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सद्गुरू का सानिध्य सबसे बड़ा आशीष

31 जुलाई गुरू पूर्णिमा पर विशेष...

० समर्पण भावना सबसे बड़ी गुरू पूजा

-डॉ. सूर्यकांत मिश्रा


गुरू पूर्णिमा पर्व का महत्व मानवीय जीवन में सदा से ही महसूस किया गया है। गुरू भक्ति करते हुए गुरू के सानिध्य में रहना और भारतीय संस्कृति को सीधना समझना कोई आज की सीख नहीं है, वरन अनादिकाल से गुरूओं का मान सम्मान भारत वर्ष का सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का विषय रहा है। गुरू के प्रति समर्पण भाव का यह पर्व गुरू की महिमा को वास्तविक जीवन में अनुभव करने की प्रेरणा प्रदान करता है। महर्षि पाराशर के पुत्र ‘वेद व्यास’ जी का जन्म दिवस ही हम भारतीयों के लिए गुरू पूर्णिमा का महान पर्व बन गया। यही कारण है कि इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। हिंदू धर्म के चार महान ग्रंथ जिन्हें वेद की संज्ञा दी गई है-यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद एवं ऋगवेद को विस्तार रूप प्रदान करने के कारण ही पाराशर पुत्र का नाम ‘वेद व्यास’ पड़ा। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ही ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है। हमार धर्म शास्त्र गुरू भक्ति के दृष्टांतों से भरे पड़े हैं। रामायण से लेकर महाभारत काल तक गुरूओं की महिमा का बखान करते हमारे धर्म शास्त्र नहीं थकते हैं।


गुरू पूणिर्मा के आगमन का अनुभव भी बड़ा ही प्राकृतिक रूप लिये होता है। बारिश की सौंधी फुहारें तन, मन और जीवन के उल्लास को कई गुणों बड़ा रही होती है। फलों तथा फुलों की वृक्ष एवं पौधों की धुली हुई साफ पत्तियां वातावरण को शुद्ध करने के साथ ही हमारी अपनी आत्मा को निर्मल रखने का संदेश देते हुए दिखाई पड़ते है। इन सारी प्राकृतिक व्यवस्थाओं के बीच कहीं न कहीं शिष्यों का मन भी बरबस ही गुरू चेतना एवं गुरू भक्ति की ओर खिंचा चला जाता है। वहीं दूसरी ओर गुरू कृपा भी अपने शिष्यों के प्रति सद्विचार, सद्ज्ञान और सद्विवेक बनकर अवतरित होती है। मानवीय जीवन में सामान्य रूप से शिक्षा प्रदान करने वाले गुरू को बड़े ही सहज रूप में प्राप्त हो जाते हैं किंतु जीवन समर में विभिन्न बाधाओं और कर्तव्य पथ पर आने वाली कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय का बोध कराने वाले गुरू का आसानी से मिल पाना संभव नहीं होता है। आज के भौतिक संसार में तो सद्गुरू की तलाश तारे तोड़ने जैसी कठिन परिकल्पना से कम नहीं आंकी जा सकती है। आज के दूषित परिवेश में ज्ञान से परिपूर्ण सच्चा गुरू और समर्पण भावना से शिक्षा ग्रहण करने वाला शिष्य यदि आपस में मिल जाए तो दोनों ही धन्य हो उठते है। गुरू ही उस सेतु का काम करता है, जिस पर जलकर एक शिष्य बड़े समुद्र जैसी कठिन पार उतरने वाली परीक्षा में भी सफल हो जाता है


गुरू का महिमा अनंत है, इसे हम सदियों से स्वीकार करते आ रहे हैं। इसमें भी दो मत नहीं कि गुरू भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है। मानवीय जीवन ही नहीं ईश्वर ने भी गुरू को ही सर्वश्रेष्ठ माना है। गुरू गीता नामक ग्रंथ में कहा गया है कि-
ध्यानमूलं गुरोमूर्तिः पूजामूलं गुरोः पद्म।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।


एक गुरू की भावना से परिपूर्ण प्रतिमा ध्यान का मूल है, उनके चरण कमल पूजन का मूल है, उनके द्वारा कहे गये शब्द ही मूल मंत्र हैं, जबकि उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल अथवा मार्ग है। अनादिकाल से यह माना जा रहा है कि मनुष्य में वह क्षमता तथा सामर्थ्य है, जिससे वह हर उस काम को कर सकता है, जिसे करने का मन में संकल्प ले लिया जाए। प्रश्न यह उठता है कि संकल्प की पूर्णतः कब और कैसे हो पाएगी? यह प्रश्न हमें एक समर्थ गुरू की याद दिलाता है। एक गुरू का सहकार ही हमें अपने संकल्प मार्ग में प्रशस्त कर सकता है, वही हमें कठिनाई से उबारकर लक्ष्य तक पहुंचा सकता है। इसलिए गुरू गीता सार में यह भी कहा गया है-
श्रवणं तु गुरोः पूर्व, मननं तदन्तरम्।
निधिध्यानसम मित्येतत्, पूर्ण बोधस्य कारणम्।।


अर्थात सर्वप्रथम गुरू की बातों को सुनें, फिर मनन करें, और नित्यपूर्ण बातों का गहन अध्ययन करें, तो ही पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।
एक गुरू द्वारा जब भी किसी शिष्य को विद्या देने के लिए स्वीकारा जाता है, तो इतना जरूर होता है कि गुरू उसे मन से स्वीकार करते हुए उसके व्यक्तित्व निर्माण की जिम्मेदारी का वहन करता है। अंधकार को मिटाने, अज्ञानता का लोप करने और पारिवारिक दायित्वों को सही ढंग से जानने समझने के लिए एक गुरू की जरूरत से इंनकार नहीं किया जा सकता है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक शिष्य को सदैव इस बात पर चौकन्ना होना चाहिए कि गुरू उसके किसी व्यवहार से रूष्ट न हो जाए। कारण यह कि यदि भगवान नाराज हो जाए तो उनसे क्षमा याचना की रास्ता बताते हुए गुरू शिष्य को बचा सकता है, किंतु यदि शिक्षा देने वाला गुरू ही नाराज हो जाए तो फिर बचाने वाला कोई नहीं है। यह भी शाश्वत सत्य है कि शिष्य के समर्पण के अनुरूप गुरू की चेतना उसके जीवन में प्रवेश कर सुख शांति और विकास का रास्ता तय करती है। जिस भावना और विश्वास के समर्पण के साथ गुरू भक्ति की जाए, उसकी उतनी ही समग्र शक्ति के साथ गुरू का सानिध्य और आशीर्वाद शिष्य के जीवन का आधार तय जाता है। मुझे एक गुरू की निच्छलता का किस्सा याद आ रहा है।


एक गुरू अपने शिष्यों को रात दिन मानवीय जीवन की जटिलताओं से निकलने और व्यवहारिक शिक्षा देने का काम बड़ी तल्लीनता से किया करते थे, एक बार उनके शिष्यों में से एक गुरू से किसी बात पर रूठ गया और मन में ठान लिया कि अब मैं इसे जिंदा नहीं छोडुंगा। उस शिष्य को अवसर मिला और उसने ध्यान में लीन अपने गुरू को पीछे से पीठ पर चाकुओं से गोदकर मरणासन्न कर दिया। अब तो गुरू अपना जीवन बचाने केवल प्रभु का नाम ही ले पा रहे थे। जीवन की अन्य सारी चिंताएं कहीं खो चुकी थी। इतने में एक शिष्य ने उनसे सवाल किया- आपने जिसे अपना शिष्य बनाया, उसे शिक्षा दी और  मानव धर्म में चलना सिखाया, उसी शिष्य ने आपके प्राण लेने चाहे। आप उस शिष्य को किस नजर से देखते है? इस पर मरणासन्न गुरू का जवाब यह सिद्ध कर गया कि गुरू शिष्य की गलती पर भी अच्छाई ढूंढ निकालते हैं। उक्त गुरू ने कहा कि जिस शिष्य ने मुझे घायल किया है, वह मुझे प्रभु के स्मरण में पहुंचाने का लाभ प्राप्त करा रहा है। अब मैं उसी दर्द के कारण प्रभु को रात दिन याद कर रहा हूं। दुनिया और घर-बार की सारी चिंताएं मेरे जीवन में दूर-दूर तक नहीं है। ऐसे सच्चे गुरू ही वास्तव में आदर के पात्र होते हैं। जब शिष्य को गुरू की इस प्रकार की व्याख्या का ज्ञान हुआ, तो वह अपना अपराध बोध लिए गुरू चरणों में गिर पड़ा।

 

                                     

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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