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हास्य-व्यंग्य : भूत अभी उतरा नहीं

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- प्रमोद यादव

 

दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसके सिर पर कभी कोई भूत सवार न हुआ हो..गाहे-बगाहे हरेक के सिर पर उसे सवार होना ही है..उसकी पकड़ से बच पाना मुश्किल ही नहीं..नामुमकिन है..वो कब ,कैसे और किस बात के लिए सवार हो जाए,कहा नहीं जा सकता..उम्र के किसी भी पड़ाव में यह सक्रिय हो सकता है.. इसे बचपन, जवानी या बुढापा से कोई लेना-देना नहीं..ना ही शरीर के अन्य हिस्सों से..उसे तो सिर्फ सिर पर ही सवार होना है..कभी किसी ने नहीं कहा कि भूत उसके पेट या पीठ पर सवार हुआ अथवा कंधे या जांघ पर सवार हुआ..दरअसल भूत को मालूम है कि आदमी का सी.पी.यु. उसका सिर है..उस पर सवार होकर ही वह उसे महावत की भांति बेदर्दी से टोंच सकता है..हांक सकता है..भूत कब और कैसे सवार होता है ? कब तक सवार रहता है ? कब उतरता है ?..इसे जानने के पहले तमाम तरह के भूतों के बारे में कुछ मूलभूत जानकारी जरुरी है.. भूत कई तरह के होते हैं जैसे सिर पर सवार रहने वाले भूत..शरीर में प्रवेश कर आदमी को हलाकान करने वाले भटकती आत्मा का कन्वर्टेड भूत..और जनश्रुति वाला आम भूत..जिसका नाम सुनते ही बच्चा डर के मारे सो जाता है..दुबक जाता है..

हमें नहीं मालूम कि अमेरिका या ब्रिटेन..चीन या जापान में भूत होते हैं या नहीं..पर हमारे देश में फिफ्टी परसेंट होते हैं और फिफ्टी परसेंट नहीं होते.. जो कहते हैं भगवान दिखते नहीं, पर हैं ..वही इसे मानते हैं..क्योंकि भूत भी दिखते नहीं..पर है, ऐसा तर्क होता है उसके अस्तित्व को स्वीकारने वालों का..और जो भूत के अस्तित्व को नकारते हैं वे लगभग नास्तिक किस्म के लोग होते हैं.. ये बहुधा ज्यादा पढ़े-लिखे और वैज्ञानिक टाईप के ( सनकी) लोग होते हैं..हम जिस कैटेगरी के भूत की बात ऊपर कर रहे थे वो इन्हीं महानुभावों के सिर पर ज्यादातर सवार रहते है..ये अलग बात है कि वे इसे माने या न माने पर दुनिया ऐसा मानती है.. अजीब विरोधाभाष है ..जो नहीं स्वीकारते उन्हीं के साथ भूत अधिक वास करता है.. इसी बात का पलट अर्थ ये भी है कि जो पढ़े-लिखे या शिक्सित नहीं होते..उनके सिर पर भूत सवार नहीं होता..पर ऐसा नहीं है..असली और आम भूत तो इनके बीच ही और इनके साथ ही सबसे ज्यादा होता है..देश के ग्रामीण अंचलों में जहां बिजली तक नहीं होती , इनकी अच्छी आबादी होती है..इनके सबसे ज्यादा किस्से यहीं होते हैं..हर कोई वहां डरा-डरा ,सहमा-सहमा एक-दूजे को किस्सा सुनाते ( टाईम पास करते ) रहते हैं.. हर कोई इस संजीदगी और एक्टिंग के साथ सुनते-सुनाते हैं कि यकीन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाता..

गांवों में रात को किस्सागोई के चलते माहौल कुछ इस कदर डरावना और खौफनाक हो जाता है कि सुनने-वाले डर के मारे वहीँ पेशाब रोक दुबक कर सो जाते हैं..कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते..सुबह घर जाकर ही निपटते है..और जो कमजोर दिल के होते हैं, वहीँ तर –बतर हो जाते हैं..

इनके अनुसार भूतों का डेरा अक्सर कोई बहुत पुराने पीपल या बरगद का पेड़ होता है जो गाँव से बाहर किसी वीराने में या श्मशान के आसपास होता है..या फिर कोई पुराना खँडहर..खँडहर से ख्याल आया कि बालीवुड के रामसे ब्रदर्स इस विषय के “विकिपीडिया” हैं उन्होंने भूतों पर अनेक फ़िल्में बनाई हैं...उनकी फ़िल्में देख आप इस विषय की वृहत जानकारी पा सकते हैं..भटकती आत्मा वाले भूत से जब कोई पीड़ित होता है तो उस भूत-बाधित का भूत भगाने..भूत उतारने के लिए उसे अक्सर बैगा-गुनिया-ओझा के पास ले जाया जाता है..ये सभी “भूतोलाजी” में ग्रेजुएट होते हैं..भूत उतारने कोई भी एम.बी.बी.एस.डाक्टर को नहीं बुलाता..डाक्टर की डिग्री यहाँ डेड हो जाती है..

कई लोगो से मिला जो भूत देखने का दावा किये थे..एक से पूछा कि भूत दिखता कैसे है ? तो उत्तर था- खौफनाक..डरावना..हाथ-पैर उलटे..हमने कहा- चित्र बनाकर दिखाओ-वह हंसा-बोला-नहीं आता बनाना..( आता तो जैसे बना ही देता? )..दूसरे से सवाल किया कि भूत किसी ग्रामीण को ही क्यों पकड़ता है..वो भी एकदम निरीह और नंगे किस्म के व्यक्ति को ? किसी मंत्री-संत्री को क्यों नहीं ? वह जवाब न दे सका..उसके पहनावे के विषय में पूछा तो जवाब मिला कि भूत नंगा रहता है..हमने कहा कि हमारे यहाँ तो मुहावरा है - भागते भूत की लंगोटी सही..तो ये लंगोटी कहाँ से आ गई ? वह मौन साध गया..एक से पूछा कि कैसे सिद्ध करेंगे कि भूत हैं तो उसने कहा-जब भूतनाथ ( भगवान शिव ) हैं तो भूत भी हैं..भूतों के हेड तो भूतनाथ ही हैं..किसी एक से भूतों की आबादी पूछी तो उत्तर था – कई अरब ख़रब ..हमने कहा -किसी एक का एड्रेस दे दो भाई ..बाक़ी बातें उसी से पूछ लेंगे..वह भूत की भांति एकदम से गायब हो गया..इसके पहले कि मैं और ज्यादा विषयांतर हो जाऊं..मूल टापिक पर आता हूँ...हम जिस भूत की बाते कर रहे उसका दूसरा नाम जुनून है..

यह भूत हर व्यक्ति के अन्दर इन बिल्ट होता है..और इसका होना हार्ट और किडनी के माफिक जरुरी भी है..ये ना हो तो आदमी मर तो ना जाए पर अच्छे से जी भी ना पाए.. लोग अपने गोल तक पहुँच ही न पाए.. बचपन से ही कई बच्चों में बहुत कुछ करने का भूत सवार हो जाता है..किसी को आई.पी.एस. आई.ए.एस. डाक्टर..इंजीनियर बनने का तो किसी को डांसर..गायक..म्युजिसियन..एक्टर बनने का..जब तक उसके सिर पर भूत सवार नहीं होगा तब तक शायद ही वह सफलता हासिल कर सके..हर बाड़ी में भूत की केपिसिटी या ताकत इतनी होती है कि उसे उसके गोल तक तो पहुंचा ही दे..पर कभी-कभी ऐसा नहीं भी हो पाता..तो इसमें दोष भूत का कतई नहीं होता..

मेरे साथ के पढ़ने वाले बहुत सारे लडके ऐसे थे जिनके सिर पर चौबीसों घंटे पढने का भूत सवार रहता था..इन सबमें मैं भावी डाक्टर,इंजीनियर देखा करता..उन दिनों यही मेन गोल हुआ करते..एक-दो तो बने भी किन्तु एक लड़का जो सबसे ज्यादा होशियार और पढ़ातू था..जिसका फ्यूचर सबसे ज्यादा ब्राईट लगता ,मेट्रिक के बाद कालेज में जाते ही फेल हो गया..बाद में मालूम हुआ कि उस पर किसी नाजनी के इश्क का भूत सवार हो गया था..उसके सिर से पढ़ाई का भूत कैसे उतरा और इश्क का भूत कैसे सवार हुआ ,ये तो वो दोनों भूत ही जाने..कई साल बाद जब उससे मिला तो उसने बताया कि सेशन कोर्ट में वो बड़ा बाबू है..

आजादी के पहले क्रांतिकारियों के सिर पर देश की आजादी का भूत सवार रहता था..भगत सिंह,चंद्रशेखर,सुखदेव,खुदीराम बोस जैसे अनगिनत इंकलाबियों के सिर पर देश की आजादी का भूत सवार न होता तो आज भी हम अंग्रेजों की गुलामी कर रहे होते..आज भी सीमा पर तैनात जवानों के सिर पर देश-प्रेम का भूत सवार न हो तो हम चैन की नींद न ले पायें....पर आजादी के बाद तो जैसे सारे भूत भी आजाद हो गए..एक ही सोच वाली विचारधारा में बदलाव आ गया..अब सब भूतों के गोल भी अलग-अलग हो गए..सिर पर सवार भूत दिग्भ्रमित से हो गए ..अब गोल तक पहुंचाते- पहुंचाते ये खुद ही गोल हो जाते हैं..अब गिनती के भूत ही गोल छू पाते हैं..

अब तो किसी के सिर पर लम्बी-लम्बी मूंछ रखने का भूत सवार रहता है तो किसी पर लम्बे-लम्बे नाखून का..सब भूत गिनिस बुक के चलते रिकार्ड बनाने में लगे हैं..कोई तैरकर पनामा पार कर रहा है तो कोई एवरेस्ट की चोटी चढ़ रहा..किसी को नेता बनने का भूत सवार है तो किसी को अभिनेता..किसी पर संगीत का भूत सवार है तो किसी पर फैशन का..किसी पर काम का तो किसी पर नाम का.. किसी पर परीक्षा का तो किसी पर इश्क का.. किसी के सिर पर काले धन का तो किसी पर जन लोकपाल का .. भूत तो आज भी पहले की तरह मुस्तैद है पर आदमी के सी.पी.यु. में ही इरर आ गया है..एक्के-दुक्के लोग जो किसी बड़े ओहदे तक पहुँच जाते हैं..पी.एम...सी.एम..कलेक्टर..डाईरेक्टर..बन जाते हैं वो अपनी सफलता का सारा श्रेय किसी दो अदद नारी ( पत्नी अथवा प्रेयसी ) को दे देते है..भूत से भी ज्यादा डर इन्हें नारियों का होता है..इन्हें खुश रखना इनकी पहली प्राथमिकता होती है.. भूत जाए भाड में..पर मैं ऐसा नहीं..

जवानी के दिनों मुझ पर एक बार इश्क का भूत सवार हुआ..लेकिन दो-तीन साल में ही उतर गया..वो नहीं उतरता तो मैं लम्बे से उतर जाता..लड़की का बाप मुझे मौत के घाट उतार देता..शराब ठेकेदार था उसका बाप..हमेशा दोनाली बन्दूक से सजा-धजा रहता..’मेरी-उसकी” प्रेम कहानी जब उसके नालेज में रिलीज हुई तो एकबारगी मुझे लगा कि अब गोली चली और मैं चला..पर ऐसा कुछ न हुआ..एक दिन उसने घर बुलाया और बड़े प्रेम से समझाया कि लड़की की शादी तो करनी ही है पर अपनी बिरादरी में..अब तक जो हुआ उसे भूल जाओ और किनारा कर लो..फिर कंधे से बंदूक उतारते बोला- “ नहीं तो तुम्हें देख लेंगे..”

मैंने उन्हें देखने नहीं दिया..एक हफ्ते के भीतर ही मैंने शादी कर ली..पर एक नेक शिक्षा अधिकारी की लड़की से..स्कूल के दिनों से ही मुझ पर भूत सवार था कि आगे जाकर सरकारी स्कूल का मास्टर बनूँ.. यही मेरे जीवन का लक्ष्य था.. शिक्षा अधिकारी ससुर ने ये समस्या चुटकियों में हल कर दी....चट मंगनी पट ब्याह के साथ ही मैं चट पति और पट मास्टर बन गया.. मैंने अपनी सफलता का सारा श्रेय औरों की तरह किसी औरत को नहीं दिया..बल्कि उस भूत को दिया जिसने इश्क के भारी भूत को मेरे सिर से उतारा..उसने बंदूक न तानी होती तो अब तलक मैं उसकी लड़की के आसपास ही तना होता..निपट बेकार और बेरोजगार होता..एहसानमंद हूँ उस भूत का ( लड़की के बाप का नाम भूतनाथ था ) जिसने मेरी जिंदगी को नया ट्विस्ट दिया ..आज भी यदा-कदा उसे याद कर धन्यवाद देता हूँ..

सुना है कि उसकी लाडली अब तलक कुंवारी बैठी है..उसका भूत अभी उतरा नहीं...

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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