मंगलवार, 28 जुलाई 2015

लघुकथा - नवप्रभात

image

अंकिता भार्गव

 

नवप्रभात

शाम के छः बज रहे थे, सूर्यास्‍त का समय था। समुद्र के तट पर बहुत भीड़ थी, कुछ लोग घूमने आए थे तो कुछ उनके मनोरंजन व पेट पूजा के जरिए अपनी रोजी कमाने। सभी लोग खुश थे सिवाय एक नवीन चंद्र के। वह भीड़ के उस रेले में भी अकेला-उदास ही बैठा था। नवीन चंद्र एक व्‍यापारी था और कल तक सफल भी था। क्‍या नहीं था उसके पास। नौकर-चाकर, गाड़ियां, बंगला। कुछ दिन पहले तक वह शहर के नामी रईसों में गिना जाता था। मगर आज कुछ भी नहीं रहा। फैक्‍ट्री में लगी भीषण आग ने उसका सब कुछ छीन लिया। बहुत बड़ा नुकसान हुआ था उसकी हिम्‍मत उसका साथ छोड़ चुकी थी। समझ नहीं आ रहा था क्‍या करे। कैसे अपनी पत्‍नी-बच्‍चों का सामना करे।

हताश नवीन चंद्र की आंखों में आंसू आ गए। वह शून्य में ताकने लगा, तभी उसके सामने से एक गुब्‍बारे वाला निकला। वह छोटे बच्‍चों को गुब्‍बारों की ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था। उसके मैले कुचैले कपड़े और उसकी हालत देख कर कोई भी उसकी आर्थिक स्‍थिति का अंदाजा लगा सकता था। नवीन चंद्र सोचने लगा कि जब यह व्‍यक्‍ति मेहनत करके अपनी रोजी कमा सकता है तो वह क्‍यों नहीं।

‘क्‍या सोच रहे हो एन. सी.।' यह आवाज सुन कर नवीन चौंक गया उसने पीछे केशव खड़ा था जो कि उसका मित्र और व्‍यापार में उसका भागीदार भी था। ‘तुम यहां!' ‘हां भई, भाभी का फोन आया था तुम्‍हारे बारे में पूछ रही थी, वो बहुत परेशान थी और मैं जानता था तुम यहीं मिलोगे इसलिए मैं तुम्‍हें लेने यहां चला आया। क्‍या इरादे हैं दोस्‍त कहीं हार मान कर कोई ऐसा वैसा कदम उठाने की तो नहीं सोच रहे हो ना।' ‘नहीं अब मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा। हालात चाहे कैसे भी हों मैं उनसे लड़ूंगा।' ‘यह हुई ना बात मेरे दोस्‍त, हम यूंही हार नहीं सकते। एक बार फिर शुरूआत करेंगे और दुबारा फिर वही मुकाम हासिल करेंगे जो हमने खोया है।'

‘अरे एन. सी. वह देखो वह क्‍या है?' नवीन चंद्र ने उस ओर देखा जिधर केशव ने इशारा किया था। ‘क्‍या है, डूबता हुआ सूरज है, पहली बार थोड़े ही देख रहे हो।' ‘ऊंहू! सिर्फ डूबता हुआ सूरज नहीं, मुझे तो इसके पीछे एक उम्‍मीदों से भरा नवप्रभात दिखाई दे रहा है। क्‍या कहते हो?' केशव ने नवीन की ओर अपना हाथ बढा दिया। नवीन उसका इशारा समझ गया उसने भी मुस्‍कुराते हुए केशव का हाथ थाम लिया

 

संगरिया, जिला-हनुमानगढ, (राजस्थान) 

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------