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हर तरफ है निष्ठाओं का अकाल

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डॉ. दीपक आचार्य

 

प्रवृत्तियाँ सब तरफ खूब हैं। वर्तमान में अपार संभावनाएं हैं और अनन्त पसरा हुआ कार्यक्षेत्र। पैसा भी खूब है और लोगों की विस्फोटक भीड़ भी। जिधर निगाह जाती है उधर आदमियों का रैला का रैला दौड़ता-भागता नज़र आता है।

महानगरों में तो आदमी भी भागते हैं और जड़ संसाधन भी किसी न किसी मशीन के सहारे सरपट भागते हुए ऎसे नज़र आते हैं जैसे कि किसी दूसरे ग्रह पर चींटियाँ रेंग रही हों जिनके पास कोई लक्ष्य न हो।

कोई इधर भाग रहा है कोई उधर भाग रहा है। सब भाग रहे हैं । कुछ को पता है कि कहाँ जाना है और कहाँ जा रहे है॥ बहुत सारों को यह तो पता है कि कहीं न कहीं जा रहे हैं मगर यह पता नहीं कि आखिर किस मंजिल की ओर से जा रहे हैं और रास्ता कौन सा है। 

ढेरों ऎसे हैं जो मंजिल भी जानते हैं, रास्तों का भी पता है, दृढ़ इच्छाशक्ति भी है लेकिन आगे वाली भीड़ बढ़ने ही नहीं दे रही है या कि कोई अवसर ही नहीं देना चाहता इन्हें। बहुत सारे थक हार कर रास्ते में भी थम गए हैं और कई ऎसे हैं जिन्होंने हार मानकर रास्तों के पड़ावों को ही विश्राम मान लिया है और वहीं बस गए हैं।

सब तरफ मारामारी मची हुई है अपनी हैसियत दिखाने और बनाने की। इस भागमभाग में न कोई अपनों को देख रहा है, न परायों को। सबकी नज़र अपने ही अपने पर है और अपनी ही अपनी पर उतरे हुए हैं सारे के सारे लोग।

न कहीं कोई लाल झण्डी है, न कहीं कोई हरी या पीली।  जिसे जो इच्छा होती है वही झण्डी ऊँची कर कभी रास्ते को जाम कर देता है, कभी सभी को जोरों से भगा देता है। पता नहीं कहाँ क्या हो रहा है।

सारे के सारे महसूस जरूर कर रहे हैं कि कुछ ऎसा ही हर तरफ हो रहा है कि जो अपने आप में अजीब और अविस्मरणीय है। पुरखों ने भी बहुत सारे भीषण और भयावह झंझावात देखे हैं, बहुत पापड़ बेले हैं मगर अब जो कुछ हो रहा है उसकी न उन्होंने कल्पना की होगी, न हमने।

कुछ लोग चिन्तित हैं कि आखिर यह सब क्यों और क्या हो रहा है। बहुत सारे अपनी ही मस्ती में रमे हुए हैं, यह कहते हुए कि जो हो रहा है होने दो। कामों और ठिकानों की कोई कमी नहीं, कर्मयोग के सैकड़ों-हजारों रास्ते खुले हुए हैं।

समाज और देश की सेवा के अपार और अनन्त अवसर हैं, समाजसेवा के इतने सारे आयाम हमारे सामने हैं, कर्मयोग की धाराओं और उपधाराओं का कल-कल हम सुन रहे हैं।

अनन्त अवसरों के बावजूद भीड़ का आलम यह है कि कोई भी हाथ बँटाना नहीं चाहता। कोई छोटे से शुरूआत कर बड़ा बनना नहीं चाहता। सब के सब ऊँचे ख़्वाबों के सहारे दिन काट या बिगाड़ रहे हैं। भविष्य के सुनहरे सपनों की भेंट मासूम वर्तमान चढ़ रहा है।

इंसानों की भारी भीड़ में निष्ठाओं, ईमानदारी और समर्पण का अभाव है।  बहुत सारे क्षेत्र हैं जिनमें निष्ठावान और ईमानदार लोगों की तलाश है लेकिन इनका अकाल ही दिखाई दे रहा है। भौतिकता की अंधी दौड़ में हम सभी का हश्र वस्तुओं की तरह होता जा रहा है जहां आदमियत नहीं बल्कि उसके भौतिक मूल्य से पहचान होने लगी है।

और जब से नई पहचान बनी है, आदमी की पुरानी पहचान खोने लगी है। अक्सर लोगों को  यह कहते सुना जाता है कि अच्छे लोगों की तलाश है जो ईमानदारी से काम कर सकें, हुनरमंद हों और समर्पित भाव से सेवा के इच्छुक हों।

लेकिन थोड़े दिनों तक आदमी लाईन पर चलता है उसके बाद मायावी पाशों में घिर कर कभी इधर खिंचने लगता है कभी उधर। बहुत सारे क्षेत्र हैं जिनमें आज भी निष्ठाओं और ईमानदारी से काम करने वालों की आवश्यकता है। पर मिल नहीं रहे ऎसे लोग।

इस आदमी जात को भी न जाने पिछले कुछ दशकों में ऎसी कौनसी बीमारी लग गई है कि वह आदमियत की मर्यादाओं में रहना चाहता ही नहीं, कितना ही बांधों, बार-बार बंधन तोड़कर उन्मुक्त होने लगता है।

यही कारण है कि निष्ठाओं का संकट पैदा हो गया है। घर-परिवार, अपने संस्थान, क्षेत्र, संगठन और हर कहीं निष्ठाओं की कमी का दौर व्याप्त है। निष्ठा, ईमान और समर्पण का ताना-बाना जब कहीं ढीला होने लगता है वहाँ हर तरह के संकट व्याप्त होने लगते हैं।

आज हम हमारे आस-पास से लेकर दूरदराज तक हर मामले में निष्ठाओं के संकट से त्रस्त हैं। हालात ये हैं कि आदमी खाता किसी और की है और बजाता किसी और की।

भरोसे का भयानक संकट सब तरफ इंसान को संदिग्ध बना रहा है। समय आ गया है कि जब हम अपने आपमें भरोसा पैदा करें, निष्ठावान बनें और जिस किसी के साथ हैं, जिस किसी के लिए काम कर रहे हैं उनके प्रति निष्ठावान बनें।

निष्ठाओं की बेकद्री न करें।  निष्ठाओं के लिए किसी को लाठी लेकर निष्ठा सिखायी नहीं जा सकती है। यह अन्तर्मन से जुड़ा विषय है।

जो लोग अपने आश्रयदाता या सहकर्मियों अथवा घर-परिवार वालों, देशवासियों के प्रति निष्ठावान नहीं हैं वे लोग न खुद के हो सकते हैं, न अपने माँ-बाप, पति-पत्नी, कुटुम्बियों के, और न ही ईश्वर के।  जिस दिन निष्ठाएं फिर से जग जाएंगी, हम और हमारा समाज अपने आप उन्नति के शिखर पर होगा। निष्ठाओं का जागरण राष्ट्र जागरण का मूलाधार है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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