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इस्मत चुगताईः एक दुस्साहसी नगमानिगार

शताब्दी वर्ष              इस्मत चुगतईः एक दुस्साहसी नगमानिगार

- राजीव आनंद
    इस्मत चुगतई, जिन्हें 'इस्मत आपा' के नाम से भी जाना जाता है, उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादस्पद लेकिन सर्वप्रमुख लेखिका थी। इस्मत आपा ने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया। उन्होंने निम्न मघ्यवर्गीय मुस्लिम तबके की दबी-कुचली लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है


    इस्मत आपा का साहित्यिक फलक काफी व्यापक था जिसमें उन्होंने अपने अनुभव के विविध रंग को उकेरा है। अपनी उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' में उन्होंने अपने ही जीवन के अनुभवों को स्त्री के नजरिए से समाज को दिया है। अपनी कहानी 'लिहाफ' जिसके कारण वो खासी मशहूर हुई और आज भी है, उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए समलैंगिकता के मुद्दे पर कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था, जिसके लिए उन्हें अश्लीलता को लेकर लगाए गए इल्जाम और मुकदमें के रूप में चुकानी पड़ी थी। उन्हें कहानी 'लिहाफ' के लिए लाहौर हाईकोर्ट में समलैंगिकता के आरोप पर मुकदमा लड़ना पड़ा, ये अलग बात है कि इस्मत आपा झूकने के वजाए मुकदमा को लड़ी और मुकदमा अंतत जीत गईं। उन्होंने आज से लगभग आठ दशक पहले पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों के मुद्दों को स्त्री के नजरिए से संजीदा मगर चुटीले अंदाज में पेश करने का जोखिम उठाया था। साहित्य और समाज में चल रहे स्त्री विमर्श को उन्होंने आज से आठ दशक पहले ही प्रमुखता दी थी।


    अपने समय से आगे की सोच रखने वाली इस्मत आपा अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी वजह से उनके पात्र जिंदगी के बेहद करीब नजर आते हैं। महिलाओं के सवालों के साथ उन्होंने समाज की कुरीतियों, विसंगतियों, कुव्यवस्थाओं को अपने पात्रों के माघ्यम से बखूबी पेश किया। उन्होंने मुहावरेदार गंगा-जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे हिन्दी-उर्दू की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। उनके साहित्य में करारा व्यंग्य मौजूद है। उनकी रचनाओं में सबसे आकर्षित करने वाली बात उनकी साहसी शैली थी। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज के बारे में निर्भीकता से लिखा और उनकी इसी दृष्टिकोण की वजह से साहित्य में उन्हें खास मुकाम हासिल हुआ।


    इस्मत आपा की साहित्यिक उपलब्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उर्दू साहित्य के चार स्तम्भों में मंटो, कृष्ण चंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी के साथ इस्मत आपा भी शामिल हैं। ये भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि आलोचकों ने इन चार स्तम्भों में मंटो और इस्मत आपा को उंचे स्थान पर रखते हैं क्योंकि इनकी लेखनी से निकलने वाली भाषा, शैली, कथ्य और मुद्दे ने उर्दू साहित्य को नई पहचान और ताकत दी।


    इस्मत आपा अपने उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' के संबंध में कहतीं है कि ''कुछ लोगों ने ये भी कहा कि टेढ़ी लकीर मेरी आपबीती है, मुझे खुद से आपबीती लगती है। मैंने इस नॉवेल को लिखते वक्त बहुत कुछ महसूस किया। मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है। उनके साथ आँसू बहाए हैं और कहकहे लगाए हैं। उसकी कमजोरियों से जल भी उठी हूँ, उसकी हिम्मत की दाद भी दी है। उसकी नादानियों पर रहम भी आया है और शरारतों पर प्यार भी आया है। ऐसी हालत में अगर मैं कहूँ कि ये मेरी आपबीती है तो कुछ ज्यादा मुबालगा तो नहीं, और जगबीती और आपबीती  में भी तो बाल बराबर का फर्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस नहीं हो तो वह इंसान ही क्या ? और बगैर परायी जिंदगी को अपनाए हुए कोई कैसे लिख सकता है।'' इस्मत आपा आगे कहती हैं कि ''शम्मन की कहानी किसी एक लड़की की कहानी नहीं है। ये हजारों लड़कियों की कहानी है। उस दौर की लड़कियों की कहानी है जब पाबंदियों और आजादी के बीच एक खला में लटक रही थी। और मैंने ईमानदारी से उनकी तस्वीर इन सफात से खींच दी है ताकि आने वाली लड़कियां उससे मुलाकत कर सकें और समझ सके कि एक लकीर क्यों टेढ़ी होती है और क्यों सीधी हो जाती है।''


    15 अगस्त 1915 को उतर प्रदेश के बदायूँ में जन्मी इस्मत आपा ने दिल खोल कर निर्भीक ढ़ंग से लिखा। उनका पहला उपन्यास 'जिद्दी' 1941 में प्रकाशित हुआ तथा उनकी पहली कहानी 'गेंदा' सन् 1949 में उस दौर की उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका 'साकी' में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानी संग्रहों में 'चोटें, छुईमुई, एक बात, कलियाँ, एक रात, दो हाथ दोजखी, शैतान' है। उनकी प्रसिद्ध उपन्यासों में ' जिद्दी, टेढ़ी लकीर, एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, सौदाई, बहरूप नगर, जंगली कबूतर, बांदी, अजीब आदमी' प्रमुख है। 'कागजी है पैराहन' उनकी आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने बड़ी बेबाकी से हर कुछ लिखा है। इस्मत आपा ने अनेक फिल्मों की पटकथा लिखी और फिल्म 'जुगनू' में अभिनय भी किया था। उनकी पहली फिल्म 'छेड़छाड़' 1943 में रिलीज हुई थी। वे कुल तेरह फिल्मों से जुड़ी रही। उनकी आखरी फिल्म 'गर्महवा' 1973 में आई थी, जिसके लिए कैफी आजमी के साथ इस्मत आपा को 1975 में फिल्म फेयर का उत्कृष्ट कहानी का अवार्ड भी मिला था। उन्हें 'टेढ़ी लकीर' उपन्यास के लिए 1974 में गालिब अवार्ड से नवाजा गया था। 1982 में उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा 1989 के लिए राजस्थान उर्दू अकादमी ने 1990 में इकबाल सम्मान से नवाजा था।


    24 अक्टूबर 1991 में 76 वर्ष की उम्र में मुबंई में उनका देंहात हुआ। अपनी वसियत के अनुसार मुबंई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया। अपनी कालजयी कहानियां और उपन्यासों के लिए इस्मत आपा रहती दुनिया तक स्मरणीय रहेंगी।

 


राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड
संपर्क-9471765417

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