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राम रसायन

- दयाधर जोशी

 

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सभी वानर दल सीता माता की खोज के लिये निकले हैं, हनुमानजी के दल के सदस्य समुद्र के किनारे बैठ कर आपस में विचार विमर्श कर रहे हैं कि सीतामाता की खोज कैसे की जाए। लेकिन हनुमानजी कुछ दूर बैठ कर हरि-स्मरण कर रहे हैं। हरि-स्मरण करते हुए अपने बल का अनुमान लगा रहे हैं। तभी

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहउे बलवाना।।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।

रा.च.मा. ४/३०क/३-४

जामवंत हनुमानजी से कह रहे हैं, 'हे बलवान! क्या चुप साध रखी है। पवन पुत्र हो, बल में पवन के समान हो, बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान हो।'

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।। राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा।।

रा.च.मा. ४/३०क/५-६

'राम कार्य के लिये तुम्हारा अवतार हुआ है। जगत में ऐसा कौन सा कठिन काम है जो तुमसे न हो सके।' यह सुन कर हनुमानजी पर्वत के आकार के, अत्यन्त विशालकाय हो गये। जामवंत कह रहे हैं, 'हनुमान चुप क्यों हो? अपने आप को पहचानो, अपने कुल के गौरव को याद करो, राम के कार्य के लिये ही तुम्हारा अवतार हुआ है।' पथ-प्रदर्शक जामवंतजी के वाक्य जब हनुमानजी के कानों में पड़े तो उनकी बुद्धि जाग्रत हुई। पथ-प्रदर्शक के कारण ही उनकी लघुता प्रभुता में परिवर्तित हो गयी। वे पर्वताकार हो गये। उन्होंने पास ही स्थित पर्वत शिखर पर चढ़ कर तीव्र गर्जना की, लेकिन अपना संयम नहीं खोया, अपने मानसिक संतुलन को यथावत बनाये रखा। सच्चा बलवान निर्भीक हाते ा है, क्योंकि उसका प्रमुख आभूषण है नम्रता। महाभारत युद्ध से पहले दुर्योधन और अर्जुन श्रीकृष्ण के पास सहायता माँगने के लिये गये। श्रीकृष्ण अपने शयनागार में आराम कर रहे थे। अभिमानी दुर्योधन कृष्ण के सिरहाने बैठे। लेकिन निरभिमान, विनम्र अर्जुन ने श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की शरण में रहना उचित समझा। श्रीकृष्ण ने दोनों को स्पष्ट शब्दों में कहा, 'न मैं युद्ध करुंगा और न ही बलराम भैया युद्ध करेंगे। युद्ध के लिये मेरी सेना का सहयोग या फिर मेरी राय, इन दोनों में से किसी एक को चुन लीजिये।' कौरव सेना में पराक्रमी योद्धाओं की कोई कमी नहीं थी। दुर्योधन ने सोचा युद्ध तो हमेशा सेना के बल पर ही जीते जाते हैं, सलाह से नहीं। अपनी सैन्य शक्ति में अत्यधिक वृद्धि के लिये दुर्योधन ने सेना का सहयेाग माँगा। अर्जुन चाहते थे कि श्रीकृष्ण पथ-प्रदर्शक बन कर हमारी सहायता करें, हमारे साथ हमेशा मौजूद रहें। ऐसा ही हुआ। कौरवों की सेना श्रेष्ठ पराक्रमी योद्धाओं से परिपूर्ण होते हुए भी पाण्डवों की सेना से हार गयी। कौरवों के पास योद्धा तो थे लेकिन राह दिखाने वाला मार्गदर्शक नहीं था। दूसरी ओर पाण्डवों की सेना को उचित सलाह देने के लिये श्रीकृष्ण पथ-प्रदर्शक बन कर सहयोग कर रहे थे। पाण्डवों ने यह युद्ध उचित पथ-प्रदर्शक के बलबूते पर ही जीता था। विपत्ति आने पर मौन रह कर हरि-स्मरण करते रहने से मनुष्य की बुद्धि जाग्रत होने लगती है। मनुष्य को अपनी शक्ति का भान होने लग जाता है और संकट की घड़ी में ईश्वर की शक्ति सहयोगी बन जाती है। सही सलाहकार विवेक बन कर व्यक्ति की सहायता कर सकता है। जीवन में लोगों की उचित सलाह को मान कर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिये। अच्छे और बुरे का निर्णय विवेक से ही सम्भव होता है। यह प्रसंग हमें यही शिक्षा देता है कि जो विवेक बन कर हमें राह दिखाए, उचित सलाह दे, उसे अवश्य मानना चाहिये। हनुमान सभी वानरों से कह रहे हैं-

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष विसेषी।।

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।। रा.च.मा. ५/१/३-४

'जब तक मैं सीता माता को देख कर लौट न आऊँ मेरी राह देखना। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कह कर और सबको मस्तक नवा कर तथा हृदय में रघुनाथजी को धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले। समुद्र के किनारे स्थित पर्वत पर चढ़े, बार-बार श्रीरघुबीर का स्मरण कर वेग से उछले और प्रसन्नचित्त होकर, उत्साहित मन से, अपने प्रभु का स्मरण कर समुद्र को पार करने लगे। प्रस्थान के समय विनम्र हनुमान ने सब को प्रणाम किया और सभी की दुआएँ लीं। कहते हैं, जब हनुमानजी समुद्र को पार कर रहे थे तो पर्वत टूट रहे थे, पर्वत और पेड़ उखड़ कर समुद्र में गिर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो प्रलय की घड़ी आ गयी हो। हर हालत में कार्य को पूर्ण कर परिणाम को प्राप्त करने के लिये दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ रहे थे।

जिमि अमोघ रघुपति कर बना। एही भाँति चलउे हनुमाना।। रा.च.मा. ५/१/८

जैसे श्रीरघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है उसी तरह हनुमानजी भी चले।

जब भी किसी कार्य का शुभारम्भ किया जाय, उत्साहित मन से किया जाए। कार्यारम्भ से पहले व कार्य को करते समय लगातार प्रभु नाम का स्मरण इच्छित फल प्रदान करने में सहायक होता है। कार्य को करने व कार्य सिद्धि के लिये अदम्य साहस जरुरी है। व्यक्ति को दृढ़ निश्चयी होना चाहिये। कार्य करने की पहली शर्त है दृढ़ संकल्प। यदि संकल्प ले लिया है तो सामर्थ्य स्वतः ही आ जाती है। व्यक्ति को जीवन में कार्य करते समय लक्ष्यानुगामी होना चाहिये। हनुमानजी समुद्र पार कर रहे हैं-

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।। रा.च.मा. ५/१/८

समुद्र ने हनुमानजी को श्रीराम का दूत समझ कर मैनाक पर्वत से कहा, इन्हें विश्राम दो।

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम।।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।। रा.च.मा. ५/१

हनुमानजी ने उसे हाथ से छूकर उसका सम्मान किया, प्रणाम किया और यह कर कर चल

पड़े कि 'श्रीराम का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ!' उन्होंने शुभ चिन्तक मैनाक को पूरा सम्मान दिया और उसकी शुभकामनाएँ ली। प्रमाद, आलस्य, सुस्ताने के बाद नींद एकाग्रता को भंग करते हैं। इससे कार्य सम्पादन में देरी हो सकती है, बाधा उत्पन्न हो सकती है, इस पर हनुमानजी ने अच्छी तरह विचार करने के बाद ही यह निर्णय लिया होगा। यहां हनुमानजी ने मैनाक को अपने संकल्प से अवगत करा दिया है। कार्य को पूर्ण करने से पहले विश्राम की बात मन मे नहीं लानी चाहिये। असावधानी, आलस्य, थकान, थकान के बाद नींद, ये सब एकाग्रता को भंग करते हैं और लक्ष्य पूर्ति में बाधक बन जाते हैं। यदि कोई विश्राम की बात कहे, हित चिन्तक बन कर आपका साथ देना चाहे तो उसका सम्मान करते हुए उसकी शुभकामनाएँ लेनी चाहिये। उसे अपने संकल्प से अवगत करादेना चाहिये। देवताओं ने हनुमानजी को जाते हुए देखा तो उनकी विशेष बलबुद्धि को जानने के लिये सर्पों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने हनुमानजी से कहा, 'मैं तुम्हें खाऊँगी।' उन्होंने उत्तर दिया, 'प्रभु श्रीराम का काम पूरा कर लेने दो उसके बाद खा लेना।' इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वे भय से भयभीत नहीं है, उन्हें मृत्यु का भय नहीं है। सुरसा ने उन्हें खाने के लिये अपने मुख का विस्तार किया तो उन्होंने अपने शरीर का दोगुना विस्तार कर लिया। सुरसा भय है। भय विनय की भाषा नहीं समझता। भय को जीतने के लिये ही उन्होंने अपने शरीर का विस्तार किया। जब सुरसा ने अपने मुख का विस्तार सौ योजन किया तो उन्होंने बहुत छोटा रुप धारण कर लिया और सुरसा के मुख बंद करने से पहले ही बाहर निकल गये। यहां सुरसा ने निरन्तर मुख का विस्तार कर अपने अहंकार को प्रकट किया है। हनुमान भय को भयभीत कर यह सिद्ध कर चुके हैं कि मैं भयरहित हूँ। प्रारम्भ में सुरसा के अहंकार और ईर्ष्याभाव को बढ़ता देख अपने बल का प्रदर्शन करने के लिये उन्होंने अपने शरीर का विस्तार किया लेकिन बाद में उन्होंने इस बढत़े हुए अहंकार से टकराना उचित नहीं समझा। उनका प्रमुख कार्य तो सीतामाता की खोज करना था। हनुमानजी अतिलघुरुप धारण कर यानी अहंकार शून्य होकर सुरसा के मुख से बाहर निकल गये। शरीर का यह अतिलघुरुप उनकी बुद्धि चातुर्य का परिचायक है।

भय विनय की भाषा नहीं समझता। भय के सामने निडर होकर खड़े रहो। यदि आप डर गये तो वह आपको दबोच लेगा। जीवन में भयरुपी बाधा आने पर अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार शक्ति प्रदर्शन करो व अभिमानरहित होकर बुद्धि चातुर्य का प्रयोग कर बाधा से बचने का प्रयास करो। हनुमानजी ने विश्राम का आग्रह अर्थात् 'लालच' और सुरसारुपी 'भय' से मुक्ति पा ली है। आगे बढ़ने पर उन्हें सिंहिका नाम की राक्षसी मिलती है जो जल में परछाई को देख कर जीव को पकड़ लेती है। इसने अपनी माया द्वारा हनुमानजी को पकड़ने का प्रयास किया। हनुमानजी ने उसके कपट को पहचान लिया और इस तमोगुणी बाधा को मार कर समुद्र को पार किया। यहां सिंहिका राक्षसी छल की प्रतीक है, खतरनाक तमोगुणी बाधा है। जो भी अपने जीवन में श्रेष्ठता और उन्नति की ओर अग्रसर होता है तो यह छलरुपी खतरनाक तमोगुणी बाधा बाधक बन कर उसे ऊंचा उठने से रोकती है। तमोगुणी व्यक्ति दूसरों को कमजोर करने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसे छल कपट करने वालों से हमेशा सावधान रहना चाहिये। कार्य करते समय मार्ग में अदृश्य बाधाएँ आ सकती हैं। आपके आस-पास रहने वाले लोग छल कपट कर सकते हैं, कार्य में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिये हमेशा सचेत हो कर कार्य करें, किसी के छलावे में नहीं आवें। यदि आप धीरबुद्धि हैं तो आपको लक्ष्य से कोई नहीं डिगा सकता है, क्योंकि धैर्य ही आपका सबसे बड़ा मित्र है। लालच, भय और छल मनुष्य का लक्ष्य-भ्रष्ट कर देते हैं। हनुमानजी लालच, भय और छलरुपी बाधाओं को पार कर अपने लक्ष्य तक पहुँच गये हैं। यहां तक पहुँचने में उन्होंने अपनी प्रखर बुद्धि और धैर्य का परिचय दिया, इसलिये उन्हें 'मति धीरा' मतिधीर कहा गया है। अपने पराक्रम और धीरबुद्धि का सहारा लेकर ही इन्हें लंका में प्रवेश करना है।

धैर्य की मूर्ति हनुमानजी ने रात्रि के समय लंका में प्रवेश का निर्णय लिया। रात्रि में नगर निवासी सो जाते हैं, नगर रक्षक भी नींद के कारण बहुत चौकन्ने नहीं रह पाते हैं, ऐसे में माता की

खोज के लिये पूरे नगर की छानबीन आसान रहेगी। इस पर गहराई से विचार करने बाद- मसक समान रुप कपि धरी लंकहि चलउे सुमिरि नरहरी।।

नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहां लगि चारे ा।। रा.च.मा. ५/४/१-२-३

हनुमानजी ने मच्छर के समान रुप धारण किया और प्रभु श्रीराम का स्मरण कर लंका को चले। लंका के द्वार पर लंकिनी नाम की राक्षसी ने रोक कर कहा, 'मेरा निरादर कर कहां जा रहा है। हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहां तक जितने चोर हैं, सब मेरे आहार हैं।' लंकिनी वीरों से नहीं डरती थी, लेकिन कोई चोर सोने की लंका में प्रवेश कर चोरी नहीं करले, इसका भय उसे हमेशा सताता रहता था। लंकावासियों को चोरी के भय से मुक्त करने के लिये ही लंकिनी को लंका के प्रवेश द्वार पर नियुक्त किया गया था। हनुमानजी गुप्तचर हैं, छिप कर नगर में प्रवेश कर रहे हैं। चोर नहीं हैं, इसलिये निडर हैं। लंका में प्रवेश करते समय हनुमानजी ने लंकिनी को यह अवश्य कहा होगा कि यदि नगर में घुसने वाला प्रत्येक चोर तेरा आहार है तो भक्ति (सीतामाता) की चोरी कर नगर में प्रवेश करने वाले रावण को तूने अपना आहार क्यों नहीं बनाया? हनुमानजी ने आसक्तिरुपी लंकिनी को विरक्ति की ओर अग्रसर करने के लिये सत्संगरुपी मुक्का जड़ दिया। लंकिनी को ब्रह्माजी ने कहा था, 'जब तू वानर का मुक्का खाकर व्याकुल होगी तो समझ लेना कि राक्षसों का नाश होने वाला है।' हनुमानजी का मुक्का लंकिनी के लिये सत्संग बन गया। लंकिनी में यह भक्तिभाव भय के कारण उत्पन्न हुआ है अन्तःकरण की शुद्धता के कारण नहीं। लंकिनी कह रही है, 'श्रीरघुनाथजी को हृदय में धारण कर नगर में प्रवेश कीजिये, अपने सभी कार्यों को पूरा कीजिये।' लंकिनी आशीर्वाद दे रही है, लेकिन हनुमानजी इस भयरुपी भक्ति को धन्यवाद नहीं दे रहे हैं। घायल लंकिनी श्रीराम के दूत का सानिध्य पाकर खुश है। मायावी राक्षसों के बीच रहने वाली लंकिनी को पहले से ही पता था कि उसे वानर के मुक्के से व्याकुल होना है, तभी उसे मुक्ति भी मिलेगी। बहुत लम्बी प्रतीक्षा के बाद उसे क्षण मात्र का सत्संग का सुख प्राप्त हुआ है जो स्वर्ग और मोक्ष के सुख से बढ़ कर है। लंकिनी का जीवन तो धन्य हो गया है, लेकिन हनुमान जी ने लंकिनी को मुक्का मार कर परोक्षरुप से पूरी लंका को चोट मारी है।

प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सत्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। आप अनजान जगह पर या ऐसी जगह पर जा रहे हैं जहां आपके शत्रु रहते हैं, वहां हमेशा सचेत रहना बहुत जरुरी है। आप बलवान हैं, बुद्धिमान हैं, इसके उपरान्त भी आपके साथ धोखा हो सकता है । आपको नुकसान पहुँचाने की कुचेष्टा भी हो सकती है। इसलिये अनजान जगह पर हमेशा सावधान होकर कार्य करना चाहिये। शत्रु से सामना हो जाए तो उसे अपनी बुद्धिचातुर्य से सहृदय बनाने का प्रयास करना चाहिये। विपत्ति आने पर धैर्य ही आपका साथ देता है। धैर्य जवाब दे जाए तो अक्ल काम नहीं करती। हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रुप धारण कर लंका में प्रवेश किया प्रत्येक महल की खेाज की, रावण का पूरा महल देखा, लेकिन महलों में उन्हें माता जानकीजी नहीं दिखायी दी। रात्रि के समय उन्होंने प्रत्येक महल में मुनियों के मनों को भी मोह लेने वाली स्त्रियों को बहुत ही अस्त-व्यस्त अवस्था में देखा और मन ही मन विचार किया कि इस सुन्दरता को इस हालत में देख कर मेरा धर्म भ्रष्ट हो सकता है। ब्रह्मचर्यव्रत खंडित हो सकता है, लेकिन उनके मन में न तो अशुभ विचार आया और न ही किसी तरह का विकार उत्पन्न हुआ। किसी तरह का भटकाव नहीं। यह सब हनुमानजी के अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत के कारण ही सम्भव हो सका। रात्रि में अस्त-व्यस्त वस्त्र, नग्न, अर्धनग्न युवतियों और स्त्रियों को देख कर हनुमानजी को लगा कि उनका ब्रह्मचर्य व्रत खंडित हो गया है। 'मैं मरणोपरान्त प्रायश्चित करुंगा क्योंकि इस अवस्था में यदि एक गृहस्थ भी किसी परायी स्त्री को देख ले तो उसे भी दोषी माना जाता है, मैं तो एक ब्रह्मचारी हूँ।' हनुमानजी इन स्त्रियों और युवतियों में सुन्दरता को नहीं ढूँढ रहे हैं। इनके सौंदर्य की तरफ उनका ध्यान ही नहीं है। वे तो इन सब के बीच अपनी माता सीता को ढूँढ रहे हैं। जो मन माँ को ढूंढ रहा हो उसमें किसी तरह का विकार उत्पन्न नहीं हो सकता है। इन सभी स्त्रियों के देह उनके लिये शव के समान हैं। उनके हृदय में प्रभु श्रीराम का निवास है, इसलिये उस हृदय में किसी और का निवास सम्भव ही नहीं है। उनका मन विचलित नहीं है। प्रभु श्रीराम उनके ब्रह्मचर्य की रक्षा कर रहे हैं, ऐसे में उनका ब्रह्मचर्य व्रत कैसे भंग हुआ? व्रत का मूल तो मन है, देह नहीं। मन में किसी भी तरह का विकार नहीं है तो व्रत भंग होने का प्रश्न ही नहीं उठता। अनजाने में उनकी आंखों ने जो कुछ भी देखा, उससे यदि मन में विकार आ जाता तो क्या होता? हनुमानजी का सोच यही प्रदर्शित करता है कि ब्रह्मचर्य-व्रत के प्रति उनकी निष्ठा एवं जागरुकता कितनी गहरी है। उनकी आंखों ने अनजाने में जो कुछ भी देखा उसके लिये भी वे अपने को दोषी मान कर मरणोपरान्त प्रायश्चित करने की बात कह रहे हैं। आज इस घोर कलयुग में चारों तरफ अनाचार, दुराचार और व्यभिचार खुले आम हो रहा है। नग्नता और सौंदर्य को देख कर आजकल युवक-युवतियों का व्यवहार उस सौंन्दर्य लोभी शलभ (पतिंगे) जैसा हो गया है, जो दीपक की लौ को देख कर सुख-भोग की इच्छा से उसके पास जाता है और जल कर भस्म हो जाता है। विषय-भोगी युवक-युवतियाँ भी अपने को विषय-भोगरुपी आग में झौंक कर अपना नैतिक पतन कर रहे हैं। यदि सभी युवक-युवतियाँ हनुमानजी के सोच को अपने अन्दर गहरा उतार लें, अपने मन में धारण कर लें, तो व्यभिचार, अनाचार से मुक्ति पाना आसान हो जायगा। हनुमानजी के सदाचार, सद्गुणों व आदर्श मर्यादा को आडम्बर मत समझो। हनुमानजी को आदर्श मान कर व सच्चे मन से उनकी भक्ति में संलग्न होकर आज का तरुण समाज मन में उत्पन्न होने वाले कुविचारों एवं विकारों से मुक्ति पा सकता है। अन्त में हनुमानजी को एक ऐसा महल दिखायी दिया जिसमें भगवान का मंदिर था, आँगन में तुलसी का पौधा लगा हुआ था। घर के बाहर श्रीरामजी के धनुष-बाण के चिन्ह अंकित थे। यह घर किसी सज्जन पुरुष का हो सकता है। जल्दबाजी ठीक नहीं, उत्तेजना और जोश के बजाय धैर्य का दामन पकड़ कर ही हनुमान आगे बढ़ना चाहते हैं। उनके मन में विचार आता है कि इस माया नगरी में ऐसा भवन 'रामदूत' को फँसाने के लिये भी बनाया जा सकता है। इस शंका का निवारण कैसे हो! तभी विभीषण जागे। उठते ही राम-नाम का सुमिरन किया तो हनुमानजी समझ गये कि ये सज्जन पुरुष हैं। हनुमानजी ने इनसे परिचय करना उचित समझा। विप्ररुप धारण कर उन्होंने विभीषण को पुकारा। विभीषण उनके पास आये, प्रणाम किया, कुशलक्षेम पूछी और कहा, 'हे ब्राह्मण देव! अपनी कथा समझा कर कहिये।' विभीषण सज्जन हैं, यह जानकर वे अपने वास्तविकरुप में आ गये। यहां अपनत्व भाव है, यहां 'मैं' भगवान हूँ का अहंकार नहीं है, यहां भक्ति का प्रतीक तुलसी का पौधा है, यह आध्यात्मिक परिवार है, पूरा परिवार राम भक्त है की जानकारी होने पर ही हनुमानजी ने अपनी यात्रा का प्रयोजन उन्हें बताया। यहां वास्तव में दो संतों का मिलन हुआ। सीता माता कहाँ हैं, यह जानकारी प्राप्त कर हनुमानजी अशोक वाटिका पहुँच गये। अनजान लोगों के बीच या नई जगह पर अपनी असली पहचान व प्रयोजन को तब तक छिपाए रखना चाहिये, जब तक आप वास्तविकता से परिचित नहीं हो जाएं और जो कुछ आप चाहते हैं, आपको प्राप्त न हो जाए। उत्तेजना और जोश में आकर अपना भेद किसी भी अपरिचित को नहीं देना चाहिये। धैर्यपूर्वक कार्य करने से ही परिणाम की प्राप्ति होती है, जल्दबाजी करने से काम बिगड़ सकता है। जब हनुमानजी ब्राह्मण का रुप धारण कर विभीषण से मिलते हैं तो विभीषण उनसे पूछते हैं, 'क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं अथवा आप स्वयं प्रभु श्रीराम हैं जो मुझे घर बैठे बड़भागी बनाने आये हैं?' यह सुन कर हनुमानजी ने अपना परिचय दिया। विभीषण कहते हैं, 'मैं तो एक तामस हूँ। क्या कभी प्रभु श्रीराम मुझ पर भी कृपा करेंगे?' हनुमानजी ने बहुत ही सहज होकर शालीनता के

साथ उत्तर दिया, 'मैं कौन सा बड़ा कुलीन हूँ, सब प्रकार से नीच हूँ फिर भी -

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।। रा.च.मा. ५/७

'हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ, पर श्रीराम ने मुझ पर भी कृपा की है।' भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमानजी के दोनों नत्रे ो में जल भर आया। हनुमानजी विनम्र हैं, निरभिमान हैं। विभीषण को अपना परिचय एक साधारण बंदर कह कर देते हैं। उन्होंने अपने महापौरुष का जिक्र तक नहीं किया। हनुमान अतुलित बल के धाम हैं, निर्मल हृदय संत हैं, श्रेष्ठ भक्त हैं, आदर्श सेवक हैं। इन सभी विशेषताओं से परिपूर्ण हनुमानजी का प्रमुख आभूषण तो विनम्रता ही है। इस वार्तालाप में हनुमानजी ने विभीषण को जो सुख प्रदान किया है, अनुकरणीय है। हनुमानजी कुलीन हैं, श्रेष्ठ हैं, अपने स्वामी के सवे क हैं। उन्होंने विभीषण को अवगत कराया कि प्रभु तो अपने सेवक से प्रेम करते हैं, चाहे वह कुलीन हो या कुलहीन। यहाँ वार्तालाप के समय हनुमानजी विभीषण को सखा, भ्राता कह कर पुकारते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को हनुमानजी की तरह निरभिमान एवं सहृदय होना चाहिये। हनुमानजी की शालीनता, धैर्य, बड़प्पन और अपने स्वामी के प्रति प्रेम वास्तव में अनुकरणीय है। सहनशीलता और सम्मान करने की प्रवृति ही व्यक्ति को महान बनाते हैं। सीता माता इन राक्षसों के बीच अशोक वाटिका में अपने दिन कैसे काट रहीं होंगी? राक्षसों की ताड़ना को कैसे सहन करती होंगी? इन्हीं विचारों को मन में धारण कर हनुमानजी अशोक वाटिका में पहुँच गये। पेड़ के पत्तों में अपने लघुरुप को छुपा कर सब कुछ देखते रहे। सीता माता असहाय हैं, दुःखी हैं, यह देख बहुत दुःखी हुए लेकिन धैर्य धारण कर सब कुछ देखते रहे। उन्होंने मन ही मन माता को प्रणाम किया। कुछ देर बाद वहां महाअभिमानी रावण आया। उसके साथ उसकी प्रिय रानी मंदोदरी व बहुत सी दासियाँ भी थी। उसने सीतामाता को धमकाया, प्रलोभन दिये, भयभीत किया, मारने दौड़ा तो मंदोदरी ने उसे रोक दिया। रावण क्रोध करता रहा और सीतामाता उसे धिक्कारती रहीं। हनुमानजी के मन में सीता माता के प्रति आदर भाव था, उनके दर्शन के लिये व्याकुल थे। रावण से युद्ध करने की सामर्थ्य भी थी, लेकिन उनका पहला उद्देश्य था लंका की पूरी जानकारी, रावण की

शक्ति व उसकी सैन्य शक्ति की पूरी जानकारी प्राप्त करना। उन्होंने मौन रहना उचित समझा। हनुमानजी अकेले नहीं हैं। उनके पास धैर्य है, शांति है, अक्ल से काम करने की क्षमता है। आपत्ति के समय धैर्य के साथ मौन भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। जब तक शत्रु पक्ष की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हो जाय, तब तक मौन रहना व छिप कर रहना ही श्रेयकर होता है। सीता माता राक्षसी स्त्रियों के सख्त पहरे में रहती हैं। रावण इनसे मिलने के लिये हमेशा मंदोदरी व दासियों के साथ गया। उन्हें डराया, धमकाया, लेकिन जोर-जबरदस्ती कभी नहीं की। यहां श्रीराम के प्रबल शत्रु का यह उत्तम चरित्र देश के युवा वर्ग के लिये आत्मसात् करने योग्य है, अनुकरणीय है।

रावण चला गया है। त्रिजटा नाम की राक्षसी इस विपत्ति में सीतामाता को अपना पूरा सहयोग दे रही है। त्रिजटा ने एक भयंकर स्वप्न का जिक्र कर सभी राक्षसियों को भयभीत कर दिया है। भयभीत राक्षसियाँ सीतामाता के चरणों में गिर कर क्षमा माँग रही हैं। सीतामाता त्रिजटा को मां कह कर सम्बोधित करती हैं। सीता माता दुःखी हैं अपना शरीर छोड़ना चाहती हैं। त्रिजटा से चिता तैयार कर उसमें आग लगाने की बात कहती हैं तो त्रिजटा कहती है, रात हो गई है अभी अग्नि नहीं मिलेगी। उन्हें प्रभु श्रीराम का प्रताप, बल और सुयश सुना कर अपने घर चली जाती है। बहुत बुरे लोगों के बीच बहुत अच्छे लोग भी होते हैं। ऐसे में सभी को बुरा समझ लेना उचित नहीं होगा। त्रिजटा का चरित्र यही शिक्षा प्रदान करता है कि हमें अपने जीवन में अच्छे और बुरे की पहचान करने की कला अवश्य सीखनी चाहिये। यदि बच्चों में बचपन से ही अच्छे संस्कार डाले जाएँ तो वे निश्चितरुप से सुसंस्कृत, सदाचारी और आदर्श इंसान बनेंगे। त्रिजटा के अच्छे संस्कार एवं राम प्रभु के प्रति अनुराग पैतृक गुण था। बचपन से ही रामकथा सुन-सुन कर उसका चरित्र निर्माण हुआ था। त्रिजटा राक्षसी का यह चरित्र सभी के लिये अनुकरणीय होना चाहिये। हनुमानजी ने सीतामाता के सामने प्रभु श्रीराम की मुद्रिका डाल दी। सीता माता अशोक वृक्ष से अंगार मांग रही थी, लेकिन उनकी आंखों के सामने प्रभु श्रीराम की मुद्रिका पड़ी थी। इसके बाद हनुमानजी ने त्रिजटा की अच्छाइयों का अनुसरण करते हुए श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करना शुरु कर दिया। सीता माता के लिये प्रभु श्रीराम का सुयश बहुत बड़ा सहारा है, इसकी जानकारी उन्हें त्रिजटा से ही मिली थी। सीताजी ने कहा, 'अमृतरुपी राम-कथा सुनाने वाला सामने प्रकट क्यों नहीं होता?' तब हनुमानजी सीता माता के सामने प्रकट हुए और उन्हें 'रामदूत' होने का पूर्ण विश्वास दिलाया। वे सत्य की शपथ लेकर कहते हैं, ''मैं 'रामदूत' हूँ''।

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।

जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम ते प्रेमु राम कें दूना।।

रा.च.मा. ५/१४/९-१० 'हे माता! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुःखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिये (मन छोटा कर के दुःख न कीजिये)। श्रीराम चन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है।'

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

रा.च.मा. ५/१५/७-८

प्रभु कहते हैं, वह मन सदा तेरे पास ही रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ

ले। प्रभु का यह संदेश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गयीं। उन्हें शरीर की सुध न रही। हनुमानजी सीता माता को दुःखी देख कर कहते हैं, 'हे माता! प्रभु श्रीराम आपसे अधिक दुःखी हैं। मन का दुःख कहने से घट जाता है, पर किससे कहें? उनका मन तो सदा आपके पास ही रहता है। इसलिये उनकी व्यथा को कोई नहीं जान पाता है। इतना सुनते ही सीता माता अपना दुःख भूल गयीं।

श्रीराम ने हनुमानजी से कहा था, 'सीता से पहले मरे ा बल कहना फिर विरह (प्रेम)।' यहां हनुमानजी ने पहले विरह संदेश सुनाया है। विरह संदेश उसी को अच्छा लगता है जो विरह भोग रहा हो, वियोग सह रहा हो। जब हनुमानजी ने लंका से वापस आकर प्रभु श्रीराम को चूड़ामणि दी और सीता माता का संदेश सुनाया तो प्रभु की आंखों में जल भर आया। हनुमानजी कहते है, 'प्रभो! माता के लिये आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किवाड़ है, नेत्रों को अपने चरणों में लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है, फिर प्राण जायँ तो किस मार्ग से? माता की विपत्ति बहुत बड़ी है। वह बिना कही ही अच्छी है।' लंका में सीता दुःखी है यह जानकर श्रीराम दुःखी हो गये।

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

रा.च.मा. ५/३२/३-४

तब हनुमानजी ने कहा- 'हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसों की बात ही कितनी है? आप शत्रु को जीत कर जानकीजी को ले आवेंगे।' हनुमानजी के मुँह से यह सुनकर कि माता सीता हमेशा आपका स्मरण करती रहती हैं इसलिये उन पर विपत्ति आ ही नहीं सकती, श्रीराम अपना दुःख भूल गये। हनुमान के मुँह से श्रीराम का संदेश सुन कर सीताजी अपना दुःख भूल जाती हैं। यहाँ हनुमानजी का संदेश कौशल अनुकरणीय है। सीता माता के विरह को हनुमानजी ने बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रभु श्रीराम तक पहुँचाया है, और शत्रु के साथ युद्ध कर सीता माता को वापस लाने का संकेत भी दे दिया है। हनुमान कह रहे हैं, सीता माता तो आपके नाम के बल पर ही जी रही हैं, विरह की आग अब असह्य हो गयी है। महाकवि सूरदास के काव्य 'सूर सागर' में हनुमान प्रभु श्रीराम से कह रहे हैं - रघुपति बेगि जतन अब कीजे। बाँधे सिन्धु सकल सैना मिलि, आपुन आयसु दीजै।। तब लौं तुरत एक तौ बाँधौ, म-पासाननि लाइ।

द्वितिय सिन्धु सिय-नैन-नीर ह्वै, जब लौं मिलै न आइ।।

पद - 554 हे प्रभु ! शीघ्र ही कुछ जतन कीजिए। सारी सेना के साथ इस सागर को बाँध कर लंका पहुँचने का जतन कीजिए। क्‍योंकि वहाँ सीता माता के आँसुओं से एक और विशाल सागर प्रवाहित हो रहा है जो इस सागर से भी ज्‍यादा वृहत्‌ है, शीघ्रता से इस सागर को पार कर उस महासागर का निर्माण रोकिये। सीता माता के नेत्रों से प्रवाहित हो रहा सागर कहीं इस सागर से मिल न जाय। महाकवि सूरदासजी ने भी अपने इस काव्‍य में हनुमानजी के संदेश कौशल का वर्णन बहुत ही प्रभावी ढंग से किया है। उत्‍साही हनुमानजी के लिए कोई भी कार्य कठिन और दुष्‍कर नहीं है। वे अतिशीघ्र सीताजी का शोकहरण करना चाहते हैं। पत्नी के बिना पति और पति के बिना पत्नी का जीवन कितना अधूरा हो जाता है, जीवन के सभी सुख उनके लिये कितने नीरस हो जाते हैं, यह बात साधारण जन के समझ में आ जानी चाहिये। पति पत्नी दोनों मिलकर गृहस्थ हैं। दोनों को एक दूसरे का साथ मिलेगा, प्रेम मिलेगा, तभी कुटुम्ब चलेगा।

श्रीराम की व्यथा सुन कर सीताजी अपना दुःख भूल जाती हैं, और सीताजी की व्यथा सुन कर श्रीराम अपना दुःख भूल जाते हैं। यहां दुःख के समय हनुमानजी ने जिस संदेश कौशल का उपयोग किया है उससे दोनों के अशान्त मन को शान्ति मिलती है। इस संदेश कौशल को अपने जीवन में उतार कर, हम एक दूसरे के दुःख को निश्चितरुप से कम कर सकते हैं। इस अहंकार के युग में

यह संदेश कौशल लोकहित में अनुसरण करने योग्य है। हनुमानजी ने सीता माता से कहा, 'मैं राम दूत हूँ'। मैं आपको अभी यहां से ले जा सकता हूँ लेकिन प्रभु की आज्ञा नहीं है। सीता माता कहती हैं, 'हे पुत्र! सभी वानर तुम्हारे समान नन्हे-नन्हें से होंगे, लेकिन राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा हैं।' मां का संदेह मिटाने के लिये हनुमानजी ने अपना पौरुषमय विराटरुप प्रकट किया, लेकिन मां का वात्सल्य व आशीर्वाद पाने के लिये पुनः अति लघुरुप धारण कर लिया। अशोक वाटिका में सीतामाता को सान्त्वना देने वाले महावीर अपने को शाखामृग (वानर) कहते हैं। समय के अनुसार अपना पौरुषमय विराटरुप व अतिलघुरुप का प्रदर्शन, विशालता और लघुता का एक अद्भुत उदाहरण है।

छोटे छोटे बच्चे उपदेश से नहीं अनुकरण से सीखते हैं। प्रत्येक बालक की प्रथम गुरु माता ही होती है। आदर, स्नेह, विनम्रता, निरभिमानता, दयाभाव और अनुशासन जैसे विशिष्ट गुणों का समावेश अपने बच्चों में माता ही करती है, कर सकती है। माता-पिता का अभिवादन और उनकी सेवा का संस्कार बहुत महत्वपूर्ण है। माता-पिता का आदर व सवे ा का संस्कार सबसे श्रेष्ठ माना गया है। माता सर्वतीर्थमयी है तो पिता सम्पूर्ण दवे ताओं का स्वरुप है। जीव, माता का सहारा लेकर ही जीवन धारण करते हैं। माता-पिता और गुरु को 'प्रत्यक्ष दवे ता' का दर्जा दिया गया है। इनकी सेवा करने से अर्थ, धर्म, काम, की प्राप्ति व तीनों लोकों की आराधना हो जाती है। इनकी अवहेलना कर अप्रत्यक्ष देवताओं की आराधना करने से इच्छित फल प्राप्त नहीं हो सकते हैं। माता पिता की सेवा करने से आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। यहां हनुमानजी का सीता माता के प्रति प्रेम, उनकी लघुता और विशालता का अद्भुत समन्वय सभी के लिये अनुकरणीय प्रसंग हैं।

हनुमानजी रामदूत बन कर सीता माता से मिले, अशोक वाटिका को उजाड़ दिया, रावण पुत्र अक्षय कुमार को मार दिया, लंका-दहन कर दिया। हनुमानजी इन कार्यों के लिये लंका नहीं गये थे। उनकी यात्रा का प्रयोजन तो सीतामाता का पता लगाना था। उन्होंने लंका में शक्ति प्रदर्शन क्यों किया? शक्ति प्रदर्शन के लिये उनके पास अस्त्र-शस्त्र भी नहीं थे। वाटिका से पेड़ उखाड़े और उन्हीं से राक्षसों को मार गिराया। रावण ने उनकी पूंछ को जलाने का आदेश दे दिया। उनकी पूंछ को जलाने में इतना कपड़ा, घी और तेल लगा कि नगर में तेल, घी और कपड़े की कमी पड़ गयी। उन्होंने लंका की हवन सामग्री द्वारा ही लंका का दहन कर दिया। हनुमानजी ने इस सिन्दूरी क्रान्ति द्वारा लंका के मल को जला कर उसे शुद्ध कर दिया। लंका जली नहीं, शुद्ध हो गयी। हनुमानजी के शक्ति प्रदर्शन से लंकावासियों में इतना भय व्याप्त हो गया कि सबके मुँह से एक ही बात निकल रही है, यह वानर नहीं है, वानर के रुप में कोई देवता है। इस शक्ति प्रदर्शन से राक्षसियों के गर्भ गिर गये, राक्षसी सेना का मनोबल टूट गया और रावण भी मन ही मन बहुत भयभीत हो गया। वास्तव में हनुमानजी ने यह शक्ति प्रदर्शन लंकावासियों को अपने स्वामी का परिचय देने के लिये किया था। श्रेष्ठ कार्यकारी हनुमानजी ने परिस्थितियों के अनुसार स्वतः ही सौंपे गये दायित्व का विस्तार कर लिया। सीता माता आश्वस्त हो गयीं, रावण भयभीत हो गया।

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।। दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

रा.च.मा. ५/३६/३-४

दूतियों से नगर निवासियों के वचन सुन कर मंदोदरी बहुत व्याकुल हो गयी, जिसके दूत के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता उसके स्वयं नगर में आने पर कौन भलाई है। यह सब सुन कर मंदोदरी अपने पति रावण से कहती है, 'श्रीहरि से विरोध छोड़ दीजिये।' सबसे पहले शत्रु की कुमति को हरने का प्रयास कीजिये। प्रयास असफल होने पर अपनी

शक्ति का परिचय कुछ इस तरह दीजिये कि शत्रु का मनोबल पूरी तरह टूट जाए।

श्रेष्ठ कार्यकारी देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार सौंपे गये दायित्व का विस्तार कर लेता है। जीवन में श्रेष्ठ कार्यकारी बनने के लिये, हनुमानजी की तरह, समयानुसार, सौंपे गये दायित्व में परिवर्तन व विस्तार कर लेना चाहिये। हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध हुआ। मेघनाद ने उत्तेजना में मंत्रसिद्ध अस्त्र, ब्रह्मास्त्र का दुरुपयोग किया। ब्रह्माजी वंदनीय हैं। हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं इस ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो इसकी महिमा मिट जायेगी। ब्रह्मास्त्र से हनुमानजी मूर्छित हुए, नागपाश में बंधे और उन्हें रावण के सामने ले जाया गया। वीर अर्जुन भगवान शिव से पशुपत अस्त्र प्राप्त करने के लिये तपस्या कर रहे थे। एक दिन एक लहुलुहान जानवर उनके सामने गिर गया। दयाभावी अर्जुन अपनी तपस्या छोड़ कर उस घायल पशु की सेवा में जुट गये। तभी एक किरात ने आकर कहा, 'यह जानवर मुझे दे दो, यह मेरा शिकार है।' अर्जुन ने कहा, 'शरण में आये इस घायल पशु की प्राण रक्षा मेरा परम धर्म है।'

किरात ने जोर देकर कहा, 'शिकार मरे ा है, वापस कर दो। यदि वापस नहीं करते हो तो मुझसे युद्ध करो।' अर्जुन युद्ध करने के लिये तैयार हो गये। दोनों के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में किरात भारी पड़ा। अर्जुन ने मंत्र सिद्ध अस्त्र का उपयोग करने की बात सोची लेकिन तभी उनके मन में विचार आया कि किरात को मारने के लिये मंत्रसिद्ध अस्त्र का उपयोग आसपास के पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों को भी नष्ट कर देगा और मुझे निर्दोषों की हत्या का पाप लगेगा। अर्जुन ने अपनी हार स्वीकार कर ली, और शिकार किरात को वापस कर दिया। किरात जोर से हँसा और बोला, 'मंत्र सिद्ध अस्त्र क्यों नहीं चलाते हो?' धीर गम्भीर अर्जुन ने कहा, 'मैं एक तुच्छ दोषी को मारने के लिये निर्दोषों की हत्या नहीं कर सकता।' अर्जुन के सामने खड़ा किरात अचानक किरातपति बन गया। साक्षात् भगवान शिव को सामने खड़ा देखकर अर्जुन नतमस्तक हो गये। भगवान शिव ने कहा, 'मैंने यह देख लिया है कि तुम अपने स्वार्थ के लिये सिद्धमंत्र अस्त्र का दुरुपयोग नहीं कर सकते हो। निर्दोष प्राणियों और वनस्पतियों की प्राण रक्षा के लिये तुमने अपनी पराजय स्वीकार कर यह सिद्ध कर दिया है कि तुम सिद्धमंत्र अस्त्र रखने के अधिकारी हो।'

अर्जुन ने शिवजी से प्राप्त पशुपत अस्त्र का दुरुपयोग कभी नहीं किया। जब अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिये ब्रह्मास्त्र प्रयोग किया तो मजबूर होकर अर्जुन को पशुपत अस्त्र का सहारा लेना पड़ा। कार्य सम्पादन कुछ इस तरह किया जाए कि किसी की महिमा या गरिमा को ठेस नहीं पहुँचे। श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा दूसरों की महिमा व दूसरों के सम्मान के बारे में चिन्ता करते हैं। दूसरों के प्रति आदरभाव व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है। इस प्रसंग में हनुमानजी ने जिस बड़प्पन का परिचय दिया है, जीवन में अपनाने योग्य है। लंका दहन के समय हनुमानजी ने विशालकाय रुप धारण किया, लेकिन उनका शरीर इतना हलका हो गया कि आकाश से जा लगे। भारी शरीर में इतनी फुर्ती व इतना हलकापन कि एक महल से दूसरे महल पर चढ़ कर पूरी लंका जला डाली। हनुमानजी ने यह कार्य पूर्णतः अहंकाररहित रह कर किया। यहां विशालकाय शरीर का हलकापन व फुर्ती उनके निरभिमान होने का परिचायक है। 'देह विसाल परम हरुआई'- विशालकाय देह की फुर्ती के लिये प्रयुक्त शब्द

'हरुआई' यानी हलकापन उनके अभिमानरहित आचरण का परिचायक है। रावण ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा, कानों से सुना, पत्नी ने समझाया, लेकिन सत्य से साक्षात्कार होने के उपरान्त भी उसने अपने हठ का त्याग नहीं किया। उसका अभिमान और अहंकार यथावत् बना रहा। इसका परिणाम क्या हुआ सभी जानते हैं। ब्रह्माजी श्रेष्ठ हैं, वन्दनीय हैं, यह सोच कर ही हनुमानजी ब्रह्मास्त्र से मूर्छित हुए, लेकिन रावण के पास पहुँचने से पहले ही उन्हें होश आ गया था। उन्होंने अपनी रक्षा क्यों नहीं की? बंधन से मुक्त होने का प्रयास क्यों नहीं किया? उनके लिये यह बंधन ही रावण तक पहुँचने का माध्यम था। इसी बंधन ने रावण को लंका के सर्वनाश का पूर्वाभास कराया। लंकादहन, हनुमानजी का भयरहित एवं अभिमानरहित शौर्य प्रदर्शन था, जिसे देख कर अभिमानी रावण भयभीत हो गया। जब अंगद दूत बन कर रावण के पास गये तो रावण ने श्रीराम की सेना का मजाक उड़ाया, लेकिन लंका का दहन करने वाला वीर हनुमान उसके दिमाग में छाया हुआ था। हनुमानजी की प्रशंसा करते हुए रावण ने कहा, 'राम की सेना में एक ही वानर महान योद्धा है जिसने लंका दहन किया था।' कौन है रावण? जिसने अपने सिर काट कर शिवजी को चढ़ाये, दस हजार वर्ष तक तपस्या की। ब्रह्माजी सब देवों के साथ उसके सामने प्रकट हुए और वरदान दिये। रावण की तपस्या धन, वरदान और कामनाओं की पूर्ति के लिये थी। इस राजसिक प्रवृत्ति के भक्त ने जीवन में संयम और सदाचार को नहीं अपनाया। रावण से अधिक भक्ति किसने की? भक्ति करके रावण, राक्षस से महाराक्षस बन गया। उसके पास भक्ति थी, शक्ति थी, इसके साथ उसकी महान दुष्टता जुड़ी हुई थी। महान शक्तिशाली देवता भी उससे डरते थे। विलासिता और अंहकार का प्रचारक था रावण। उसकी दुष्टता को देख कर भगवान इतने नाराज, नाखुश हुए कि उसे मारने के लिये उन्हें अवतार लेना पड़ा। रावण की सभा में हनुमानजी ने रावण का वैभव देखा और उसके तेज को देख कर प्रभावित हो गये। हनुमानजी ने मन ही मन विचार किया कि यदि रावण अपनी राक्षसी प्रवृत्ति को छोड़ दे तो त्रिलोकी का शासन करने की योग्यता रखता है। तब हनुमान कहते हैं, 'हे रावण! तुम अभिमान छोड़ कर मेरी सीख सुनो। अपने कुल में पुलस्त्य ऋषि को याद करो, अन्याय, अत्याचार करना छोड़ दो। अपने देवतास्वरुप पूर्वजों को याद करो। दुष्टता करने व दानव बने रहने में तुम्हारा हित नहीं है। तुम अपने आप को परमात्मा मत समझो, प्रभु श्रीराम के चरण-कमलों को अपने हृदय में धारण कर लंका का अचल राज करो।' इतना समझाने के बाद भी रावण अहंकार एवं अज्ञान भरी वाणी ही बोलता है। वह कहता है, 'यह वानर दयनीय नहीं, दुर्दनीय है, इसकी पूँछ में आग लगा दो।' रावण विद्वान है, यह सोच कर सद्गुणों की खान हनुमानजी उसका उद्धार करना चाहते हैं। रावण से वार्ता करने के बाद हनुमानजी समझ गये कि रावण दुर्जन है, दूसरों को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य की पू`िर्ति के लिये भक्ति करता है, प्रकृति से तामसिक है, इसलिये इसकी कुमति का हरण सम्भव नहीं है। रावण की लंका जल गयी लेकिन उसकी कुमति यथावत् बनी रही। उसके दिलो दिमाग में भय छा गया, लंका के सभी निवासी सुख की नींद सोना भूल गये, फिर भी रावण को सद्बुद्धि नहीं आयी। हनुमानजी ने रावण को प्रभु श्रीराम के प्रताप से अवगत कराया। इसके पीछे एक उद्देश्य यह भी था कि अब रावण सीता माता को भयभीत करने की हिम्मत नहीं करे।

जीवन में हनुमानजी की तरह संयम, सदाचार, परोपकार जैसे गुणों से परिपूर्ण होकर बिना किसी स्वार्थ के अपना कर्तव्य पालन करें। अभिमानरहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करें, रावण की तरह नहीं। जीवन में सात्विक भक्त बन कर, निष्ठापूर्वक भगवान की पूजा करें। भगवान सदाचारी की पूजा को ही स्वीकार करते हैं। स्वयं को महान समझने वाले व्यक्ति को प्रभु के चरणों में स्थान नहीं मिल सकता है। आपके सामने आपका दुश्मन खड़ा है, विद्वान है, लेकिन अभिमानी है, अहंकारी, दुष्ट प्रकृति का है। हनुमानजी की तरह उसे सुमति प्रदान करने का प्रयास कीजिये। यदि ऐसा प्रयास करने पर भी उसका हृदय परिवर्तन नहीं होता है तो उसके साथ वही व्यवहार कीजिये जो हनुमानजी ने रावण के साथ किया। यदि आप सद्गुणों की खान हैं तो आप अत्याचार, अन्याय के खिलाफ कड़ा कदम उठा सकते हैं, क्योंकि अत्याचार और अन्याय को सहते रहना भी धर्म विरुद्ध आचरण है। हनुमानजी सीता माता का पता लगा कर वापस लौट आये हैं। निरभिमान एवं विनम्र हनुमान ने सबसे पहले सीतामाता से सम्बन्धित सारी जानकारी रामदल के वरिष्ठों को उपलब्ध करायी। हनुमानजी ने क्या किया, कैसे किया की पूरी जानकारी जामवंतजी ने श्रीरघुनाथजी को दी। हनुमानजी ने अपने मुख से प्रभु को कुछ भी नहीं बताया। जामवंतजी के मुख से श्रीराम ने जो कुछ सुना, उसे कुछ इस तरह व्यक्त किया -

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं काउे सुर नर मुनि तनुधारी।।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मारे ा।।

रा.च.मा. ५/३२/५-६ हे हनुमान! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी दवे ता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं

है। मैं तेरा प्रत्युपकार तो क्या करुँ, मरे ा मन भी तरे सामने नहीं हो सकता।

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचारि मन माहीं।।

पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

रा.च.मा. ५/३२/७-८ हे पुत्र! 'सुन, मैंने मन में खूब विचार करके देख लिया है कि मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानजी को देख रहे हैं। नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और

शरीर अत्यन्त पुलकित है।' यह सब देख कर हनुमानजी कहते हैं-

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

रा.च.मा. ५/३३/९

'यह सब तो, हे रघुनाथजी! आपका ही प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है। हनुमानजी कहते हैं, 'जिस पर आप प्रसन्न हों उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है।' प्रभु श्रीराम जब हनुमानजी की प्रशंसा कर रहे थे तो उनकी नजर श्रीराम के मुख पर ही टिकी हुई थी। इस पर प्रभु ने चुटकी ली। हनुमान! 'क्या तुमने अपनी उपासना का स्थान बदल लिया है?' हनुमानजी ने विनम्र होकर उत्तर दिया, 'प्रभु आपने नारदजी की प्रशंसा की तो उन्हें बंदर स्वरुप प्रदान किया। मैं बंदर हूँ, इस प्रशंसा के फलस्वरुप मुझे कौन सा स्वरुप प्राप्त होगा, यह जानने के लिये ही आपके चेहरे के हावभाव पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ।' प्रशंसा सुन कर अहंकार होना व गिरना (पतन) स्वाभाविक ही है। ऐसे में इधर-उधर गिरने के बजाय प्रभु के चरणों में गिरना ही श्रेयकर है। यहां हनुमान ने शरणागति योग का सहारा लिया। तुरन्त प्रभु के चरणों में गिर कर प्रभु की निश्चल भक्ति कृपा प्राप्त कर ली।

यहां प्रभु श्रीराम ने पुनः चुटकी ली। हनुमान! 'मैं तो तुम्हारे बारे में यही सुनता आया हूँ कि तुम बहुत ज्ञानी हो। मैं तुम्हें अपने चरणों से उठा कर हृदय से लगाना चाहता हूँ लेकिन तुम उठते ही नहीं हो। तुम चरण और हृदय में भेद नहीं कर सकते, कैसे ज्ञानी हो? तुम्हारा ज्ञान अपरिपक्व है और मन में भेद बुद्धि बनी हुई है।' निष्काम सेवाभावी हनुमानजी ने बहुत ही विनम्र शब्दों में उत्तर दिया कि सच्चा ज्ञान तो वही है जहाँ भेद नहीं रहता। आप कह रहे हैं, मुझे चरण और हृदय में भेद नहीं करना चाहिये, तो फिर मुझे अपने चरणों में ही रहने दीजिये। यदि मैं आपके हृदय से लग जाऊँ तो चरण छूने के लिये मुझे नीचे आना पड़ेगा और चरणों में स्थान पाने पर मेरे मन में हृदय से लगने की जिज्ञासा हमेशा बनी रहेगी। जीवन में हमेशा उत्थान का अवसर प्राप्त होगा, पतन का नहीं।

यहां हनुमानजी के कथन में मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं ऐसा कर सकता हूँ जैसा अहंकार नहीं है। उनका व्यवहार कर्तापन 'मैंने' के अहंकार से पूर्णतः शून्य है। यहाँ कर्तव्य, निष्ठा, निष्काम सेवाभाव को प्रमुखता प्राप्त है। मेरी इसमें बड़ाई कुछ भी नहीं है, सब प्रभु का प्रताप है। इस अहंकारशून्य बर्ताव के कारण ही हनुमानजी को निश्चल भक्ति कृपा प्राप्त हुई है। अर्जुन के रथ पर श्रीकृष्ण विराजमान हैं तो रथ की धर्मध्वजा पर महावीर हनुमान! कौरवों की सेना से जैसे ही कर्ण बाण मारता तो कृष्ण कहते, 'वाह कर्ण वाह!' यह बात अर्जुन को अच्छी नहीं लगी। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं, मैं बाण मारता हूँ तो कर्ण का रथ चार सौ, पाँच सौ कदम पीछे खिसक जाता है और कर्ण के बाण से मरे ा रथ चार पाँच कदम पीछे खिसक रहा है। इस सत्य को आप अपनी आँखों देखकर भी कर्ण की तारीफ कर रहे हैं! कृष्ण ने कहा, 'जो कुछ देख रहा हूँ उसी की तारीफ कर रहा हूँ।'

कृष्ण रथ से नीचे उतर गये। उन्होंने हनुमानजी को भी धर्मध्वजा से नीचे उतरने को कहा। रथ में अर्जुन अकेले रह गये। उधर से जैसे ही कर्ण ने बाण मारा, अर्जुन का रथ पता नहीं कहां गायब हो गया। हनुमानजी रथ को वापस लेकर आये तो कृष्ण ने अर्जुन से पूछा, तुम्हारे रथ में मैं और हनुमानजी बैठे थे तब कर्ण के बाण से तुम्हारा रथ चार पांच कदम पीछे खिसक रहा था। जैसे ही हमने रथ छोड़ा तो उसके बाण से तुम्हारा रथ ही गायब हो गया। अब तुम ही बताओ, वीर कौन है? दोनों ओर की सेना में मेरे से बड़ा वीर कोई नहीं है, मैं ही सबसे बड़ा वीर हूँ का अहंकार भाव, जो अर्जुन के मन में पैदा हो गया था चूर-चूर हो गया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस अभिमान भाव को पढ़ लिया था। बुद्धि पर अहंकार, अभिमान का पर्दा क्यों पड़ जाता है? व्यक्ति में 'मैं' का

भाव क्यों आ जाता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। जब आप किसी का कार्य करे और उसमें सफल हो जाएँ तो अपने मन में मैंने ये किया, वो किया जैसा अहंकार उत्पन्न नहीं होने दें। अभिमानरहित होकर सहयेाग की भावना रखें। कर्तव्य निष्ठा एवं निष्काम सेवाभाव को प्रमुखता प्रदान करने का प्रयास करते रहें। हनुमानजी और अर्जुन से जुड़े हुए ये दोनों प्रसंग हमें यही शिक्षा देते हैं कि जीवन में हमेशा

निरभिमान होकर व अन्तःकरण में हमेशा ईश्वर को बैठा कर सत्कर्म करते रहें। वनवास के समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को हनुमानजी का व्रत करने की सलाह दी। जब द्रौपदी ने विधि विधान से हनुमानजी का व्रत प्रारम्भ किया तो अहंकार के वशीभूत होकर अर्जुन ने व्रत को खंडित करा दिया। अभिमान के वश में होकर अर्जुन ने द्रोपदी से कहा, 'रामवतार का वह वानर जो हमेशा हमारे रथ की धर्मध्वजा पर लटका रहता है तुम्हारा क्या भला करेगा?' तुम्हें व्रत की सलाह देने वाला कृष्ण भी कम कपटी नहीं है। इसी प्रकार अर्जुन ने युद्ध के समय भी सबसे बड़ा वीर होने का भ्रम पाल लिया और इसके दुष्परिणाम भी भुगते। इसे कहते हैं, बुद्धि पर अहंकार का पर्दा। तुलसीदासजी कहते हैं, सुबुद्धि और कुबुद्धि सबके हृदय में रहती है। जहां सुबुद्धि है वहां नाना प्रकार की सम्पदाएँ रहती हैं, और जहाँ कुबुद्धि है वहां परिणाम में विपत्ति रहती है। आपकी सुबुद्धि पर अभिमान का पर्दा नहीं पड़े, इस बात को हमेशा ध्यान में रखिये। निश्चित मानिये, प्रभु को अपने हृदय में स्थान देने से कुबुद्धि कभी नहीं आवेगी। ध्यान रहे, जो हितोपदेश करता है वह गुरु है। गुरु के हितोपदेशों को मन में धारण कीजिये। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। रा.च.मा. ५/३७ मंत्री, वैद्य और गुरु - ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कह कर) प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं) तो (क्रमशः) राज्य, शरीर, और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है। मंत्री के सम्यक् मंत्रणा न देने से राज्य का पतन व चिकित्सक की उपेक्षा से रोगी का मरण हो जाया करता है। वाल्मीकिजी कहते हैं- 'सदा प्रिय लगने वाली मीठी-मीठी बातें कहने वाले तो सुगमता से मिल सकते हैं, किन्तु जो सुनने में अप्रिय तथा परिणाम में हितकर हो, ऐसी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ होते हैं।' हनुमानजी हमेशा भयरहित होकर सुग्रीव को समय-समय पर उचित सलाह देते रहे। सुग्रीव को राज्य और यश की प्राप्ति हुई। रावण के मंत्री रावण को हमेशा मीठा-मीठा बोल कर गुमराह करते रहे, किसी ने भी उसके हित की बात नहीं कही, परिणाम सबके सामने है। रावण के दरबार में माल्यवान एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। रावण का भाई विभीषण भी नीति कुशल था। दोनों ही रावण के शुभचिंतक थे, लेकिन चाटुकार मंत्रियों के सामने बुद्धिमान मंत्री व नीतिमान भाई महत्त्वहीन हो गये। आज सत्ता के गलियारों में इन्हीं चाटुकारों का बोलबाला है। कहते हैं, सबसे बड़ा धर्म है सत्य और सबसे बड़ा पाप है असत्य। असत्य, सत्य पर हावी है। अशिष्ट पुरुषों को दंड देना और शिष्ट पुरुषों का पालन करना, उन्हें सम्मान देना राजा का धर्म है लेकिन आज प्रायः सभी राजा अशिष्ट पुरुषों को सम्मानित कर रहे हैं। राजा और मंत्री सदाचार को भूल गये हैं। चाटुकार मंत्रियों व नेताओं के कारण प्रजा अशान्ति से ग्रस्त हो गयी है। देश अत्याचार, भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अनाचार की चपेट में है। सदाचार की जगह पापाचार और अनाचार ने ले ली है। चारों तरफ झूठ-फरेब, बेईमानी, का बोलबाला है। हमारे राजा और मंत्री सुविधाभोगी और अवसरवादी हो गये हैं, इन्हें अपनी प्रजा की कोई चिन्ता नहीं है। भ्रष्ट चाटुकार मंत्रियों और नेताओं से घिरा हुआ व्यक्ति जब राज्य और देश पर शासन करेगा तो फिर इस देश की दशा क्या होगी? गोस्वामी तुलसीदासजी ने यहां यही कहा है कि मंत्री, सचिव आदि अपने राजा को हमेशा उचित सलाह दें, अनुकूल आचरण करें। विभीषण अपने भाई रावण को हितोपदेश दे रहे हैं-

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।। रा.च.मा. ५/३८

'काम, क्रोध, मद और लोभ, ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को भजिये।' काम, क्रोध, अभिमान, लोभ, असत्य और तृष्णा को शत्रुओं में महाशत्रु कहा गया है। जहां तक सम्भव हो मनुष्य को इनसे बचना चाहिये। नेक इंसान संयम, सदाचार, परोपकार जैसे गुणों से परिपूर्ण होते हैं। संसार में संतोषी बन कर रहिये, जो संतोषी है वही धनी है। तृष्णा से बढ़ कर कोई दुःख नहीं, जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है वह दरिद्र है। लोभ और अर्थ सभी अनर्थों का मूल है। अर्थ अर्जन भी हमेशा धैर्यपूर्वक ही किया जाना चाहिये। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-माया द्वारा हरे हुए ज्ञान वाले, आसुरी स्वभाव वाले नीच, पापाचारी और मूढ़, मुझे भजते हुए भी नहीं भजते। भगवान इन्हें दुर्जन भक्त कहते हैं। निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिनका पाप नष्ट हो गया है, राग-द्वेष मोह-माया से मुक्त, दृढ़ निश्चयी पुरुष ही सज्जन भक्त कहलाते हैं। जीवन में सत्पुरुष बनने के लिये इन महाशत्रुओं से बचने की इस नेक सलाह की तरफ सभी को ध्यान देना चाहिये। नीति निपुण विभीषण कह रहे हैं -

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ विधाता।।

रा.च.मा. ५/४६/ ७ 'नरक में रहना वरं अच्छा है परन्तु विधाता दुष्ट का संग कभी न दे।'

यह नेक सलाह अनुकरणीय है। यदि आप दुष्टों की मंडली में बसते हैं, दुष्टों की संगत में रहते हैं तो आप अंधकार की ओर जा रहे हैं। दुष्टों के बीच रहने वाला मनुष्य विषय-कामना में फंस कर अपने जीवन को नरक बना लते ा है। काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे प्रबल शत्रुओं से घिरा रहता है। इनसे बचने के लिये खल मंडली का त्याग अतिआवश्यक है। प्रभु श्रीराम विभीषण से कह रहे हैं -

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।

रा.च.मा. ५/४८

'जो सद्गुण (साकार) भगवान के उपासक हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं।'

मनुष्य को अपने जीवन में नीति और नियमों का पालन करना चाहिये, और दूसरों के हित में लगे रहना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य नीति, प्रीति और नियमों का पालन अवश्य करे। सेवाभावी और सत्य आचरण करने वाले मनुष्य से ही प्रभु प्रेम करते हैं। नीति का पालन करने वाले निरभिमान श्रीराम, सुग्रीव और विभीषण से पूछ रहे हैं-

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गम्भीरा।। रा.च.मा. ५/५०/५

'हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस तरह पार किया जाय?' सामर्थ्यवान, मित्रों से सलाह मांग कर उनका सम्मान कर रहे हैं, सामर्थ्यवान होते हुए भी निरभिमान हैं, विनम्र हैं। नीति-निपुण सामर्थ्यवान को मित्र सलाह देते हैं कि इसके लिये समुद्र से विनय की जाय। विभीषण नीतिज्ञान के पंडित हैं, इसलिये सामर्थ्यवान ने उनकी नीति संगत राय को माना।

यहां सामर्थ्यवान श्रीराम, शक्ति का प्रयोग कर समुद्र को पार कर सकते थे, लेकिन उन्होंने इस आसुरी प्रवृत्ति का सहारा नहीं लिया। उन्होंने समुद्र से विनय करने का नीतिगत निर्णय लेकर श्रेष्ठता का परिचय दिया है। नीति-निपुण श्रीराम का यह व्यवहार मनन करने योग्य ही नहीं, आत्मसात करने योग्य है।

भगवान श्रीराम कह रहे हैं-

बिनय न मानत जलधि जड़ गये तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।। रा.च.मा. ५/५७ 'इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोध सहित बोले-बिना भय के प्रीति नहीं होती।' प्रभु श्रीराम ने तीन दिन तक इन्तजार किया। तीन दिन बीत जाने पर उन्हें क्रोध आया। ये तीन दिन ईश्वर के विराट स्वरुप संसार को संचालित करने वाले तीन मूल कारणों को प्रदर्शित करते हैं। विनय को कमजोरी मान कर उसे ठुकुरा देना, विनम्र व्यक्ति एवं विनम्रता के साथ क्रूर मजाक है। ऐसा मजाक जड़ प्रकृति का विवेकहीन व्यक्ति ही कर सकता है। अतः ऐसे विवेकहीन व्यक्ति को शक्ति से भयभीत कर दण्डित करना नीतिगत निर्णय है। जड़ स्वभाव का व्यक्ति भय के बिना प्रेम की भाषा नहीं समझता। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है। क्रोध हमेशा सकारण होना चाहिये, अकारण नहीं। नीति निपुण श्रीराम कहते हैं -

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।। सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।। ममता रत सन ग्यानकहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएं फल जथा।।

रा.च.मा. ५/५८/१-२-३-४

'हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ।' मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुन्दरनीति (उदारता का उपदेश) ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यन्त लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनकावैसा ही फल हाते ा है जैसा ऊसर में (बंजर जमीन में) बीज बोने से होता है। विनय, प्रीति, सुनीति, ज्ञान, वैराग्य, शांति और हरि-कथा-ये सात जीवन उत्कर्ष के साधन हैं। दुष्ट पुरुष को सही रास्ते पर लाने के लिये दण्ड ही प्रधान है, शास्त्र प्रधान नहीं हैं।

शठता, कुटिलता, कृपणता, ममता, अतिलोभ, क्रोध और काम-ये सात जीव को पतन की ओर ले जाते हैं।

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते। मृजया रक्ष्यते पात्रं कुलं शीलेन रक्ष्यते।। धर्म सत्य से रक्षित होता है, विद्या योग से रक्षित हातेी है, पात्र स्वच्छता से रक्षित होता है, कुल शील से रक्षित होता है।

धैर्य, साहस, लगन, सत्य आचरण आर आत्मविश्वास जैसे गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति ही योग्य होते हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में सब कुछ हासिल कर सकते हैं। सही रास्ते पर चलें, गलत रास्ते न अपनाएँ, सकारात्मक 'जिद्दी' बन कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़े तो निश्चित मानिये 'गद्दी' अवश्य हासिल होगी। गलत रास्ते व नकारात्मक जिद को अपना कर आगे बढ़ने वाले को केवल 'रद्दी' मिलती है। अपने नैतिक मूल्यों और सिद्धान्तों से समझौता न करें। सत्य के रास्ते पर अडिग रहें। जीवन में अर्जित करने के लिए बहुत कुछ अर्पित करना पड़ता है। अर्पण से ही अर्जन सम्भव है।

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