गुरुवार, 2 जुलाई 2015

अनुपम सौंदर्य बिखेरता है पलायथा

- डॉ. दीपक आचार्य

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कोटा संभाग नैसर्गिक सौंदर्य के मामले में कहीं उन्नीस नहीं है। नदियों, पहाड़ों, हरियाली, पानी और सेहतमंद आबोहवा से लेकर मुग्ध कर देने वाले रमणीय परिवेश के साथ ही ऎतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और बहुविध लोक सांस्कृतिक आयामों की दृष्टि से भी यह बेमिसाल है। 

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हाड़ौती क्षेत्र अपने आप में साहित्य, संस्कृति और पुरातन परंपराओं का इतना बड़ा जखीरा समेटे हुए है कि यह हर मामले में बेमिसाल ही कहा जा सकता है।

कोटा संभाग का हर जिला अपने आप में कई विशिष्टताओं को लिए हुए है। इन्हीं में बाँरा जिला है जो कई पुरातन संपदाओं और परंपराओं को समेटे हुए प्राच्य धरोहरों की कीर्तिगाथा सुना रहा है

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इन्हीं में कालीसिंध नदी के मुहाने बसा पलायथा प्राचीन महत्त्व का क्षेत्र है। प्रकृति और पुरातन इतिहास का मेल दर्शाने वाला यह कस्बा काफी पुराना है और यह सिद्ध करता है कि किसी जमाने में इस क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक और ऎतिहासिक दृष्टि से कोई बड़ा गढ़ रहा है।

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पलायथा के प्राचीन महल देखने लायक हैं। इनमें बेजोड़ शिल्प स्थापत्य का दर्शन होता है वहीं पलायथा की प्राचीन छतरियाँ भी कलात्मकता के साथ-साथ पूर्वजों की परंपरा से जोड़ती हैं और गौरव का अहसास कराती हैं।

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दूर-दूर तक पसरी कालीसिंध नदी का वैभव हर क्षण प्रकृति की महिमा का जय गान करता नज़र आता है। कस्बे से लगा दोहरा पुल जहाँ आधुनिक विकास का स्पष्ट प्रतीक है वहीं कालीसिंध का जल सौंदर्य निहारते हुए इन समानान्तर सेतुओं पर से होकर गुजरना और तनिक देर सेतु पर रुके रहकर आक्षितिज पसरी नैसर्गिक छटा का विहंगम दृश्यावलोकन भी अपने आप में अलग ही छटा  दर्शाता है।

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हाड़ौती क्षेत्र  भर में इसी प्रकार के ढेरों स्थल हैं जो बहुआयामी लोक जीवन के साथ सुनहरे परिदृश्य का दिग्दर्शन कराते हुए हर किसी को भीतर तक आह्लादित कर देने का सामथ्र्य रखते हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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