये प्रभु से निवेदन करने में भी कोई आपत्ति नहीं है। विरोधी का उद्धार एवं उसका मोक्ष कोई सद्गुणी ही कर सकता है। हनुमानजी तो रावण के कटु वचनों को सुन कर व उसके क्रोध को देखकर भी धीर-गम्भीर बने रहते हैं। सौम्यगुणी हनुमान की कीर्ति की चर्चा तीनों लोकों में होती है।

भक्त इन अनुकरणीय गुणों को अपने जीवन में उतारने के लिये हनुमानजी की उपासना करे तो उसका उद्धार सुनिश्चित मानिये। हनुमानजी की उपासना करने से मनुष्य को आत्मज्ञान हो

जाता है, जिसे जीवन में अर्जित सबसे बड़ा लाभ माना जाता है। हनुमानजी ज्ञानी हैं, गुणों के सागर हैं, प्रभु के परम भक्त हैं इसलिये निरभिमान हैं।  जीवन में ज्ञान का अपना महत्त्व है। ज्ञानी का सभी सम्मान करते हैं। भक्ति, ज्ञान से भी अधिक महान है। ज्ञान में अभिमान होता है लेकिन भक्ति में केवल नम्रता होती है। कर्मफल की प्राप्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिये ज्ञान अति आवश्यक है। भक्ति निःस्वार्थ भाव से की जाने वाली सेवा है। इसीलिये जहाँ ज्ञान में विद्वता और क्षमता प्रदर्शित होती है वहीं भक्ति में सहिष्णुता एवं वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव परिलक्षित होता है। ज्ञान में तर्क-वितर्क समाहित है तो भक्ति में समर्पण। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है लेकिन भक्ति अकिंचन को ही प्राप्त होती है, अभिमानी को नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान और भक्ति के समन्वय में ही ईश्वर समाहित है।

राम दूत अतुलित बल धामा।

अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

जब श्री हनुमानजी लंका में सीता माता से मिले तो उन्होंने कहा, 'मैं रामदूत हूँ'। क्रोधोन्मत होकर अशोक-वाटिका को उजाड़ दिया, रावण पुत्र अक्षय कुमार को मार दिया। मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया तो ब्रह्मास्त्र की महिमा को ध्यान में रखा, मूर्छित हुए, नागपाश में बंधे। जब इन्हें

रावण के सामने उपस्थित किया गया तो इन्होंने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया -

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।। रा.च.मा. ५/२१

जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम चोरी से हर लाये हो मैं उन्हीं का दूत हूँ। हनुमानजी ने रावण को अपना परिचय पवनसुत, अंजनिपुत्र, केसरीनन्दन कह कर नहीं दिया। अभिमानरहित हनुमानजी ने रावण को अपना परिचय अपने आराध्य श्रीराम का वर्णन करते हुए ही दिया। क्योंकि ये मन, क्रम, वचन से श्रीहरि के दास हैं और दास्य भक्ति में दास का अलग से अस्तित्व नहीं रहता है। अतुलित बल के धाम हनुमान जी ने रावण को अपने स्वामी की श्रेष्ठता का आभास कराया और कहा -''दासो हं कौसलेन्द्रस्य''-मैं अयोध्यापति श्रीराम का दास हूँ। अशोकवाटिका उजाड़ना, अक्षय कुमार को मारना, विभीषण से प्रेम, लंका दहन इन्होंने अपने अतुलित बल का परिचय देने के लिये नहीं किये। वास्तव में यह सब इन्होंने अपने स्वामी प्रभु श्रीराम का परिचय देने के लिये किया था ताकि रावण को आने वाली विपत्ति का आभास हो जाय। लंकावासियों को यह ज्ञान हो जाना चाहिये कि प्रभु श्रीराम अपने भक्तों से बेहद प्यार करते हैं, साधक की रक्षा करते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं। हनुमानजी ने अपने चरित्र से, राम की महिमा से अवगत कराने का प्रयास किया, ताकि रावण भक्तिमाता (सीता) को परेशान नहीं करे। अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं,

रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।।

अतुलित बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कांतियुक्त शरीर वाले, दैत्यरुपी वन को ध्वंस करने के लिये अग्निरुप, ज्ञानियों में अग्रगण्य सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमानजी को मैं प्रणाम् करता हूँ। महाबीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी।।

संसार में जितने भी सामर्थ्यवान हैं उनसे भी अधिक सामर्थ्यवान हैं हनुमान। इनमें असम्भव कार्य को आसानी से पूर्ण करने की क्षमता है। इसलिये इन्हें ''महावीर'' कहते हैं। इनकी सामर्थ्य और महानता को लाँघने वाला इस संसार में कोई नहीं है। ज्ञान, तेज, बल, शक्ति, वीर्य और पराक्रम, इन छः ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हनुमानजी को विक्रम भी कहते हैं। बाल मारुति पर इन्द्र ने वज्र से प्रहार किया जिससे इनकी हनु (ठुड्डी) टेढ़ी हो गई। इन्द्र का वज्र प्रभावहीन हो गया। वज्र के समान शरीर वाले हनुमानजी को 'बजरंगी' भी कहते हैं। हनुमानजी जैसे योग्य सचिव के कारण ही सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य मिला, साक्षात ब्रह्म से मिलने का सौभाग्य मिला, भय से मुक्ति मिली। राजसुख मिलते ही सुग्रीव विषयों में लिप्त हो गये। सुग्रीव कृतघ्न हो गये, प्रभु श्रीराम को दिया गया वचन भूल गये। ऐसा विश्वासघात 'कुमति' के कारण ही हुआ। हनुमानजी ने सुग्रीव को श्रीराम के पौरुष, पराक्रम एवं लक्ष्मण के क्रोध से अवगत करा कर प्रभु को दिये गये वचन का स्मरण कराया। सुग्रीव को कर्तव्य-बोध हो गया। कुमति का हरण होते ही सुग्रीव सक्रिय हो गये।

क्रोधित लक्ष्मण जब सुग्रीव के पास पहुँचे तो हनुमानजी ने उन्हें अवगत कराया कि सभी दिशाओं में दूत भेजे जा चुके हैं। चारों ओर से वानर सेनाएँ आ रही हैं। यह समाचार सुन कर लक्ष्मण ने कहा, 'हम सबको शीघ्र ही प्रभु श्रीराम के पास जाना चाहिये।' सुग्रीव की रक्षा सुमति और वचन निर्वाह के कारण ही सम्भव हो सकी। ''कुमति निवार सुमति के संगी'' का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। हनुमानजी कुमति का निवारण कर सुमति का साथ देते हैं। हनुमानजी द्रोणाचल से संजीवनी बूटी लाये और लक्ष्मणजी के प्राण बचाये। संजीवनी बूटी

लाकर हनुमानजी ने भरतजी के पुत्र की भी प्राण-रक्षा की थी।

एक बार प्रभु श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ का घोड़ा जब देवपुर के पास पहुंचा तो वहाँ के राजा वीरमणि और उसके पुत्रों के साथ शत्रुघ्न की सेना का भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान शिव और उनके गण भी सहायता कर रहे थे। वीरमणि भगवान् शिव का परम भक्त था, इसलिये भगवान शिव स्वयं युद्ध कर रहे थे। युद्ध में भरतजी का पुत्र राजकुमार पुष्कल मारा गया और शत्रुघ्न मूर्छित हो गये। हनुमानजी

क्रोधित होकर भगवान् शिव से युद्ध करने लगे। उन्होंने शिवजी के रथ को चूर-चूर कर दिया। भगवान् शिव नन्दी पर बैठ कर युद्ध करने लगे तो हनुमानजी ने एक शालवृक्ष को उखाड़ा और उससे प्रहार किया। भगवान् शिव ने अपना त्रिशूल चलाया तो हनुमानजी ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और भगवान शिव को अपनी पूँछ में लपेट लिया। हनुमानजी का युद्ध कौशल एवं पराक्रम देखकर शिवजी प्रसन्न हो गये। भगवान शिव ने कहा, 'मैं प्रसन्न हूँ वरदान माँगो।' हनुमानजी ने कहा, 'प्रभु श्रीराम की असीम कृपा से मुझे किसी बात की कमी नहीं है।' मैं संजीवनी लेने द्रोणाचल जा रहा हूँ। मेरे वापस आने तक आपके गण हमारे मृत वीरों के शरीरों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते रहें।' भगवान शिव ने कहा, 'चिन्ता मत करो, तुम्हारे मृत वीरों के शरीर सुरक्षित रहेंगे।' वीर हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आये, राजकुमार पुष्कल व अन्य मृतवीरों को जीवनदान दिया, महाराज शत्रुघ्न की मूर्छा दूर की। प्रभु श्रीराम स्वयं युद्धस्थल पर आये।  भगवान् शिव ने राजा वीरमणि और उसके पुत्रों को प्रभु श्रीराम से मिलाया। भगवान शिव एवं हनुमानजी की कृपा से राजा वीरमणि भगवान श्रीराम के परम भक्त बन गये।

हनुमान ने बाली को क्यों नहीं मारा? बाली त्रिलोक विजयी था इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन ''महावीर, विक्रम, बजरंगी'' के आगे उसका बल तिनके के बराबर भी नहीं था। श्रीराम ने सोचा, हनुमान भयभीत सुग्रीव की सवे ा तो करते रहे लेकिन अतुलित बल के धाम होते हुए भी बाली को नहीं मार सके? अपनी इस शंका का समाधान करने के लिये उन्होंने ऋषि अगस्त्यजी से यही प्रश्न पूछा तो उन्होंने अवगत करायाकि हनुमानजी को बाल्यावस्था में ही भृगुवंशियों ने श्राप दे दिया था कि, तुम दीर्घकाल तक अपनी शक्तियों को भूल जाओगे। जब तुम्हें कोई तुम्हारी शक्तियों का स्मरण करायेगा तो समस्त शक्तियाँ पुनः प्राप्त हो जायेंगी। इस श्राप की जानकारी केवल जामवंतजी को ही थी। उस अवधि में सारी शक्तियाँ सुप्तावस्था में होने के कारण ही उन्होंने बाली को नहीं मारा। जब हनुमानजी को बाँध कर रावण के सामने ले जाया गया तो रावण उन्हें दयनीय समझ कर हँस रहा था, दुर्वचन कह रहा था, वानर सेना को रावण ने राक्षसों का भोजन समझा। उसके सचिवों ने कहा, 'जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं, नर वानर केहि लेखे माही,-आपने देवताओं और असुरों को जीत लिया फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं।' युद्ध में पुत्रों और भाइयों के मारे जाने पर यही रावण सोचता है, देवताओं और असुरों के बल को मैंने परख लिया था। बाली से युद्ध कर मैत्री कर ली थी, लेकिन वानरों को बहुत ही साधारण समझ कर उनकी परीक्षा कभी नहीं ली। परिणाम सबके सामने है। आज उसी महावीर, विक्रम, बजरंगी के बल और पराक्रम का परिणाम भुगत रहा हूँ। रावण ने हनुमान एवं अन्य वानरों को बहुत साधारण समझा। यह उसकी भयंकर भूल

थी। हनुमानजी में पूरी लंका को उखाड़ कर हाथ में उठा कर ले जाने की क्षमता थी। जरा सोचिये, ऐसे क्षमतावान को लंका का सर्वनाश करने में कितना समय लगता? प्रभु श्रीराम की मर्यादा में बँधे हुए हनुमानजी ने हमेशा सभी के यश और कीर्ति का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने सभी के यश और कीर्ति को ध्यान में रख कर ही युद्ध किया। श्रीराम-लक्ष्मण व अन्य वीरों के यश का क्षरण नहीं हो, यह सोच कर वे युद्ध भूमि में रावण के साथ जूझते रहे। कुम्भकरण के प्रहार से व्याकुल होने का प्रदर्शनभाव भी उन्होंने प्रभु श्रीराम की प्रभुता एवं कीर्ति का विस्तार करने के लिये ही किया था। युद्धभूमि में अपने बल और पराक्रम का प्रदर्शन वे राक्षसी सेना को आतंकित करने के लिये करते रहे। शिवजी और ब्रह्माजी के वरदानों से राक्षस रावण, महाराक्षस बन गया था। ऐसे दुष्ट अत्याचारी, अन्यायी महाराक्षस को मारने एवं मोक्ष प्रदान करने के लिये ही प्रभु को अवतार लेना पड़ा। हनुमानजी से जब रावण ने पूछा कि तुमने मेरे  प्रमोद वन को क्यों उजाड़ा? मेरे पुत्र और वीर योद्धाओं का संहार क्यों किया? हनुमानजी ने उसे आध्यात्मिक उपदेश देते हुए कहा था, 'तुम अपनी राक्षसी बुद्धि का त्याग कर दो और प्रभु श्रीराम का आश्रय लो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारे मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं रहेगी।' भगवान् श्रीराम ने रावण को मोक्ष प्रदान कर भव सागर में धर्म की स्थापना की, अन्याय, अत्याचारों से मुक्ति प्रदान की।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।

काँधे मूँज जनेऊ साजै।।

हनुमानजी के बाएँ हाथ में वज्र के समान गदा हमेशा विराजमान रहती है इसीलिये इन्हें ''वामहस्तगदायुक्तम'' भी कहते हैं।

संकर सुवन केसरीनंदन।

तेज प्रताप महा जग बंदन।।

रावण को मारने के लिये प्रभु श्रीराम की सहायतार्थ भगवान शिव ने अपने ग्यारहवे रुद्र पुत्र को जन्म लेने के लिये कहा। आप भगवान शिव के अवतार हैं, उत्कृष्ट तेज से परिपूर्ण हैं। केसरीजी को आनन्द देने वाले हनुमानजी को 'कपि केसरी' की उपाधि से विभूषित किया गया है।

बिद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर।।

विद्या, ज्ञान, शूरता, चरित्र, तपस्या एवं स्वामिभक्ति जैसे विशिष्ट गुणों के कारण ही हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी को बहुत प्रिय हैं। हनुमानजी के ये गुण नमन करने योग्य हैं। इन नमस्य गुणों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक व्यक्ति इनकी उपासना करे और इन विशेष गुणों को अपने जीवन में उतारने का भरसक प्रयास करता रहे।

हनुमानजी गुणी हैं, सर्वगुण संपन्न हैं, गुणों के भंडार हैं। गुणों का उपयोग कब, कहाँ और कैसे किया जाना है, इस बात को भलीभाँति जानते हैं, समझते हैं, इसलिये 'अतिचातुर' भी हैं। विद्यावान हैं, गुणवान हैं, चतुर हैं, लेकिन अभिमानरहित हैं। इन्होंने अपनी विद्या और गुणों का हमेशा सही और सात्त्विक उपयोग किया है। ''मैं ही'' श्रेष्ठ हूँ की भावना इनमें कभी नहीं आयी, ये अपने स्वामी के प्रत्येक कार्य को निष्ठापूर्वक एवं लगन से करते हैं, आलस्य और प्रमाद को अपने नजदीक नहीं आने देते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया।।

       भक्तशिरोमणि    हनुमानजी    का    निर्मल    मन    प्रभु    श्रीराम    का     अभिराम

धाम है। जब इन्होंने सीतामाता को अपना हृदय चीर कर दिखाया तो श्रीराम-लक्ष्मण और सीता इस अभिराम धाम में विराजमान थे। उनके हृदय में विषयों के लिये जगह ही नहीं थी।

श्रीहनुमानजी जैसा रामकथा का श्रोता और वक्ता इस संसार में दूसरा कोई नहीं है। रामकथा चाहे अभिमानी के यहाँ हो रही हो, दुष्ट के यहाँ हो रही हो या फिर किसी धर्मात्मा के यहाँ हो रही हो, हनुमान वहाँ अवश्य पहुंचते हैं।  क्योंकि ये रामकथा से कभी तृप्त ही नहीं होते। इस व्यसन से पीड़ित हनुमानजी को उसे बार-बार पढ़ना, सुनना और सुनाना अच्छा लगता है। प्रभु श्रीराम ने इन्हें वरदान दिया है कि जब तक इस संसार में रामकथा होतेी रहेगी तब तक तुम्हारा जीवन यथावत बना रहेगा, तुम्हारे शरीर में प्राण रहेगा।  चारों आरे तुम्हारा यशोगान होता रहेगा और तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। जब तक यह लोक अस्तित्व में रहेगा तब तक रामकथा का अस्तित्व भी यथावत बना रहेगा।

श्रीराम कथा में एक वृद्ध ब्राह्मण नित्य आते, बड़ी श्रद्धा व लगन से राम-कथा सुनते। राम-कथा पूर्ण होते ही प्रसाद बँटता, भक्तगण प्रसाद पाकर अपने घर को चले जाते। सभी भक्तों के चले जाने के बाद वृद्ध ब्राह्मण प्रस्थान किया करते थे। नित्य दर्शन के बाद तुलसीदासजी ने इन्हें पहचान लिया और इनके चरणों में गिर गये। उन्हें हनुमानजी का दिव्य एवं विराटस्वरुप देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  इसके बाद हनुमानजी की कृपा इन पर बराबर बनी रही। हनुमानजी की

कृपा से ही इन्होंने चित्रकूट में श्रीराम-लक्ष्मण के दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त किया।

ऐसा सौभाग्य आपको भी प्राप्त हो सकता है।

अपने हृदय में थोड़ी सी जगह हनुमानजी के लिये भी बनाइये, हमेशा उनका स्मरण करते रहिये। जिस दिन आपको हनुमान चालीसा और सुन्दरकाण्ड सुनने और पढ़ने का व्यसन लग जायगा समझ लो हनुमानजी गद्गद् होकर आपकी रक्षा करेंगे। आप अभिमान से मुक्त हो जायेंगे।

यदि आप चाहते हैं कि हनुमानजी इस धरा पर हमेशा विचरण करते रहें, भक्तों की रक्षा करते रहें, भक्तों के कष्टों का निवारण करते रहें तो रामचरित मानस का पाठ यानी राम कथा करते रहें। हनुमानजी राम कथा में उपस्थित रहते हैं।  राम कथा में जाओ, इसे श्रद्धा पूर्वक सुनो, प्रभु चरणों में प्रीति रखो, सत्संग करो। यदि आपका प्रभु श्रीराम से लगाव नहीं है, हृदय में उनके प्रति प्रीति नहीं हैं तो राम कथा में जाने से कोई फायदा नहीं। संत मोरारी बापू अक्सर कहा करते हैं, यदि ऐसा व्यक्ति राम कथा में जाता भी है तो उसे वहाँ नींद आ जाती है। राम कथा का लाभ प्राप्त करने के लिये हनुमानजी की तरह रामचरणानुरागी बनना पड़ता है, उनके चरण-कमलों की शरण में जाना पड़ता है।

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रुप धरि लंक जरावा।।

हनुमानजीको अपने शरीर को बहुत छोटा, आवश्यकतानुसार पर्वताकार एवं बहुत हल्का कर लेने की सिद्धियाँ प्राप्त हैं। योग विद्या द्वारा ये अपना स्वरुप परिवर्तित करने में सक्षम हैं। ये सूक्ष्मरुप धारण कर सीतामाता के सामने उपस्थित हुए तो इनके सूक्ष्म और सुकोमलरुप को देख कर सीतामाता के मन में शंका उत्पन्न हुई, कहीं यह रावण तो नहीं है?  'रामदूत मैं मातु जानकी' - लेकिन हनुमान के मुख से निकले 'माता' शब्द ने उनकी शंका का निवारण कर दिया। सीतामाता की दूसरी शंका, यह छोटा सा वानर राक्षसों का संहार कैसे करेगा?  हनुमान ने भयंकर रुप धारण कर उनकी शंका का निवारण कर अशोक वाटिका उजाड़ दी और लंका-दहन कर दिया। लंका नगरी जलाने वाले हनुमान को गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमानबाहुक में -''गहन-दहन-निरदहन-लंक'' कहा है।

भीम रुप धरि असुर संहारे।

श्रीरामचंद्र के काज सँवारे।।

सीतामाता अशोक वाटिका में शोकरुपी अग्नि से जल रही थीं। हनुमानजी ने सबसे पहले उनके शोक का निवारण किया। उन्हें राम कथा सुना कर भय मुक्त किया।  इसके बाद विकराल रुप धारण कर सीतामाता की शोकरुपी अग्नि से लंका को जला दिया।  भयंकर अग्नि की लपटें रावण को भयभीत कर रही थी लेकिन यही लपटें सीताजी को शीतलता प्रदान कर रही थीं। प्रभु श्रीराम पर जब किसी प्रकार की विपत्ति आती है तो हनुमानजी जब तक उसका निवारण नहीं कर लेते तब तक उन्हें चैन ही नहीं आता। ''राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम'', यह उनका स्वभाव गुण है। हनुमानजी सीतामाता की खोज कर वापस लौटे तो उनसे प्रभु श्रीराम ने पूछा, 'हनुमान! रावण द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े-बड़े किलों को तुमने कैसे जलाया?' विनम्रता, कृतज्ञता और भक्ति से परिपूर्ण हनुमान कहते हैं, 'यह सब आपके प्रताप से ही सम्भव हुआ।'  इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है। जिस पर आप प्रसन्न हों उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। यह सुन कर जब श्रीराम बहुत भावुक हो गये तो हनुमानजी ने उनसे निश्चल भक्ति का वरदान माँग लिया

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नाथ भगति अति सुखदायनी, देहु कृपा करि अनपायनी।।

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी, एवमस्तु तब कहउे भवानी।। रा.च.मा. ५/३४/१ -२

हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमानजी की

अत्यन्त सरल वाणी सुन कर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीराम ने ''एवमस्तु'' (ऐसा ही हो) कहा। सीतामाता ने हनुमान से पूछा, 'हनुमान तुमने अपनी पूँछ से लंका जला दी लेकिन तुम्हारी पूँछ नहीं जली, कैसी विचित्र है तुम्हारी पूँछ?' सेवाभावी हनुमानजी ने उत्तर दिया, 'आगे मरे े हृदय में प्रभु श्रीराम का निवास है पीछे पूँछ होने का रहस्य बहुत बड़ा है।  वानर को भला पूछता कौन, प्रभु श्रीराम के पीछे है पूछ (पूँछ) हमारी।' पूंछ शब्द से ही पूछ शब्द प्रतिष्ठा के भाव को ध्वनित करता है।

एक बार पाण्डु पुत्र महाबली भीम ने हनुमानजी से कहा,' मैं आपका वह स्वरुप ''भीमरुपधरि असुर संहारे'' देखना चाहता हूँ जो आपने राम-रावण युद्ध में दिखाया था।'  हनुमान ने कहा,' भीम तुम बहुत बलशाली हो, भीमकाय हो, बक जैसे भयंकर राक्षस का वध कर चुके हो किन्तु मरे ा वह स्वरुप तुम नहीं देख सकोगे, क्योंकि वह बहुत डरावना होगा।' हनुमानबाहुक में गोस्वामी तुलसीदासजी ने राक्षसों का मान-मर्दन करने वाले हनुमानजी के लिये विशेषता सूचक शब्द ''जातुधन- बलवान-मान-मद-दवन (बलवान राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले) को प्रयुक्त किया है।

भीम ने जिद करते हुए कहा, 'कुछ भी हो जाए मैं आपका वह स्वरुप अवश्य देखूँगा।' हनुमानजी ने बहुत तीव्र अट्टहास के साथ गर्जना की तो तीनों लोक कम्पायमान हो गये, धरती हिल गई, समुद्र में उथल-पुथल शुरु हो गई।  हनुमानजी धीरे-धीरे अपना विराटरुप धारण करने लगे, जिसे देख कर भीम थर-थर काँपने लगे और मूर्छित हो गये।  विनम्र करुणामय, निरभिमान हनुमान पुनः अपने सामान्य स्वरुप में आ गये। उन्होंने भीम के सिर पर हाथ रखा।  भीम की मूर्छा टूटी और उन्होंने हनुमानजी के चरणों में गिर कर क्षमा याचना की। हनुमान अपने भक्त को निर्भय बना देते हैं।  उन्होंने अभय का आशीर्वाद देकर अपने भाई भीम को गले से लगा लिया। भीम ने देखा, 'हनुमान, कनक भूधराकार शरीरा, समर भयंकर अतिबलबीरा' तो हैं लेकिन मधुर हैं, सरल हैं और पूर्णरुप से अपने स्वामी के प्रति समर्पित हैं।

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

सीता हरण, युद्धभूमि में वीरघातिनी शक्ति से लक्ष्मण की मूर्छा, सीता से विछोह और छोटे भाई की मरणासन्न अवस्था, प्रभु श्रीराम के जीवन के ये दो प्रमुख दुःख, जब वे फूट-फूट कर रोये। इन दोनों ही प्रतिकूल परिस्थितियों में हनुमानजी ने अपने स्वामी का साथ दिया। हनुमानजी ने सीतामाता की खोज की, द्रोणाचल पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की। प्रभु के सभी कार्यों को पूर्ण करते समय हमेशा सजग और सतर्क रहे।

प्रभु श्रीराम बार-बार हनुमानजी से एक ही बात कर रहे हैं कि हे पुत्र! मैंने मन में बहुत विचार करके देख लिया है, मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता। प्रभु ने ऐसा क्यों कहा? यह एक विचारणीय प्रश्न है। सेवाभावी हनुमान सेवा करते समय की जाने वाली उपेक्षाओं की परवाह नहीं करता। यदि उसके सेवाभाव की कोई प्रशंसा करे तो गद्गद् नहीं होता। प्रभु श्रीराम नहीं चाहते कि मेरे परमप्रिय सेवक हनुमान के जीवन में दुःख आये, जीवन में किसी तरह का संकट उत्पन्न हो। यदि इस सेवक के जीवन में दुःख आयेगा तो उऋण होने के लिये उन्हें उपकार करना पड़ेगा। इसलिये प्रभु श्रीराम हनुमानजी को जीवन में कभी भी दुःखी नहीं देखना चाहते हैं।

मृदे जीर्णतां यातु यत्त्वयोपकृतं कपे, नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम्।

'हे हनुमान! तुमने मुझ पर जो उपकार किया है उसे मैं अपने शरीर के साथ ले जाना चाहता हूँ, क्योंकि आपत्ति आने पर ही प्रत्युपकारों की पात्रता प्राप्त होती है। मैं यह कभी नहीं चाहूँगा कि तुम पर कभी कोई विपत्ति पड़े।' वाल्मीकिजी ने यह बात प्रभु श्रीराम के मुख से कहलायी है। लंका विजय के बाद प्रभु श्रीराम ने भरतजी से पूछा, 'हनुमान का ऋण कैसे चुकाया जाए।' भरतजी ने तत्कालीन राज्याधिकारी- 'श्रीचरणपादुका' से पूछ कर कहा, 'हे प्रभो! हनुमानजी आपके चरणों के दास हैं, चरण दबा कर आपकी सेवा करते हैं। अगले अवतार में यदि आप इनके चरण दबा कर सेवा करेंगे तो यह ऋण उतर सकता है।' अगले अवतार मं आप लक्ष्मण को बड़ा भाई बना कर उनकी सेवा करेंगे और हनुमानजी को मुरली बना कर उनके चरण दबायेंगे। आप ब्रह्मचारी हनुमानरुपी मुरली को अपने होठों पर सुला कर चरण दबायेंगे तभी राधाजी गोपिकाओं के साथ रास-मंडल में प्रवेश करेंगी। ब्रह्मचारी हनुमान की उपस्थिति में होने वाली रास-लीला लौकिक कामरोग से सर्वथा रहित, श्रीकृष्ण प्रेमरसमयी होगी। आपकी यह मुरली हनुमान की तरह निरभिमान होगी। आपके द्वारा चरण दबाने पर इसमें से जो मधुर

ध्वनि उत्पन्न होगी वह सभी ऋषि-महर्षि रुप धारिणी गोपिकाओं को आकर्षित करेगी।

}ापर युग में श्रीकृष्ण अपने होठों पर मुरली को सुला कर उसके चरण दबा रहे हैं और मुरली के रुप में ब्रह्मचारी हनुमान की साक्षी में रास-लीला कर रहे हैं।  इस मुरली की धुन ने

रास-लीला को साक्षात, मन्मथ-मंथन करने वाली सिद्ध किया है।

रघुपति किन्हीं बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

        हनुमानजी    ज्ञानी    एवं    अनन्त    गुणों    के    सागर    हैं,    इसलिये     इन्हें 

'ज्ञान गुण सागर' भी कहते हैं।

ज्ञान के प्रदाता भगवान शंकर हैं। हनुमान रुद्रावतार हैं और भगवान शिव की तरह ही यथार्थ ज्ञान के प्रदाता भी हैं। प्रभु श्रीराम कह रहे हैं, 'तुम ज्ञान और गुणों की दृष्टि से ''भरत सम'' हो।' तुम दोनों ही ज्ञान के समुद्र हो, तुम्हारी और भरत की जिह्वा पर सरस्वती का निवास है और वाणी में विवेक, धर्म एवं नीतिरुपी त्रिवेणी का संगम है। अतः तुम भी भरत के समान ही मेरे प्रिय भाई हो। मेरा परमभक्त यदि तुम्हारी उपासना नहीं करेगा तो उसे मैं (श्रीराम) कभी नहीं मिल सकता। मेरे भक्त पर जब तक हनुमान की कृपा नहीं होगी तब तक वह मेरी कृपा का पात्र नहीं बन सकता है। ज्ञान के बिना भगवान नहीं मिलता। भवसागर से मुक्ति पाने के लिये ज्ञान अतिआवश्यक है और

ज्ञानार्जन के लिये हनुमानजी की भक्ति ही सबसे सुगम उपाय है। महाकवि सूरदासजी ने अपने काव्य 'सूरसागर' में अपने मन के भाव को व्यक्त करते हुए लिखा है कि मेघनाद की वीरघातिनी शक्ति से लक्ष्मण मरणासन्न मूर्छित हो गये हैं। प्रभु श्रीराम फूट-फूट कर रो रहे हैं और बार-बार हनुमानजी की आरे देखते हैं। मन ही मन विचार कर रहे हैं कि यदि भरत को दुःखद समाचार की जानकारी हो जाए तो वह अपने धनुष के बल पर सारे संसार को जीत लेगा; इन राक्षसों की तो उसके सामने शक्ति ही क्या है ? भरत के पास किसे भेजूँ ? हनुमान ही सामर्थ्यवान हैं। महाकवि सूरदासजी ने अपने काव्य में इस विपत्ति का वर्णन कुछ इस तरह प्रकट किया है -

श्रीराम हनुमान से कह रहे हैं,

अहो पुनीत मीत केसरि-सुत, तुम हित बंधु हमारे। जिया रोम-रोम प्रति नाहीं, पौरूष गनौं तुम्हारे।। पद 591

हनुमान प्रभु श्रीराम से कहते हैं,

रघुपति मन संदेह न कीजै।

मो देखत लछिमन क्‍यों मरिहैं, मोकौं आज्ञा दीजै॥

कहो तौ सूरज उगन देउँ नहिं, दिसि-दिसि बाढ़ै ताम। कहो तौ गन समैत ग्रसि खाऊँ, जमपुर जाइ न राम॥

कहौ तौ कालहिं खंड-खंड करि, टूक-टूक करि काटौं। कहौ तौ मृत्‍युहिं मारि डारि कै, खोदि पतालहिं पाटौं॥

कहौ तौ चंद्रहिं लै अकास तैं, लछिमन मुखनि निचौरौं।

कहो तौ पैठि सुधा कैं सागर, जल समस्‍त मैं घोरौं॥

पद 592 हनुमानजी ने अपने बल का  वर्णन करते हुए प्रभु श्रीराम के शोक का हरण किया। हनुमान संजीवनी        बूटी    सहित   द्रोणाचल       पर्वत   को     लेकर अयोध्‍या के ऊपर से उड़ रहे थे तो भरतजी ने उन्‍हें बाण मार कर गिरा दिया। उन्‍होंने भरतजी को सीता-हरण एवं लक्ष्‍मण की मरणासन्‍न मूर्छा के बारे में सब कुछ बता दिया। उन्‍होंने दृढ़तापूर्वक प्रभु श्रीराम से जो कहा था वह करके दिखा दिया। द्रोणाचल से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्‍मणजी के प्राणों की रक्षा की। प्रभु श्रीराम पूर्णतः शोक मुक्‍त हो गये। हनुमान भी भरत के समान ही प्रभु

श्रीराम के परमप्रिय भाई हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। अवधपुरी में रघुकुल शिरोमणि दशरथ की तीन रानियाँ थीं लेकिन पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के 

लिये कामेष्टि यज्ञ कराया गया। अग्निदवे हाथ में चरु (हविष्यान खीर) लिये प्रकट हुए। राजा दशरथ ने खीर के उचित भाग बना कर तीनों रानियों को दे दिया। रानी कौसल्या और सुमित्रा ने प्रसन्न चित्त होकर खीर को तुरन्त ग्रहण कर लिया। रानी कैकयी अपने हिस्से में आयी खीर की मात्रा से संतुष्ट नहीं थी। खीर का दौना हाथ में लिये विचारमग्न थी। तभी एक चील ने उनकी खीर पर झपट्टा मारा और कुछ खीर मुख में रख कर उड़ गई। इस खीर की कुछ बूँदें अंजनि माता के मुख में जा गिरी। इस विवरण के अनुसार हनुमानजी की उत्पत्ति अग्निदेव द्वारा दी गई उस हविष्यान खीर से भी मानी जाती है जिससे भरतजी का जन्म हुआ था। अतः हनुमान भी भरत के समान ही प्रभु श्रीराम के परमप्रिय भाई हैं।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

हनुमान संजीवनी बूटी लाये, जिससे शुभलक्षणों के धाम, सारे जगत के आधार लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा हुई। प्रसन्न होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें छाती से लगा लिया। उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा, 'तुम भरत के समान ही मरे े परम प्रिय भाई हो। हजारों मुख तुम्हारा यशोगान कर रहे हैं', यह कहते हुए उन्हें पुनः गले लगा लिया।

हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ रामचरन अनुरागी।।

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार-बार प्रभु निज मुख गाई।।

रा.च.मा. ७/५०/८-९  शिवजी कहते हैं, 'हे गिरिजे! हनुमानजी के समान न कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजी के चरणों का प्रेमी है, जिनके प्रेम और सेवा की बड़ाई स्वयं प्रभु श्रीराम ने बार-बार अपने श्रीमुख से की है।'

श्रीराम कहते हैं, हनुमान ही मेरा सर्वस्व है। वहीं हनुमानजी कहते हैं, 'श्रीराम ही मेरे  लिये सब कुछ हैं'-

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः

स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-

र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने

श्रीराम रक्षा स्तोत्र के अनुसार - हनुमानजी कहते हैं, राम ही मेरे पिता हैं, स्वामी हैं और सखा

भी हैं। दयालु रामचन्द्र ही मेरे सर्वस्व हैं। उनके अतिरिक्त मैं किसी और को जानता ही नहीं। प्रभु श्रीराम, जिनका नाम सुनते ही कल्याण होता है, जो सम्पूर्ण लोकों को शांति प्रदान करते हैं, हनुमानजी उन्हीं के सेवक हैं, लेकिन उनमें सेवक होने का अभिमान नहीं है। क्योंकि उनका मन तो प्रभु प्रीति से भरा है। 'प्रीति सेवकाई', हनुमान प्रभु के प्रति विशेष प्रेम एवं सेवाभाव से समर्पित हैं।

भरत संसार का आध्यात्मिक भरण-पोषण करते हैं। शत्रुघ्न संसार को शक्तिवान् बना कर शत्रुओं का नाश करते हैं। लक्ष्मण इस संसार को धारण करते हैं, इस धारण शक्ति के कारण ही इन्हें एकाग्रता का स्वरुप भी माना गया है। श्रीराम की कृपा से कल्याण, शत्रुघ्न की कृपा से शक्ति एवं शत्रुनाश, भरत की कृपा से इन्द्रिय निग्रह अर्थात् ज्ञान की प्राप्ति, लक्ष्मण की कृपा से धारण

शक्ति अर्थात् एकाग्रता प्राप्त होती है। इसके बाद ही प्रभु श्रीराम मिलते हैं।

एकाग्रता के प्रतीक लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा कर हनुमानजी ने पूरे संसार पर कृपा की है। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

हनुमानजी सुग्रीव के स्वामिभक्त सचिव थे। यदि सुग्रीव के पास हनुमानजी जैसा दूरदर्शी, नीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ एवं मंत्र कुशल सचिव नहीं होता तो उन्हें किष्किंधा का राज्य नहीं मिल सकता था। हनुमानजी सुग्रीव के दूत बन कर श्रीराम - लक्ष्मण से मिले। इन्हीं की कृपा से इन्हें किष्किंधा का राज्य पुनः प्राप्त हुआ। दीनहीन, निराश्रय एवं भयभीत सुग्रीव का साथ देना सच्ची प्रीति का एक अच्छा उदाहरण है। वहीं बाली जैसे महाबली के दुश्मन का सचिव बन कर, सचिव धर्म का पालन करना परम साहसिकता का परिचायक है। हनुमानजी ने रामचन्द्रजी से सुग्रीव की मैत्री करा कर उन्हें भय मुक्त कर दिया। राजगद्दी पर बैठने के बाद सुग्रीव विषय-भोगों में लिप्त हो गये और प्रभु श्रीराम को दिया हुआ वचन भूल गये। वचन के प्रति उदासीन हो चुके सुग्रीव को हनुमानजी ने दिये गये वचन का स्मरण कराया।

क्या बाली की मृत्यु और राज्य की पुनः प्राप्ति ही सुग्रीव के लिये सबसे बड़ी उपलब्धि थी? हनुमानजी ने सुग्रीव को प्रभु श्रीराम से मिलाया। प्रभु श्रीराम के दर्शन करा कर साक्षात ब्रह्म से मिला दिया। उन्हें मृत्यु भय से मुक्त कर दिया। राज्य मिलते ही विषयों ने सुग्रीव का ज्ञान हर लिया और वे श्रीराम का कार्य भूल गये। उनकी कुमति को देख कर श्रीराम

क्रोधित हो गये। हनुमानजी ने सुग्रीव को प्रभु श्रीराम को दिये गये वचन का स्मरण करा कर उन पर पुनः बहुत बड़ा उपकार किया। कुमति का निवारण कर उन्हें प्रभु श्रीराम से विमुख होने से बचाया। हनुमानजी जैसे अनुभवी सचिव ने सुग्रीव को साक्षात ब्रह्म से मिला कर बहुत बड़ा उपकार

किया था। लेकिन उन्हें ब्रह्म से विमुख होने से बचाना मिलाने से भी बड़ा उपकार था।

तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना।।

हनुमानजी जब पहली बार विभीषण से मिले तो उन्होंने यह जान लिया था कि विभीषण का जन्म राक्षस कुल में हुआ है लेकिन वे धर्मस्वरुप हैं, बुद्धिमान हैं, नीतिकुशल हैं। विभीषण प्रभु श्रीराम के परम भक्त थे, लेकिन बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में भक्ति कर रहे थे। इसलिये उनकी भक्ति श्रद्धाविहीन थी। राक्षस कुल में जन्म व बड़े भाई द्वारा सीता माता का हरण किये जाने के कारण उनके मन में हमेशा यही शंका बनी रही कि मुझे प्रभु श्रीराम नहीं मिल सकते। उन्होंने हनुमानजी से पूछा, 'क्या राम मुझ पर कभी कृपा करेंगे?' हनुमानजी ने उनकी शंका का समाधान कुछ इस तरह किया -

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

प्रात लेइ जो नाम हमारा।। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

रा.च.मा. ५/७/७-८

भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ। चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ। प्रातःकाल जो हम लोगों का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले।

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।

रा.च.मा. ५/७ हनुमान विभीषण से कह रहे हैं, हे सखा! सुनिये मैं ऐसा अधम हूँ पर श्रीरामचन्द्रजी ने तो मुझ

पर भी कृपा की है। भगवान् के गुणों का स्मरण करके उनके दोनों नेत्रों में जल भर आया।

श्रीराम ने शबरी के बेर खाये उसकी जाति और कुल के बारे में कुछ नहीं पूछा। उन्होंने मेरे कुल के बारे में भी कुछ नहीं पूछा। जिसका हृदय पवित्र हो उसके हृदय में जाकर बैठ जाते हैं। प्रभु श्रीराम तो भक्त को उसकी भावना से ही पहचान लते े हैं। हनुमानजी ने अपने आप को बहुत तुच्छ बताया। उन्होंने अपने बारे में जो कुछ कहा उसे सुन

कर विभीषण को पूर्ण विश्वास हो गया कि श्रीराम वास्तव में शरणागतवत्सल हैं। हनुमानजी ने विभीषण को ऐसा क्या मंत्र दिया था? महापुरुषों की ऐसी वाणी जिसका मनन करने से रक्षा हो, नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच में परिवर्तित हो जावे, उसे कहते हैं मंत्र। हनुमानजी ने अपनी वाणी से (मंत्र से) विभीषण के नकारात्मक सोच को सकारात्मक सोच में परिवर्तित कर दिया। जब विभीषण प्रभु श्रीराम से मिलने आये तो वानरराज सुग्रीव ने कहा, 'हो सकता है यह हमारा भेद लेने आया हो। इसलिये इसे बांध कर रखा जाय।' लेकिन श्रीराम कहते हैं, 'मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना।' प्रभु के वचन सुन कर हनुमानजी हर्षित हुए और मन ही मन कहने लगे, भगवान् कैसे शरणागतवत्सल हैं। यहां एक बात विचार करने योग्य है कि श्रीराम का इस सम्बन्ध में उनसे सीधा संवाद नहीं हुआ। ये दोनों ही एक दूसरे के मन के भावों को पढ़ लेते हैं। हनुमानजी के मन के भावों को पढ़ कर श्रीराम ने सुग्रीव से कहा, 'विभीषण को आदर सहित ले आओ।' विभीषण प्रभु की शरण में आकर कह रहे हैं।

श्रवन सुजसु सुनि आयऊँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।। रा.च.मा. ५/४५ हे प्रभु! मैं कानों से आपका सुयश सुन कर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) का नाश करने वाले हैं। हे दुखियों के दुःख दूर करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्री रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। हनुमानजी जब विभीषण से मिले थे तो प्रभु श्रीराम के शील स्वभाव की यह सुयश कथा उन्होंने इन्हें सुनाई थी। श्रीराम शरणागतवत्सल हैं, इस मंत्र को मान कर ही ये प्रभु श्रीराम से मिले।

दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।। कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

रा.च.मा. ५/४६/२,४ विभीषण के दीन वचन प्रभु के मन को भाये और उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़ कर उनको हृदय से लगा लिया। 'हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल कहो, तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है।' मिलते ही 'लंकेश' सम्बोधन सुन कर सुग्रीव को आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा यदि रावण भी प्रभु श्रीराम की शरण में आ जाये तो क्या होगा? सुग्रीव की इस शंका का निवारण प्रभु श्रीराम ने कुछ इस तरह किया - यदि ऐसा होता है तो विभीषण 'लंकेश' होगा और रावण 'अयोध्या' का राजा बनेगा। विभीषण को मैं अपनी शरण में अवश्य रखूंगा। प्रभु श्रीराम ने शायद हनुमान के मन के भाव को पढ़ कर ही ऐसा निर्णय लिया होगा। प्रभु जानते हैं - 

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 

मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

रा.च.मा. ५/४४/५

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छलछिद्र नहीं सुहाते। 

जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई।  मोरें सनमुख आव कि सोई।। 

रा.च.मा. ५/४४/,४ यदि विभीषण निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता, तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?  जौं सभीत आवा सरनाईं। 

रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं।। 

रा.च.मा. ५/४४/२,

यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आया है तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूंगा। इससे यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि प्रभु श्रीराम दया, करुणा, प्रेम, सहानुभूति जैसे गुणों से परिपूर्ण हैं। उनके लिये सदाचार एवं सेवाधर्म प्रमुख है। मानवीय संवेदनाओं जैसे गुणों के कारण ही वे प्राणिमात्र पर विजय प्राप्त कर लेते है। विभीषण से मिलने पर यही तो बताया था हनुमानजी ने उन्हें, जिससे उनकी नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच में परिवर्तित हो गयी थी। अन्ततः उन्हें सद्गुणों की खान प्रभु श्रीराम से मिलने का सौभाग्य मिला और 'लंकेश्वर' बन गये। विभीषण श्रीराम से मिले तो उन्होंने विभीषण को 'लंकेश' कह कर उनकी शंका का निवारण किया और उन्हें भयमुक्त कर दिया। इसके तुरन्त बाद व राजतिलक करने से पहले उन्हें 'सखा' कह कर सम्बोधित किया।

खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

रा.च.मा. ५/४६/५ हे सखा! लंका में हमेशा दुष्टों के बीच रहते हुए अपने धर्म का निर्वाह किस प्रकार करते हो? प्रभु के मुख से 'सखा' शब्द सुन कर शरणागत मन निर्भय हो गया। जिसे भाई ने त्याग दिया

उसे प्रभु ने अपना मित्र बना लिया।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

रा.च.मा. ५/४९/९-१०

हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत में मरे ा दर्शन अमोघ है। ऐसा कह कर श्रीराम

ने उन्हें तिलक कर दिया। आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई।

श्रीराम ने यह स्पष्ट कर दिया कि तुम लंका के राजा हो और रावण की मृत्यु के बाद भी लंका के राजा बने रहोगे। तुम्हारे और मरे े बीच जो मैत्री सम्बन्ध स्थापित हुआ है, यथावत बना रहेगा।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

हनुमानजी की मां ने तपस्या करते समय संकल्प लिया था कि मेरा होने वाला पुत्र इस संसार

में असुरों का नाश करे व देवताओं की रक्षा करे।

भगवान विष्णु ने राहु को वरदान दिया था कि ग्रहण के दिन सूर्य और चन्द्रमा से जो अमृत

टपकेगा वह संसार के समस्त प्राणियों के लिये औषधि होगा। ग्रहण के दिन तुम भी उस अमृत का पान कर सकोगे। इस वरदान के कारण ग्रहण के दिन राहु अमृतरस का पान कर लेता था। पृथ्वीवासी इस अमृतरस से वंचित रह जाते थे।

बाल-लीला करते हुए जब हनुमानजी सूर्य की तरफ लपके तो राहु डर गया और सीधे ही इन्द्रदेव की शरण में चला गया। हनुमानजी ने राहु की समूची सेना का संहार कर दिया। कहते हैं, मंदार नाम के साठ हजार राक्षसों ने तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे यह वरदान भी प्राप्त कर लिया कि हम रोज सूर्य से युद्ध करें लेकिन उसके हाथों हमारी मृत्यु नहीं हो। राक्षस सूर्य से रोज युद्ध करते, समुद्र में गिरते व पुनः जीवित होकर दूसरे दिन फिर युद्ध करने लगते थे। इन राक्षसों से सूर्यदेव भी परेशान थे। बाल-लीला करते  हुए हनुमानजी ने इन सभी राक्षसों का अन्त कर अपनी माँ की तपस्या के संकल्प को पूरा करके दिखा दिया। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।

वानरों के दल सीतामाता की खोज के लिये प्रस्थान कर रहे हैं। प्रस्थान के समय सभी ने

श्रीराम के चरणों में सिर नवाया। 

पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।

परसा सीस सरोरुह पानी। कर मुद्रिका दीन्हि जन जानी।। रा.च.मा. कि ४/२३/९-१०

सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमानजी ने सिर नवाया। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अंगूठी उतार कर दी।

श्रीराम ने हनुमानजी से कहा, 'बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल तथा विरह

(प्रेम) कह कर तुम शीघ्र लौट आना।' हनुमानजी धन्य हो गये, उनके सिर पर प्रभु ने पाप, ताप और माया को मिटा देने वाले अपने

कर-कमल रख दिये। हनुमानजी ने प्रभु की मुद्रिका को अपने मुख में रख लिया। राम-नाम अंकित इस मुद्रिका के प्रभाव से उन्होंने सौ योजन का समुद्र लाँघा। रास्ते में उन्हें सत्वगुणी, रजोगुणी व तमोगुणी मायाओं का सामना करना पड़ा। लंका में इन्हें विभीषण मिले। प्रभु के प्रताप से दो संतों का सत्संग हुआ। विभीषण के सहयोग से हनुमानजी सीतामाता के निकट पहुँच गये। इसके बाद इन्होंने लंका-दहन किया। अग्नि की आंच से इनका बाल भी बांका नहीं हुआ। यह सब प्रभु के अभय हस्त व उनके द्वारा दी गई मुद्रिका के कारण ही सम्भव हुआ, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।। ताकिहै तमकि ताकी ओर को।

जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी किसोर को।।

जिसे सब प्रकार से केसरी-नन्दन हनुमानजी का भरोसा है, उसकी ओर भला क्रोध भरी दृष्टि

से कौन ताक सकता है?  

जन-रंजन अरिगन-गंजन मुख भंजन खल बरजारे को।

वेद पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमारे को।।

हनुमानजी के समान भक्तों को प्रसन्न करने वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला, दुष्टों का मुंह

तोड़ने वाला बड़ा बलवान संसार में और कौन है? इनका पुरुषार्थ वेदों और पुराणों में प्रकट है।

भगत-कामतरु नाम राम परिपूरन चंद चकारे को। तुलसी फल चारों करतल जस गावत गई बहारे को।।

पूर्ण कला-सम्पन्न चन्द्रमा जैसे श्रीराम चन्द्रजी के मुख को अनिमेष-दृष्टि से देखने वाले चकोर रुप हनुमानजी का नाम भक्तों के लिये कल्पवृक्ष के समान है। हे तुलसीदास! गई हुई वस्तु को फिर दिला देने वाले श्री हनुमानजी का जो गुण गाता है, अर्थ, धर्म, काम, मोक्षरुप चारों फल सदा उसकी हथेली पर धरे रहते हैं। इस भवसागर में लोगों के सभी असम्भव कार्य इनकी अनुकूलता, दया एवं कृपा दृष्टि से पूर्ण हो जाते हैं। संकट से मुक्ति, भूत प्रेतादि से मुक्ति, बाधा-विपत्ति निवारण, रोगों से मुक्ति एवं पराक्रम की

उपलब्धि के लिये हनुमद्-गायत्री 

˙Tनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्।।

का जप करना चाहिये। राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

साकतेधाम के दक्षिण द्वार पर सांतानिक नाम का दिव्य वन प्रभु श्रीराम को परम प्रिय है। इसी दक्षिण द्वार पर प्रभु के परमप्रिय श्रीहनुमान सदैव विराजमान रहते हैं। हनुमानजी की उपासना किये बिना प्रभु श्रीराम की उपासना का फल प्राप्त नहीं होता है। प्रभु श्रीराम कहते हैं, हनुमान से विमुख रहने वाला मेरा परम भक्त भी मेरी अनुकम्पा प्राप्त नहीं कर सकता है।  भक्ति माता सीता व

हनुमानजी की कृपा के बिना प्रभु श्रीराम की ड्योढ़ी में प्रवेश पाना टेढ़ी खीर है।

रामद्वारे में प्रवेश से पहले हनुमानजी की कृपा प्राप्त करनी पड़ती है। रामद्वारे में प्रवेश के लिये भक्तिमाता जानकी की उपासना भी उतनी ही आवश्यक है जितनी हनुमानजी की उपासना। शुद्ध

अन्तःकरण से इन्हें याद करने पर प्रभु श्रीराम स्वतः ही याद आ जाते हैं।

सब सुख लहै तुम्हरी सरना।

तुम रच्छक काहू को डरना।।

जिसके रक्षक स्वयं हनुमानजी हों वह सदा अभय रहता है। आपकी शरण में सब सुख ही सुख है। यहां महर्षि वेदव्यास द्वारा पृथापुत्र युधिष्ठिर को बतायी गयी हनुमानजी की व्रत कथा का विवरण प्रस्तुत है -

श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से श्री हनुमानजी का व्रत करने के लिये कहा। द्रौपदी ने व्रत प्रारम्भ किया व इस व्रत से सम्बन्धित डोरे को गले में बांध लिया। अर्जुन ने डोरे को देख कर द्रौपदी से पूछा, 'यह डोरा गले में क्यों बांध रखा है?' द्रौपदी ने कहा, 'मैं श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार हनुमानजी का व्रत कर रही हूँ। यह डारे ा उसी व्रत से सम्बन्धित है।' अर्जुन ने कहा, 'रामावतार का वह वानर जो हमेशा हमारे रथ की ध्वजा पर लटका रहता है, तुम्हारा क्या भला करेगा? तुम्हें व्रत करने की सलाह देने वाला कृष्ण भी कम कपटी नहीं है। मैं भी बहुत वीर हूँ, मेरी पूजा किया करो।' यह सब अर्जुन नहीं, अर्जुन का अहंकार बोल रहा था। उसने पूजा की सामग्री और उस डारे े को दूर फेंक दिया। द्रौपदी ने उस डोरे को उठा कर सुरक्षित रख दिया। श्रीकृष्ण ने कहा, 'हे युधिष्ठिर! उस डोरे का त्याग ही तुम्हारी विपत्ति का प्रमुख कारण है। उस डोरे में तेरह गांठें थी इसलिये तुम्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। यदि तुमने उस डोरे  का अपमान न किया होता तो तुम्हारे ये तेरह वर्ष सुखपूर्वक ही व्यतीत होते।' इतना सुनते ही अर्जुन का अभिमान चूर-चूर हो गया, उन्हें बड़ी आत्मग्लानि हुई। अर्जुन ने कृष्ण के चरणों में गिर कर कहा, 'हे प्रभो! हमारी रक्षा करो।' इस व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि विधान के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने भी किया था। श्रीकृष्ण ने हनुमानजी से निवेदन किया, आप अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान रह कर पाण्डवों की रक्षा करें। हनुमानबाहुक में गोस्वामी तुलसीदासजी ने अर्जुन के रथ की ध्वजापर विराजमान हनुमानजी को ''भारत में पारथ के रथकेतु कपिराज'' कहकर सम्बोधित किया है। अर्जुन ने हनुमानजी से क्षमा

याचना की।

युधिष्ठिर ने द्रौपदी के साथ मिल कर इस व्रत को किया और उन्हें उनका राज्य पुनः प्राप्त हो गया। जब मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में तेरह घटीयुक्त त्रयोदशी एवं अभिजित नक्षत्र हो तब पीले डोरे में तेरह गाँठ लगा कर उसे कलश में रखें। '¬ नमो भगवते वायुनन्दनाय' से हनुमानजी का आवाहन करें। पीले चन्दन, पीले पुष्प और पूजन सामग्री से पूजन करें। गेहूँ के आटे के तेरह मालपुआ, ताम्बूल ब्राह्मण को देकर भोजन करावें। इस व्रत को तेरह वर्ष पूर्ण होने तक नियमपूर्वक करें व तेरह वर्ष बाद विधिवत उद्यापन करें। हनुमानजी की कृपा से भक्त को लौकिक एवं पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है। महाभारत के युद्ध में पाण्डव विजयी हुए। युद्ध समाप्त होते ही 'रथकेतु कपिराज' रथ छोड़ कर चले गये। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को रथ से उतार लिया। जैसे ही अर्जुन रथ से उतरे रथ में आग लग गई। तब श्रीकृष्ण ने कहा, 'हे अर्जुन! तुम्हारे रथ की रक्षा हनुमानजी कर रहे थे। यदि हनुमानजी नहीं होते तो भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं के अस्त्रों से तुम भी भस्म हो चुके होते। हनुमानजी ने तुम्हारी रक्षा की और तुम्हें इच्छित फल प्राप्त हुआ है।'

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक तें काँपै।।

ऐसी गर्जना जिसे सुन कर तीनों लोकों के राक्षस एवं दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति कांपने लगते हैं। समुद्र लाँघने से पहले सिंहनाद, घारे गर्जना, अशोक वाटिका में राक्षस योद्धाओं को देख कर गर्जना, लंका से वापस लौटते समय की गई भयंकर गर्जना से राक्षस स्त्रियों के गर्भ गिर गये और रावण अत्यन्त भयभीत हो गया। भयभीत लंकावासियों के कानों में यह गर्जना हमेशा ही गूँजती रहती थी। इस प्रसंग में महाभारत की एक घटना याद आती है - जब अर्जुन इन्द्रलोक चले गये तो शेष पाण्डव बदरिकाश्रम की यात्रा पर निकल गये। यात्रा के समय एक दिव्य सुगंधयुक्त सहस्त्रदल कमल द्रौपदी के सामने गिरा। द्रौपदी कमल को देख कर बहुत खुश हुई। उसने भीम से कहा, 'यदि तुम मुझसे विशेष प्रेम करते हो तो मेरे  लिये ऐसे  ढ़ेरसारे कमल लेकर आओ।' जिस दिव्य सरोवर में ये कमल खिलते हैं वहां जाने वाला शापग्रस्त हो जाता है। हनुमानजी अपने भाई की रक्षा करना चाहते थे। भीम कमल के फूल लेने चले गये तो हनुमानजी विशाल शरीर धारण कर कदलीवन के मार्ग में सो गये ताकि कदलीवन के सरोवर में जाने पर कोई उन्हें शाप न दे। भीम ने रास्ता देने के लिये कहा तो हनुमानजी बोले, 'बीमार हूँ पूँछ पकड़ कर रास्ते से हटा दो।' भीम ने पूँछ पकड़ कर हटाने की कोशिश की लेकिन वे तिल भर भी नहीं हिले। हनुमानजी ने अपना शरीर छोटा कर लिया। भीम की सरोवर से पुष्प लाने की उत्कट इच्छा को देखकर उन्होंने वर मांगने के लिये कहा। इस पर भीम ने सिर्फ इतना ही कहा कि आप मुझ पर प्रसन्न रहिये। प्रसन्न होकर हनुमान ने वायुपुत्र भीम को अपनी स्वयं की इच्छा से वरदान दिया कि जब तुम शस्त्रों के आघात से व्याकुल शत्रु की सेना में घुस कर सिंहनाद करोगे उस समय मैं उसमें अपनी किलकारी मिला कर तुम्हारे सिंहनाद में अपार वृद्धि कर दूँगा जो शत्रुओं के प्राण हर लेगी। घबराये हुए शत्रुओं का संहार तुम्हारे लिये आसान हो जायगा। युद्ध के समय मैं अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठ कर तुम्हारी सहायता करुंगा। यह वरदान देकर हनुमान ने भीम को दिव्य सरोवर का रास्ता बता दिया और अंतर्धान हो गये।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

भयंकर से भयंकर तंत्र मंत्र यंत्र हनुमानजी का नाम लेने से प्रभावहीन हो जाते हैं। इनका नाम स्मरण करने मात्र से ही भूत, पिशाच, दुष्ट आत्माएँ व दुष्ट स्वभाव के मनुष्य पास आने की हिम्मत ही नहीं करते, दूर भाग जाते हैं। क्योंकि प्रभु श्रीराम की तरह ही ये भी शरणागतवत्सल हैं। शरणागत के भय को हर लेना इनका स्वभाव है।

एक बार पाण्डवों ने अश्वमेध यज्ञ किया और अश्व की रक्षा का दायित्व अर्जुन को सौंप दिया। यज्ञ का अश्व जब एक नगर के पास पहुँचा तो राक्षसों ने अर्जुन से कहा, 'हमसे युद्ध करो।' चारों ओर से पत्थरों की वर्षा, भयंकर आंधी तूफान, चारों तरफ धूल के गुबार के कारण आगे जाने का रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था। चारों तरफ देखा तो शत्रु भी नजर नहीं आ रहे थे। हमसे युद्ध करो कहने वाले शत्रु नजर नहीं आये तो अर्जुन बेहद परेशान हो गये। उन्हें इस संकट की घड़ी में महावीर, हनुमान याद आ गये। भूत पिसाच निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावैं का उच्चारण प्रारम्भ कर इस पिशाच माया से मुक्ति प्रदान करने को कहा। महावीर का नाम-स्मरण करने से पिशाची माया तुरन्त समाप्त हो गयी और सब कुछ सामान्य हो गया। अर्जुन के अश्व की रक्षा कर

धर्म की रक्षा के लिये वीर हनुमानजी ने अपना सक्रिय सहयोग प्रदान किया।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमान बीरा।।

हनुमानजी के नाम का निरन्तर जप सर्व रोगनाशक, सर्व पीड़ानाशक औषधि है। समस्त

व्याधियों से मुक्ति पाने का सुगम साधन है। रात्रि में सोते समय, प्रातःकाल उठते समय, किसी भी कार्य को प्रारम्भ करते समय, यात्रा पर प्रस्थान करते समय जो भक्त सच्चे मन से हनुमानजी को याद करता है वह पूर्णतः कष्ट रहित एवं भयमुक्त हो जाता है।  हनुमानजी भक्त के धार्मिक, दैविक एवं दैहिक कष्टों का सर्वानुकूल समाधान कर देते हैं। इस विशेषता के कारण ही इन्हें 'संकटमोचन' भी कहते हैं । हनुमानTनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः।

रामेष्टः फाल्गुनसखः पिXUÊ{ाोऽमितविक्रमः।। उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।

लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।

आनन्द रामायण २/१३/८-९

इनके इन बारह नामों का ध्यान करते समय मन राग-द्वेष रहित हो, मन में वैराग्यभाव हो। मन को पूरी तरह अपने वश में रखें। इसमें आपका शरीर भी पूर्ण सहयोग करे, तभी तन-मन से उपासना सम्भव हो सकती है। इसके बाद आप वाचिक (जीभ द्वारा), उपांसु (कंठ द्वारा) व मानसिक (मन से हनुमान स्मरण) उपासना करेंगे तो वह निश्चितरुप से फलदायी होगी। सब प्रकार की पीड़ाओं और सांसारिक कष्टां से मुक्ति पाने के लिये मन, वचन और कर्म से हनुमान जी का ध्यान करने से ही भगवान श्रीराम के चरण-कमलों की कृपा एवं आश्रय प्राप्त होता है। काशीरुपी आनन्द-वन में तुलसीदासजी चलता-फिरता तुलसी का पौधा है तो भैरवजी काशी के नगर-कोतवाल (नगर-रक्षक) हैं। एक बार नाराज भैरवजी ने गोस्वामी तुलसीदासजी की बांह में असहनीय पीड़ा कर दी। चिकित्सा करायी, तंत्र, मंत्र, यंत्र का सहारा लिया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ, पीड़ा में निरन्तर वृद्धि होती रही। जब पीड़ा असह्य हो गयी तो हनुमानजी याद आये। हे हनुमान! आइये, मेरे माथे पर अपनी लम्बी पूंछ घुमा कर मुझे इस असह्य पीड़ा से मुक्त कीजिये। इस पीड़ा के कारण मैं प्रभु श्रीराम का स्मरण भी नहीं कर पा रहा हूँ। भक्त की करुण पुकार सुन कर हनुमान आये। उन्होंने तुलसी का हाथ पकड़ा तो वे पीड़ा के कारण रो पड़े।

यह पीड़ा भैरव की देन है सुन कर, हनुमानजी को गुस्सा आ गया। इस बात की जानकारी होते ही भैरव, भगवान शिव के पास पहुँच गये। कुछ दरे बाद हनुमान भी वहां पहुँच गये। उन्होंने भगवान शिव से पूछा, 'भैरव ने तुलसीदास को पीड़ा क्यों दी'? शिवजी ने कहा, 'गोस्वामी तुलसीदासजी ने देवताओं की स्तुति की, भूतप्रेतों की स्तुति की लेकिन काशी के कोतवाल को भूल गये!' हनुमान समझ गये। भैरव का क्रोध एवं नाराजगी सकारण है, अकारण नहीं। हनुमानजी ने कहा, 'गोस्वामीजी आप नगर रक्षक भैरवजी की भी स्तुति करें।' भैरवजी की स्तुति करते ही गोस्वामीजी की पीड़ा दूर हो गई। हनुमानजी निश्चित रुप से 'हरैं सब पीरा' हैं, सभी तरह के कष्टों

एवं पीड़ाओं का हरण करते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी बेहद परेशान हैं। सारे शरीर में फोड़े-फुन्सियां, वातरोग के कारण बाहुओं में भयंकर पीड़ा। पीड़ा से छुटकारा पाने के लिये चिकित्सा करायी। तंत्र, मंत्र, यंत्र टोटके आदि का सहारा लिया लेकिन फायदा होने के वजाय पीड़ा दिन ब दिन बढ़ती रही। पीड़ा असह्य होते ही हनुमान याद आये। सब कुछ छोड़ कर गोस्वामीजी ने उनकी वंदना प्रारम्भ कर दी। कुछ ही दिनों में उनकी सब व्याधियाँ दूर हो गयीं। भयंकर बाहु पीड़ा, हनुमानजी की नियमित, निरन्तर

वंदना के कारण पीड़ा निवारण ने उन्हें ४४ पद्यों का 'हनुमानबाहुक' लिखने के लिये प्रेरित किया। सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा।।

हनुमानजी ने संसार के स्वामी प्रभु श्रीराम के सभी कठिन से कठिन कार्यों को अभिमान रहित

होकर सम्पन्न किया है। को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रुप फिरहु बन बीरा।।

कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेते बिचरहु बन स्वामी।।

मृदुल मनोहर सुन्दर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।

४/१/७-८-९

कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए।।

४/२/१

श्रीराम-लक्ष्मण वन में फिर रहे हैं। कोमल चरणों वाले कठोर भूमि पर वन में विचर रहे हैं। कोमल अंग वन के दुःसह धूप और वायु को सह रहे हैं। पिता का वचन मान कर वन आये हैं।

भैया राम और लक्ष्मण वन में भटक कर दुःख सहन कर रहे हैं। इनके कोमल चरणों को याद कर भरतजी भी बहुत दुःखी हैं। उन्हें इनका कोमल चरणों से वन में भटकना बहुत खटक रहा है। हनुमान अपने प्रभु को पहचान गये हैं। भगवान के चरण वन-वन भटक रहे हैं। प्रत्यक्ष में यह सब देख कर वे बहुत दुःखी हैं। सोच रहे हैं, सेवक के होते हुए भी प्रभु को असह्य दुःख सहन करना पड़ रहा है। अब यहां सेवाभाव का उच्च आदर्श देखिये, ''लिये दुऔजन पीठि चढ़ाई'', हनुमानजी ने दोनों को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया और सुग्रीव के पास ले गये। इस मधुर मिलन के बाद श्रीराम-लक्ष्मण को वन-वन नहीं भटकना पड़ा। हनुमानजी इन्हें अपनी पीठ पर बैठा कर ही लंका लेकर गये। अपने स्वामी के प्रति प्रगाढ़ एवं गूढ़ प्रेम और सेवकभाव का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है। हनुमानजी ने समुद्र को लाँघ कर भक्ति माता (सीताजी) की खोज की और लंका पहुँच कर सीता माता के शोक का नाश किया। ''सिंधु तरन, सिय-सोच-हरन'' समुद्र लाँघ कर जानकीजी के शोक को हरने वाले हैं हनुमान। लंका में अशोक वाटिका को उजाड़ दिया, और रावण पुत्र अक्षय कुमार को मार दिया।

''गहन-दहन-निरदहन-लंक निःसंक, बंक भुव, जातुधान- बलवान-मान-मद-दवन पवनसुत''-लंकारुपी गम्भीर वन को, जो जलाने योग्य नहीं था उसे जिन्होंने निःशंक जलाया और जो टेढ़ी भौंहवाले तथा बलवान राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले हैं, उन्हीं का नाम है हनुमान। लंका जली लेकिन अशोक वाटिका में जहां सीतामाता को रखा गया था वह स्थान एवं विभीषण का घर सुरक्षित रहा। हनुमानजी ने रावण के दर्प को धूल में मिला दिया।

युद्ध भूमि में मेघनाद की वीरघातिनी शक्ति के प्रभाव से लक्ष्मण मूर्छित एवं मरणासन्न हो गये। मेघनाद लक्ष्मण को लंका ले जाना चाहता था। वह उनके पास गया और उन्हें उठाने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा। मेघनाद और मेघनाद के समान अगणित योद्धा जगत के आधार शेषजी (लक्ष्मण) को उठा नहीं सके और लजा कर चले गये। जिन्ह शेषजी को मेघनाद और मेघनाद के समान अगणित योद्धा जमीन से नहीं उठा सके उन्हीं शेषजी को हनुमान अकेले ही युद्धभूमि से उठाकर अपने शिविर में ले आये। जामवंतजी के बताने पर हनुमानजी लंका के राजवैद्य सुषेण के घर पहुँचे और उन्हें उनके घर सहित युद्धस्थल पर लेकर आये। वैद्यराज की सलाह मान कर संजीवनी बूटी लेने द्रोणाचल गये। संजीवनी बूटी को पहचान नहीं पाये तो पर्वत को ही उठा कर ले आये। वैद्यराज ने उसमें से संजीवनी बूटी निकाल कर मूर्छित लक्ष्मण को स्वस्थ कर दिया। साथ ही सारी वानर सेना को भी जीवित कर दिया। राम-रावण युद्ध के समय रावण ने हनुमान की पँूछ पकड़ ली तो वे प्रभु श्रीराम को अपने हृदय में धारण कर आकाश में उड़ गये और लंका का प्रतापी राजा इनकी पूँछ को पकड़ कर आकाश में लटकता रहा। अपने मुष्ठि प्रहार से रावण को मूर्छित कर आपने एक बार फिर रावण के दर्प को धूल में मिला दिया। संसार में विपत्ति के समय सब प्राणी राम-नाम का स्मरण करते हैं लेकिन जब अहिरावण ने देवी के सामने राम और लक्ष्मण की बलि चढ़ाने के लिये उन्हें बंधक बना लिया तो प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, 'आओ, हम दोनों इस बंधन से मुक्ति पाने के लिये हनुमानजी का स्मरण करें।' कर्तव्यनिष्ठ एवं अपने स्वामी के प्रति अनन्य प्रेम रखने वाले हनुमानजी तुरन्त पाताल लोक चले गये। अहिरावण शिव भक्त था। भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने अहिरावण को वरदान दिया कि युद्ध करते समय भंवरे तुम पर अमृत की वर्षा करते रहेंगे। जैसे ही तुम्हारे शरीर से रक्त की एक बूंद जमीन पर पड़ेगी, अमृतवर्षा के कारण उससे राक्षस पैदा होते रहेंगे। श्रीराम, अहिरावण से युद्ध करते रहे और उसके शरीर के रक्त से सैकड़ों राक्षस पैदा होते रहे। यह सब देख कर हनुमानजी तुरन्त देवकन्या चंद्रलेखा के पास गये और उसे अपना परिचय दिया। चंद्रलेखा ने कहा,' यदि श्रीराम मेरे पति बनना स्वीकार करें तो मैं अहिरावण की मृत्यु का उपाय बात दूँगी। 'हनुमानजी ने समय की नाजुकता को देखते हुए बुद्धि-विवेक का परिचय दिया और कहा, 'मैं तुम्हारा प्रस्ताव प्रभु श्रीराम तक पहुँचा दूँगा।'चंद्रलेखा ने उन्हें बताया कि पाताल में एक अमृत कुण्ड है जहाँ से ये भँवरे अमृत लेकर आते हैं। उन्होंने अग्निरुप धारण कर अधिकतम भंवरों को समाप्त कर दिया और अमृत को स्वयं पी लिया। अहिरावण और उसकी सेना का संहार व विजयश्री प्राप्त करने के बाद हनुमानजी ने चित्रलेखा का प्रस्ताव श्रीराम के सामने रखा तो उन्होंने चित्रलेखा को वचन दिया कि द्वापरयुग में कृष्णावतार के समय जामवंतजी के यहाँ तुम्हारा जन्म होगा और तुम्हारा नाम जामवंती होगा। तब मैं तुम्हारा वरण करुँगा और तुम मरे ी रानी बनोगी। अहिरावण का बध करने के बाद हनुमानजी श्रीराम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठा कर सुरक्षित वापस ले आये। हनुमानजी कहते हैं, अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के प्रत्येक कार्य को सुचारु

रुप से पूर्ण करना ही मेरा लक्ष्य है। यही मरे ा दृढ़ संकल्प है। हनुमानजी प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये पाँच सौ नदियों एवं चारों समुद्रों का जल लेकर

आये। हनुमानजी की बुद्धि, विवेक, ज्ञान और अनुभव का लाभ प्रभु श्रीराम को सदैव मिलता रहा,

इसके उपरान्त भी वे सदैव निरभिमान बने रहे व अपने को शाखामृग ही बताते रहे।

'राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहां विश्राम'-प्रभु श्रीरामजी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहां!

हनुमानजी प्रभु श्रीराम की डयोढ़ी पर बैठे हमेशा यही इंतजार करते रहते हैं कि प्रभु आवाज दें, काम बताएँ और मैं उसे तुरन्त पूरा कर दूं। इनके इस व्यवहार से सभी परेशान रहते हैं और हमेशा यही सोचते रहते हैं कि हमें तो प्रभु की सेवा करने का मौका ही नहीं मिलता।

एक बार प्रभु की समस्त सेवाओं के दायित्व को परिकरों ने आपस में बाँट लिया और हनुमानजी को प्रभु की सेवा करने से पूरी तरह वंचित कर दिया। वे बहुत दुःखी हो गये। हताश, निराश हनुमानजी के मन में विचार आया कि परिकरों ने आपस में काम तो बांट लिये हैं लेकिन प्रभु को उबासी आने पर चुटकी बजाने का काम किसी ने नहीं लिया है। यह सेवा मैं करुँगा। दिन भर हनुमानजी श्रीराम के मुँह को निहारते रहे। जैसे ही उन्हें उबासी आती, चुटकी बजा देते। रात हो गयी तो श्रीराम शयनागार में चले गये और शयन कक्ष के द्वार बंद हो गये। प्रभु के मुख को अनिमेष-दृष्टि से देखने वाले हनुमानजी परेशान हो गये। एक काम मिला था उसमें भी व्यवधान उत्पन्न हो गया। प्रभु का मुख देखे बिना चुटकी कैसे बजेगी? यह सोच कर वे बहुत बेचैन हो गये। प्रभु को उबासी अवश्य आयेगी, यह सोच कर परकोटे पर बैठ गये और सोचने लगे कि यदि मैं निरन्तर चुटकी बजाता रहूँगा तो क्रम यथावत बना रहेगा। समस्या समाधान के इस सोच को कार्यरुप देने के लिये वे कंगूरे पर प्रभु की ओर मुख करके बैठ गये और राम-नाम का उच्चारण करते हुए लगातार चुटकी बजाते रहे। परिणामस्वरुप चुटकी की गति के अनुसार ही प्रभु की उबासी भी बढ़ने लगी। लगातार उबासी की अजीबसी आवाज सुन कर सीताजी उठ गईं और प्रभु की दशा देख कर बेचैन हो गयीं। प्रभु श्रीराम रुग्ण हो गये हैं 'यह बात धीरे-धीरे सबको मालूम हो गयी। चिकित्सक बुलाये गये लेकिन उपचार सफल नहीं हुआ। सभी परेशान हैं। सोच रहे हैं अब क्या किया जाए? तभी गुरु वसिष्ठजी आ गये और कुछ देर ध्यान मुद्रा में बैठे रहे। चेहरे पर मधुर मुस्कान लिये चारों ओर नजर दौड़ायी और उपस्थित जनों से पूछा, 'हनुमान कहां है?' सभी हनुमानजी को खोजने लगे। तभी लक्ष्मणजी ने देखा, हनुमानजी परकोटे पर बैठे राम-नाम स्मरण करते हुए लगातार चुटकी बजा रहे हैं। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है। लक्ष्मणजी ने आवाज दी, 'हनुमानजी! आपको प्रभु श्रीराम याद कर रहे हैं।' वे तुरन्त परकोटे से नीचे उतरे। उन्हें लक्ष्मणजी ने अवगत कराया, प्रभु रुग्ण हैं। वे तुरन्त प्रभु के पास पहुँचे तो अकस्मात् उनकी उबासी बंद हो गयी। प्रभु ने मुस्कराते हुए कहा, 'आओ हनुमान! चिन्ता मत करो मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ।' हनुमान प्रभु के चरणों में गिर गये। सभी ने एक स्वर में पूछा, 'हनुमान तुमने क्या चमत्कार कर दिया! तुम्हें देखते ही प्रभु स्वस्थ हो गये।' वाकपटु सेवाभावी हनुमानजी ने बहुत ही सरल एवं मधुर शब्दों में बच्चों की तरह सब कुछ बता दिया। प्रभु श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगा लिया और सभी को सम्बोधित कर कहा, 'हनुमान को मेरी सेवा करने में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं होना चाहिये।' हनुमान खुशी से झूमने लगे तो उनकी प्रसन्नता देखकर सभी गद्गद् हो गये। 

और मनोरथ जो कोइ लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै।।

मनुष्य जीवन मं दुःख का कारण है अज्ञान, कुबुद्धि का कारण भी अज्ञान ही है। ज्ञान के प्रदाता हनुमानजी अपने सभी भक्तों की कुबुद्धि का नाश कर उन्हें सुबुद्धि प्रदान करते हैं। सुबुद्धि के कारण ही भक्त अपने सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है और ज्ञान से मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाता है। हनुमानजी भक्त के अनन्य प्रेम से प्रसन्न हो जाते हैं। जो भक्त शर्तों में बाँध कर इनकी उपासना करते हैं उनकी मनोकामना पूर्ण नहीं हाते ी है। भक्त के मन में इनके प्रति अनुरक्ति एवं आसक्ति होनी चाहिये।

मंगल-मूरति मारुत नंदन, सकल अमंगल मूल निकंदन

पवन तनय संतन-हितकारी, हृदय विराजत, अवध-बिहारी

मातु-पिता-गुरु, गनपति-सारद, सिवा समते संभु सुक-नारद चरन बंदि बिनवौं सब काहू , देहु रामपद-नेह-निबाहू

बंदौं राम-लखन-बैदेही, जे तुलसी के परम सनेही।

पवनसुत हनुमान कल्याण की मूर्ति हैं जो सभी अमंगलों, सभी तरह की बुराइयों को जड़ से नष्ट करने वाले हैं । इनके तथा माता-पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वती सहित शिवजी, शुकदेवजी, नारद, इन सबके चरण कमलों में प्रणाम करके मैं यह विनती करता हूँ कि श्रीरघनुाथजी के चरण कमलों में मेरा प्रेम सदा एक सा निभता रहे, यह वरदान दीजिये। अन्त में मैं

श्रीराम-लक्ष्मण और जानकी जी को प्रणाम् करता हूँ, जो तुलसी के परम प्रेमी और सर्वस्व हैं। प्रभु श्रीराम के साथ हनुमानजी की कीर्ति का गायन सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर भवसागर

को पार कराने वाला है।

भक्ति आपका आत्मविश्वास बढ़ाती है। सम्पूर्ण व्यक्तित्व के धनी हैं हनुमानजी। आप यदि उनके सभी गुणों को आत्मसात करें तो आपकी मनोकामनाएँ अवश्य ही पूरी होंगी।  अपनी शक्ति को पहचानो और अपने लक्ष्य को पाने के लिये कर्म करो, कठिन परिश्रम करो, तभी सफलता मिलेगी।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता।।

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों की हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों की

करने वाली श्रीरामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ। अशोक वाटिका में हनुमानजी सीतामाता से कहते हैं, हे माता! मैं तो आपको अभी यहां से ले जाता लेकिन प्रभु श्रीराम की ऐसी आज्ञा नहीं हैं। आप कुछ दिन और धीरज धरें।  हनुमानजी ने सीता माता के संदेह का निवारण किया। हनुमानजी के मुख से प्रभु श्रीराम का संदेश व भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई वाणी सुनकर सीता माता के मन में संतोष हुआ तो उन्होंने

श्रीरामजी का प्रिय जान कर उन्हें आशीर्वाद दिया।

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

अजर-अमर गुन निधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

रा.च.मा. ५/१७/२-३-४

हे तात! हे सुत! तुम बल और शील के निधान होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। तुम अजर-अमर और गुणों की खान होओ। ''प्रभु तुम पर कृपा करें'', ऐसा सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये।

यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है कि हनुमानजी के लिये अजर-अमर, बल व शील का निधान होने का आशीर्वाद उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था जितना माता के मुख से 'सुत' शब्द का सम्बोधन। माता का आशीर्वाद अचूक है, यह बात हनुमानजी जानते थे लेकिन 'सुत' शब्द सम्बोधन से वे कृतार्थ हो गये। जगत जननी सीतामाता को आठ सिद्धियाँ और नव निधियों को देने का सौभाग्य प्राप्त था। हनुमानजी को इस योग्य समझ कर माता ने उन्हें आशीर्वाद स्वरुप ये सभी सिद्धियाँ प्रदान की। हनुमानजी को यह वरदान भी दिया कि ये इन सिद्धियों को किसी को भी दे सकते हैं। आठ सिद्धियाँ -

(1) अणिमा

- अणु के समान सूक्ष्मरुप धारण करना-अदृश्य होने की क्षमता।

(2) महिमा

- पर्वताकाररुप धारण करना-अपने आप को बहुत बड़ा बना लेने की क्षमता।

(3) लधिमा

- हवा के समान हल्का- अपने आप को जितना चाहे उतना हल्का बनाने की क्षमता।

(4) गरिमा

- पृथ्वी के समान भारी-अपने आपको जितना चाहे उतना भारी बनाने की क्षमता।

(5) प्राप्ति

- इच्छित पदार्थ प्राप्त करने की क्षमता-योगी इच्छित पदार्थ प्राप्त कर लेता है।

(6) वशित्व

- दूसरों को अपने वश में करने की क्षमता।

(7) प्रकाम्य - धरती में समा जाने व आकाश में उड़ने की क्षमता।

(8) ईश्वित      - प्रभुत्व, यानी शासन करने की क्षमता, कुछ नया कर दिखाने की क्षमता।

नौ निधियाँ  -  यत्र पद्म महाkमो तथा मकर कच्छपौ।

मुकुन्दो नन्दकश्चैव नीलः शंखोऽष्टमो निधिः।।

                महापद्मश्च पद्मश्च शंको मकर कच्छपी।

मुकुन्द कुन्द मालश्च खर्व्वश्च निधिया नव।।

(1)  पद्म - सत्वगुण आधारित

(2)  महा पद्म-सत्वगुण आधारित

(3)  मकर-तमोगुण आधारित

(4)  कच्छप-तमोगुण पर आधारित

(5)  मुकुन्द-रजोगुण आधारित

(6)  नन्दक कंद-रजोगुण एवं तमोगुण आधारित

(7)  नील-सत्व और रजोगुण आधारित

(8)  शंख-रजोगुण और तमोगुण आधारित (9)  महाशंख-रजोगुण एवं तमोगुण की अधिकता।

पद्म

- इस निधि से युक्त मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुणों से सम्पन्न होता है। मूल्यवान धातुओं का क्रय-विक्रय एवं दान करता है।

महापद्म

- इस निधि से सम्पन्न मनुष्य भी सत्त्वगुणी होता है। धन संग्रह करता है और धार्मिक कार्यों एवं धार्मिक जनों को धन का दान करता है।

मकर

- इस निधि से सम्पन्न मनुष्य अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह और विक्रय करता है। राजा से मैत्री रखता है। धन दौलत प्राप्त करने के लिये शत्रुओं का नाश करता है। युद्ध के लिये हमेशा तत्पर रहता है। ब्राह्मणों को दान भी देता है लेकिन यह निधि तमोगुण पर आधारित है।

कच्छप

- इस निधि से सम्पन्न मनुष्य भी तमोगुणी होता है। ऐसे व्यक्ति किसी का विश्वास नहीं करता। अपनी सम्पत्ति का स्वयं भी उपयोग नहीं करता और इसमें से किसी और को कुछ नहीं देना चाहता है। सम्पत्ति को जमीन से गाढ़ देता है जो एक पीढ़ी तक स्थिर रहती है।

मुकुन्द

- इस निधि से सम्पन्न मनुष्य रजोगुणी होता है। राज्य संग्रह करता है। भोगों में

लिप्त रहता है। वाद्ययंत्रों का संग्रह करता है। गायकों और वैश्याओं को धन देता है।

नन्दक कंद - यह निधि रजोगुणी और तमोगुणी दोनों पर आधारित होती है। इस निधि से सम्पन्न मनुष्य अपनी प्रशंसा सुन कर खुश होता है। एक से अधिक स्त्री का पति होता है। पुराने मित्रों से मित्रता में कमी कर नये मित्र और प्रशंसक बनाता है। बंधु-बांधवों का भरण-पोषण भी करता है।

नील - यह निधि भी सत्त्व गुणी और तमोगुणी दोनों पर आधारित होती है। इस निधि से सम्पन्न मनुष्य वस्त्र एवं अनाज का संग्रह एवं विक्रय करता है। उद्यान लगाता है। फल, फूल, मोती, मूंगा का विक्रय करता है। उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ी तक रहती है।

शंख - यह निधि भी रजोगुणी और तमोगुणी दोनों पर आधारित होती है। इस निधि से सम्पन्न मनुष्य अपने धन का उपयोग स्वयं के लिये करता है। परिवारजनों को अच्छा भोजन नहीं देता, अच्छे वस्त्र नहीं देता। किसी को कुछ देता भी है तो वह वस्तु उपयोग में लाने योग्य नहीं होती है।

महाशंख        - रजोगुण और तमोगुण पर आधारित यह निधि जिस मनुष्य को प्राप्त होती है उसे मिश्रित फल देती है। ऐसा मनुष्य भी धन का उपयोग स्वयं के लिये ही करता है

परिवार के दूसरे सदस्यों पर ध्यान नहीं देता है। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

हनुमानजी के पास आध्यात्म बुद्धि है, अपना ज्ञान है, स्वयं की पहचान है, सकारात्मक सोच है। इनके लिये तो राम से भी बढ़ कर राम का नाम है, राम नाम से प्रीति है। ये नाम की सेवा में भी व्यस्त रहते हैं। दास्य-प्रेम के आदर्श हनुमानजी की जगह तो प्रभु श्रीराम-सीता के पदाम्बुजों में है। हनुमानजी श्रीराम से कहते हैं -

देहदृष्टया तु दासोऽहं जीवदृष्टया त्वदंशकः।

आत्मदृष्टया त्वमेवाहमिति मे निश्चता मतिः।।

प्रभो! देह दृष्टि से तो मैं आपका दास हूँ, जीव दृष्टि से आपका अंश हूँ तथा आत्मा से तो

आप और मैं एक ही हैं, यह मेरा निश्चित मत है। हनुमानजी के पास राम रसायनरुपी खजाना है।

धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।। मैं सोई धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ परु अपजसु छावा।।

रा.च.मा. २/९५/५-६

'वेद् शास्त्र और पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्म को सहज ही पा लिया है। इस सत्यरुपी धर्म का त्याग करने से तीनों लोकों में अपयश छा जायगा।' यह बात वन में प्रस्थान करते समय प्रभु श्रीराम ने सुमन्तजी से कही थी। यह राम रसायन अब हनुमानजी के पास है। आपका सच्चा भक्त सत्य का मार्ग अपना कर प्रभु श्रीराम को पा लेता है। प्रत्येक भक्त को यह भलीभांति समझ लेना चाहिये कि सत्य ही शाश्वत परमात्मा है। प्रत्येक हनुमान भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सम्बन्धी सभी कार्य सत्य की सीमा में रह कर ही करने चाहिये। जीवन में सत्य के महत्त्व को समझो और दूसरों को भी सत्य के मार्ग को अपनाने के लिये प्रेरित करो। इसे अपने जीवन का उद्देश्य बनाओ। मृगतृष्णा में मत भटको, क्योंकि यही मृगतृष्णा जीवन में दुःख और अशान्ति उत्पन्न करती है। इस संसार में सब कुछ विनाशशील है। केवल हरि-नाम ही अविनाशी है, इसलिये निरन्तर हरिनाम जपते रहो। सत्यरुपी राम रसायन को अपनाने वाले सभी भक्तों को हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है और वे ऐसे सभी भक्तों को कमल नयन और सांवले शरीर वाले प्रभु से मिला देते हैं। हनुमानजी का स्वभाव तो देखिये, केवल राम-नाम से ही प्रसन्न हो जाते हैं। हनुमानजी के भक्त, जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, उन्हें जीवन में अलौकिक आनन्द की अनुभूति होने लग जाती है। ये अपने सभी भक्तों को परमानन्द प्रदान करते हैं। जीवन में आनन्दरुपी रस का रसास्वादन वही कर सकता है जिसे ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।

श्रीकृष्ण ने हनुमानजी से कहा, 'मैं राम हूँ'। हनुमानजी ने उत्तर दिया, 'आप राम ही हैं और

कृष्ण बन कर आये हैं। मैं तो धनुषबाण धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ, मेरे सर्वस्व तो धनुषधारी श्रीराम ही हैं। यदि आप भी धनुष-बाण धारण कर लें तो मैं आपके चरणों में नतमस्तक हो जाऊँगा अन्यथा नहीं।' श्रीकृष्ण ने धनुषबाण धारण कर सेवक के स्वाभिमान की रक्षा की। 'सदा रहो रघुपति के दासा' यानी सेवक के स्वाभिमान का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है? तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै।।

पराक्रम, उत्साह, बुद्धिप्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति-अनीति का विवेक, धीर-गम्भीरता, चातुर्य, उत्तम बल और धैर्य जैसे प्रमुख गुणों के कारण ही आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले हनुमानजी प्रभु श्रीराम को प्राणों से भी प्रिय हैं। प्रभु श्रीराम ने हनुमानजी से कहा, 'जब तक इस संसार में राम कथा होती रहे, तब तक तुम इस संसार में रह कर धर्म एवं अपने भक्तों की रक्षा करते रहो।'

सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।। रा.च.मा. १/२६/६

हनुमानजी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्रीराम जी को अपने वश में कर रखा है। इस तरह हनुमानजी प्रभु श्रीराम के उपासक भी हैं और उपास्य भी।

'राम ते अधिक राम कर दासा'- हनुमानजी की सच्ची भक्ति करने मात्र से ही मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के दुःखों का अंत हो जाता है। जीवन में शांति प्रदान करने वाले प्रभ श्रीराम 'आनन्द स्वरुप हैं' तो हनुमानजी 'राम-स्वरुप' हैं। शांति प्रदान करने वाले के द्वार तक पहुँचने के लिये 'राम-स्वरुप' हनुमानजी की आराधना अति आवश्यक है। आराधना करने वाले प्रत्येक भक्त को सबसे पहले अपने अहंभाव की बलि देनी चाहिये, सत्य आचरण करना चाहिये। इसके बाद 'देवो भूत्वा देवं जयेत्'- देवता बन कर देवता की उपासना करनी चाहिये। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, 'अरे मन! अवसर बीत जाने पर पछतायेगा, इसलिये इस दुर्लभ शरीर को पाकर मन, वचन तथा कर्म से भगवान का स्मरण कर, भजन कर, चिन्तन कर। सहस्त्रबाहु और रावण जैसे प्रतापी राजा भी बलवान काल के ग्रास बन गये। बड़े-बड़े धनवान् यहां से खाली हाथ चले गये। अन्त समय में न पुत्र साथ देगा न स्त्री। अन्त समय आने पर ये सब तुझे छोड़ देंगे। हे पामर! तू अभी से इन्हें क्यों नहीं छोड़ देता। विषयों में सुख कहां, विषयों की कामना तो दिनों दिन बढ़ती ही रहती है। संसार की आशा त्याग दो और श्रीरघुनाथजी से प्रेम करो।' हनुमानजी से विमुख रहने वाले जीव को राम नहीं मिलते। राम विमुख जीव अभागे होते हैं और इस संसार में नरकरुप जीवन जीते हैं। राम भक्ति के बिना यह मानव जन्म वृथा है। भगवान भक्त से कहते हैं, दृढ़ नियम से मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्व व्यापक और सबका हित करने वाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना।

अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।

राम-नाम नर केसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।

रा.च.मा. १/२७ राम-नाम श्रीनृसिंह भगवान है, कलयुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रहलाद के समान हैं। यह राम-नाम देवताओं के शत्रु (कलयुगरुपी दैत्य) को मार कर जप करने वालों की रक्षा करेगा। ओम् (˙) श्री हनुमते नमः के मंत्र के जाप के बाद सभी पापों का नाशक है राम-नाम, तारक-मंत्र है राम-नाम।

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।। कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।। रा.च.मा. १/२७/७-८

कलयुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है। राम नाम ही एक आधार है। कपट की

खान कलयुगरुपी कालनेमिके (मारने के) लिये राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमानजी हैं।

महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।। रा.च.मा. १/१७/१०

मैं महाबीर श्री हनुमानजी की विनती करता हूँ, जिनके यश का श्रीरामचन्द्रजी ने स्वयं (अपने

श्रीमुख से) वर्णन किया है। इस कलयुग में श्री हनुमानजी का भजन करने से ही प्रभु श्रीराम की कृपादृष्टि प्राप्त होती है, राम का धाम प्राप्त होता है। मृत्युलोक में जन्म लेने व भक्ति का मार्ग अपनाने पर ही हरि-भक्त कहलाये जाने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

भक्ति के लिये विश्वास अति आवश्यक है -

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। रामकृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।। रा.च.मा. ७/९०क बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना श्रीरामजी द्रवित नहीं होते तथा राम की कृपा के बिना जीव को स्वप्न में भी विश्राम (मोक्ष) नहीं मिलता।

हे मूर्ख मन! हरि के चरणों से विमुख होकर कोई सुखी कैसे रह सकता है। पाप-ताप से मुक्ति पाने के लिये हनुमान-दास बन जा, वे तुझे रामदास बना कर मोक्ष प्रदान करेंगे। नील और नल दो वानर भाइयों ने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था कि उनके स्पर्श कर लेने से भारी-भारी पहाड़ और पत्थर भी प्रभु श्रीराम के प्रताप से समुद्र पर तैर जायेंगे।  भारी-भारी पहाड़ों और पत्थरों को नील और नल स्पर्श कर रहे हैं। वानर उन पर राम-नाम लिख कर समुद्र में डाल रहे हैं। प्रभु के प्रताप से ये समुद्र पर तैर रहे हैं। इस तरह धीरे-धीरे राम-सेतु का निर्माण हो रहा है। अपनी वानर सेना से नजर बचा कर श्रीराम कुछ दूर चले गये हैं और सबसे नजर बचा कर समुद्र में पत्थर डाल रहे हैं। हनुमानजी ने उन्हें पत्थर डालते हुए देख लिया था। श्रीराम ने हनुमानजी से पूछा, 'मैंने जो पत्थर समुद्र में छोड़े, सभी डूब गये। ऐसा क्यों?' हनुमानजी ने कहा, 'प्रभु इस भवसागर में आप जिसे छोड़ देंगे उसे तो डूबना ही है, ये तो पत्थर हैं। 'इस भवसागर में जो आदर सहित आपका नाम जपेंगे, निष्काम भाव से आपकी अनन्य भक्ति करेंगे, आपके शरणागत रहेंगे वे बिना किसी जहाज के ही भवसागर को तर जायेंगे।' रावण, राम और राम-नाम की महिमा को जानता है। रावण ने कुम्भकरण से सीता को वश में करने का उपाय पूछा तो उसने कहा, 'सीता के पास राम बन कर चले जाओ, वह तुम्हें स्वीकार कर लेगी।' रावण ने कहा, 'मैं ऐसा कर चुका हूँ। जैसे ही मैं राम बनता हूँ मेरे अन्दर का रावण मर जाता है, मैं दुराचारी से सदाचारी बन जाता हूँ, मेरे मन में कुविचार आते ही नहीं।' राम के नाम से समुद्र में भारी-भारी पहाड़ और पत्थर तैर रहे हैं और राम सेतु तैयार हो रहा है। जब यह खबर लंका पहुँची तो रावण भी घबरा गया। इस खबर से हमारी सेनाओं का मनोबल टूट जायगा और लंकावासी भयभीत हो जायेंगे, यह सोच कर चिन्तित रावण ने कहा, 'चिंता मत करो, मेरे नाम से भी पत्थर तैर जायेंगे।' तब सभी ने उनसे विनती की कि 'हे विद्यासागर! प्रजाजनों एवं अपने सैनिकों को यह चमत्कार करके दिखाओ।' सभी समुद्र के तट पर पहुँच गये। रावण ने एक विशाल पत्थर पर अपना नाम लिखा। उस पत्थर को समुद्र में छोड़ा गया तो वह तैरने लग गया। इस चमत्कार को देख कर सैनिकों और प्रजाजनों में खुशी की लहर दौड़ गयी। यह चमत्कार दिखा कर रावण वापस लंका आ गया। रात्रि को शयन-कक्ष में महारानी मंदोदरी ने पूछा, 'महाराज! वैसे तो आप अनेकों विद्याओं में पारंगत हैं लेकिन पानी में पत्थर तैराने की विद्या आपने कहां से सीखी?' मुझे सही बात बताओ। रावण ने मंदोदरी से कहा, 'मुझे वास्तव में पानी में पत्थर तैराने की कला नहीं आती है।' पहले मैंने अपने हृदय में राम का नाम लिखा फिर पत्थर पर रावण लिखा और कहा, 'यदि तुम पानी में डूबे तो तुम्हें राम की कसम है।' राम के प्रताप से पत्थर पानी में तैर गया। रावण ने मंदोदरी को इस सत्य से अवगत कराया कि पत्थर राम-नाम की महिमा से ही तैरा है मेरे प्रताप से नहीं। अपने सैनिकों और प्रजाजनों का मनोबल बढ़ाने के लिये रावण को राम-नाम का सहारा लेना पड़ा।

        युद्ध भूमि में जब रावण मर गया तो -                     

तासु तेज समान प्रभु आनन! हरषे देखि संभु चतुरानन।। रा.च.मा. ६/१०३/९ उसका तेज प्रभु श्रीराम के मुख में समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। प्रभु श्रीराम ने रावण को मोक्ष प्रदान कर सांसारिक-आवागमन से मुक्त कर दिया। ब्रह्माजी का बोझ हल्का हो गया, क्योंकि अब उन्हें रावण के लिये किसी नये शरीर की रचना नहीं करनी पड़ेगी। शिवजी और ब्रह्माजी के वरदानों से रावण राक्षस से महाराक्षस बन कर महान उत्पाती बन गया था। उसके अन्याय और अत्याचार से देवता, ऋषि-मुनि, दानव-मानव सभी दुःखी थे। जिसे ब्रह्मा और शिव का संरक्षण प्राप्त हो, जो इनके वरदानों से पोषित हो, उसे मारने की हिम्मत भला कौन कर सकता था? ऐसे दुष्ट अन्यायी अत्याचारी को मार कर धर्म की स्थापना और अन्याय-अत्याचार को समाप्त करने के लिये ही प्रभु को अवतार लेना पड़ा। मनुष्य मात्र के उद्धार के लिये प्रभु ने इस दुष्ट, अन्यायी, अत्याचारी को भी मोक्ष प्रदान कर दिया। कहते हैं, जिस मनुष्य के प्राण अयोध्या में छूटते हैं वह हनुमानजी के शरणागत होकर सीधे ही साकेत-धाम को जाता है। दुष्ट, दुराचारी, अत्याचारी और अधर्मी मनुष्य भी यदि राम जन्म भूमि अयोध्या में प्राण त्यागता है तो सीधे रघुनाथजी के धाम को प्राप्त करता है। यहां प्राण त्यागने वालों पर हनुमानजी विशेष कृपा करते हैं।

जो मुक्ति अयोध्या में मरने से होती है वह मुक्ति हरेक मनुष्य कहीं भी प्राप्त कर सकता है। सन्त-महात्मा, बड़े-बूढ़े, दीन-दुःखी, ये भगवान के निवास स्थल हैं, इनकी सेवा करो, निष्काम भाव से प्रभु की अनन्य भक्ति करोगे तो -

अवध तहाँ जहँ राम निवासू, तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।

रा.च.मा. २/७४/३

जहां रामजी का निवास हो वहीं अयोध्या है, जहां सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन है, 

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना। रा.च.मा. १/१८५/५

भगवान श्रीहरि सब जगह समान रुप से व्यापक हैं। प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं। अपने शरीर और धन सम्पत्ति को संसार के कार्य में लगावें लेकिन मन को भगवान में लगा दीजिये, प्रभु से प्रेम कीजिये, मोक्ष सुनिश्चित है। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई।।

पवनसुत हनुमानजी अपने भक्तों को गति प्रदान करते हैं। वायु की गति मिलने से भक्त अपने इष्ट के पास जल्दी पहुँच जाता है। ज्ञान मुक्ति का हेतु है। रुद्रावतार हनुमान ज्ञान के प्रदाता हैं। भक्तों को यथार्थ ज्ञान प्रदान कर उनके भयंकर कष्टों का विनाश करते हैं। हनुमानजी की उपासना सर्वमान्य है। हनुमान चरणानुरागी बन कर प्रभु श्रीराम की भक्ति करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भक्ति स्वतः ही हो जाती है व ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भक्ति का सुफल भी प्राप्त हो जाता है। जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले श्याम शरीर, कमल नयन, सुन्दरता के धाम श्रीरघुनन्दन के दर्शनाभिलाषी भक्त को सबसे पहले हनुमानजी की कृपा प्राप्त करनी होती है। इसके लिये भक्तिमाता जानकीजी की कृपा भी आवश्यक है। प्रभु श्रीराम कहते हैं, हनुमान से विमुख होकर मेरी भक्ति करने वाले भक्त को मेरी अनुकम्पा प्राप्त नहीं हो सकती है। हनुमानजी की उपासना करने से सभी देवताओं की आराधना हो जाती है और आराधना का सुफल आसानी से प्राप्त हो जाता है। आज इस घोर कलयुग में सन्मार्ग-सदाचार से भटके हुए लोगों के लिये हनुमानजी की उपासना अति आवश्यक है। ये असीमित शक्तियों के भंडार हैं जब कि अन्य देवताओं की शक्तियाँ सीमित हैं। असुर अपनी तपस्या के बल पर देवताओं से वरदान प्राप्त करने में सफल हो जाते थे। वरदान स्वरुप प्राप्त सिद्धियों का उपयोग देवताओं, ऋषिमुनियों और संतों को परेशान करने या फिर उन्हें मारने के लिये किया करते थे। ऋषि मुनि और देवता अपनी रक्षा के लिये इन्द्र व अन्य देवताओं की शरण में जाते थे, लेकिन वे भी इनकी रक्षा करने में असमर्थता प्रकट कर देते थे। त्रेतायुग में जो भी राक्षस अपनी राक्षसी वृत्तियों से दूसरों को सता रहे थे उनका विनाश रुद्रावतार हनुमान ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम से करवा कर चहुँ आरे साधु-संतों, ऋषि-मुनियों एवं देवताओं की रक्षा की। अपने आराध्य के आदेशानुसार ये स्वयं भी राक्षसों का संहार करते हैं। इसलिये इनका एक नाम 'राक्षसान्तक' भी है।

त्रेतायुग से आज तक इस कलयुग में भी असीमित शक्तियों से परिपूर्ण हनुमानजी अपने भक्तों के कष्टों का निवारण कर रहे हैं। भूत पिशाचों एवं दुष्ट प्रकृति के लोगों से उनकी रक्षा कर रहे हैं। 

निरज्नो निर्विकल्पो गुणातीतो भयंकरः।

श्री हनुमानस्तोत्रम्-३१ हनुमान, अज्ञानी, विकल्परहित, सत्वादि गुणों से रहित तथा दुष्टों के लिये विकराल स्वरुप वाले

हैं। अपनी इस विशेषता के कारण ये नगर और ग्राम की रक्षा करने वाले ''नगरग्रामपालश्च'' भी है। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

''राम'' तारक मंत्र है। पतित पावन सीताराम का नाम सभी पापों का नाश करता है। आठों प्रहर राम-नाम जपने वाले एवं प्रभु श्रीराम के सुन्दर स्वरुप का चिन्तन करने वाले हनुमान जी का सुमिरन करने मात्र से ही मनुष्य के सभी दुःखों का अन्त हो जाता है, क्योंकि उनके शरीर के रोम-रोम से हमेशा ही राम-राम की ध्वनि होती रहती है। निर्मल मन से इनका स्मरण करते रहने से सारा वातावरण राममय हो जाता है।

जब प्रभु श्रीराम साकेतधाम जाने की तैयारी कर रहे थे तो सभी ऋषि-मुनि, साधु-संत उनसे प्रार्थना करने लगे कि आपने साकेतधाम जाने का निर्णय तो ले लिया है लेकिन यहां दुष्ट स्वभाव के व्यक्तियों एवं भूतपिशाचों से हमारी रक्षा कौन करेगा? प्रभु श्रीराम ने इनकी समस्या का समाधान कुछ इस तरह किया- हनुमान यहीं रहेंगे, असुरों और दुष्टों से तुम्हारी रक्षा करेंगे। इन्हें तुम मेरा ही स्वरुप मान कर, इनकी उपासना करना। इस भवसागर में ये अपने सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करेंगे। प्रत्येक रामभक्त की सेवा ये सवे कभाव से करते रहेंगे। प्रभु श्रीराम कहते हैं, यह हनुमान मेरा ही स्वरुप है। ये धरती पर अजर-अमर रह कर मेरे  सभी भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते रहेंगे। श्रीराम भक्त हनुमानजी का निरन्तर स्मरण समस्त बाधाओं से मुक्ति पाने का सरलतम उपाय है। इनसे विनती कीजिये, हे स्वामी! मुझे तो तन, मन, वचन से आपके चरणों की ही शरण है। आप इस कलयुग में कल्पवृक्ष के समान हैं। मेरे  हृदय में एक मात्र आपका ही भरोसा है। हे पवनसुत! मेरे माथे पर हाथ फेरिये, मेरी रक्षा कीजिये। हे कपिराज! अपने कृपा पात्र को हमेशा बाधारहित और प्रसन्न रखिये। जो आपका सुमिरन करता है उसके सब संकट दूर हो जाते हैं। हनुमानजी कहते हैं -

यावत तव कथा लोके विचरिष्यति पावनी। तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपालयन।।

'हे भगवान्! संसार में जब तक आपकी पावनी कथा का प्रचार रहेगा तब तक आपके आदेश का पालन करता हुआ मैं इस पृथ्वी पर ही रहूँगा।' गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमानजी से कह रहे हैं-

कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाई।

करहिं अनभलेउ को भलो आपनी भलाई।।

संकट के समय अपने स्वामी को ही भला-बुरा कहा जाता है और अच्छे स्वामी अपनी भलाई

से उस बुरे सेवक का भी भला कर देते हैं।

समरथ सुभ को पाइये बीर पीर पराई।

ताहि तकें सब ज्यों नदी बारिधि न बुलाई।।

ऐसा सामर्थ्यवान, कल्याणकारी, शूरवीर जो विपत्ति आने पर सहायक बन जाता है सभी उसकी ओर ऐसे देखते हैं जैसे नदियाँ बिना बुलाये ही दौड़ कर समुद्र के पास चली जाती हैं। अपने अपने को भलो, चहैं लोग-लुगाई।

भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ असुभ सगाई।।

इस संसार में सभी नर-नारी अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं। अच्छे-बुरे का विचार करके जिसे

जो देवता अच्छा लगता है वह उसी दवे ता का भजन करने लगता है। बाँह बोलि दै थापिये जो निज बरिआई।

बिन सेवा सों पालिये, सेवक की नाई।।

जिसे जबरदस्ती अपने बल का भरोसा देख कर रख लिया, यदि वह आपकी सेवा नहीं करता

तो भी उसे सेवक की तरह पालना चाहिये।

चूक चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई।

होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई।।

चूक और चंचलता सब मेरी ही है। आप बड़े हैं, मुझ जैसे नीच को क्षमा करने में ही आपकी बड़ाई है, आदर करने से नीच भी ढीठ हो जाता है और नीचता करने लगता है, इस बात को सभी जानते हैं। वंदिछोर विरुदावली निगमागम गाई।

नीको तुलसीदास को तेरियै निकाई।।

आप ही बंधनों से छुड़ाने वाले हैं, आपका एसे ा सुयश वेद-शास्त्र गाते हैं। मुझ तुलसीदास का

भला अब आपकी भलाई से ही होगा, अन्यथा मैं तो किसी भी योग्य नहीं हूँ। आप भी गोस्वामी तुलसीदास जी की तरह हनुमानजी को पुकारें, उनकी पूजा करें। आपके

सभी कष्ट मिट जायेंगे। जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरु देव की नाईं।।

गिरति अज्ञानम्-गृणाति ज्ञानम् स गुरुः - जो अज्ञान रुपी अंधेरे को दूर कर मनुष्य के हृदय में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं उन्हें गुरु कहते हैं। हनुमानजी बुद्धि और कौशल के निधान हैं। साक्षात् सद्गुरु होने के कारण अपने भक्तों को सच्ची शिक्षा प्रदान करते हैं, सन्मार्ग दिखाते हैं। हनुमानजी सर्वत्र वंदनीय हैं, पूजनीय हैं। हे हनुमान गोसाई! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। हनुमानजी अपने भक्तों के अज्ञानरुपी अंधकार को दूर करते हैं, उनके कानों में ज्ञानरुपी अमृत

का सिंचन करते हैं। इनका भजन किये बिना क्लेश दूर नहीं होते। गुरु शब्द में 'गु' का अर्थ है दुष्ट चरित्र, दुष्टकर्मी, विषय वासनाओं से युक्त जीव। 'रु' का अर्थ है दुष्ट चरित्र, दुष्ट कर्मों एवं विषय वासनाओं का नाश कर सद्मार्ग पर लाने वाला। जो हनुमानजी के शरणागत हो जाता है उसकी सारी गंदगी दूर हो जाती है और वह ज्ञानमार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है, शास्त्रों के रहस्यों को समझ कर, धर्मानुकूल आचरण करने लगता है। हनुमानजी सद्गुरु बन कर शरणागत मनुष्य के दुष्कर्म, दुष्ट-चरित्र, काम वासनाओं का नाश कर उसे ज्ञान मार्ग की ओर ले जाते हैं। नियमितरुप से ¬ नमो हनुमते नमः का जप या इस मंत्र का श्रवण करने वाले भक्तों को आप जीवन में सुख समृद्धि प्रदान कर अन्ततः मोक्षधाम का अधिकारी बना देते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी भी सद्गुरु हनुमानजी की अंगुली पकड़ कर ही श्रीराम के चरणारविंदों तक पहुंचने में सफल हुए थे। इस तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्येक भक्त हनुमानजी से यही प्रार्थना करता रहे 'कृपा करो गुरुदवे कि नाईं'। ध्यान रहे इसके लिये निर्मल मन और शुद्ध अंतःकरण अति आवश्यक है। हनुमानजी की उपासना करने वाले प्रत्येक भक्त का मन निर्मल होना चाहिये, अंतःकरण शुद्ध होना चाहिये। हमारे धर्म-शास्त्र इस शुद्ध अन्तःकरण को परमतीर्थ कहते हैं।

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटही बंदि महा सुख होई।।

तात तीनि अति प्रबल खल काम, क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निभिष महुँ क्षोभ।।

रा.च.मा.  ३/३८क काम, क्रोध और लोभ ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के मनों को भी पल भर में क्षुब्ध कर देते हैं।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।

कवहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हते ु सनेही।।

रा.च.मा. ७/४४/५-६ अविनाशी जीव माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ (इनके वश में हुआ) सदा भटकता रहता है (चौरासी लाख योनियों में)। बिना ही कारण स्नेह करने वाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्य का शरीर दे देते हैं। मनुष्य जन्म ईश्वर का सबसे उत्तम वरदान है। मनुष्य को ईश्वर ने विवेकशक्ति प्रदान की है। सत्य, असत्य, अच्छा व बुरा को समझने की सामर्थ्य प्रदान की है। मनुष्य शरीर पाकर जो विषयों में अपना मन लगा लेते हैं, निश्चित जानिये, ऐसे मूर्ख जीवन में अमृत के बजाय विष का पान करते हैं व पुनः चौरासी लाख योनियों में भटकने का रास्ता अपना लेते हैं। काम, क्रोध, मद और लोभ मनुष्य को नरक में धकेलते हैं। इनका त्याग करने के लिये, विषयों से दूर रहने के लिये, निरन्तर बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी का स्मरण व पाठ करने वाले भक्त को प्रभु श्रीराम की कृपा स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। राम द्वारे में प्रवेश करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। हनुमानजी का पाठ, स्मरण या भजन इस तरह करें जैसे संत किया करते हैं। जहां भी हिन्दू होगा वहां हनुमानजी का मंदिर अवश्य होगा, घर में हनुमानजी की मूर्ति या चित्र अवश्य होगा। जो हनुमानजी की पूजा करे वही हिन्दू है। यही हिन्दू शब्द की सही व्याख्या है। हनुमानजी में ज्ञान, भक्ति और शक्ति का पूर्ण समन्वय है, इसलिये सर्वत्र पूजनीय हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ, तृष्णा और असत्य शत्रुओं में महाशत्रु माने जाते हैं, इन पर विजय पाने के लिये हनुमानजी की कृपा अतिआवश्यक है। इन्हें अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति प्रदान कर आप परमानन्द स्वरुप कृपा के धाम और मन की कामनाओं को पूर्ण करने वाले श्रीराम को अपने हृदय में धारण करने की योग्यता प्राप्त कर लेंगे।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि, साखी गौरीसा।।

हनुमानजी दास्य प्रेम के आदर्श हैं। दया के सागर प्रभु श्रीराम इनके सर्वस्व हैं। प्रभु श्रीराम समदर्शी हैं, लेकिन इन्हें हनुमानजी जैसे निष्काम सवे कों से विशेष प्रेम है। हनुमानजी को भी प्रेमी भक्त बहुत प्रिय हैं। ये अपने प्रिय भक्तों के निःस्वार्थ प्रेम को पाने के लिये हमेशा छटपटाते रहते हैं। भगवान भक्त के निस्वार्थ प्रेम के बंधन में स्वयं बंध जाते हैं, क्योंकि प्रभु को तो भक्त का प्रेम ही प्रिय है। अतः यह बात हमेशा ध्यान में रहे कि पुरुषार्थ, प्रभाव और वैभव से प्रभु का साक्षात्कार नहीं हो सकता। भक्त के अन्तःकरण में हनुमानजी के प्रति प्रेम हो, शरणागतभाव हो, निष्काम भक्ति हो तो समझ लीजिये इनकी कृपा प्राप्त हो गयी है। भक्त का इनसे परिचय हो गया तो समझ लीजिये प्रभु श्रीराम से भी परिचय हो गया है।

भौतिक, दैहिक और दैविक कष्टों से छुटकारा पाने के लिये, इस भवसागर से पार उतरने के लिये, इनका नियमित स्मरण व हनुमान चालीसा का पाठ अतिआवश्यक है। 'निरामयं रामरसायनं पिबं' - प्रभु श्रीराम का नाम निरामय रसायन है। निर्मल मन से राम-नाम स्मरण करने वाले को प्रभु श्रीराम अवश्य मिलते हैं। लेकिन यह राम रसायन हनुमानजी की भावपूर्ण भक्ति करने के बाद ही पाप्त हो सकता है, यह बात भक्तों की समझ में आ जानी चाहिये।

'रामचरितमानस' हनुमान चालीसा व अन्य ग्रंथ जो गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखे हैं, जन साधारण के लिये सरल, सहज व सरस हैं। इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं। तुलसीदासजी ने बालकाण्ड की रचना संस्कृत भाषा में की थी जिसे संन्यासी वेश में शिवजी पढ़ने के लिये ले गये। भगवान शिव ने इन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा, 'संस्कृत भाषा में रचनाओं की कमी नहीं है। तुम जनसाधारण के कल्याण हेतु सरल भाषा में लिखो ताकि साधारण जनमानस उन्हें पढ़े और उनका उद्धार हो सके। सरल भाषा में लिखा जाने वाला रामचरितमानस ग्रंथ वेदान्तशास्त्र की तरह पूजनीय होगा। तुम्हारे अन्य ग्रंथों को भी एसे ा ही सम्मान प्राप्त होगा। तुलसीदासजी को समझाने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।' सरल भाषा में लिखा गया 'रामचरितमानस' भारत का सांस्कृतिक दर्पण बन गया है। प्रत्येक माता-पिता से विशेष आग्रह है कि बच्चों को श्रीहनुमान चालीसा पढ़ कर सुनाएँ, पढ़ने के लिये प्रेरित करें, सरल भाषा में उन्हें इसका अर्थ समझावें। इससे बच्चों की आत्मशक्ति व आत्म-विश्वास में निरन्तर वृद्धि होती रहेगी। हनुमान-चरित्र से अच्छे चरित्र निर्माण और नैतिकता का मार्ग प्रसस्त होगा। जो हनुमान चालीसा पढ़ेगा, होय सिद्धि साखी गौरीसा-उसे सिद्धि 'सफलता' अवश्य प्राप्त

होगी। इसके साक्षी स्वयं शंकर भगवान हैं। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मँह डेरा।।

गोस्वामी तुलसीदासजी की हमेशा एक ही इच्छा रही कि प्रभु श्रीराम जन्म-जन्मान्तर तक मेरे स्वामी बने रहें और मैं दास बना रहूँ। इन्होंने हनुमानजी का हाथ थामा और प्रभु श्रीराम के चरणारविन्दों तक पहुँचने में सफल हो गये। यह प्रसंग प्रत्येक भक्त के लिये अनुकरणीय है। माया का निवास मनुष्य के हृदय में होता है। यदि हृदय में प्रभु बैठ जाएं तो माया को हृदय में स्थान नहीं मिलेगा। मनोविकार उत्पन्न नहीं होंगे, बुद्धि भ्रष्ट नहीं होगी, आत्म कल्याण हो जायगा। तुलसीदासजी हनुमानजी से कह रहे हैं, आप सदा मेरे हृदय में निवास करें। गोस्वामी तुलसीदासजी बार-बार प्रभु श्रीराम और हनुमानजी का गुणगान कर रहे हैं, रामचरितमानस के माध्यम से इनकी महिमा को जनजन तक पहुंचा रहे हैं। इनका यह कार्य शंकराचार्य श्री मधुसूदनाचार्यजी के अनुयायियों को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने गोस्वामीजी को परेशान करना प्रारम्भ कर दिया। दुःखी होकर इन्होंने 'कवितावली' की रचना कर शिवजी के समक्ष अपना निवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, 'अद्वैतवाद के विद्वान शंकराचार्य श्री मधुसूदनाचार्य और उनके अनुयायी मेरी भक्ति में विघ्न डाल कर मुझे दुःखी कर रहे हैं। हे भगवान शिव! आप मेरी बात नहीं सुनेंगे तो मैं प्रभु श्रीराम से आपकी शिकायत करुँगा।' पागल बन कर शिवजी ने मधुसूदनाचार्यजी से कहा, 'प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र का रसपान कर, तुलसीकृत रामचरितमानस को पढ़, 'आनन्दस्वरुप ईश्वर' के नाम का स्मरण कर, बार-बार अद्वैतवाद की रट लगाना छोड़ दे।' शंकराचार्य ने रामचरितमानस पढ़ा और लिखा-'काशी में तुलसीनाम का चलता-फिरता पौधा है, उसके ऊपर मारी है जो 'रामचरितमानस' नाम से प्रसिद्ध है। उस मTरी पर राम-रुपी भंवरा मँडराता हुआ मैं देख रहा हूँ।' राम भक्त भगवान शिव की कृपा से ही यह सम्भव हुआ। कलि ने गोस्वामी तुलसीदासजी से कहा, 'यह कलयुग है। तुम मेरे शासनकाल में सत्य एवं राम-नाम का प्रचार नहीं करोगे। यदि तुम एसे ा करोगे तो मैं तुम्हें दंडित करुंगा और सत्य को पूरी तरह समाप्त कर दूँगा। मेरे युग में भयमुक्त होकर जीना चाहते हो तो छल, कपट और झूठ का प्रचार करो।' सत्य का अपमान गोस्वामीजी के लिये असह्य हो गया। ''सत्य यानी प्रभु श्रीराम को छोड़ दूं? उन्होंने अपने इष्ट देव की स्तुति की। हनुमानजी प्रकट हुए तो उन्हें बताया -'कलि कहता है, कोई देवता नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके।' हनुमानजी ने कहा, 'तुम डरो मत, मैं सीधे हस्तक्षेप नहीं करुंगा क्योंकि इस युग का शासक कलि है। मैं प्रभु श्रीराम की आज्ञा लेकर ही तुम्हारी मदद करुँगा। तुम प्रभु श्रीरामजी की 'विनयपत्रिका' लिखो।' गोस्वामीजी ने 'विनयपत्रिका' लिखी। हनुमानजी ने विनयपत्रिका प्रभु श्रीराम को सौंप दी। उन्होंने प्रभु को अवगत कराया कि आपका अनन्य भक्त तुलसी, कलि के अत्याचारों से बहुत दुःखी है। कलि सत्य आचरण करने वालों एवं आपका नाम स्मरण करने वालों को बहुत सता रहा है। यह सब जानकर प्रभु श्रीराम ने

'विनयपत्रिका' पर अपनी मोहर लगा दी। विनयपत्रिका पर प्रभु श्रीराम की मोहर लगने के बाद हनुमानजी कलि के पास गये। भयभीत कलि भाग गया व सीधे ही ब्रह्माजी के पास पहुँच कर पुकार करने लगा, 'मेरी रक्षा करो।' इतने में हनुमानजी भी वहाँ पहुँच गये। ब्रह्माजी ने कलि से कहा, 'तुम्हें पापियों पर शासन करने के लिये

भेजा गया है।'  तुम अपने शासनकाल में सत्य आचरण करने वाले व राम-नाम स्मरण करने वाले प्रजाजनों पर अन्याय, अत्याचार नहीं करोगे। ब्रह्माजी ने प्रभु श्रीराम से कहा, 'कलि को मांफ कर दो। भविष्य में यदि यह राम भक्तों एवं सत्य आचरण करने वालों को सतायेगा तो इसे अवश्य दडित करें।' इस तरह ब्रह्माजी ने शरणागत कलि की रक्षा की और हनुमानजी को राम भक्तों की रक्षा का संकल्प भी करा दिया। गोस्वामी तुलसीदासजी के इष्ट, हनुमानजी की कृपा आज इस घोर कलयुग में भी सभी राम भक्तों एवं सत्य आचरण करने वालों पर यथावत बनी हुई है। तुलसीदास ने अपने इष्ट का हाथ थामा और अपनी विनय की पराकाष्ठा, 'विनयपत्रिका' को प्रभु श्रीराम तक पहुँचा दिया जिसमें इन्होंने भक्ति और ज्ञान का बहुत सुन्दर वर्णन किया है। गोस्वामी तुलसीदासजी मुक्त-कंठ से श्रीकृष्ण का गुणगान करते रहते हैं। एक दिन श्यामसुन्दर की मूर्ति के सामने खड़े होकर कह रहे हैं, प्रभु! आपकी मुरलीधारी बाँकी छवि बड़ी सुन्दर लग रही है। माथे पर मोर मुकुट शोभायमान है। क्या खूब नटवर वेश बनाया है आपने!

कहा कहौं छबि आपकी भले बने हो नाथ।

तुलसी मस्तक तब नवै धनुषबान लो हाथ।।

पहचान लिया है मैंने आपको, हैं तो आप मेरे राम, लेकिन मैं भी कम हठी नहीं! आपके चरणों में माथा तभी टेकूंगा जब आप इस मारे मुकुट और मुरली को अदृश्य कर मुझे धनुषधारी बन कर दर्शन देंगे।

कित मुरली कित चंद्रिका कित गोपियन को साथ। अपने जन के कारने कृष्ण भये रघुनाथ।।

प्रभु ने अपने भक्त के विनोद का उत्तर विनोद में देते  हुए कहा, ''मुरली मुकुट दुराय कै'', चलो मुरली और मुकुट छिपा कर मैं

धनुषधारी राम बन गया हूँ। भगवान का भक्त के प्रति प्रेम देखिये! भक्त ने जिस स्वरुप का ध्यान किया प्रभु का वही स्वरुप उसकी आँखों के सामने आ गया। तुलसीदासजी प्रभु के सामने अपना मस्तक टेक कर धन्य हो गये।

पवन तनय संकट हरन। मंगल मूरति रुप। राम लखन सीता सहित। हृदय बसहु सुर भूप।। हे मारुति नन्दन, आप भक्तों की सभी विपत्तियों का नाश करने वाले हैं। जगदम्बा सीतामाता प्रभु के सभी शरणागतों के कष्टों एवं क्लेशों को हरने वाली हैं। नित्य प्रति कल्याण करने वाली क्लेश हरणी सीतामाता का स्मरण, हनुमान चालीसा और सुन्दरकाण्ड का पाठ, शांतिपूर्वक भजनभाव मनुष्य को निश्चितरुप से राम-चरणानुरागी बना देते  हैं। हनुमानजी और प्रभु श्रीराम की भक्ति इस कलयुग में सबसे सरल, सुगम, श्रेयकरी एवं कल्याणकारी मार्ग है। जो मनुष्य हनुमानजी का स्मरण नहीं करता है, भजनभाव से विमुख रहता है वह अपने जीवन में विपत्तियों को आमंत्रित करता है। मनुष्य प्रभु श्रीराम से विमुख हो जाता है। प्रभु राम से विमुख होना ही क्लेश (विपत्तियों) का सूचक है। हनुमानजी इन्द्रियों के देवता व अन्य सिद्धिदायक देवी देवताओं के नियन्ता हैं जो सिद्धियोंरुपी भोगों का नाश कर आनन्द प्रदान करते हैं, मनुष्य को पाप, शाप और संताप से बचाते हैं। हनुमान चालीसा और रामचरितमानस का पठन, कथन और श्रवण करने वाले मनुष्य का मन निर्मल हो जाता है और निर्मल मन के भक्त रामधाम के अधिकारी बन जाते हैं, संसाररुपी भवसागर को आसानी से पार करने की सामर्थ्य पा लते े हैं। इस घोर कलयुग में आज मनुष्य के सामने जो प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं उनसे छुटकारा पाने के लिये व मनोविकारों से मुक्ति पाने के लिये नित्यप्रति हनुमान चालीसा और सुन्दरकाण्ड का पाठ अचूक राम रसायन है। ब्रह्मचारी हनुमान का नाम स्मरण करने वाला अनैतिक

एवं अन्यायपूर्ण आचरण से मुक्ति पा लेता है। सत्य का पालन कर सत्यावलम्बी बन जाता है। आज का युवावर्ग पूर्ण संयम से रहे, अनुशासित होकर जिये, विनयशील बने, इन्द्रियजयी बने तभी अनाचार, व्यभिचार और भ्रष्टाचार से मुक्त रह सकता है। इसके लिये युवावर्ग हनुमान चालीसा पढ़े, ब्रह्मचर्य का पालन करे, सभी कार्यों को निपुणता के साथ करे। इन्द्रियाँ अच्छे-अच्छे विद्वानों, संतों को विचलित कर देती हैं, अतः इन्द्रियजयी बनने के लिये प्रारम्भ से ही प्रयास करता रहे। अच्छे संस्कार एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण के लिये हनुमानजी का स्मरण करे। हनुमानजी अग्नि स्वरुप बन कर हमारी विषय वासनाओं व समस्त पाप-तापों को भस्म कर हमें अच्छा इंसान बना देते हैं।

संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।

निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।

रा.च.मा. ७/१२५क/७-८

संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, एसे ा कवियों ने कहा है, परन्तु उन्होंने असली बात कहना नहीं जाना, क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने से पिघलता है और पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं। इस घोर कलयुग में सभी देवता अपने लोक को लौट गये हैं, लेकिन हनुमानजी त्रेतायुग से लगातार आज तक इस कलयुग में भी अपने सभी भक्तों के कष्टों का निवारण कर रहे हैं। ये भक्तों के दुःख से पिघल जाते हैं। ये बड़े शूरवीर हैं पर भक्तों के वास्तविक दुःखों को सहन करने में बड़े कायर हैं, भक्तों के दुःखों को सहन नहीं कर सकते हैं, दुःखों का त्वरित समाधान कर देते हैं। हनुमानजी अपने भक्तों के लिये तो 'मृदूनि कुसुमादपिं'-पुष्प से भी कोमल हैं। हनुमानजी-

(1) बल, बुद्धि और विद्या के दाता हैं।

(2) दुःखों के निवारणकर्ता हैं। धार्मिक, दैविक एवं दैहिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करते हैं।

(3) कुबुद्धि का नाश करते हैं।

(4) सज्जनों का साथ देते हैं, दुष्टों का नाश करते हैं।

(5) कठिन से कठिन कार्यों का सरलीकरण कर उन्हें पूर्ण करा देते हैं।

(6) सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं, मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

(7) भूत, पिशाच, दुष्ट आत्माएँ व दुष्ट स्वभाव के व्यक्तियों से भक्त की रक्षा करते हैं।

(8) अष्ठ सिद्धि, नौ निधियों के दाता हैं।

(9) राम भक्त बना कर प्रभु श्रीराम से मिला देते हैं।

(10) मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के दुःखों का अन्त कर देते हैं।

(11) इनकी कृपा से राम का धाम प्राप्त होता है। जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

(12) ये हमेशा सद्गुरु की भाँति कृपा करते हैं। हनुमानजी का जीवन और उनका चरित्र अपने परमप्रिय भक्तों को राम-नाम रुपी आनन्द का अनुभव करा कर, उन्हें रामचरणानुरागी बना देता है। प्रभु श्रीराम की अनुकम्पा से प्राप्त तीन प्रमुख गुण-भक्त को प्यार, साधक की रक्षा एवं दुष्ट को मार द्वारा ही ये इस भवसागर में अपने परमप्रिय भक्तों का उद्धार करते हैं।

हनुमान - विलक्षण व्यक्तित्व के धनी हैं, अतुलनीय बली हैं। बुद्धिमान हैं, विद्वानों के शिरोमणि हैं। शौर्य के महासागर हैं,  कामरूप हैं। हृदय की भाषा में बोलने वाले ओजस्वी वक्ता हैं, सच्चे सेवक हैं। हनुमान चालीसा और संकट मोचन हनुमानाष्टक का नियमित पाठ सर्वसिद्धिदायक है,

हनुमानजी हिन्दुओं का कल्याण करने वाले 'जनदेवता' हैं। 

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