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भाषाविज्ञान के प्रमुख विभाग अथवा भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएँ

प्रो. महावीर सरन जैन

भाषा पर विचार करते समय भाषा सम्बन्धी बहुत से पहलुओं पर विचार किया जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि समस्त पहलुओं से विचार करने वाली अध्ययन शाखाओं को भाषाविज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषाविज्ञान की केन्द्रीय शाखाओं के रूप में विवेचित करना उपयुक्त नहीं है। भाषागत प्रश्नों पर विचार करने वाले अध्ययन विभागों की तीन कोटियाँ बनाना उपयुक्त है-

(1.)   भाषाविज्ञान के प्रमुख विभाग अथवा भाषाविज्ञान की प्रमुख अथवा केन्द्रीय शाखाएँ -

(2.)   अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की शाखाएँ -

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान भाषाविज्ञान का अंतःविषय क्षेत्र है। इसके उदाहरण भाषाशिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोशकला अथवा कोशविज्ञान हैं।

(3.)  भाषाविज्ञान से सम्बद्ध अध्ययन विभाग –

भाषा सम्बंधित समस्याओं का अध्ययन एवं उनका समाधान एक ओर भाषाविज्ञान करता है वहीं दूसरी ओर मनोविज्ञान, नृविज्ञान, समाजविज्ञान एवं साहित्य शास्त्र भी भाषा सम्बंधी समस्याओं पर विचार करता है। दूसरे शब्दों में जहाँ ज्ञानानुशासन के अन्य विषयों का ज्ञान भाषावैज्ञानिक की भाषा अध्ययन में सहायता करता है, वहीं दूसरी ओर भाषाविज्ञान का ज्ञान शिक्षा शास्त्री, मनोवैज्ञानिक, नृवैज्ञानिक, समाजवैज्ञानिक एवं साहित्य शास्त्री अथवा साहित्यालोचक की भाषा विषयक समस्याओं के समाधान में सहायता करता है। परस्पर के आदान-प्रदान के परिणाम स्वरूप ज्ञानानुशासन के नए विषयों का जन्म हुआ है। इन अध्ययन विभागों में प्रमुख हैं –

  1. मनोभाषाविज्ञान (Psycholinguistics)

  2. नृजातिभाषाविज्ञान अथवा मानवजाति-भाषाविज्ञान (Ethno linguistics)

  3. समाजभाषाविज्ञान (Socio-linguistics)

  4. शैली विज्ञान (Stylinguistics)

बहुत से विद्वान इनको ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ के ही अन्तर्गत परिगणित करते हैं। लेखक ने इनको ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ से भिन्न कोटि के अन्तर्गत रखा है। इसका कारण निम्न है –

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ में भाषाविज्ञान का ज्ञान शिक्षाशास्त्री, कोशकार एवं अनुवादक आदि क्षेत्रों में कार्यरत विद्वानों के लिए सहायक होता है किन्तु ‘भाषाविज्ञान से सम्बद्ध अध्ययन विभागों’ में एक ओर अन्य विषय भाषावैज्ञानिक की सहायता करते हैं वहीं भाषावैज्ञानिक अन्य विषयों के विद्वानों की सहायता करता है। इन विषयों का प्रादुर्भाव एकाधिक विषयों के परस्पर आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप हुआ है।

सम्प्रति भाषविज्ञान के प्रमुख विभाग अथवा भाषाविज्ञान की केन्द्रीय शाखाओं के सम्बन्ध में विचार किया जाएगा। भाषा के चार तत्व प्रमुख माने जाते रहे हैं –

  1. ध्वनि अथवा वर्ण विचार

  2. शब्द समूह

  3. व्याकरण

  4. अर्थ

    भाषा में शब्द और अर्थ द्रव्य (substance) हैं। सामान्य व्यक्ति भाषा में शब्द और अर्थ को महत्व देता है। उसके द्वारा हम अपने भाव और विचार को व्यक्त करते हैं। भाषा-संरचना को महत्व देने वाले भाषावैज्ञानिक यह मानते हैं कि भाषा में शब्द तो आसानी से परिवर्तित हो जाते हैं मगर भाषा-संरचना अपेक्षाकृत स्थिर तत्व है। जैसे नदी के तट पानी की धारा के प्रवाह को मर्यादित रखते हैं, वैसे ही भाषा का व्याकरण भाषा को बाँधे रखता है। इन चार तत्वों में से शब्दों अथवा शब्द समूह की विवेचना कोशकार के अध्ययन सीमा में अधिक आती है; भाषावैज्ञानिक की अभिरिचि भाषा के शब्दों की विवेचना की अपेक्षा उसके व्याकरण की विवेचना में अधिक होती है। इस दृष्टि से भाषा के दो पक्ष हैं।

    (1) भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था (Grammatical system) अथवा भाषा व्यवस्था (Language system)

    (2) शब्दावली (Vocabulary or Glossary)

    अन्तर

  1. भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था सम्बंध-दर्शी होती है इसके विपरीत भाषा की शब्दावली अर्थ-दर्शी होती है।

  2. भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था आबद्ध, सीमित एवं नियंत्रित होती है जबकि भाषा की शब्दावली मुक्त, असीमित एवं अनियंत्रित होती है। भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था के आबद्ध एवं नियंत्रित  होने के कारण भाषावैज्ञानिक किसी भाषा के व्याकरणिक नियमों का निर्धारण कर पाता है। उसके नियम परिमित होते हैं। भाषा की शब्दावली के मुक्त एवं अनियंत्रित होने के कारण किसी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की संख्या अपरिमित होती है। किसी भाषा का कोई भी कोशकार यह दावा नहीं कर सकता कि उसने ऐसा कोश बना दिया है जिसमें उस भाषा में प्रयुक्त होने वाले समस्त शब्द समाहित हैं।

  3. भाषा की यह प्रकृति है कि उसमें परिवर्तन होता रहता है। भाषा-परिवर्तन के स्वरूप और उसके कारणों की विवेचना अन्यत्र की जाएगी। यहाँ केवल यह कहना यथेष्ट है कि भाषा के व्याकरणिक नियम अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं। उनके बदलाव की गति बहुत धीमी होती है। ये नियम भाषा को बाँधे रहने की भूमिका का निर्वाह करते हैं। इसके विपरीत भाषा में नए शब्दों का प्रवेश होता रहता है तथा शब्दों का लोप भी होता रहता है।

    (देखें – महावीर सरन जैन: भाखा बहता नीर, साहित्य अमृत, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, अक्टूबर, 2012)

    परम्परागत व्याकरण में विवेच्य भाषा की ध्वनियों, व्याकरण एवं अर्थ पर ही अधिक विचार किया जाता था। बीसवीं शताब्दी से पहले तक यूरोप की अधिकांश भाषाओं के परम्परागत व्याकरण इन भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप न होकर लैटिन एवं ग्रीक व्याकरणों का अनुगमन करके लिखे जाते थे। इसी प्रकार हिन्दी के परम्परागत व्याकरण भी संस्कृत व्याकरण को आदर्श मानकर लिखे गए। वर्णनात्मक एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान में ध्वनि, शब्द एवं अर्थ की अपेक्षा ध्वनिमों अथवा स्वनिमों का तथा व्याकरण के धरातल पर परम्परागत व्याकरण के मॉडल में विवेच्य भाषा के उदाहरणों को रखने के स्थान पर उस भाषा की अपनी विशिष्ट व्यवस्था और संरचना के नियमों का अध्ययन करना अभीष्ट हो गया। सूचक से प्राप्त भाषिक-सामग्री के विश्लेषण और वितरणगत स्थितियों के आधार पर व्यवस्थागत इकाइयों को जानने के लिए नई तकनीकों का विकास हुआ। ध्वनिमिक व्यवस्था में ध्वनि विवेचन का महत्व समाप्त हो गया। उसके स्थान पर स्वनिमिक अध्ययन किया जाने लगा। किसी भाषा में दो ध्वनियों का वितरण किस प्रकार का है – यह जानना महत्वपूर्ण हो गया। स्वनिमिक व्यवस्था के अध्ययन का मतलब पूरक वितरण एवं / अथवा स्वतंत्र परिवर्तन में वितरित ध्वनियों का एक वर्ग अर्थात्  स्वनिम बनाना तथा व्यतिरेकी अथवा विषम वितरण में वितरित ध्वनियों को अलग अलग  स्वनिम के रूप में रखने की पद्धति का विकास हुआ। व्याकरणिक अध्ययन का आरम्भ विवेच्य भाषा की उच्चार की लघुतम अर्थवान अथवा अर्थयुक्त इकाइयों की वितरणगत स्थितियों के आधार पर रूपप्रक्रियात्मक संरचना का अध्ययन होने लगा। सूचक से प्राप्त भाषिक सामग्री को प्रमाणिक मानकर उसके आधार पर भाषा के प्रत्येक स्तर पर विश्लेषण एवं वितरणगत तकनीकों के आधार पर भाषिक इकाइयों को प्राप्त करना तथा उसके बाद उनकी श्रृंखलाबद्ध संरचना के नियम बनाना लक्ष्य हो गया। हॉकिट ने भाषा की पाँच उप-व्यवस्थाओं में  से तीन को केन्द्रीय के रूप में स्वीकार किया है –

    व्याकरणीय व्यवस्था (The Grammatical System): रूपिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।

    स्वनिमिक व्यवस्था (The Phonological System): ध्वनिग्रामों अथवा स्वनिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।

    रूपस्वनिमिक व्यवस्था (The Morphophonemic System): व्याकरणिक एवं स्वनिमिक व्यवस्थाओं को परस्पर संबद्ध करने              वाली संहिता। (संधि व्यवस्था)। इन्हें केन्द्रीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका उस भाषेतर वातावरण से, जहाँ भाषा का प्रयोग किया जाता है, प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता।

    (A Course in Modern Linguistics, P. 137, (1958))

    संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों ने इन तीन व्यवस्थाओं को ही केन्द्रक माना और ध्वनि एवं अर्थ को केन्द्रक परिधि से बाहर माना। संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों ने भाषा विश्लेषण में अर्थ की उपेक्षा की किन्तु प्राग स्कूल के भाषावैज्ञानिकों ने अर्थ का परित्याग नहीं किया। प्राग स्कूल के भाषावैज्ञानिकों ने भाषा के आशय (Content) को महत्वपूर्ण माना। उनका विचार था कि भाषा का आशय उच्चार के संदर्भ से निर्दिष्ट होता है। यही भाषा का प्रकार्य है। शब्द के अर्थ का मतलब केवल शब्दकोशीय अर्थ ही नहीं है अपितु इसमें शैलीगत एवं संदर्भगत अर्थ भी समाहित हैं। इनकी मान्यता है कि भाषा का प्रयोक्ता अपने विचारों का सम्प्रेषण करता है। भाषा शून्य में नहीं अपितु समाज में बोली जाती है। भाषा सामाजिक वस्तु है। सम्प्रेषण में वक्ता श्रोता को केवल तथ्यपरक सूचना ही नहीं देता। वह सम्प्रेषित तथ्य के बारे में अपने निजी भावों को भी प्रकट करता है। संदर्भ के बिना भाषा के वक्ता के आशय को नहीं समझा जा सकता। वक्ता अपनी बात से श्रोता में मनोनुकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न करना चाहता है। भाषा की व्यवस्था में सम्प्रेषण व्यापार के सभी प्रकार्यों का स्थान है। लंदन सम्प्रदाय के प्रोफेसर फर्थ के मत के अनुसार भाषा के विश्लेषण का उद्देश्य उसके अर्थ का विवरण प्रस्तुत करना है जिससे हम भाषा के जीवंत प्रयोगों को आत्मसात कर सकें। भाषा एक अर्थपूर्ण प्रक्रिया है। प्रोफेसर फर्थ का मत है कि भाषा अर्थपूर्ण भाषा-व्यवहार है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अर्थ के अध्ययन को भाषाविज्ञान की केन्द्रक परिधि में माना जाए अथवा नहीं – इस बारे में हमें विरोधी विचार मिलते हैं। संरचनात्मक भाषाविज्ञान और प्रोफेसर फर्थ के विचारों के अन्तर को इससे समझा जा सकता है कि जहाँ संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा का अध्ययन ‘अर्थ को बीच में लाए बिना’ की मान्यता को ध्यान में रखकर करने जोर देता है वहीं इसके उलट प्रोफेसर फर्थ का विचार था कि भाषा का विश्लेषण हम जिस स्तर पर क्यों न करें, वह विश्लेषण प्रत्येक स्तर पर अर्थ का ही विश्लेषण है।

    "अर्थ प्रसंगाश्रित सम्बंधों (contextual relations) की संश्लिष्टता है और ध्वनि, व्याकरण, शब्दकोष निर्माण और अर्थविज्ञान इनमें से प्रत्येक के अपने उचित संदर्भ में प्रसंगाश्रित सम्बंधों की संश्लिष्टता के घटक होते हैं"।

(J.R.Firth: The Technique of Semantics (Papers in Linguistics, P.19)

 

व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) भाषा को सामाजिक संदर्भ में व्याख्यायित करने का सिद्धांत है। भाषा सामाजिक संदर्भानुसार परस्पर विनिमय होने वाले अर्थ को व्यक्त करने का एक संसाधन है। इसी कारण व्यवस्थागत प्रकार्यात्मक व्याकरण भाषा के अर्थ को विवेच्य मानता है। भाषा के प्रयोक्ता भाषा का प्रयोग सामाजिक संदर्भगत अर्थ को व्यक्त करने के लिए करते हैं। इसी कारण हैलिडे का कथन है कि भाषा का प्रयोक्ता किन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भाषा का प्रयोग एक संसाधन के रूप में कर रहा है – इस पर भाषावैज्ञानिक को अपनी दृष्टि केन्द्रित रखनी चाहिए। हैलिडे का स्पष्ट विचार है कि भाषा का महत्व उसके सामाजिक उपयोग में निहित है और इस पर अनिवार्य रूप से उपभोक्ता की दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए। हैलिडे ने प्रोफेसर फर्थ के विचारों को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने अर्थ के साथ-साथ सामाजिक परिस्थितियों तथा संदर्भों को भी समाविष्ट किया। हैलिडे ने माना कि भाषा के अध्ययन में संदर्भ प्रमुख है जो भाषा को सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ने का काम करता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वर्णनात्मक एवं संरचनात्मक भाषावैज्ञानिक भाषविज्ञान के विभागों अथवा भाषाविज्ञान की इन शाखाओं को प्रधान शाखाओं एवं गौण शाखाओं के रूप में विभाजित करते थे तथा प्रधान शाखाओं के अन्तर्गत भाषा के अलग-अलग स्तरों पर प्राप्त संरचनाओं एवं व्यवस्थाओं का विश्लेषण एवं विवेचन करते थे जबकि गौण शाखाओं के अन्तर्गत ‘ध्वनि’ एवं ‘अर्थ’ का अध्ययन, भाषागत सामान्य सिद्धान्तों का निरूपण तथा संसार की भाषाओं के वर्गीकरण से सम्बन्धित विवेचन करते थे। प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के विकास के बाद अर्थ का अध्ययन केन्द्रक हो गया। संरचनात्मक भाषाविज्ञान एवं प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान की विवेचना से यह स्पष्ट है कि संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों ने अर्थ की उपेक्षा की मगर प्रकार्यात्मक भाषावैज्ञानिकों ने यह माना कि अर्थ की व्याख्या एवं सहारे के बिना व्याकरणिक पद की प्रकार्यात्मक भूमिका को नहीं समझा जा सकता। यह कहा जा चुका है कि भाषा मानवीय अनुभवों का प्रतिपादन करता है। मानवीय अनुभवों का संसार अपरिमित है। इस कारण भाषा में एक कथ्य के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग होता है। एक शब्द के संदर्भ के अनुसार अनेक अर्थ होते हैं। एक शब्द के अनेक प्रयोग होते हैं। भाषा का प्रयोगकर्ता अपनी भाषा में उपलब्ध विकल्पों में से संदर्भ को ध्यान में रखकर किसी विकल्प का चयन करता है। भाषा में उपलब्ध विकल्प भाषा के विभिन्न स्तरों पर मिलते हैं। भाषा के तीन बुनियादी स्तर होते हैं।

ध्वनि

शब्द-व्याकरण (lexicogrammar)

अर्थ

इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि भाषाविज्ञान की प्रधान शाखाओं के सवाल पर भाषावैज्ञानिकों में

मतैक्य नहीं है। भाषाविज्ञान के सामान्य पाठक की दृष्टि से हम भाषाविज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाओं की विवेचना करेंगे।

भाषा का ध्वन्यात्मक पक्ष: ध्वनिविज्ञान एवं ध्वनिमविज्ञान अथवा स्वनिम विज्ञान

भाषा का व्याकरणिक पक्ष: रूपिमविज्ञान एवं वाक्यविज्ञान

भाषा का अर्थ अथवा कथ्य पक्ष: अर्थविज्ञान

इस प्रकार भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएँ निम्न हैं

  1. ध्वनिविज्ञान अथवा स्वनविज्ञान (Phonetics) – इसके अन्तर्गत भाषा की आधारभूत सामग्री का अध्ययन किया जाता है। किसी भी भाषा का कोई भी उच्चार ध्वनियों अथवा स्वनों का अविच्छिन्न प्रवाह है। भाषा की ध्वनियाँ स्वतः अर्थहीन होती हैं। ध्वनियों का उच्चारण भौतिक घटनाएँ हैं तथा इस रूप में ये भौतिक विज्ञान में भी विवेच्य हैं। ध्वनिविज्ञान अथवा स्वनविज्ञान में वाक् ध्वनियों के उत्पादन, संचरण एवं संवहन का अध्ययन किया जाता है।

  2. स्वनिमविज्ञान (Phonemics) - इसमें विवेच्य भाषा की ध्वनियों अथवा स्वनों के वितरण के आधार पर अर्थ-भेदक अथवा विषम वितरण में वितरित स्वनिमों का अध्ययन किया जाता है। प्रत्येक भाषा में ध्वनियों की अपनी व्यवस्था होती है। दो भाषाओं में ध्वनियाँ समान हो सकती हैं किन्तु उनका भाषाओं में प्रकार्य समरूप नहीं होता। इस कारण ध्वनियों की संरचनात्मक इकाइयों में भेद होता है। जब हम ध्वन्यात्मक व्यवस्था की विवेचना करते हैं तब हमारा तात्पर्य किसी विशिष्ट भाषा के स्वनिमों से होता है। उदाहरण के लिए हिन्दी एवं तमिल में "क्" एवं "ग्" ध्वनियों का उच्चारण होता है। हिन्दी में इनका स्वनिमिक महत्व है। तमिल में इनका स्वनिमिक महत्व नहीं है। इसी कारण तमिल की लिपि में इनके लिए अलग अलग वर्ण नहीं हैं।

  3. रूपिमविज्ञान (Morphemics)  अथवा शब्दरूपप्रक्रिया (Morphology)

  4. वाक्यविज्ञान (Syntax) –

    रूपिमविज्ञान एवं वाक्यविज्ञान को अलग-अलग शाखाएँ माना जाए अथवा नहीं – यह भी विवाद का विषय है। किसी भाषा के स्वनिमों के  विशिष्ट क्रम से निर्मित रूपात्मक या व्याकरणिक इकाइयों की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं का अध्ययन इन शाखाओं का विवेच्य है। स्वनिम व्यवच्छेदक अर्थात् अर्थ भेदक होते हुए भी स्वयं अर्थ शून्य होते हैं किन्तु इन्हीं के विशेष क्रम से संयोजित होने वाले रूप, शब्द, वाक्यांश एवं वाक्य भाषा के अर्थवान तत्त्व होते हैं। भाषावैज्ञानिक भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था को जानने के लिए इन्हीं तत्त्वों के द्वारा संरचित संरचना स्तरों का अध्ययन करता है। (रूपों का संचय एवं उससे निर्मित रूपिम, शब्द, वाक्यांश, एवं वाक्य आदि)। भाषा में प्रत्येक  स्तर पर रचना की विशिष्ट व्यवस्था होती है। प्रत्येक स्तर की इकाई अपने से निम्न स्तर की एक अथवा एकाधिक इकाइयों से मिलकर बनती है। दूसरे शब्दों में निम्न स्तर की एक अथवा एकाधिक इकाइयाँ मिलकर बड़े स्तर की इकाई की रचना करती हैं। उदाहरण के लिए वाक्य स्तर की इकाई एक अथवा एकाधिक उपवाक्य / उपवाक्यों द्वारा बनती है। हिन्दी भाषा के संदर्भ को ध्यान में रखकर इनको इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है –

संरचना स्तर

संरचित इकाई

संरचक (एक अथवा एकाधिक)

वाक्यीय स्तर

वाक्य

उपवाक्य

उपवाक्यीय स्तर

उपवाक्य

वाक्यांश अथवा पदबंध

वाक्यांश अथवा पदबंध स्तर

वाक्यांश अथवा पदबंध

पद (सविभक्तिक शब्द)

पदीय स्तर

पद (सविभक्तिक शब्द)

शब्द

शब्द स्तर

शब्द

रूपिम

 

प्रत्येक स्तर की संरचक इकाई/ इकाइयों के क्रम, विस्तार आदि की अभिरचनाएँ (Patterns) होती हैं। इन अभिरचनाओं की नियमबद्धता एवं परस्पर सम्बंधों के नियम उस स्तर की व्यवस्था को स्पष्ट करते हैं। विविध स्तरों की इकाइयों के परस्पर मिलकर अपने से बड़े स्तर की इकाइयों की रचना के नियम संरचना को स्पष्ट करते हैं। विविध स्तरों का परस्पर अधिक्रम होता है। अधिक्रम में एक स्तर में आनेवाली इकाइयों का संरचनात्मक मूल्य समान होता है। संरचनात्मक मूल्य से उस व्याकरणिक इकाई की पहचान होती है। एक स्तर की व्याकरणिक इकाई अधिक्रम में अपने से नीचे स्तर की व्याकरणिक इकाई/ इकाइयों की पहचान कराती है। जो विद्वान रूपिमविज्ञान एवं वाक्यविज्ञान को अलग-अलग शाखाएँ मानते हैं उनके मतानुसार रूपिमविज्ञान में हम लघुतम अर्थयुक्त् इकाईयों से बड़ी इकाईयों के अध्ययन की ओर प्रवृत्त होते हैं तथा वाक्यविज्ञान में बड़ी इकाइयों से छोटी इकाइयों की ओर प्रवृत्त होते हैं। निम्न स्तर की संरचना की इकाई अपने से बड़े स्तर की संरचना की संरचक होती है। उदाहरण के लिए शब्द स्तर पर संरचक रूपिम होते हैं। वाक्यांश स्तर पर संरचक शब्द होते हैं। उपवाक्य स्तर पर संरचक वाक्यांश एवं वाक्य स्तर पर संरचक उपवाक्य होते हैं। किसी भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए उसका रूपिम एवं वाक्य विन्यासीय अध्ययन करते हैं। रूपिमविज्ञान में उच्चारों को रूपों में विभाजित करके, वितरण के आधार पर रूपिम में वर्गबद्ध करते हैं। आबद्ध रूपिमों को व्युत्पादक एवं विभक्ति प्रत्ययों में वर्गीकृत किया जाता है। इस अध्ययन से भाषा की व्युत्पन्न प्रतिपादिक रचना एवं विभक्ति व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। विभक्ति प्रत्यय किसी/किन्हीं वैयाकरणिक रूप/रूपों की सिद्धि करते हैं। कोटियों के अनुरूप वैभक्तिक होने तथा/अथवा वैभाक्तिक शब्दों के वाक्यीय प्रकार्य के आधार पर भाषा के समस्त शब्दों को वाग्भागोंमें विभक्त किया जाता है। प्रत्येक वाग्भाग का अध्ययन वैयाकरणिक कोटियों के अनुरूप रूपान्तरित होने वाले वर्गों उपवर्गों के अनुरूप किया जाता है। वाक्यविज्ञान में विवेच्य भाषा के वाक्यों की संरचना सम्बंधी अध्ययन किया जाता है। सामान्यतः किसी भाषा के सामान्य वाक्य को पहले संज्ञा वाक्यांश (NP) एवं क्रिया वाक्यांश (VP) में विभक्त किया जाता है।नॉम चॉम्स्की ने गहन संरचना के नियमों को जानने के लिए रचनांतरण व्याकरण का मॉडल प्रस्तुत किया। प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन के बाद विवेच्य भाषा के वाक्य संरचना के विभिन्न तत्त्वों का संरचनात्मक एवं अर्थपरक आधारों पर अध्ययन किया जाता है। इसमें सबसे अधिक महत्व भाषा के वाक्य प्रकारों, मूल अथवा आधार वाक्यों का निर्धारण, मूल अथवा आधार वाक्यों के साँचों एवं उपसाँचों का अध्ययन किया जाता है।

  1. अर्थविज्ञान (Semantics) – इसमें विवेच्य भाषा के शब्दों के अर्थों का अध्ययन किया जाता है। शब्दार्थ का अध्ययन ऐतिहासिक, तुलनात्मक एवं शब्द के वर्तमानकालिक संदर्भानुसार अर्थ प्रयोगों सहित किया जाता है। उदाहरण के लिए शब्दार्थ के ऐतिहासिक अध्ययन में शब्द में कालक्रमानुसार हुए अर्थ परिवर्तनों के कारणों एवं विभिन्न प्रकार के अर्थ परिवर्तनों के सम्बंध में विचार किया जाता है। 

भाषाविज्ञान की अन्य शाखाएँ

  1. क्षेत्र-कार्य भाषाविज्ञान (Field Linguistics) -    भाषा का अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक है कि हम विवेच्य भाषा-क्षेत्र का सर्वेक्षण करें तथा विवेच्य भाषा के सूचकों से भाषा सामग्री संकलित करें। इस दृष्टि से ‘क्षेत्र-कार्य भाषाविज्ञान (Field Linguistics)’ भाषाविज्ञान के अध्ययन का एक विभाग है। इसके अन्तर्गत प्रमुख रूप से निम्न विषयों पर विचार किया जाता है –

  1. भाषा-सर्वेक्षण की विशेषताएँ, स्वरूप एवं प्रकृति

  2. सर्वेक्षण-सामग्री

  3. प्रश्नावली का निर्माण

  4. सर्वेक्षण-क्षेत्र की जानकारी

  5. सामग्री संकलन

  6. सूचकों का चयन, सूचकों की विशेषताएँ एवं योग्यताएँ

  7. सामग्री का अंतर्राष्ट्रीय स्वन वर्णमाला (IPA) लिपि में प्रतिलेखन

  8. सामग्री का विश्लेषण

     

  1. भाषा-भूगोल (Linguistic Geography) अथवा बोलीविज्ञान (Dialectology) -    किसी भाषा-क्षेत्र के उपभाषा, बोली आदि क्षेत्रों तथा भिन्न भाषायी क्षेत्रों का निर्धारण ‘बोलीविज्ञान’ अथवा ‘भाषा भूगोल’ के सिद्धांतों के आधार पर होता है। कुछ विद्वान भाषा-भूगोल (Linguistic Geography) अथवा बोलीविज्ञान (Dialectology) को समानार्थक मानते हैं। भाषा-भूगोल (Linguistic Geography) अथवा बोलीविज्ञान (Dialectology) में अन्तर मानने वाले विद्वानों का यह मानना है कि भाषा-भूगोल (Linguistic Geography) में विवेच्य भाषा-क्षेत्र की केवल क्षेत्रगत विविधताओं का अध्ययन किया जाता है मगर बोलीविज्ञान (Dialectology) में विवेच्य भाषा-क्षेत्र की समस्त प्रकार की भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। भाषा-भूगोल (Linguistic Geography) के अन्तर्गत भाषा के प्रत्येक तत्व को समभाषांश सीमा-रेखा द्वारा भाषा मानचित्रावली में स्पष्ट किया जाता है। इस अध्ययन से दो भाषाओं एवं एक भाषा की दो बोलियों के संक्रमण-क्षेत्र का वैज्ञानिक ढंग से निर्धारण किया जाता है। इस अध्ययन से भाषा-क्षेत्र के केन्द्रीय क्षेत्र, अवशिष्ट क्षेत्र तथा संक्रमण-क्षेत्र आदि का निर्धारण वैज्ञानिक ढंग से सम्पन्न हो पाता है।

  2. भाषाविज्ञान में सामान्य भाषा के स्वरूप तथा भाषाविश्लेषण की विभिन्न पद्धतियों के सम्बन्ध में भी विचार किया जाता है।

(9)   भाषाविज्ञान में संसार भर की भाषाओं का ऐतिहासिक सम्बन्ध तथा सम्बन्ध तत्त्वों की समानता एवं प्रकारात्मक आदि आधारों पर वर्गीकरण प्रस्तुत किया जाता है।

 

7

अनुप्रयुक्त-भाषाविज्ञान

 

7.1.  भाषाशिक्षण

7.2.  कोश विज्ञान

7.3.  व्युत्पति शास्त्र

7.4.  अनुवाद विज्ञान

 

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ ज्ञान की एक अलग शाखा के रूप में विकास कर रहा है।

 

      भाषा वैज्ञानिक सिद्धान्तों, भाषा विश्लेषण की विभिन्न पद्धतियों तथा विभिन्न भाषाओं के विश्लेषणात्मक अध्ययन संबंधी, निष्कर्षों का उपयोग एवं प्रयोग भाषा संबंधी अन्य समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। भाषा संबंधी अन्य समस्याओं में प्रमुख हैं-भाषा-शिक्षण, अनुवाद कोश-विज्ञान।

      ‘अनुप्रयुक्त-भाषाविज्ञान’ में भाषावैज्ञानिक अध्ययन की सहायता से उपर्युक्त भाषा विषयक समस्याओं के संबंध में विचार किया जाता है। इस दृष्टि से ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखायें निम्नलिखित है:-

      (1.)   भाषा विज्ञान (विशेष रूप से अन्य-भाषा के रूप में शिक्षण)

      (2.)   कोश-विज्ञान

      (3.)   व्युत्पत्ति शास्त्र

      (4.)   अनुवाद विज्ञान

 

7.1.  भाषा शिक्षण

      मातृभाषा को व्यक्ति बाल्यकाल में समाज में रहकर सीख लेता है किन्तु अन्य भाषा सिखाते समय हमें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

      मातृभाषा-शिक्षण एवं अन्य-भाषा-शिक्षण में कई मूलभूत अन्तर हैं। इनमें सर्वप्रमुख यह है कि जब कोई बालक स्कूल में पढ़ने जाता है, तो अपनी मातृभाषा को ध्वनि-व्यवस्था, व्याकरण एवं शब्दावली को सीख चुका होता है। अपनी मातृभाषा की ध्वनियों, दैनिक जीवन की शब्दावली एवं उसके सरल वाक्य साँचों से अभ्यस्त हो चुका होता है। किन्तु अन्य-भाषा शिक्षण के आरम्भ में वह अन्य भाषा में बिल्कुल अपरिचित एवं अनभिज्ञ होता है।

      भाषाविज्ञान ने अन्य-भाषा शिक्षण में महत्वूपर्ण योगदान दिया है। भाषावैज्ञानिक लक्ष्य-भाषा का भाषा का भाषावैज्ञानिक अध्ययन कर उसकी अभिरचनाओं एवं व्यवस्थाओं की विवेचना करता है। साथ ही प्रशिक्षणार्थी की मातृभाषा की अभिरचनाओं एवं व्यवस्थाओं को ज्ञात कर दोनों भाषाओं (मातृभाषा एवं लक्ष्य भाषा) का, प्रत्येक स्तर पर व्यतिरेकात्मक अध्ययन करता है। इस अध्ययन से दोनों भाषाओं की व्यवस्था एवं संरचना के साम्य वैषम्य का पता चल जाता है। वह यह भी ज्ञात करता है कि मातृभाषा से भिन्न लक्ष्य-भाषा की अभिरचनायें कौन-कौन सी हैं तथा प्रशिक्षण में मातृभाषा के कौन-कौन से भाषिक तत्त्वों का व्याघात संभावित है। इस दृष्टि से वह अध्यापन बिन्दुओं का निर्माण कर, पाठ्य सामग्री का निर्माण करता है। लक्ष्य-भाषा के विशिष्ट ध्वन्यात्मक लक्षणों को अभिरचना-प्राभ्यास प्रक्रिया द्वारा सिखाने की सामग्री प्रदान करता है। इसी प्रकार लक्ष्य-भाषा की विशिष्ट व्याकरणिक अभिरचनाओं, मूल उपवाक्य संरचनाओं तथा उनके विस्तारणों एवं रूपान्तरणों, शब्द अथवा व्याकरणिक खण्ड परिवर्तनों तथा विविध प्रकार के प्राभ्यसों-सुनना, दुहराना, पहचानना, प्रतिस्थापन, रूपान्तरण, विस्तार, प्रश्नोत्तर आदि की पाठ-सामग्री बनाता है। भाषा-प्रयोगशाला क लिए विशेष पाठों का निर्माण करता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान की पद्धतियों द्वारा भाषा के संपूर्ण प्रशिक्षण का कार्य पूर्व नियोजित एवं वर्गीकृत पाठय-सामग्री तथा नियन्त्रित प्रक्रिया के द्वारा संपन्न करता है।

      इस प्रकार भाषा-विश्लेषण, भाषा-शिक्षण-सामग्री-निर्माण तथा भाषा-सामग्री के वर्गीकरण एवं प्रस्तुतीकरण आदि में आधुनिक भाषाविज्ञान बहुत सहायता प्रदान करता है। यह भी उल्लेखनीय ‘भाषाविज्ञान’ भाषा-शिक्षण में सहायक साधन मात्र है, भाषाविज्ञान ही भाषा-शिक्षण नहीं है। भाषा का अध्यापक भाषाविज्ञान की सहायता से शिक्षणार्थी की मातृभाषा एवं लक्ष्य-भाषा के स्वरूप, साम्य वैषम्य, शिक्षण कार्य की सम्भावित समस्याओं की खोज तथा समाधान हेतु पाठय-सामग्री का तदनुरूप निर्माण आदि कार्य सम्पन्न करता है किन्तु कक्षा में वह भाषा सीखाता है, भाषविज्ञान नहीं पढ़ाता।

    

7.2.  कोश विज्ञान

      कोशकार किसी भाषा के समस्त शब्दों का संग्रह कर, उन्हें अकराादि क्रम से सजाता है। प्रत्येक का विभिन्न प्रसंगों एवं संदर्भों मेें अर्थ-निर्धारण कर, उसके समस्त अर्थों एवं अर्थ-छायाओं का विधान करता है। शब्द के पूर्ण विवरण के लिए वह शब्द का मूलरूप खोजता है, उसके व्याकरणिक रूप को ज्ञात करता है तथा लिंग आदि का निर्वाचन करता है। उसका उच्चरित रूप ज्ञात कर, उसको ध्वन्यात्मक प्रतिलेखन में लिखता है।

      इस समस्त कार्य में ध्वनिविज्ञान, रूपग्रामविज्ञान, अर्थविज्ञान एवं ऐतिहासिक-विज्ञान उसकी प्रत्येक पग पर सहायता करते हैं।

      वस्तुतः भाषा विज्ञान एवं कोश (निघण्टु एवं निरूक्त) एक दूसरे के पूरक हैं।

      संस्कृत में व्याकरण, निघण्टु एवं निरूक्त का कार्यक्षेत्र अलग रहा है। व्याकरण में दो मूल अर्थ तत्त्वों के मध्य सम्बन्ध तत्त्व की व्याख्या के लिए विभक्ति रूपों की विवेचना की गयी, निघण्टुकार ने शब्द के पर्याय दिए तथा निरूक्तकार यास्क ने व्युत्पत्ति तथा अर्थ-विवेचना का कार्य किया। वैदिक शब्दों का पर्याय-ग्रन्थ ‘निघण्टु’ प्राप्त है।

      यास्क ने अपने निरूक्त में इसकी व्याख्या अर्थात् शब्दों की व्युपत्ति एवं अर्थ का विधान किया है। निघण्टु के कुल 796 शब्दों में से निरूत्त में 536 शब्दों की व्याख्या की गयी है।

      आधुनिक कोशग्रन्थों में निघण्टु एवं निरूत्त दोनों का योग होता है। यह कार्य भाषाविज्ञान की विधियों एवं सिद्धान्तों के आधार पर वैज्ञानिक ढंग से सम्पन्न किया जाता है।

 

7.3.  व्युत्पत्ति शास्त्र

      व्युत्पत्ति शास्त्र में शब्द के मूलरूप की खोज की जाती है। अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति ज्ञात नहीं है। इसके लिए भाषाविज्ञान ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अन्तर्गत एक भाषा की विविध बोलियों अथवा एक भाषा परिवार की विविध भाषाओं के ज्ञात रूपों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर शब्द के पूर्ववर्ती अज्ञात रूप के पुननिर्माण की विधि का विकास किया है। इस प्रकार तुलनात्मक विवेचना एवं पुनर्निर्माण-विज्ञान के सिद्धान्त व्युत्पत्तिशास्त्री की सहायता करते है।

      भाषात्मक विकास एवं परिवर्तन सम्बन्धी सिद्धान्त भी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्यक् निर्धारण में सहायता करते हैं।

 

7.4. अनुवाद विज्ञान

      एक भाषा की कृति का दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। विषय की जानकारी भर होने से सही अनुवाद नहीं हो पाता। द्विभाषिक शब्दाकोशों से एक भाषा के शब्द के स्थान पर दूसरी भाषा के शब्द को रखने से भी हमारे लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो जाती। अनुवाद की अनेक भाषावैज्ञानिक समस्याएँ हैं:-

      (1.)   अर्थपरक समस्याएँ-किसी शब्द का उचित पर्याय खोजना अत्यंत कठिन कार्य होता है। प्रत्येक भाषा के शब्द का अपना इतिहास होता है। प्रत्येक भाषियों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परायें होती है, विशिष्ट भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुभव होते हैं, विशिष्ट आस्थायें एवं विश्वास होते हैं, इस कारण प्रत्येक भाषा के शब्द की अपनी विशिष्ट अर्थवत्ता होती है। इस कारण अनुवाद की लक्ष्य भाषा में से उचित एवं सम्यक् अर्थ प्रतीति कराने वाले शब्द की खोज करनी पड़ती है।

      (2.)   व्याकरणिक समस्याएँ-अनुवाद में शब्दों के साथ-साथ भाषा की संरचना में परिवर्तन करना    पड़ता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि अनुवादक मूलग्रन्थ की भाषा की व्याकरणिक विशिष्टताओं, अनुवाद की लक्ष्य भाषा की व्याकरणिक विशिष्टताओं तथा दोनों भाषाओं की व्याकरणिक संरचनाओं एवं व्यवस्थाओं के साम्य वैषम्य से परिचित हो। इस दृष्टि से दोनों भाषाओं के व्याकरणिक अध्ययन एवं व्यतिरेकी भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर उनकी संरचनाओं एवं व्यवस्थाओं के साम्य वैषम्य की जानकारी प्राप्त कर, हम भाषिक संरचना का भी सही अनुवाद कर सकते हैं।

      (3.)   शब्दावली की समस्या-शब्दावली की समस्या के कई रूप हैं:-

      (1)   वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के अनुवाद की समस्या

      (2)   आंचलिक शब्दावली के अनुवाद की समस्या

      (3)   विशिष्ट भावाभिव्यंजक शब्दावली के अनुवाद की समस्या

      इस दृष्टि से यदि अनुवाद की लक्ष्य भाषा में पर्याय उपलब्ध नहीं हो पाता तो या तो अनुवादक लक्ष्य भाषा में शब्दनिर्माण की प्रकृति को ध्यान में रखकर शब्द का निर्माण कर सकता है अथवा मूलग्रन्थ की भाषा के शब्द की मूल प्रकृति या धातु में दूसरी भाषा के रचनात्मक उपसर्गों एवं प्रत्ययों को लगाकर शब्द व्युत्पन्न कर सकता है।

 

      (4.)   ध्वन्यात्मक एवं लिप्यंकन की समस्याएँ-मूलग्रन्थ की भाषा में बहुत से ऐसे शब्द होते हैं जिनका अनुवाद की लक्ष्य भाषा की लिपि में लिप्यंकन करना होता है। इस दृष्टि से मूलभाषा में विवेच्य शब्द का सम्यक् उच्चारण जानने की समस्या तथा उसे उसी रूप में लक्ष्य भाषा की लिपि के द्वारा लिखने के समाधान के लिए ध्वनिविज्ञान, मूल भाषा का ध्वन्यात्मक विवेचन, लिपि विज्ञान तथा लक्ष्य भाषा की परम्परागत लिपि की प्रकृति तथा उसमें अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक प्रतिलेखन के विशिष्ट चिह्रों का उपयोग एवं प्रयोग करने की विधि से सम्बन्धित ज्ञान हमारी सहायता करता है।

      इस प्रकार अनुवाद की भाषावैज्ञानिक समस्याओं का समाधान भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है।

 

 

8

भाषा विज्ञान एवं मनोविज्ञान

 

8.1.  भाषाविज्ञान: मनोविज्ञान के लिए सहायक

8.2.  मनोविज्ञान: भाषाविज्ञान के लिए सहायक

8.3.  स्वतंत्र अध्ययन दृष्टियाँ

 

      मनोविज्ञान का अध्ययन पहले दर्शनशास्त्र के एक अंग के रूप में होता था किन्तु अब मनोविज्ञान एक पृथक विषय बन चुका है। इसके अन्तर्गत मानव व्यवहार से सम्बन्धित नियमों की खोज, उनका विश्लेषण तथा उनकी विवेचना की जाती है।

      मनुष्य की मानसिक घटनाओं का शरीरिक सत्ता के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध है-यह अत्यन्त विवाद का विषय है। इतना निश्चित है कि भाषात्मक अभिव्यक्ति के दो आधार हैं- (1.) मानसिक (2.) शरीरिक।  मनोविज्ञान व्यक्ति विशेष के अनुभवों, धारणाओं एवं क्रियाओं का अध्ययन करता है। व्यक्ति विशेष की धारणाएँ एवं अनुभव प्रत्यक्षतः उसी का अनुभूत होते हैं। व्यक्ति अपने निजी अनुभवों एवं धारणाओं को समाज से जोड़ता है। इसके लिए वह अपने अनुभवों एवं धारणाअें की अभिव्यक्ति करता है। व्यक्ति के अभिव्यक्तिकरण-व्यवहार के साधनों में से प्रमुख साधन उसका वाक्-उच्चारण है।

      व्यक्ति भाषा के द्वारा अपने को समाज से जोड़ता है तथा भाषा के द्वारा उसके अन्तर्मन को जानने में बहुत सहायता मिलती है। इस सम्बन्ध में भाषा एवं विचार (दे0 5.2.) के अन्तर्गत चर्चा की गयी है।

      व्यक्ति के वाक्-व्यवहार का अध्ययन भाषावैज्ञानिक भी करता है तथा मनोवैज्ञानिक भी। मनोवैज्ञानिक भाषा के आधार पर किसी मनुष्य के व्यक्तित्व तथा उसके व्यवहार का अध्ययन करता है। इसके लिए वह उसकी मातृ-भाषा की सामान्य भाषिक व्यवस्थाओं एवं सरंचना से इतर उसके वाक्-व्यवहार की विशिष्टताओं का आकलन करता है।

      भाषावैज्ञानिक भाषा का अध्ययन करते समय उसके माध्यम से अभिव्यक्त विचार के सामान्य पक्ष- ‘अर्थ’ की विवेचना करता है, बच्चों के भाषात्मक विकास तथा उसके द्वारा भाषा अधिगम की समस्याओं तथा अन्य भाषा शिक्षण में प्रशिक्षणार्थियों का अध्ययन करता है एवं किसी भाषा की विविध शैलियों का विश्लेषण करता है। ‘भाषा’ एवं ‘व्यवहार’ तथा ‘भाषा’ एवं ‘विचार’ की आन्तरिकता के कारण दोनों अध्ययन-विषय परस्पर सहायक है।

    

      8.1.  भाषा-विज्ञान: मनोविज्ञान के लिए सहायक

      (1.)   मनुष्य का व्यक्तित्व तथा व्यवहार-भाषा के आधार पर मनुष्य के व्यक्तित्व तथा व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। वाक्-व्यवहार से व्यक्ति के संवेगात्मक अनुभवों और अनुभूतियों को पहचाना जा सकता है। क्रोध में व्यक्ति अलग ढंग से बोलता है, प्यार में अलग ढंग से। आवेश की भाषा अलग तरह की होती है, आनन्दानुभूति की भाषा अलग तरह की। स्नेह और घृणा की अभिव्यक्तियाँ एक सी नहीं होती। अलग-अलग मानसिक स्थितियों में वाक्-व्यवहार के स्वरूप में परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन लय, आघात, अनुतान, लहजा, आदि में देखा जा सकता है।

      भाषाविज्ञान भाषा का वस्तुपरक विश्लेषण करता है। एक भाषा-समाज का व्यक्ति अलग-अलग मानसिक स्थितियों में भिन्न शैलियों में प्रयोग करता है। भाषा-वैज्ञानिक इन शैलियों का विश्लेषण करता है। पांडित्य प्रदर्शन करते समय व्यक्ति ‘तत्सम प्रधान भाषा’ का प्रयोग करता है। जिन्दगी की सामान्य स्थिति में ‘सहज भाषा’ का प्रयोग करता है। बातचीत कभी आम होती है तो कभी खास। उच्चारण का लहजा उसके मनोभाव को प्रकट करता है। रूप तथा वाक्य-धरातल पर भी भाषा-रूप में अन्तर आ जाता है। एक वक्ता किसी दूसरे व्यक्ति को बुलाते समय जिस शब्द का प्रयोग करता है, उससे उसके मनोभाव को सूचना मिल जाती है। ‘इधर आ’, ‘यहाँ आओ’, ‘आइए’- अलग मनोभावों को व्यक्त करते हैं। जिस प्रकार साहित्य के क्षेत्र में प्रत्येक रचनाकार की अपनी निजी शैली होती है, जिस प्रकार व्यक्ति-बोली के स्तर पर प्रत्येक की बोली में निजीपन होता है, उसी प्रकार अलग-अलग मानसिक स्थितियों में व्यक्ति के बोलने का लहजा बदल जाता है, शब्द बदल जाते है, शब्द का ध्वनि-स्वरूप बदल जाता है, रूप व्यवस्था तथा वाक्य व्यवस्था बदल जाती है तथा वाक्य का अर्थ बदल जाता है। भाषा के प्रत्येक स्तर पर व्यक्ति किस मानसिक स्थिति में क्या ‘चयन’ करता है-इसका विश्लेषण भाषा-वैज्ञानिक पद्धति से सहज सम्भव है।

      कभी-कभी व्यक्ति खुली बात नहीं करता, सच्ची बात नहीं बोलता, झूठी बात करता है या बात छिपा जाता है। जब व्यक्ति अपने मन से एक प्रकार से अनुभव करता है तथा उसकी अभिव्यक्ति भिन्न प्रकार से करता है तब उसके ‘वाक्-व्यवहार’ से उसके व्यक्तित्व का विश्लेषण किस प्रकार सम्भव है ? इस सम्बन्ध में विचार किया जा चुका है (दे0 5.2.)।  सम्प्रति, यह उल्लेखनीय है कि यदि शब्द के स्तर पर वह अपने मन की बात छिपा जाता है तो भाषा की संरचना के ‘विचलन प्रयोगों’ से उसके मन की परतों को पहचाना जा सकता है। इस प्रकार के व्यक्तियों का परीक्षण करते समय ‘शब्द-प्रयोग’ की अपेक्षा भाषा-व्यवस्था एवं संरचना प्रयोगों को अधिक महत्त्व देना चाहिए। ‘नहीं’, मैंने यह काम नहीं किया। ‘नहीं, नहीं, यह काम मेरे द्वारा नहीं हुआ’-दोनों वाक्यों का ‘अभिप्रेत-अर्थ’ समान है। दोनों में ‘भाव’ का अन्तर है। इस अन्तर को वाक्यों के संरचना-भेद से जाना जा सकता है।

      मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के चिन्तन के विश्लेषण के लिए भाषिक दृष्टि से ‘शब्द-परीक्षण करता रहा है। इसे चिन्तन के विश्लेषण के लिए भाषा में निहित व्यवस्था एवं संरचना के विश्लेषण की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। इसके लिए इसे भाषा-विज्ञान की संरचनात्मक-पद्धति से परिचय प्राप्त करना चाहिए।

      (2.)   मानसिक विकृति तथा वाक्भ्रन्श-मनोविज्ञान मानसिक दृष्टि से विकृत-व्यक्तियों का भी निदान करता है। इस कारण इसमें ‘वाक् भ्रंश’ का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में भाषाविज्ञान एवं मनोविज्ञान परस्पर सहायक हैं।

(दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्याय 12)।

 

      (3.)   भाषा-अर्जन तथा भाषा विकास-मनोविज्ञान में बच्चों के भाषा अर्जन तथा भाषा-विकास का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की दृष्टि से भाषा सीखना एक माननीय-व्यवहार को ‘सीखना और याद करना है। बच्चा अपनी मातृ-भाषा को सहज रूप से सीख लेता है। यह शब्द सुनता है। धीरे-धीरे उसका अर्थ ग्रहण कर क्रिया करता है। यह बात कही जा चुकी है कि शब्द और अर्थ में प्राकृत सम्बन्ध नहीं है। भाषा के विकास की प्रक्रिया में दोनों का सम्बन्ध जुड़ जाता है। (दे0 3.3.)। भाषा-विकास की दृष्टि से शिशु पहले कुछ सप्ताहों तक रोता है, खाँसता है, छींकता है तथा किलकारी भरता है। तीन महीने का होने पर यदि कोई उसके साथ खेलता है तो प्रसन्नता के साथ हँसता है तथा आवाज़ करता है। छह महीने से नौ महीनों के बीच हिन्दी भाषी बच्चा ‘आ’ ‘पा’ आदि बोलने की कोशिश करता है। पाँच-छह महीने का होने पर यदि कोई उससे बातें करता है तो वह अपना सिर उसकी तरफ घुमाता है। अपनी माँ या अपने अभिभावक का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए आवाज़ करता है। एक वर्ष से डेढ़ वर्ष के बीच वह ‘माँ’, ‘पापा’, ‘बाबा’ आदि कुछ शब्द बोलने लगता है तथा ‘ना’ ‘नही’ जैसे शब्दों का अर्थ समझने लगता है।

      दूसरे वर्ष का होते-होते वह शब्द-प्रयोग करना सीख जाता है। इसी के साथ-साथ वह शब्द में ध्वनि-खंडों को ग्रहण करता है तथा एक शब्द में एक ध्वनि-खंड के स्थान पर दूसरा ध्वनि खंड जोड़कर नया शब्द बनाता है। शब्दों में परस्पर अर्थ-भेद करने लगता है। दो वर्ष का हो जाने के बाद छोटे-छोटे वाक्य बनाने लगता हैं।

      बच्चों के भाषा-अर्जन तथा भाषा-विकास में मनोविज्ञान की विशेष अभिरूचि है। इसका कारण यह है कि यह प्रक्रिया मानव-व्यवहार की कई समस्याओं के समाधान में सहायक है।

      भाषाविज्ञान इस दिशा में मनोविज्ञान को नया चिन्तन एवं पद्धति प्रदान करता है। भाषाविज्ञान से यह जानकारी प्राप्त होती है कि किसी भाषा का बच्चा अपनी भाषा की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं में से किन-किन को किस क्रम से सीखता है। भाषा के सम्पूर्ण शब्द-कोश में से सबसे पहले किन शब्दों का प्रयोग करता है।

      उदाहरण के रूप में एक हिन्दी-भाषी बच्ची के भाषा विकास का अध्ययन करते हुए महरोत्रा ने सबसे पहले उच्चारित ध्वनियाँ (अ), (आ), (म्) तथा सर्वप्रथम उच्चारित शब्द ‘ता’ माना है।

      (4.)   अर्थ-विज्ञान-मनोविज्ञान को भाषाविज्ञान से सबसे अधिक सहायता ‘अर्थ’-विज्ञान’ के क्षेत्र में प्राप्त होती है। इस सम्बन्ध में व्होर्फ ने भाषाविज्ञान को तत्वतः ‘अर्थ की खोज’ करने वाला विषय बतलाया है तथा अर्थ की उपेक्षा करने के कारण अपने समय के मनोविज्ञान के सभी सम्प्रदायों की आलोचना की है।  ब्लूमफील्ड के बाद ‘संरचनात्मक भाषाविज्ञान’ में ‘अर्थ’ उपेक्षित हो गया था किन्तु सातवें दशक से भाषा विवेचना में ‘अर्थ’ की पुनः समाहित किया जाने लगा है। भाषा के प्रत्येक स्तर पर ‘अर्थ’ को ‘वितरण’ के समान महत्वपूर्ण मानकर ‘अर्थ का वितरणात्मक विश्लेषण किया जा रहा है। फर्थ ने अर्थ के विश्लेषण के लिए ‘परिस्थिति-संदर्भ’ पद्धति का आष्किार किया है जिसमें शब्द के सहप्रयोगों के आधार पर उसका अर्थ निर्धारित किया जाता है। (दे0 6.5.3.) काट्ज तथा फोडर  ने शब्द के पूरे अर्थ को अर्थ-परमाणुओं के रूप में खंडित करने की विधि प्रतिपादित की है। अर्थीय चिह्रकों के आधार पर भिन्न-भिन्न शब्दों की अर्थ-भिन्नता तथा एक ही शब्द के अनेकार्थक अणुओं को वस्तुपरक पद्धति से विश्लेषित किया जा सकता है। शब्द के आत्मगत प्रभाव से इतर, अर्थ के अध्ययन की वस्तुगत पद्धति के लिए मनोविज्ञान को भाषाविज्ञान से मार्गदर्शन मिल सकता है।

      (5.)   अन्य-भाषी व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक परीक्षण-भाषाविज्ञान की मान्यता है कि एक भाषा के शब्द का पर्याय दूसरी भाषा में खोजना दुष्कर है। शब्द के पूर्ण पर्याय प्रायः नहीं होते। प्रत्येक भाषा के व्यक्ति का दृष्टिकोण अपनी भाषा की संरचना से प्रभावित होता है। (दे0 मानवजाति भाषाविज्ञान, अध्याय 13)

मनोवैज्ञानिक अन्य-भाषी व्यक्ति के वाक्-व्यवहार का परीक्षण किस प्रकार सम्पन्न करें ? हम उससे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि एक व्यक्ति के वाक्-व्यवहार का परीक्षण करने के लिए वह अन्य-भाषी व्यक्ति की भाषा सीखें। मनोवैज्ञानिक सामान्यतः अनुवाद के माध्यम से परीक्षण कार्य करता है। यहाँ हम जोर देकर यह कहना चाहते है कि उसे अनुवाद के माध्यम

से परीक्षण करते समय सतर्कता बरतनी चाहिए।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ’अर्थ’ के परिमापन का अर्थ ‘व्यवहार का परिमापन’ है। भाषाविज्ञान मनोवैज्ञानिक को संचेत करता है कि उसे भाषागत संरचना तथा शब्द के सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़े हुए भावार्थ को ध्यान में रखकर परीक्षण-कार्य करना चाहिए।

      भारतवर्ष में अंग्रेजी के माध्यम से कार्य करने वाले मनोविश्लेषक जब इन तथ्यों पर ध्यान नहीं देते तो अपने विश्लेषण में सही मार्ग से भटक जाते हैं।

      यदि मनोविश्लेषक को किसी अन्य भाषा-क्षेत्र में स्थाई रूप से अन्य-भाषी व्यक्तियों का परीक्षण-कार्य करना हो तो उसे उस क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा का ज्ञान होना चाहिए तथा स्थानीय सांस्कृतिक एवं भावात्मक शब्दों के अर्थ-प्रयोगों से सुपरिचित होना चाहिए।

      (6.)   चिन्तन-चाम्स्की के व्याकरण-दर्शन ने मनोविज्ञान को चिन्तन की विशिष्ट आधार भूमि प्रदान की है। चाम्स्की की मान्यता है कि मनुष्य पशु से प्रज्ञा या विचारणा के कारण नहीं अपितु ‘भाषा-सामथ्र्य’ के कारण भिन्न है। चाम्स्की ने ‘सार्वभाषिक-व्याकरण’ का दर्शन प्रस्तुत किया है। विशिष्ट भाषा के व्यक्ति की ‘भाषा-सामथ्र्य एवं ‘भाषा-निष्पादन’ अन्तर किया है। ‘सार्वभाषिक व्याकरण’ भाषाओं की सार्वभौमिक विशेषताओं का आकलन है, भाषाओं से सम्बन्धित सामान्य सिद्धान्तों का निर्धारण है, सभा भाषाओं में अन्तर्निहित संरचना के सामान्य लक्षणों की खोज है। इन सामान्य लक्षणों का अन्तिम आधार मानव मस्तिष्क है। भाषा-अर्जन की चेतना-शक्ति के कारण एक बच्चा संसार की किसी भी भाषा को सीख लेता है। इस आधार पर चाम्स्की, लेनबर्ग एवं मेकनील आदि विद्धानों ने भाषा-अर्जन की ‘चेतना-शक्ति’ को जन्मजात माना है। चेतना-शक्त् िमानसिक है। भाषा सीखने की सामथ्र्य का आधार ‘मानसिक’ है। विशेष भाषा के बोलने का आधार ‘व्यवहार-अभ्यास है। व्यक्ति व्यवहार में भाषा का ‘निष्पादन’ करता है। निष्पादन की स्थिति में स्मृति, ध्यान रूचि आदि कारणों के भेदों के कारण प्रत्येक व्यक्ति के वाक्-व्यवहार में अन्तर आ जाता है। (दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्याय 12)। चाम्स्की ने भाषा की मानसिक यांत्रिकता का विश्लेषण कर, संज्ञान ;ब्वहदपजपवदद्ध का मूल आधार भाषा-शक्ति को स्वीकार किया है तथा संज्ञानात्मक-मनोविज्ञान का चिन्तन की नयी भूमिका प्रदान की है। (दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्याय 12)

 

8.2   मनोविज्ञान: भाषाविज्ञान के लिए सहायक

      (1.)   भाषा का मानसिक पक्ष-भारतीय परम्परा भाषा की मानसिक-क्रिया तथा वाचिक-क्रिया दोनों को महत्त्व देती हैं।

      मनोविज्ञान भाषा के मानसिक पक्ष के सामान्य स्वरूप  का अध्ययन करता है। यह भाषा के बोलने, सुनने, ग्रहण करने तथा शब्दार्थ प्रतीति करने पर विभिन्न मानसिक स्थितियों के प्रभाव की विवेचना करता है (दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्याय 12)

      (2.)   तंत्रिका-मनोविज्ञान ध्वनिविज्ञान-व्यक्ति के मस्तिष्क में विचार उत्पन्न होता है। इससे तंत्रिकायें उत्तेजित होती हैं। तंत्रिकायें वाक्-अवयवों को ध्वनि-उच्चारण के लिए प्रेरित करती हैं।

      ध्वनि लहरें श्रोता के कानों के विभिन्न मार्गों को कम्पित करती हैं। कान के अन्तिम भाग से सम्बद्ध श्रवण-तंत्रिका के माध्यम से ध्वनि-लहरें मस्तिष्क तक पहुँचती हैं।

      ‘तंत्रिका-मनोवैज्ञानिक ध्वनिविज्ञान’ में वाक्-व्यवहार से सम्बन्धित तंत्रिकाओं का तथा उनके मस्तिष्क एवं पेशियों से अन्तर्सम्बन्घ का अध्ययन किया जाता है। इस दृष्टि से वाटसन, जेकब्सन, मैक्स फिस आदि मनोवैज्ञानिकों के कार्य नयी दिशा प्रदान कर सकते हैं।

      (3.)   वाक्य विज्ञान-किसी व्यक्ति के वाक्य प्रयोग से उसकी मनःस्थिति का पता लगाया जा सकता है।

      एक ग्लास के आधे भाग में पानी है।

      एक व्यक्ति कहना है कि ग्लास आधा भरा है।

      दूसरा व्यक्ति कहना है कि ग्लास आधा खाली है।

      दो व्यथ्कत्यों की उपर्युक्त अभिव्यक्तियों उनकी भिन्न मानसिकता की द्योतक हैं। चाम्स्की की मान्यता है कि प्रत्येक भाषा के बोलने वाले के मस्तिष्क में भाषा की आन्तरिक संरचना के मूलभूत नियम होते हैं। भाषा-साम्थ्र्य के कारण वह ऐसे वाक्यों का प्रजनन कर पाता है जो उसने कभी नहीं सीखे। श्रोता के रूप में वह ऐसे वाक्यों को समझ लेते है जो उसने पहले नहीं सुने। वक्ता प्रयुक्त भाषा रूप ‘निष्पादन’ है,  जो वक्ता की मानसिक स्थितियों के अनुरूप प्रभावित होता है। मनोविज्ञान भाषा-सामथ्र्य विषयक सूत्रों या नियमों के खोज करने तथा भाषा -निष्पादत सम्बन्धी अध्ययन करने में सहायक है।

(4.)   अर्थ विज्ञान-शब्द के अर्थ पर विचार करते समय भाषावैज्ञानिक की दृष्टि वस्तुपरक होती है। वैयाकरण किसी भाषा का व्याकरण तैयार करते समय यह जानना चाहता है कि उस भाषा का विवेच्य शब्द अथवा वाक्य सार्थक है या नहीं ? कोशकार पर्याय, अनेकार्थक तथा समनाम शब्दों के संग्रह की दृष्टि से शब्दों के अर्थों पर विचार करता है। ऐतिहासिक भाषा विज्ञान में किसी शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार किया जाता है, उसके इतिहास की व्याख्या प्रस्तुत करते समय उसके अर्थ की विकास-परम्परा पर वस्तुगत दृष्टि से प्रकाश डाला जाता है। इधर ‘अर्थ’ को भाषा के प्रत्येक स्तर पर विश्लेषित करने का जो प्रयास हो रहा है उसमें भी शब्द के अनिधेयार्थ एवं भाषा के व्यवस्था एवं संरचना रूपों के अर्थ-निर्धारण पर दृष्टि केन्द्रित है। मनोविज्ञान अर्थ का अध्ययन मनुष्य के व्यवहार को जानने की दृष्टि से करता है। वह शब्द के अर्थ का परिमापन करता है। शब्द-प्रयोग के समय वक्ता की मानसिक स्थिति की दृष्टि से तथा श्रोता की उत्तेजन-प्रतिक्रिया की दृष्टि से विचार करता है। मनोवैज्ञानिक के लिए अर्थ का परिमापन मनुष्य के व्यवहार का परिमान है। इस कारण मनोविज्ञान में ‘अर्थ’ पर अनेक दृष्टियों से विचार किया जाता है। मनोवैज्ञानिक शब्द के बोलने एवं सुनने के समय सामान्य शारीरिक प्रतिक्रियाओं का तथा विशिष्ट शब्दों के बोलते समय वक्ता की एवं सुनते समय श्रोता की विशिष्ट शारीरिक-प्रतिक्रियाओं का अंकर करता है। यह ‘सीखने’’ की प्रक्रिया पर विशद् विचार करता है। शब्द एवं अर्थ को सीखते समय की प्रक्रिया, प्रतिक्रिया, व्यवधान क्रम आदि का अध्ययन करता है। वाचक तथा वाक्य के सम्बन्ध स्थापन से उत्पन्न अर्थ-प्रक्रिया का विश्लेषण करता है। अर्थ के परिमापन के लिए सांख्यिकी-तकनीक भी अपनाता है। अर्थ परिमापन की विविध विधियों को अपनाने के उपरान्त ‘अर्थ-निर्धारण’ करता है।

      अर्थ आत्मगत है अर्थात् अर्थ का बोध ‘व्यक्ति’ को होता है किन्तु अर्थ का विविध विधियों से परिमापन करने के कारण इसका निर्धारण सम्भव है।

      ‘सोस्यूर’, ‘आग्डेन एवं रिचडर््स, ‘व्लूमफील्ड’ एवं ‘येल्मस्लेव’ के अर्थ सम्बन्धी विचार मनोवैज्ञानिक चिन्तन से प्रभावित हैं।

      भाषावैज्ञानिक दृष्टि से शब्द के ‘अधिधेयार्थ’ पर विचार किया जा सकता है। भाषा-प्रयोग के समय कुछ शब्द विशिष्ट भावात्मक तथा संवदनात्मक व्यापारों का सम्प्रेषण करते हैं। शब्दों की ‘अभिधा’ के अतिरिक्त ‘लक्षणा’ एवं ‘व्यंजना’ शक्तियाँ भी हैं जिनके कारण ‘लक्ष्यार्थ’ एवं ‘व्यंग्यार्थ’ का बोध होता है।

      भाषाविज्ञान को, शब्द के लक्ष्यार्थ, व्यग्यार्थ एवं भाषा के द्वारा व्यक्त भावात्मक एवं संकल्पनात्मक अर्थों के परिमापन एवं निर्धारण में, मनोविज्ञान से दिशा प्राप्त करनी चाहिए।

      (5.)   भाषा अर्जन तथा बच्चों में भाषा का विकास-इन दिशा में दोनों विषय परस्पर सहायक हैं। मनोविज्ञान के अध्ययन का एक क्षेत्र ‘सीखना’ है। भाषा सीखने का मूल आधार क्या है ? सीखने की मानसिक-सामथ्र्य के कारण भाषा सीखी जाती है या समाज में भाषा रूपों को सुनकर व्यक्ति अपनी आदत का निर्माण करता है ? इनमें किस पर बल देना चाहिए ? मनोविज्ञान में भाषा-अर्जन सम्बन्धी भिन्न दृष्टिकोण हैं इनका प्रभाव व्याकरण के रचना-सांचों पर पड़ा है।

      बच्चों में भाषा का विकास किस प्रकार होता है ? सर्वप्रथम शिशु किन ध्वनियों का उच्चारण करता है। विभिन्न भाषाओं के शिशु ध्वनियों, शब्दरूपों, वाक्यरूपों को क्रमशः किस प्रकार तथा कितना सीखते हैं। मनोविज्ञान में इन सभी पक्षों की विवेचना की जाती है।

      मनोवैज्ञानिक अध्ययन से किसी भाषा के आधारभूत वाक्य-साँचों, सर्वाधिक प्रयुक्त व्याकरणिक रूपों, आधारभूत-शब्दावली, भेदक ध्वनि रूपों, प्राथमिक ध्वनिग्रामों, तथा भेदक तत्वों की पहचान में सहायता मिल जाती है। इससे भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन में भी सहायक ली जा सकती है (दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्ययन 12)

      (6.)   अन्य-भाषा शिक्षण-अन्य भाषा सीखते समय प्रशिक्षणार्थी सचेत होता है। मनोविज्ञान अन्य-भाषा को अधिकाधिक सहज रूप में सिखाने के सम्बन्ध में भाषा-वैज्ञानिक की सहायत करता है।

      अन्य भाषा सीखना अधिगत-व्यवहार है। सीखने में प्रशिक्षणार्थी की रूचि, लगन, प्रेरणा का महत्त्व निर्विवाद है।  मनोविज्ञान की सहायता से प्रशिक्षणार्थी की मनोवैज्ञानिक स्थिति तथा उसके भाषा-कौशल का परिमापन किया जाता है।

      लेखक को विदेशी छात्रों को हिन्दी पढ़ाते समय उनके भाषा-अर्जुन के सापेक्षिक अंतरों का अनुभव हुआ है। बेल्जियम देश की फ्लेमिश-भाषी  श्रीमती एलिजाबेध खान ने हिन्दी ने हिन्दी सीखने में अत्यधिक उत्साह एवं निष्ठा दिखायी। उन्होंने बहुत जल्दी भाषा सीखी। इसके कारणों में से सर्वप्रथम कारण ‘प्रेरणा’ थी। बेल्जियम में उनका विवाह हिन्दी भाष श्री खान से हुआ। अपने पति से हिन्दी में बात कर सकने की आवश्यकता के कारण उन्होंने हिन्दी सीखने के लिए बेल्जियम शासन के शिक्षा मंत्रालय को छात्रवृत्ति प्राप्त की। वे उसी छात्रवृत्ति पर भारत में हिन्दी सीखने आयीं तथा उन्होंने सापेक्षिक दृष्टि से कम समय में हिन्दी बोलना सीख लिया।

      (7.)   शैलीविज्ञान-प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग स्थितियों में भिन्न शैलियों का प्रयोग करता है। इसी कारण उसकी बात कभी मीठी हो जाती है तो कभी कड़वी, कभी रसीली, तो कभी नीरस। कभी बात से रस टपकता है तो कभी क्रोध प्रकट होता है। कभी व्यक्ति मधुर बात करता है जिससे दिल मिल जाता है, कभी तीखी बात करना है जिससे दिल फट जाता है। कभी उसकी बात को महत्त्वपूर्ण माना जाता है तो कभी फालतू। प्रत्येक रचनाकार की अपनी शैली होती है। ‘चयन’ एवं ‘विचलन-प्रयोगों’ का व्यक्ति की मानसिक स्थिति से सम्बन्ध है। इस दृष्टि से मनोविज्ञान ‘शैली प्रयोगों’ का व्यक्ति की मानसिक स्थिति से सम्बन्ध है। इस दृष्टि से मनोविज्ञान ‘शैलीविज्ञान’ का सहायक है। (दे0 शैली-विज्ञान अध्याय 15)

      (8.)   भाषा-परिवर्तन-मनोवैज्ञानिक कारणों से भाषा के प्रत्येक स्तर पर परिवर्तन होता है।

      ध्वन्यात्मक स्तर पर बनकर बोलने, बोलने में शीघ्रता करने तथा भावातिरेक में बोलने के कारण शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं साँप-शाँप, पण्डित जी-पण्डिज्जी तथा बेटी-बिटिया में यह प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हैं।

      इसी प्रकार व्याकरणिक स्तर पर वाक्य की रचना बदल जाती है। जब यह बदलाव ‘सामाजिक-मनोविज्ञान’ के धरातल पर होता है तो भाषा की व्यवस्था एवं संरचना भी परिवर्तित हो जाती है। हिन्दी में वर्तमान-सातत्य-क्रिया धरातल पर पुल्ंिलग बहुवचन प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एक विद्यार्थी भी कहता हैं-‘हम जा रहे हैं, हम पढ़ रहे हैं। वचन भेद की समाप्ति के साथ ही लिंग भेद भी मिट रहा है। एक लड़की भी कक्षा में बोलते हुए सुनी जा सकती है-‘सर’!  हम पढ़ रहे हैं।’

      शब्दों में अर्थ-परिवर्तन के लिए मनोविज्ञान बहुत अधिक उत्तरदायी है। नम्रता से प्रेरित व्यक्ति दूसरे से पूछता है-‘‘आपका दौलतखाना कहाँ है ? मेरे गरीब खाने पर कभी तशरीफ लाइए।’’ व्यंग्य में पूछने के कारण ही ‘महात्मा’, ‘महापण्डित’, ‘नेता’ के अर्थ बदल रहे हैं। ‘आप तो पूरे महात्मा हैं, ‘आप महापण्डित जो ठहरे।’ ‘और सुनाओ नेताजी, क्या हाल-चाल है।’ प्राचीन अवेस्ता (जेन्दावेस्ता ग्रन्थ की भाषा, फारसी भाषा की पूर्ववर्ती भाषा) में ‘अहुर’ में ‘असुर’ का अर्थ ‘देवता’ है। भारत का असुर का अर्थ राक्षस और सुर का अर्थ देवता है। इस अर्थ-भेद का कारण ईरानी-आर्य शाखा और भारतीय-आर्य शाखा के बीच तत्कालीन व्याप्त मनोवैज्ञानिक घृणा है। श्री रामधारीसिंह दिनकर आदि के निष्कर्ष इसका समर्थन करते है।

      भावावेग की मनःस्थिति में जब कोई ‘सोल’, ‘बेटा’, ‘नालायक’ का उच्चारण करता है तो इनका वही अर्थ नहीं होता जो सामान्य स्थिति में होता है।

      (9.)   भाषा चिन्तन-मनोविज्ञान ने भाषा चिन्तन को प्रभावित किया है। इसे ‘ब्लूमफील्ड’ एवं ‘चास्की’ के उदाहरणों से समझा जा सकता है। ब्लूमफील्ड व्यवहारवादी हैं। व्यवहारवादी मनोविज्ञान की मान्यता है कि मनुष्य के व्यवहार का निरीक्षण परीक्षण सम्भव हैं, मन का नहीं। व्यवहार को समझने के लिए अनुभव, चेतना और अन्तर्निरीक्षण का कोई महत्व नहीं है। उद्धीपनों और प्रतिक्रियाओं के अध्ययन से व्यवहार को समझा जा सकता है। इस प्रकार मनोविज्ञान ‘मन का विज्ञान’ नहीं ’व्यवहार का विज्ञान’ है। ब्लूमफील्ड ने भाषा को विशेष उद्धीन से प्रेरित विशेष वाचिक प्रतिक्रिया कहा है। इनका भाषा-दर्शन व्यवहारवादी मनोविज्ञान या यांत्रिकमनोविज्ञान पर आश्रित है। इन्होंने एक मनुष्य के आचरण की दूसरे मनुष्य के आचरण से भिन्नता का कारण अभौतिक गुणक (मनस या मनःशक्ति या आत्मा) को स्वीकार नहीं किया है। इन्होंने मानवीय आचरण का अध्ययन भौतिकी या रसायनशास्त्र की तरह करने में विश्वास प्रकट किया है। इन्होंने ‘मनोवादी मनोविज्ञान’ या ‘मानसिकवाद’ की व्याख्यात्मक प्रणाली को स्थान नहीं दिया है अपितु ‘यांत्रिक-विज्ञान’ की वस्तुपरक पद्धति को महत्व दिया है। इन्होंने भाषा को वत्ता के मानसिक पक्ष से नहीं जोड़ा विशेष उद्धीपन से प्रेरित भाषिक व्यवहार या भाषिक प्रतिक्रिया को भाषा माना है। भाषा परक तथ्यों का अध्ययन रूपात्मक-विश्लेषण के आलोक में करने का उद्घोष किया है।

      चाम्स्की का भाषा चिन्तन ब्लूमफील्ड के भाषा चिन्तन से भिन्न है। चाम्स्की के भाषा-    अध्ययन तथा संज्ञात्मक मनोविज्ञान मंे गहरा सम्बन्ध है। चाम्स्की के भाषा अध्ययन का आधार व्यवहारवादी मनोविज्ञान का ‘उत्तेजन-प्रतिक्रिया व्यवहार’ नहीं है। यह संज्ञानात्मक मनोविज्ञान की ‘संज्ञान’ की अवधारणा से प्रभावित है। ‘संज्ञान’ एक व्यापक शब्द है। यह स्मृति एवं चिन्तन की प्रक्रिया का द्योतक है, इसमं जानने का आधार मानसिक क्रियाऐ- प्रत्यक्षण, स्मरण, समझना, तर्क, निर्णय आदि मानसिक क्रियाऐं हैं। ‘संवेदन’ तथा ‘संज्ञान’ में अन्तर है। संवदेन के द्वारा प्राणी को उत्तेजन का आभास मात्र होता है ज्ञान नहीं होता। ‘संज्ञान’ से मनुष्य के संवेदन संगठित होते है सार्थक बनते हैं। मनुष्य अन्य प्राणियों से इस कारण श्रेष्ठ है कि वह ‘संज्ञान-शक्ति’ के द्वारा ‘संवेदनों’ को नाम, रूप, गुण आदि भेदों से संविशेष बनाकर ज्ञान प्राप्त करता है। चाम्स्की ने ने संज्ञानात्मक मनोविज्ञान की भाँति भाषिक-सामथ्र्य को मानसिक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया है।  इन्होंने भाषा-व्याकरण का उद्धेश्य निष्पादित सामग्री में अन्तर्निहित तथा भाषा-भाषियों के मस्तिष्क में विद्यमान सामथ्र्य नियमों की खोज करना माना है। इसी सामथ्र्य के कारण भाषा का कोई वत्ता परिस्थिति के अनुकूल नए-नए वाक्यों को बना पाता है। चाम्स्की ने संज्ञानात्मक मनोविज्ञान की अवधारणाओं के आधार पर एक ओर अपना भाषा-दर्शन स्थापित किया है तो दूसरी ओर अपने चिन्तन द्वारा मानव-मस्तिष्क के   अध्ययन की दिशा में योगदान भी दिया है। (दे0 मनोभाषाविज्ञान, अध्याय 12)

8.3.  अध्ययन की स्वतन्त्र दृष्टियाँ

      भाषाविज्ञान एवं मनोविज्ञान परस्पर एक दूसरे की सहायता तो करते है; किन्तु फिर भी दोनों के अध्ययन की स्वतंत्र दृष्टियाँ एवं विधियाँ है। भाषाविज्ञान वाक्-व्यवहार का अध्ययन वाक्-संरचना की दृष्टि से करता है, किन्तु मनोविज्ञान वाक्-व्यवहार का अध्ययन मनुष्य के व्यवहार को जानने की दृष्टि से करता है। भाषाविज्ञान एवं मनोविज्ञान में गहरा सम्बन्ध होने के कारण एक नया विषय विकसित हुआ है जिसको मनोभाषा विज्ञान (Psycholinguistics)  के नाम से पुकारा जाता है। मनोभाषाविज्ञान के अन्तर्गत भाषा-अभिव्यक्ति के मानसिक पक्ष के सम्बन्ध में भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से विचार किया जाता है।

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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