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कहानी - हत्यारा पिता

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डॉ० श्रीमती तारा सिंह

नवी मुम्बई

 

उषा और मैं, वसंत पंचमी के दिन, गाँव के स्कूल में दोनों एक साथ दाखिला ली थी । उषा कुछ मंद-बुद्धि की थी, मगर बला की मेहनती थी । उछल-कूद करने के उम्र में वह खेलना-कूदना छोड़कर किताबों से चिपकी , कमरे में बैठी रहती थी । शाम के वक्त जब भी मैं उसके घर, उसे खेलने जाने के लिए बुलाने जाती थी, वह अपनी बड़ी बहन प्रतिभा को वह बोलकर रखती थी कि तारा आये ,तो बोल देना,’मैं घर पर नहीं हूँ’ और उसकी दीदी एक कदम और आगे बढ़कर कहती थी – ’उषा की तबीयत खराब है, वह डॉक्टर के पास गई है ’ । दूसरे दिन स्कूल में , ’तबीयत कैसी है ?’ पूछने पर उषा कहती थी,’मेरी तबीयत को क्या हुआ , बिल्कुल भली-चंगी तो हूँ ” । वो मैं छत पर पढ़ रही थी, दीदी नहीं देखी होगी, शायद इसलिए उन्होंने ऐसा कहा होगा । एक दिन तो खिन्न होकर मैंने उससे कह दिया--- उषा, क्यों प्राण दे रही हो, पढ़ाई-लिखाई कोई मुक्ति नहीं है, जिसके लिए मित्र समाज, अपने-पराये, सबों से रिश्ते तोड़ लिए जायें । तब वह सिर्फ़ इतना कहकर चुप हो जाती थी कि जिंदगी का क्या भरोसा; आज है,कल नहीं ।

चूँकि हमारे गाँव के स्कूल में सातवीं कक्षा तक की ही पढ़ाई की व्यवस्था थी, मेरे पिता आगे की पढ़ाई के लिए मुझे शहर भेजने का फ़ैसला लिये । आज भी याद है, शहर जाते दिन जब मैं उससे मिलने गई ; उसने मुझे देखकर , विषाद भरे शब्दों में कहा था---- काश ! मेरे पिता भी तुम्हारे पिता जैसे ख्यालात के होते, तब आज मैं भी तुम्हारे साथ पढ़ने शहर जा रही होती । फ़िर एक लम्बी साँस छोड़ती हुई कही--- तारा ! मैं वो दरख्त हूँ, जिसे कभी पानी नहीं मिला । बचपन के वो दिन, जब मुझे लाड़ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब माँ मुझे इस दुनिया में छोड़कर खुद उस दुनिया में चली गई । जानती हो, पौधे को बक्त पर तरी मिल जाय, तो उम्र भर के लिए उसकी जड़ें मजबूत हो जाती हैं ; वरना जिंदगी खुश्क हो जाती है । मेरी रूह को खुराक कौन देता, सो स्वस्थ जिंदगी की भूख ,तकदीर बनकर रह गई । उसकी बातों को सुनकर मेरा मन नास्तिकता की ओर झुक गया । मुझे सारा विश्व शृंखलाहीन, अव्यवस्थित और रहस्यमय लगने लगा । मैं कुछ देर उसे देखती रही, फ़िर होस्टल के लिए रवाना हो गई । रात को भी उसका नैराश्य मुख आँखों में फ़िरता रहा । उसकी दर्द भरी आवाजें कानों में गुंजती रहीं ; कुछ देर के लिए लगा कि उसकी सारी विपत्ति का भार मेरे सर आ गया हो, जिसे हल्का करने का कोई साधन मेरे पास नहीं था । कर्म जिग्यासा मुझे किसी तिनके का सहारा नहीं लेने दे रही थी । कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मातृहीन उषा के भविष्य में शीतल छाया है या इससे भी अधिक तीव्र गर्मी ।

लगभग एक साल बाद जब मैं गर्मी की छुट्टी में गाँव आई, तो भाभी ने बताया--- ’तुम्हारी सहेली उषा की शादी ,एक प्रोफ़ेसर के साथ हो गई । वह ससुराल चली गई । ” सुनकर मुझे अच्छा लगा और बुरा भी । बुरा इसलिए कि अब मैं उसे कभी नहीं देख पाउँगी । अच्छा इसलिए कि अब पति का साथ पाकर, बचपन के सारे गिले-शिकवे भूल जायगी । समय की गति के साथ जब देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होगा, तब पति-पत्नी दोनों का प्रेम-पौधा कलम की भाँति और घनिष्ट हो जायगा क्योंकि गृह-प्रबंध में उषा का जोड़ नहीं था । उषा ने भाभी को बताया कि उसके पति कमल , कॉलेज से छुट्टी पाते ही दीवानों की तरह घर भागकर चले आते हैं । घर लौटते वक्त एक मिनट के लिए भी रुकना उन्हें पसंद नहीं है । उषा भी प्रेम-योगिनी की तरह छज्जे पर खड़ी होकर , पति की राह देखा करती है । मात्र एक साल के अभिन्न सहचारिता ने दोनों की आत्माओं में इतनी समानता पैदा कर दी है कि जो बात एक के दिल में आती है, वही दूसरा बोल उठता है । कभी-कभी दोनों की सोच में आकाश-पाताल का भी अंतर होता है, तब दोनों में खूब झाँव –झाँव होती है । बाहर के लोगों को लगता है, दोनों में लड़ाई चल रही है, लेकिन जब पास आकर दोनों का प्रेम देखते हैं, तब बोल उठते हैं---ये दोनों देवलोक के निवासी हैं ।

उषा के दाम्पत्य जीवन की प्रेम-कथा, भाभी सत्यनारायण कथा की तरह सुनाती जा रही थी, और मैं सुनी जा रही थी । तभी भैया ,कहीं से वहाँ आ टपके । उन्हें देखकर ,भाभी, उषा के पति की मिसाल देती हुई बोली-----इसे कहते हैं प्रेम, ऐसा पुरुष पति-रूप मिल जाय, तो भला कौन स्त्री उसकी गुलामी नहीं पसंद करेगी । भाभी के मुँह से इतने मीठे बोल , वह भी प्रेम-रस में डुबोया हुआ, भैया शायद पहली बार सुन रहे थे, क्योंकि इसके पहले तो वे हमेशा कहा करते थे ----तुम्हारी भाभी को केवल शासन करना आता है । भाभी के मुख से उषा की कहानी के शांत आलोक में मेरी वर्षों की कामनाएँ हँसने लगीं । मैंने ईश्वर से कहा---- सचमुच तुम्हारे घर देर है, पर अंधेर नहीं । इसी प्रकार उषा के जीवन के नवीन उपवन के प्रेम-मंदिर में अगरू, केसर और कस्तूरी की सुगंध भरे रखना; कभी कम नहीं होने देना , उसने बहुत कष्ट भोगा है ।

भाभी के मुख से उषा की प्रेम-कथा की बरसा में स्नानकर मेरी आत्मा खुश हो गई और नाना प्रकार की सद-कल्पनाएँ भी चित्त में उठने लगीं । सोचने लगी---कल मेरी भी शादी होगी, जो उषा के पति जैसा मेरा पति नहीं मिला, तब क्या होगा, आदि-आदि । तभी पिताजी की आवाज आई --- तारा ट्रेन का टाइम हो चला है, हमें चलना चाहिये । मैं उसी स्थिर,अविचलित द्वंद भाव से उत्तर दी---- आ रही हूँ पिताजी, और मैं होस्टल लौट आई । दो महीने बाद ही दीदी की शादी में मुझे गाँव आने का पुन: मौका मिला । मैं खुश थी, यह सोचकर कि इस बार उषा से अवश्य मुलाकात होगी । फ़ाल्गुन का महीना था,अबीर-गुलाल से जमीन हर जगह लाल हो रही थी । कामदेव का प्रभाव लोगों को भड़का दिया था, खेतों में रबी की फ़सलें देखते बनती थीं , मानो किसी ने सुनहला फ़र्श बिछा रखा हो । ऐसे में, मैं अपनी भावनाओं को और अधिक देर रोक नहीं सकी, और दौड़ती हुइ भाभी के कमरे में गई, बोली----- भाभी, चलो न - - - --

भाभी ने पूछा---- कहाँ ? मैंने कहा—उषा के घर, रंग खेलने ।

भाभी, मेरी बातों को अनसुनी करती हुई बोली----दो-तीन दिन बाद आभा की शादी हो जायगी, उसके बाद तुम्हारी बारी । तुम जवान हो रही हो, अब पहले की तरह दूसरों के घर जाना और उछल-कूद करना ठीक नहीं होगा । फ़िर उदासीन भाव से बोली---- आदमी जो सोचता है, वह होता नहीं; जिसे एक दिन के लिए यहाँ रहना पसंद नहीं था, अब उसे सारी जिंदगी यहीं बितानी होगी ।

मैं विस्मित होकर भाभी की ओर मुख कर पूछी--- भाभी, किसे अब यहीं रहना होगा ?

भाभी,आर्द्र स्वर में कही---तुम्हारी सहेली उषा को । मैंने कहा---क्यों, यहाँ क्यों ?

भाभी स्वर में कठोरता लाती हुई बोली----इसके सिवा कोई और उपाय भी तो नहीं है । मैंने कहा--- क्यों उसके पति के घर ?

भाभी, आर्द्र होकर कही--- जब पति ही नहीं रहा, तो पति का घर कैसा ?

यह कहती हुई भाभी की आँखों में आँसू छलक उठा, जिसे देखकर मैं डर गई । मेरे पैरों तले की जमीं खिसक गई । भाभी को कुछ न बोलने की स्थिति में देखकर मैं माँ के पास भागकर गई और पूछी---- माँ, उषा को क्या हुआ है ? माँ ने कहा—भाग्य को किस्मत से द्वेष हो गया ।

मुझे समझ में नहीं आ रहा था, माँ कहना क्या चाह रही है ? तभी मैंने देखा, माँ की आत्मा ग्लानि और पीड़ा से तड़प रही थी । वह मेरे सर पर ममता का हाथ फ़ेरती हुई बताई---- उषा का पति मर गया ।

माँ की बातों पर मुझे भरोसा नहीं हुआ, और मैं रोष भरी दृष्टि से माँ की ओर देखती हुई चिल्ला पड़ी----- नहीं सब झूठ, ऐसा नहीं हो सकता । फ़िर मैंने अपने मन को संभाल कर , माँ से पूछा---- यह सब कैसे हुआ ?

माँ प्रदीप्त आँखों से मेरी ओर देखती हुई बोली--- उषा के पिता ने रात को सोये में काट दिया ।

मैं,माँ की ओर आर्द्र दृष्टि से देखती हुई, कातर स्वर में कही----- मार ही देना था, तो उन्होंने बेटी की शादी क्यों दी, कुँवारी ही रहने देते । निरपराध का खून बहाकर उन्हें क्या मिला ?

माँ ने कहा----- वो तो वही जाने, लेकिन आज उषा अगर विधवा नहीं होती, तो उसकी बुआ मीना हो जाती; क्योंकि दरअसल उषा के पिता,अपनी बहन मीना के पति को मारने के लिए गुंडे ठीक किये थे । लेकिन संयोग–वश उसी रोज उषा अपने पति के साथ ससुराल से आ गई । गर्मी काफ़ी थी, इसलिए दोनों का बिस्तर दरवाजे पर बाहर लगाया गया । जब दोनों मेहमान खा-पीकर सो गये, तब उषा के पिता ने गुंडे को सोये में खाट पहचनवा दिया और कहा---- इन्हें मारना है , लेकिन--- - - -

मैंने माँ से पूछा---- लेकिन क्या ?

माँ शांत-शीतल होकर जवाब दी----- मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा मजबूत होता है । वो जो न चाहे, तो पत्ता भी नहीं खड़कता और वही हुआ भी । उषा के पति को खटमल बहुत परेशान कर रहा था, उन्होंने मीना के पति से कहा---- फ़ूफ़ाजी क्या आपके खाट में भी खटमल है, मैं सो नहीं पा रहा हूँ ?

मीना के पति ने कहा--- एक काम कीजिये, मैं बहुत देर सो लिया, अब बिना सोये भी काम चल जायगा । एक काम कीजिये---आप मेरे खाट पर आकर सो जाइये, मैं आपके खाट पर चला जाता हूँ । उषा के पति, फ़ूफ़ाजी की खाट पर जाकर सो गये । पूर्व नियोजित प्रोग्राम के अनुसार गुंडे आये, और उषा के पति का, सोये में गला काट दिये । ऊषा के पिता को जब पता चला, कि कत्ल हुआ है, वे मन ही मन खुश थे, लेकिन लोगों को दिखाने के लिए घड़ियाली आँसू बहाने लगे । चीख-पुकार सुनकर मीना के पति दौड़कर आँगन में आये, और उषा के पिता को चुप कराने लगे । उषा के पिता, मीना के पति को देखकर अवम्भित हो गये ; कुछ देर के लिए रोना छोड़ उन्हें आँख फ़ाड़-फ़ाड़कर देखने लगे । फ़िर पागल की तरह दरवाजे की ओर दौड़े । वहाँ जाकर उन्होंने जो देखा कि उनका दामाद दो टुकड़े में, लहू के सैलाब में डूबा पड़ा है , तो उनके होश उड़ गये । बाद पुलिस आई, पूछताछ के बाद शक के आधार पर उषा के पिता को पकड़कर ले गई । वहाँ उन्होंने, पुलिस के आगे अपनी गुनाह कबूल कर ली । अभी वे जेल में हैं और उषा घर पर । क्या होगा, यही तो होगा, जो माली, खुद अपने हाथों गुलशन को छिन्न-भिन्न कर उजाड़ दे

(ऊपर का चित्र - गौरी गांधी की कलाकृति का डिटेल)

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