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हास्य-व्यंग्य - चोचं चरित्र

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- कुबेर

एक सहकर्मी मित्र हैं, चोचं जी।

चोचं जी बड़े सत्कर्मी, सद्धर्मी और संस्कृतिधर्मी हैं। उनका व्यक्तित्व आकर्षक है। उनकी बातें बड़ी मीठी लगती हैं। जिन चीजों में धर्म और संस्कृति की महक न हो, उन्हें वे हाथ भी नहीं लगाते हैं। जहाँ धर्म और संस्कृति की छाँव न हो, वहाँ वे रुकना तो क्या, थूकना भी पसंद नहीं करते हैं। धर्म और संस्कृति की बातों के अलावा वे और कुछ भी बोलना, सुनना, पढ़ना-लिखना पसंद नहीं करते हैं। उनका हर आचरण धर्म के अनुकूल होता है। जाहिर है, वेशभूषा भी वे धर्म और संस्कृति के अनुरूप ही धारण करते हैं। माथे पर सिंदूरी तिलक और सिर पर लंबी चुटैया उनकी खास पहचान हैं। विश्वप्रसिद्ध संत 'जी महराज' उनके गुरू और आदर्श हैं।

एक दिन उन्होंने तिलक और चुटैया की महिमा का वर्णन कुछ इस प्रकार किया था - 'पूज्य गुरूवर कहते हैं कि हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म मानने वालों को तिलक और चुटैया अवश्य धारण करना चहिए। इससे चेहरे पर तेज आती है। यश और संपत्ति की प्राप्ति होती है। परिवार में सुख और शांति आती है। चुटैया के संबंध में वे बताते हैं कि यह ज्ञान और सूचनाएँ एकत्रित-अर्जित करने का केन्द्र होती है। इसी के रास्ते ब्रह्माण्ड की दिव्य ईश्वरीय ऊर्जाएँ मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं। पूज्य गुरूवर का कहना है कि आजकल के इलेक्ट्रानिक उपकरणों के एन्टिना इसी की प्रेरणा से विकसित किये गये हैं।'

आगे वे कहते हैं - 'पूज्य गुरूवर के अनुसार तिलक और चुटैया को शक्तिक्षम बनाने के लिए इसे विभिन्न मंत्रों से सिद्ध करना आवश्यक है। यह प्रक्रिया इलेक्ट्रानिक यंत्रों में बैटरी डालने अथवा बैटरी को रिचार्ज करने के समान है।'

गुरू के विधानों और आदेशों की अवहेलना भला कोई कैसे कर सकता है? रौरव नर्क में जाना है क्या? लिहाजा अपना तिलक और अपनी चुटैया सिद्ध किये बिना वे घर से कदापि नहीं निकलते हैं। तिलक और चुटैया जब तक शक्तिक्षम न हो जायें, चेहरे पर दिव्यता और तेज जब तक न आ जायें, ईश्वरीय सत्ता से सीधा संपर्क जब तक न स्थापित हो जाय घर से भला कोई कैसे बाहर निकले? तिलक और चुटैया को सिद्ध करने की उनकी प्रक्रिया कुछ लंबी है, समय लेती है। उनका समय पर स्कूल नहीं पहुँच पाने का यही एकमात्र कारण है।

वे कहते हैं - 'धर्म के कायरें में लगा समय व्यर्थ नहीं जाता। यह समय अगले जन्म में हमारे उम्र का निर्धारण करता है अतः इस प्रक्रिया में जितना अधिक समय लगे उतना ही अच्छा है।'

समय पर स्कूल नहीं पहुँच पाने का उन्हें कोई मलाल नहीं है। स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए वे तर्क देते हैं - 'देश की संविधान ने सभी नागरिकों को अपना धर्म पालन और तदनुरूप धार्मिक आचरण करने की स्वतंत्रता और अधिकार दिया है। सरकार पूजा-पाठ के समय में स्कूल लगाती है। यह हमारे संविधानिक अधिकारों का हनन है। हम तो अपना धार्मिक क्रियाकलाप करेंगे ही। गलती सरकार की है, हमारी नहीं। हम तो अपना धर्म निभायेंगे ही, कोई माई का लाल हमें अपने संविधानिक अधिकारों के उपयोग करने से नहीं रोक सकताय स्कूल जाय भांड़ में।'

हमारे एक मित्र और हैं। वे भी देर से स्कूल आते हैं। स्कूल देर से पहुँचने का उनका कारण नितांत मानवीय है। उन्हें प्रातःकालीन नित्यक्रिया से निपटनें के लिए सार्वजनिक सुविधाओं पर आश्रित रहना पड़ता है। वे कहते हैं - ''ऐसे में है कोई माई का लाल तो सात बजे स्कूल पहुँच कर बता दे? सरकार को अकल नहीं है तो हम क्या करें। स्कूल जाय भांड़ में।''

सूची कुछ लंबी है।

चोचं जी एक दिन काफी देर से स्कूल आये। अन्य दिनों की अपेक्षा उसके चेहरे पर अधिक तेज थी। वाणी में अधिक ओज था। मैं समझ गया कि महोदय जी को उनकी संस्था ने कुछ अधिक महत्वपूर्ण और भारी-भरकम जिम्मेदारी सौंपा  होगा। मेरा अनुमान सही निकला। आते ही उन्होंने हमें एक-एक प्रपत्र दिया।

मैंने पूछा - ''क्या है?''

उन्होंने आदेश वाले लहजे में कहा - ''नीचे साईन कीजिए और लौटाइए।''

मेरे विवेक ने कहा, हस्ताक्षर करने से पहले पढ़ लिया जाय। पता चला, देश भर में गौ-हत्याएँ बन्द करने के लिए देश के राष्ट्रपति के नाम यह ज्ञापन है। इसे उनके गुरू विश्वप्रसिद्ध संत 'जी महराज' की सत्प्रेरणा सह आदेश के परिपालन में एक अभियान के रूप में उनके संगठन द्वारा देश भर में चलाया जा रहा था। देश में हिन्दुओं की आबादी के अनुपात में उनके गुरू विश्वप्रसिद्ध संत 'जी महराज' ने एक अरब ज्ञापनों का लक्ष्य निर्धारित किया था। ज्ञापन पत्र में गो वंश महात्मय के अलावा भी अनेक दिव्यवाणियाँ और अमृतवाणियाँ लिखी हुई थी। यदि आप सच्चे हिन्दू हैं और भारतीय संस्कृति को सच्चे मन से मानते हैं तो इस ज्ञापन में लिखी हुई समस्त दिव्यवाणियों और अमृतवाणियों का सहजतापूर्वक अनुमान लगा सकते हैं।

मुझे इस बात की कोई उलझन नहीं थी कि इनके संगठन द्वारा प्रेषित एक अरब ज्ञापन पत्रों को राष्ट्रपति भवन में किस तरह सहेजा जायेगा। मुझे इस बात की भी कोई उलझन नहीं थी कि अपने कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व माननीय राष्ट्रपति महोदय इन्हें पढ भी पायेंगे? मेरी उलझन अलग थी। मैंने चोचं जी से कहा - ''महोदय जी! सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों के लिए आपकी संस्था की कोई योजना नहीं है क्या?''

''क्यों, इससे आपको क्या परेशानी है?'' चोचं जी ने धमकी वाले अंदाज में जवाब दिया। 'नेकु कही बैननि, अनेक कही नैनन सौं। रही-सही सोऊ कही दीन्हीं हिचकीनि सौं।' रत्नाकर की इन पँक्तियों की तर्ज पर बाकी जवाब उनके तमतमाये हुए चेहरे ने दे दिया था।

सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों से उत्पन्न परेशानियों वाले सारे दृश्य मेरी नजरों के आगे साकार होने लगे। यदि मेरी तरह आप भी भ्रष्ट हिन्दू होंगे तो ये सारे दृश्य आप भी साकार रूप में देख सकते हैं।

उस दिन अखबार में एक समाचार छपा था। इस समाचार ने मेरी हिम्मत को तार-तार कर दिया। समाचार का सार कुछ इस प्रकार था - 'सरकार ने एक विश्व प्रसिद्ध संत को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। किसी अज्ञानी और मूढ़ व्यक्ति ने इस पर कोई टिप्पणी कर दिया था। उसे क्या पता था कि उस विश्व प्रसिद्ध संत के दो परम भक्त पास ही खड़े हैं। उस संत के अनुयायिओं से यह टिप्पणी सुनी नहीं गई। अचानक उनके अंदर से विकराल क्रोधाग्नि प्रगट होने लगी। इस क्रोधाग्नि से झुलसकर टिप्पणी करने वाला वह बेचारा मूढ़ अब अस्पताल में अपनी अज्ञानता और मूढ़ता को कोसते हुए तड़प रहा है।'

इस समाचार को पढ़कर मेरे मस्तिष्क में जो दृश्य बना वह मुझे बुरी तरह डराने लगा था। सड़क पर घूम रहे आवारा मवेशियों से होने वाली परेशानियों का बखान करने का परिणाम इससे भी भयंकर हो सकता था। लिहाजा मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा।

सभी साथी ज्ञापन पत्र में हस्ताक्षर करके लौटा चुके थे। चोचं जी ने मुझे घुड़काते हुए कहा - ''क्या सोच रहे हो साहब, हमें और भी जगह जाना है। साइन कीजिए और दीजिए।''

मैंने कहा - ''क्षमा करे महोदय जी! मुझसे साइन नहीं हो सकेगा।''

सुनते ही चोचं जी के अंदर छिपकर बैठा धर्म-संस्कृति उत्पादित बम फट पड़ा। मेरा चीथड़ा उड़ाते हुए उन्होंने कहा - ''वाह! क्या भारतीय संस्कृति है आपकी? धर्म पर आपकी आस्था कितनी महान है? मान गये।''

उन्होंने मेरे हाथ से वह ज्ञापन छीन लिया।

उन्होंने मेरी धार्मिकता और संस्कृति पर चोट किया था। मेरे लिए आत्मावलोकन जरूरी था। मैंने अपनी धार्मिकता और सांस्कृतिक आस्था पर गहन सोच-विचार किया। मुझे भी अपनी धार्मिकता और सांस्कृतिक आस्था को सिद्ध करना चाहिए। इसके लिए मुझे चोचं जी का मार्ग ही उपयुक्त लगा। गो वंश की रक्षा के लिए मुझे भी कोई नेक काम करना ही चाहिए। लौटते वक्त मैंने फूटपाथ पर सजी बाजार से रोली चंदन खरीदा। रुद्राक्ष की माला खरीदी। एक फर्जी संस्था बनाया। महामहीम के नाम एक ज्ञापन पत्र तैयार किया। ज्ञापन की विषय वस्तु कुछ इस प्रकार थी -

माननीय महाहीम,
हमारी महान सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है कि देश में गो वंश की सुरक्षा और संवर्धन हो। सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थायी रूप से निवास करने वाली इनकी पीढ़ियाँ आये दिन किसी न किसी दुर्घटना का शिकार होती रहती हैं। ये पूर्णतः असुरक्षित और उपेक्षित हैं। निवेदन है कि सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर इनके स्थायी निवास स्थलों पर केटल शेड का निर्माण हो ताकि इन्हें सुरक्षा और संरक्षण प्राप्त हो सके।
निवेदक
अध्यक्ष
अखिल विश्व गो वंश संरक्षण-संवर्धन मंच
भरतगाँव (ध. प्र.)

अपने इस पवित्र अभियान के प्रति मेरे अतिउत्साह ने निंदिया रानी को रात भर मेरे नजदीक फटकने नहीं दिया। ब्रह्ममुहूर्त में मैंने अपने इस अधम शरीर को पवित्र किया। माथे पर टीका लगाया। गले में रूद्राक्ष की माला धारण किया। चोटी वाले स्थान के बालों में गांठ लगाई ताकि उसे चुटैया का स्वरूप मिल सके। इन्हें चार्जिंग करने के लिए घंटे भर का ध्यान लगाया। अपनी महान संस्कृति के अनुरूप वस्त्र धारण किया और स्कूल के लिए निकल पड़ा। मेरे अंदर प्रगट हुए महान धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था की दिव्य तरंगों ने मुझे चेतावनी दिया कि समय पर स्कूल पहुँचना हमारी महान धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विरूद्ध है। आपने जिस पवित्र अभियान का जिम्मा लिया है यह उसके प्रति विश्वासघात है। सावधान।

मैंने सोचा, इस पवित्र अभियान की शुरुआत क्यों न ठेलू राम के पान ठेले से किया जाय। वहाँ पर एकत्रित धर्मप्रेमियों को मैंने अपने महान धर्म और संस्कृति की कुछ अनमोल बातें बताई और हस्ताक्षर की प्रत्याशा में वह ज्ञापन  पत्र उन्हें सौंप दिया। पढ़कर लोगों ने मुझ पर व्यंग्य किया - ''आपको भी व्यंग्य लेखक बनने का चस्का लग गया है क्या सर?''

ठेलू राम बार-बार घड़ी की ओर देख रहा था। कहा - ''सर! आज सण्डे है क्या?''

रास्ते में एक मंदिर पड़ता है। मैंने सोचा, क्यों न अपने इस पवित्र अभियान की सूचना प्रभु को भी देते चलूँ। प्रभु के समक्ष ध्यानस्थ हुए कुछ ही पल बीते होंगे। मुझे लगा, प्रभु प्रगट होकर मुझसे कह रहे हैं - ''मूर्ख! तेरे मंदिर के पट तो कब के खुल चुके हैं। तेरे पाँच सौ प्रगट ईश्वर कब से तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तू यहाँ स्वांग किये खड़ा है। दूर हो जा मेरी नजरों से।''
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(टीप :- चोचं जी का यह नाम उनकी चोटी और चंदन से प्रेरित होने वाले विद्यार्थियों का दिया हुआ है। 'चोटी-चंदन' नाम ही सिंकुड़कर अब 'चोचं' हो गया है।)
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